Friday, September 30, 2016

दो बच्चों को माओवादी बताकर हत्या की तो कल्लूरी समर्थकों ने कहा, 'हो गया शतक'

दो बच्चों को माओवादी बताकर हत्या की तो कल्लूरी समर्थकों ने कहा, 'हो गया शतक'




राजकुमार सोनी@
CatchHindi | 30 September

23 सितंबर को बस्तर के एक गांव सांगवेल में दो नाबालिगों की कथित मुठभेड़ पर सवाल उठने लगे हैं. दूसरी तरफ़ आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी के समर्थकों ने ख़ुशी जताते हुए इसे मौत की सेंचुरी करार दिया है.

बस्तर में दो नाबालिग छात्रों सहित तीन महिलाओं को 'माओवादी' बताकर मौत के घाट उतारने की वारदात पर अग्नि संगठन ने आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को सेंचुरी मारने पर बधाई दी है. समर्थकों ने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में कहा है कि मिशन 2016 के तहत कल्लूरी साहब ने माओवादियों को मौत के घाट उतारने का जो लक्ष्य रखा था वह शतक बनाकर पूरा कर लिया गया है.

अग्नि के कर्ताधर्ता फारुख अली का कहना है कि सामाजिक कार्यकर्ता और माओवादी समर्थक चिल्लाते रहेंगे और बस्तर के जवान ठोंकते रहेंगे. इधर दो नाबालिगों की मौत के बाद बस्तर में बवाल मच गया है. सामाजिक कार्यकर्ताओं, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का आरोप है कि पुलिस ने एक बार फिर असल माओवादियों से लोहा लेने के बजाय बेकसूर ग्रामीणों को अपना निशाना बनाया है.

वारदात बीते शुक्रवार 23 सितम्बर की है. बस्तर के थाना बुरगुम के गांव सांगवेल में पुलिस ने अलसुबह दो छात्रों को माओवादी बताकर मौत के घाट उतार दिया था. इस घटना के तुरन्त बाद आईजी कल्लूरी ने जवानों को एक लाख रुपए नगद ईनाम देने की घोषणा की तो गांववालों का यह आरोप सामने आया कि मुरिया आदिवासी सोनकू राम अपने एक दोस्त सोमडू के साथ एक शोक संदेश लेकर अपनी बुआ के घर सांगवेल गया था.

रात होने की वजह से दोनों वहीं ठहर गए. अलसुबह पुलिस ने उन दोनों बच्चों को घर से उठा लिया. घर में मौजूद उनकी बुआ ने पुलिसवालों को रोकने की कोशिश की तो उनके साथ मारपीट की गई. इसके बाद दोनों को पुलिस पास के जंगल ले गई और फिर हत्या कर दी.

फिर उठे सवाल!

दो बच्चों की मौत के बाद बस्तर में एक बार फिर सवालों का पहाड़ खड़ा हो गया है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल का कहना है कि अगर पुलिस की नज़र में बच्चे किसी तरह की गतिविधियों में शामिल थे तो उन्हें पकड़ने के बाद बाल संरक्षण गृह में रखा जा सकता था.

बघेल ने कहा कि सरकार बस्तर से माओवादियों के खात्मे के नाम पर सिर्फ आदिवासियों की हत्या करने में लगी हुई है. माओवाद प्रभावित दंतेवाड़ा की विधायक देवती कर्मा ने बताया कि जब उन्होंने मौके का मुआयना किया, तब उन्हें उस जगह गोली के खोखे मिले जहां बच्चों की लाश मिली थी.

इससे पता चलता है कि पुलिस ने बच्चों पर बेहद नजदीक से गोलियां दागी हैं. घटना स्थल का मुआयना करके लौटे सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने बताया कि पुलिस जब बच्चों को घर से उठाकर ले जा रही थी, तब उनकी चीख-पुकार सुनकर गांववाले जाग गए थे.

पुलिस ने दोनों बच्चों को पास के एक नाले में ले जाकर पहले तो डूबा-डूबाकर मारा और फिर गोलियां दाग दीं. बच्चों की मौत के बाद पुलिस के जवानों ने लाश के पास बैठकर शराब भी पी. ठाकुर का दावा है कि पुलिस की इस करतूत के कई चश्मदीद हैं, लेकिन वे इस बात को लेकर डरे हुए हैं कि कहीं पुलिस उन्हें भी माओवादी बताकर न मार डाले.

माओवादी नहीं था मेरा बेटा

कथित मुठभेड़ में मारे गए सोनकू के पिता पायकूराम का दावा है कि उनका बेटा और उसका दोस्त, दोनों माओवादी नहीं थे. उनका माओवादियों से कभी कोई संबंध भी नहीं था. पायकू ने बताया कि घर में बुखार की वजह से एक बच्चे की मौत हो गई थी जिसकी सूचना देने वह अपनी बुआ के घर गया था, तभी पुलिस ने उसे अपना शिकार बना लिया.

पायकू के अनुसार सोनकू हितामेटा के पोर्टाकेबिन में पढ़ाई कर रहा था तो नउगू कश्यप का बेटा बीजलू अनुत्तीर्ण होने की वजह से पढ़ाई छोड़ चुका था. चित्रकोट के विधायक दीपक बैच का आरोप है कि पुलिस फर्जी एनकाउंटर में समर्पण करने वाले माओवादियों का इस्तेमाल कर रही है. आत्मसमर्पित माओवादी असल माओवादियों का पता-ठिकाना बताने की बजाय हमनाम ग्रामीणों को माओवादी बताकर मारा जा रहा है.
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पुलिस महानिरीक्षक श्री एस.आर.पी. कल्लूरी को आदिवासियों की गयी निर्मम हत्या के लिये सेवा से बर्खास्त करते हुए कानूनी कार्यवाही किया जाए.-छत्तीसगढ़ कांग्रेस

          छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी
                     प्रेस विज्ञप्ति


* छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने राज्यपाल  और डीजीपी नक्सद आपरेशन को दिया ज्ञापन, उसमें मांग की गई कि :-

 * पुलिस महानिरीक्षक श्री एस.आर.पी. कल्लूरी को आदिवासियों की गयी निर्मम हत्या के लिये सेवा से बर्खास्त करते हुए कानूनी कार्यवाही किया जाए.
* पुलिस ने मासे एवं परिजनों से मारपीट कर बच्चों को घसीटते हुए नही किनारें, जो कि बुरगुम थाना से महज डेढ किलोमीटर की दूरी पर ही दोनो बालकों को गोली  से मार दिया गया, जिसकी आवाज पूरे गांव वालों ने सूनी .
* मिच्चीपारा निवासी श्री कवासी हांदा, पिता श्री मुका एवं श्री मुचाकी हिडमा, पिता श्री सोमा को पुलिसबल द्वारा दोनों के घर से उठाकर फुलबगडी थाना से महज दो किलोमीटर की दूरी पर ही माओवादी बताकर फर्जी मुठभेड करते हुए मार दिया गया.
* जब से श्री एस.आर.पी. कल्लूरी की पदस्थापना हुई है, तब से वहां के आदिवासी नक्सली/माओवाद से कम पुलिस प्रशासन से ज्यादा प्रभावित है .
* क्षेत्र के व्यापारिक, सामाजिक, राजनैतिक व जनसामान्य पुलिसिया आतंक व श्री कल्लूरी के  दहशत से डरे हुए हैं कि, कब किसको फर्जी मुठभेड के बहाने से मौत के घाट उतार दिया जायेगा .
* पुलिस महकमे के अधीनस्थ अधिकारी अपनी पदोन्नती तथा नगदी ईनाम राषि पाने की आस में इस प्रकार की घटना को अंजाम दे रहे हैं, जिसकी सूक्ष्म एवं निश्पक्ष न्यायिक जांच की आवष्यकता है.
* फर्जी मुठभेड में निर्दोश आदिवासी मारे जा रहे हैं साथ ही, नाबालिक युवतियों/महिलाओं के साथ सामुहिक बलात्कार/दुश्कर्म की घटना आये-दिन देखने को मिल रही है .
* श्री कल्लूरी आंध्रप्रदेष के मूलनिवासी है और आंध्रप्रदेष के माओवादियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण प्रदान कर रहें हैं.
* सभी प्रकरण के पीड़ित परिवार को 20-20 लाख रूपये आर्थिक सहयोग तथा परिवार के एक-एक सदस्यों को षासकीय नौकरी प्रदान की जाये.
* प्रतिनिधिमंडल में प्रदेष अध्यक्ष भूपेष बघेल के साथ पूर्व मंत्री सत्यनारायण षर्मा, पूर्व मंत्री मो. अकबर, राज्यसभा सदस्य छाया वर्मा, गंगा पोटाई, देवती कर्मा, कवासी लखमा, दीपक कर्मा, दीपक बैज, पीड़ित परिवार के सदस्य गण बालसाय, मासे, जुगली, लक्ष्मण, रूपधर, महामंत्री गिरीष देवांगन, मलकीत सिंह गैंदू, सचिव सत्तार अली, विमलचंद सुराना, शिशुपाल सोरी, पी.आर. खुंटे, शोभा राम बघेल, रमेश वल्र्यानी, मीडिया विभाग के चेयरमेन ज्ञानेश शर्मा, किरणमयी नायक, प्रवक्ता महेन्द्र छाबड़ा, मीडिया सचिव सुशील आनंद शुक्ला, घनश्याम राजू तिवारी, शिवसिंह ठाकुर, अजय साहू, हरदीप बेनीपाल, विजय बघेल, निवेदिता चटर्जी, एजाज ढेबर, प्रमोद चैबे, विकास उपाध्याय, इंदरचंद धाड़ीवाल, चंद्रशेखर शुक्ला, अमरजीत चांवला, सुंदर जोगी, विमल गुप्ता, सुशील ओझा, आयशा सिद्दीकी, राधेश्याम विभार, गिरीश दुबे, विकास तिवारी, अखिलेश जोशी, सोमेन चटर्जी, सुनीता शर्मा, धनंजय ठाकुर, सोमन लाल ठाकुर, भोजकुमारी यदु, नीना युसूफ, साक्षी सिरमौर, मो. अमजद, तैयब खान, अशफाक अहमद, पुरूषोत्तम चंद्राकर, अनिल यादव, नितिन ठाकुर, सोनू साहू, सद्दाम सोलंकी, आमोद सिन्हा, लोकेश यादव, राजेश यदु, मो. साहिल, विपिन साहू अनेक कांग्रेसजन शामिल थे.
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रायपुर/30 सितंबर 2016
  बस्तर संभाग में आदिवासियों पर हो रही अमानवीय पुलिसिया अत्याचार व माओवादी के नाम पर की जा रही फर्जी मुठभेड के संबंध में विरोध प्रकट करने के लिये प्रदेष कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल प्रदेष अध्यक्ष भूपेष बघेल के नेतृत्व में महामहिम राज्यपाल के नाम राज्यपाल के सचिव को और विषेश पुलिस महानिदेषक नक्सल आपरेषन डीएम अवस्थी से मिलकर ज्ञापन सौपा।
ज्ञापन में कहा गया है कि  छत्तीसगढ़ प्रदेष कांग्रेस कमेटी इस ज्ञापन के माध्यम से बस्तर संभाग में आदिवासियों के साथ लगातार हो रही पुलिसिया अत्याचार व माओवादी के नाम पर फर्जी मुठभेड की घटना की ओर आपका ध्यान आकृश्ट कराना चाहते हैं। ?

 विगत दिनों बस्तर संभाग के दंतेवाडा विधानसभा क्षेत्र के बारसूर परिक्षेत्र के ग्रामपंचायत-भटपाल के आश्रित ग्राम-गड्दा निवासी एक बालिग व एक नाबालिग-सोनकू, पिता श्री पायकू उम्र-16 वर्श, तथा बिजलू, पिता श्री नडगू, को नक्सली गतिविधियों में संलग्न व माओवादी बताते हुए पुलिस द्वारा फर्जी मुडभेड कर मार दिया गया, जिसमें से सोनकू, पिता श्री पायकू पोटा केबीन हितामेटा में अध्ययनरत था जबकि दूसरा बालक बिजलू, पिता-नडगू घरेलू कार्यो में संलग्न था ।

मृतक दोनो बालक अपने रिष्तेदारी के एक बच्ची की मौत की षोक-संदेष लेकर 23 सितम्बर 2016 को बुरगुम थानाअंतर्गत ग्राम-सांगवेल निवासी अपनी बुआ मासे के घर गये थे, सांगवेल में रात होने की वजह से वे दोनो अपनी बुआ के घर रात्रि विश्राम कर रहे थे, जहां से पुलिस द्वारा मासे के घर का घेराव कर दोनो लडकों से मारपीट कर बुरगुम थाना ले जाने की बात पर मासे एवं परिजनो ने विरोध किया, जिस पर पुलिस ने मासे एवं परिजनों से मारपीट कर बच्चों को घसीटते हुए नही किनारें, जो कि बुरगुम थाना से महज डेढ किलोमीटर की दूरी पर ही दोनो बालकों को गाली से मार दिया गया, जिसकी आवाज पूरे गांव वालों ने सूनी ।

 इस घटना से पूरे आदिवासी समाज एवं जनमानस में रोश व्याप्त है और क्षे़त्र लोगों ने उचित न्याय की मांग की है ।

दूसरा फर्जी मुठभेड सुकमा जिले के फुलबगडी थानाक्षेत्र में हुआ है, जिसमें फुलबगडी के मिच्चीपारा निवासी श्री कवासी हांदा, पिता श्री मुका एवं श्री मुचाकी हिडमा, पिता श्री सोमा को पुलिसबल द्वारा दोनों के घर से उठाकर फुलबगडी थाना से महज दो किलोमीटर की दूरी पर ही माओवादी बताकर फर्जी मुठभेड करते हुए मार दिया गया।

बस्तर संभाग में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर जब से श्री एस.आर.पी. कल्लूरी की पदस्थापना हुई है, तब से वहां के आदिवासी नक्सली/माओवाद से कम पुलिस प्रषासन के आतंक से ज्यादा डरे/सहमे व प्रभावित हो रहे है, साथ ही क्षेत्र के व्यापारिक, सामाजिक, राजनैतिक व जनसामान्य पुलिसिया आतंक व श्री कल्लूरी के  दहषत से डरे हुए हैं कि, कब किसको फर्जी मुठभेड के बहाने से मौत के घाट उतार दिया जायेगा ।

राज्य सरकार पुलिस महानिरीक्षक के माध्यम से सोची-समझी रणनीति के तहत आदिवासियों की जनसंख्या कम व खत्म करने की दृश्टि से प्रायोजित फर्जी मुठभेड करा रही है। पुलिस महकमे के अधीनस्थ अधिकारी अपनी पदोन्नती तथा नगदी ईनाम राषि पाने की आस में इस प्रकार की घटना को अंजाम दे रहे हैं, जिसकी सूक्ष्म एवं निश्पक्ष न्यायिक जांच की आवष्यकता है।

श्री कल्लूरी के कार्यकाल में बस्तर संभाग में घटित विभिन्न नक्सली/माओवादी एवं पुलिस अत्याचार की घटनाएं:-

1. नवम्बर 2015    सुकमा जिले के हर्रेमपल्ली में तीन नाबालिक लडकों को माओवादी बताकर फर्जी मुडभेड कर मार दिया गया।

 2.   बीजापुर जिले के बासागुडा थानाक्षेत्र में मवेषी चरा रही 15 वर्शीय नाबालिक युवती एवं 4 अन्य ग्रामीण महिलाओं के साथ जवानों द्वारा की गयी सामुहिक बलात्कार घटना।

  3.   नारायणपुर जिला मुख्यालय में आत्मसर्पण करने वाले माओवादी द्वारा की गई आत्महत्या की घटना।
   
4 .जून 2016    सुकमा जिले के गोमपाड में आदिवासी युवती के साथ सुरक्षा बल के जवानों द्वारा की गयी सामुहिक बलात्कार की घटना।
   
इसी प्रकार की कई फर्जी मुठभेड में निर्दोश आदिवासी मारे जा रहे हैं साथ ही, नाबालिक युवतियों/महिलाओं के साथ सामुहिक बलात्कार/दुश्कर्म की घटना आये-दिन देखने को मिल रहा है, जिसे कांग्रेस पार्टी समय-समय पर सरकार के संज्ञान में लाया गया है।

क्षेत्र में नक्सल गतिविधियां प्रमुख रूप से अन्य राज्यों के माओवादी नेताओं के माध्यम से संचालित हो रहा है, किन्तु आत्मसमर्पण एवं मुडभेड की घटना में आंध्रप्रदेष के कोई माओवादी नेता न ही, मारा जाता है और न ही, आत्मसमर्पण करता है।
चूंकि श्री कल्लूरी आंध्रप्रदेष के मूलनिवासी है और आंध्रप्रदेष के माओवादियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण प्रदान कर रहें हैं। आत्मसमर्पण/ मुडभेड में बस्तर के स्थानीय आदिवासी ही प्रभावित हो रहे हैं, जबकि इनका नाम किसी भी प्रकार के ईनामी सूची में षामिल नही होने के बावजूद भी इन्हे बड़ा ईनामी नक्सली बताया जाता है।

बस्तर संभाग में फर्जी मुठभेड, सुरक्षा बल व नक्सली/माओवादी के बीच पिस रहे निर्दोश आदिवासी अपनी सुरक्षा व षांति को लेकर भयभीत हैं, जिससे उनका जीना भी दुभर हो गया है। श्री कल्लूरी के कार्यकाल में पुलिस प्रषासन का आतंक माओवाद से ज्यादा बढ़ जाने से प्रभावित विभिन्न जिलों के लगभग 10 हजार आदिवासी परिवार (पूरे गांव का गांव खाली कर) अपने घर-द्वार छोडकर आंध्रप्रदेष, तेलंगाना एवं अन्य प्रदेषों में पलायन कर चुके है, जिसकी सर्वे करायी जा सकती है ।

बस्तर संभाग के आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिये फर्जी नक्सली मुठभेड/ आत्मसमर्पण तथा पुलिसिया अत्याचार का उच्चस्तरीय निश्पक्ष जांच कराया जाना आवष्यक है, जो श्री कल्लूरी के बस्तर संभाग में पदस्थापना से निश्पक्ष जांच संभव नही है।

कांग्रेस पार्टी इस ज्ञापन के माध्यम से आपसे मांग करती है कि, उक्त सभी प्रकरणों की सी.बी.आई./माननीय उच्च न्यायालय के सेवानिवृति न्यायाधीष के नेतृत्व में न्यायिक जांच कराया जाए तथा बस्तर, पुलिस महानिरीक्षक श्री एस.आर.पी. कल्लूरी को आदिवासियों की गयी निर्मम हत्या के लिये सेवा से बर्खास्त करते हुए कानूनी कार्यवाही किया जाए। साथ ही, उक्त सभी प्रकरण के पीड़ित परिवार को 20-20 लाख रूपये आर्थिक सहयोग तथा परिवार के एक-एक सदस्यों को षासकीय नौकरी प्रदान की जाये।
आदिवासियों की हितों की रक्षा के लिए आपका दायित्व अभिभावक के रूप में सर्वोपरि है और प्रदेष के आदिवासी वर्ग अपने हितों की अपेक्षा रखती है ।

प्रतिनिधिमंडल में प्रदेष अध्यक्ष भूपेष बघेल के साथ पूर्व मंत्री सत्यनारायण षर्मा, पूर्व मंत्री मो. अकबर, राज्यसभा सदस्य छाया वर्मा, गंगा पोटाई, देवती कर्मा, कवासी लखमा, दीपक कर्मा, दीपक बैज, पीड़ित परिवार के सदस्य गण बालसाय, मासे, जुगली, लक्ष्मण, रूपधर, महामंत्री गिरीष देवांगन, मलकीत सिंह गैंदू, सचिव सत्तार अली, विमलचंद सुराना, शिशुपाल सोरी, पी.आर. खुंटे, शोभा राम बघेल, रमेश वल्र्यानी, मीडिया विभाग के चेयरमेन ज्ञानेश शर्मा, किरणमयी नायक, प्रवक्ता महेन्द्र छाबड़ा, मीडिया सचिव सुशील आनंद शुक्ला, घनश्याम राजू तिवारी, शिवसिंह ठाकुर, अजय साहू, हरदीप बेनीपाल, विजय बघेल, निवेदिता चटर्जी, एजाज ढेबर, प्रमोद चैबे, विकास उपाध्याय, इंदरचंद धाड़ीवाल, चंद्रशेखर शुक्ला, अमरजीत चांवला, सुंदर जोगी, विमल गुप्ता, सुशील ओझा, आयशा सिद्दीकी, राधेश्याम विभार, गिरीश दुबे, विकास तिवारी, अखिलेश जोशी, सोमेन चटर्जी, सुनीता शर्मा, धनंजय ठाकुर, सोमन लाल ठाकुर, भोजकुमारी यदु, नीना युसूफ, साक्षी सिरमौर, मो. अमजद, तैयब खान, अशफाक अहमद, पुरूषोत्तम चंद्राकर, अनिल यादव, नितिन ठाकुर, सोनू साहू, सद्दाम सोलंकी, आमोद सिन्हा, लोकेश यादव, राजेश यदु, मो. साहिल, विपिन साहू अनेक कांग्रेसजन शामिल थे.

घनश्याम राजू तिवारी
प्रवक्ता
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी

Thursday, September 29, 2016

बस्तर में प्रजातंत्र ख़त्म,पुलिस और सुरक्षा बल ही शासन चला रहे-- सर्व आदिवासी समाज बस्तर


बस्तर में प्रजातंत्र ख़त्म,पुलिस और सुरक्षा बल ही शासन चला रहे
सर्व आदिवासी समाज बस्तर



बस्तर प्रहरी
गुरुवार, 29 सितंबर 2016


सर्व आदिवासी समाज का प्रतिनिधि मंडल घटना स्थल ग्राम सांगवेल पहुच कर वास्तुस्थिति का जायजा लिया प्रतिनिधि मंडल ने मृतक सोनकू के पिता पायको, और बिजलू के पिता नडगी, बुआ मासो, मामा लक्ष्मण व ग्राम गड़दा भटपाल के ग्रामीण एवं ग्राम सांगवेल व बुरगुम के ग्रामीणों से बयान दर्ज किया गया ।


बस्तर संभाग में प्रजातंत्र ख़त्म हो चुका है, ऐसा लगता है पुलिस और सुरक्षा बल ही शासन चला रहे  है जो संविधान व आदिवासी जिलो का पूर्णत उल्घंन कर रहे है बस्तर में पुलिस शासन लागू हो गया है , हर दिन निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बता कर मारा जा रहा है हाल ही में सुरक्षा बलों द्वारा दो निर्दोष नाबालिक आदिवासी बच्चो को नक्सली बता कर सुरक्षा बल के जवानो ने हत्या कर दिया था उक्त घटना की वास्तुस्थिति जानने सर्व आदिवासी समाज का प्रतिनिधि मंडल घटना स्थल पहुंचा



सर्व आदिवासी समाज का प्रतिनिधि मंडल दिनाक 28 अक्तूबर दिन बुधवार को बस्तर जिले के बास्तानार विकास खंड अंतर्ग्रत सांगवेल में पुलिस द्वारा दो नाबालिक युवको की हत्या कर नक्सली मुठभेड़ बताया गया था । सर्व आदिवासी समाज का प्रतिनिधि मंडल घटना स्थल ग्राम सांगवेल पहुच कर वास्तुस्थिति का जायजा लिया प्रतिनिधि मंडल ने मृतक सोनकू के पिता पायको, और बिजलू के पिता नडगी, बुआ मासो, मामा लक्ष्मण व ग्राम गड़दा भटपाल के ग्रामीण एवं ग्राम सांगवेल व बुरगुम के ग्रामीणों से बयान दर्ज किया गया ।

प्रतिनिधि मंडल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि सोनकू और बिजलू नाबालिक था जो पोटाकेबिन के छात्र थे जिसे पुलिस जवानो द्वारा निर्मम हत्या कर इसे फर्जी नक्सली मुठभेड़ बनाया गया है, और पुलिस के आला अधिकारियो द्वारा बुरगुम थाने को इनाम से नवाजा गया है, प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि पुलिस के आला अधिकारी के निर्देशअनुसार ही सुरक्षा बल आदिवासियों की हत्या कर नक्सली नाम दिया जा रहा है ।

प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि आदिवासी समाज ने अपनी सामाजिक जाँच दल गठित कर पिछले साल व इस साल का हर घटना चाहे वह महिलाओं बच्चो के उत्पीडन का हो या नक्सली के नाम पर मारे गए व्यक्तियों का सच्चाई , वस्तुस्थिति जानने का कार्य किया गया है , और हर जाँच का निष्कर्ष यह निकला है की पुलिस के दावे खोखले साबित हो रहे है, सभी मामलो में मारे गये आदिवासी निर्दोष निकले व महिलाओं पर पुलिस व सुरक्षा बलों द्वारा शोषण किया गया है ।

प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि पहुचविहीन ग्रामो में पुलिस अधिकारी खुलेआम गाँव वालो को पुलिस के खिलाफ बयान देने पर नक्सली ग्राम घोषित कर मारने की धमकी देते है बस्तर संभाग में पुलिस व सुरक्षा बल सुनियोजित षडयंत्र के आदिवासियों को फर्जी नक्सली मामलो में हत्या कर रहे है, बन्दुक की नोक पर आदिवासियों पलायन के लिए  मजबूर कर रहे है, पुलिस सुरक्षा बल द्वारा निरंतर हत्या व आदिवासियों को पलायन हेतु मजबूर करना शासन-प्रशासन द्वारा प्रायोजित है, जिससे आदिवासियों को खत्म कर जल,जंगल,जमीन को लुटने का पूरा शासन-प्रशासन का षडयंत्र है ।

प्रतिनिधि मंडल ने बताया कि बस्तर संभाग में आदिवासी समाज में दहशत का माहौल है, ऐसा लगता है कि समाज व मानव अधिकार के लिए लड़ने वाले हर आदिवासी को पुलिस मार देगी या फिर नक्सली मुठभेड़ का फर्जी मामला बना देगी ।

सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधि मंडल के अनुसार सर्व आदिवासी समाज राज्य में मिडीया व उबलब्ध सभी संवेधानिक मानवाधिकार विकल्पों के पास कई बार जा चुकी है, पर सभी से कोई रास्ता नही निकला अब आदिवासी समाज राष्ट्रपति व अंतर्राष्ट्रीय विकल्पों पर ध्यान देगी क्योकि यह आदिवासी समाज के अस्तित्व का मामला है ।

बस्तर संभाग के विभन्न जगहों पर भारी विरोध होने की खबर

जानकारी के अनुसार पुलिस और सुरक्षा बलो द्वारा आदिवासियों को नक्सली बता कर हत्या करने के खिलाफ बस्तर के वभिन्न हिस्सों से नौजावान आदिवासी युवा विरोध प्रकट करने वाले है, बस्तर संभाग पूरी तरह से पुलिस संभाग के रूप में तब्दील हो चुका है जहा रोजाना आदिवसियो के साथ आत्याचार, दमन शोषण की घटनाए बढ़ गई है
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हिंदुत्ववादी संगठन के लोग मुझे जान से मार सकते हैं : मनीष कुंजाम

हिंदुत्ववादी संगठन के लोग मुझे जान से मार सकते हैं : मनीष कुंजाम


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उस व्हाट्स एप्प ग्रुप में गलती से पोस्ट हुआ विवादित बयान .
बस्तर पुलिस आंध्रा के माओवादियों को क्यों नहीं मार पाई .
बस्तर में सच को दबाने का षड्यंत्र चल रहा है, सोमवार को सभा कर पुलिस अधिकारियों ने सारी सीमाएँ पार कर दी, बयानबाजी करने वाले अधिकारियों को नौकरी छोड़ नेतागिरी करनी चाहिए :
असुर शब्द अनार्य कोयतुर की उपाधि है जो विशेष योग्यता के आधार पर मिलती है.
हिंदुत्ववादी संगठन के लोग मुझे जान से मार सकते हैं :
मनीष कुंजाम
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आतंक का पर्याय बन चुके आईजी एसआरपी कल्लूरी को तत्काल बर्खास्त किया जाए- छत्तीसगढ़ कांग्रेस


* भाजपा सरकार आदमखोर हो चुकी है ,


भाजपा सरकार के मुंह में आदिवासियों का खून लग गया है
* दोनों  छात्रों का नक्सलवाद या नक्सली गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं था।
* आतंक का पर्याय बन चुके आईजी एसआरपी कल्लूरी को तत्काल बर्खास्त किया जाए।
* कांग्रेस ने मांग की है कि पहले इस एनकाउंटर में शामिल पुलिस कर्मियों पर हत्या का मामला दर्ज हो, बस्तर में पदस्थ आईजी एसआरपी कल्लूरी को तत्काल बर्खास्त किया जाए और इस घटना की सीबीआई जांच करवाई जाए. कांग्रेस ने दोनों मृतक बच्चों के परिजनों को 20-20 लाख रुपए मुआवजा देने की भी मांग की.
* मीना खल्खो से लेकर मड़कम हिड़मे तक दर्जनों मामलों से साबित हो गया है कि रमन सिंह सरकार माओवाद या नक्सलवाद से निपटने की आड़ में निरीह और निर्दोष आदिवासियों को प्रताड़ित कर रही है.
* अगर नक्सली हिंसा छोड़ने के लिए आत्मसमर्पण कर रहे हैं तो रमन सिंह सरकार उनके हाथ में फिर से बंदूक थमाकर उन्हें फिर हिंसा में शामिल क्यों कर रही है।
** छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने पत्रकार  वार्ता में लगाये गंभीर आरोप.
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रायपुर/29 सितंबर 2016। बस्तर के दो नाबालिग छात्रों को नक्सली बताकर पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर में मार दिया है। कांग्रेस नेताओं ने आज पत्रकारवार्ता लेकर पूरे मामले पर भाजपा सरकार और बस्तर पुलिस को बेनकाब किया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल, कांग्रेस विधायक दल के नेता टी.एस. सिंहदेव, पूर्व अध्यक्ष धनेन्द्र साहू, पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा, पूर्व मंत्री मो. अकबर, बस्तर के विधायकगण देवती कर्मा, लखेश्वर बघेल, मोहन मरकाम, दीपक बैज सहित मृतक के पिता पायको, और नड़गू ने पत्रकारवार्ता को संबोधित करते हुये घटनाक्रम का ब्यौरा दिया।
कांग्रेस नेताओं ने  कहा कि माओवादियों से निपटने की आड़ में रमन सिंह सरकार निर्दोष आदिवासियों का दमन कर रही है और उन्हें बस्तर से पलायन करने पर मजबूर कर रही है।
मारे गए दोनों छात्रों के परिजनों की उपस्थिति में कांग्रेस ने मांग की है कि पहले इस एनकाउंटर में शामिल पुलिस कर्मियों पर हत्या का मामला दर्ज हो, बस्तर में पदस्थ आईजी एसआरपी कल्लूरी को तत्काल बर्खास्त किया जाए और इस घटना की सीबीआई जांच करवाई जाए. कांग्रेस ने दोनों मृतक बच्चों के परिजनों को 20-20 लाख रुपए मुआवजा देने की भी मांग की है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कांग्रेस भवन में आयोजित एक पत्रकारवार्ता में कहा कि भाजपा सरकार आदमखोर हो चुकी है। भाजपा सरकार के मुंह में आदिवासियों का खून लग गया है।
 मीना खल्खो से लेकर मड़कम हिड़मे तक दर्जनों मामलों से साबित हो गया है कि रमन सिंह सरकार माओवाद या नक्सलवाद से निपटने की आड़ में निरीह और निर्दोष आदिवासियों को प्रताड़ित कर रही है. उन्होंने कहा, “दो निर्दोष नाबालिग आदिवासी छात्रों की पुलिस द्वारा की गई हत्या को नक्सली एनकाउंटर बताना इसका नया उदाहरण है।“
उन्होंने कहा कि मारा गया बच्चा सोनकू राम कश्यप महज 16 साल का था जबकि दूसरा बच्चा बिजलू कश्यप लगभग 19-20 साल का था। बच्चों के परिजनों से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने कहा कि दोनों बच्चों के माता पिता के पास इस बात से पर्याप्त सबूत हैं कि दोनों छात्र थे और नक्सली संगठनों से उनका दूर दूर तक कोई नाता नहीं था.

श्री बघेल ने कहा कि सोनकू राम के घर पर बुखार से एक छह साल के बच्चे की मौत हो गई थी और ये दोनों बच्चे इसकी खबर रिश्तेदारों को देने के लिए गए थे। पैदल कई किलोमीटर चल कर जाने के कारण उन्हें देर हो गई और वे वहीं रुक गए। रिश्तेदारों की सूचना के अनुसार सुबह चार बजे के आसपास पुलिस दोनों को उठाकर ले गई। परिजनों ने इसका विरोध किया लेकिन पुलिस नहीं मानी और थोड़ी देर बाद उन्होंने गोली चलने की आवाज सुनी और फिर दोनों बच्चों की लाश मिली.
उन्होंने सवाल उठाया कि दो निहत्थे छात्रों को पुलिस को किन परिस्थितियों में गोली मारनी पड़ी इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए जो सीबीआई ही कर सकती है. दूसरा यह कि जांच की निष्पक्षता के लिए जरूरी है कि आतंक का पर्याय बन चुके आईजी एसआरपी कल्लूरी को तत्काल बर्खास्त किया जाए।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा कि जानकारी मिल रही है कि इस फर्जी एन्काउंटर में पुलिस के अलावा आत्मसमर्पण करने वाले कुछ नक्सली भी थे। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर नक्सली हिंसा छोड़ने के लिए आत्मसमर्पण कर रहे हैं तो रमन सिंह सरकार उनके हाथ में फिर से बंदूक थमाकर उन्हें फिर हिंसा में शामिल क्यों कर रही है। यह अपने आपमें जांच का विषय है कि कौन लोग हैं जो समर्पण कर रहे हैं और वे क्यों फिर से बंदूक थामने को तैयार हो रहे हैं?
भूपेश बघेल ने पत्रकारों से कहा कि इस मामले को सबसे पहले कांग्रेस की विधायक श्रीमती देवती कर्मा ने उठाया था और वे उस स्थान तक भी गईं जहां बच्चों को मारा गया. वहां उन्होंने एक पांच राउंड गोली के खोखे भी देखे. इसके बाद बुधवार को कांग्रेस की जांच समिति भी सोनकु राम और बिजलू कश्यप के गांव भी गई और परिजनों से तथ्य एकत्रित किए।
श्री बघेल ने कहा कि यह रमन सिंह सरकार बस्तर से आदिवासियों को भगाना चाहती है। इसलिए वह आदिवासियों के मन में तरह तरह के भय पैदा कर रही है। उन्होंने 21 सितंबर को पत्रिका में प्रकाशित खबर का हवाला देते हुए कहा कि बस्तर की दो बेटियों सुनीता और मुन्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके कहा कि उन्हें पुलिस से जान का खतरा है। इन दोनों ने अपनी याचिका में कहा है कि पुलिस और सुरक्षाबल के लोग किसी भी गांव में घुसकर किसी को भी उठाकर ले जा रही है और नक्सली बताकर गोली मार देती है। इन दोनों बेटियों ने कहा है कि सुरक्षाबलों के आते ही महिलाएं बच्चों को लेकर घर से भाग जाती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि अगर वे घर पर रुकीं तो उनके साथ यौनहिंसा भी होगी।
श्री बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य का गठन एक आदिवासी राज्य के रूप में हुआ था क्योंकि यहां आदिवासियों की बहुलता है। लेकिन यह कल्पना तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नहीं की होगी कि राज्य बनाने के बाद उनकी ही पार्टी के शासनकाल में आदिवासियों के नाम पर बने राज्य में उनको इस तरह से प्रताड़ित करके मारा जाएगा। श्री बघेल ने आरोप लगाया कि दरअसल रमन सिंह सरकार बस्तर को आदिवासियों से मुक्त करके जंगल और खनिज सबको उद्योगपतियों के हवाले करना चाहती है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस आदिवासियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है और वह इस लड़ाई को जहां तक ले जाना होगा लेकर जाएगी।
 क्या हुआ सोनकू और बिजलू के साथ?
बस्तर स्थित थाना बुरगुम ग्राम सांगवेल में पुलिस द्वारा दो नक्सलियों को एन्काउन्टर में मार गिराये जाने का दावा किया गया. नक्सली बताए गए दोनों मासूम छात्र ग्राम गउदा के निवासी थे. पोयकू राम कश्यप का बेटा सोनकू पोटाकेबिन हितामेटा में अध्ययनरत था और नउगू कश्यप का बेटा बीजलू भी अनुत्तीर्ण छात्र था।
परिजनों का कहना है कि दोनों का नक्सलवाद या नक्सली गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं था।परिवार में एक बच्चे की मौत की सूचना देने अपने रिश्तेदार मासे को देने सांगवेल गांव गये थे। जहां रात में पुलिस मासे के निवास का घेराव कर दोनों छात्रों से मारपीट करते हुए उन्हें बुरगुम थाने ले गई। मासे एवं उसके पति के विरोध करने पर उनसे भी मारपीट की। इसके कुछ देर बाद गोली की आवाज सुनाई पड़ी और दोनों छात्रों की लाश मिली। कांग्रेस इसकी शिकायत केन्द्रीय मानव अधिकार आयोग, राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग और केन्द्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग से भी करेगी।
    आज की पत्रकारवार्ता में प्रदेश कांग्रेस कमेटी महामंत्री मलकीत सिंह गैंदू, दीपक कर्मा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी सचिव सत्तार अली, दंतेवाड़ा जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष विमलचंद सुराना, शिशुपाल सोरी, मृतक परिजन बालसाय, मासे, जुगली, लक्ष्मण, रूपधर, घासीराम मौजूद थे।

ज्ञानेश शर्मा
मीडिया चेयरमेन
 छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी

27 और 28 सितंबर को सुरक्षा बलो पर पालनार में फिर ग्रमीणों की मारपीट और मंगू को जान से मारने की कोशिश का आरोप

27 और 28 सितंबर को सुरक्षा बलो पर पालनार में फिर ग्रमीणों की मारपीट और मंगू को जान से मारने की कोशिश का आरोप ,ग्रमीणों ने एसपी और कलेक्टर से की लिखित शिकायत.
प्रियंका शुक्ला की रिपोर्ट



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 दिनांक 27.9.2016 को हमारे गाँव पालनार, गुडापारा  थाना  गंगालूर में पुलिस एवं सुरक्षा बलों द्वारा तीन पुरषों एवं दो महिलाओं के साथ मारपीट करने और   मंगू को जान से मारने के प्रयास .
 आज दिनांक 28.9.2016 को एक व्यक्ति से मारपीट के समंबंध में शिकायत दर्ज कराने हेतु आवेदन पत्र.
***
महोदय,
एसपी बीजापुर
कलेक्टर
बीजापुर

विषय:- हम निम्न हस्ताक्षर करने वाले ग्रामीण ग्राम पालनार गुंडापारा, थाना गंगालूर, तहसील बीजापुर, जिला बीजापुर के स्थाई निवासी हैं.

महोदय ,

दिनांक 27.09.2016 और दिनांक 28.09.206 को हमारे गाँव में पुलिस एवं सुरक्षा बलों द्वारा आकर ग्रामीणों के साथ मारपीट  किया गया है.
 दिनांक 27.09.2016 को गाँव के हम तीन पुरुष,
 (1) मंगू ताती पिता पाँडू नि. गुंडापारा, उम्र लगभग 30 वर्ष,
 (2) सुखराम ताती पि. सन्नू नि गुंडापारा, उम्र लगभग 28 बर्ष
(3) सन्नू ताती पि. मासा, नि. गुंडापारा, उम्र लगभग 50 वर्ष .
सुबह 7-8 बजे गुंडापारा के पास के जंगल से बाँस  काटने जा रहे थे , क हमने देखा कि पहाड़ से पुलिस एवं सुरक्षा बल उतर रहे थे ,जो कि लगभग 150 – 200 की संख्या में रहे होंगे. उनमे से कुछ लोगों ने हम तीनों को पकड़ लिया और बिना किसी कारण हमें जोर जोर से पीटने लगे। उनमे से कुछ लोग हमसे पूछ रहे थे कि नक्सली लोग कहाँ रहते हैं और कब आते है, पर हम यह सब वातें नहीं जानते थे ,इसलिये उनको नहीं बता सकते थे
इसके बावजूद उन्होंने हमें हाथों से, डंडो से पीटा,उन लोगों ने मंगू की गर्दन को हाथों से दवाया,हम में से दो लोंगों को, सुखराम और उनके पिता, सन्नू को, मारते मारते पुलिस वाले गुंडापारा ले आये और फिर हमें वहा़  लाकर छोड़ दिया.
 पर मंगू के हाथ पीछे बाँधकर वे उसे वहीं रखे थे ,पूछने पर भी नहीं बताये कि क्यों रख रहे हैं।मंगू को जंगल के रास्ते उसे घसीटते हुए वे उसे मातापारा लाये जहाँ उसकी आँखों पर पतले टावल से प़ट्टी बाँध दी, और उसे एक पेड़ के तने से रस्सी से बाँध दिया। मंगू की निक्कर उन्होनें निकाल दी, और उसको एक काली पैंट पहनाने लगे। पुलिस वालों ने उसको कहा कि उसको ‘ड्रैस’ पहना कर मार देंगे.
इतने में सुखराम और सन्नू ने हम गाँव की महिलाओं को खबर दी कि पुलिस ने मंगू को पकड़ा हुआ है। हम सब महिलायें फिर उसे ढूँढते ढूँढते मातापारा पहुँचे जहाँ हमने देखा कि पुलिस ने उसे बाँधा हुआ है और उससे पिटाई कर रहे हैं। हमने जाकर उनसे कहा कि वह गाँव का लड़का है और उसके तीन बच्चे है, उसे छोड़ दो।
उन्होने हमारी एक न सुनी और हमसे कहा कि हम दूर रहें, पर हमने जाकर मंगू को घेर लिया। इस बीच हम में से दो महिलाओ को भी पुलिस ने बहुत मारा – मंगू की पत्नी बूदी जिसकी गोंदी में मंगू की छोटी बेटी भी थी, और गायतापारा की सोडी पति राजू भी थी .
परन्तू इतनी सारी महिलाओं होने के कारण पुलिस वालों ने मंगू को छोड़ दिया। आज तक मंगू का शरीर फूला हुआ है और उसके कानों मे और गले में और पैरों में दर्द हो रहा है।
जो कल पुलिस आई थी, उन लोगो में से हम एक ही जन को नाम से जानते हैं – वह है गंगालूर गायतापारा का सुखराम हेमला पि. पोच्चा। जिन लोगों ने हम सब को मारा उनके नाम नहीं जानते पर वे गंगालूर के हैं और उनको हमने हाट में देखा है और फिर से देखने पर पहचान लेंगे।
आज दिनांक 28.09.2016 को भी गाँव में पुलिस आई थी और सूपा उर्फ सोमलू ताती पि. बुदरू नि. मातापारा के साथ भी उसी के घर में मारपीट कर के गई है।
हम लोग स्थानीय पुलिस से वहुत डरते हैं – आये दिन वे लोग आकर गाँव के लड़को को पकड़ कर मारपीट करते हैं, और ले जाते हैं, या फिर सीतू की तरह जान से मार देते हैं। महिलाओं से भी मारपीट करते हैं। हम आपसे निवेदन करते हैं कि ऐसी कार्यवाहियों पर रोक लगे, और जिन लोगों ने मारपीट की, उनको सजा हो। हम लोग यह चिट्ठी वकील दीदियों के माध्यम से आपको भेज रहे हैं।

                            निवेदक गण
                    समस्त पीड़ित ग्रामीण
                         ग्राम-पलनार,
                        थाना-गंगलूर
1- मंगू,पि.-पांडू
2-सन्नू
3-सिन्नी,पति-सन्नू
4-बूदी,पति-मंगू
5-सुखराम,पि.सन्नू
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They were just boys, say families of two killed in Naxal encounter in Bastar

They were just boys, say families of two killed in Naxal encounter in Bastar



The boys left home on foot to meet their aunt, but returned in body bags, killed in what the police called an anti-Maoist operation.



WRITTEN BY
DIPANKAR GHOSE | BASTAR |Updated: September 29, 2016 8:09 Am
Indian express



Sonaku Ram Kashyap, 16, and Bijlu Kashyap, 13, left their village of Gadhda in Dantewada on September 23, carrying bad news — a six-year-old from Sonaku’s family had died after suddenly developing fever.

They left on foot, to the home of an aunt who lives in a village more than 20 km away. They would return home in body bags, killed in what the police called an anti-Maoist operation.

Sonaku’s father Poyaku Ram Kashyap spent Wednesday narrating the sequence of events over and over again. He told this to the police, who have so far not filed an FIR, prompting villagers to initially refuse to cremate the body. He said the same thing to politicians and activists — from AAP’s Soni Sori to an eight-MLA Congress team — that reached the village Wednesday.

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He kept repeating that Sonaku and his friend Bijlu were not Naxals. He pointed to a school transfer certificate to show that Sonaku studied in a government porta cabin school till last year. He said the boys had gone to gather relatives — in line with local customs — after the child’s death.

“I sent Sonaku to his aunt’s village in Sanguel, to tell them to come because Sanni had died. He took Bijlu along because the path through the jungles is long and hard, and he wanted company. They left at 3 pm,” Poyaku Ram said.

Standing next to him, Bijlu’s parents Nadgi Ram Kashyap and Sukki Bai clutched an Aadhaar card showing that their son was born in 2003.

The boys reached their aunt, Maasa, at around 6 pm. “They wanted to leave but it was getting dark, so I told them to spend the night here,” she said.

According to Maasa, at around 4 am, police personnel barged into their hut — one of 25 in the village, located 18 km from the nearest police station in Burgum. “They went straight for the boys,” she said.

Maasa’s sister Jugti, who stays in the same hut, said, “Sonaku was carrying some identification and tried to show it to them, but they wouldn’t listen. I tried to hold the arm of one of the policemen, but he kicked and slapped me.”

The family said the boys were taken away; a little later, the sound of gunshots resonated in the air.

Villagers told the Congress team that they tried to follow security personnel, but could not go any further than a stream nearby. They also claim to have found Sonaku’s slippers, a clump of hair and five empty rounds at the “encounter spot”.

“We found these at the spot where villagers said the two had been shot,” said Tulika Karma, daughter of Dantewada MLA Devti Karma, head of the Congress fact-finding team.

Sources said the families of the victims plan to travel to Raipur to meet the Governor.

D M Awasthi, Special DG, anti-Naxal operations, said he was awaiting a report from the Jagdalpur SP. “The police headquarters does not keep records of Jan Militia members, which they (the victims) are said to be. However, district police have their own inputs. The SP has also sought a magisterial inquiry, as is the norm in encounter cases. An inquiry on that front, and any other if need be, will be complied with,” he said.

Incidentally, following the death of the two boys, Bastar police had said that the encounter team included women personnel of the District Reserve Group, who themselves happen to be surrendered Maoists.
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Photo Story: The Coal Curse of Raigarh

Photo Story: The Coal Curse of Raigarh

The people, whose land was turned into geometrical black holes, are rising against further land acquisition and forest diversion for mining in the area.

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Enraged residents of Bhengari have witnessed their landscape transform and have failed to get the government regulatory and local authorities to act. Credit: Manshi Asher
Metaphors unfurl at the strangest moments and in the most unexpected ways. In a seemingly uneventful adivasi region of Chhattisgarh, flags of black smoke, hoisted from power plant stacks, are reaching for the sky. Today, it’s not just the grey skies that narrate the story of Raigarh. The Earth, stripped bare and quarried, has a lot to say.
The arteries of the Mahanadi basin ­– Kelo and Mand – that are now transporting toxic residues of a mineral more precious than gold, are carrying the proof with its every ebb and flow. The children of this soil, who are being hauled by the changing tides, part resisting part relenting, are still waiting to be heard.
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Kosampalli village. Credit: Manshi Asher
In Kosampalli village, there is a lull in the early morning air. Pictured above is Tamnar, a subdivision of Raigarh district, now known for the Gare Pelma coal block of the Mand-Raigarh coalfields (the largest coal reserve in the state). It is spread over an expanse of over 112000 hectares. The Gare Pelma coal block alone has close to 13 mines, the oldest being Gare IV/1.
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A young boy sits at the edge of a miniature mud village that he created. Credit: Manshi Asher
For those who sat in faraway places and carved out pieces of this ‘treasure’, the land was merely a numeric and the Earth on it was ‘overburden’. Underneath lay 21,117 mt tonnes of coal, which has to be removed to fire the engine of economic growth and achieve development. For this boy, sitting at the edge of a miniature mud village that he has created, Earth has a different value.
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Protest rally in Kosampalli against any further land acquisition and forest diversion for mining in the area. Credit: Rinchin
Affected by Gare block IV/2 and IV/3, which was allotted to Jindal Steel & Power Limited (JSPL) in the late 1990s, there has been no mining activity in the area after a reallocation was ordered by the Supreme Court.
South Eastern Coalfields Limited is the new custodian of these mines, but the people of Kosampalli are at the forefront of a movement against any further land acquisition and forest diversion for mining in the area. On June 23, 2016, the people of the region organised a massive rally demanding implementation of the Forest Rights Act and compensation as per the newLand Acquisition Act of 2013. In July, they also carried out a week-long blockade.
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Kanhai Patel points out how unfit the drinking water from the tube well is. Credit: Manshi Asher
Kanhai Patel – one of the leaders of the struggle that recently held a blockade in the region – points out how unfit the drinking water from the tube well is. A report by the Public Health Engineering Department also documents that the ground water levels in over 100 villages in Tamnar had fallen by up to 100 feet since the mines opened. In about 40 villages, the water table has dropped by up to 150 feet.
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The Jindal power colony. Credit: Manshi Asher
Not too far from Kosampalli, the JSPL is discharging its untreated sewage into Karra Nala, which meets the Kelo river downstream.
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Fly ash dump opposite the Jindal power plant on a plantation. Credit: Manshi Asher
A fly ash dump opposite the Jindal power plant has buried a forest plantation. Forests of mahua, tendu and sarai are being wiped out by coal mining and the thermal power plants. The region was once known as the centre of tendu collection and kosa silk production. But the increasing pollution and deforestation has destroyed these forms of local livelihoods.
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Jindal’s thermal power plant in Tamnar is pictured in the background and in the fore is the ash dyke, which is spread over close to 300 hectares. Credit: Manshi Asher
After the controversial expansion of its thermal power plant from 1000 MW to 2400 MW, Jindal still needs to acquire an additional land of about 240 hectares for another ash dyke. Residents of the villages whose land is to be acquired are fighting in court to oppose the move.
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Gare IV/1 at the Nagramuda village. Credit: Manshi Asher
JSPL adopted the Nagramuda village and has been mining here for the last two decades. People of the village, who were once dependent on agriculture and forests for their livelihood, turned into coal mine workers. After the reallocation of the mine, many of them lost their jobs and are now struggling to survive.
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Underground fire in Nagarmuda mine. Credit: Manshi Asher
Underground fires may be considered an unusual event, or one that occurs only after extensive long-term mining. But in the Nagramuda mines, they are simmering and slowly eating away the land at the edge of the village forest.
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Tailings in paddy field. Credit: Manshi Asher
Jindal’s footsteps were promptly followed by all its competitors, perhaps because there is no other way to mine coal and turn it into power in an area abundant in forest and farm resources. Tailings from the Jayaswal Neco mines are destroying the paddy fields in Kokdel village.
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Fly ash dump in Gharghoda. Credit: Manshi Asher
Fly ash dumps on paddy fields in Bhengari village of the neighbouring Gharghoda subdivision, which is slowly turning into a hotbed of power plants and mines.
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Felled trees. Credit: Manshi Asher
Close to 960 trees were felled by TRN Energy Private Limited, which is running a 600 MW power plant in Gharghoda. According to the locals, it is a part of elephant corridor and it is not just humans who are suffering the consequences of these activities.
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TRN Thermal Power Plant at Gharghoda. Credit: Manshi Asher
The smoking stack of the TRN Thermal Power Plant at Gharghoda stands tall and proud. Meanwhile, Naveen Jindal, whose name has become synonymous with Raigarh in the last decade, was proudly uploading images of unfurling of the tricolour at the campus of Jindal Power Limited on Independence Day, a right he won from the court so that we all could share the feeling of nationhood via the national flag. ‘We’ excludes indigenous people or adivasis whose land was turned from lush forests and fields into geometrical black holes.
Manshi Asher is a researcher-activist and carried out this documentation as a part of an independent fact finding team looking into environmental violations in coal based projects in Tamnar and Ghargoda, Raigarh.

A Chhattisgarh father's tragedy: One son framed as a Maoist, another is killed as a police informer

A Chhattisgarh father's tragedy: One son framed as a Maoist, another is killed as a police informer.



by Malini Subramaniam

Published 7 hours ago.
 Updated 4 hours ago.29 ,sept

It isn't just Adivasis. Even North Indian migrants in Bastar are caught between the rebels and the police.

 Malini Subramaniam

Late on the afternoon of September 17, traffic in Chhattisgarh's Jagdalpur town was paralysed as thousands of people, including school children, were directed to an open ground. On a stage at one end, a group of men stood next to police officials, issuing calls for an end to the Maoist presence in the region.

This lalkaar (defiance) rally had been organised by a new outfit called the Action Group for National Integration or AGNI. But prominent on the dais were familiar faces from a disbanded vigilante group known as the Samajik Ekta Manch: Anand Mohan Mishra, Subba Rao, Sampat Jha, Farukh Ali and others.

Formed in December 2015, the Samajik Ekta Manch made headlines early in 2016 when it ran a campaign against activists, lawyers and journalists who had brought to light allegations that the security forces were killing and raping villagers under the guise of fighting Maoists. The group was disbanded in April after an India Today TV report showed a senior police official admitting that the vigilante group had been set up by the authorities.[Disclosure: This reporter was among those targetted by the manch].

On the stage with the Samajik Ekta Manch-turned-AGNI members were police superintendents from the districts of Sukma, Kondagaon, Dantewada and Bastar. Also present was Inspector General of Police Shiv Ram Prasad Kalluri, the officer in charge of all the seven districts of Bastar region.

Amidst chants of “aag lagi hai aag, bhag Naxali bhag” – a fire has broken out, run, Naxal, run – some AGNI members held up a poster with the picture of Sanjeet Singh Thakur, a young man killed by the Maoists in August.

Thakur was shot dead in the forests of Sukma by Maoists, who accused him of being a police informer since at least 2004. Two hours after Thakur's body was brought home, Inspector General of Police Kalluri circulated a message on social media, claiming the young man had been a staunch supporter of the Maoists, “but for the last few months, he started to distance himself from the Maoists and lead a normal life”.





(AGNI members and the police share the stage at a rally in Jagdalpur in September. Also present are former Salwa Judum leaders: Madhukar Rao, Soyyam Muka and P Vijay. Credit: Shaikh Tayyab, Patrika)

In Dornapal, where this reporter met him, Thakur’s father, Sartej Singh, refuted the claims of both the Maoists and the police. He pointed out that his son was born in 1991 and was just 13 years old in 2004. How could he have been an informer at that young age, Singh asked.

Thakur's killing has emerged as a rallying point in the latest round of protests against the Maoists. The police, who are aiding the protests, are keen to appear sympathetic to Thakur's family. But ironically, less than a year ago, the family had faced trouble when the police accused Thakur's older brother, Ashish, of being a Maoist and forced him to surrender.

The family's story shows how both the Maoists and the police are complicit in endangering the lives of ordinary people.

The migrants from North India



Twenty five- year-old Sanjeet Singh Thakur, better known as Nabbe, lived in Chintalnar, a market village that lies deep inside Maoist-dominated territory in the Konta block of Sukma district. A broken road veers off the highway that passes through Dornapal town. About 45 km down the road is Chintalnar. Another 12 km ahead lies Jagargunda, a village that has been converted into a security fortress by the police and paramilitary forces.

Every Saturday, tribal people from dozens of interior villages come to the weekly market in Chintalnar to buy soap, oil, clothes and other essential goods, and sell mahua flowers and tora seeds, among other forest produce they gather. The traders are primarily migrants from Uttar Pradesh who moved here decades ago, drawn by the profits to be made selling forest produce purchased cheaply from local Adivasis.

In the early 1980s, Thakur’s father, Sartej Singh, left his village in Uttar Pradesh's Kanpur district to step into his father-in-law’s business in Chintalnar. His wife worked as an anganwadi in the village. Their children were born and raised here. The eldest son, Ashish, took to the trade. Thakur, the younger one, found a job driving a jeep to transport goods and people between Dornapal and Chintalnar. In 2014, he bought his own vehicle.

A gruesome death

August began on a bad note for Thakur. He came down with typhoid. With no good hospital in the area, he had to be taken to Bhadrachalam in Khamman district in neighbouring Telengana.

On the evening of August 26, after recovering from his illness, Thakur was returning home. In Dornapal, feeling better, he took charge of a jeep headed in the direction of Chintalnar, said a cousin who accompanied him.

About 40 kms into the journey, Maoists stopped the vehicle, along with ten others. It was Friday and traders were transporting goods for the weekly Saturday market. More than a hundred passengers, including children and the elderly, were asked to get off and sit in an open ground, recounted some villagers who were present there. Their mobile phones were taken away and put in a plastic bag. From a distance, some passengers saw their phones being put to scrutiny.

The Maoists addressed the passengers and said what people in the area had heard many times before: that the rebels were fighting a people’s war against the loot of jal-jungle-zameen (water, forests and land). They declared that they wanted the villagers to support them.

About half an hour into the address, Thakur was singled out and asked to stand up, recalled one of the villagers who was also there. Thakur was blindfolded and he was jerked away into the forest. Most people in the gathering remained silent, frozen with fear. Some found the courage to ask why he was being taken away and pleaded with the Maoists not to harm him.

Their entreaties went unheard. Ten minutes later, a single shot was heard. As women began to wail, some villagers gathered the courage to go to the spot from where the sound had come. They found Thakur lying there with a bullet wound in the centre of his body. A handwritten pamphlet was lying nearby. It said that "Thakur Nabbe" was guilty of passing information about the Maoists to the police, and that he had been warned several times since 2004.

Not too far away, the confiscated mobile phones were strewn on the ground. Thakur’s phone was missing, most likely taken away by the Maoists.

The villagers called his family, which rushed to the spot, crossing paths with the vehicle that was taking Thakur to the security camp in Chintalnar where medical facilities were available. But by the time the group reached Chintalnar, Thakur was dead

Absent police

There are seven security camps in the 45-km stretch between Dornapal and Chintalnar. Each camp has about 200 personnel, with 2,400 security men altogether. One of the camps, in Burkapal village, was just 3 km away from the place where the Maoists stopped the vehicles. For six hours from 11 am, Maoists held about 100 people captive, delivered lectures on their ideology and shot a man dead, but not one policeman showed up, villagers said.

Even after Thakur’s body was brought to Chintalnar, the security personnel did not consider it safe to go to the site to collect evidence, villagers said.

However, the police superintendent of Sukma, Indira Kalyan Elesela, denied that the Maoist operation had lasted six hours. He claimed it was “a 40-minutes affair”. Defending the police inaction, he said, “Any presence of the police at that time would have only resulted in higher civilian casualties.”

In recent years, the police have claimed that the Maoists are “on the back foot” in the region. In April alone, the Sukma police claimed 122 Maoists surrendered, of whom 102 were from the Konta and Jagargunda blocks. If the surrenders were genuine and had crippled the Maoists, how could they pull off the road blockade? Elesela attributed this to the large Maoist support base in the area.

A difficult balance

Residents of Chintalnar said they walk a tightrope between the growing Maoist influence and the intensification of police and paramilitary presence. They feel compelled to keep both the authorities and the Maoists happy. Both sides stop vehicles plying between Dornapal and Chintalnar and ask the drivers to pick up supplies for them, while offloading goods they suspect are meant for the other side. When the balance tilts to one side, said a young trader, the other side retaliates, and often it is the civilians who pay a price. Thakur’s killing has only heightened their fears.

The area hasn't always been so tense. Until the late nineties, traders moved freely in the forest, setting up makeshift markets in two dozen villages. Occasionally, they ran into the Maoists, but they were never harmed.

As the conflict between the Maoists and the police escalated in the early 2000s, the traders began to feel pressure from both sides to gather and pass on information. After a civilian anti-Maoist militia called the Salwa Judum was formed with the support of the government in 2006, the conflict turned brutal. Aiming to isolate the Maoists, Judum activists began to forcibly drive out villagers into faraway government camps. The people of Chintalnar resisted and stayed on, inviting the ire of the police.

The conflict directly hit business. The Maoists forced the closure of Jagargunda market after the security forces established a camp there. The police shut down the markets Teemapuram and Elmagunda, ostensibly to deprive the Maoists of supplies. But in fact, this made it harder for villagers to buy goods they needed for daily life. From two dozen markets in the area, only seven weekly markets now function. They last just a few hours and not the whole day.

Despite the thinning of business, the traders of Chintalnar have not left because they have nowhere to go. They say they try to keep a low profile. When young men get into trouble with either the police or the Maoists, they are sent away to work in Dornapal and Sukma.

Fake surrenders

In November 2015, Singh’s older son, Ashish, was one of the 23 young men paraded by the police in front of journalists as a surrendered Maoist. AsScroll.in reported at that time, local people alleged the surrenders were fake, and the men were not Maoists as the police had claimed.

After the controversy, Singh had sent Ashish away to Sukma. Now, back home, Ashish said the only reason he surrendered was because the police promised to free him from charges that had been framed against him and 11 others in the murder of a police officer. The murder took place in 2008, but the 12 men were named as accused in the case only in 2015. Ashish claimed the charges were false and that he had been made merely to put him under pressure. The police was staging fake surrender ceremonies to exaggerate its success against the Maoists, said villagers.

The police superintendent, Elesela, declined to comment on Ashish's case, saying he had taken charge in May 2016, and was not familiar with previous cases. Speaking of Thakur, he said, “Nabbe was never with the police, but we have records to show he was supporting the Maoists [earlier].” Since there were no information about his criminal involvement, the police did not press any charges against him, he added.

Caught between the two forces, the young men of Chintalnar face a peculiar predicament: the Maoists view them as police informers, but in the police records, they are shown to be Maoists and under pressure to surrender.

Police excesses

Over the past year, Adivasis living in the interior villages have reported large-scale arrests, detentions and beatings by security forces, as documented byScroll.in in February 2016. This reporter heard of fresh instances of police beatings but could not confirm them independently.

The residents of Chintalnar say the security forces have since stepped up the pressure on non-Adivasis. They alleged that young men were being asked to accompany the security forces on patrols inside the forest to identify Maoist locations.

Had Thakur been forced to do this? Some villagers speculated that the young man had been questioned by the police about the location of a Maoist meeting held in June.

The police superintendent did not comment on the specific allegation but said that as a principle, the police never compel any surrendered Maoists to accompany them during search operations or divulge information, unless they willingly do so.

Thakhur's father, Sartej Singh, said that had either side – the police or the Maoists – told him that his son was aiding the other, he would have shifted him out of the village. Said Singh, “Both the Maoists and the police are playing games with our lives.”

 Letters@scroll.in.

Wednesday, September 28, 2016

भारी खर्च ,भारी डाक्टर गरीब क्या करें.

भारी खर्च ,भारी डाक्टर गरीब क्या करें.
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छत्तीसगढ़ में निजी  मेडिकल काँलेज में ग्रेजुएशन की फीस इस साल  पांच लाख अठारह हजार बढी ,अब छात्रों को 25 लाख देने होंगे अपनी पढाई के लिये .
यह सब तय हुआ है स्वास्थ्य सचिव की अध्यक्षता में.
फीस की बढोत्तरी का कोई अनुपात है किसी के पास सिवाय इसके कि देश के कई काँलेज दो करोड़ तक फीस ले रहे है ,बिना किसी मैरिट के एडमीशन लेने के लिये.
जब बिना किसी मैरिट ,इतनी फीस ,और भारी संसाधन लगा के डाक्टर बनेंगे तो वही न करेंगे जो आजकल निजी अस्पतालों में कर रहे है .
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अहिंसा ,योगा और स्वछता दिवस .


अहिंसा ,योगा और स्वछता दिवस .


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2 अक्टूबर गांधी जयंती को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस के रूप में घोषित किया है .
हां उसी संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिसने योगा दिवस की घोषणा की थी.
संघ प्रेरित सरकार अहिंसा के प्रति अनुदारता इस सीमा तक है कि उसी अहिंसा दिवस को स्वछता दिवस में बदल दिया .
इतनी उदारता तो है इनमें कि उन्होंने अहिंसा दिवस को
नफरत दिवस में नहीं बदला .
यही है उनका गांधीजी के प्रति नाटकीय प्रेम .
स्वछता बहुत अच्छी पहल है लेकिन अहिंसा का विकल्प भी नहीं है .
मुझे तो शक है कि सरकार में किसी को मालूम भी होगा कि यूपीए सरकार की दूसरी पारी में मनमोहन सिंह के प्रस्ताव पर दुनियाँ के सभी देशों ने सर्वसम्मति से इसकी घोषणा की थी.
योगा दिवस मनायें यह अच्छी बात है ,लेकिन अहिंसा के प्रति भी भारत सरकार के कमिटमेंट को दोहराया ही जाना चाहिए ,भले ही संघ को यह सूट न करता हो.
यह कौन नहीं जानता कि मोदी भारत के प्रधानमन्त्री है सिर्फ संघ के स्वयंसेवक नही.
विदेशों में बुद्ध और गांधी की माला फेरने वालों को कभी कभी भारत में भी बुद्ध और गांधी को याद कर लेना चाहिए.
गांधी सिर्फ झाडू  के ही नहीं ,सत्य अहिंसा और राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत के भी वे प्रतीक है.
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बस्तर में कत्लेआम हो रहा है ,रोज एक आदिवासी मारा जा रहा है . -भूपेश बघेल

बस्तर में कत्लेआम हो रहा है ,रोज एक आदिवासी मारा जा रहा है .
भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष


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अभी तक जो तथ्य सामाजिक और मानवाधिकार संगठन रखते रहे है ठीक वही बात  विधानसभा में सबसे  बडी पार्टी कांग्रेस कह रही है .
छत्तीसगढ़ पुलिस को लगने लगा है कि रमन सिंह हमेशा के लिए मुख्यमंत्री चुनें गये है जो हर गैरकानूनी काम का सरंक्षण देते रहेंगे .

भूपेश बघेल ने कल बिलासपुर में पत्रकारों को संबोधित करते हुये कहा.
नक्सलियों के नाम पर बस्तर में कत्लेआम हो रहा है ,रोज एक आदमी मारा जा रहा है .बुआ के घर गये आठवीं के छात्र और उसके दोस्त को पुलिस ने नक्सली बताकर मार डाला,सुकमा बीजापुर दंतेवाड़ा में रोज मौतें हो रही है .व्यवस्था के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है .
कल्लूरी सार्टिफिकेट बांट रहे है कि जो उनके अनुसार चले वो राष्ट्रवादी अन्यथा पत्रकार राष्ट्रविरोधी होता है ॥सामाजिक संगठनों की बस्तर में हालात खराब है ,राजनैतिक कार्यकर्ताओं को पुलिस निशाना बना रही है .आदिवासीयों को चुन चुन कर मारा जा रहा है. आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है और ऐसे पुलिस अधिकारियों की तारीफ मुख्यमंत्री सरे आम कर रहे है .
इनके खिलाफ कार्यवाही सरकार को करना ही होगी.
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जवानों ने मेरी 13 साल की बहन को मेरी आँखों के सामने हवस का शिकार बनाकर मार डाला’

जवानों ने मेरी 13 साल की बहन को मेरी आँखों के सामने हवस का शिकार बनाकर मार डाला’



Kashmirजम्मू और कश्मीरब्लॉग

– आचार्य सुभाष विक्रम

एमएससी फाइनल ईयर में था। उस टाइम हमारे कॉलेज में बहुत से कश्मीरी छात्र- छात्राएं पढ़ते थे। इन्ही में से एक मेरा घनिष्ठ था गुलज़ार। आम कश्मीरियों जैसा गोरा चिट्टा। काले काले घुंघराले बाल। पढाई ख़त्म होने के बाद हम दोनों ने एक दूसरे को अपने अपने पोस्टल अड्रेस और घर में लगे फोन नम्बर्स दिए। इसके पहले गुलज़ार जब भी घर जाता, वहाँ से मेरे लिए ढेर सारे ड्राई फ्रूट्स और कुछ कश्मीरी गरम कपड़े जरूर लाता। जैसे शॉल और ऊनी जैकेट्स। मेरे घर आता कुछ दिन रहता और हम खूब बातें करते। वो कुछ झिझकते हुए बताता कि कैसे उनकी जिंदगी बद से बदतर होती चली जा रही है।

पहले उसके हाउसबोट चलते थे। काफी सैलानी उनमें ठहरते थे, जिससे अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी। मगर मिलिटेंट्स ने सब तबाह कर दिया। हमें दोहरी मार पड़ी। मिलिटेंटों ने तो हमको लूटा ही हमारे मुल्क की मिलिट्री ने भी जी भर के लूटा खसोटा। मिलिटेंट्स आते, रात को किसी आम कश्मीरी के घर में छिप जाते। कोई वारदात करते और उस कश्मीरी के डर की वजह से उसी कश्मीरी द्वारा वापस पीओके सुरक्षित पहुंचा दिए जाते।

असली खेल तब शुरू होता, जब हमारे अपने देश की मिलिट्री आती फिर एक एक घर की तलाशी लेती और निरीह नागरिकों को परेशान करना शुरू कर देती। पुरुषों को बिना कोई जुर्म साबित हुए अपने साथ उठा ले जाती। उन्हें कई-कई साल के लिए किसी जेल में बंद कर दिया जाता या उनकी हत्या करके लाश को किसी जंगल या पहाड़ी खोह में गायब कर दिया जाता था। घर की जवान से लेकर बूढी या कम उम्र बच्चियों तक को नही छोड़ा जाता।

ये हमारे देश के तथाकथित रक्षक उनकी अस्मिता के भक्षक बन जाते। सबसे बुरा उस औरत पर बीतता, जिसके पति को मिलिट्री उठा कर ले गयी होती। जवान बेटी के सामने अधेड़ माँ का और उसी घायल बेबस माँ के सामने कमसिन बेटी को कई-कई जवान अपनी हवस का शिकार बनाते। रात को अक्सर किसी न किसी घर से कोई चीख़ सुनाई देती। सुबह तक एक और जिन्दा लाश अपने तन और मन में हजारों जख्म लिए जीने को मजबूर हो जाती।

मेरे दोस्त गुलज़ार के दिल में भी हमारी मिलिट्री के लिए जबरदस्त गुस्सा था। मगर मेरे सामने वह कभी भी खुल कर व्यक्त नहीं कर पाता था। बहुत दिनों बाद दिवाली की छुट्टियों में मुझे गुलज़ार का आखिरी ख़त मिला था। जिसे उसने जेल से लिखा था और उसके किसी दोस्त ने जम्मू से पोस्ट किया था। उसने लिखा था। डियर विकरम। मैं तुमसे सहमत होना चाहता था। लेकिन इन जवानों ने मेरी 13 साल की बहन को मेरी आँखों के सामने अपनी हवस का शिकार बना कर मार डाला। फिर मैंने भी कलम छोड़ कर बंदूक उठा ली। मेरा अंजाम भी शायद वही हो कि मैं भी अपनों के पास पहुंचा दिया जाऊं। लेकिन दोस्त मलाल इस बात का रह जाएगा कि जिस देश को हमने अपना माना उसने हमें कभी अपना नही समझा।

बहुत से दोस्तों की पोस्ट पढ़ कर खुद को लिखने से नही रोक सका। लेकिन दुःख हुआ कि कुछ दोस्त मूल बातों को दरकिनार करके सिर्फ नफरत के बीज बोने में लगे हैं। चाहे कोई भी बहाना हो। (आचार्य सुभाष विक्रम ने अपना ये अनुभव फेसबुक वॉल पर सातझा किया है)

Source – socialdiary24.blogspot.com

दलित युवक सतीश नोरगे की पुलिस आभिरक्षा में हुई हत्या पर कलेक्टर और एसपी दिल्ली में तलब .


 दलित युवक सतीश नोरगे की पुलिस आभिरक्षा में  हुई हत्या पर कलेक्टर और एसपी दिल्ली में तलब .


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 सिंहदेव की शिकायत पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के तेवररायपुर 28 सितंबर 2016।पुलिस कस्टडी में सतीश नौरंगे की मौत का गुनाहगार कौन है ? इस सवाल का जवाब जांजगीर एसपी को भी देना होगा…और जांजगीर कलेक्टर को भी।
 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने जिले एसपी और कलेक्टर को दिल्ली तलब किया है। 11 अक्टूबर को एसपी और कलेक्टर को  व्यक्तिगत रूप से दिल्ली स्थिति अनुसूचित जाति आयोग के दफ्तर पहुंचकर सफाई देनी होगी।

राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग ने ये सख्ती… नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के उस शिकायत के बाद दिखाई है.. जिसमें सिंहदेव ने जानबूझकर सतीश नौरंगे की हत्या का आरोप लगाया था।
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जिस कथित मुठभेड़ के लिये जवानों को आई जी और एसपी ने इन्म दिया वही निकले हत्यारे बच्चों के

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

जिस कथित मुठभेड़ के लिए जवानो को आई जी और एस पी ने दिया था इनाम वाह निकला फर्जी



बुरगुम में कथित मुठभेड़ में जवानो ने जिन बच्चो को नक्सली बता कर मारा था  बस्तर आई जी और एस पी ने सुरक्षा बल के जवानो को इनाम दिया थालेकिन बुरगुम में नक्सली मारने की बजाय सुरक्षा बलों ने दो निर्दोष आदिवासी बच्चो को मौत के घाट उतार दिया 
बुरगुम में कथित मुठभेड़ में मारे गए दोनों बच्चों के शव का मंगलवार को ग्राम गड़दा में अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान परिजनों सहित गांव के शिक्षक और अन्य लोगों ने मृतकों का नक्सलियों से किसी तरह का नाता होने से इंकार करते कहा कि पुलिस ने उन्हें मारा है।


छत्तीसगढ़ कांग्रेस बस्तर के मुठभेड़ की जांच करेगी. छत्तीसगढ़ कांग्रेस बस्तर के बुरगुम गांव में हुये पुलिस मुठभेड़ की जांच करेगी. इसके लिये प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने बस्तर के सात कांग्रेसी विधायकों का एक जांच दल बनाया है जो मामले की जांच करेगा.