Friday, March 31, 2017

FIR filed against two Chhattisgarh journalists for Facebook post



STATE NEWS

FIR filed against two Chhattisgarh journalists for Facebook post about ex-IG's meeting with Maoists

The have been charged with defamation and public mischief, among other things.

Scroll Staff

Published Yesterday · 10:43 pm.

6 TV/YouTube

A First Information Report was filed against two journalists in Chattisgarh’s Bastar on Friday for posting and sharing a message on social media and through WhatsApp about interactions between former Inspector General SRP Kalluri and Maoist fighters. Kamal Shukla and Prabhat Singh have been charged with defamation, insult to provoke breach of peace, public mischief and disturbing religious enmity.

The complaints against them were filed by two social groups Andhra Samaj Bastar and Sarva Dharm Samaj after Shukla wrote on Facebook about Kalluri holding a meeting with some Maoist leaders of Andhra origin in Jagdalpur’s Andhra Bhavan. Arms were allegedly handed over to the fighters at the meeting, the post said. Singh later shared Shukla’s post on a WhatsApp group titled Yuva Sangh Chhattisgarh.

The post cast doubts on the secrecy with which the meeting was conducted and also questioned the disclosure soon after the meeting, of an imminent attack by Maoists, which was shared on the same WhatsApp group by members close to Kalluri.

Shukla sought a high-level enquiry into the gathering. In the post, he commented on Kalluri’s inability to keep himself away from illegal mining activities, timber trafficking and corruption involving police officials working closely with Maoists.

Kalluri was transferred from the Bastar range in February after a series of attacks on academic and activist Bela Bhatia by a civil vigilante group allegedly supported by the police. The men threatened her with dire consequences and gave her a 24-hour deadline to leave. Bhatia had faced violence and threats in the past, in particular about her involvement with the National Human Rights Commission’s efforts to gather depositions from women who had survived rape and sexual assault at the hand of security forces in the region.

Several activists and journalist have faced trouble in Bastar for their reports and work that has questioned authority figures in the area. In January, 2016, effigies of Aam Aadmi Party leader Soni Sori were burnt. On February 4 last year, leaflets were thrown into Sori’s house in Geedam, warning her against returning to Bijapur. After repeatedly being harassed, Scroll.in contributor Malini Subramaniam left Jagdalpur. Later, a group of lawyers for the Jagdalpur Legal Aid Group had to leave the town after an imminent threat of arrest.

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Thursday, March 30, 2017

प्रेस कांफ्रेंस में रो पडीं सोनी ,कहा अत्याचार बर्दाश्त करने की ताकत खतम


** सात ग्रमीणों को पकड कर  ले गई थी  पुलिस ,आजतक लापता है ,परिजन  तलाश में पहुचे मुख्यालय जगदलपुर .
**प्रेस कांफ्रेंस में रो पडीं सोनी ,कहा
अत्याचार बर्दाश्त करने की ताकत  खतम .
**  आदिवासियों पर अत्याचार करने  वाले पुलिस कर्मीयों को डुपट्टा ओढ कर चलना चाहिए .
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 चिंतागुफा गाँव से  लापता हुये ग्रामीणों के परिजन आज सोनी सोरी के साथ जिला मुख्यालय जगदलपुर पहुचे .
 दोपहर निषाद भवन में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में आदिवासियों पर हो लगातार हो रहे अत्याचार से व्यथित होकर रो पडी  सोनी ने एर्राबोर थाने के इंचार्ज पर आरोप लगाते हुये कहा कि उसने थाने  में मेरा डुपट्टा खींचा .बिरोध करने पर जेल भेजने की धमकी मिलती है, उन्होंने कहा कि गाँव में आदिवासियों के साथ अत्याचार की इंतहा हो गई हैं .
हर गाँव में यही कहानी है ,आदिवासियों के साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लडते लडते में थक गई हूं. पुलिसिया अत्याचार को देखते हुये अब मेरा मन काम छोडनें का हो रहा है.
पहले भी क ई बार सेवा का काम छोड़ने का मन बना चुकी हूं लेकिन  फिर
पहले भी क ई बार सेवा का काम छोड़ने का मन बना चुकी हूं लेकिन  लोगो की तकलीफें देखकर बार बार इनकी  लड़ाई में साथ आना ही होता हैं .
 आप नेता रोहित आर्य ने बताया कि सोनी पर  हमला करने वाले थानेदार के खिलाफ  मामला दर्ज करने की मांग को लेकर रायपुर में  बडा प्रदर्शन किया जावेगा ,सोनी ने बताया कि चिंतागुफा के दो पारा खाली हो गये हैं ,सभी ग्रमीण पुलिसिया कहर के कारण आन्ध्रा भाग गये है, और तीन गाँव भी खाली होने को तैयार हैं।
सोनी ने कहा कि जल्दी ही कुछ नहीं किया गया तो यह सब आंध्र में जाकर बस जायेंगे .

** चितागुफा के सात लोग है लापता
सोनी ने बताया कि चिंतागुफा में रहने वाले  कट्टम एंका ,कट्टम राजू, कट्टम बुच,सोढी चन्द्रा ,पदमा नागा,पदम रंगा, और मडकाम मुत्ते दस दिन से लापता है ,जिनका  आजतक  कोई पता नही पडा है ।.

** पुलिस ले गई थी इन सब को जिनका अभी तक कुछ पता नही पड रहा.      
             
  सोनी ने पत्रकारों को बताया कि फोर्स के  लोग उस दिन गाँव पहुचे थे ,सिपाहियों ने जो भी मिला उसे बेदम  तक मारा पीटा ,महिलाओं को नंगा करके भी पीटा गया ,गर्भवती महिला को  भी नही छोड़ा गया . महिलाओं के साथ छेडछाड की गई और गंभीर रूप से घायल कर दिया,जो लोग मंदिर या शादी घर में  थे उन्हें भी वहाँ जाकर पीटा गया .
मारपीट के बाद 25  लोगो को पुलिस पकडक गोरका कैम्प ले गई ,अगले दिन सात लोगों को छोडकर अन्य सभी को वापस कर दिया हम लोग आईजी बस्तर से मिलकर उन सात लोगों के बारे में जानकारी मांगेंगे ,उन्होंने कहा कि एक कनाडाई युवक को पुलिस तीन दिन में खोज लेती है लेकिन आदिवासियों को  दस दिन बाद भी नही खोज पाई  जब कि वही लोग उन्हे पकड ले गये थे.
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जान जोखिम में डालने की कीमत महज़ 40 रुपए! -bbc




जान जोखिम में डालने की कीमत महज़ 40 रुपए!

आलोक प्रकाश पुतुल
छत्तीसगढ़ से बीबीसी हिंदी के लिए

अपनी जान जोख़िम में डाल कर माओवादियों से लोहा लेने की क़ीमत क्या हो सकती है?

छत्तीसगढ़ सरकार से अगर यह सवाल पूछें तो जवाब होगा 40 रुपये, 50 रुपये, 75 रुपये और बहुत हुआ तो 100-150 रुपये.

माओवादियों से मुठभेड़ करने वाले बहादुर जवानों को छत्तीसगढ़ सरकार ऐसी ही रक़म इनाम में देती है

दंतेवाड़ा में छत्तीसगढ़ पुलिस के जवान रामसाय (बदला हुआ नाम) इनाम के सवाल पर हंस देते हैं.

रामसाय कहते हैं, "यह पिछले साल का क़िस्सा है. माओवादियों के सर्चिंग ऑपरेशन के लिए हम दो दिनों से जंगल की खाक़ छान रहे थे और जब हम थक चुके थे, उसी समय हम पर माओवादियों ने हमला बोला. हम लोगों ने भी मोर्चा संभाला और जवाबी कार्रवाई की. अपनी जान की परवाह नहीं की और कई माओवादियों को मार दिया."

क्यों आती है शर्म

"उस दिन पुलिस अधीक्षक ने पूरी टीम को सराहा और इनाम देने की घोषणा की. घर में भी लोग ख़ुश थे. लेकिन लगभग महीने भर बाद जब इनाम मिला तो मैं शर्म से गड़ गया. मुझे मुठभेड़ में अपने शानदार प्रदर्शन के लिए 40 रुपये का इनाम दिया गया था."

रामसाय का कहना है कि यह उनका पुलिस सेवा में पहला इनाम था, इसलिए बहुत उम्मीदें थीं.

रामसाय कहते हैं, "अब तो इनाम के बारे में सोचता भी नहीं हूं. कहीं किसी जवान को इनाम देने की घोषणा की जाती है तो मुझे बस हंसी आती है. हमारी जान की क़ीमत भुजिया के पैकेट से भी कम है. भुजिया का पैकेट भी इससे महंगा आता है."

पिछले दो साल के आंकड़े देखें तो बस्तर में माओवादियों से मुठभेड़ करने वाले 1362 जवानों को अलग-अलग अवसरों पर उनकी वीरता के लिए पुरस्कृत किया गया. लेकिन इनमें से लगभग 75 फ़ीसदी जवानों को 100 रुपये या उससे भी कम बतौर ईनाम दिये गए.

344 जवानों को तो महज़ प्रशंसा पत्र थमा दिया गया, जबकि 91 जवानों को 40 रुपये और 325 जवानों को 50 रुपये दिए गए. 109 जवान ऐसे थे, जिन्हें 75 रुपये दिए गए. इसी तरह 100 रुपये की रक़म पाने वाले जवानों की संख्या 211 थी.


लेकिन ऐसा नहीं है कि सारे जवानों को ऐसी ही रक़म मिली. इन 1362 जवानों में से एक, सहायक उप निरीक्षक संग्राम सिंह को इनाम में चार हज़ार नगद दिए गए. यह बस्तर में पिछले दो सालों में ईनाम की सबसे बड़ी रक़म है.

पदोन्नति और पदक

इसके अलावा 109 जवानों को पदोन्नति दी गई और चार जवानों को वीरता पदक भी दिया गया.

इसी तरह चार जवानों को 2500 रुपये, दो जवानों को 1500 रुपये और 37 जवानों को हज़ार-हज़ार रुपये बतौर इनाम दिए गए. 500, 400 और 350 रुपये का इनाम पाने वालों की संख्या महज़ एक-एक है. 250, 300 और 375 रुपये की रक़म चार-चार जवानों को दे कर उनका हौसला बढ़ाया गया.


पुलिस सुधार को लेकर चर्चित उत्तर प्रदेश व असम में पुलिस प्रमुख और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह का कहना है कि इस तरह के इनाम को जवान की सेवा पुस्तिका में दर्ज़ किया जाता है. इसका लाभ उन्हें सेवा काल में मिलता है. लेकिन वे इतनी कम रक़म दिए जाने को हास्यास्पद मानते हैं.

प्रकाश सिंह कहते हैं, "चालीस रुपये या सौ रुपये का इनाम मुंगफली की तरह है. किसी चौराहे पर खड़े हैं और किसी ने हाथ बढ़ाया और आपने रुपया-दो रुपया डाल दिया. सरकार को इनाम देना है तो ठीक से दे नहीं तो इसे भी बंद कर दे."

प्रकाश सिंह का कहना है कि जवानों को ईनाम के रुप में दिए जाने वाले बजट को बढ़ाए जाने की जरूरत है और जवानों को एक सम्मानजनक राशि दी जानी चाहिए.

सरकार की दलील

लेकिन छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा जवानों को दी जाने वाली इनाम की राशि को पर्याप्त मानते हैं.

रामसेवक पैंकरा कहते हैं,"फ़िलहाल तो जवानों को दी जाने वाली इनाम की राशि को बढ़ाए जाने की कोई योजना नहीं है. मुझे लगता है कि जवानों को जो इनाम राशि दी जाती है, वह पर्याप्त है."

ईनाम की रक़म0-500-150200-5001000-25003000-4000जवानों की संख्या760117334441

स्रोतः गृह मंत्रालय, छत्तीसगढ़

(बीबीसी हिन्दी

Wednesday, March 29, 2017

सोनी सोरी के साथ थानेदार ने की बदतमीजी



पहले मारा पीटा,गंभीर चोटे आई ,एक बहन को कपड़े उतार कर पीटा ,लगातार 15 दिल गाँव में हाहाकार ,तीन चार गाँव छोड़ कर आदिवासी आंध्र भाग गए ,जब उनके सहायता के लिये सोनी सोरी गाँव जाके कुछ पीडितों को न्याय दिलाने के लिये ला रहे थे तो उनके साथ बदतमीजी का व्यवहार पुलिस का .
यही है रमन सिंह की भाजपा सरकार की पुलिस का गैरकानूनी ,गैरजिम्मेदाराना, अप्रजातांत्रिक और अमानवीय करम .

सोनी सोरी को पूरी रात एर्राबोर थाने के बाहर रोक कर रखा गया,

सोनी सोरी के साथ छह आदिवासी भी थे,

पुलिस इन आदिवासियों को अदालत जाने से रोकना चाहती है,

इन आदिवासियों के परिवार के सदस्यों को पुलिस ने गायब कर दिया है,

अब यह आदिवासी सोनी सोरी के साथ अदालत जाकर अपनी शिकायत दर्ज़ कराना चाहते हैं,

इसलिए पुलिस ने सारी रात सोनी सोरी और इन आदिवासियों को थाने में रोक कर रखा,

इन पीड़ितों में दो युवतियां हैं जिनकी उम्र बीस साल से भी कम है,

एक बुज़ुर्ग महिला और भी हैं,  दो बुज़ुर्ग हैं जो पचास साल से ज्यादा उम्र के हैं,

रात भर पुलिस इन आदिवासियों को धमकाती रही कि "तुम लोग सोनी सोरी के साथ मत जाओ,  तुम लोग बोल दो कि सोनी सोरी हमें ज़बरदस्ती लेकर जा रही है, बोल देना कि सोनी सोरी जंगल में नक्सलियों से मिलने गयी थी,"

आदिवासियों नें कहा कि नहीं सोनी सोरी को हमने अपनी मदद के लिए बुलाया था, सोनी जंगल में नहीं गयी बल्कि हमारे गाँव में हमसे मिलने आई, हम अपनी मर्जी से सोनी के साथ जा रहे हैं,

चूंकि बात सोशल मीडिया पर फ़ैल गई थी और कई लोगों नें पुलिस को फोन करने शुरू कर दिए थे इस लिए पुलिस ज़्यादा कुछ नहीं कर पाई,

अभी सोनी सोरी और यह सभी आदिवासी पीड़ित गीदम के रास्ते पर हैं,
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Monday, March 27, 2017

कल्लूरी फिर पहुंचे बस्तर, सामाजिक संगठनों की ले रहे बैठक

कल्लूरी फिर पहुंचे बस्तर, सामाजिक संगठनों की ले रहे बैठक
Updated: Mon, 27 Mar 2017
Naiduniya


बस्तर से हटाए गए आईजी एसआरपी कल्लूरी एक बार फिर बस्तर पहुंच गए हैं।

रायपुर । बस्तर से हटाए गए आईजी एसआरपी कल्लूरी एक बार फिर बस्तर पहुंच गए हैं। बताया गया है कि रविवार को उन्होंने विभिन्न् सामाजिक संगठनों की बैठक ली। इससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि कल्लूरी एक बार फिर बस्तर में सक्रिय हो गए हैं। रात में जगदलपुर के धरमपुरा इलाके के एक होटल में अग्नि संगठन की बैठक भी हुई, जो देर रात तक चली। बैठक से मीडिया को दूर रखा गया।

सूत्रों ने बताया कि बस्तर में फिर से अग्नि जैसे संगठन को खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि अग्नि के एक सदस्य ने कहा-आईजी छुट्टी लेकर परिवार के पास आए हैं। ज्ञात हो कि आईजी कल्लूरी को बस्तर में मानवाधिकार हनन के आरोपों पर हटाया गया है।

रविवार को सोशल मीडिया पर खबर चली कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ग्वालियर में बयान दिया कि कल्लूरी को हटाया नहीं गया है, उन्हें छुट्टी दी गई है, क्योंकि वे बीमार हैं। इसके बाद बताया गया कि वे बस्तर पहुंच गए हैं। इसी महीने 2 मार्च को वे बस्तर गए थे तो काफी हंगामा हुआ था। आरोप लगे थे कि बिना बताए मुख्यालय छोड़ बस्तर पहुंच गए और बिना अनुमति निजी कार्यक्रम में शामिल हुए।

दरअसल उस कार्यक्रम में मंच से सुकमा एसपी ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कुचल देने की बात कही थी। इस पर बवाल मचा तो सरकार आयोजन में शामिल होने वाले सुकमा और जगदलपुर एसपी को भी हटा दिया था। इसके बाद कल्लूरी ने सोशल मीडिया में दोनों एसपी के साथ अपनी तस्वीर डाली और लिखा-थ्री इडिएट्स क्लीन बोल्ड।

इनका कहना है

हो सकता है बस्तर गए होंगे, उनका परिवार वहां है। मेरी जानकारी में नहीं कि वहां क्या कर रहे हैं।

-डीएम अवस्थी, डीजी नक्सल ऑपरेशन

भेज्जी एम्बुश का बदला निर्दोष आदिवासियों से लेने के लिये सीआरपीएफ और पुलिस द्वारा चिंतागुफा ,भेज्जी के आसपास के गाँव में भयंकर मारपीट . बहुत लोगों को गंभीर चौट ,कुछ लोग अस्पताल में भर्ती .

** भेज्जी एम्बुश  का बदला निर्दोष आदिवासियों से लेने के लिये सीआरपीएफ और पुलिस द्वारा चिंतागुफा ,भेज्जी के आसपास के  गाँव   में भयंकर मारपीट .      बहुत लोगों को गंभीर चौट ,कुछ लोग अस्पताल में भर्ती .                      
  * दस पंद्रह दिन से चल रहा है यह सिलसिला .
* कोट्टाचेरू, मुकंतोंग,  वेंड्रापेडार गांव खाली कर लोग जा रहे हैं आंध्र प्रदेश
*महिला के कपडे उतार कर पीटने का आरोप .*
* ग्रामीणों ने सोनी सोरी के पास आकर सहायता की अपील की .
 * पत्रकारो ,सामाजिक कार्यकर्ताओं  से हस्तक्षेप की गुजारिश .
* आज सोनी और कुछ पत्रकार जा रहे हैं गांव .
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सुकमा के चिंतागुफा और  भेज्जी के गोरखा गाँव से एक पीडित ने फोन पर चर्चा करते हुये बताया कि पिछले दस पंद्रह दिन से सीआरपीएफ और पुलिस के लोग भेज्जी एम्बुश (जिसमें 12 सैनिक शहीद हुये थे ) का बदला लेने के लिये आसपास  के  गाँव में भयंकर मारपीट कर रहे है .
उसनें बताया कि 12 मार्च को गोरखा गाँव में लोग एक मंदिर  में थे कि गोरखा केम्प से फोर्स के लोग आये और लोगों के साथ बुरी तरह मारपीट करने लगे .
भीमा को बुरी तरह मारा गया और महिलाओं को घाव घाव तक मारा गया .
मडकाम हुर्रे तो खडी भी नही हो सकतीं हैं
पिछले सोमवार 21 मार्च को  कुछ ग्रमीण एक शादी में शामिल थे तो वही आकर सीआरपीएफ के सैनिकों ने  मारपीट की एक व्यक्ति  का पैर टूट गया ,सोढी चन्द्रा को बहुत चोट आई ,एक महिला कर्तम भीमे को थाना या केम्प ले जाकर उसके कपड़े उतारकर पीटा गया ,उसे तों छोड़ दिया लेकिन उसके पति राजू और ससुर ग्राम पटेल को रोक लिया या गिरफ्तार किया गया पता नहीं .
सोढी चन्द्रा और एक व्यक्ति को रोक लिया गया साथ में चार और ग्रामीणों को पकड लिया गया .जो बुरी तरह से घायल है और कोंटा के किसी अस्पताल में भर्ती बताये जाते है .
एक व्यक्ति  का पैर टूट गया ,सोढी चन्द्रा को बहुत चोट आई ,एक महिला कर्तम भीमे को थाना या केम्प ले जाकर उसके कपड़े उतारकर पीटा गया ,उसे तों छोड़ दिया लेकिन उसके पति राजू और ससुर ग्राम पटेल को रोक लिया या गिरफ्तार किया गया पता नहीं .
सोढी चन्द्रा और एक व्यक्ति को रोक लिया गया साथ में चार और ग्रामीणों को पकड लिया गया .
कोट्टाचेरू ,कोमिगताग ,और बेंदरापेडार के लोग गाँव छोडकर आंध्र भाग गये है ,और गोरखा गाँव के लोग भी गाँव छोड़कर जाने को तैयार बेठे है.
कुछ ग्रमीण कल सोनी सोरी के   पास दंतेवाडा आकर सहायता की मांग किये,तथा उनका आग्रह है कि मीडिया और समाज कर्मी उनकी सहायता करें
 और उन्हें इस संकट से निजात दिलाये.
आज सोनी और कुछ मीडिया कर्मी उन गाँव जा रहे है ताकि सही सही जानकारी बाहर आ  सके.
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सोनी सोरी और पीड़ित व्यक्ति से चर्चा के आधार पर तैयार नोट .
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Sunday, March 26, 2017

सलवा जुडूम : दो साल का मानदेय मिला और न आरक्षक की नौकरी



सलवा जुडूम : दो साल का मानदेय मिला और न आरक्षक की नौकरी
नई दुनिया
Fri, 24 Mar 2017
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नक्सलियों की तलाश में जंगल भी भटके और कुछ मुठभेड़ में भी हिस्सा लिया लेकिन आज फाके की जिंदगी जीने मजबूर हैं।

दंतेवाड़ा। नक्सलियों के खिलाफ जनजागरण आंदोलन में शामिल होने के बाद एसपीओ बनकर समाज सेवा में जुटे। नक्सलियों की तलाश में जंगल भी भटके और कुछ मुठभेड़ में भी हिस्सा लिया लेकिन आज फाके की जिंदगी जीने मजबूर हैं। सरकार ने फंड नहीं होने की बात कहते एसपीओ की सेवा से अलग किया। फिर सहायक आरक्षक की भर्ती में बुलाया पर मापदंड का डंडा चलाकर प्रक्रिया से बाहर कर दिया। अब दो साल मुफसिली की जिंदगी जी हैं। सरकार बंदूक की नौकरी न सही पर परिवार चलाने के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ कर दें।

यह बातें आज सर्किट हाउस में बीजापुर जिले से आधा एक दर्जन महिला-पुरुष ग्रामीणों ने मीडिया के समक्ष कहा। समाज सेवी और आप पार्टी की नेत्री सोनी सोरी तथा सुकुलधर नाग के साथ पहुंचे युवक-युवतियों ने मीडिया के सामने अपना दर्द बयां किया। युवक-युवतियों के माने वे नक्सलियों के खिलाफ में जन जागरण अभियान में हिस्सा लिया था।

इसके बाद उन्हें सलवा जुडूम कैंप और फिर दंतेवाड़ा के कारली कैंप में लाया गया। जहां प्रशिक्षण के बाद वर्ष 2005 में विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के रुप में बीजापुर ले जाकर फोर्स के साथ सर्चिंग से लेकर आपरेशन और अन्य ड्यूटी ली गई। जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तब भी वे अपने कर्तव्य पर थे। लेकिन मार्च 2016 में फंड नहीं होने की बात कहते अधिकारियों ने कार्य से अलग कर दिया।

इसके बाद वे जिला बल और एसटीपीएफ और हाल में सीआरपीएफ की भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए पर मापदंड में बाहर कर दिए गए। युवक-युवतियों का कहना है कि उन्हें 2014 से मार्च 2016 के बीच करीब दो साल का मानदेय भी अब तक नहीं मिला है। भर्ती और अन्य शिकायत लेकर जब थाने और दफ्तर जाते हैं तो बाहर ही रोक दिया जाता है। अधिकारियों से मिलने तक नहीं देते। निकाले गए एसपीओ का कहना है कि उनकी जगह अधिकारियों ने मिलीभगत करते अन्य लोगों को नौकरी दे दी है।

निर्मलक्का को भागने नहीं दिया

एसपीओ पद से हटाए जाने के बाद मजदूरी कर पति और बच्चों का पेट पाल रही बत्तमा नागु ने बताया कि वह बहादुर सिपाही थी। सीजर प्रवस के बाद भी जोखिम भरे कार्य किए और अब दोबारा नौकरी के लिए दर-दर भटक रही है। पेट पालने के लिए होटल में बर्तन मांजना मजबूरी हो गया है। बत्तमा नागु ने बताया कि सन् 2000 में हार्डकोर नक्सली निर्मलक्का, पदमक्का, चंद्रशेखर आदि को पूछताछ के लिए बीजापुर लाया गया।

वहां सर्किट हाउस में फोर्स के साथ उसकी ड्यूटी भी सुरक्षा में लगी थी। जब निर्मलक्का ने यूरिन के लिए बाथरूम की बजाए बाहर जाने की बात कही तो तत्कालीन एसपी रतनलाल डांगी ने उसके साथ बाहर भेजा। इस बीच निर्मलक्का बाड़ा को कूदकर भागने की कोशिश। तब मैंने झपट्टा मारकर उसे गिराया और पकड़ा था। बत्तमा के अनुसार नक्सलियों के टारगेट में रहने की वजह से अपने मूल गांव भी बरसों से नहीं जा रही हैं।

विस्फोट में मारे गए 11 साथी तथा नागा जवान

ग्रामीण युवाओं का दर्द है कि वे एसपीओ रहते सर्चिंग और आपरेशन में हिस्सा लेता रहा है। बीजापुर के इरनवाड़ा निवासी फिलिप एक्का ने बताया कि 2005-06 में वह मुसलनार कैंप में नागा बटालियन के साथ था। एक बार गश्ती में जाने के लिए 30 जवानों की टोली कैंप से निकली और बैरियर में पहुंचने पर आधे साथी आगे बढ़ गए। हम लोग वहीं रूके थे, तभी नक्सलियों ने आगे विस्फोट कर 11 नागा जवानों सहित एसपीओ को शहीद कर दिया। इसके बाद सर्पोटिंग पार्टी के साथ उसने भी इस मुठभेड़ में फोर्स का सहयोग किया था। फिलिप के अनुसार ट्रेनिंग में उसे हथियार चलाना भी बताया गया था। कुछ ऐसी ही बातें अन्य पीड़ित ग्रामीणों ने भी मीडिया को बताई।

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Friday, March 24, 2017

रमन सरकार रावघाट खदान के लिए आदिवासियों का गांव उझाड़ रही ।




रमन सरकार रावघाट खदान के लिए आदिवासियों का गांव उझाड़ रही ।
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रावघाट में आयरन ओर का खदान बनने से इलाका का वन, प्रकृति, परिबेश, पेड़-पौधे, जीव-जानवर, कीटपतंग, नदी-नाला-झरनाओ नष्ट हो जाएगा एवं साथ ही साथ उक्त पहाड़ में युग-युगांत से रहते हुए आदिवासी-मुलनिवासी ग्रामवासियों का जीवन भी तहस-नहस हो जाएगा.

माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ नें भारत एवं राज्य सरकार का निर्दिष्ट मन्त्रको एवं विभाग एवं भीलाई इस्पात संयंत्र को नोटिस भेजा है.

बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता तिरु. अरविन्द नेताम के साथ साथ कांकेर जिला की अंतागढ़ क्षेत्र का दो साहसी एवं अनुभवी आदिवासी नेता तिरु. रामकुमार दर्रो और तिरु. राईपाल नुरेटी ने मिलके छत्तीसगढ़ का मुख्य न्यायलय बिलासपुर में NM D C  तथा भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा संचालित होनेवाला कांकेर एवं नारायणपुर जिले का रावघाट घाटी का 883.22  हेक्टेअर इलाका में निर्माणाधीन आयरन ओर खदान के खिलाफ जनहित जाचिका दायर किए है. उक्त जाचिका में भिलाई इस्पात संयंत्र के साथ साथ अपने अपने लापरवाही के इलज़ाम देते हुए छत्तीसगढ़ सरकर का वन विभाग एवं भारत सरकार का पर्यावण एवं वन मंत्रालय एवं मिनिस्ट्री ऑफ़ ट्राइबल अफेयर्स को भी पार्टी बनाया गया है

अभियोग काफी सारे है. उक्त खदान का जो एनवायरनमेंट असेसमेंट रिपोर्ट है उस में लिखा गया है की उक्त खदान इलाका में कोई गांव है ही नहीं. लेकिन ताजुब का बात ये है की एक राइट टू इनफार्मेशन आवदेन का जवाब में अंतागढ़ का तहसीलदार स्वयं १० गांव का नाम दिया है जो खदान इलाका में आते है. आप को शायद याद रहेगा, सन 2013 में बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स द्वारा हिंसा एवं वलपूर्वक रावघाट घाटी का दो गांव - आंजरेल एवं पल्लाकसा को खली करवाया गया था. हाल में पूरा रावघाट पहाड़ी में 30 से भी ज्यादा बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स एवं सशत्र सीमा वल का कैंप बैठाया गया है, एवं रावघाट अंचल का विस्तृत जगहों में २ किलोमीटर दुरी में एक एक करके फौजी कैंप है, जो इलाका का आदिवासी-मूलनिवासियों से सहमति नहीं लेते हुए ही बनाया गया था.

सिर्फ ये ही नहीं, पूरा रावघाट घाटी में २० से भी ज्यादा गांव से वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के अनुसार सही प्रारूप में सामूहिक, उपचारिक एवं व्यक्तिगत वनाधिकार पत्रक का आवेदन अभी भी अंतागढ़ का तहसील, साब-डिवीज़नाल ऑफिस आदि कछेरीओं में पड़े हुए है. ऐसे परिस्थिति ने, भारत सरकार का आदिवासी मंत्रालय द्वारा दिए हुए गेजेट नोटिफिकेशन के अनुसार  को भी वनभूमि का ऐसे खदान, कारखाना आदि तथाकथित 'डेवलपमेंटल' प्रोजेक्ट्स के लिए डायवर्सन के पहोले ऐसे वनभूमि का वनाधिकारों का सेटलमेंट हो जाना ज़रूरी है. रावघाट घाटी में अवस्थित २० से भी ज्यादा गांव का वनाधिकार दवाओं का सेटलमेंट नहीं होने के बावजूद भी भिलाई इस्पात संयंत्र को खदान के लिए कैसे सम्पूर्ण फारेस्ट क्लीयरेंस मिल गया, ये सवाल उठता है.

सवाल तो ये भी उठता है की, माननीय सुप्रीम कोर्ट कस नियमगिरि जजमेंट, जिस में उक्त न्यायलय नें स्पष्ट बताया है की आदिवासियों का धार्मिक महत्वपूर्णता समन्वित कोई भी इलाका को इलाका में पंचायत (एक्सटेनशन) टू शिड्यूल्ड एरियास एक्ट 1996 के अनुसार सही ढंग से अनुष्ठित ग्राम सभायों के माध्यम से गांववालों के सहमति नहीं लेते हुए किसी भी कारन से हस्तांतरण नहीं किया जायेगा, के देश का कानून के रूप में रहते हुए भी किस उपाय से गोंड आदिवासियों का धार्मिक घाटी रावघाट में माइनिंग का परमिशन मिला? याचिकाकर्ताओं नें शिकायत किए है की रावघाट खदान के  इलाका में ऐसे सहमत लाने के वास्ते कोई भी ग्राम सभा सही एवं क़ानूनी ढंग से हुआ ही नहीं था.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 एवं 26 हर इंसानों को आपने धार्मिक विश्वास के साथ जीने का मुलभुत अधिकार स्वीकृत किया है, एवं, जाचिकार्ताओं का शिकायतों के अनुसार, रावघाट पहाड़ी में खदान बनने से उक्त अंचल का गोंड एवं अबुझमाड़िया आदिवासियों का उक्त अधिकारों का हनन हो रहा है.

रावघाट में आयरन ओर का खदान बनने से इलाका का वन, प्रकृति, परिबेश, पेड़-पौधे, जीव-जानवर, कीटपतंग, नदी-नाला-झरनाओ नष्ट हो जाएगा एवं साथ ही साथ उक्त पहाड़ में युग-युगांत से रहते हुए आदिवासी-मुलनिवासी ग्रामवासियों का जीवन भी तहस-नहस हो जाएगा. इस समस्या को देखते हुए डाला हुआ याचिका रिट पिटीशन (पीआईएल) क्र. 26/2017 में 23/03/2017 को एडमिट करते हुए माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ नें भारत एवं राज्य सरकार का निर्दिष्ट मन्त्रको एवं विभाग एवं भीलाई इस्पात संयंत्र को नोटिस भेजा है.

और भी एक ज़रूरी बात ये है की उक्त खदान के सुविधा के लिए निवेदित हांल में निर्माणशील रेलरास्तों के कारन भी प्रभूत परिमाण में वनभूमि एवं आदिवासियों के लिए महत्वपूर्ण देवस्थलों, मरघटों, सामूहिक एवं व्यक्तिगत ज़मीनों को चपेटते हुए तथाकथित 'विकास' का काम किया जा रहा है भारत सरकार द्वारा। इस दौरान दल्ली-राजारा से भानुप्रतापपुर हो के अंतागढ़ हो के रावघाट पहाड़ी का गहन वन में अवस्थित कुरसेल-ताड़ोकी-तुमापाल हो के खदान का कोर इलाका भैंसगांव तक वनभूमि साफ़, समतलीकरण एवं कुछ कुछ कंस्ट्रक्शन का काम भी हो चूका है. इस के खिलाफ दिल्ली का पर्यावरण कोर्ट (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) का मुख्य बेंच में भी प्रकरण चल रहे है. बस्तर जिला में जगदलपुर से रावघाट पहाड़ी और बढ़ता हुआ निर्माणाधीन रेलरास्ता के लिए भी आदिवासी मरघट, देवस्थल आदि का नष्ट होने का आरोप है. कुल मिलाके, रावघाट पहाड़ी में माइनिंग को ले के वहां का वास्तविक परिस्थिति बहुत ही गंभीर है.

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तामेश्वर सिन्हा की पोस्ट 

Thursday, March 23, 2017

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे

  • 23 मार्च 2017
भगत सिंह
Image captionवर्ष 1927 में पहली बार गिरफ़्तारी के बाद जेल में खींची गई भगत सिंह की फ़ोटो (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.
लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.
उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.
उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.
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Image captionसॉन्डर्स मर्डर केस में जज ने इसी कलम से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के लिए फांसी की सज़ा लिखी थी
बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.

लाहौर कॉन्सपिरेसी केस

अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.
एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, "आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया."
भगत सिंह का जवाब था, "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं."
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Image captionभगत सिंह की खाकी रंग की कमीज
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.

जेल की कठिन ज़िंदगी

भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की 'मिलिट्रिज़म', लेनिन की 'लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म' और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास 'द स्पाई' कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.
भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें लेट पाए.
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Image captionभगत सिंह के जूते जिसे उन्होंने अपने साथी क्रांतिकारी जयदेव कपूर को तोहफे में दे दिया था
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.

'इंक़लाब ज़िदाबाद!'

उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.
मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.
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Image captionभगत सिंह की घड़ी. इसे उन्होंने अपने साथी क्रांतिकारी जयदेव कपूर को तोहफे में दे दिया था
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, "हम लोग जल्द मिलेंगे." सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.

तीन क्रांतिकारी

मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.
भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, "क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?"
भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.
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Image captionअसेंबली बम केस में लाहौर की सीआईडी ने ये गोला बरामद किया था
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.

आज़ादी का गीत

थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा.
फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.
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Image captionभगत सिंह की भूख हड़ताल का पोस्टर जिस पर उनके ही नारे छपे हैं. पोस्टर नेशनल आर्ट प्रेस, अनारकली, लाहौर ने प्रिंट किया था
चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.

फांसी का तख़्ता

भगत सिंह बोले, "पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है."
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़े भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."
सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.
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Image captionये टोपी सुखदेव की है जिसे वो अक्सर पहना करते थे
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे.

लाहौर सेंट्रल जेल

लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.
उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.
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Image captionअसेंबली बम केस में भगत सिंह के खिलाफ उर्दू में लिखा गया एफआईआर
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.

अंतिम संस्कार

एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.
पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.
भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह
Image captionभगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.

लाहौर में नोटिस

उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.
अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.
अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.
भगत सिंह
Image captionनेशनल कॉलेज लाहौर की फ़ोटो. पगड़ी पहने भगत सिंह (दाहिने से चौथे) खड़े नज़र आ रहे हैं (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.

भगत सिंह का परिवार

इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.
लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रूका.
अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.
भगत सिंह
Image captionजालंधर के देशभगत यादगार हॉल में लगाई गई भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की एक पुरानी तस्वीर (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.

ब्रिटिश साम्राज्य

वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, 'किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.'
उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.
किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.
(ये लेख मालविंदर सिंह वड़ाइच की किताब 'इटर्नल रेबल', चमनलाल की'भगत सिंह डॉक्यूमेंट्स' और कुलदीप नैयर की किताब 'विदाउट फियरमें प्रकाशित सामाग्री पर आधारित है.)
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