Friday, July 24, 2015

छत्तीसगढ़ में सूदखोरी का सितम, 15 हजार किसान दफन

छत्तीसगढ़  में सूदखोरी का सितम, 15 हजार किसान दफन






Posted:IST   Updated:ISTRaipur : 15 thousand farmers committed suicide

किसानों की खुदकुशी का यह ग्राफ ��"र भी भयावह हो सकता था, लेकिन एनसीआरबी ने 2011 से 2013 की अवधि में ऐसी मौतों की गणना नहीं की









रायपुर. 14 साल और 14793 किसानों की आत्महत्या। राज्य सरकार को इन मौतों के आंकड़ों से भले ही परहेज हो, लेकिन रोंगटे खड़े कर देने वाली यह सच्चाई राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के रिकॉर्ड में दर्ज हैं। किसानों की खुदकुशी का यह ग्राफ और भी भयावह हो सकता था, लेकिन एनसीआरबी ने 2011 से 2013 की अवधि में ऐसी मौतों की गणना नहीं की। बढ़ती लागत से खेती में हो रहे लगातार नुकसान और ऊपर से सूदखोरों के मकडज़ाल ने किसानों की कमर तोड़ दी है। बावजूद इसके सरकार की अनदेखी से प्रदेश का अन्नदाता अपनी जान देने के लिए मजबूर हो रहा है। शर्मनाक और हैरान करने वाली बात यह भी है कि विधानसभा में मंगलवार को कृषि मंत्री यह कहने से नहीं चूके कि वे एनसीआरबी के आंकड़ों से इत्तेफाक नहीं रखते, जबकि ये आंकड़े राज्य पुलिस ने ही एनसीआरबी को उपलब्ध कराए हैं। वर्ष 2014 के लिए एनसीआरबी की जारी रिपोर्ट में किसानों की खुदकुशी� के मामले में महाराष्ट्र, तेलंगाना और मध्यप्रदेश के बाद छत्तीसगढ़ चौथे स्थान पर है।

शासन बेपरवाह

बोनस� भाजपा ने 2013 के विधानसभा चुनाव में वादा किया कि वह किसानों को धान पर ३०० रुपए प्रति क्ंिवटल बोनस देगी। मगर सरकार ने पिछली बार से धान पर बोनस देना बंद कर दिया है।
एमएसपी भाजपा ने यह चुनावी वादा भी किया कि वह किसानों से 2100 रुपए प्रति क्ंिवटल एमएसपी पर धान लेगी, लेकिन केंद्र में भी इसी पार्टी की सरकार होने� के बावजूद यह नहीं निभाया। बीते दो सालों में ५० रुपए प्रति क्ंिवटल एमएसपी बढ़ा है, जबकि किसान की उत्पादन लागत 20 प्रतिशत बढ़ी है।
फसल बीमा� इस साल मौसम बीमा बंद कर दिया गया है। जानकारों के अनुसार नई फसल बीमा में लाभ आधारित बात नहीं जोड़े जाने और अस्पष्टता के चलते किसानों की हालत और ज्यादा खराब होने वाली है।
पीडीएस में कटौती� राज्य सरकार ने 2013 के बाद से अलग-अलग समय और विभिन्न तरीके से पीडीएस सब्सिडी पर ३० प्रतिशत कटौती की है।

प्रदेश में सबसे सस्ते मजदूर

केंद्र के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में देश के सबसे सस्ते मजदूर हैं। यहां मनरेगा में मजदूरों को महज १५९ रुपए मेहनताना प्रतिदिन है, जो बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे कम हैं।

जान की दुश्मन बनी सूदखोरी

"पत्रिका" की पड़ताल में सामने आया कि प्रदेश के हर कोने से बेबस किसान सूदखोरों की मकडज़ाल में उलझकर जिंदगी की बाजी हार रहे हैं। दरअसल, कम दर पर कर्ज दिलाने के मोर्चे पर सरकारी एजेंसियां पंगु साबित हुई हैं। सूदखोर कर्ज देने से पहले जमीन, जायदाद, जानवर, मकान और घर के सामान तक गिरवी रख लेते हैं। फिर मूलधन से तीन गुना वसूलने पर भी रहम नहीं करते।� सूदखोर 3 से 5 रुपए प्रति सैकड़ा ब्याज पर पैसा देते हैं, जो चक्रवती ब्याज में बदलता रहता है। पुलिस के अनुसार 3 वर्षों में 300 से ज्यादा सूदखोरी के मामले दर्ज हुए। इस दौरान 40 ने जान गंवाई। इनमें ज्यादातर किसान हैं। राज्य लोक आयोग ने बीते 4 मार्च को सूद कारोबार पर लगाम के लिए छत्तीसगढ़ रेग्यूलेशन ऑफ मनी-लेंडिंग एक्ट-2015 कानून बनाया, लेकिन राज्य में इसका असर अब तक नहीं दिखा है।

बदलते पैमानों में भी नहीं छिपे आंकड़े

एनसीआरबी ने इस बार आत्महत्या को लेकर जो मापदंड तय किए, उससे किसानों के जान देने के मामलों में आधी से ज्यादा गिरावट आ गई। २०११ से २०१३ तक आंकड़ों में किसान का कॉलम हटा दिया गया। ताजा रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या का कॉलम फिर जोड़ दिया, लेकिन मापदंड परिवर्तित कर दिए। इसके बावजूद प्रदेश में ४४३ किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं।

अविश्वास प्रस्ताव पर 24 को चर्चा

राज्य सरकार के खिलाफ नान घोटाला और किसानों की आत्महत्या सहित अन्य मुद्दों पर विपक्षी दल कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को बुधवार को सदन में चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया गया और अब इस पर 24 जुलाई को चर्चा होगी। विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल ने दोपहर साढ़े 12 बजे का समय निर्धारित किया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने अपने सदस्यों को व्हिप जारी कर उपस्थिति अनिवार्य कर दिया है। सदन में भाजपा के 49, कांग्रेस के 39 विधायक हैं। एक विधायक बसपा और एक निर्दलीय हैं। चर्चा के लिए शुक्रवार का दिन निर्धारित होने पर नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने कहा, शुक्रवार का दिन अशासकीय संकल्पों के लिए है। इसे सोमवार किया जाता तो बेहतर होता। कृषि एवं जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आरोप लगाया कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा से बचना चाह� रहा है। इसे लेकर दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक हुई।

सरकार लाए श्वेत पत्र

प्रदेश में 17 लाख छोटे किसान बैंकों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। फायदे में हैं, बस कुछ बड़े किसान। सरकार के हर मोर्चे पर फेल होने के चलते ग्रामीणों का जीना दूभर हो गया है। किसानों की आत्महत्या पर सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।

संकेत ठाकुर, कृषि विशेषज्ञ

पड़ताल कराएंगे

मनरेगा लोगों की आमदनी में सहायक बनती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत सबसे सस्ती मजदूरी मिलने की बात पता नहीं थी। पड़ताल कराएंगे।

अजय चंद्राकर मंत्री, पंचायत एवं ग्रामीण विकास
महज रिपोर्ट है
हमारी जानकारी में ऐसा कुछ भी नहीं है कि राज्य के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कि

खेत बने कब्रगाह ; एक साल में 52 महिला किसानो ने की आत्महत्या ; छत्तीसगढ़ मदर छत्तीसगढ़ के छूट रहे रहे है प्राण



खेत बने कब्रगाह ; एक साल में 52 महिला किसानो ने की आत्महत्या ; छत्तीसगढ़ 

मदर छत्तीसगढ़ के छूट रहे रहे है प्राण 





Posted:IST   Updated:ISTRaipur : Chhattisgarh Mother are dead

"दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा" मशहूर फिल्म "मदर इंडिया" का यह गीत छत्तीसगढ़ के खेतों में "सोना" उपजाने वाली "मदर छत्तीसगढ़" के दर्द को बयां कर रहा है।











रायपुर. "दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा" मशहूर फिल्म "मदर इंडिया" का यह गीत छत्तीसगढ़ के खेतों में "सोना" उपजाने वाली "मदर छत्तीसगढ़" के दर्द को बयां कर रहा है। प्रदेश की किसान महिलाओं की पीड़ा इससे कहीं ज्यादा है और वो सूदखोरी के शिकंजे में उलझकर खुदकुशी कर रही हैं। गरीबी और तंगहाली में उनके हालात इतने बदतर हो गए हैं कि जो जिंदा हैं, वो भी घुट-घुटकर जी रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट में यह सामने आया कि एक साल में यहां पर 443 किसानों में से 52 महिला किसानों ने भी अपनी जान गंवाई है। इनके ज्यादातर परिवार सूदखोरी के मकडज़ाल में फंसे हुए हैं। रिपोर्ट बताती है कि 20.6 प्रतिशत महिला किसानों ने आर्थिक तंगी या कर्ज के चलते आत्महत्याएं कीं। वहीं, 20.1 प्रतिशत ने पारिवारिक कलह के कारण अपनी जान दी। कृषि विशेषज्ञों का कहना है, इसके पीछे भी फसल की बर्बादी और सूदखोरी का दबाव है।

किसानों की खुदकुशी मामले पर सदन में हंगामा

14 वर्षों में 14793 किसानों की आत्महत्या के रोंगटे खड़े कर देने के मामले पर विधानसभा में गुरुवार को जबरदस्त हंगामा हुआ। अनुपूरक बजट पर चर्चा के दौरान सवालों पर सरकार असहज नजर आई। मरवाही से कांग्रेस विधायक अमित जोगी ने कहा, एनसीआरबी के आंकड़ों को भी कृषि मंत्री गलत बता रहे हैं। उन्होंने कहा, एनसीआरबी केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था है और उसको ये आंकड़े प्रदेश की एजेंसियों ने ही दिए हैं। नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने कहा, विकास के तमाम दावों के बीच कृषि क्षेत्र पीछे ही छूटता जा रहा है।

नान, धान, किसान और मानव तस्करी पर चर्चा आज

विधानसभा में शुक्रवार को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नान, धान, किसान, मानव तस्करी, अफसरशाही, भ्रष्ट अफसरों से करोड़ों की संपत्ति की बरामदगी सहित अन्य मामले छाए रहेंगे। कांग्रेस ने चर्चा से पहले गुरुवार को १२१ बिंदुओं पर ५३ पेज का आरोप पत्र विधानसभा के प्रमुख सचिव को सौंपा। नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव व विधायक भूपेश बघेल ने पत्रकारों को बताया, अविश्वास प्रस्ताव इसलिए जरूरी हो गया, क्योंकि सत्तापक्ष जनहित के मसलों पर जवाब देने से भाग रहा है।
10 साल से खेती में कोई विकास नहीं: एसोचेम
देश की प्रमुख औद्योगिक संस्था एसोचैम (द एसोसिएट चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ऑफ इंडिया) ने कृषि विकास के मामले में राज्य सरकार को असफल बताया। गुरुवार को राजधानी पहुंचे एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने पत्रिका से कहा, राज्य में पिछले 10 वर्षों से खेती का विकास घटता जा रहा है।


-स्कूली शिक्षा से लड़कियां बेदखल हैं। यहां 40 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं को अपना नाम लिखना नहीं आता।
-कहने को ढाई लाख महिला स्वसहायता समूह हैं, जिससे महिलाओं की तस्वीर बदल जानी चाहिए, पर ऐसा नहीं हुआ।
-गांवों में महिला मजदूरों की संख्या 25 लाख के पार हो चुकी है, लेकिन बेकारी ने उन्हें झकझोर कर रख दिया है।
-महिला तस्करी के लिए यह राज्य बड़ा बाजार बन गया है। उनकी तस्करी के लिए 1200 से ज्यादा एजेंसियां
सक्रिय हैं।
-बीते 4 साल में महिला उत्पीडऩ के 22949 मामले दर्ज, 259 गैंगरेप और महज एक साल में 1308 दुष्कर्म की वारदातें हुईं।
-केंद्र सरकार के अनुसार प्रदेश के शहरी इलाकों में ही चार लाख से ज्यादा परिवारों की महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं।

गरीबी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं में बढ़ती असुरक्षा जैसी स्थितियां उन्हें आत्महत्या की ओर धकेल रही हैं। यौन उत्पीडऩ और सूदखोरी जैसे हालात उनमें जबरदस्त तनाव पैदा कर रहे हैं। कर्ज और सामाजिक विघटन के बीच पिस रहीं महिलाओं में असहाय होने का भाव इस हद तक जा पहुंचता है कि� उनमें आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति बढ़ी है।
आनंद मिश्रा, किसान नेता

प्रदेश में सूदखोरी बढ़ीबाजार प्रभावित करने वाले गरीब और महिला किसानों को हर स्तर पर लूट रहे हैं। कर्ज से आतंकित होकर उनके परिवार के लोग अपने खेत औने-पौने दामों में बेच रहे हैं। मगर जीने का दूसरा जरिया नहीं होने से उनकी मुसीबतें बढ़ रही हैं।

चितरंजन बक्सी, कृषि विशेषज्ञ

किसने बनाया असहा

Wednesday, July 22, 2015

चार सहायक अरक्षों को अगुवा कर हत्या की छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल. द्वारा घोर निंदा

छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्रय संगठन (पी.यू.सी.एल)
१६ जुलाई, २०१५
चार सहायक अरक्षों को अगुवा कर हत्या की
छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल. द्वारा घोर निंदा
छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन (पी.यू.सी.एल) ने छत्तीसगढ़ औक्सिलिअरी फ़ोर्स (विशेष पुलिस अधिकारी) के चार सहायक आरक्षकों की माओवादियों द्वारा अगुवा कर हत्या की घोर निंदा की है, जो बीजापुर जिले के बेदरे पुलिस थाना में पदस्थ थे.

जैसा कि मीडिया रपटों से पता चला है, कि इन आरक्षकों को जन-अदालत लगा कर इसलिए मारा गया कि उन्होंने सलवा जुडूम अभियान के दौरान अत्याचार किये थे. इनमें से दो आरक्षक सार्वजनिक बस में सफ़र कर रहे थे, और माओवादियों ने इन बसों की तलाशी के दौरान उन्हें बस से उतार लिया था. मृतक आरक्षकों के शवों को माओवादियों ने कुटरू मार्ग पर बैनर और पर्चों के साथ छोड़ दिया था. इसी दौरान खबर मिली है की जिन तीन गांववासियों को कांकेर जिले के रवास गाँव से माओवादियों ने उठाया था उन्हें गत शाम छोड़ दिया गया है.
अगुवा करने और हत्या के खिलाफ पी.यू.सी.एल. अपने सैधांतिक मत पर अडिग है. पूरे विश्व में मानव अधिकार संगठनों ने लगातार और बार-बार मांग की है कि  जिनेवा कन्वेंशन में निहित मापदंडों को उन सभी पक्षों को मानना चाहिए जो किसी भी युद्ध या द्वन्द में शामिल हों.
सलवा जुडूम के मृतक नेता महेंद्र कर्मा के पुत्र छविन्द्र कर्मा द्वारा मई महीने में सलवा जुडूम – भाग II को “विकास संघर्ष समिति” के बैनर तले फिर से शुरू करने की घोषणा के बाद यह घटना घटित हुई है. बस्तर के पुलिस महानिदेशक एस.आर.पी.कल्लूरी और मुख्य मंत्री रमन सिंह ने ऐसी पहल को समर्थन दिया था.
वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने ऐसे आन्दोलन से अपने हाथ यह  कहकर धो लिए थे कि सुप्रीम कोर्ट ने “नंदिनी सुंदर एवं अन्य” प्रकरण  में आदेश दिया था कि सलवा जुडूम को समेट दिया जाए, और इस तरह के सशत्र प्रहिरियों को गैर-संवैधानिक घोषित किया था. एक माह पहले ‘विकास संघर्ष समिति’ द्वारा प्रस्तावित रैली को माओवादियों से खतरे के चलते रद्द कर दिया गया था.
पिछले कुछ महीनों में बस्तर संभाग में व्यापक स्तर पर जन-संघर्ष और जन-आन्दोलन किये जा रहे हैं, और यह सब-के-सब विभिन्न प्रस्तावित औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ हुए हैं. दिल्मिली में प्रस्तावित अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट और बस्तर जिले में नगरनार-विशाखापत्तनम स्लरी पाइप लाइन, और सुकमा जिले में पोलावरम बाँध के खिलाफ हज़ारों-हज़ार की संख्या में गांववासी लामबंध हुए हैं.
छत्तीसगढ़ सरकार को इस अवसर पर लोकतान्त्रिक ढाँचे में ग्रामीण समुदायों के साथ संवाद की परिस्थिति निर्मित करनी चाहिए, और कानून के  शासन के प्रति उनका विशवास अर्जित करना चाहिए, ताकि राज्य अपने कल्याणकारी कर्तव्य का पालन कर सके, और अनुसूचित इलाकों के लिए संवैधानिक प्रावधानों का आदर करते हुए स्वात्त्ता: को बरकरार रखा जा सके. 
संवैधानिक दायरे में उठाये जाने वाले यह कदम लोगों को हिंसक विद्रोह के रास्ते पर जाने से रोकने में ज्यादा कारगर सिद्ध होंगे, न कि महज़ सैनिक कार्यवाही जिसकी नाकामी स्थानीय गुप्तचर जानकारी के अभाव में स्पष्ट दिखाई देती है. आज बस्तर संभाग में सैनिक बलों की मौजूदगी प्रति एक लाख जनसँख्या पर १७७३ है, जब कि पूरे देश में यह देवल १३९ है, वहीँ  पूरे छत्तीसगढ़ में भी यह केवल १६९ है, और काश्मीर में भी यह ८०० से अधिक नहीं है.
अभी हाल ही में ओड़िसा के कोरापूट में एक प्रेस सम्मलेन के दौरान सी.आर.पी.ऍफ़. के डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह ने कहा था कि बस्तर के भीतरी जंगलों में नक्सलियों के शिविरों को ध्वस्त करने के लिए ज़रुरत पड़ने पर ड्रोन जैसे विमानों का इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीँ दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ में ‘तर्कसंगत आधार’ का हवाला देकर २,९१८ स्कूलों को बंद किया जा रहा है, उनमें से ७८२ स्कूल केवल बस्तर संभाग के माओवादियों से युद्ध के इलाके में मौजूद हैं.
डॉ. लखन सिंह,                                    सुधा भारद्वाज
अध्यक्ष                                               महासचिव

PUCL CONDEMNS THE ABDUCTION AND KILLING OF FOUR AUXILIARY FORCE CONSTABLES

CHHATTISGARH LOK SWATANTRYA SANGATHAN
(PEOPLE’S UNON FOR CIVIL LIBERTIES, CHHATTISGARH)
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                                                                                                                                                                                16th July 2015


CHHATTISGARH PUCL CONDEMNS THE ABDUCTION AND KILLING OF FOUR AUXILIARY FORCE CONSTABLES


The People’s Union for Civil Liberties, Chhattisgarh condemns in no uncertain terms the abduction and killing of four constables belonging to the Chhattisgarh Auxiliary Force (erstwhile SPOs) attached to Police Station Bedre, district Bijapur by the Maoists. As per newspaper reports, these constables were killed in a Jan Adalat on account of atrocities committed by them during the Salwa Judum campaign. Two of the constables had been travelling in public transport – a bus – and were taken down by Maoists searching the bus. The bodies of the dead constables were left on the Kutru Road by the Maoists along with pamphlets and banners. PUCL reiterates its principled stand against such politics of abduction and murder. Human rights organisations internationally have repeatedly insisted on the Geneva Conventions being complied with by all parties to armed conflict. Meanwhile three villagers picked up by Maoists from Village Rawas, district Kanker were released last evening.
The incident comes in the wake of the announcement made in May by Chavindra Karma, son of slain Salwa Judum leader Mahendra Karma, that Salwa Judum II would be launched under the banner of “Vikas Sangharsh Samiti”. The Bastar IG SRP Kalluri and Chief Minister Raman Singh had supported this move. The Congress Party on the other hand had disassociated itself from such movement stating that the Supreme Court in its judgment in “Nandini Sundar & Ors” has directed disbanding of the Salwa Judum and similarly constituted armed vigilantes as unconstitutional. A rally proposed by the Vikas Sangharsh Samiti a month ago had to be cancelled owing to Maoist threats.
The past few months have seen widespread agitations in Bastar region on account of various proposed industrial projects. Thousands of villagers have been protesting against the proposed Ultra Mega Steel Plant at Dilmili and the Nagarnar- Vishakhapatnam Slurry Pipeline in district Bastar, and the Polavaram Dam in district Sukma. The Chhattisgarh government must seize the opportunity to have a dialogue with the village communities and instill confidence in them in the Rule of Law, the social welfare obligations of the State and the autonomy granted under the scheme of the Scheduled Areas. This would be much more effective in weaning the people away from violent rebellion, than mere military operations which often fail for lack of local intelligence. Today the concentration of security forces per lakh of population in Bastar region is 1773, as opposed to 139 for all-India, 169 for Chhattisgarh, and about 800 for Kashmir. Recently the DG CRPF Prakash Singh in a press conference in Koraput, Odisha had stated that if need be drones may be deployed to wipe out Naxalite camps deep in the forests of Bastar.  On the other hand, of the 2,918 schools being closed down in Chhattisgarh on account of “rationalization”, 782 of them lie in the Maoist conflict-affected region of Bastar.

Lakhan Singh                                                                                                                                      Sudha Bharadwaj
President                                                                                                                                            General Secretary

Friday, July 3, 2015

बस्तर जिले के 138 प्राथमिक, 46 मिडिल, एक हाई और तीन हायर सेकेंडरी स्कूूलों को बंद कर दिया है।


बस्तर जिले के 138 प्राथमिक, 46 मिडिल, एक हाई और तीन हायर सेकेंडरी स्कूूलों को बंद कर दिया है।

हेमंत कश्यप, जगदलपुर (ब्यूरो)। राज्य सरकार ने अपना आर्थिक बोझ कम करने के लिए तीन बिंदुओं को आधार बताकर बस्तर जिले के 138 प्राथमिक, 46 मिडिल, एक हाई और तीन हायर सेकेंडरी स्कूूलों को बंद कर दिया है। इसमें सुलियागुड़ा की 50 साल पुरानी प्राथमिक शाला भी है। बस्ती के स्कूलों को बंद किए जाने से छोटे बच्चों को जंगलों व व्यस्त मार्गों से होकर डेढ़ से दो किमी चल कर स्कूल आना पड़ रहा है।
इस बस्ती के पुराने स्कूलों को बंद करने से पालकों में काफी आक्रोश है। इनका आरोप है कि अधिकारियों ने पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों से चर्चा किए बगैर मनमानी तौर पर विद्यालयों में ताला लगवा दिया है। बंद स्कूलों में अभी से जुआ और शराबखोरी शुरू हो गई है। कई अभिभावक अपने बच्चे का नाम स्कूलों से कटवाने का मन भी बना चुके हैं।
50 साल पुराना स्कूल बंद
विभाग ने जगदलपुर ब्लॉक के सुलियागुड़ा के जूनापारा स्थित 50 साल पुराने स्कूल को भी बंद कर दिया है जबकि यहां की प्राथमिक शाला में 22 बच्चे पढ़ रहे थे। अब यहां के बच्चे करीब डेढ़ किमी दूर चीतापदर स्कूल जा रहे हैं। सुलियागुड़ा में पुराना स्कूल भवन तो है वहीं बीते दिनों ही नया प्राथमिक शाला भवन बनाया गया है। विभागीय आदेश के बाद अब यहां के दोनों स्कूलों में ताला जड़ दिया गया है इसलिए ग्रामीण खासे नाराज हैं।
बदबू के बीच पढ़ाई
भाटीगुड़ा स्कूल से लगा बड़ा मुर्गी फॉर्म है। यहां से उठने वाली बदबू के कारण हर साल स्कूल के तीन- चार बच्चे बेहोश होते हैं इसलिए ग्रामीण भाटीगुड़ा प्राथमिक शाला को बंद कर बैदारगुड़ा में शिफ्ट करने की मांग करते रहे हैं, परंतु अधिकारियों ने बैदारगुड़ा के आंगनबाड़ी भवन में 2012 से संचालित प्राथमिक शाला को ही बंद कर दिया। अब वहां के 11 बच्चे भी बदबू भरे माहौल में संचालित भाटीगुड़ा स्कूल के 69 बच्चों के साथ पढ़ने मजबूर हैं।
आने का मन नहीं करता
बैदारगुड़ा से आकर भाटीगुड़ा स्कूल में पढ़ने वाली कु मुन्नी धुरवा (चौथी) व दीपक भतरा (तीसरी ) ने बताया कि नया स्कूल गांव से करीब दो किमी दूर है। नानगूर मार्ग पर काफी गाड़ियां चलती हैं इसलिए बैदारगुड़ा के सभी 11 बच्चे जंगल से होकर स्कूल आते हैं। इधर स्कूल में मुर्गीफॉर्म के कारण हमेशा बदबू रहती है, इसलिए मध्यान्ह भोजन भी नहीं कर पाते। बदबू के कारण पिछले दिनों दो छात्र बेहोश हुए थे। सुलियागुड़ा से चीतापदर प्रायमरी स्कूल जाकर पढ़ने वाली कु शांति (दूसरी)ने बताया कि नया स्कूल बहुत दूर है। अकेले जाने में डर लगता है इसलिए उसके पिता रोज स्कूल छोड़ने जाते हैं। नए स्कूल में जाने का मन नहीं करता।
निर्णय मनमानीपूर्ण
बेदारगुड़ा के हरिराम नाग के दो बच्चे अब भाटीगुड़ा स्कूल पढ़ने जाते हैं। उनका आरोप है कि ग्रामीणों व पंचायत प्रतिनिधियों की सलाह लिए बगैर अधिकारियों ने स्कूल बंद करवाया है। बच्चे जंगलों से होकर स्कूल जाते हैं इसलिए हमेशा सांप -बिच्छुओं का डर बना रहता है। सुभद्रा कश्यप के तीन बच्चे पढ़ने जाते हैं। उन्होंने बताया कि भाटीगुड़ा स्कूल में बदबू के साथ मक्खी का भारी प्रकोप है, आए दिन बच्चे बीमार होते हैं।
बारिश के कारण बच्चों को और परेशानी हो रही है। यहीं के महेन्द्र कश्यप ने बताया कि सरकार बस्तर को शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा कहकर पहले स्कूल खोलती है, फिर अपनी सुविधा के हिसाब से बंद कर रही है। यह कार्रवाई अधिकारियों की मनमानी का उदाहरण है। बैदारगुड़ा की तिलई कश्यप ने बताया कि बैदारगु़ड़ा स्कूूल भवन जंगल के पास निर्माणाधीन है। कम से कम भवन बनते तक स्कूल को नहीं बंद करना था।
वह अपने नातियों को भाटीगुड़ा स्कूल भेजती हैं पर उनकी सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंतिंत रहती है। इधर जूनापारा सुलियागुड़ा के धनसिंह बघेल ने कहा कि 50 साल पुरानी शैक्षिक संस्था को बंद करना, एक तरह से ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था को बदतर करने का प्रयास है।
विभाग की मनमानी के कारण बस्ती के 22 बच्चों को डेढ़ किमी दूर चीतापदर जाना पड़ रहा है। मुकुंदराम बघेल के तीन बच्चे भी अब बस्ती के स्कूल के बदले चीतापदर स्कूल पढ़ने जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि दर्ज संख्या कम होने का बहाना कर पुराने स्कूलों को बंद किया जा रहा है। बेहतर होता मोटी तनख्वाह ले रहे शिक्षकों के प्रति सरकार सख्ती करती। स्कूलों को बंद करने से क्या होगा? पढ़ाने वाले तो आखिर वही शिक्षक हैं।
इनका कहना है
'राज्य सरकार के निर्देश पर जिले के कुल 188 स्कूलों को बंद किया गया है। स्कूलों को बंद करने के पीछे स्कूल शिक्षा विभाग का मानना है कि एक शिक्षक के पीछे 35 बच्चे होने चाहिए। बस्तर के अधिकांश स्कूलों में 10-15 बच्चे ही अध्ययनरत थे औेर दर्ज संख्या बढ़ नहीं रही थी, वहीं शिक्षकों पर लाखों रुपया खर्च हो रहा था। एक ही केम्पस में समान स्तरीय स्कूलों और दो स्कूलों के मध्य की दूरी को ध्यान में रखकर चिन्हित स्कूलों को बंद किया गया है।'
-बृजेश बाजपेई, जिला शिक्षा अधिकारी बस्तर

चाहकर भी पोलावरम निर्माण नहीं रुकवा सकती राज्‍य सरकार

चाहकर भी पोलावरम निर्माण नहीं रुकवा सकती राज्‍य सरकार




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विनोद सिंह, जगदलपुर। बस्तर संभाग के सुकमा व बीजापुर जिले के एक बड़े हिस्से को डुबोनें वाली पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश व तेलंगाना में प्रस्तावित पोलावरम व इंचमपल्ली बहुउद्देशीय अन्तर्राज्यीय परियोनाओं का निर्माण छत्तीसगढ़ सरकार चाहकर भी नहीं रोक पाएंगी। ये दोनों परियोजनाए केन्द्र शासन की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो योजना में शामिल हैं।
अभी इनमें से सिर्फ एक पोलावरम प्रोजेक्ट पर ही तेजी से काम चल रहा है और छत्तीसगढ़ सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस परियोजना के प्रभाव से सुकमा जिले के वनवासी बहुल हिस्से को बचाने की कोशिस में लगी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर सिविल सूट में संशोधन करने का निर्णय लेने के बाद एक बार फिर पोलावरम बस्तर के संदर्भ में सुर्खियों में आ गया है।
जलसंसाधन विभाग के पोलावरम परियोजना के संबंध में जानकार लोगों का मानना है कि राज्य सरकार को भी भलिभांति मालूम है कि नदी जोड़ो योजना में शामिल इस परियोजना का विरोध एक हद तक ही किया जा सकता है। परियोजना का निर्माण तय है और इसका बहुत ज्यादा प्रभाव भले ही सुकमा जिले में न पड़े पर आंशिक असर पड़ना तय है।
छत्तीसगढ़ शासन ने भी 20 अगस्त 2011 को पोलावरम परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जो सिविल सूट दायर किया है उसमें परियोजना का निर्माण रोकने अथवा सुकमा जिले के हिस्से को डूबान से बाहर रखने की मांग नहीं की गई है। सरकार की मांग समझौते के अनुरूप निर्माण कराने की है। समझौते के उल्लंघन का विरोध किया गया है।
छत्तीसगढ़ को कुछ नहीं
पोलावरम बांध के डूबान से सुकमा जिले के 18 बसाहट क्षेत्र, करीब साढ़े सात हजार हेक्टेयर वन व राजस्व भूमि, 30 हजार की आबादी प्रभावित हो रही है। इसके एवज में छत्तीसगढ़ को मात्र डेढ़ टीएमसी पानी ही मिलेगा वह भी नहर का निर्माण कर लाने की अनुमति नहीं होगी बल्कि जलादोहन लिफ्ट सिस्टम से करना होगा।
सबसे बड़ा संकट दोरला आदिवासी जनजाति के विलुप्त होने के खतरे का है। छत्तीसगढ़ राज्य ने अभी तक नुकसान का विस्तृत आंकलन नहीं किया है। सरकार का कहना है कि 150 फीट पर निर्माण से सुकमा जिले की 683 और 177 फीट पर निर्माण से 2474 हेक्टेयर भूमि सबरी नदी के बैकवाटर से डूबेगी।
दक्षिण भारत तक जाएगा पानी
पोलावरम बांध के निर्माण के बाद नदी जोड़ो योजना के तहत गोदावरी नदी से कृष्णा नदी में 80 टीएमसी पानी छोड़ा जाना प्रस्तावित है। यह पानी तेलंगाना, कर्नाटक से लेकर केरल तक पहुंचाया जाएगा। नदी जोड़ो योजना में शामिल एक अन्य प्रोजेक्ट इंचमपल्ली बांध से पानी कृष्णा कछार में छोड़ने की योजना है।
ओआईसी पोलावरम एवं महानदी परियोजना के मुख्य अभियंता एसव्ही भागवत का कहना है कि छत्तीसगढ़ शासन ने केन्द्रीय जल आयोग और सुप्रीम कोर्ट दोनों के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। परियोजना का निर्माण बंद करने की मांग हमारी नहीं है। हमारी मांग समझौते के उल्लंघन व छग को परियोजना से होने वाले नुकसान को लेकर है।

कुनकुरी का किस्सा ; मालिक ने कहा - कराया है भू-अर्जन, एसडीएम ने कहा- नहीं हुआ कोई भू-अधिग्रहण

कुनकुरी  का किस्सा  ; मालिक ने कहा - कराया है भू-अर्जन, एसडीएम ने कहा- नहीं हुआ कोई भू-अधिग्रहण





रायगढ़ (निप्र)। कुनकुनी में जिस जमीन को स्थानीय आदिवासियों ने अपना बताते हुए उसमें गड़बड़ी की शिकायत की है, वह जमीन वेदांता कोल एण्ड लॉजिस्टिक नामक कंपनी क ी निकली, जो कि मौके पर निजी रेलवे साइडिंग का निर्माण करवा रही है। इस कंपनी के कई हिस्सेदार हैं।
कुनकुनी के जमीन की छानबीन करने नईदुनिया संवाददाता जब घटनास्थल पर पहुंची तो वहां पर काम कराता एक व्यक्ति मिला, जिसका नाम पप्पू राठौर था। जब हमने उससे बात की तो उसने कहा कि जो कंपनी रेलवे साइडिंग का काम करवा रही है उसका नाम वेदांता कोल एण्ड लॉजिस्टिक है। यदि कंपनी के बारे में ज्यादा जानकारी चाहिए तो इसके लिए खरसिया के बजरंग अग्रवाल से संपर्क कीजिए। इस संबंध में जब हमने बजरंग अग्रवाल से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि यह काम उनका भले ही है, पर इसका काम उनके भाई अशोक अग्रवाल देखते हैं, जो होटल अंश इंटरनेशनल के मालिक हैं। जब हमने यह जानना चाहा कि आदिवासियों की जमीन पर रेलवे साइडिंग कैसे बन रही है, तो उन्होंने कहा कि हमने भू-अर्जन कराकर जमीन ली है। लेकिन उन्होंने और ज्यादा बात करने से मना करते हुए अशोक भाई से बात करने को ही बेहतर बताया। इसके बाद हमने अशोक अग्रवाल से बात करने की कोशिश की पर उनका फोन लगातार बंद मिला।
नहीं हुआ भू-अर्जन
इस संबंध में जब नईदुनिया संवाददाता ने खरसिया एसडीएम बीएस मरकाम से बात की तो उन्होंने कहा कि कुनकुनी या वेदांता कोल एण्ड लॉजिस्टिक कंपनी के नाम से कोई जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया है। ऐसे में हमने तीन बार उनसे यही पूछा ताकि वे अच्छी तरह देखकर बता सकें। तीनों बार उनका यही जबाव था कि कुनकुनी में कोई भू-अर्जन सरकार द्वारा नहीं कराया गया है।
पेसा एक्ट में आता है खरसिया
खरसिया में कोई भी भूमि अधिग्रहण बिना ग्राम सभा की अनुमति नहीं की जा सकती है। क्योंकि यह आदिवासी विकासखंड होने से पेसा एक्ट के दायरे में आता है। संबंधित कंपनी को ग्राम सभा से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होता है। इसके बाद ही वहां पर जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है या किसी तरह का निर्माण कार्य कराया जा सकता है।
नहीं हुई कोई ग्राम सभा
कुनकुनी के ग्रामीणों के अनुसार गांव में भू-अर्जन के लिए कोई ग्राम सभा नहीं कराई गया है। हमें यह बताया भी नहीं गया है कि गांव में किसी प्रकार का भू-अर्जन किया जा रहा है। उन्हें जब यह बताया गया कि बिना ग्राम सभा के भू-अर्जन नहीं किया जा सकता, तब उन्होंने दावे के साथ कहा इस संबंध में कोई ग्राम सभा नहीं हुई है। इस बारे में जब हमने पंचायत सचित रामाधार डनसेना से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने हमारा मोबाइल रिसीव ही नहीं किया।
यह रेलवे साइडिंग वेदांता कोल एण्ड लॉजिस्टिक कंपनी की है। यह सब लाला भैया यानि बजरंग अग्रवाल का है। आदिवासी जमीन तो यहां सबकी है। जाएगी तो सभी की जमीन जाएगी। आप उन्हीं से बात कर लें तो ज्यादा जानकारी मिल पाएगी।
पप्पू राठौर
साइट इंचार्ज
हमने इस जमीन को भू-अर्जन से लिया है। लेकिन इस बारे में ज्यादा कुछ अशोक अग्रवाल ही बता पाएंगे। वे रायगढ़ में हैं उनसे बात कर लें।
हमने बाबू से कह कर चेक करवाया है, इस
बजरंग अग्रवाल
वेदांता कोल एण्ड लॉजिस्टिक



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