Saturday, December 26, 2015

बीजापुर में महिलाओ के साथ हुए बलात्कार और मारपीट की मानवाधिकार आयोग ने सरकार से और डीजीपी ने कल्लूरी से मांगी रिपोर्ट


बीजापुर में महिलाओ के साथ हुए बलात्कार और मारपीट की मानवाधिकार आयोग ने सरकार से और डीजीपी ने कल्लूरी से मांगी रिपोर्ट 


बीजापुर में फोर्स द्वारा आदिवासी महिलाओ से दुराचार और मारपीट और हत्या पे मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ डीजीपी को फटकार लगाते हुए चार सप्ताह में मांगी रिपोर्ट .
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राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग ने पुलिस महानिरीक्षक छत्तीसगढ़ से बीजापुर जिले के ग्राम चिन्नागेलुर ,पेदमा पल्ली ,बुडी गेचोर ,और गुडेन में आदिवासी महिलाओ के साथ फ़ोर्स द्वारा किये गये बलात्कार ,मारपीट और हत्या के मामले में कडी फटकार लगाते हुए विस्त्रत रिपोर्ट र्मांगी है .और चार सप्ताह में मामले का पूरा ब्यौरा देने को आदेश दिया है .
लगभग डेढ़ महीने पहले इन ग्रामो में सीआरपी और पुलिस द्वारा 40 महिलाओ के साथ मारपीट बलात्कार और अन्य तरीको से प्रताड़ित किया गया था , जिसमे गर्भवती महिला के साथ मारपीट और रेप किया गया जिसमे एक महिला की बाद में मौत हो गई थी .
आयोग ने शिकायत के बाद भी कोई कार्यवाही न करने और ज्ञात सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज न करने पे नाराजगी जताई है .
महिला संघटनो ने घटना के बाद तुरंत स्थल पे जाके जाँच की थी और रिपोर्ट को प्रेस तथा विभिन्न स्थानो में शिकायत के रूप में भेजी थी , जाँच में पाया गया था की 45 दिन पहले बीजापुर के ग्राम चिन्ना गेलुर ,पेद्दा गेलुर,पेदमापल्ली,बुडगी चेरू और गुधेन में 13 साल की नाबालिग और गर्भवती महिला समेत 40 महिलाओ के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया .चोथे दिन उसमे से एक महिला का मौत हो गयी थी .
परिवार के लोग और जन संघटन के लोगो की शिकायत पे खानापूर्ति के लिए प्राथमिकी दर्ज कर ली गई और बाद में पुरे मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया था .आज तक फ़ोर्स के किसी भी जवान के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई .




चेन्नागेलुर (बीजापुर) अनाचार की याद आई पुलिस डीजीपी को :कल्लूरी से मांगी रिपोर्ट 
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आदिवासी महिलाओ के साथ बदसलूकी मारपीट और बलात्कार की रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय ने आई जी बस्तर से मांगी है .
आई जी कल्लूरी से घटना का पूरा व्योरा देने को कहा गया है . प्रताड़ित के परिवार की मांग, महिला संघटनो की जाँच रिपोर्ट , मिडिया के लगातार दवाव और अब मानवअधिकार आयोग की फटकार के बाद छत्तीसगढ़ का पुलिस प्रमुख जागे और उन्होंने इसकी रिपोर्ट तलब की है .
सबको मालूम है कि बिजपुर ब्लोक का ग्राम चेन्नागेलुर, पेदागेलुर ,पेड़मापल्ली, बुडगी गेचुर और गुडेन में सुरक्षा बलों पे स्थानीय महिलाओ के साथ मारपीट , 13 साल की बच्ची के साथ अनाचार और अन्य 40 महिलाओ के साथ बद्सलुकी का आरोप है जिसमे एक महिला की मौत हो गई थी .
इस घटना के प्रकाश में आने के बाद मानव अधिकार आयोग ने गंभीरता से लिया और इसकी रिपोर्ट 28 दिन के अंदर देने को कहा .
आयोग ने पीडिता के लिखित शिकायत के बाबजूद कोई जाँच न करने को आयोग ने गंभीरता से लिया ,आज तक किसी आरोपी से पूछ ताछ तक नही की गई वे आरोपी अब भी आज़ाद घूम रहे है और उन्ही गाव में आतंक मचा रहे है .

स्कूली छात्र के साथ सुरक्षा बलों की मारपीट के खिलाफ 700 छात्रो ने त्यागा था स्कुल

स्कूली छात्र के साथ सुरक्षा बलों की  मारपीट के खिलाफ 700 छात्रो ने त्यागा था स्कुल , समाज के हस्तझेप के बाद हुए बच्चे वापस .



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19 नवम्बर को चेरपाल पोटो केबिन छात्रावास के एक छात्र को छुट्टी में घर वापस जाते समय रैगड़ गत्ता नाले के पास सवनार निवासी सातवी के छात्र सोहन ताती को फ़ोर्स के लोगो में मारपीट की जिससे वो वेहोश हो गया इसके विरोध में 700 छात्रो ने अपना होस्टल छोड़ दिया और वे सब अपने घर चले गये .
इस अमानवीय घटना के विरोध में 700 छात्रो का भविष्य खतरे में पड़ता देख कर गोंडवाना समाज का एक दल सोहन ताती के गाव सवानार गया जिसका नेत्रत्व जिला अध्यक्ष श्री तेलम बोरिया ने किया .
गोंडवाना समाज के लोगो ने बच्चो और पालको के बयान लिया और उनके भविष्य का हवाला दिया और आग्रह किया की बच्चो को वापस आश्रम भेजे उनके कहने पर गाव के लोग तैयार हुए और बच्चो को वापस स्कुल भेजा
इस बीच स्कुल या शाशन ने कोई कोशिश नही की जिससे की बच्चे वापस आ पाते.
इस दौरान गोंडवाना समाज से ग्रामीणों ने कहा की फ़ोर्स के लोग गश्त के दौरान ग्रामीणों के साथ मारपीट करते है लूट पाट करते है उनकी कोई पुलिस के लोग न सुनते है और न कोई र्र्पोर्ट लिखते है .
समाज ले लोगो ने ग्रामिणो को आश्वासन दिया की वे मुख्यमंत्री से मिल के शिकायत करेंगे और फ़ोर्स के लोगो के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करवाएंगे .

Saturday, December 19, 2015

कोयली बेडा के मरकनार में फ़ोर्स का ग्रामीणो के साथ मारपीट और जान से मरने की धमकी ,नक्सली सिद्द करने की कबायद

कोयली बेडा के मरकनार में फ़ोर्स का ग्रामीणो के साथ मारपीट और जान से मरने की धमकी ,नक्सली सिद्द करने की कबायद 

प्रताड़ित ग्रामीणो की पीड़ा जैसा उन्होंने लिखा 




























उत्तरी बस्तर के कांकेर जिले में कोयली बेडा के ग्राम मरकानार  में दो दिसंबर बुधवार को कोयली बेडा मेढकी नदी और मरकानार  के बीच हुए बम विस्फोट को लेके थाना कोयलीबेड़ा से फ़ोर्स लगभग दोपहर तीन बजे ग्राम मरकानार में  खेत में काम करने वाले लोगो आयतु ध्रुव ,रामलाल ध्रुव ,राम चन्द्र दर्रो बजनु राम ध्रुव ,हिरदु निषाद ,धंनु राम उसेंडी ,बैजनाथ ध्रुव ,अर्जुन कड़ियांम  और एक मेहमान श्याम सिंह दुग्गा को घर से बुला ले बीच जंगल में नौ लोगो का सामूहिक फोटो खिंच के घटना स्थल से होते हुए थाने  ले गए और वहाँ जाके  पुलिस अधिकारियो के सामने सभी नौ लोगो के नाम रजिस्टर  में अंकित किया।

इसके बाद फ़ोर्स के लोगो ने घटना के बारे में पूछ ताछ किया ,और सभी लोगो को एक कमरे में बंद करके  लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटाई की गई , इस मारपीट में रामचन्द्र दर्रो बेहोश हो गया। इसके बाद दबा बनाते हुए दुबारा 4 दिसंबर  दिन शुक्रवार को सुबह 9  बजे  पुरे गाव को उपस्थित होने का आदेश देने का बाद रात को 10  बजे छोड़ा गया।
अगले दिन 4  दिसंबर को पूरे गाव के लोग सुबग 9 बजे थाने में उपस्थित हुए ,पुरे  दिन पुरे गाव के लोगो को बेवजह  बिठाया गया और 17 व्यक्तियों से    बरी बारी पूछताछ की गई और उन्हें अलग अलग कमरो में तीन तीन पुलिस वालो ने लात घुसो बेल्ट डंडे से बुरी तरह से मारपीटा  गया , जिससे राजेन्द्र ध्रुव और शेषन लावतरे बेहोश हो गया।
जिन ग्रामीणो के साथ मारपीट की गई उनके नाम है , रामलाल धुर्व ,शेषन लाउत्तरे ,राम लाल दर्रो ,हीरालाल आँचले ,सुबीर कौशल ,आयतु राम ध्रुव ,धनी  राम मांडवी ,महेर सिंह ध्रुव ,राजेन्द्र ध्रुव ,शंकर अचला ,बजणु राम ध्रुव ,अर्जुन कड़ियां ,सग्राम सलाम ,हिरदु राम निषाद ,बेहा राम अचला और अजित ध्रुव है। 

पुरे गाव को बुरी तरह प्रताड़ित करने के बाद अगले दिन शनिवार दिनाक 5  दिसंबर 15  को फिर उपस्थित होने को कह के रात में 10  बजे छोड़ा गया।  बजे तीसरी बार 5  दिसंबर को फिर  पुरे गाव के लोग थाने  में हाजिर हुए ,फिर वही कहानी दोहराई गई इन सब से अलग अलग पूछ ताछ के बार मार पीट  की गई और शाम को 7 बजे यह कह के छोड़ दिया की तुम लोगो में से तीन चार लोगो को समय आने पे नक्सली केस में फसा के जेल भेज दिया जायेगा।
ग्रामीणो ने कलेक्टर और एसपी  से लिखित में शिकायत करते हुए लिखा है की महोदय हम ग्राम वासी खेती मजदूरी ,वनोपज सग्रह करके बड़ी मुश्किल में अपना  जीवन का भरण पोषण करते है ,घने जंगलो में नक्सलियों और पुलिस के बीच किसी तरह अपना जीवन वसर कर रहे हैं। हम कोई घटना के बारे में कुछ नहीं जानते बस हमें पुलिस बार बार प्रताड़ित करती रहती हैं। ऐसी किसी नक्सली घटना से हमारा कोई वास्ता नहीं है और न ही कुछ हमलोगो को कुछ मालूम ही हैं।
ग्रामीणो ने पत्र में लिखा है की ऐसी प्रताड़ना की घटनाये रोज की बात हो गई है। ये पुलिस और नक्सलियों के बीच की लड़ाई है और हम ग्रामवासी इसमें बेगुनाह प्रताड़ित  होते रहते है। आज कल रोज पुलिस हमारे साथ मारपीट करती रहती है।
उन्होंने अपील की है की ऐसे जिम्मेदार फ़ोर्स के लोगो के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जाये और उन्हें निलंबित करके उनके खिलाफ जाँच की जाये।

ऐसी ही एक अन्य शिकायत 7 नवम्बर 2015  की है ,

मरकानार  में 7 नवम्बर को दिन शनिवार को सुबह साढ़े पांच बजे जिला पुलिस बल और बीएसएफ  की सयुक्त टीम ने गांव का घेराव करके सब को जगाया गया ,और पांच व्यक्तियों को मारकानार और बड़ापारा के बीच जगल में सुबीर कौशल ,राम चन्द्र दर्रो ,आयतु राम ध्रुव ,मखलू राम ध्रुव [ग्राम पटेल ] और राजेन्द्र ध्रुव को अलग अलग करके नक्सलियों के बारे में कड़ाई से पूछ ताछ  किया गया ,इनमे से राजेन्द्र ध्रुव और सुबीर कौशल को नंगा बदन करके 80 -100  बार उठक बैठक करवाया गया और खड़े खड़े पी टी  कराई और नक्सलियों द्वारा स्टाप डेम  में लगी गाड़ियों को जलाने ,पर्चे फेंकने और सामग्री पहुचने के बारे में पूछ ताछ  की गई।
साथ में तलब से मछली पकड़ के चावल बनाने को खा गए जिसका कोई भुगतान फ़ोर्स के लोगो न ेनह किया और खा पीके  पकडे गए लड़को को म छोड़ दिया और कहा की सभी पांच लोग थाने  में हाजिर होंगे एस अादेश देके चले गया।
दूसरे दिन 4 बजे सभी ग्रामीणो ने अपनी उपस्थिति दी  उन लोगो से धमकी देते हुए कहा की तुम सब लोगो के खिलाफ वारंट है कभी भी कोयली बेडा में वारदात होगा तो तुम लोगो को जेल जाने के लिया तैयार रहना पड़ेगा। इसके बाद लाईन वाले कोरे कागज में हस्ताक्षर करवा के शाम  5 ,30  बजे छोड़ दिया गया।

ग्रामवासियो ने इस घटना की भी रिपोर्ट कलेक्टर और एसपी  को की और निवेदन किया की दोषी अधिकारियो के खिलाफ कार्यवाही की जाये।
आज तक न तो पुलिस वालो के खिलाफ कोई कार्यवाही हुई और न ग्राम वासियो की प्रताड़ना ही कम हुई है।

आवेदन पे सुबीर प्रेमलाल कौशल ,रामचन्द्र सोम सिंह दर्रो ,आयतु गस्सु राम ध्रुव ,तथा जिला पंचायत  सदस्य के हस्ताक्षर हैं ,









Friday, December 11, 2015

सांसद, विधायक से बड़ा मांझी पटेल गायता, बस्तर में संवैधानिक जन जागरण पदयात्रा....

सांसद, विधायक से बड़ा मांझी पटेल गायता, बस्तर में संवैधानिक जन जागरण पदयात्रा.....


■ लोक सभा न विधान सभा सबसे बड़ा ग्राम सभा,
■ पांचवी अनुसूचित क्षेत्र संवैधानिक जागरण यात्रा बस्तर में जागरूकता रैली
★कांकेर.तामेश्वर.सिन्हा★
आदिवासी महिलाओं के साथ अत्याचार और आउटसोर्सिंग के खिलाफनिकली संवैधानिक जन जागरण पदयात्रा आज कांकेर पहुंची. यह यात्रा 5 दिसंबर को जगदलपुर से निकली है. अपनी तरह की इस अनूठी यात्रा को लेकर पूरे बस्तर में उत्साह का वातावरण बना हुआ है. लंबे समय के बाद बस्तर के इलाके में इस तरह की पदयात्रा के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं लेकिन पदयात्रा में शामिल लोगों के लिये अपना मुद्दा सबसे बड़ा है और उनका दावा है कि वे अपना हक़ ले कर रहेंगे.
बस्तर राज की दंतेश्वरी याया के अंगरक्षक आंगापेन नरसिंह नाथ, बड़ेडोंगर की आंगापेन तथा बेड़मामारी केशकाल की आंगापेन बुम मुदिया इस आंदोलन में मचांदुर चारामा तक पदयात्रा में अगुवाई कर रहे हैं
इस पदयात्रा को बस्तर के इतिहास में आंगापेनों का अत्याचार के खिलाफ और परम्परागत ग्रामसभा मतलब पूर्व की व्यवस्था को तहस-नहस करने के विरोध के रुप में गायताओं के द्वारा बताया जा रहा है.
इस पदयात्रा में शामिल लोग अपनी इस यात्रा में संविधान को न मानने वाला देशद्रोही, पांचवी अनुसूची क्षेत्र बस्तर में धारा 244(1) कोन मानने वाला देशद्रोही, पांचवी अनुसूची क्षेत्र बस्तर में नगरीय निकाय अधिनियम असंवैधानिक है, पांचवी अनुसूची क्षेत्र बस्तर में गौ रक्षा अधिनियम लागू करने वाला देशद्रोही, पांचवी अनुसूची के प्रावधान को नहीं मानने वाला अर्थात् संविधान को नहीं पालन करने वाला देशद्रोही है; जैसे नारे गढ़ते हुये पारंपरिक परिभाषाओं को भी सवालों में घेरे में खड़े कर रहे हैं.
सर्व आदिवासी समाज के नारायण मरकाम का कहना है कि आउटसोर्सिंग द्वारा बाहरी व्यक्तियों की भर्ती करना बस्तर संभाग के बेरोजगारों के साथ घोर अन्याय है. बस्तर को मिले विशेष संवैधानिक अधिकार नियमों की सरकार द्वारा खुली हत्या की जा रही है.
मरकाम कहते हैं-”नक्सली हिंसा से जूझ रहे बस्तर के लिए सरकार के फैसले से विस्फोटक स्थिति उत्पन्न होगी. सरकार ने अगर हमारी बात नहीं मानी तो हमें उग्र आंदोलन के लिये बाध्य होना पड़ेगा.”
वही डड़सेना कलार समाज बस्तर संभाग के युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष युगेश सिन्हा भी मानते हैं कि एक तरफ तो सरकार शिक्षकों की भर्ती में आउटसोर्सिंग कर रही है और दूसरी ओर उत्तर बस्तर कांकेर जिला पंचायत में ही बड़ी संख्या में स्थानीय बेरोजगार इंतजार में हैं.
सिन्हा आरोप लगाते हुये कहते हैं- “सरकार की सारी चिंता अपने लोगों की भर्ती से जुड़ी हुई है. हमारी यह पदयात्रा सरकार को चेताने के लिये है. फिर भी अगर सरकार अपना निर्णय वापस नहीं लेती तो एससी, एसटी और ओबीसी के हज़ारों नौजवान सड़कों पर उतरने के लिये बाध्य होंगे.”
इस पदयात्रा में नुक्कड़ सभा के द्वारा पांचवी अनुसूची के तहत परम्परागत ग्राम सभा में मांझी,मुखिया,गायता, पटेल व कोटवार की महत्ता को बताया जा रहा है. इस पदयात्रा में 500 से अधिक युवक युवतियां सामाजिक पदाधिकारियों एवं आंगापेन के मार्गदर्शन में चल रहे हैं.
यह पदयात्रा दस दिसंबर को छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र वीर शहीद नारायण सिंह बिंझवार की शहादत दिवस के दिन ही पांचवी अनुसूची क्षेत्र की अंतिम सीमा मचांदुर चारामा में विशाल आमसभा के रुप में बस्तर में पुनः पेन साम्राज्य की पुनर्स्थापना का वचन लेकर समापन होगी.
यात्रा में शामिल लोगों का कहना है कि पांचवी अनुसूची में प्रदत मांझी, मुखिया, गायता, पटेल ग्राम प्रमुखों की परम्परागत शांति पूर्ण व्यवस्था अर्थात् पांचवी अनुसूची को नष्ट कर सामान्य प्रशासन को जबरदस्ती थोप करके अराजक व्यवस्था लादा गया है. आंदोलनकारियों का दावा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 244(1) का घोर उल्लंघन है.
आज कांकेर पहुंची यात्रा में वक्ताओं ने कहा कि 5वीं अनुसूची क्षेत्र में रक्षक ही भक्षक बन गये हैं और सरकार इन्हें बचा रही है. अब तो सरकार आऊटसोर्सिंग नामक साजिश से पहले हमें मौलिक रोजगार से वंचित कर रही है. उसके बहाने बाहरी लोगों को यहाँ घुसपैठ कराना चाहती है और हमें जल,जंगल, जमीन. से बेदखल करने का साजिश है.
वक्ताओं ने कहा कि पेसा कानून की धज्जियां उड़ाकर पारम्परिक ग्रामसभा के अधिकारों को पंगु बना दिया गया है. टाटा एस्सार, रावघाट जैसी परियोजनाओं में मूल निवासियों को विस्थापित कर बाहरी लोगों को बसाया जा रहा है, जो पांचवी अनुसूची का उल्लंघन है.
http://bastarprahri.blogspot.in/2015/12/blog-post.html?m=1

जापानी प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान प्रस्तावित भारत-जापान परमाणु समझौता तुरंत वापस लें !

जापानी प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान प्रस्तावित भारत-जापान परमाणु मझौता तुरंत वापस लें !

फुकुशिमा के बाद अन्य देशों को परमाणु तकनीक निर्यात करना बंद करें !

भारतियों का उन्मुक्त विनाश और नहीं सहेंगे !

मोदी की कमजोर परमाणु नीतियां से भारत में और  भोपाल होंगे !

आमंत्रण

जापान के साथ परमाणु करार भारत में परमाणु हथियारों को वैध करेगा जिससे उनकी संख्या में 
बढ़ोत्तरी होगी !

एशिया में यह हथियारों की दौड़  सैनिक शासन को और बढ़ाएगी !

विदेशी देशों के लिए परमाणु प्रतिबद्धताओं के कारण भारत की ऊर्जा प्राथमिकताएं बिगड़ेंगी !

12 दिसंबर 2015 | 11:00AM-3:00PM
जंतर-मंतर, दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में शामिल हों

प्रिय मित्रों,

हम सभी लोकतांत्रिक और शान्तिप्रिय भारतीयों एवं समुदाय जो कि प्रस्तावित परमाणु केंद्र के पास है कि तरफ से आप सबको भारत-जापान समझौते का विरोध करने के लिए आयोजित कैंपेन में आमन्त्रित करते हैं. यह समझौता जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के ११- १३ दिसंबर के दौरे पर करार किया  जायेगा। यह समझौता भारत की महत्वकांक्षी परमाणु योजना का महत्त्वपूर्ण अंग है जो कि भारत और अमरीका परमाणु संधि अमरीका और फ्रांस के परमाणु कार्यक्रम गुजरात के मीठी विरदी, आंध्र प्रदेश के कोवड़ा और महाराष्ट्र के जैतापुर बिना भारत जापान के करार के आगे नहीं बढ़ सकते। यह कार्यक्रम जापान के जरूरी पुर्ज़ों का इस्तेमाल करता हैं. जैतापुर, मीठी विर्दी, कोवड़ा और कूडनकुलम के गावों में जमीनी संघर्ष जारी है. इनके सहयोग में सभी सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक भी मुंबई, चेन्नई, बैंगलोर, कोलकाता और अन्य शहरों में अपना विरोध दर्ज़ कराएँगे।

भारत वासियो के हित में यह जरूरी है कि वह इस समझौते का कड़ा विरोध जताएं क्यूंकि यह लोकतंत्र को कुचलकर क्रूरतापूर्वक परमाणु तकनीक को बढ़ाने की  दिशा में एक कदम हैं. इन कार्यक्रमों का किसानो और मछुआरों द्वारा जबरदस्त विरोध  किया जा रहा है क्यूंकि ये  हज़ारों लोगों को विस्थापित करते और उनकी सुरक्षा तथा पर्यावरण को खतरे में  डालते हैं. बहुत सारे आज़ाद विशेषज्ञों और पूर्व नीतिनिर्माताओं ने भी इसके डिज़ाइन, विवादास्पद पर्यावरण अनुमति तथा पारदर्शिता और जवाब देहि की परमाणु क्षेत्र में कमी. फुकुशिमा के बाद तमाम देशों ने परमाणु ऊर्जा और इस तरह के अन्य अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से दूर हटना शुरू कर दिया हैं।  

जापान में लोग इस समझौते का विरोध कर रहे हैं. फुकुशिमा में हुए हादसे के बाद लोगों का शिंजो अबे का यह कदम गलत लग रहा हैं. हम आपसे निवेदन करते हैं क़ि  आप इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर हमारा सहयोग करें और भारत-जापान परमाणु समझौते का विरोध करें। 

आयोजक : कोएलिशन ऑफ़ न्यूक्लिअर डिसआर्मामेण्ट एंड पीस (सी. एन. डी. पी.) | जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन. ए. पी. एम.) | ऑल इंडिया पीपल'स फोरम (ए. आई. पी. एफ़ ) | दिल्ली समर्थक समूह (डी. एस. जी.) | खुदाई खिदमतगार | ओक्कुपायी यू. जी. सी. | टॉक्सिक वॉच अलायन्स -नो टू न्यूक्लिअर एनर्जी फोरम | न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव
संपर्क : कुमार सुंदरम - 9810556134 | शबनम शेख़ - 99971058735 | संजीव - 9958797409

दुनिया की सबसे बड़ी जमीन की लूट ;कोलम्बस के बाद


दुनिया की सबसे बड़ी  जमीन  की लूट ;कोलम्बस  के बाद 

[ संघर्ष संवाद ]

 


पिछले कुछ सालों में किसानों के खेती छोड़ने की दर भी बढ़ी है. शहरी मजदूर के रूप में उनका पलायन बढ़ा है. जब किसान खेती छोड़ रहा है तो आखिर भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ संघर्ष कौन कर रहा है और क्यों? देश भर के किसान आंदोलनों, खेती और किसानी की दुश्वारियों, जमीनों पर पसरते रियल इस्टेट के जाल पर अलग-अलग हिस्सों में घूमकर किए गए अध्ययन पर अभिषेक श्रीवास्तव की  एक विस्तृत जमीनी रिपोर्ट जिसे हम कैच हिंदी से साभार साझा कर रहे है.


अरशद खान 2009 तक एक पत्रकार हुआ करते थे. लखनऊ विश्‍वविद्यालय से पत्रकारिता करने के बाद जनता की आवाज़ बनने का आदर्श उन्‍होंने व्‍यवहार में उतारा और सात साल तक दिल्‍ली में रह कर ख़बरें करते रहे. फिर अचानक 2008 के अंत में मंदी आई.

मंदी भी ऐसी अजीबोगरीब कि हिंदुस्‍तान टाइम्‍स जैसे बड़े अखबार ने दस-बीस हज़ार तनख्वाह पाने वाले कुछ कर्मचारियों, मझोले पत्रकारों की नौकरी से निकाल दिया. बेरोज़गारी के बावजूद कुछ ने शहर में टिकने की भरसक कोशिश की, लेकिन 2009-2010 के दौरान अधिकतर पत्रकार कुछ और धंधों की ओर मुड़ गए.

अरशद के पास पर्याप्त ज़मीन थी. उन्‍हें खेती-किसानी पर पूरा भरोसा था. वे सीधे उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर स्थित अपने गांव निकल लिए. बीते पांच साल में उनकी एकाध बार दोस्‍तों से फोन पर बात भी हुई. कभी पुदीने की खेती, कभी डेयरी फार्म, कभी पशुपालन की अपनी योजनाएं वे उन्‍हें बताते रहे. फिर एक लंबा समय गुज़र गया, सबने मान लिया कि अरशद खेती-किसानी में रम चुके हैं.

इसी नवंबर की एक चढ़ती दोपहर में अरशद का फोन आया. वे शहर में थे. अपने पुराने ठिकाने निज़ामुद्दीन के सेंट्रल गेस्‍ट हाउस में. मिले, तो बाल थोड़े पक चुके थे. चेहरा पत्‍थर की तरह सपाट था. चेहरे पर संतोष का भाव था. यह संतोष धंधे में कामयाबी का नहीं, सारे कर्ज चुका देने से उपजा था.

यह संतोष धंधे में कामयाबी का नहीं, सारे कर्ज चुका देने से उपजा था

पांच साल की खेती में उनके ऊपर करीब 35 लाख का कर्ज चढ़ चुका था. वे 30 बीघा ज़मीन बेचकर और खेती को हमेशा के लिए अलविदा कह कर दिल्‍ली में दोबारा लौटे थे, लेकिन इस बार पत्रकारिता के लिए नहीं. दुबई के काग़ज़ात तैयार हो रहे थे. वे किसी भी वक्‍त अगली फ्लाइट पकड़ने को तैयार थे.

खेती के मारे अरशद अकेले नहीं हैं. वे जिंदा हैं, बस यही गनीमत है. जिस दौर में रोज़ाना पचासेक किसान खुदकुशी करने को मजबूर हों, जिस देश ने पिछले साल 1109 किसानों की मौत देखी हो और जहां खेती की ज़मीन पिछले पांच साल में 0.43 फीसद घटकर 18 करोड़ 23.9 लाख हेक्टेयर रह गई हो, वहां शहरी बेरोज़गारी के संकट से आजि‍ज़ आकर अपनी जड़ों की ओर वापस लौटना खुदकुशी करने से कम कुछ भी नहीं है.


बीते पांच साल के मुकाबले यह बात आज कहीं ज्‍यादा शिद्दत से लोग महसूस कर रहे हैं. दूसरी ओर, जिनकी समूची आजीविका खेती-किसानी पर ही टिकी हुई थी, वे भी अब शहरों की ओर भागने को बेताब हैं. तीसरा पक्ष सरकारों का है, जो उद्योगों के हित में खेती की ज़मीनों को कब्‍ज़ाती जा रही हैं. इस संकट को खेती का संकट कहा जाए या ज़मीन की लूट, इस पर बहुत बहस है.

किसान, ज़मीन, विकास, सरकार और खेती के जटिल रिश्‍ते को आखिर कैसे समझा जाए?

महाराष्‍ट्र में दिल्‍ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे के खिलाफ आंदोलन चलाने वाली समाजकर्मी उल्‍का महाजन कहती हैं, "खेती को घाटे का सौदा बताने वाले और प्रचार करने वाले लोगों की मंशा दरअसल कंपनियों और सरकारों के हित में किसानों से ज़मीन छीनने में आसानी पैदा करना है."

क्‍या किसान वाकई खेती को घाटे का सौदा नहीं मानता? फिर अरशद जैसे शिक्षित जागरुक किसानों पर इतना कर्ज कैसे चढ़ गया? क्‍या यह धंधे में उनकी नाकाबिलियत का नतीजा है? आखिर किसानों की बढ़ती खुदकुशी क्‍या ज़मीन की लूट का प्रत्‍यक्ष परिणाम है?

एक अहम सवाल यह है कि ज़मीन की लूट के खिलाफ जो भी किसान आंदोलन चल रहे हैं, क्‍या वहां सारा मामला मुआवजे की लड़ाई तक आकर नहीं सिमट जा रहा है? किसान, ज़मीन, विकास, सरकार और खेती के जटिल रिश्‍ते को आखिर कैसे समझा जाए?

नाकाम अध्‍यादेश?
पिछले साल केंद्र में बहुमत से आई नरेंद्र मोदी की सरकार ने जब 29 दिसंबर को भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के 'सहमति' वाले उपबंध समेत अन्‍य में संशोधन के लिए अध्‍यादेश जारी किया, तो हल्‍ला मच गया. अचानक ऐसा लगा कि ज़मीन के मसले पर क्‍या राजनीतिक दल और क्‍या एनजीओ, सभी एक हो गए.

फरवरी में संसद मार्ग पर 'भूमि अधिकार आंदोलन' के बैनर तले हुई किसान संगठनों और जनांदोलनों की विशाल संयुक्‍त रैली और उसके बाद अध्‍यादेश की देश भर में जलाई गई प्रतियों ने साफ़ इशारा किया कि आने वाले दिनों में ज़मीन की लड़ाई और तीखी होने वाली है.

दो बार अध्‍यादेश लाने के बाद अगस्‍त में इसे वापस लेने के सरकारी फैसले को आंदोलनों की बड़ी जीत बताया गया. दिलचस्‍प यह है कि दिल्‍ली में जो जंग अब तक 'ब्लैक एंड वाइट' दिख रही थी, वह ज़मीन पर उतना ही धुंधलका पैदा कर चुकी थी.

अध्‍यादेश वापस लिए जाने के बाद 2013 के कानून में संशोधन की जो अस्‍पष्‍ट स्थिति थी, उसका फायदा राज्‍य सरकारों ने उठाया और पिछले एक साल में ज़मीन से जुड़ी जो लड़ाइयां उफान पर आईं, उनमें किसी को भी नहीं पता था कि ज़मीन किस कानून के तहत ली जानी है और मुआवजा किस कायदे के तहत दिया जाना है.

यह किसानों की जीत थी या 'कोलंबस' के भारतीय संस्‍करण का एक और सुनियोजित विस्‍तार?

राज्‍यों में पटवारी से लेकर तहसीलदार, डीएम और मुख्‍य सचिव के स्‍तर तक यह भ्रम अब तक कायम है और किसानों की नुमाइंदगी करने वाले अब तक जीत की खुमारी में हैं. दूसरी तरफ गिरफ्तारियों व मौतों का सिलसिला बदस्‍तूर कायम है. यह किसानों की जीत थी या 'कोलंबस' के भारतीय संस्‍करण का एक और सुनियोजित विस्‍तार?

भूमि अधिग्रहण अध्‍यादेश को एक साल पूरा होते-‍होते यह सवाल पूछा जाना बेहद ज़रूरी है क्‍योंकि बीते एक साल के दौरान किसी ने भी पलट कर ग्रामीण विकास मंत्रालय की 2009 में आई उस मसविदा रिपोर्ट को खंगालने की ज़हमत नहीं उठायी, जिसके 160वें पन्‍ने पर भारत के आदिवासी इलाकों में कब्जाई जा रही ज़मीनों को धरती के इतिहास में 'कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी लूट' बताया था.

"कमिटी ऑन स्‍टेट अग्रेरियन रिलेशंस एंड अनफिनिश्‍ड टास्‍क ऑफ लैंड रिफॉर्म्‍स" शीर्षक से यह रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक विमर्श का हिस्‍सा नहीं बन पाई है, जिसने छत्‍तीसगढ़ और झारखण्‍ड के कुछ इलाकों में सरकारों और निजी कंपनियों (नाम समेत) की मिलीभगत से हो रही ज़मीन की लूट से पैदा हो रहे गृहयुद्ध जैसे हालात की ओर इशारा किया था.

ईमानदार अफसर सरकार के भीतर भी हैं, लेकिन सदिच्‍छा और ईमानदारी काग़ज़ों तक सीमित रह जाने वाली चीज़ है

छह साल पहले आई अपनी ही रिपोर्ट पर यदि समय रहते सरकार ने अमल किया होता, तो आज न तो अध्‍यादेश की नौबत आती और न ही गृहयुद्ध जैसी स्थिति बस्‍तर, दंतेवाड़ा या बीजापुर से निकलकर शहरों-कस्‍बों तक फैलने पाती.

यह रिपोर्ट इस बात का ज्‍वलंत उदाहरण है कि ईमानदार अफसर सरकार के भीतर भी हैं, लेकिन सदिच्‍छा और ईमानदारी काग़ज़ों तक सीमित रह जाने वाली चीज़ है.

लूट एक, रास्‍ते अनेक
यह रिपोर्ट ज़मीन की लूट में सरकारों और कंपनियों की जिस मिलीभगत का जिक्र करती है, उसे आज हम देश के किसी भी कोने में देख सकते हैं. कहानियां एक से एक हैं और दिलचस्‍प हैं. उत्‍तराखण्‍ड के रामनगर में एक छोटा सा गांव है बीरपुर लच्‍छी.

यहां पीढ़ियों से नेपाली मूल की बुक्‍सा जनजाति के लोग रहते आए हैं. एक दिन अचानक इस गांव में किसी बाहरी का प्रवेश होता है. वह कुछ ज़मीनें घेर लेता है और फिर गांव से भारी-भरकम डम्‍परों की आवाजाही शुरू हो जाती है.

गांव वालों को पता लगता है कि सरकार ने उनकी ज़मीन पंजाब के किसी क्रेशर कारोबारी को बेच दी है जो कांग्रेस का नेता भी है. बात तब तक नहीं फैलती है जब तक कि एक दोपहर गांव की एक बच्‍ची डम्‍पर से गिरे पत्‍थर से मारी जाती है.

इसके बाद गांव के लोग डम्‍परों का रास्‍ता खोद देते हैं. अचानक रात में क्रेशर का मालिक अपने गुर्गों के साथ गांव पर गोलियों और बमों से हमला बोल देता है. औरतों-बुजुर्गों को पीटा जाता है.

जब बाहर के संगठन इस मामले में दखल देते हैं, तो उन पर जानलेवा हमला करवा दिया जाता है. कहानी पूरी फिल्‍मी लगती है.

बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां होती हैं. इलाके में धारा 144 लग जाती है. बांध का काम शुरू हो जाता है

दूसरी कहानी उत्‍तर प्रदेश के सोनभद्र की है. यहां कोई 40 साल पहले से कनहर नदी पर एक बांध की परियोजना लंबित थी. राज्‍य में 2012 में आई समाजवादी पार्टी की सरकार ने नए सिरे से इसमें दिलचस्‍पी लेनी शुरू की. पूरा इलाका आदिवासी बहुल है और तीन राज्‍यों छत्‍तीसगढ़, यूपी और झारखण्‍ड की सीमा पर पड़ता है. पता चला कि डूब क्षेत्र में तमाम आदिवासी गांव आ रहे हैं.

दिलचस्‍प यह है कि तमाम गैर-आदिवासी परियोजना से न केवल अप्रभावित थे बल्कि उनके डम्‍पर-ट्रैक्‍टर चल रहे थे. एक दिन आंबेडकर जयन्‍ती पर आदिवासी शांत जुलूस निकालते हैं. उन पर पुलिसिया फायरिंग होती है. एक को छाती में गोली लगती है. फिर वे धरने पर बैठते हैं तो एक सुबह मुंह अंधेरे पर उन पर पुलिस का हमला हो जाता है. बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां होती हैं. इलाके में धारा 144 लग जाती है. बांध का काम शुरू हो जाता है. यह अगस्त महीने की बात है.

बिलकुल इसी तर्ज पर इलाहाबाद के करछना स्थित कचरी गांव में पावर प्‍लांट का विरोध कर रहे ग्रामीणों पर आरएएफ और पीएसी का हमला होता है और चार दर्जन असहमत किसानों को जेल में ठूंस दिया जाता है.

कुछ कहानियां ऐसी हैं जहां राष्‍ट्रहित की भारी आड़ है. मसलन, राजस्‍थान के अलवर में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) को ज़मीन दी गई है. कहा गया है कि यह एक 'रणनीतिक परियोजना' है. यह इलाका मेवात का है. यहां पीढ़ियों से मेवाती मुसलमान रहते आए हैं. राष्‍ट्र का 'रणनीतिक' मसला है, इसलिए कोई भी पहचाना जाना गवारा नहीं कर सकता. एक दिन विरोध में मौन जुलूस निकलता है तो अज्ञात लोगों पर एफआईआर दर्ज हो जाती है. इंसान तो इंसान, मेवात की पहाड़ियों पर चरने वाली बकरियों तक को नहीं बख्‍शा जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुपालन के बाद फिर से इस कवायद का अर्थ समझने में दिक्‍कत नहीं आनी चाहिए

कुछ कहानियों को सुनकर सुप्रीम कोर्ट भी बगले झांकने लगेगा. बीते दशकों में ओडिशा के नियमगिरि में ज़मीन बचाने की लड़ाई को सबसे कामयाब बताया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने रायगढ़ा और कालाहांडी की 12 ग्राम सभाओं में वेदांता कंपनी के खिलाफ रायशुमारी करवाने का आदेश सरकार को दिया था.

एक रिटायर्ड जज की अगुवाई में 12 ग्राम सभाएं 2013 में हुईं और डोंगरिया कोंढ आदिवासियों ने एकमत से वेदांता कंपनी की खनन परियोजना के खिलाफ अपना मत दिया. इसके बाद वेदांता की बॉक्‍साइट खनन परियोजना खत्‍म मानी जा रही थी, लेकिन राज्‍य सरकार ने हार नहीं मानी है.

दो महीने पहले ही उसने पर्यावरण मंत्रालय को नए सिरे से सुनवाई करवाने को लिखा है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुपालन के बाद फिर से इस कवायद का अर्थ समझने में दिक्‍कत नहीं आनी चाहिए. इसे ही कुछ लोग 'क्रोनी पूंजीवाद' कहते हैं, जहां राज्‍य और कंपनियां देश को बेचने के लिए मिलकर काम करती हैं.

केंद्र सरकार ने जो 'मेक इन इंडिया' नाम का कार्यक्रम शुरू किया था, उसकी वेबसाइट पर 'लाइव प्रोजेक्‍ट्स' नाम का एक टैब है

हम कह सकते हैं कि ये फिर भी छिटपुट मसले हैं क्‍योंकि बड़े मसले वाकई इतने बड़े हैं कि उनसे होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाना इतना सहज नहीं है. पिछले साल केंद्र सरकार ने जो 'मेक इन इंडिया' नाम का कार्यक्रम शुरू किया था, उसकी वेबसाइट पर 'लाइव प्रोजेक्‍ट्स' नाम का एक टैब है. उसे खोलने पर आंखें भी खुल सकती हैं और दिमाग भी. यह कहता है कि 2014-15 के बजट में पांच औद्योगिक गलियारा परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है जिनके इर्द-गिर्द 100 स्‍मार्ट सिटी बसाई जाएंगी.

दिल्‍ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कोरिडोर, बंगलुरु-मुंबई इकनॉमिक कोरिडोर, चेन्‍नई-बंगलुरु इंडस्ट्रियल कोरिडोर, विजैग-चेन्‍नई इंडस्ट्रियल कोरिडोर, अमृतसर-कोलकाता इंडस्ट्रियल कोरिडोर नाम की ये पांच विशाल परियोजनाएं तकरीबन समूचे भारत को छेक लेती हैं. सिर्फ इससे अंदाजा लगाएं कि दिल्‍ली से मुंबई के बीच बन रहा गलियारा 1500 किलोमीटर लंबा और 300 किलोमीटर चौड़ा है.

अगर यह गलियारा बन गया, तो साल 2031 तक राजस्‍थान की 65 फीसदी ज़मीन इसमें चली जाएगी. इन पांचों गलियारों को आपस में जोड़ने वाले लिंक राजमार्ग अलग से होंगे जो बीच की ज़मीनें निगल जाएंगे. इन सभी परियोजनाओं में जेबीआईसी, एडीबी जैसी विदेशी एजेंसियों का पैसा लगा है और कहा जा रहा है कि इनसे जीडीपी की व़द्धि दर बहुत ऊंची हो जाएगी. यह सब कुछ खेती-किसानी की कीमत पर ही होगा.

किसान क्‍यों करे खेती?
क्‍या खेती को डकार जाने वाली इन प्रस्‍तावित परियोजनाओं के बावजूद खेती की जा सकती है? ज़ाहिर है, जो किसान अपनी ज़मीनें बचाने के संघर्ष में जुटे हैं, उन्‍हें इसका भरोसा तो होगा ही. देश के अलग-अलग हिस्‍सों में हालांकि अपनी ज़मीनें गंवाने के कगार पर खड़े किसानों से बात करें, तो हकीकत कुछ और समझ में आती है.

ओडिशा के जगतसिंहपुर स्थित ढिंकिया गांव में पान की खेती करने वाला युवक नित्‍यानंद स्‍वाईं कहते हैं, "हमारे यहां काजू और पान खूब होता है. इससे हमारी अच्‍छी कमाई हो जाती है. सरकार अगर उसी हिसाब से बाजार दर पर मुआवजा दे, तो बात बन सकती है वरना हम अपनी ज़मीन छोड़ कर क्‍यों जाएंगे."

सोनभद्र के कनहर में अप्रैल की गिरफ्तारियों और अब रिहाई के बाद आदिवासियों को एसडीएम रोज़ाना मुआवजे का चेक बांट रहे हैं. अखबारों में तस्‍वीरें छप रही हैं. इस मामले समेत करछना के किसानों का मुकदमा लड़ रहे इलाहाबाद के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता ओडी सिंह कहते हैं, "लड़ाई तो चलती ही रहेगी. मामला यहीं फंसा है कि किसान 2013 के कानून के मुताबिक मुआवजा मांग रहे हैं जबकि सरकार पहले वाले कानून का सहारा ले रही है."

कचरी गांव के लोग एक स्‍वर में शिकायत करते हैं कि उनसे स्कूल, अस्‍पताल और विकास का वादा किया गया था जिसे पूरा नहीं किया गया. अगर यह सब हो जाता, तो उन्‍हें लड़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

कुछ जन संगठनों का कहना था कि इसे भूमि बचाओ आंदोलन कहा जाना चाहिए क्‍योंकि मुद्दा ज़मीन बचाने का है

हालांकि सब जगह ऐसा नहीं है. झारखण्‍ड में एक स्‍टील प्‍लांट के खिलाफ 'एक इंच ज़मीन नहीं देंगे' का जो नारा कुछ साल पहले लगा था, लोगों ने उसे ज़मीन पर उतारा भी और कंपनी को आखिरकार लौटा दिया. यह नारा हालांकि आज की तारीख में कमज़ोर पड़ चुका है क्‍योंकि अपनी ही खेती पर किसानों को बहुत भरोसा नहीं रहा.

यह स्थिति खासकर उत्‍तरी भारत के मैदानी इलाकों के संदर्भ में सही जान पड़ती है, जहां टीवी और मोबाइल जैसे उपकरण काफी पहले पहुंच चुके थे और महत्‍वाकांक्षाओं का स्‍तर महानगरीय नहीं तो कम से कम शहरी ज़रूर हो चुका है. किसान आंदोलनों के भीतर इसी समझदारी का परिणाम था कि पहली बार अध्‍यादेश लाए जाने के बाद दिल्‍ली के कांस्टिट्यूशन क्‍लब में जब भूमि अधिग्रहण अध्‍यादेश के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने की प्रक्रिया चल रही थी, तो इस मोर्चे के नाम को लेकर संगठनों के बीच मतभेद पैदा हुआ था.

कुछ जन संगठनों का कहना था कि इसे भूमि बचाओ आंदोलन कहा जाना चाहिए क्‍योंकि मुद्दा ज़मीन बचाने का है. भूमि अधिकार से उन्‍हें परहेज़ था क्‍योंकि इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि जिनके पास अपनी खेती की ज़मीन नहीं है, उन्‍हें भी ज़मीन का अधिकार है. ऐसे में इस आंदोलन का स्‍वाभाविक विस्‍तार ज़मीन कब्‍ज़ाने तक चला जाता.

इस मसले पर एकाध संगठनों ने मंच से खुद को अलग भी कर लिया और बाद में आरएसएस समर्थित अन्‍ना हजारे के मंच पर जाकर बैठ गए. बाद में हालांकि "भूमि अधिकार आंदोलन" के नाम पर ही सहमति बनी, जिसने साल भर आंदोलन को चलाया और आगे भी इसी नाम से संघर्ष जारी रहेगा.

भूमि आंदोलन के प्रायोजक
जिन किसानों के पास ज़मीनें हैं, ज़ाहिर है ज़मीन की लड़ाई भी वे ही लड़ेंगे लिहाजा किसान आंदोलन का 'ओनस' भी उनके ऊपर ही होगा. इसका मतलब यह नहीं कि वे खेती को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. उत्‍तर प्रदेश में हाल में हुए जिला पंचायत और प्रधानी के चुनावों में उतरे कई उम्‍मीदवार ऐसे हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में ज़मीन की लड़ाइयों की नुमाइंदगी करते हैं.

उत्‍तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण के मामलों पर अक्‍टूबर में बनारस में एक सम्‍मेलन हुआ जिसमें करछना के किसानों के समर्थन में एक प्रस्‍तावित राज्‍यस्‍तरीय कार्यक्रम की तारीख केवल इसलिए फंस गई क्‍योंकि ग़ाज़ीपुर, बलिया, मिर्जापुर आदि से आए किसान नेताओं को खुद या अपनी पत्नियों को चुनाव लड़वाना था.

कुछ ऐसे ही हित भूमि-अधिकार आंदोलन के मशहूर चेहरों के साथ भी जुड़े हैं, जिनमें एक के बारे यह चर्चा आम है कि वे मैग्‍सेसे पुरस्‍कार के लिए तगड़ी लॉबिइंग में जुटी हैं. करछना के किसान नेता राजबहादुर पटेल फ़रार चल रहे हैं तो कनहर के एक आदिवासी नेता छाती पर गोली खाने के बाद बांध में सुरक्षागार्ड की नौकरी पा गए हैं.

खेती के मूल तर्क को बहाल करने की लड़ाई अब तक इस देश में संगठित रूप से शुरू नहीं हुई है

सबसे दिलचस्‍प स्थिति उत्‍तराखण्‍ड के नैनीसार की है. यहां गांव वालों के फर्जी दस्‍तखत कर के जिंदल समूह को सरकार के इशारे पर ग्राम सभा की ज़मीन सौंप देने वाले 30 वर्षीय ग्राम प्रधान गोकुल राणा अल्‍मोड़ा विश्‍वविद्यालय के अपने दिनों में पुराने आंदोलनकारी पीसी तिवारी के अनुयायी हुआ करते थे. अब, जबकि पीसी तिवारी की उत्‍तराखण्‍ड परिवर्तन पार्टी खुद गांव वालों के साथ और प्रधान के खिलाफ ज़मीन के मसले पर खड़ी है, तो राणा कहते फिर रहे हैं, "हम छात्र जीवन में खुद तिवारीजी से बहुत प्रभावित रहते थे. हमें क्‍या पता था कि वो ये सब काम भी करते हैं. वे हमारे गांव में कैसे घुस गए, यह हमारे लिए अब तक रहस्‍य है."

उधर, ओडिशा के जगतसिंहपुर और नियमगिरि, राजस्‍थान के अलवर और महाराष्‍ट्र के नागपुर में ज़मीन की लड़ाई लड़ने वाले कुछ जन-नेताओं ने पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी का दामन टिकट के चक्‍कर में थाम लिया था और हारने के बाद अब तक इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं.

कुछ और जगहों पर दिलचस्‍प प्रयोग हुए हैं. मसलन, छत्‍तीसगढ़ के रायगढ़ में जिंदल कंपनी के खिलाफ़ ज़मीन की लड़ाई लड़ रहे किसानों ने संघर्ष करते-करते कोयला खोदने के लिए खुद ही एक कंपनी बना डाली. इन किसानों की नेता सरिताजी बड़े गर्व से बताती हैं कि अब गोरताप उपक्रम प्रोड्यूसर कंपनी के माध्‍यम से आदिवासी खुद अपना कोयला खनन करेंगे और उन्‍हें किसी निजी कंपनी का मुंह नहीं देखना पड़ेगा.

खेती का संकट अपनी जगह बना हुआ क्‍योंकि खेती के मूल तर्क को बहाल करने की लड़ाई अब तक इस देश में संगठित रूप से शुरू नहीं हुई है. खेती-किसानी का बुनियादी तर्क यह था कि आदमी अपने खाने-पकाने के लिए अनाज उपजाता था. जो बच जाता था, उसे वह बेच देता था. पहले पेट भरता था, फिर बचे तो मंडी.

वे कभी नहीं मानेंगे कि किसान ज़मीन बेचने को तैयार बैठा है जबकि किसान बार-बार यही कह रहा है

आजादी के बाद से किसान एफसीआई के गोदामों के लिए उपजाने लगा क्‍योंकि उस दौर में वैश्विक राजनीति का एक बड़ा आयाम खाने में आत्‍मनिर्भरता का था. इसके चलते बहुफसली खेती चौपट हुई. बाजार के लिए एकफसली उपज होने लगी. नब्‍बे के दशक में किसान को कहा गया कि घरेलू नहीं, वैश्विक बाजार के लिए अन्‍न उपजाओ. कौन सा अन्‍न?

सोयाबीन, कपास, जटरोफा, सूरजमुखी, आदि. किसान बीते तीन दशक से जो उपजा रहा है, वह अपने पेट के लिए नहीं बल्कि कारों का पेट भरने के लिए है. सोयाबीन, जतरोफा, सूरजमुखी, गन्‍ना, मकई आदि से बायोडीजल बन रहा है. खेती का पूरा तर्क ही सिर के बल खड़ा कर दिया गया है. किसान जान रहा है कि उसे वैश्विक बाजार के लिए उपजाना है और खुद भूखे मरना है, इसलिए वह खेती से कन्‍नी काट रहा है.

जहां इस तर्क को दरकिनार कर के सिर्फ ज़मीन बचाने की लड़ाई चल रही है, वहां दिल्‍ली के बड़े मंचों पर नुमाइंदगी करने वाले नेता इस बात को स्‍वीकार करने से कतराते हैं कि सारी जंग सही मुआवजे की है. वे कभी नहीं मानेंगे कि किसान ज़मीन बेचने को तैयार बैठा है जबकि किसान बार-बार यही कह रहा है. ऐसे में किसानों की मूल भावना और किसान मंचों की प्रायोजित भावना के बीच बड़ी दूरी पैदा होती जा रही है.

ऐसे में अरशद जैसे लाखों किसानों को जब अपनी सही नुमाइंदगी करने वाला कोई नहीं मिल रहा, तो वे शहरों का रुख कर रहे हैं. साठ फीसदी किसान भारी कर्ज में हैं और पंजाब जैसे संपन्‍न राज्‍य में भी किसान अपनी जान दे रहे हैं. साल 2011 की जनगणना को मानें तो औसतन 2,300 लोग रोज़ाना खेती छोड़ रहे हैं और अतंरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी क्राइसिल की मानें तो बीते आठ साल में तीन करोड़ 70 लाख किसान खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर गए हैं.

कवि और पत्रकार रघुवीर सहाय ने बहुत पहले लिखा था, "खतरा होगा, खतरे की घंटी होगी, उसे बादशाह बजाएगा, रमेश!"

यह बात अलग है कि विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियां नहीं मिलने के कारण 2012 से 2014 के बीच करीब डेढ़ करोड़ लोग वापस अपने गांवों को लौट गए हैं. संकट दुतरफा है. एक ओर गांव के गांव खाली हो रहे हैं तो दूसरी ओर शहरों पर बढ़ रहे आबादी के दबाव के कारण शहरी ढांचे तबाह हो रहे हैं.

कुछ विश्लेषक कहते हैं कि अगले बीस सालों में देश की आधी आबादी शहरों की निवासी होगी. कवि और पत्रकार रघुवीर सहाय ने बहुत पहले लिखा था, "खतरा होगा, खतरे की घंटी होगी, उसे बादशाह बजाएगा, रमेश!"

खतरे की यह घंटी 2009 में ही बजा दी गई थी. बादशाह ने ही बजाई थी. बीते छह साल में इसे किसी ने नहीं सुना. सुन कर भी नजरंदाज़ किया. आज कोलंबस पूरे देश को चर रहा है. अन्‍नदाता को बचाने के लिए क्‍या और बड़ा सबूत हमें चाहिए?
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चर्च गए टी हेण्डपम्प से पानी बंद ;छत्तीसगढ़

चर्च गए टी हेण्डपम्प से पानी  बंद ;छत्तीसगढ़ 


छत्‍तीसगढ़ के नारायणपुर के केरलापाल गांव के ग्राम पटेल, सरपंच, सहित चार लोगों ने तुगलकी फरमान जारी किया है. फरमान में मुख्यमंत्री रमन सिंह के आदेश का हवाला देकर चर्च जाने वाले ग्रामीणों को राशन नहीं देने का फरमान पंचायत ने जारी किया है.
साथ ही पंचायत ने स्‍पष्‍ट लहजों में चर्च जाने वाले परिवारों को हैंडपंप से पानी और मनरेगा के तहत काम न करने की चेतावनी दी है. ऐसे में राशन न मिलने से दो परिवार के सदस्यों ने मुख्यालय आकर कलेक्टर से राशन के लिए गुहार लगाई है.
कलेक्टर ने इस मामले की जांच के आदेश खाद्य निरीक्षक को दिए हैं. हालांकि, अधिकारी इस पूरे मामले में कैमरे के सामने कुछ भी कहने से बचते नजर आ रहे हैं.


कमला काका ने अपनी व्यथा से पूरी सभा को स्तब्ध कर दिया .


कमला काका ने अपनी व्यथा से पूरी सभा को स्तब्ध कर दिया .


पीयूसीएल के वार्षिक अधिवेशन में मानवाधिकार दिवस पे एकजुट होके संघर्ष का संकल्प

















आदिवासियों के सबसे बड़े हितेषी डा.बी डी शर्मा जी को श्रधांजलि के साथ सम्मेलन शुरू किया गया .



कमला काका ने अपनी व्यथा से पुरी सभा को स्तब्ध कर दिया .

कमला काका सारकेगुड़ा में सुरक्षाबलो द्वारा 17 निर्दोष हत्याओ की पीड़ित और प्रत्यक्ष गवाह है ,और हत्या के दुसरे दिन से ही इसके खिलाफ लड़ाई लड़ रही है ,
आज उसने सम्मेलन में अपनी व्यथा बहुत मार्मिक तरीके से व्यक्त की ,उसने कहा की उसके आठ साल के छोटे भाई को भी फ़ोर्स ने मार दिया था ,वो जिम्मेदार लोगो को सजा दिलाने के लिए थानेदार से लेके एसडीएम् ,कलेक्टर,डी आई जी ,डीजी ,मंत्री ,मुख्यमंत्री से लेके केन्द्रीय ग्रह मंत्री तक गुहार लगा चुकी है ,सबसे मिली अपनी कही पुरे सबुत दिया गवाही के लिए तैयार लेकिन अभी तक किसी भी पुलिस के खिलाफ एफ आई आर तक दर्ज नही हुई 
कमला कहती है कि झीरमघाटी में नेता मारे गये तो जाँच और कर्यवाही कहाँ से कहाँ पहुच गई लेकिन उसके एक साल पहले हुई सारकेगुड़ा में हुई 17 हत्या पे आज तक कोई गंभीर कार्यवाही तक नही हुई 
फ़ोर्स के अत्याचार इन्तहा हो गई है , लडकियो के साथ बलात्कार ,बुरी तरह मारपीट ,बच्चो के साथ बुरी तरह पिटाई हो या घरो फसलो को आग लगना उन्हें नष्ट करना आम घटना हो गई है .
महिलाओ को माँ सिद्द करने के लिए अपने स्तन से दूध निकाल के दिखाना पड़ता है ,बच्चे हिन्दी नही बोल पाते तो इसलिये पिटते है..
कमला आखरी में कहती है की आखिर हम करें तो क्या करें ऐसा कोई क़ानूनी रास्ता नही बचा जो हमने नही अपनाया .
और अब पुलिस ने अपना आखरी हथकंडा अपनाया की कमला काका के खिलाफ झुटा गवाह खड़ा कर दिया की कमला को नक्सलियों से लाखो रुपया मिला है ,इसलिए वो पुलिस के खिलाफ गवाही दे रही है, कमला बड़ी मासूमीयत से पूछती है की क्या माओवादी किसी को पैसा देते है .
सम्मेलन में अल्पसंख्यको पे हो रहे हमले पर पिछले दिनों इसाई मिशनरियो पे सुनियोजित हमले ,नन के साथ बलात्कार ,बस्तर में विश्व हिन्दू परिषद का उत्पात और कोरिया में चर्च के लोगो पे झूटे आरोप के साथ रायपुर में सिमी के नाम से 13 मुस्लिम नोजवानो की झूटे केस में गिरफ्तारी पर विस्तार से चर्चा हुई .
प्रसाद राव,फादर सेबस्टियन ,अरुण पन्ना लाल,बोस थामस,सीएन विनोद ,कुमार गिरीश, मोहम्मद शफी सिद्दुकी और नेहरु राज ने अपनी बात कही.
सत्र के अध्यक्षता राजेन्द्र सायल ने की.
दूसरा सत्र ,बस्तर में सैन्यिकृत क्षेत्र में आम आदिवासी की स्थति पे व्यापक चर्चा हुई .
ईशा खंडेलवाल ने बस्तर के कई फर्जी मुठभेड़ और उसके क़ानूनी पहल पे विस्तार से अपनी बात कही और एक फिल्म का प्रदर्शन भी किया.कमला काका ने सारकेगुड़ा की घटना और उसके बाद की कर्यवाही से अवगत कराया ,श्रेया ने बीजापुर की फेक्ट फयिनाडिंग रिपोर्ट प्रस्तुत की और एस आर नेताम ने पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासियो की नई पहल की जानकारी दी उन्होंने कहा की दुर्दांत ताकतों से मुकाबला को आदिवासी तैयार हो रहे है .
आलोक शुक्ला ने बस्तर में कारपोरेट हमले और हमारे संसाधन की लुट पे प्रकाश डाला .
बस्तर क्षेत्र में पत्रकारों पे हो रहे हमलो पे पत्रकार सुरक्षा समिति के अध्यक्ष कमल शुक्ल ने संतोष यादव और सोमारू नाग (पत्रकार) की गैरकानूनी गिरफ्तारी का मुद्दा गंभीरता से उठाया, उन्होंने बस्तर के एस आर पी कल्लुरी की कुटिल भुमिका की उजागर किया 
कमल शुक्ला ने 21 दिसम्बर को बस्तर में पत्रकारो के आन्दोलन में सबको आमंत्रित भी किया.
मजदूर नेता जनकलाल ठाकुर ने अपनी बात कही और पहले दोनों सत्रों का संचालन डा लाखन सिंह ने किया .
"महिलाओ पे हिंसा और मानव तस्करी पे तीसरा सत्र आयोजित था .
सत्र में दुर्गा झा ,फादर जैकब ,श्रेया और डिग्री चौहान ने कोरिया ,जशपुर , रायगढ़ और बस्तर की घटनाओ का विस्तार से चर्चा की 
चोथा और अंतिम सत्र प्रदेश में बढ़ रही किसानो की आत्महत्या और खेती पे आये संकट की चर्चा की .
आम आदमी पार्टी के राज्य संयोजक और किसान नेता संकेत ठाकुर ने किसानो की आत्महत्या की घटनाओ पे सरकार की संवेदन हीनता और बर्बाद होती खेती पे विस्तार से चर्चा की , अध्यक्षता कर रहे नन्द कश्यप ने खेती पे कर्पोर्र्ट हमले के षड्यंत्र की उजागर किया. रमाकांत बंजारे ने राजनांदगाव में किसान आन्दोलन की बात कही 
सांगठनिक सत्र में महासचिव सुधा भारद्वाज ने जिला इकाई और सदस्यता को बढ़ाने की चर्चा की .