Saturday, December 31, 2016

नोटबंदी से कितने काबू में आये नक्सली -बीबीसी

नोटबंदी से कितने काबू में आये नक्सली

  • 30 दिसंबर 2016
हथियार डालनेवाले माओवादीImage copyrightALOK PUTUL
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर की शाम जब नोटबंदी का फ़ैसला पूरे भारत को सुनाया था उस वक़्त उन्होंने ऐसा करने के कई कारण गिनवाए थे.
उनका कहना था कि इससे काले धन पर लगाम लगेगी, भ्रष्टाचार की रोकथाम होगी, पड़ोसी देश से संचालित चरमपंथी गतिविधियों में कमी आएगी, नक़ली नोटों की पकड़ होगी वग़ैरह-वग़ैरह.
बाद में इस लिस्ट को आगे बढ़ाते हुए अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के दौरे के समय उन्होंने कहा कि नोटबंदी के कारण नक्सलवाद पर भी क़ाबू पाया जा रहा है, माओवादियों के पास खाने तक के पैसे नहीं हैं इसलिए वो भारी मात्रा में आत्मसमर्पण कर रहे हैं.
केंद्रीय गृहमंत्रालय के अनुसार साल 2016 में अब तक 1399 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है और ख़ासकर नोटबंदी के बाद यानी कि आठ नवंबर, 2016 के बाद कुल 564 माओवादियों ने सरेंडर किया है.
आइए नक्सल प्रभावित राज्यों के अलग-अलग आंकड़ों पर एक नज़र डालते हैं.
आत्मसमर्पण पर हो रही एक ब्रीफ़िंगImage copyrightALOK PUTUL
रायपुर से आलोक प्रकाश पुतुल कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक माओवाद प्रभावित बस्तर में हालात प्रधानमंत्री के दावों के ठीक उलटे हैं.
बस्तर के सात ज़िलों के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि नोटबंदी के बाद कथित माओवादियों के आत्मसमर्पण की रफ़्तार को तगड़ा झटका लगा है और इस साल पहली बार ऐसा हुआ है, जब नवंबर और दिसंबर में सबसे कम आत्मसमर्पण हुए हैं.
राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा सफ़ाई देते हुये कहते हैं, " माओवादियों के समर्पण का कोई महीना नहीं रहता. कम या ज़्यादा का महीना नहीं रहता. जब-जब मुठभेड़ में आते हैं, जब दबाव काफी पड़ता है, उस समय विचार भी बदलते हैं और मुख्यधारा से जुड़ने की उनकी मंशा रहती है, इसलिये वो आत्मसमर्पण करते हैं."
इस साल की बात करें तो एक जनवरी से अक्तूबर 2016 तक बस्तर के सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर, कांकेर, बस्तर और कोंडागांव ज़िले में लगभग 1165 कथित माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. यानी हर महीने 116 कथित माओवादियों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है.
समर्पण करनेवाला एक माओवादीImage copyrightALOK PUTUL
लेकिन नोटबंदी के बाद से अब तक राज्य में माओवादी आत्मसमर्पण का आंकड़ा 30 पर जा कर अटक गया है. यानी हर महीने औसतन 116 माओवादी आत्मसमर्पण का आंकड़ा केवल 15 पर रुक गया है.
माओवादी मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग का कहना है कि नोटबंदी के बाद बस्तर से किसी भी बड़े आत्मसमर्पण की कोई ख़बर अब तक नहीं आई है. रुचिर गर्ग के अनुसार नोटबंदी से माओवादियों को नुकसान पहुंचा होगा लेकिन वे अपनी दैनिक ज़रुरतों को कैसे पूरा करते हैं, यह बात सबको पता है.
रुचिर गर्ग कहते हैं,"जो माओवादियों की रणनीति को जानते-समझते हैं, उन्हें पता है कि गुरिल्ला युद्ध का यह आधार ही होता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे ज़िंदा रहा जाये और कैसे अपनी लड़ाई लड़ी जाए."
लेकिन छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह कथित माओवादियों के आत्मसमर्पण पर ही सवाल खड़े करते हैं.
लाखन सिंह का आरोप है कि बस्तर में फ़र्ज़ी तरीक़े से गांव वालों को माओवादी बता कर उनका कथित आत्मसमर्पण कराया जाता है.
लाखन सिंह कहते हैं,"प्रधानमंत्री जब नोटबंदी से माओवादियों के आत्मसमर्पण को जोड़ते हैं तो यह साफ़ है कि पीएमओ में बैठे लोगों को कुछ भी अता-पता नहीं है. मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री हर समस्या का समाधान नोटबंदी को बताने की असफल कोशिश में गुमराह करने वाला यह बयान दे रहे हैं."
सुरक्षाकर्मीImage copyrightTHINKSTOCK
भुवनेश्वर से संदीप साहू
राज्य गृह विभाग से मिली सूचना के अनुसार पिछले छह महीनों में ओडिशा में 17 माओवादियों ने और 513 माओवादियों के समर्थकों ने आत्मसमर्पण किया.
ग़ौरतलब है कि 17 माओवादी कैडरों में से नवंबर के बाद केवल तीन ने आत्मसमर्पण किया. हालाँकि इन छह महीनों में आत्मसमर्पण करने वाले 513 में से 495 समर्थकों ने केवल नवंबर में आत्मसमर्पण किया.
एक जुलाई से लेकर अब तक सुरक्षा बलों ने कुल तीस माओवादियों को मार गिराया जिसमें से 30 केवल मलकानगिरी के जंगलों में 24 अक्टूबर को हुए एनकाउंटर में मारे गए.
ट्रेनिंग करते माओवादीImage copyright.
रांची से रवि प्रकाश कहते हैं कि झारखंड में 'आपरेशन नई दिशा' के तहत इस साल 32 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. इनमें से 15 लोगों ने आठ अक्टूबर के बाद सरेंडर किया.
सरेंडर करने वाले ज्यादादतर नक्सलियों ने मीडिया से कहा कि वे मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं.
हालांकि, 8 अक्टूबर के बाद सरेंडर करने वाले 15 लोगों में से आठ के नक्सली होने पर स्पेशल ब्रांच ने ही सवाल उठाए हैं.
विशेष सचिव विभूति भूषण प्रसाद ने 18 नवंबर को अपर मुख्य सचिव को लिखी अपनी चिट्ठी में स्पष्ट लिखा है कि 17 अक्तूबर को पुलिस मुख्यालय मे सरेंडर करने वाले पश्चिमी सिंहभूम जिले के नौ कथित नक्सलियों में से आठ का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है.
नक्सल प्रभाव वाले इलाक़े में सुरक्षाImage copyrightALOK PUTUL
पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी 13 दिसंबर को प्रेस कांफ्रेंस कर गृहमंत्री राजनाथ सिंह से इस मामले की जांच कराने का अनुरोध किया. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस वाहवाही लूटने के लिए भोले-भाले ग्रामीणों को नक्सली बताकर उनका सरेंडर करा रही है.
हालांकि, झारखंड के डीजीपी डी के पांडेय ने बीबीसी से कहा- 'हमने चाईबासा के डीसी और एसपी की रिपोर्ट के बाद पीएलएफआई के नौ नक्सलियों का सरेंडर कराया. लिहाज़ा, इसपर संदेह की कोई गुंजाईश नहीं है. हम इसकी जाँच क्यों कराएंगे.'
राज्य पुलिस प्रवक्ता के मुताबिक झारखंड में अभी तक कुल 114 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. इनके पुनर्वास के लिए सरकार ने सवा तीन करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि का चेक दिया है.
.Image copyrightAP
झारखंड सरकार अपनी सरेंडर पालिसी के तहद जुलाई-2010 से 'ऑपरेशन नई दिशा' चला रही है. इसमें नक्सलियों के सरेंडर करने पर उन्हें पुलिस में नौकरी तक दी जाती है. इसकी शुरुआत के बाद साल 2010 में 19, 2011 में 15, 2012 में 7, 2013 में 16, 2014 में 12, 2015 में 13 और 2016 में 32 नक्सलियों ने पुलिस के समक्ष हथियार डाले हैं.
झारखंड पुलिस ने कुल 190 फ़रार नक्सलियों की सूची भी जारी की है. इनपर 20.48 करोड़ रूपए का इनाम रखा गया है. इनमें से कुछ पर एक करोड़ रुपए तक के इनाम घोषित किए गए हैं.
सलमान रावी के अनुसार तेलंगाना में इस साल जनवरी से नवंबर तक कुल 169 माओवादियों ने सरेंडर किया है लेकिन उसके बाद से उनके आत्मसमर्पण की कोई ख़बर नहीं है.
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Thursday, December 29, 2016

It's a joke: Shalini Gera on her face-off with Bastar police



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It's a joke: Shalini Gera on her face-off with Bastar police

SUHAS MUNSHI@suhasmunshi |
 First published: 29 December 2016,

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Advocate Shalini Gera, 48-hrs of police harassment in Bastar & how it is all a part of a 'trend'

Advocate Shalini Gera speaks to Catch about her 48-hour-long harassment by Bastar police

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It has been a gruelling 48 hours for Shalini Gera: threats from Bastar's notorious police department, accusation of laundering Maoist money and inciting locals. Yet, Catch'sconversation with the founder of Jagdalpur Legal Aid, opened and ended with laughter.

"It's become a joke now," said Gera, who was forced to flee her house in Jagdalpur earlier this year.

Just two days ago, similar charges were levelled against a fact-finding team including lawyers, students and a journalist, who were on their way to Bastar to probe an unusually large number of encounters carried out in the area in last three months.



They were accused of exchanging currency notes for Naxals and slapped with the non-bailable Chhattisgarh Public Safety Act. All the seven are still in jail.

But the anti-Maoist forces in the area have a special reason to be angry with Gera.

Only last week she picked up the case of a 13-year-old boy who was allegedly tortured and bayoneted to death by state forces on 16 December. Gera got the Chhattisgarh High Court to order the exhumation of his body and conduct an autopsy on him. The trial, in this case, may start soon.

In her interview with Catch Gera recounts the harassment she's suffered over 48 hours. Reading Gera's account gives one some idea of the everyday personal risks involved in probing and questioning state excesses in Bastar.

Suhas Munshi (SM): One person filed a police complaint against you, alleging you were laundering money for Maoists. And the next thing we know is that you dispatched a letter to NHRC complaining about police high-handedness. So what has really happened?

Shalini Gera (SG): We are working on this case of the 13-year-old child. So on Monday his post mortem was completed and the villagers left for their village around 1 pm. Suddenly at around 7 pm, a contingent of 7-10 police personnel arrived at our room in the dharamshala, lead by a police officer who called the entire legal team out and claimed that we had been "caught" staying in the room in an unauthorised manner.

This officer called us to the local police station to be interrogated for being found under suspicious circumstances. We explained the purpose of our visit and the fact that we had been authorised to stay there by the Commissioner himself.

It was only after we managed to get through to the commissioner and he spoke directly to the police officer that we were let be. Our presence in Jagdalpur that day was well publicised, given the public interest in the present case and for this reason, it is highly unlikely that this harassment, that very day, was a mere coincidence.

Then on Tuesday evening I got a call from an unknown number. A person introduced himself as SP Bastar and said that he had received a complaint against me and wanted to ask me some questions. This person wanted to know whether I had incited villagers against the Aadhar card.

I told him that I had not done anything like that. He later claimed in an extremely aggravated manner that we were spreading false stories of police atrocities in front of young children.

This other person then asked me, whether any JNU students were present at the meeting, to which I replied that to my knowledge, there were no students from JNU there. However, he responded that he had information that seven JNU students had been present there.

He then also asked me in a very offensive tone about why I am coming to Bastar again and again - questions like these, which clearly had no bearing on any kind of "investigation" that he could be conducting, and were only meant to intimidate me.

After that, this other person on the phone said he had received a written complaint against me that I was in Goel Dharamshala yesterday, exchanging "old notes" for Naxalites. I again denied this and told him that I was in Goel Dharamshala yesterday, duly authorised by the Commissioner of Bastar Division, to follow up on orders of the Hon'ble High Court of Chhattisgarh.

After the call ended, I checked the number on which I had received the call from SP Bastar on the TruCaller app, and found that it belong to one Farukh Ali. It should be noted that there is one Farukh Ali who belongs to the vigilante group Agni active in Bastar.

SM: Did you speak to any police officer after this call?

SG: Yes, I called the SP Bastar on his official number. When I identified myself as Shalini, he asked: "who Shalini". I again clarified that I was "Advocate Shalini Gera", and again SP Bastar appeared not to know who I was. I informed him about the complaint against me.

The SP Bastar rather rudely informed me that there was indeed such a complaint against me and that he indeed had just called me, and I should stop wasting his time with these calls.

A few hours after these phone calls, I was informed that the same Farukh Ali had posted news of a complaint by one Vinod Pandey against me given to SP Bastar, claiming that I have been exchanging notes for Naxalites in Goel Dharamshala in Jagdalpur.

It is again highly objectionable that SP of Bastar District would share this confidential information with a private individual, who uses it only for the purposes of maligning other people who are inconvenient for the Bastar police.

SM: You know that seven people have been very recently put in jail for the same charges as levelled against you?

SG: This is obviously a continuation of Bastar police's drive against activists, academics and critics of their policies. It is all a part of the same trend. We have complained to the NHRC and now sincerely hope that the institution will this time take some substantive steps against this persecution and act against the high-handedness of the Bastar Police.

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अपने गुर्गे के मोबाइल से फ़ोन कर बस्तर एसपी ने वकील शालिनी गेरा को धमकाया, NHRC से शिक़ायत






अपने गुर्गे के मोबाइल से फ़ोन कर बस्तर एसपी ने वकील शालिनी गेरा को धमकाया, NHRC से शिक़ायत

राजकुमार सोनी
@CatchHindi | 29 December 2016,
कैच न्यूज़
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बिलासपुर उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहीं वकील शालिनी गेरा को बस्तर के एसपी आरएन दास ने अपने मोबाइल की बजाय एक संदिग्ध के नंबर से फोन करके धमकाया है. दास ने शालिनी को माओवादियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाते हुए थाने बुलाया. शालिनी और उनके साथियों ने जब नंबर की पड़ताल की तो वह अग्नि संस्था के एक सदस्य फारूख़ अली का निकला. शालिनी गेरा और उनकी टीम ने बस्तर आईजी शिवराम कल्लूरी,पुलिस अधीक्षक आर एन दास, सब इंस्पेक्टर अर्चना धुरन्धर, एसआई रंजक और फारूख अली के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेजी है.

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गेरा ने कैच न्यूज को बताया कि इसी महीने 25 और 26 दिसम्बर को जब वह अपने साथी अधिवक्ताओं के साथ बस्तर में थीं, तब पुलिस अधीक्षक दास ने उन्हें माओवादियों से कनेक्शन रखने का आरोप लगाते हुए थाने बुलाया था. जब उन्होंने इसकी पड़ताल की और पुलिस अधीक्षक दास से फोन करने की वजह जाननी चाही तो उन्होंने बेहद सख्त लहजे में कहा, 'मैं किसी शालिनी गेरा को नहीं जानता.' हालांकि बाद में उन्होंने यह स्वीकारा कि फोन उन्होंने ही किया था.

क्यों तिलमिलाए हैं अफ़सर?

मानवाधिकार आयोग को रिकॉर्ड किए गए फोन व अन्य दस्तावेजों के साथ भेजी गई शिकायत में वकीलों ने पूरे घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्यौरा भेजा है. शिकायत में कहा गया है कि सुरक्षाबल के जवानों ने इसी महीने 16 दिसम्बर को बीजापुर जिले के थाना गंगालूर गांव के मेटापाल में 13 साल के बच्चे सोमारू पोटाम को माओवादी बताकर मार दिया था.

कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल से बच्चे के अभिभावकों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिसके बाद न्यायालय ने शव के दोबारा पोस्टमार्टम करने के निर्देश दिए थे. बस्तर पहुंचने के बाद अधिवक्ताओं को जब कहीं ठहरने की जगह नहीं मिली तो उन्होंने कमिश्नर दिलीप वासनीकर को फोन पर जानकारी दी.

कमिश्नर ने बच्चे के परिजन और अधिवक्ताओं के लिए गोयल धर्मशाला में ठहरने का इंतजाम किया, लेकिन उनके निर्देश के बाद भी भारी पुलिस बल ने गोयल धर्मशाला को घेर लिया. वहां उनसे सब इंस्पेक्टर अर्चना धुरन्धर ने अभद्र व्यवहार किया. अर्चना धुरन्धर की पूरी बातचीत का वीडियो और आडियो भी अधिवक्ताओं ने आयोग को भेजा है.

इस घटनाक्रम के बाद एसपी ने किसी फारूख अली के फोन से शालिनी गेरा को फोन पर धमकाते हुए बताया कि उनके खिलाफ शिकायत हुई है कि वे माओवादियों का पैसा बदलवाने के लिए बस्तर आई हुई हैं. अधिवक्ता प्रियंका ने बताया कि इससे पहले भी जब अधिवक्ता बस्तर के दौरे पर थे, तब फारूख अली ने उन्हें जेएनयू का माओवादी बताते हुए सोशल मीडिया में पोस्ट डाली थी.

प्रियंका ने बताया कि इसकी जानकारी भी दस्तावेजों के साथ आयोग को भेजी गई है. मामले में फारूख अली का पक्ष जानने के लिए उन्हें फोन लगाया गया,  उन्होंने फोन नहीं उठाया. पुलिस अधीक्षक आरएन दास ने कहा कि वे किसी भी पत्रकार को फोन पर अपना पक्ष नहीं देते. फिलहाल वे अपना पक्ष नहीं देंगे.

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Wednesday, December 28, 2016

Human Rights Lawyer in Bastar Faces Police Harassment



Human Rights Lawyer in Bastar Faces Police Harassment

BY AJOY ASHIRWAD MAHAPRASHASTA
ON 28/12/2016
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Jagdalpur Legal Aid Group’s Shalini Gera has been charged with being a Maoist cash conduit despite the police having no evidence to back the claim.

File photo of Isha Khandelwal and Shalini Gera of JagLAG. Credit: Mukta Joshi

New Delhi: Two days after the Bastar police arrested seven civil rights activists from the Telangana Democratic Forum (TDF) under the draconian Chhattisgarh Special Public Security Act, it is now trying to implicate human rights lawyer Shalini Gera, a part of the Jagdalpur Legal Aid Group (JLAG), for allegedly exchanging ‘old notes’ on behalf of the Maoists.

Gera, however, has said that the charges are totally false. In a letter to National Human Rights Commission (NHRC), she has claimed that the police’s action against her is yet another tactic to intimidate and silence human rights defenders in Bastar.

Gera, who along with her colleagues, has been taking up cases of alleged police atrocities against Adivasis has been under constant attack by state-sponsored vigilante groups like AGNI. JLAG lawyers moved from Delhi to Bastar’s Jagdalpur in July 2013 and have been practicing in Bastar district courts since then. Their work centres on defending those Adivasis who have been implicated by the police on the basis of extremely weak evidence. As a result, JLAG has been subjected to constant scrutiny by the police.

Earlier this year, Gera and her colleague Isha Khandelwal were forced out of Jagdalpur amidst escalating threats, intimidation and attacks for their work defending the Adivasis.

A hint that the police was planning some sort of action against Gera first surfaced when a police complaint made against her by a man called  Vinod Pandey surfaced on a WhatsApp group on December 27.

The complainant Pandey claimed that Gera, along with two of her colleagues and seven JNU students, had gone to two villages – Matenar and Palnar in Dantewada (Bastar) – and incited the villagers against the police, urging them to support the Maoists. After the meetings, Pandey claimed, Gera met Naxal commander Ayutu who handed over Rs 10 lakh in old notes to the team, following which Gera and her team travelled to Jagdalpur and stayed in a place called Goel Dharamshala.

Here, Pandey said, “do kale kale ladke(two dark skinned boys)” came over on a motorcycle and exchanged the old notes with new Rs 2000 notes after charging a 30% commission. The complainant urged the police to inquire into the matter and take “adequate action.”

Soon after the complaint was filed at the Jagdalpur police station, none other than Bastar’s superintendent of police (SP), R. N. Dash, called Gera from an unofficial phone number inquiring about the details mentioned in the complaint.

Gera’s response

In the letter to NHRC dated December 27, Gera said that her stay in Goel Dharamshala was arranged by the divisional commissioner Dilip Wasnikar and her presence in Jagdalpur was widely publicised because she and team were there to oversee the postmortem and cremation of Somaru Pottam, who the security forces had claimed was killed in an encounter on December 16.

Contrary to the police’s claim that Pottam was a Maoist, his parents havemoved the Bilaspur high court saying that their son had no connection with Maoists and was killed by security force personnel in cold blood in full view of the villagers. The case has received significant media attention, and Gera had also organised a press conference regarding the matter.

In the letter to NHRC, Gera clearly said that her stay in Jagdalpur was no secret. “We had requested the commissioner of Bastar, Mr. Dilip Wasnikar, to make arrangements for the stay of the villagers and the legal team, and he had most graciously made arrangements in Room no. 3 of the Goel Dharamshala in Jagdalpur for this purpose,” wrote Gera.

Despite this, on December 26, a team of policemen barged into the dharamshala, called the entire legal team out of their rooms, noted down the details of their identity cards and claimed that they had been “caught in the room.” The police team asked Gera and her colleagues to accompany the police to the thana (station) for interrogation, although they neither had a warrant nor a legal notice to raid the place. However, when divisional commissioner Wasnikar intervened, the police left.

The very next day SP Dash called Gera to inquire about the details mentioned in the complaint, which was filed after the illegal police raid occurred on the evening on December 26.

Dash repeatedly asked about her meetings at Palnar and Matenar in a “loud and offensive” manner, Gera wrote in her letter.

Gera explained that she had gone to Palnar in Dantenwada district to meet her client Mundra Ram Sori several months ago and did not hold a meeting with the villagers there. She also said that she had visited Matenar to attend a meeting on Adivasi rights which was organised by People’s Union For Civil Liberties (PUCL) on December 20. Gera added that no JNU student had accompanied her and the charges of being a cash conduit for Maoists were baseless and vindictive.

In the letter, Gera told NHRC that Dash had called her from a man called Farukh Ali’s number, who was also a member of the state-sponsored vigilante group Agni. “It should be noted that there is one Farruk Ali who belongs to the vigilante group “AGNI” active in Bastar, and he has recently sent defamatory and inflammatory messages from the same phone number against some attendees of a PUCL meeting in Matenar village, containing confidential police information about them, on several WhatsApp groups, and has also threatened journalists earlier,” she said.

Incidentally, Ali later posted a copy of Pandey’s complaint on WhatsApp for circulation.

The handling of the matter by the Bastar SP and his prompt action on the complaint, which merely makes baseless allegations, have raised many civil rights activists’ suspicions over the police’s intentions. The record of the Bastar police, under the leadership of S.R.P. Kalluri, inspector general of police (Bastar Range), in handling human rights related cases has come under repeated criticism by civil society organisations. The police has often supported vigilante groups like Agni and has been at the forefront of attacking human rights defenders who question atrocities against Adivasis. So much so that personnel from the security forces have, in the past, also organised several protest marches where they burnt effigies of human rights activists.

Earlier this year, the CBI filed a chargesheet against seven former special police officers – now renamed armed auxiliary forces – for burning down three villages in Bastar. Through the investigation, the Bastar police’s earlier claims of Maoists being responsible for the fires were proven false. Several journalists too have been at the receiving end of this intimidation for reporting human rights abuses in the region.

Recently, the academic Nandini Sundar, who played a crucial role in getting the Supreme Court to ban the state-sponsored terror group Salwa Judum and to direct the CBI to investigate Kalluri’s men was accused by Kalluri of being involved in the murder of an Adivasi villager. Also accused were JNU faculty member Archana Prasad and political activists Sanjay Parate and Vinnet Tiwari. But when the wife of the murdered man denied their involvement in the incident, the role of the Bastar police came under sharp scrutiny. Last month, the NHRC issued notice to Kalluri and the Chhattisgarh government for leading a witch-hunt against Sundar and her colleagues.

Criticisms of police action

The arrest of the TDF fact-finding team and the continual harassment of the lawyers based on charges of exchanging old notes demonstrates that the demonetisation has given the Bastar police a new opportunity to abuse its power, civil rights activists say.

“The Bastar police has made a mockery of the law. It has also misled the courts in the name of fighting Maoism,” CPI(M) eader Sanjay Parate said while demanding the immediate release of the TDF activists.

Condemning the arrests and harassment of Gera, Anand Teltumbde of the Committee for Protection of Democratic Rights (CPDR) said, “There is a pattern in the behaviour of the Chhattisgarh police. Early this year, two women lawyer activists Shalini Gera and Isha Khandelawal were forced out of Jagdalpur. In February, Soni Sori, local tribal teacher-turned-activist and AAP candidate in the last Lok Sabha elections, was asked to vacate her house. Soni Sori and her nephew Linga Kodopi have been facing persistent harassment from the police. Before that Malini Subramanium, a freelance journalist and former head of the International Committee of Red Cross in Chhattisgarh, left Bastar due to alleged harassment by local police.”

Talking about the ‘outrageous charges of murder’ on Sundar and others, he called the police’s actions vindictive. “This all has been happening with direct/indirect backing of the controversial Bastar IG, S.R.P. Kalluri who is in turn backed by the state government.”

The Hyderabad-based Civil Liberties Monitoring Committee also denounced the attack on human rights defenders. “It (the arrest of TDF activists) is a clear sign of nexus between Telangana and Chhattisgarh police to intimidate and suppress the activists in the name of Maoists who are fighting for the rights of the Adivasis.”

The PUCL also demanded the immediate release of the TDF members. “PUCL strongly condemns the illegal and unlawful actions of both the Telangana and Chhattisgarh police. Such acts of highhandedness and flagrant abuse of law is only possible when the State promises the police total impunity and protection from any prosecution for abuse of law. The actions of the police of both states is violative of the fundamental rights to free movement, freedom of speech and expression and the fundamental duty to protect the fundamental rights of adivasis and other local people in Bastar area who are victims of a severely repressive state police. It is also to scare others in the future from daring to visit the conflict hut areas,” said the organisation in a press release.

Most civil rights organisations were of the view that fact-finding teams, journalists, human rights activists played a significant role in highlighting police excesses in Bastar as despite several allegations of staged encounters, the Chhattisgarh government has refused to set up independent criminal investigations into these cases.

Condemning the arrest of the TDF activists, Amnesty International India’s Abhirr VP said “Chhattisgarh authorities must immediately release all seven men and stop abusing harsh laws to harass and intimidate activists and journalists who are well within their rights to investigate human rights abuses and seek accountability.”

“It is disconcerting how frequently draconian laws are being used to silence activists and journalists who work on issues linked to conflict between security forces and Maoist armed groups. These attempts at intimidation cannot become order of the day,” he added.

Amnesty strongly criticised the use of the Chhattisgarh Special Public Security Act, which was enacted in 2005 to combat violence by Maoist armed groups. “Several parts of the Act violate India’s obligations under international human rights law. The Act contains broad and vaguely worded definitions of ‘unlawful activity’. The definition includes, for instance, an act which ‘tends to interfere with maintenance of public order’ or ‘which is designed to overawe…any public servant’, or acts ‘encouraging or preaching disobedience to established law and its institutions’. The UN Special Rapporteur on the situation of Human Rights Defenders has called for the repeal of this law.”
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ब्लाक सी, गी.पी.ओ काम्प्लेक्स, ईएनऐ नई दिल्ली, 110023

प्रति,
श्री श्रीनिवास कामथ
राष्ट्रीय.......
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
ब्लाक सी, गी.पी.ओ काम्प्लेक्स, ईएनऐ
नई दिल्ली, 110023

विषय: पीयूसीएल मीटिंग में भाग लेने वाले पत्रकार, वकील, शिक्षाविद और गांवासियों का दंतेवाडा पुलिस द्वारा शोषण

महोदय,
आपका ध्यान दंतेवाडा जिला बस्तर डिवीज़न में पुलिस द्वारा पीयूसीएल मीटिंग में भाग लेने वाले पत्रकार, वकील, शिक्षाविद के शोषण और धमकाने की स्थिति पर केन्द्रित करना चाहेंगे.

19.12.2016 को पी यू सी एल ने दंदेवाडा जिला के मातेनर गाँव में आदिवासी अधिकारों पर एक दिवसीय बैठक का आयोजन किया था. इसकी जानकारी जिला प्रशासन को पहले से ही दे दी गयी थी (अन्नेक्षर 1 देखें). इस बैठक में अलग अलग जिलों से आये लगभग 100 गाँव वासियों ने हिस्सा लिया. साथ में देश भर से आये 25-30 सामाजिक कार्यकर्ताओ और छात्र-छात्राओं ने भाग लिया. बैठक में गाँव वालों ने  अपनी कठिनायों और अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में बताया. पूरे कार्यक्रम की वीडियोग्राफी की गयी और उसे मीडिया के साथ साझा भी किया गया (अनेक्षर 2 देखें). भाग लेने वाले कुछ सदस्य उसी दिन रात को चले गए, और कुछ अगली सुबह निकलने से लिए वहीँ रुके.

अगले दिन, 20.12.2016 को सुबह लगभग 9 बजे, कुछ सदस्य, जिनका नाम अरित्र भट्टाचार्य (पत्रकार, स्टेट्समैन अखबार), अतीन्द्रियो चक्रबर्ती (वकील, कोल्कता उच्च न्यायलय), पी पावनी (पत्रकार, हैदराबाद), कावेरी (प्रोफेसर/वैज्ञानिक, अशोका विश्वविधालय), प्रियंका शुक्ला (वकील, बिलासपुर), निकिता अगरवाल (वकील, नई दिल्ली), और कुछ गाँव वासी, बैठक की जगह से एक किराये की गाडी से निकेले. जैसे ही वे 150 मीटर की दुरी तक चले, लगभग 10-15 लोगों ने, कुछ पुलिस वर्दी में, और कुछ सादे कपड़ों में थे, उन्हें रोका. उन में से एक पुलिस अधिकारी ने अपनी पह्चान कोतवाली थाना, दंतेवाडा का सब-इंस्पेक्टर रजक बताई. जैसे ही गाडी रुकी, एक पुलिसवाले ने किसे से फ़ोन पे कहा “हमने उन्हें पकड़ लिया है”. इसके बाद वो हमसे पूछताछ करने लगे, हमारी जानकारी और फोटो ली. फोटो लेने वाले पुलिसवाले ने कहा की उनको “ऊपर से आदेश” आये हैं. बैठक के बारे में जानकारी बेवजह आक्रामक थी, जबकि सारी जानकारी श्री रजक को पहले ही दे दी गयी थी. गैर कानूनी और हस्तक्षेप करने वाले आदेशों के बावजूद, बहस टालने के लिए उन्हें सारी जानकारी और फोटो दे दी गयी.

किसे पता था की एक सरकारी अधिकारी को विश्वसनीयता और ज़िम्मेदारी से दी गयी निजी जानकारी और तसवीरें कई व्हात्सप्प ग्रुपों पर एक श्री फारुख अली (नंबर 9424287654) पर साझा कर दी जाएँगी. इन ग्रुपों में पुलिस डिपार्टमेंट के वरिष्ठ अधिकारी जैसे श्री एस आर पी कल्लूरी, एस पी सुकमा, एस पी दंतेवाडा, और अन्य कई पत्रकार, जैसे ई टी वी से, शामिल हैं. इन ग्रुपों के मेसेजिस और सदस्यों के स्क्रीनशॉट अन्नेक्षर 3 में संलग्न है. श्री फारुख अली बस्तर संघर्ष समिति और एक नए विजिलान्ते समूह “एक्शन ग्रुप फॉर नेशनल इंटीग्रेशन (अग्नि)” के सदस्य हैं. इस से पहले वे अब भंग कर दिए गए समूह “सामाजिक एकता मंच” के भी सदस्य रहे हैं. यह तसवीरें विभिन्न व्हात्सप्प समूहों को इस मेसेज के साथ भेजी गयी:

“बस्तर मॆ फ़िर एक बार नक्सली समर्थन मॆ JNU कि घुसपैट.....
दिल्ली से आये Jnu के कुछ संदिग्ध लोग !दंतेवाड़ा जिला कटेकल्याण ग्राम मटेनार मॆ घुसे झूट बोलकर,किया सरकारी भवन का उपयोग ! 19-12-2016को दिल्ली JNU के छात्र जिनके नाम अतिंद्रेवा,चक्रवती,अरिटो भटाचार्य,कावेरी,प्रियंका शुक्ला,P.पावनी पहुँचे ग्राम मटेनार ये कहकर कि ई.आवास का फोटो खीचना है एवं बैंक खाता मॆ आधार न.जोड़ने कहकर घुसे ! गांव वालों को इखट्टा करके शुरू किया भाषण बाजी !Jnu छात्रों द्वारा ग्राम के युवकों को भड़काया गया कि फोर्स बलात्कार करती है आदिवासियों कि हत्या करती है !नक्सलियों के समर्थन मॆ फ़िर एक बार jnu कि गहरी चाल !ज्ञात हो कि कुछ महीने पहले नामा कोम्माकोलेंग मॆ पत्रकार बनकर नंद्नि सुन्दर गांव वालों को नक्सलियों का साथ देने कि बात कही थी !ग्रामीणों द्वारा सामनाथ बघेल के नेतृत्व मॆ  नंद्नि सुन्दर एवं अन्य के खिलाफ fir दर्ज कराया गया था !उसके कुछ महीने बाद सामनाथ बघेल कि नक्सलियों ने हत्या करदी थी !
फ़िर एक बार jnu का बस्तर मॆ धोके से घुसना बस्तर के लिये खतरे का संकेत है !बस्तर पुलिस को करनी होगी कार्यवाही !
फारुख अल
बस्तर संघर्ष समिति"

न सिर्फ यह मेसेज पूरी तरह गलत है, यह अपमानजनक और उत्तेजक भी है. और भी ज्यादा दुखद यह है की दंतेवाडा पुलिस के द्वारा 20.12.2016 को ली गयी वही तस्वीरें इस मेसेज के साथ डाली गयी हैं. यह कैसे हो सकता है की पुलिस अफसर द्वारा सरकारी काम के लिए  ली गयी तसवीरें एक फारुख अली जैसे व्यक्ति, जिसका पुलिस डिपार्टमेंट से कोई तालुक नहीं हैं, और जो सामाजिक कार्यकर्ताओं को सताने के लिए जाना जाता है, के पास आ गयी. गोपनीयता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जिसका दंतेवाडा पुलिस ने पूरी तरह से हनन किया है. यह पुलिस और ऐसे विजिलान्ते समूहों की साझेदारी को उजागर करता है.

यह भी ज्ञात हो की यह मेसेज पूरी तरह तथ्यों के आधार पर गलत है. इन 6 लोगों में से कोई भी jnu से नहीं है, और jnu का इस्तेमाल केवल ‘राजविरोधी’ तत्वों से जोड़ने के लिए किया गया है. यह भी सोचने की बात है कि अगर कोई jnu से हो भी तो उसे भारत का नागरिक होने के नाते बस्तर में आने की पूरी आजादी है. साथ ही, कोई जबरन या गैरकानूनी तरीके से किसी भी सरकारी बिल्डिंग पर कब्ज़ा नहीं किया गया. न ही किसी ने सरकार के खिलाफ कोई भाषण दिया.

बैठक पंचायत भवन में गाँव के लोगों ने आयोजित की थी जो उनका अधिकार है. स्थानीय प्रशासन को पहले ही कार्यक्रम और जगह की सूचना दे दी गयी थी. इस कार्यक्रम का मकसद स्थानीय आदिवासी लोगों को पी यू सी एल के राष्ट्रिय प्रतिनिधियों से मिलवाना और नागरिक अधिकारों पर चर्चा करना था. बैठक में ठीक यही हुआ और स्थानीय मीडिया में भी आया.

ज्ञात हो की श्री सुकुल प्रसाद नाग/ बरसे, मातेनर के निवासी, जिन्होंने इस बैठक का आयोजन करने में मदद करी, का भी शोषण बस्तर पुलिस द्वारा हुआ और उन्हें धमकाया भी गया. इस पर एक शिकायत पी यू सी एल ने NHRC से की है.

यह हमला इस इलाके में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर चले आ रहे हमलो की कड़ी में है. माननीय अध्यक्ष, NHRC, ने 9 दिसम्बर, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के मनावाधिकार कार्यकर्ताओं के डेकलारेशन के पास होने का दिन है, की प्रेस रिलीज़ में कहा था की “मानवाधिकार के लिए लड़ने वालों के हित की सुरक्षा करना देश का दायित्व है”. मगर ऐसा लगता है की छत्तीसगढ़ के बस्तर में सिर्फ और सिर्फ डर का मोहौल है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बचने अपने दायित्व को पूरा करने के लिए, हम माननीय आयोग से प्रार्थना करते हैं की इस विषय पर तुरंत कार्यवाही करें.

भवदीय
प्रियंका शुक्ला
वकील, बिलासपुर. 

बस्तर पुलिस के गैर लोकतान्त्रिक और गैरक़ानूनी कार्यो को संरक्षण देना बंद करे राज्य सरकार --छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन

** बस्तर पुलिस के गैर लोकतान्त्रिक और गैरक़ानूनी कार्यो को संरक्षण देना बंद करे राज्य सरकार

** गिरफ्तार मानवाधिकार कार्यकर्ताओ और वकीलों को तुरंत रिहा किया जाये .

 छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन
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बस्तर के अन्दर लोकतान्त्रिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाते हुए स्वयं पुलिस और सुरक्षा बलों के द्वारा लगातार गैरकानूनी कार्यो को अंजाम दिया जा रहा हैं l राज्य के अन्दर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व राज्य सरकार पर है, परन्तु छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार या तो कुछ पुलिस अधिकारियो के सामने लाचार हैं या फिर उसकी मंशा अनुरूप ही इन गैरकानूनी कार्यो को अंजाम दिया जा रहा हैं l माओवादी उन्मूलन के नाम पर लगातर बेकसूर आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मारा जा रहा हैं l फर्जी आरोप में लोगों को जेल भेजा जा रहा हैं l

हाल ही में तेलांगना मानवाधिकार फोरम से जुड़े पत्रकार, वकील, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और छात्रो के सात सदस्यीय तथ्य परक जाँच दल को मावोवादी समर्थक होने का आरोप लगाकर जेल भेजना न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि पुलिस के बेलगाम और तानाशाही रवैये को दर्शाता हैं l पुलिस द्वारा यह कार्य सिर्फ दहशत फ़ैलाने और उसके गैरकानूनी कार्यो को बेरोकटोक जारी रखने की मंशा से किया गया हैं l कल की ही घटना हैं जब सभी क़ानूनी मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए  बस्तर एसपी आर एन दास के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के नंबर से शालिनी को फोन कर धमकी दी गई l आदिवासियों के क़ानूनी और मानवाधिकारों के लिए कार्य कर रही वकील शालिनी गैरा को फ़साने की साजिश के तहत बस्तर पुलिस ने नोट बदलवाने की फर्जी शिकायत दर्ज की हैं l वकील प्रियंका शुक्ला को प्रताड़ित करने की कोशिश की गई l

पिछले दिनों देश की सर्वोच्च जाँच संस्था सी बी आई की रिपोर्ट ने ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में पुलिस के द्वारा घरों को जलाये जाने सहित महिलाओं के साथ मारपीट के आरोपों की पुष्टि की हैं l परन्तु दोषी अधिकारियो पर कार्यवाही की बजाय राज्य सरकार न सिर्फ उन्हें सरंक्षण प्रदान कर रही हैं बल्कि मनमानी करने की खुली छूट दे कर रखी हैं l इसी का नतीजा हैं की पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता, वकील और पत्रकारों पर स्वयं आई जी कल्लूरी के इशारे पर हमले और फर्जी मुकदमे दायर किये जा रहे हैं l

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन बस्तर पुलिस के इन गैरकानूनी कृत्यों की कड़े शब्दों में निंदा करता हैं और राज्य सरकार से इन मामले में हस्तक्षेप करते हुए जाँच दल की तुरंत रिहाई व फर्जी केशो को ख़त्म करने की मांग करता हैं l

भवदीय
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छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्ता समिति) अखिल भारतीय आदिवासी महासभा छत्तीसगढ़ किसान सभा, अखिल गोडवाना महासभा, भारत जन आन्दोलन, जनाधिकार संगठन, दलित आदिवासी मजदुर संगठन (रायगढ़) हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, आदिवासी विकास परिषद् (छत्तीसगढ़ इकाई) जशपुर जिला बचाओ संघर्ष समिति, किसान संघर्ष समिति (कुरूद) भूमि बचाओ संघर्ष समिति (धरमजयगढ़), मेहनतकश आवास अधिकार संघ (रायपुर) गाँव गणराज्य आन्दोलन (सरगुजा), जनशक्ति संगठन (राजनांदगांव) राष्ट्रीय बाजिव मजदूरी अधिकार मोर्चा, जनहित (बिलासपुर)  आदिवासी जन वन अधिकार मंच,  उधोग प्रभावित किसान संघ (बलोदाबाजार)
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Tuesday, December 27, 2016

सुकमा पुलिस की थ्योरी में झोल: उठाया खम्मम से और ज़ीरो एफ़आईआर सुकमा में



सुकमा पुलिस की थ्योरी में झोल: उठाया खम्मम से और ज़ीरो एफ़आईआर सुकमा में

राजकुमार सोनी@CatchHindi |
 28 December 2016, 9:06 IST

बस्तर में दो अधिवक्ता, एक पत्रकार सहित सात मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी में नया मोड़ आ गया है. मंगलवार को गिरफ्तार किए गए लोगों की जमानत के सिलसिले में हैदराबाद से दंतेवाड़ा पहुंचे वकीलों ने कहा कि जो गिरफ्तार किए गए हैं उन्हें रविवार की सुबह नौ बजे के आसपास सादी वर्दी में कुछ हथियारबंद लोगों ने तेलगांना के खम्मम इलाके के दुगुडम क्षेत्र में रोका था.

रोक-टोक करने वाले खुद को छत्तीसगढ़ का पुलिसकर्मी बता रहे थे. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उन्हें  तेलगांना इलाके में होने की वजह पूछी तो वे जवाब नहीं दे पाए थे। उनके पास अपने पहचान पत्र भी नहीं थे.

तक़रार बढ़ने के बाद आसपास काफी ग्रामीण जमा हो गए और तेलगांना पुलिस भी आ गई थी. तेलगांना पुलिस ने इन सभी लोगों को सभी को जाने के लिए भी कह दिया था, लेकिन छत्तीसगढ़ की पुलिस उन्हें अपने साथ सुकमा ले आई और फिर देर शाम उन्हें जनसुरक्षा अधिनियम के तहत जेल भेज दिया गया.

जीरो एफआईआर पर सवाल

नियम कहता है कि छत्तीसगढ़ पुलिस को एफआईआर खम्मम में ही दर्ज करवानी चाहिए थी लेकिन इसकी बजाय इनकी गिरफ्तारी सुकमा में दिखाई गई है. सवाल यह उठ रहा है कि सुकमा में भी गिरफ़्तारी का क्रमांक ज़ीरो क्यों दर्शाया गया है? तेलांगना हाई कोर्ट के वकील सुरेश कुमार ने कहा कि जब तेलगांना के किसी भी थाने में एफआईआर दर्ज ही नहीं की गई तो फिर सुकमा पुलिस का जीरो पर अपराध दर्शाना गैर वाजिब ही माना जाएगा.

सुरेश कुमार ने कहा कि पुलिस के नाम पर जो लोग सादी वर्दी में छत्तीसगढ़ की सीमा से बाहर जाकर आम नागरिकों की जांच-पड़ताल कर रहे हैं, वे लूटपाट करने वाले अपराधी या सलवा-जुडूम के कार्यकर्ता भी हो सकते हैं. अधिवक्ता दशरथ ने कहा कि बस्तर के बदतर हालात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कई मर्तबा फटकार लगाई है. बस्तर में जब सलवा-जुडूम संचालित था तब माओवादियों से मुकाबले के नाम पर पुलिस ने ग्रामीणों को हथियार थमा दिया था. फिलहाल पुलिस की कार्रवाई को देखकर यही लगता है कि बस्तर में एक बार फिर माओवादी उन्मूलन के नाम पर निजी लोगों की सेवाएं ली जा रही है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता देंगे गिरफ्तारी

अधिवक्ता, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद बस्तर की पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ मानवाधिकार संगठन लामबंद हो गए है. तेलगांना की सिविल लिबट्रीज कमेटी के संयुक्त सचिव मदन कुमार स्वामी ने बताया कि जल्द ही देशभर के मानवाधिकार कार्यकर्ता बस्तर आकर गिरफ्तारी देंगे. स्वामी ने तेलगांना और छत्तीसगढ़ की पुलिस पर सांठगांठ कर संगठित ढंग से अपराधिक गिरोह संचालित करने का आरोप भी लगाया. उन्होंने कहा कि जो लोग हाईकोर्ट में नियमित रुप से प्रैक्टिस कर रहे हैं पुलिस उन्हें माओवादी बता रही है.

पुलिस की झूठी कहानी का आलम यह है कि वह एक लाख रुपए के पुराने नोटों की जब्ती दर्शाकर यह साबित करने में तुली हुई है कि सभी लोग ग्रामीणों के जरिए पैसा बदलवाने आए थे. स्वामी ने कहा कि सात लोगों की गिरफ्तारी से पहले पुलिस ने प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद सहित कुछ अन्य लोगों पर भी हत्या का केस दर्ज कर दिया था. हकीकत यही है कि बस्तर की पुलिस यह नहीं चाहती है कि माओवादी उन्मूलन के नाम पर फर्जी मुठभेड़ और फर्जी आत्मसमर्पण की कहानियां सामने आए.

आदिवासी नेता सोनी सोरी ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि एक बार फिर यह साबित हो गया है कि बस्तर में कैसा फर्जीवाड़ा चल रहा है. जब मानवाधिकार के क्षेत्र में सक्रिय लोगों को पुलिस माओवादी बताकर जेल में डाल सकती है तो फिर किसी ग्रामीण को नई वर्दी पहनाकर माओवादी बता ही सकती है. छत्तीसगढ़ की पीयूसीएल ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह ने कहा कि बस्तर में असहमति के हर स्वर को कुचला जा रहा है. वहां लोकतंत्र निलंबित हैं, लेकिन कानून का माखौल उड़ाने वाले अफसरों को देर-सबेर जेल जरूर होगी

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बस्तर पुलिस ने वकील, पत्रकार सहित सात लोगों को पीएसए के तहत गिरफ़्तार किया



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बस्तर पुलिस ने वकील, पत्रकार सहित सात लोगों को पीएसए के तहत गिरफ़्तार किया

Bastar police arrested lawyers, scribe and others under PSA
फ़ाइल फोटो
बस्तर की सुकमा पुलिस ने बीती रात आंध्र प्रदेश और तेलगांना के हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे दो अधिवक्ताओं, एक पत्रकार सहित सात मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में जनसुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. पुलिस का आरोप है कि जिन्हें जेल भेजा गया है वे सभी बस्तर के हालात पर रिपोर्ट तैयार करने के बहाने माओवादियों को सहयोग करने का काम करते हैं.
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पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी तेलगांना के खम्मम और भद्राचलम से होकर बस्तर में प्रवेश कर रहे थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों के पास से प्रतिबंधित माओवादी साहित्य, पर्चे, पोस्टर और प्रचलन से बाहर हो चुके 500-1000 के नोटों में करीब एक लाख रुपए भी जब्त किया.

झूठे आरोप में फंसाया?

अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद बवाल मच गया. देशभर के सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता इस मामले की सच्चाई जानने में जुट गए हैं. आंध्र और तेलगांना में मानवाधिकारों के लिए कार्यरत मदन कुमार स्वामी ने बताया कि बस्तर में पुलिस और सुरक्षा बल के लोग निर्दोष आदिवासियों को मौत के घाट उतार रहे हैं.
स्वामी बताते हैं कि आदिवासियों के घरों को उजाड़ देना और महिलाओं से बलात्कार करना इस इलाके में आम बात हो गई है. उन्होंने बताया कि जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उनमें से दो हाईकोर्ट में नियमित रुप से प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं. क्या कोई माओवादी न्यायालय में प्रैक्टिस कर सकता है? स्वामी ने कहा कि सभी लोग पुलिस प्रताड़ना के शिकार आदिवासियों के गांवों में जाकर रिपोर्ट बनाने वाले थे. लेकिन पुलिस ने अपनी कलई खुलने के डर से इन लोगों को पहले ही गिरफ्तार कर लिया.
तेलगांना डेमोक्रेटिक फोरम के समन्वयक प्रोफेसर पीएल विश्वेश्वर ने बताया कि फोरम से जुड़े सभी सदस्य 25 दिसम्बर की सुबह अपने वाहन से हैदराबाद से बस्तर के लिए रवाना हुए थे. सुबह नौ बजे वे लोग तेलगांना के खम्मम इलाके में पहुंचे तो वहां अधिवक्ताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से दुगुडम इलाके की पुलिस ने कड़ी पूछताछ की.
सभी कार्यकर्ताओं ने अपना आईकार्ड, ड्राइविंग लायसेंस, आधार कार्ड आदि परिचय पत्र दिखाया. लेकिन खम्मम पुलिस ने उन्हें माओवाद प्रभावित सुकमा के धरमपेटा इलाके की पुलिस को सौंप दिया. घटना की जानकारी मिलने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का एक प्रतिनिधि मंडल हैदराबाद के पुलिस महानिदेशक अनुराग शर्मा से मिला और उनसे इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा.
शर्मा ने इन कार्यकर्ताओं से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि गिरफ्तारी छत्तीसगढ़ में हुई है इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते. विश्वेश्वर ने बताया कि फिलहाल तेलगांना में विधानसभा का सत्र चल रहा है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से उठे बवाल से बचने के लिए पुलिस अपना दामन बचाने में लगी है.