Monday, October 31, 2016

न्यायालय को है इस देश में आरोप तय करने और सजा देने का अधिकार ?

न्यायालय को है इस देश में आरोप तय करने और सजा देने का अधिकार ?

बड़े षड्यंत्र की बू आ रही है | इनके खिलाफ अभी मामला न्यायलय में था , हो सकता है वे निर्दोष साबित होते | जैसा कि अधिकांश मामलों में हो रहा है , पुलिस द्वारा आतंकी बताये जा रहे युवा दस-पंद्रह साल जेल में बर्बाद कर बाईज्जत बरी होते रहे हैं |
हाई टेक सेंट्रलजेल से पहले भी भाग चुके बंदी एक सिपाही की चम्मच और गिलाश से हत्या कर आसानी से दुबारा भाग लेते है | इस जेल में दो बार दो सप्ताह बिता चुके कामरेड बादल सरोज का तो दावा है कि यहाँ से भागना संभव ही नहीं है , अगर यह हुआ है तो तय है कि जेल के बड़े अधिकारी और सिपहियों की मिली भगत से ही संभव हुआ होगा | तब फिर सिपाही की हत्या भी सवालों के घेरे में है |
इन बंदियों के बारे में आधिकारिक रूप से बताया जा रहा है कि इन्हें तीन अलग अलग बैरकों के अलग अलग सेल में रखे गए थे | मतलब लोहे के मजबूत तीन तीन दरवाजे × 3 = 9 दरवाजे एक ही समय में तोड़ डाले गए | यह बात तो हजम होने वाली नहीं है | भागे गए सभी बंदी आठ से दस घंटों में भी मात्र 8 किमी के भीतर और वह भी एक साथ रहे , यह बात भी असंभव प्रतीत होता है | सभी के पैरों में एक ही तरह के नए जूते और नए कपडे भी संदेहास्पद है | इस घटने की वीडियो का भी सोशल मीडिया में जिक्र हो रहा है , जिसमे इनके बिना हथियार के होने और जान बख्स देने के लिए गिड़-गिड़ाने की बात की जा रही है | मुठभेड़ करने वाले पुलिस जवान कहीं बस्तर से तो नहीं गए थे ?
अगर मान लिया जाये कि मुठभेड़ असली था और इनके पास हथियार थे तो क्या सभी के सर में गोली मारना उचित था ? क्या किसी एक को जेल से भागने के तुरंत बाद उन्हें हथियार और अन्य सहयोग करने वालों की जांच के लिए घायल कर जिन्दा पकड़ने की कोशिश नहीं होनी थी ?
क्या रहस्य उजागर होने वाला था जिसके लिए सभी को खामोश करना जरुरी हो गया ? क्या अब भाजपा की सरकारें गुजरात और बस्तर मॉडल सभी जगह लागूं करेंगी ? बस्तर में भी न्यायालय से बाईज्जत बरी होने वाले और जमानत पर निकले आरोपियों को फर्जी मुठभेड़ में मारा जा रहा है | क्या अब आतंक के मामले बनाकर पकडे जाने वाले सभी आरोपियों न्यायालय के फैसले का इंतजार किये बिना ऐसे ही मार डाला जाएगा ? न्यायपालिका की जैसी हुज्जत देश के मुखिया और सरकार की ओर से हो रही है , उसे देखकर तो ऐसा ही लग रहा है कि अब आरोपियों को सजा देने का काम न्यायालय नहीं खुद आरोप तय करने वाली सरकार करेगी , उसे अब न्यायालय पर भरोसा नही रहा |
इस देश में सजा देने का लोकतान्त्रिक प्रावधान है , न्यायपालिका है , यह देश तानाशाहों का नहीं है | कौन चोर है ? देशद्रोही है ? या हत्यारा है ? ये आप नहीं तय कर सकते |
अभी तो सरकार आपकी है , अगर पुलिस को सजा देने का समर्थन कर रहें है तो क्या जब आपके विरोधियों की सरकार आएगी और राजनितिक कार्यकर्ताओं पर इसी तरह देशद्रोह का आरोप लगाकर बिना न्यायालय की प्रक्रिया के गोली मारने का काम होगा ( जिसमें आपके अपने भी हो सकते हैं लेकिन ) तो क्या आप तब भी समर्थन करेंगे ?

अरविन्द के जरीवाला ने भोपाल एनकाउंटर पर उठाये सवाल

अरविन्द केजरीवाल ने भोपाल एनकाउंटर पर सवाल उठाये.

  • 8 घंटे पहले
भोपाल सेंट्रल जेलImage copyrightMP POLICE
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक ट्वीट में भोपाल में हुए एनकाउंटर पर सवाल उठाए हैं.
सोमवार को मध्य प्रदेश पुलिस ने प्रतिबंधित संगठन सिमी के आठ विचाराधीन क़ैदियों के जेल से फ़रार होने और फिर बाद में एनकाउंटर में उनकी मौत का दावा किया है.
मध्य प्रदेश पुलिस का ये दावा कई तरह के सवाल में घिर गया है.
सोमवार देर शाम अरविंद केजरीवाल ने इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने इस बारे में एक के बाद एक कई ट्वीट किए हैं.
केजरीवाल ट्वीटImage copyrightTWITTER
ट्वीट में केजरीवाल ने लिखा, "ये मोदी राज है. फ़र्ज़ी एनकाउंटर. फ़र्ज़ी मामले, रोहित वेमुला, केजी बंसल, ग़ायब नजीब, दलितों पर अत्याचार, एबीवीपी की गुंडागर्दी, आरएसएस, गौरक्षक."
एक और ट्वीट में अरविंद केजरीवाल ने भोपाल के एक स्थानीय पत्रकार का एनकाउंटर पर सवाल उठाता फ़ेसबुक पोस्ट भी शेयर किया है.
पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी का एक ट्वीट भी रिट्वीट किया है उन्होंने लिखा है, "सिमी के आतंकवादी बताए जा रहे विचाराधीन क़ैदियों के एनकाउंटर की कहानी उतनी ही यक़ीन करने लायक है जितना गुजरात का विकास मॉडल."
केजरीवाल ने पत्रकार राजदीप सरदेसाई को भी रिट्वीट किया.
राजदीप ने लिखा है, "क्या भोपाल एनकाउंटर पर सवाल उठाना किसी को राष्ट्रविरोधी बना देता है? मैं तो समझता हूं कि सवाल उठाना हमारे महान लोकतंत्र की ख़ूबी है. नहीं?"
केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी नेता अंकित लाल का भी एक ट्वीट रीट्वीट किया है.
कुमार विश्वास का ट्वीटImage copyrightTWITTER
इसमें उन्होंने लिखा है, "तो अब विचाराधीन क़ैदियों का क़त्ल करना जायज़ है? न सुनवाई, न मुक़दमा, न जज न सज़ा. गुजरात मॉडल मध्यप्रदेश पहुँच गया है."
अरविंद केजरीवाल ने शिरीष कुंदेर का मध्यप्रेदश एनकाउंट पर तंज करता ट्वीट भी रिट्वीट किया है.
कुंदेर ने लिखा है, "मुख्य न्यायाधीश ठाकुर ने जजों की कमी की शिकायत की. मध्य प्रदेश पुलिस ने तुरंत आठ लंबित मामले निपटा दिए. मध्य प्रदेश पुलिस की इस कार्रवाई पर गर्व है."
सिमी के कथित सदस्यImage copyrightMP POLICE
Image captionकथित मुठभेड़ में मारे गए आठ विचाराधीन क़ैदी
अरविंद केजरीवाल ने आप नेता कुमार विश्वास का एक ट्वीट भी शेयर किया. इसमें उन्होंने लिखा है, "जिस की सत्ता है वो "देश" है, बाक़ी जो भी बोले-सवाल करे,न्याय माँगे वो "देशद्रोही" है. जो इस नई लोकतांत्रिक व्याख्या से सहमत न हो वो पाक चला जाए."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़े

हिजाब को ना बोल हिना हो गई Viral

हिजाब को ना बोल हिना हो गई Viral

Monday, October 31, 2016
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hina sidhu-shooter
नई दिल्ली | समाचार डेस्क: हिजाब को ना बोल हिना ईरान में रातों-रात चर्चित हो गई है. भारतीय शूटर हिना सिद्धू ने ईरान में हिजाब पहनने की अनिवार्यता के चलते वहां होने वाले इशियाई प्रतियोगिता में भाग लेने से इंकार कर दिया है. इसका ईरान की महिलाओं पर काफी असर पड़ा है. सोशल मीडिया में हिना के इस कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है.
इसके बाद से ही ईरान में सोशल मीडिया पर#CompulsoryHijabIsNOTOurCulture और #SeeYouInIranWithoutHijab जैसे हैशटैग वायरल होने लगे हैं.
उल्लेखनीय है कि हिजाब पहनने की अनिवार्यता के चलते उसने ईरान में होने वाली 9वीं एशियाई एयरगन शूटिंग चैंपियनशिप से अपना नाम वापस ले लिया है. हिना सिद्धू भारतीय शूटर हैं तथा दिसंबर में ईरान में होनी वाली प्रतियोगिता में उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करना था.
ईरान की एक महिला शूटर ने फेसबुक पर लिखा है “अनिवार्य हिजाब महिला एथलीटों के बलात्कार का एक रूप है.” इसी के साथ उसने एक वीडियो भी पोस्ट किया है.
एक पोस्ट में कहा गया है “अनिवार्य हिजाब एक भेदभावपूर्ण कानून है, यह सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है.”
माई स्टेल्थी फ्रीडम पेज पर पिस्टल चलाते हुए हिना की तस्वीर लगाई गई है, जिसमें उन्होंने कोई हिजाब नहीं पहना है. साथ में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की तस्वीर है, जिन्होंने सिर से पैर तक ख़ुद को ढंक रखा है. उनकी ये तस्वीर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मुलाक़ात की है.

यह सरासर हत्या है और कुछ नहीं

* यह सरासर हत्या है और कुछ नहीं






* जेएनयू के नज़ीब को पंन्द्रह दिन में नहीं खोज पाई पुलिस और आठ लोगों को बारह घंटे में खोजकर एनकाउंटर कर दिया पुलिस ने.
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सिमी के आठ विचाराधीन केदियों की हत्या शिवराज सिंह की राष्ट्रवाद की दौड में आगे निकल जाने की मुहिम का हिस्सा है.
और यह भांड मीडिया जो लगातार ऊन्हे आतंकवादी कह रहा है वह जघन्य सामाजिक अपराध है, उन्हें किसी अदालत ने आतंकवादी नहीं कहा और न सजा दी.
उनका भागे जाने की कहानी और 12 घंटे में दस किलोमीटर  तक पहुच पाने ,उनके कपड़े ,जीन ,सफेद फक कमीज ,शानदार जूते और कभी कहते है हथियार कभी बिना हथियार की कहानी उनकी पोल खोल रही है .
हम छत्तीसगढ़ के लोग पुलिस की आधी अधूरी बकवास कहानी के आदी है.
कई मुस्लिम नौजवान दस दस पंन्द्रह पंन्द्रह साल की जेल के बाद निरपराध छूटे है ,कोर्ट में न सबूत पेश कर पा रही है पुलिस तो इस तरह की कहानी गढ कर इनकाउन्टर किया जा रहा है .
मध्यप्रदेश सरकार की कहानी पूरी तरह झूठी है यह सरासर हत्या है,  जांच वांच की मांग फालतू है ,जब जांच भी इन्हें ही करना है और मीडिया जज की तरह फैसला दे रहा हो तो इन सब का कोई मतलब नहीं है.
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Problem graver than Una’: Chhattisgarh Dalits up in arms over custodial death

Problem graver than Una’: Chhattisgarh Dalits up in arms over custodial death
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Ritesh Mishra, Hindustan Times, Janjgir-Champa|Updated: Oct 30, 2016 10:46 IST


Santosh Norge’s two sons—Rahul and Prakash --- and his wife Usha Devi in Sagarpara village in Champa district’s Janjgir . Satish’s death has become a rallying point for Dalits in Chhattisgarh.(Ritesh Mishra/HT Photo)

Rage, grief, fear and helplessness flit across the face of 13-year-old Rahul Norge when he talks about September 17, the day he claims he saw the police beat his father to death at Mumula police station.

The memories of his cowering father, Satish Norge, a Dalit, haunt him and the tears flow. “Fansi deni chahiye (they should be hanged),” said Rahul, referring to the police personnel allegedly involved in the fatal beating as well as several upper caste members of the neighbourhood with whom his father had an argument a few hours before his death. “I want to study law and fight for Dalits,” he added.

The death of Satish has become a rallying point for Dalits in and around Janjgir-Champa district of Chhattisgarh and they are preparing to fight “injustices and discrimination” that they say are heaped on them.

“The problem is graver than in Una of Gujarat,” claimed Goldy George, a local Dalit rights activist. Unlike Una, where the public flogging of four Dalit youths in July on the suspicion of cow smuggling hit the headlines and triggered national outrage, Satish’s death received little coverage. “Atrocities on Chhattisgarh Dalits never got media attention, hence no one cared about them,” George added.

Fed up of the indifference, Dalits leaders say the community has decided to take matters into own hands. They say meetings have already been held against “upper caste domination and atrocities” across Janjgir-Champa, Bilaspur, Korba, Raigarh and Baloda Bazar and Mungeli districts.

“A mass movement against atrocities on Dalits will follow,” said Guddu Lahere, an officer-bearer of Dalit Mukti Morcha. Some leaders are also toying with the idea of floating a party of their own.

A majority of Dalits in this region of Chhattisgarh belong to Satnami Samaj. At the meetings being held now, the focus is on galvanising their “arms-less army” known as “Satnam Sena”. Satish was from the Satnami Samaaj.

Janjgir-Champa’s population comprises more than 50% Dalits. This is where Kanshi Ram, the late founder of Bahujan Samaj Party, fought his first Lok Sabha election in 1984. Though he lost, he is credited with consolidating the Dalit vote. Dalits of the region still call him “Messiah”. According to an estimate, the region has more than 800,000 people of Satnami Samaj, apart from around 200,000 other Dalits.

“After the killing of Satish Norge, the Satnami Samaj has organised many meetings. The other Dalits are also with us now,” said Lahere.

After the death of Satish, the arrest of Satnami leader Vikas Khandekar in Mungeli district over a Facebook post on Goddess Durga too has united the Dalits, said activists.

Following Khandekar’s arrest, the Satnami Samaj alleged that Hindu right-wing activists threw stones at his house in police presence and even attacked his family members. The Satnami Samaj also alleged that slippers were thrown their “Jaistambh” (a monument symbolising peace and truth) in Mungeli.

“We lodged a complaint with the police that our sentiments were hurt after the attack on Jaistambh and the family members of Vikas, but no FIR was registered,” said Lahere.

Dalit organisations in the state are now focusing their energies on meetings, campaigning for “proper investigation” leading to convictions in cases registered under the Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, and building up to a possible statewide yatra. Dalits allege that the police are hand in glove with upper castes and cases of atrocities on them rarely result in conviction.

The numbers that matter

“Most of the custodial deaths reported in the state are either of Dalits or Adivasis, said Dalit rights activist Goldy George.

National Crime Records Bureau data for Chhattisgarh shows 242 cases were registered for crimes against persons belonging to Scheduled Castes in 2013, and 1,066 in 2014. The increase of about 340% is the highest among states.

Data released by National Commission for Scheduled Castes this year shows crimes against Dalits in Gujarat went up from 27.7% in 2014 to 163.3% in 2015. In Chhattisgarh, it spiked from 32.6% in 2014 to 91.9% in 2015.

The proportion of Scheduled Castes in Chhattisgarh increased from 11.6% in 2001 to 12.8% in 2011.

There are 10 SC MLAs — nine from the BJP and one from the Congress — in the 91-member House (One member is nominated). The Bahujan Samaj Party has one seat (OBC legislator).
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Sunday, October 30, 2016

Soni Sori: 'The State is Lawless'

 
Soni Sori: 'The State is Lawless'






Written by Soni Sori
Published on 30 October 2016

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Soni Sori, a human rights defender and an Adivasi school teacher from Chhattisgarh, was in Mumbai recently to talk at an event organized to commemorate Justice (retired) Suresh Hosbet's 25 years of contribution to human rights struggle in India post his retirement. This event was orgainsed by Majlis, a women's rights organization in collaboration with Human Rights Law Network (HRLN), Centre for Study of Society and Secularism (CSSS) and People's Watch. Sori, who has endured serious custodial torture for nearly two years, spoke at length about her experience working for her community in Bastar.



Following is the translated transcript of her speech delivered on October 1 in Mumbai:

My warm regards to everyone gathered here. I am extremely happy to be present before you all for such an important event commemorating Justice Suresh's 25 years in activism. His contribution is commendable, both as a judge and as an activist. Justice Suresh had recently travelled to Chhattisgarh. I was informed by one of the fellow activists about his visit. I did not know about Justice Suresh then. Even when I was told he is a senior person, I thought of him as several other activists and human rights lawyers who travel from cities to support our cause. But when I saw him in Bastar, I was completely astounded that a man at such a ripe age wants to still travel to remote corners of the country to defend their rights. Although, he had managed to reach Bastar, I was not sure if he could take the travel ahead to those inaccessible villages in the region. When I suggested he should take it easy and not venture to far off villages, he promptly replied, "I have travelled all the way to just examine the condition of Adivasi communities in this region, I will travel ahead." I in fact even tried to warn him of the possibility of long walks that he would have to undertake to reach some villages. He was very willing and asked me to not sweat over his travel. We went to one of the remotest villages which involved both travelling in a vehicle on the rickety road and then covering a long stretch on foot. But, no where did he appear tired. He was zealous and wanted to meet as many villagers as he could. When people got to know a retired judge had travelled from Mumbai to hear them out, they got hopeful. Villagers gathered in large numbers to talk to him and put forth their grievances. Justice Suresh patiently listened to each and every person gathered. He took note of every complaint made and patiently tried to address them one by one. His visit not only inspired people in general, but also helped some of them to take immediate steps.

At the gathering, a pregnant Adivasi woman called Hurre had also come. She was heavily pregnant. Her husband Hunga was arrested few days ago for his alleged involvement in one blast case. Hurre had pleaded for her husband's innocence before the police, but they did not relent. They took Hunga away, leaving Hurre distraught. The police had hit her on her stomach with the rifle butt when she tried to prevent Hunga's arrest. She had suffered a deep injury. Hurre knocked at every door for justice. When she reached the police station inquiring about her husband's arrest, the police claimed Hunga was taken to the court. When she reached the court, she was told her husband was lodged at the jail. Then she rushed to the jail. She aimlessly kept shuttling between the police station, court and jail for several days. Fed up, she contacted me and sought my help in finding her husband. Amid all this, she also delivered a premature child. After the delivery, Hurre who was still frail and fatigued insisted on meeting her husband. Hurre and I went to meet him at Dantewada jail. After a lot of persuasion, we could finally meet Hunga in the jail. Hunga had not seen his boy child before this. It was an emotional moment to see Hunga meet his son in the jail. Hunga advised Hurre to not visit him in the jail and focus on making their thatched hut sturdy. He wanted the money they had painstakingly saved to be spent on the house as planned and not in travelling to visit him. Hurre returned to her village and few days later she succumbed to the complications that developed due to the harassment by the police. After Hurre's death, our focus now is on her infant child.

Since Hunga is in jail and Hurre is no more, we had to find ways to keep their child alive and healthy. On Justice Suresh's suggestion, we decided to move the High Court for arrangements to be made for the child's food. The court passed a favourable order and asked the collector to make necessary arrangements for the child. That one visit by Justice Suresh helped us in finding ways to help Hurre's family.

When I saw him there, helping our movement, I was reminded of my father. It is very courageous of someone his age to travel into the remote area and help people.

Seeing him, I was reminded of an incident from the time I was in the prison. My old father, who was shot in his leg, which rendered him handicapped would come to the court on every date and stand at a corner. I would insist he didn't come to the court and keep standing like this. He would reply that he stood there since he cannot help me in any other way. He would say he had no money, no power to save me, but still the courage to stand by me. He once told me, "I want you to remember that your crippled father is standing here for you every day. I do not want you to lose hope. If I can stand under the scorching sun, you can't lose hope. You have to fight back." So when I saw Justice Suresh in my village, I was reminded of my father's efforts. There is a lot to learn from Justice Suresh and his undying spirit.

In Bastar, law has its own way of functioning. When a woman is raped anywhere in the country, the Supreme Court intervenes, asks for an immediate action, an immediate FIR and investigation. But this is not the case in Bastar. There is no law, no system, and no sensitivity in handling women in this region. Let the Supreme Court say anything, let the high court give any directions, the police here will do as they like. They do not care for law or for its people. If you take cases of sexual assault by the police in Bastar, you will find even after an FIR, the police do nothing. On the contrary, the victims live under constant terror here. And the police continue to unleash its terror on people here. If the state machinery continues to work like this and the government neglects lives here (Bastar), people will continue to die here. It appears the system is built to harass people here and the police continue to operate with complete impunity.

Take the recent case of killing of two young school going boys. One of them was sleeping in the house. When the armed force entered his house, he kept saying I am a school going child. Look at my Aadhar card, look at my school I- card. I am not a Naxal. Even as he continued to beg, the policemen dragged him out of the house, thrashed him badly and took him far away from the house and gunned him down. Even in such brutal, cold blooded murder, there is no FIR against the police, no investigations. What law is this, which allows the State to kill without any accountability, with such impunity? If there is a justice system in place, if there are courts to deliver justice, then they should function too. Then why doesn't it work in Bastar? His family is running from pillar to post seeking justice.

Another villager called Karma was killed by the police and declared to be Naxalite. His family produced his citizenry documents to establish he was a law-abiding citizen and had no link with the arms movement. If a person has lived all his life in the village, and has been publicly present, how can the police then declare him a Naxalite and that too after his death? We ask when did he go underground, when did he pick up arms, when did he become a Naxalite, when did the government declare reward on his name? Even when they brutally murder our people, we still hold on to bleak hopes that someday we will get justice. Instead, the same police officers unabashedly come and threaten us. They threaten women of dire consequences. They threaten to kill young boys of the family. What type of State is this which hates its own people?

It has become so easy for Chhattisgarh government to declare anyone and everyone a Naxal. Those assigned with the task of upholding democratic principles in this country are busy killing it. Murderers are secure in this democracy, but the victims are not.

Women particularly are easy targets here. Young mothers in Bastar mostly step out to nearby areas to work as agricultural labourers. They time their work in such a way that they are able to take periodic breaks to breast feed their infants who are left back home. As these women take these breaks and head home, they invariably are apprehended by the police. The police interrogate them as if they were Naxals. Even when these young mothers tell the police they are headed home to breast feed their children, the police do not relent. To prove their innocence, the women are forced to bare their chests on gun point and squeeze out milk. Even after all the abuses she is made to endure, she cannot go and feed her hungry child. Can her frail body regenerate the milk once again in such a short time span? These daily abuses leave her humiliated and her child hungry. These abuses are not even accounted for. As if Adivasi lives are so dispensable that anyone can come and do whatever they like. There is no accountability of any kind.

We are not asking for some special protection for our people. We are only saying if there is an established legal system in this country, then the State should function within the limits. If the government wants our land and our wealth, doesn't it have the responsibility of protecting our interests too? Should development be an inevitable agenda, then the government should first have a system in place ensuring that every Adivasi life is protected and their interests secured. If government wants to procure our land, there is a law in place. Whether good or bad, the law exists and the government should at least try to stick to its own laws. How can this government kill Adivasis and speak of development? How can this be even termed as development? You cannot vacate villages, displace every one and claim that you worked towards development. If the government is really serious about development, it must focus on making lives of villagers better. There is no electricity, potable water, schools in most villages. Shouldn't the State focus on providing these things to the villagers instead of killing them?

The State is killing Adivasis in the name of development. Madkam Hidme of Gompad village is one of the recent victims of the State brutality. She was picked up from her house while she was sleeping, brutalized, gang raped by policemen and then shot dead. We still decided to opt for a legal battle. On August 15, I along with her mother and sister went to her village and addressed the villagers and urged them to understand the values of democracy, their legal rights and the need to assert our constitutional rights. As planned, we looked for a place to hoist a flag in the village. We looked around entire village but could not find a single school or aanganwaadi there. We finally went to one open space and hoisted the flag there. This is State's development! They can send policemen to Adivasi houses, brand them as Naxals and brutalize them, but cannot set up a single school in the village.

When Adivasis speak of development, there is no one to hear their voice. If they approach a collector for setting up of a school, they are sent away. The collector doesn't even give Tribals an opportunity to make an appeal. They want forest-dwellers to remain in the forest for ever. They are not interested in our development. But when they want our lands and forests, they unleash terror on us and kill us.

After the gang-rape incident of Delhi, entire nation joined hands seeking justice for her. Am not saying that the incident was not brutal and we should not have come together for her, but such incidents happen every day in Bastar. Adivasi girls are assaulted every day in Bastar. But there is no one to fight with us. They rape us and then brand us Naxals. But no one comes ahead in support of us and speaks against the State atrocities. What happened in JNU with Kanhaiya and Umar Khalid was terrible. But when it happened to those two young boys of Bastar, there was no uproar. The boys were simply killed and not one protest was organized anywhere outside Chhattisgarh. They were school-going kids. Imagine if this were to happen to some students in your college, how the entire nation would have joined hands against the State and demanded immediate justice. Why doesn't the youth of this country assert itself when children are killed in Bastar? Will the government not kneel, if a concerted effort is made? Our children don't deserve justice?

Just when I was leaving for Bombay, five Adivasi youth (from the same village where two school kids were killed) came to me seeking help. They are afraid, the police will kill them. We have moved a petition before the High Court. I asked them why are they so afraid. They said, the Thanedaar has threatened them that on the first opportunity he will get rid of them. Of them, three men have already been to jail. Other two have even surrendered under police pressure. Still they are not spared. The police now want to have them killed. Engulfed in fear, those men spend every night in the forest. Since police mostly strike at night, these men stay away during the night time. They go deep in the forest, wait for rains to subside, find some dry space and sleep. Such is the terror of police here. One can't sleep in their house, can't visit the market, and can't lead a normal fearless life.

Worst affected are young girls of 12-13 years of age. They are forced to tie mangalsutra around their necks. Hoping to be let off by the police, almost all girls are forced to move around with those black beads around their necks. Even then girls are not sparred. The police continue to attack them. They are publicly humiliated, spoken to inappropriately in highly sexual tone, and many are even sexually assaulted. This State claims to be protecting its Adivasi population. Is this the way to protect its people? In the name of Naxalism, they are openly brutalizing us and will eventually wipe out our existence.

There is a dire need to have more and more participation of civil society from rest of the country. While people are actively working in other parts, it is essential that they pay more attention to what is happening in Bastar. Media has an important role to play here. You have seen how attempts were made to completely crush the media here. But that should not discourage us. If some journalist travels from Delhi or Bombay or Kolkata, our stories will defintely travel outside.

An entire drama has been carried out in the name of surrender. Young boys and girls are randomly picked up from villages and are shown as surrendered Naxals. These youths are given only two ultimatums, either to die or sign those papers. What do these terrorized youth know? They think signing those papers is a wise decision to make. Only to realize later that those papers declare them as surrendered Naxals. As news spreads, the Maoists punish them. If the police let them go, the Maoists kill them. Adivasis are stuck between the police and Maoists. Either ways they get killed.

Another case of a boy named Arjun recently came to light. He was sent to jail in 2015. He was released on bail after spending few days in jail. On every court hearing, he would diligently be present before the court. Not once did he miss the court hearing. Suddenly one day, the police went to his house and arrested him. They declared a Naxal who carried three lakh rupees reward on his head has been arrested. This boy Arjun, who was arrested in another petty case and was released on bail, was not even in hiding. If the police wanted, they could have arrested him much earlier. He was lawfully released on bail by the court. There was no mention of the reward amount until he was re-arrested. His sister, who tried to speak up against the police, is now taken into custody. It has been over 15 days since her illegal arrest.

This is the condition of Bastar, of Chhattisgarh. No voice of dissent can be raised; no Adivasi can raise her voice for justice. This State is lawless. No law, no rule applies here. The law that applies and governs the middle class, the ruling class and the upper caste in the rest of the country, does not protect the Adivasis of Chhattisgarh.

I have personally suffered a lot in past few years. It is not possible to fight the might of this State. But I will continue. This is no more my individual fight. It is the fight of every Adivasi here. We are threatened every day, our voices crushed; but we will continue to fight.

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दलित सीएमओ हूं, इसलिए मंत्री कर रहे प्रताड़ित, न्याय न मिला तो कर लूंगा आत्मदाह"

"दलित सीएमओ हूं, इसलिए मंत्री कर रहे प्रताड़ित, न्याय न मिला तो कर लूंगा आत्मदाह"






Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 2016-10-27Time : 17:49:19 PM


रायपुर। बीजेपी शासित राज्यों में दलितों पर अत्याचार और शोषण की खबरें आना आम बात हो गई हैं फिर चाहे व्यक्ति किसी भी पद पर क्यों न हो। ऐसी ही एक खबर बीजेपी शासित छत्तीसगढ़ से आई हैं जहां एक सीएमओ को दलित होने की वजह से विभागीय अफसरों द्वारा आए दिन प्रताड़ित किया जाता है। सीएमओ ने नगरीय मंत्री और विशेष सचिव पर इस तरह के आरोप लगाए हैं।

तिल्दा नगर पालिका के पूर्व सीएमओ हेमशंकर देशलहरा ने संवाददाताओं कहा कि दलित होने की वजह से मुझे नगरीय मंत्री अमर अग्रवाल और विशेष सचिव रोहित यादव द्वारा आए दिन प्रताड़ित किया जाता है। मैंने राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर न्याय मांगा है, न्याय न दिलाने पर मुझे आत्मदाह करने की अनुमति दी जाए, एक सप्ताह के भीतर मेरे मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो मुख्यमंत्री निवास के सामने मैं आत्मदाह कर लूंगा।

सीएमओ का कहना है कि मुझे जातिगत प्रताडऩा किए जाने की शिकायत अनुसूचित जाति आयोग ने सही पाई और नगरीय प्रशासन विभाग से तीन महीने में आयोग ने प्रतिवेदन मांगा, मगर अभी तक विभाग ने नहीं भेजा। एक घंटे में विभागीय जांच पूरी कराकर मुझे निलंबित कर दिया, मगर विभाग में आर्थिक अनियमितता करने वाले आज भी अपने पदों पर जमे हुए हैं।
सीएमओ ने कहा कि मेरे ऊपर तिल्दा नगर पालिका अध्यक्ष महेश अग्रवाल ने जानलेवा हमला किया, इसकी शिकायत की, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सीएमओ ने कहा कि मंत्री और विशेष सचिव का नार्को टेस्ट करा लिया जाए यदि मुझको प्रताडऩा आदि के लगाए गए आरोप गलत निकले तो मुझे नौकरी से बर्खास्त किया जाए।

उन्होंने कहा कि तिल्दा नगर पालिका अध्यक्ष महेश अग्रवाल नियम विरुद्ध कार्य करने के लिए मुझसे कहते रहे, मैंने यह काम करने से मना कर दिया। अग्रवाल ने एक नहीं कई आर्थिक व प्रशासनिक अनियमितताएं की हैं, उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। नगर पालिका तिल्दा के सीएमओ कार्यकाल से पहले जो गड़बड़ी हुईं, उसके लिए मुझे दोषी बताकर कुछ दिनों पूर्व सस्पेंड कर दिया। उन्होंने मंत्री अमर अग्रवाल पर महेश के साथ की जाने वाली हेराफेरी और आर्थिक अनियमितता में संलिप्त होने का आरोप लगाया।

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Saturday, October 29, 2016

एसआरपी कल्लूरी को बस्तर  से हटाये जाने के पुख्ता संकेत
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अगर अखबार की माने तो कल्लूरी का हमेशा से विवादों से नाता रहा है ,सरगुजा में विवाद के चलते उन्हें मुख्यालय बुला लिया गया था ,जग्गी हत्याकांड के आरोपी को भगाने का आरोप भी उनपर लगा था .इनसब से पीछा छुडाने के लिये उन्हें बस्तर भेजा गया था .वहाँ जाते ही उन्होंने बवाल खड़ा कर दिया ,उन पर फर्जी मुठभेड़ ,आगजनी ,बलात्कारीयो़ और लुटपाट करने वालोँ को सरंक्षण देने के आरोप भी लगे.
जनसंगठनों ने उधपर हत्याओं के मुकदमे दर्ज कर उन्हें दंडित करने की मांग जोरशोर से उठाई है ।
कब कह जा रहा है कि उनकी बिदाई तय है ,उनके स्थान पर साफसुथरी छवि वाले सीआईडी के आई जी हैमकृष्ण राठौड़ को भेजे जाने की चर्चा है .
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बस्तर एस पी आर एन दास से पुलिस मुख्यालय ने पूछा कि बरगुम मे हत्या का सच क्या

* बस्तर एस पी आर एन दास  से पुलिस मुख्यालय ने पूछा कि बरगुम मे हत्या का सच क्या है.
** पहले कहा था दोनों छात्र माओवादी है और उन्हें पुलिस ने मारा है और अब कह रहे है कि हमें पता नही किसने मारा .
** झूठ बोलकर बुरी तरह फंस गये एसपी,  हाईकोर्ट में पलट गई थी पुलिस अपने बयान से .
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बरगुम थाना क्षेत्र के सांगवेल गाँव के दो किशोरों की हत्या के मामले में बस्तर एसपी आर एन दास बुरी तरह फंस गये है .
पूलिस मुख्यालय ने नोटिस देके हत्या का सच जानना चाहा है .पी सुन्दराजन एस एसपी एस आई बी ने कहा कि बरगुम में हुई घटना की विस्तृत जानकारी बस्तर एसपी से मांगी गई है इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है ,मामले की जांच की जा रही है.
बताया जा रहा है कि हत्या पर दो दो अलग रूख दिखाने की वजह से एसपी को मुख्यालय ने फटकार लगाई है.
बस्तर एसपी ने दावा किया था कि 23,24  सितम्बर की दरम्यानी रात को दो माओवादियों को मुठभेड़ में मार गिरा दिया था. उसके पास से दो बन्दूक बिस्फोटक ओर डिटरनेटर बरामद किये थे और बाद में पुलिस के इसी ग्रुप को एक लाख का इनाम भी घोषित किया गया था.
जबकि ग्रामीणों का दावा था कि वह सोलह साल का सोनकू और अठारह साल का बिजलू था जो बारासूर थाना के भटपाल ग्रामपंचायत के रहने वाले थे. और पोटाकेबिन में पढने वाले दोनों दोस्त थे जो किसी की मोत की खबर देने अपनी मोसी के घर गये थे और ज्यादा रात होने के कारण वही रूक गये थे. उन्हें दूसरे दिन घर से खींच कर लेजाकर गोली से मार दिया .
बाद में जब प्रकरण जब हाई कोर्ट पहुचा तो पुलिस अपने पुराने रूख से पलट गई और जबाब दिया कि दोनों बच्चों को किसने मारा पता नहीं है ,उन्हें पुलिस ने नहीं मारा,अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है
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पत्रिका की रिपोर्ट के आधार पर

छत्तीसगढ़: आत्महत्या करते CRPF जवान सीजी खबर से साभार

छत्तीसगढ़: आत्महत्या करते CRPF जवान
सीजी खबर से साभार

Saturday, October 29, 2016

रायपुर | संवाददाता: CRPF द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला रुक नहीं रहा है. शनिवार 29 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ के बस्तर में तैनात सीआरपीएफ के एक जवान ने आत्महत्या कर ली है. इस साल बस्तर में पदस्थ सीआरपीएफ के जवानों द्वारा आत्महत्या करने की यह चौथी घटना है. सीआरपीएफ के 231वीं बटालियन के जवान सुनील कुमार ने दंतेवाड़ा में आत्महत्या कर ली है.

सीआरपीएफ जवान सुनील कुमार ने अपने साथी के रायफल को गले में फंसाकर गोली चला ली. घटना दिन के 12 बजे के आसपास की है.

मिली जानकारी के अनुसार आत्महत्या करने वाला सीआरपीएफ जवान सुनील कुमार शनिवार सुबह ही ट्रेनिंग करके चंडीगढ़ से लौटा था. सुनील कुमार हिमाचल प्रदेश का रहने वाला है.

सुनील कुमार वायरलेस आपरेटर के पद पर पदस्थ था. जवानों का कहना है कि यहां आने के बाद से ही कुछ बात को लेकर परेशान था.

जब सीआरपीएफ के अधिकारियों ने सुनील के पत्नी बात की तो उसने बताया वह एक दिलेर आदमी था तथा आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठा सकता है.

साल 2016 में आत्महत्या
सुनील कुमार से पहले इस साल सीआरपीएफ के तीन जवान बस्तर में आत्महत्या कर चुके हैं. दंतेवाड़ा में जून माह में कोंदापारा में सतीश ने आत्महत्या कर ली थी. जून माह में ही बीजापुर में पदस्थ पवित्र यादव ने एके-47 से आत्महत्या की थी. इसी तरह से जुलाई माह में सुकमा में तेजवीर सिंह ने अपनी पिस्टल से आत्महत्या कर ली थी.

सबसे ज्यादा आत्महत्या CRPF में
उल्लेखनीय है कि Central Armed Police Forces personnel (CAPF) में सबसे ज्यादा आत्महत्या CRPF के जवान करते हैं. पिछले चार सालों में पूरे देश में CRPF में 137 आत्महत्या, ITBP में 12 आत्महत्या, SSB में 26 आत्महत्या, CISF में 50 आत्महत्या और AR में 32 आत्महत्या के मामले सामने आये हैं.
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देश बाँटने की नई-नई तरकीबें खोजने में माहिर है संघ परिवार- रामपुनियानी

देश बाँटने की नई-नई तरकीबें खोजने में माहिर है संघ परिवार

  ** रामपुनियानी

अक्टूबर के अन्तिम और नवंबर के प्रथम सप्ताह के बीच, दो परस्पर विरोधाभासी घटनाएं हुयीं। एक ओर भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की विशालकाय मूर्ति, जिसे स्टेच्यु आफ यूनिटी कहा जा रहा है, का गुजरात में शिलान्यास हुआ तो दूसरी ओर बिहार में भाजपा ने पटना बम धमाकों में मारे गये लोगों की अस्थिकलश यात्रा निकाली।
ये लोग मोदी की ‘हुंकार रैली’ में हुये धमाकों में मारे गये थे। जहाँ पटेल ने भारत को एक कर, उसे राष्ट्र का स्वरूप दिया, वहीं भाजपा ने अस्थिकलश यात्रा निकालकर भारत को बाँटने की कोशिश की। संघ परिवार देश को बाँटने की नई-नई तरकीबें खोजने में माहिर है। जाहिर है, ये सभी तरकीबें भारतीय संविधान में निहित बंधुत्व के मूल्य के विरूद्ध हैं।

मूल प्रश्न यह है कि भारत की एकता को हम किस रूप में देखें। भारत का एकीकरण शुरू हुआ अंग्रेज़ों के आने के बाद से। उसके पहले, उपमहाद्वीप ने आदिम सभ्यता से लेकर राजशाही तक की यात्रा पूरी कर ली थी। पशुपालक समाज का ढाँचा एकदम अलग था। गरीब किसान कमरतोड़ मेहनत कर अनाज उगाता था, जिसका बड़ा हिस्सा जमींदारों के जरिए राजाओं द्वारा हड़प लिया जाता था। निर्धन किसान जमींदारों के गुलाम भर थे। आज की युवा पीढ़ी, उस दौर की जिन्दगी की एक झलक, महान साहित्यकारों, विशेषकर मुंशी प्रेमचंद, के साहित्य में देख सकती है। अंग्रेजों ने इस देश को लूटने के लिये ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनायी। और इसके लिये उन्होंने सबसे पहले इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया। राजाओं, नवाबों और बादशाहों को धर्म के चश्मे से देखा जाने लगा। यहाँ तक कि इतिहास के जिस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्से पर मुस्लिम राजाओं का शासन था, उसे मुगलकाल का नाम दे दिया गया। मुस्लिम राजा यहीं जिये और यहीं मरे, जबकि अंग्रेजों ने लंदन से भारत पर शासन किया और देश को जमकर लूटा खसोटा। राजाओं के काल में राष्ट्र-राज्य की अवधारणा नहीं थी। ढेर सारे राजा और बादशाह थे, जो अनवरत एक दूसरे से युद्धरत रहते थे और तलवार के दम पर अपने-अपने राज्यों की सीमाओं को बढ़ाने की जुगत में लगे रहते थे।

देश को लूटने में उन्हें सुविधा हो, इसके लिये ही अंग्रेजों ने रेलवे, संचार माध्यमों और आधुनिक शिक्षा की नींव रखी। अंग्रेजों का असली इरादा चाहे जो भी रहा हो परन्तु रेलवे, संचार माध्यमों और आधुनिक शिक्षा के कारण देश, भौगोलिक दृष्टि से एक हुआ। आज हम भारत को जिस स्वरूप में देख रहे हैं उसका निर्माण, अंग्रेजों के राज में ही शुरू हुआ था। परन्तु अनवरत युद्धरत बादशाहों के देश से भारतीय राज्य बनने की प्रक्रिया को अन्य कारकों से भी बल मिला। अंग्रेजों की नीतियों ने देशवासियों में असंतोष को जन्म दिया और ब्रिटिश शासन प्रणाली ने इस असंतोष को स्वर देने के रास्ते भी खोले। राजशाही के दौर के विपरीत, साम्राज्यवादी दौर में उद्योगपतियों, श्रमिकों और नए उभरते वर्गों के कई संगठन अस्तित्व में आए। इस तरह के संगठन, देश में पहले कभी नहीं थे। इनमें से कुछ थे मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा व बाम्बे एसोसिएशन। उसी दौर में नारायण मेघाजी लोखण्डे औरसिंगार वेल्लू ने श्रमिकों को संगठित करना शुरू किया। ये संगठन धर्म पर आधारित नहीं थे। इनका आधार था पेशा या व्यवसाय। इन संगठनों के सदस्य देश के सभी क्षेत्रों और सभी धर्मों के हमपेशा लोग थे। अंग्रेजों द्वारा डाली गयी इस नींव पर ‘भारतीय पहचान’ ने आकार लेना शुरू किया और आगे चलकर, भौगोलिक एकता, भावनात्मक एकीकरण में बदल गयी।

इस एकीकरण को मजबूती दी साम्राज्यवाद-विरोधी व ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रीय आन्दोलन ने। राष्ट्रीय आन्दोलन में सभी धर्मों, क्षेत्रों व जातियों के नागरिकों, विभिन्न भाषा-भाषियों, महिलाओं व पुरूषों ने हिस्सेदारी की। और  शनैः शनैः भारतीय पहचान, हमारी मानसिकता और नागरिक जीवन का हिस्सा बन गयी। भारत को राष्ट्र में बदलने वाला यह आन्दोलन, दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन था, जिसकी नींव स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों पर रखी गयी थी-और यही मूल्य आगे चलकर भारतीय संविधान का हिस्सा बने। अतः हम कह सकते हैं कि ब्रिटिश शासन के विरोध में चले आन्दोलन ने देश को एक किया। इस एकता के पीछे थी धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण की परिकल्पना-एक ऐसे भारत के, जिसकी सांझा संस्कृति हो। हम स्वतन्त्र हुये परन्तु साथ में आई विभाजन की त्रासदी। इस प्रकार देश एक हुआ परन्तु कुछ काम अभी भी बाकी थे।

स्वतन्त्रता के बाद लगभग 650 राजे-रजवाड़ों को यह तय करना था कि वे भारत का हिस्सा बनें, पाकिस्तान का या फिर स्वतन्त्र रहें। इस मामले में सरदार पटेल ने भारत को एक करने में महती भूमिका निभाई। एक तरह से उन्होंने देश की एकता रूपी दीवार पर प्लास्टर किया। उन्होंने जिस राष्ट्रीय एकता को मजबूती दी, उसका चरित्र भावनात्मक, नागरिक और राष्ट्रीय था। इसमें सभी धर्मों के लोगों की हिस्सेदारी थी। और यही कारण था कि अपनी एकदम अलग पृष्ठभूमियों और भारतीय राष्ट्र के चरित्र के बारे मे अपने वैचारिक विभिन्नताओं के बावजूद, गांधी, नेहरू, पटेल व मौलाना आजाद एक टीम के रूप में काम कर सके। मोदी कुछ ऐसी टिप्पणियां करते रहे हैं जिनसे ऐसा ध्वनित होता है कि पटेल, मुसलमानों के साथ अलग तरह का व्यवहार करते। परन्तु उनकी यह सोच गलत है। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के महान नेताओं में इस विषय पर मतविभिन्नता नहीं थी। पटेल ने ही अल्पसंख्यकों को उनकी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार दिया था। पटेल के बारे में गांधी जी ने कहा था, ‘‘मैं सरदार को जानता हूँ…हिन्दू-मुस्लिम और कई अन्य मुद्दों पर उनकी सोच और तरीके, मेरे और पण्डित नेहरू से अलग हैं। परन्तु उन्हें मुस्लिम विरोधी बताना, सत्य की हत्या करना होगा।’’

समाज के विभिन्न तबकों के संगठनों के निर्माण से शुरू हुयी भावनात्मक और नागरिक एकीकरण की प्रक्रिया को आजादी के आन्दोलन ने मजबूती दी और इसकी अन्तिम परिणति थी भारत में राजे-रजवाड़ों का विलय। उस समय भी एक छोटा-सा तबका समाज को बाँटने की साजिशें रचता रहता था। देश को बाँटने की शुरूआत हुयी मुस्लिम लीग व हिन्दू महासभा-आरएसएस के धार्मिक राष्ट्रवाद से। देश को बाँटने वालों में शामिल थे जमींदार और नवाब और इनका नेतृत्व कर रहे थे ढाका के नवाब और काशी  के राजा। बाद में शिक्षित मध्यम वर्ग के कुछ लोग भी इनके साथ हो लिये। इनमें शामिल थे जिन्ना, सावरकर व आरएसएस के संस्थापक। जहाँ गांधी और राष्ट्रीय आन्दोलन लोगों को एक कर रहे थे वहीं साम्प्रदायिक संगठन एक-दूसरे के खिलाफ नफरत फैला रहे थे। इसी नफरत से उपजी साम्प्रदायिक हिंसा, जिसके कारण कलकत्ता और नोआखली जैसे स्थानों पर भयावह खून खराबा हुआ। वे गांधी ही थे जो राजकाज को नेहरू और पटेल के हवाले कर, साम्प्रदायिकता की आग बुझाने के लिये अकेले ही निकल पड़े थे।

स्वाधीनता के बाद, कुछ वर्षों तक साम्प्रदायिकता का दानव सुप्तावस्था में रहा। सन् 1961 में उसने अपना सिर फिर उठाया और जबलपुर में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ में है ‘दूसरे’ के प्रति घृणा, जिसे संघ की शाखाओं, स्कूली पाठ्यपुस्तकों और मुँहजबानी प्रचार के जरिए हवा दी जाती है। इससे एक सामूहिक सामाजिक सोच उपजती है, जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति नकारात्मकता का भाव निहित होता है। दंगे शुरू करवाने के लिये कई तरीके विकसित कर लिये गये हैं। कभी मस्जिद में सुअर का मांस फेंक दिया जाता है तो कभी मंदिर में गौमांस; कभी गौहत्या की अफवाह फैलाई जाती है तो कभी मस्जिदों के सामने बैंड बजाये जाते हैं। ‘हमारी’ महिलाओं  के साथ दुर्व्यवहार की अफवाह, दंगें भड़काने के अचूक तरीकों में से एक है।

अब एक नया तरीका भी सामने आ रहा है। बाबरी मस्जिद पर अक्टूबर 1990 में कारसेवकों के हमले को रोकने के लिये पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई कारसेवक मारे गये। विहिप ने इन कारसेवकों की अस्थिकलश यात्रा निकाली और यह यात्रा जहाँ जहाँ से गुजरी, वहां-वहाँ खून खराबा हुआ। गोधरा में ट्रेन में आग लगने की घटना के बाद भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। कारसेवकों के शव विहिप को सौंप दिये गये, जिसने उनका जुलूस निकाला। इस जुलूस से समाज में उन्माद भड़क उठा। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। आज भी हमारा समाज धार्मिक आधार पर बँटा हुआ है। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई है। गुजरात जैसे कुछ प्रदेशों में यह खाई बहुत चौड़ी  और बहुत गहरी है।

अब हम कंधमाल की बात करें। स्वामी लक्ष्मणानंद मारे गये। इस बात से किसी को मतलब नहीं था कि उन्हें किसने मारा। विहिप ने उनके मृत शरीर का जुलूस निकाला। उसके बाद ईसाईयों के खिलाफ हिंसा शुरू हो गयी। ठीक यही तकनीक पटना बम धमाकों के बाद इस्तेमाल में लाई गयी। वहाँ अस्थिकलश यात्रा निकाली गयी जो अलग-अलग रास्तों से निकली। क्या इसका उद्देश्य उन गरीब, निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि देना था, जो बम धमाकों के शिकार बने? यदि ऐसा था तो फिर धमाकों में लोगों की मौत के बाद भी रैली जारी क्यों रही? उसे श्रद्धांजलि सभा में परिवर्तित क्यों नहीं किया गया? सच यह है कि इस नाटक का उद्देश्य समाज को धर्म के आधार पर बाँटना था। सरदार पटेल ने देश को एक किया। भाजपा और उसके साथी देश को बाँट रहे हैं। यहां संघ परिवार का दोगलापन एकदम साफ नजर आता है। वे सरदार की स्मृति को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं। सरदार ने केवल राजे-रजवाडों का देश में विलय कराकर, देश को एक नहीं किया था। उन्होंने उस स्वाधीनता आन्दोलन में असरदार भूमिका अदा की थी जो देश को एक करने वाला आन्दोलन था। केवल राजे-रजवाड़ों को देश में मिला देने से देश एक नहीं हो जाता। वह तो देश के एकीकरण की प्रक्रिया का अन्तिम चरण था। दूसरी ओर, पटेल के तथाकथित भक्त, अस्थिकलश यात्रा निकालकर समाज और देश को बाँट रहे हैं। क्या हमारे राजनेता, सत्ता की अपनी लिप्सा को पूरा करने के लिये कुछ भी कर सकते हैं?

 (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

Friday, October 28, 2016

माओवाद पर छत्तीसगढ़ को फिर फटकार

माओवाद पर छत्तीसगढ़ को फिर फटकार

Saturday, October 29, 2016
सीजी खबर
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भारतीय सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली | संवाददाता: सुप्रीम कोर्ट ने माओवाद पर नये समाधान पेश करने के लिये कहा है. छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया कि नंदिनी सुंदर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को बस्तर से दूर रहे का निर्देश पारित करें. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह कोई समाधान नहीं है. वे चाहेंगे कि आप वहां से दूर रहे. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आतंकवाद और विद्रोह में मौत के मामले में आईएस और नाइजीरिया के बोको हरम के बाद भारत तीसरे स्थान पर है.
सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दावा किया कि नक्सल प्रभावित इस राज्य में आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर से भी ज्यादा मौतें हुई हैं. साथ ही उसने कहा कि इन क्षेत्रों में चरमपंथी वाम कार्यकर्ताओं की गतिविधियां आग में घी का काम करती हैं.
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और आदर्श कुमार गोयल की पीठ को बताया कि “आज जम्मू-कश्मीर से ज्यादा सुरक्षा बल छत्तीसगढ़ में तैनात है. बड़ी तादाद में यहां पुलिस के जवान नक्सली हिंसा में मारे जा रहे हैं. हम नक्सली समस्या को सुलझाने के लिए कदम उठा रहे हैं.”
उन्होंने कहा कि वहां काफी ढांचागत काम किया है और एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं. तुषार मेहता ने कहा कि आतंकवाद और आतंक से संबंधित मौतों में आईएस और बोको हरम के बाद भारत तीसरे स्थान पर है.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि नंदिनी सुंदर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को इन इलाकों से दूर रहने का निर्देश पारित करें. उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोग केवल यही चाहते हैं कि आग सुलगती रहे.

||….सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि नंदिनी सुंदर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को इन इलाकों से दूर रहने का निर्देश पारित करें. इस पर कोर्ट ने कहा कि यह कोई समाधान नहीं है. वे चाहेंगे कि आप इन इलाकों से दूर रहें.||

इस पर कोर्ट ने कहा कि यह कोई समाधान नहीं है. वे (कार्यकर्ता) चाहेंगे कि आप (राज्य) इन इलाकों से दूर रहें. छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से अदालत में पेश मेहता ने इस पर कहा कि हम इन इलाकों से बाहर नहीं जा सकते. यह एक राज्य है और सरकार को लोगों की देखरेख करनी पड़ेगी. जनता के प्रति हमारी जिम्मेदारियां हैं.
मेहता ने कहा कि आग सुलगाये रखना कोई समाधान नहीं है. एक सीडी है, जिसमें उन्हें ‘लाल सलाम’ के नारे लगाते हुए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए देखा जा सकता है. इससे समस्या समाप्त नहीं होगी. सभी लोग शांति चाहते हैं. पीठ ने सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को कुछ नये समाधान के साथ आने को कहा ताकि समस्या का हल निकल सके.