Wednesday, September 30, 2015

बस्तर के युवा पत्रकार संतोष यादव को तत्काल रिहा करो - पीयूसीएल

बस्तर के युवा पत्रकार संतोष यादव को तत्काल रिहा करो - पीयूसीएल 

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ प्रेस को पेशेवर स्वंत्रतता, दबावों से मुक्ति
और निहित स्वार्थों के हमले से सुरक्षा दो

छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन, बस्तर जिला, दरभा विकासखंड के निवासी –
युवा पत्रकार श्री संतोष यादव के, 28 सितम्बर शाम 5.30 बजे पुलिस वालों
द्वारा अपने साथ ले जाने के बाद से, लापता होने पर गंभीर चिंता व्यक्त
करता है, और उनकी तत्काल रिहाई की मांग करता है.
संतोष यादव दरभा क्षेत्र में कई वर्षों से ईमानदारी से आंचलिक पत्रकारिता
करते आ रहे हैं. वे दैनिक नवभारत व दैनिक पत्रिका की एजेंसी लेकर ग्रामीण
रिपोर्टिंग करते हुए जीवन यापन करते हैं. वे अपनी पत्नी और दो छोटे
बच्चों के साथ दरभा में रहते हैं.

उनकी प्रताड़ना की शुरुआत जीरम घाटी कांड के पश्चात प्रारंभ हुई. इस घटना
में महेंद्र कर्मा सहित कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की माओवादियों
द्वारा हत्या की गयी थी. संतोष जी स्थानीय पत्रकार होने के नाते घटना
स्थल पर पहुँचने वाले पहले पत्रकारों में से थे और उनकी निष्पक्ष
रिपोर्टिंग से स्थानीय पुलिस काफी नाराज़ थी.

2014 के मध्य में एक बार पुलिस उनके घर पर आधी रात को आई और उन्हें एक रेस्टहाउस में ले गई जहा उनसे पूछताछ की गयी और डराया धमकाया गया. पुलिस  का आदेश था कि वे 5 लाख रूपये लेकर अपने क्षेत्र से नक्सलियों को   पकड़वाकर  लाये. उन्होंने कहा कि उनका जो संपर्क है ग्रामीणों से है, और वह यह नहीं कर सकते. शायद उसी कारण 27 अगस्त 2014 को उनपर महिलाप्रताड़ना का फर्जी  प्रकरण दायर किया गया.

24 जून 2015 को संतोष यादव को फिर स्थानीय थाने पर बुलाया गया जहा उन्हें  बताया गया कि उनकी गिरफ़्तारी के लिए वारंट ज़ारी किया गया है. पुलिस ने  लॉकअप में ले जाकर, कपडे उतरवाकर मारने की तैय्यारी की. केवल उनके
पत्रकार होने और घटना के उजागर होने के डर से उन्हें छोड़ा गया. लगातार
उन्हें डर के साए में जीना पड़ रहा है.

इस प्रकार के प्रताड़ना के बावजूद संतोष यादव निरंतर ग्रामीणों की
समस्याओं के बारे में काफी लिखते आ रहे हैं और ग्रामीणों के बीच में वे
काफी लोकप्रिय हैं. पिछले कुछ दिनों से दरभा ब्लाक के ग्राम भदरीमहू में
लगातार सर्चिंग-कॉम्बिंग ऑपरेशन चल रहे हैं. 9-10 ग्रामीणों को नक्सली
आरोपों में गिरफ्तार किया गया है, जिनके बारे में गाँव वालों का कहना था
कि ये साधारण ग्रामीण हैं. संतोषजी यथा संभव ग्रामीणों की बातों की
रिपोर्टिंग कर रहे थे.

29 सितम्बर के स्थानीय अखबारों में यह छपा है कि 28 सितम्बर को भदरीमहू
के 150-200 ग्रामीणों ने दरभा थाने पर जाकर नक्सलियों से सुरक्षा की मांग
की है. फोटो में स्थानीय पुलिस के साथ स्वयं आईजी कल्लूरी की तस्वीर है.
परन्तु संतोष यादव की पत्नी पूनम यादव ने बताया कि 28 सितम्बर को दोपहर
बाद से कुछ पुलिस जवान घर आये और ‘कल्लूरी साहब बुला रहे है’ बोल कर
संतोष यादव को अपने साथ ले गए | जब रात 9 बजे तक भी संतोषजी नही लौटे तो  उनके मित्र दरभा थाने में पता करने गये. पुलिस वालो ने उनके साथ
दुर्व्यवहार किया और संतोष के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की बात
कही, किन्तु थानेदार दुर्गेश शर्मा ने उन्हें जगदलपुर जा कर पता करने के
लिए कहा | पूनम यादव के अनुसार जगदलपुर पुलिस ने भी अगले दिन संपर्क करने  पर संतोष के बारे में किसी प्रकार की जानकारी से इंकार कर दिया |
इस सम्बन्ध में जब एक अन्य पत्रकार ने जिला पुलिस अधीक्षक अजय यादव से
बात की, तो उन्होंने पहले तो किसी संतोष यादव के पकडे जाने से इंकार कर
दिया, पर बाद में उन्होंने स्वीकार किया की दरभा से कुछ लोगो को पूछताछ
के लिये हिरासत में लिया गया है, जिन्हें बाद में छोड़ दिया जायेगा |

इस सम्बन्ध में नवभारत के जगदलपुर ब्यूरो चीफ से संपर्क नही हो पाया, किन्तु  पत्रिका के प्रमुख जिनेश जैन ने स्पष्ट कहा कि छोटे-मोटे जगहों में वे
कोई पत्रकार नही केवल एजेंट रखते है, और यदि वे किसी पुलिस प्रकरण में
फसे तो हम उनसे संस्थान का सम्बन्ध अलग कर लेते है |

दूसरी ओर, विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 28 सितम्बर की
शाम 7 बजे से संतोष यादव व ग्राम भदरी महू के कुछ लोगो को जगदलपुर के
निकट परपा थाने में रखा गया है, और रात में इनके साथ कई घंटो तक पूछताछ
और दुर्व्यवहार की गई है| कहा जा रहा है कि संतोष यादव की हालत चिंताजनक
है|

बस्तर के स्थानीय पत्रकारों की स्थिति बेहद असुरक्षित है, उन्हें वे तमाम
सुविधाएं और सुरक्षा प्राप्त नहीं होते जो राष्ट्रिय पत्रिकाओं के
पत्रकारों को मिलते हैं, जबकि वास्तव में उन राष्ट्रिय मीडिया की
रिपोर्ट्स स्थानीय पत्रकारों के मदद के बिना असंभव है. स्थानीय पत्रकार
अपने स्रोतों की गोपनीयता बरक़रार नहीं रख पाते और अक्सर पुलिस विभाग के
विज्ञप्तियों पर ही निर्भर रहते हैं. स्वतंत्र रिपोर्टिंग करने पर फर्जी
मुकदमों का खतरा बना ही रहता है. इसके बावजूद सारकेगुडा जैसे मामलों को
सभी पत्रकारों ने बहुत बहादुरी से उजागर किया था.

छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर निरंतर हमले, मानवअधिकार का एक गंभीर हनन है.
आज भी सुशील पाठक हत्याकांड के जांच की मोनिटरिंग उच्च न्यायलय द्वारा की  जा रही है. छुरा, गरियाबंद के पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या के मामले में
उच्च न्यायलय ने सीबीआई जांच का निर्देश दिया. हाल में पत्रकार दिलीप
मेनन, जिन्होंने जेके लक्ष्मी सीमेंट के अपराधों को उजागर किया था, को
उच्च न्यायलय से सुरक्षा देने का निर्देश दिया गया.

लोकतंत्र के लिए निर्भीक और निष्पक्ष प्रेस एक बुनियादी ज़रूरत है. यह बात
कनफ्लिक्ट एरिया में और भी अधिक सच है. हम छत्तीसगढ़ में, विशेषकर बस्तर
में, कार्य कर रहे पत्रकारों की पेशेवर स्वतंत्रता और सुरक्षा की मांग
करते हैं ताकि वे हर प्रकार के दबावों से मुक्त होकर नागरिकों को सही
जानकारी दे सके.

24 घंटे पश्चात भी, पत्रकार श्री संतोष यादव को हिरासत में रखा गया है,
हम मांग करते हैं कि उन्हें तत्काल रिहा किया जाये.


डॉ लाखन सिंह                                                            
अध्यक्ष                                                                         सुधा भारद्वाज          

                                                                                    महासचिव

आखिर संतोष यादव को कल्लूरी उठा ले ही गया ..

आखिर संतोष यादव को कल्लूरी उठा ले ही गया .. 

[ कमल शुक्ल ]

संतोष यादव दरभा क्षेत्र में वर्षों से ईमानदारी से आंचलिक पत्रकारिता कर रहा है , जैसे कि पुरे देश में आंचलिक पत्रकार किसी अखबार का एजेंसी लेकर ग्रामीण रिपोर्टिंग कर पत्रकारिता करते हैं वैसे ही संतोष भी दैनिक नवभारत व दैनिक पत्रिका की एजेंसी लेकर जीवन यापन कर रहा था | पिछले एक साल से अधिक समय से दरभा पुलिस उसे थाने में कई बार बुला कर नक्सलियों के बारे में सूचना मांगने और मुखबिरी करने के लिए बाध्य कर रही थी | सात या आठ माह पहले भी उसे मुखबिरी के लिए बाध्य करने अन्यथा नक्सली मामले में फसा देने की धमकी दी गई थी | पुलिस द्वारा बार बार परेशान करने के कारण उसने तब बस्तर में निर्दोष लोगो को पुलिस मामले में फ़साने के खिलाफ काम कर रही समाज सेवी संस्था “लीगल एड’’ से संपर्क किया था | तब “लीगल एड’’ के अधिवाक्ताओं ने उसके पक्ष में कुछ क़ानूनी कार्यवाही भी की थी | 

इस सम्बन्ध में पत्रकार संतोष यादव ने पहले भी मुझे जानकारी दी थी | संतोष की पहली गलती यह थी कि दरभा का ही रहने वाला होने के कारण बहुचर्चित " दरभा घाटी काण्ड " के समय वह अपने प्रेस से मिले आदेश के परिपालन में सबसे पहले घटना स्थल पहुँच गया था | पीयूसीएल के बुलेटीन के अनुसार इसी साल अगस्त माह में उसे कल्लूरी ने पांच लाख रूपये का लालच देकर कुछ फर्जी नक्सलियों के बारे में बयान देने और जानकारी देने को कहा था | संतोष ने बताया था कि उसे नक्सलियों के खिलाफ पुलिस मुखबिर बनने को लेकर किये जा रहे जबरदस्ती को लेकर अपनी जान जाने का ख़तरा था | अभी अभी दरभा से संतोष यादव की पत्नी पूनम यादव ने बताया की कल दोपहर बाद कुछ पुलिस जवान घर आये और ‘कल्लूरी’ साहब बुला रहे है बोल कर अपने साथ ले गए | चूँकि कल्लूरी नाम का कोई पुलिस वाला साहब पहले ही उसे उलाती ही रहता था , इसलिए उसने गम्हिर्ता से नही लिया | उस समय संतोष दरभा में ही ग्राम बाडरी महू से सैकड़ो की संख्या में पुलिस सुरक्षा मांगने आये ग्रामीणों की खबर बनाने और उसे पत्रिका और नवभारत को भेजने की तैयारी कर रहा था | ज्ञात ही कि कल 28 सितम्बर को पुलिस विभाग ने इन ग्रामीणों के स्वागत और सत्कार के लिए बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया था, जैसे कि पूर्व में कई अनेक स्थानों पर हो चुका है | 

संतोष यादव के मित्रो और पत्नी पूनम यादव ने बताया कि रात 9 बजे तक जब संतोष नही लौटा तो वे थाने में पता करने गये तो पुलिस वालो ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और संतोष के बारे में कोई जानकारी होने की बात कही, किन्तु थानेदार दुर्गेश शर्मा ने उन्हें जगदलपुर जा कर पता करने के लिए कहा | पूनम के अनुसार जगदलपुर पुलिस ने भी आज दोपहर में संपर्क करने पर संतोष के बारे में किसी प्रकार के जानकारी से इंकार कर दिया | इस सम्बन्ध में मैने जिला पुलिस अधीक्षक अजय यादव( ९४२५२६६८६६ ) से बात किया तो उन्होंने पहले तो किसी संतोष यादव के पकडे जाने से ही इंकार कर दिया, पर बाद में उन्होंने स्वीकार किया की दरभा से कुछ लोगो को पूछताछ के लिये हिरासत में लिया गया है, जिन्हें बाद में छोड़ दिया जायेगा | इस सम्बन्ध में नवभारत के जगदलपुर के ब्यूरो चीफ से संपर्क नही हो पाया किन्तु पत्रिका के प्रमुख जिनेश जैन(9993599969) से बात हुई तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि छोटे-मोटे जगहों में वे कोई पत्रकार नही केवल एजेंट रखते है और यदि वे किसी पुलिस प्रकरण में फसे तो हम उनसे संस्थान का सम्बन्ध अलग कर लेते है, यह पत्रिका का पूरे देश में नीति है | 

इस सम्बन्ध में विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 28 सितम्बर की शाम 7 बजे से संतोष यादव व ग्राम बाडरी महू के कुछ लोगो को जगदलपुर के निकट परपा थाने में रखा गया है, और रात में इनके साथ कई घंटो तक ‘कल्लू मामा स्टाइल’ में पूछ ताछ की गई है | पता तो यह भी चला है कि संतोष यादव कि हालत चिंताजनक है | 

'मोदी से मिले हैं तो हाथ साफ़ कर लीजिए'; गुजरात का खून हुई इनके हाथो में

'मोदी से मिले हैं तो हाथ साफ़ कर लीजिए'; गुजरात का खून हुई इनके हाथो में 

  • 29 सितंबर 2015
साझा कीजिए
नरेंद्र मोदी, मार्क ज़करबर्गImage copyrightAFP
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात के बाद फ़ेसबुक प्रमुख मार्क ज़करबर्ग को बड़ी संख्या में सैनेटाइज़र की बोतलें भेजी गई हैं.
एक एक्टिविस्ट ग्रुप अलायंस फ़ॉर जस्टिस एंड अकाउंटबिलटी ने ज़करबर्ग को अपने हाथ साफ़ करने की सलाह देते हुए ये सैनेटाइज़र की बोतलें भेजी हैं.
ग्रुप ने एक वेबसाइट भी लॉन्च की जिसका नाम है "ज़क, वॉश योर हैंड्स!"
इस एक्टविस्ट ग्रुप का आरोप है कि मोदी, 2002 के गुजरात दंगे रोकने में नाकाम रहे थे और इस तरह से वो दंगों पीड़ितों की मौत के ज़िम्मेदार हैं.
ग्रुप के मुताबिक़, "गुजरात दंगों के लिए ज़िम्मेदार शख़्स से हाथ मिलाकर अब ज़करबर्ग को अपने हाथ साफ़ करने चाहिए."
सैनेटाइज़र की हर बोतल में गुजरात दंगों के एक-एक पीड़ित का नाम लिखा है.

सोशल पर चर्चा

नरेंद्र मोदी, मार्क ज़करबर्गImage copyrightAFP
सोशल मीडिया पर इसकी काफ़ी चर्चा हो रही है.
@DocVatsa ने लिखा, "सैनेटाइज़र गूगल को भी भेजा जाना चाहिए क्योंकि मोदी उनके दफ़्तर भी गए थे."
@vinaydokani ने लिखा, "सांप्रदायिकता के चेहरे पर एक करारा तमाचा है ये मुहिम."
@MECHASHISH, लिखते हैं, "मोदी जी, तू जहां-जहां चलेगा, गोधरा का साया साथ होगा."
(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें

लाउडस्पीकर से घोषणा हुई कुछ लोग गोमांस खा रहे हैं'

'लाउडस्पीकर से घोषणा हुई कुछ लोग गोमांस खा रहे हैं'

  • 5 घंटे पहले
साझा कीजिए
अख़लाक़ अहमद Image copyrightHindustan Times
दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के दादरी इलाक़े में बीफ़ खाने के शक में एक व्यक्ति की हत्या के मामले में एक चश्मदीद ने कहा है कि इसके लिए मंदिर में पहले घोषणा की गई थी.
घटनास्थल पर पहुंचे बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने पीड़ित के परिजनों के अलावा इस चश्मदीद से बात की.
मारे जाने वाले अख़लाक़ के परिचित पंकज कुमार ने पूरी घटना की जानकारी देते हुए कहा, ''मैंने मंदिर के लाउडस्पीकर से ऐलान करते हुए सुना कि एक घर में कुछ लोग गोमांस खा रहे हैं. मेरा घर मंदिर से सटा हुआ है. लेकिन जब तक मैं बाहर आया मुझे पता चला कि भीड़ ने अख़लाक़ के घर पर हमला कर दिया है.''
उधर अख़लाक़ की मां असग़री का कहना है कि हर तरफ़ से लोग आ रहे थे.

'सुनने को तैयार नहीं'

Image captionअख़लाक़ अहमद का परिवार सदमे में हैं.
असग़री का कहना था, ''वो भारी संख्या में थे. हमने उन लोगों से कहा कि हमारे पास बीफ़ नहीं है. फ़्रिज में बकरे का गोश्त रखा है. लेकिन वे सुनने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने हम लोगों को बाहर निकाला और हम सभी पर हमला कर दिया.''
अख़लाफ़ के चचेरे भाई शहाबुद्दीन ने कहा कि भीड़ में ऐसे कई लोग थे जिन्हें परिवार पहचानता है.
शहाबु्द्दीन कहते हैं, ''उनमें से कई पास में ही रहते हैं. अब हम भला किसी पर कैसे विश्वास करेंगे.''
दादरी इलाक़े में बीफ़ खाने के संदेह में 50 वर्षीय अख़लाक़ अहमद की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई, जबकि उनका बेटा अस्पताल में भर्ती है.

घायल है बेटा

नोएडा पुलिस के प्रवक्ता के मुताबिक़ बिसराड़ा गाँव में ऐसी अफ़वाह फैल गई थी कि कुछ लोग गोमांस खा रहे हैं.
इसके बाद उत्तेजित भीड़ ने अख़लाक़ अहमद के घर पर धावा बोल दिया.
Image copyrightHindustan Times
इस हमले में अख़लाक़ अहमद की मौक़े पर ही मौत हो गई, जबकि उनके 22 वर्षीय बेटे को घायल हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
पुलिस ने इस मामले में 10 लोगों के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज किया है. इनमें से छह लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमेंफ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं

लाशों को कहां छुपायेंगे?--संजय पराते

लाशों को कहां छुपायेंगे?

Friday, September 25, 2015
संजय पराते
A A

फांसी







आकड़ों की बाजीगरी की आड़ में किसानों की लाशों को छुपाया नहीं जा सकता है. किसान अकाल से तंग आकर आत्महत्या कर रहें हैं उधर फर्जी मस्टर रोल के आधार पर मनरेगा में रोजगार देने के दावे किये जा रहें हैं. वर्णमाला में ‘अ’ से ‘आ’ तक की जितनी दूरी होती है, ‘अकाल’ से ‘आत्महत्या’ तक उतनी दूरी भी नहीं होती. कारण बहुत ही स्पष्ट है कि एक औसत भारतीय किसान बोता तो ‘क़र्ज़’ है, लेकिन ‘अकाल’ पड़ने पर उसे ‘आत्महत्या’ की फसल काटने को मजबूर होना पड़ता है. छत्तीसगढ़ के किसानों पर यह बात और ज्यादा तल्खी से लागू होती है, चाहे सरकार के आदेश-निर्देश पर राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो किसान आत्महत्याओं के आंकड़ों को कितना भी छुपाने कि कोशिश क्यों न करें.
वास्तव में ये आत्महत्याएं तो उन सरकारी नीतियों की ही ‘उपज’ है, जिसके चलते अकाल की भयावहता और ज्यादा गहरी हो जाती है. छत्तीसगढ़ में पिछले दो महीनों में हुई भुखमरी और आत्महत्याओं की घटनाएं इसी सच्चाई को बयां भी करती है. क्या यह कोई कम शर्म की बात है कि सरकारी खजाने में मनरेगा के 3,272 करोड़ रूपये पड़े रहे और इस वित्तीय वर्ष के पहले तीन महीनों अप्रैल-जून में केवल 1.86 लाख मानव दिवस रोजगार ही पैदा किये जाएं, काम के अभाव में लोग गांवों से पलायन करें तथा भूख से मर जाएं. इस पर भी क्या हमको शर्म नहीं आनी चाहिए कि शून्य प्रतिशत ब्याज दरों पर फसल ऋण वितरण का हम ढिंढोरा तो पीटते हैं , लेकिन आर्थिक तंगी और क़र्ज़ से बेहाल किसान फांसी के फंदे पर झूलकर या ट्रेन के सामने कूदकर अपनी आत्माहूति दें. क्या इस पर भी हमें शर्म नहीं आनी चाहिए कि ‘ये तेरा क्षेत्र – ये मेरा क्षेत्र’ की तर्ज़ पर पीड़ित परिवारों को राहत पहुँचाने के मामले में भी हम भेदभाव करें.
यदि ऐसा ही है, तो ऐसा गंभीर कृषि संकट प्रकृति से ज्यादा मानवनिर्मित ही माना जायेगा– लेकिन ये वे ‘मानव’ है, जो ‘महामानव’ बनकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं. यह सत्ता ही तय करती है कि हमारे बजट का कितना हिस्सा कृषि तक पहुंचे और आंकड़े दिखाते हैं कि पिछले 25 सालों में हमारे देश के 70 फीसदी किसानों के लिए कुल बजट का केवल 0.1 फीसदी (जी हां, शून्य दशमलव एक प्रतिशत) ही दिया गया. तो सिंचाई की योजनाएं तो बनी, लेकिन नहरों-बांधों को कागजों पर ही खुदना था. मनरेगा में नए तालाब निर्माण व् पुरानों के गहरीकरण कि योजना तो बनी, लेकिन फर्जी मस्टर रोलों के लिए ही. किसानों को क़र्ज़ तो मिला, लेकिन महाजनों द्वारा उसकी केवल फसल लूटने के लिए ही. तो इस लुटे-पिटे किसान के पास, जिसके पास ईज्जत से जीने का कोई सहारा न हो, ‘आत्महत्या’ के सिवा कोई चारा बचता है? उसकी इस अंतिम कोशिश को भी सत्ता के मदांध, प्रेम-प्रसंगों या नपुंसकता से जोड़ दें, तो अलग बात है. ‘नैतिकता के ठेकेदारों’ को किसानों को देने के लिए इससे ज्यादा और कुछ हो भी नहीं सकता. उनकी ‘नैतिकता’ का तकाजा यही है कि किसानों के उपजाए अन्न के एक-एक दाने पर पहरा बैठा दे और उसे अनाज मगरमच्छों के हवाले कर दें !!
उन खेत मजदूरों को भी गणना में ले लिया जाएँ, जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा नहीं हैं और पेट पालने के लिए ऊंचे किराए पर ली गई जमीन ही जिनका आसरा है या वे आदिवासी, जो वन भूमि पर निर्भर है, इस प्रदेश में खेती करने वाले परिवारों की संख्या 40 लाख से ज्यादा बैठेगी. पिछले 15 सालों से इस प्रदेश में 15,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं– और इनमें वे दुर्भाग्यशाली आत्महंतक शामिल नहीं हैं, जिनके पास किसान होने का कोई सरकारी सर्टिफिकेट नहीं था. एनसीआरबी के आंकड़ों के चीख-चीखकर यह कहने के बावजूद सरकार इसे मानने के लिए तैयार नहीं थी. लेकिन एनसीआरबी के ये आंकड़ें अचानक ‘शून्य’ पर पहुंच जाते हैं, जिसे यह सरकार बड़े पैमाने पर प्रचारित करती है. लेकिन एनसीआरबी के पास इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं हैं कि आत्महत्याओं के संबंध में ‘अन्य’ (स्वरोजगार) श्रेणी के आंकड़ों में जबरदस्त वृद्धि कैसे हो गई? आप आंकड़ों को तो छुपा सकते हैं, लेकिन लाशों को कहां छुपायेंगे?
लेकिन आंकड़े भी चीख-चीखकर कह रहे हैं कि जीडीपी में वृद्धि और विकास के दावों के बावजूद किसान के हाथों केवल क़र्ज़ ही आया है. इन 40 लाख से ज्यादा किसान परिवारों में से बैंकों के कर्जों तक पहुंच 10 लाख किसानों की भी नहीं हैं. बचे हुए 30 लाख किसान भी खेती करते हैं, वे भी क़र्ज़ लेते हैं. लेकिन किससे? महाजनों से. किस दर पर? 5 फीसदी प्रति माह — यानि 60 फीसदी सालाना की दर पर. है कोई ऐसा व्यवसाय, जो भूखों-नंगों को निचोड़कर इतना मुनाफा दें? लेकिन इस महाजनी कर्जे के बोझ से किसानों को मुक्त करने के बारे में हमारे कर्णधार चुप हैं. सभी जानते हैं कि इन कर्णधारों के इन सामंती महाजनों से क्या रिश्ते है !! तो यह चुप्पी भी स्वाभाविक हैं.
तो हमारे छत्तीसगढ़ के 28 लाख किसान परिवार महाजनी कर्जे में फंसे हैं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के 70 वें चक्र के आंकड़े कह रहे हैं कि उनकी औसत कर्जदारी 10,000 रुपयों की हैं. इस कर्जदारी पर वे सालाना 6,000 रूपये का ब्याज ही पटा रहे हैं — यानि एक क़र्ज़ छूटता नहीं कि दूसरा सर पर. ‘क़र्ज़ के मकडजाल’ में फंसे इन किसान परिवारों की प्रति माह औसत आमदनी केवल 3,423 रूपये है. एनएसएसओ का सर्वे भी यही बताता है. हाल का सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण बता रहा है कि प्रदेश के 75 फीसदी से ज्यादा किसान परिवारों की मासिक आय 5,000 रूपये से कम है, जबकि देश में किसान परिवारों की औसत आय का 40 फीसदी हिस्सा तो केवल क़र्ज़ चुकाने में चला जाता है. फिर किसानी घाटे का सौदा नहीं, तो और क्या होगी?
यह हमारे कर्णधारों की असफलता ही है कि वे हमारे अन्नदाताओं को पेट में पत्थर बांधकर सोने को मजबूर कर रहे हैं. वे सो भी रहे हैं. लेकिन यदि एक साल फसल बर्बाद हो जाए, तो गले में फंदा डालने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता.
क़र्ज़ के इस दुष्चक्र पर प्रसिद्द पत्रकार पी. साईनाथ ने एक पुस्तक लिखी है– .Everyone loves a good drought. अकाल की आड़ में चांदी काटने वालों को एक अच्छे अकाल का इंतजार है, इसके लिए भले ही किसानों को आत्महत्या क्यों न करनी पड़ें!! एक अच्छा अकाल कुछ लोगों के सुनहरे भविष्य के लिए बहुत ज़रूरी है — हमारे कर्णधारों के भविष्य के लिए भी!!

हर तीसरे दिन एक टोनही प्रताड़ना ; छत्तीसगढ़

हर तीसरे दिन एक टोनही प्रताड़ना ; छत्तीसगढ़ 

Tuesday, September 29, 2015
A A

छत्तीसगढ़-डायन
रायपुर | समाचार डेस्क: छत्तीसगढ़ में औसतन हर तीसरे दिन एक महिला को टोनही कहकर प्रताड़ित किया जाता है. छत्तीसगढ़ में वर्ष 2005 से जून 2015 तक टोनही प्रताड़ना के 1,268 मामले सामने आए हैं. इसमें से 332 मामले अब भी विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं. 10 साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद मामलों का निराकरण नहीं होने की वजह से प्रताड़ित महिलाएं बहिष्कृत जीवन जीने को विवश हैं.
अंधश्रद्धा निर्मलून समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलकर टोनही प्रताड़ना के मामलों के त्वरित निपटान की मांग की. उन्होंने प्रताड़ित महिलाओं को मुआवजा व पुनर्वास के लिए योजना बनाए जाने पर मुख्यमंत्री से चर्चा की.
डॉ. मिश्र ने कहा कि प्रदेश में 2005 से जून 2015 तक टोनही प्रताड़ना के 1,268 मामले सामने आए हैं. इनमें से 332 मामले अभी भी विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं. ये मामले लगभग 10 वर्षो से भी अधिक समय से लंबित हैं, जिस कारण न प्रताड़ित महिलाओं को न मुआवजा मिल पाया है और न ही उनका पुनर्वास हो पाया है और न ही कोई अन्य मदद मिल पाई है. इस वजह से वे गांवों में बहिष्कृत जीवन जीने को मजबूर हैं.
डॉ. दिनेश मिश्र ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया कि टोनही प्रताड़ना के कारण ग्रामीण अंचल में गरीब, निराश्रित, विधवा महिलाओं को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. जादू-टोने के संदेह में प्रताड़ित महिलाओं के हित व जीवन-यापन के लिए छह बिंदुओं पर उन्होंने ध्यान आकर्षित किया है.
डॉ. मिश्र का कहना है कि टोनही प्रताड़ना के प्रकरणों में राज्य के विशेष कानून के अनुसार कार्रवाई हो, पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए आर्थिक मदद दी जाए. उन्होंने कहा कि राज्य शासन द्वारा आसानी से पीड़ित महिलाओं तथा लंबित प्रकरणों की सूची तैयार कराई जा सकती है, जिसके अनुसार प्रताड़ित महिलाओं को कम से कम 25 हजार रुपये उनके जीवनयापन व पुनर्वास के लिए दिए जा सकते हैं.
उन्होंने मांग की कि आरोपियों को सजा दिलाने के लिए टोनही प्रताड़ित महिलाओं के प्रकरण फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की व्यवस्था की जा सकती है.
उन्होंने कहा कि टोनही प्रताड़ित महिला को आंगनबाड़ी केंद्रों या स्थानीय स्तर पर चल रहे शासकीय परियोजनाओं से जोड़ा जा सकता है, ताकि उनके सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति का निवारण हो.
टोनही प्रताड़ित महिला के संरक्षण के लिए स्थानीय पुलिस थाने, चौकी को निर्दिष्ट किया जा सकता है कि वे प्रताड़ना की पुनरावृत्ति रोकने एवं महिला एवं उसके परिवार के पुनर्वास में मदद करें.

छत्तीसगढ़: मनरेगा फेल, पलायन जारी है

छत्तीसगढ़: मनरेगा फेल, पलायन जारी है

Tuesday, September 29, 2015
[cg khabar]
A A

छत्तीसगढ़ रोजगार गारंटी
रायपुर | एजेंसी: अल्प वर्षा से पीड़ित किसान छत्तीसगढ़ से पलायन कर रहें हैं. उन्हें मनरेगा के तहत भी रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है.इस कारण से उनके पास जीविका चलाने के लिये दिगर राज्यों की ओर पलायन करना पड़ रहा है. उल्लेखनीय है कि रोजगार की तलाश में दिगर राज्यों में जाने वाले कईयों को वहां बंधक बना लिया जाता है. छत्तीसगढ़ के कई जिलों में खेती-किसानी में जमा पूंजी के बर्बाद हो जाने के बाद उम्मीद खो चुके किसानों को मनरेगा से भी अब कोई आस नहीं रह गई है. कम वर्षा के कारण अपना 50 फीसदी फसल खो चुके सूबे के कई किसान जीवनयापन के लिए दूसरे राज्यों की ओर कूच करने लगे हैं.
राजधानी से लगे बलौदाबाजार जिले में प्रारंभ हो चुके पलायन को मनरेगा भी नहीं रोक पा रहा है, क्योंकि मनरेगा का कामकाज करने वाले ग्रामीण श्रमिकों का अब तक तीन करोड़ 32 लाख 96 हजार रुपये का भुगतान बकाया है. ऐसे में नियमित भुगतान न होने के कारण ग्रामीण अन्य राज्यों में पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं. जिले में मनरेगा के तहत 48 ग्राम पंचायतों में 785 श्रमिक कार्य में लगे हैं.
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की एपीओ अंजू भोगामी का कहना है कि जिले में सवा तीन करोड़ रुपये का भुगतान आवंटन के अभाव में नहीं किया जा सका है. इसके लिए राज्य शासन को प्रस्ताव भेजा गया है. राशि मिलने के बाद भुगतान कर दिया जाएगा.
ग्रामीणों द्वारा रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में पलायन को रोकने के साथ ही गांव में रोजगार मुहैया कराने के लिए सभी ग्राम पंचायतों में चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना पलायन रोकने में कारगर सिद्ध नहीं हो रही है. पिछले कुछ वर्षो से ग्राम पंचायतों में मनरेगा के कार्यो में गड़बड़ी के कई मामले भी उजागर हुए हैं.
ग्राम पंचायतों द्वारा फर्जी श्रमिकों के मस्टररोल व जॉब कार्ड, फर्जी कार्यो की सूची सहित करोड़ों रुपये की गड़बड़ी सचिव व रोजगार सहायक के साथ मिलकर किए जाने के मामले सामने आ चुके हैं. इस मामले की जांच भी हुई है, मगर कार्रवाई अब भी ठंडे बस्ते में है.
वर्तमान में जिले की 611 ग्राम पंचायतों में से मात्र 48 ग्राम पंचायतों में मनरेगा का काम हो रहा है. इसके तहत शौचालय निर्माण कराया जा रहा है.
एक परिवार को साल में 150 दिन काम दिया जाना है, मगर ज्यादातर पंचायतों में काम ही शुरू नहीं हो सके हैं. बकाया भुगतान नहीं होने से लोग मनरेगा का काम करने से परहेज कर रहे हैं. मनरेगा के तहत जिले को 10 करोड़ 619 लाख 91 हजार रुपये व्यय करने का लक्ष्य मिला है. मगर अब तक सिर्फ दो करोड़ 68 लाख रुपये ही खर्च हो पाए हैं.

Tuesday, September 29, 2015

डिजिटल गुलामी का दौर - ललित सुरजन




डिजिटल गुलामी का दौर 
ललित सुरजन 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर अमरीका में अपनी वाहवाही करवा रहे हैं। न्यूयार्क से लेकर कैलिफोर्निया तक। मीडिया मालिक, कार निर्माता, साफ्टवेयर  दिग्गज हर कोई उनकी तारीफों के पुल बांध रहा है। रूपर्ट मर्डोक उन्हें आजादी के बाद से अब तक का सर्वश्रेष्ठ नेता बता रहे हैं, सिस्को प्रमुख जान चैंबर्स उन्हें भारत का बेजोड़ राजदूत बता रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि वे देश को बदल कर रख देंगे। गूगल, माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनियां जिनमें भारतीय अग्रणी भूमिकाओं में हैं, भारत में निवेश करने, काम का विस्तार करने को उत्सुक दिख रहे हैं। फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग ने तो अपनी प्रोफाइल तस्वीर ही तिरंगे के साथ दर्शा दी। न्यूयार्क में दिग्गज कंपनियों के शीर्षस्थ अधिकारियों ने मोदीजी को सलाह दी है कि आर्थिक सुधारों में तेजी लाने के लिए और कदम उठाएं। इन अधिकारियों ने कहा कि आप जो भी कर रहे हैं, करते रहिए। लेकिन थोड़ा तेजी से करिए। इन अधिकारियों की इच्छा, आदेश सिर-माथे पर। माननीय मोदीजी ने भी वादा किया कि भारत सरकार फैसले लेने में तेजी लाएगी। अपनी पूंजीवादी, स्वार्थ केन्द्रित नीतियों के कारण आर्थिक मंदी की बुरी मार खा चुके अमरीकियों के लिए इससे बेहतर अवसर क्या हो सकता है कि सवा सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री बार-बार, लगातार विदेशी निवेशकों से मिन्नतें कर रहा है कि आप हमारे देश में आइए, थोड़ी पंूजी लगाकर अधिक मुनाफा कमाइए। हम आपकी सुविधा के हिसाब से योजनाएं प्रारंभ करेंगे, कानूनों में बदलाव करेंगे। इस सारे खेल को मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे शब्दों के आवरण में लपेट कर इस तरह पेश किया जाता है मानो विदेशी निवेशक न आए तो देश में विकास होगा ही नहीं। नरेन्द्र मोदी जब व्यापारियों, सीईओ आदि से मिलते हैं तो लगता है कि कोई व्यापारी बड़ा सौदा करने के लिए निकला है। पिछली बार न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वेयर पर मोदीजी की राजनीति का मेगा शो आयोजित हुआ, इस बार सिलिकान वैली में। डिजिटल इंडिया की मंजिल का रास्ता यहां से ही गुजरता है। मालिकान अमरीकी हैं, और कर्मचारी अधिकतर भारतीय। भारत का भविष्य भी कुछ ऐसा ही दिखता है। इतिहास तो हम देख ही चुके हैं। डिजिटल इंडिया से भारत में अभूतपूर्व क्रांति आएगी, ऐसा समझाया जा रहा है। सवाल यह है कि यह क्रांति किन लोगों के लिए होगी और किस स्तर की होगी। यह सही है कि आज की पीढ़ी इंटरनेट, मोबाइल की भाषा ही सबसे ज्यादा समझती है। सबसे ज्यादा वक्त भी उसका इन उपकरणों पर ही बीतता है। श्री मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में कहा कि पहले हर पांच साल में चुनाव होते थे, अब सोशल मीडिया पर हर पांच मिनट में चुनाव करा सकते हैं। सच, सोशल मीडिया की महिमा उनसे ज्यादा कौन समझ सकता है। उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाने में इस सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है। लेकिन वे इसके महिमामंडन में एक बड़ी भूल कर गए। याद दिला दें कि भारत में अब भी हर पांच साल में ही चुनाव की व्यवस्था है। जहां तक सोशल मीडिया पर होने वाले चुनाव की बात है तो अब बहुत से भारतीय इंटरनेट बुद्धिजीवी, विचारक, लेखक, क्रांतिकारी बन गए हैं, जो अपनी चंद पंक्तियों की पोस्ट से देश बदलना चाहते हैं। वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री मोदी जरूरी मुद्दों पर बोलते ही नहींहैं या अपनी राय जाहिर करते हैं तो ट्विटर आदि पर। 
डिजिटल इंडिया बनाने के लिए देश में फाइबर आप्टिकल का जाल बिछेगा, वाई-फाई सुविधा होगी, नवीनतम तकनीकी के कंप्यूटर, मोबाइल होंगे। इन्हें उपलब्ध कराने के लिए देसी कंपनियों के साथ विदेशी कंपनियां निवेश करेंगी, भारतीय बाजार पर कब्जा जमाएंगी। व्यापार का यही तकाजा है। लेकिन क्या देश में बिजली, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, कृषि इन तमाम क्षेत्रों की समस्याएं भी डिजिटल इंडिया में हल हो जाएंगी या आभासी दुनिया में इनका कोई वजूद ही नहींरहेगा। हम भारतीयों को यूं भी आभासी दुनिया में जीना अच्छा लगता है। देश में सदियों से गरीबी, भूख, शोषण का बोलबाला रहा, केवल राजघराने उनके जमींदार और सामंत तथा धार्मिक स्थल ही अमीर थे और हमें आभास होता था कि देश सोने की चिडिय़ा है। स्थिति अब भी नहींबदली है। जातिप्रथा, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, भूख, बेरोजगारी, बीमारी में लाचारी, किसानों की आत्महत्या ऐसी कई विकराल समस्याओं से गरीब जनता रोज जूझ रही है, इनके जाल में फंसकर दम तोड़ रही है। इस जाल को काटने की जगह सरकार बहादुर इंटरनेट के जाल बिछाने को उत्सुक दिख रहे हैं। दुनिया को बताएंगे कि भारत डिजिटल हो गया है। इसके मालिक दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर बटन दबाकर हमें नियंत्रित कर सकते हैं। साम्राज्यवादी और आर्थिक गुलामी के बाद एक नये किस्म की डिजिटल गुलामी बर्दाश्त करने के लिए सवा सौ करोड़ भाइयो-बहनो तैयार रहो।

अक्लमंद हो तो क्या लिखो ? - हिमांशु कुमार

अक्लमंद हो तो क्या लिखो ?

[हिमांशु कुमार ]
रूप, रंग, गंध लिखो
मन की उडान हो गई जो स्वच्छंद लिखो
तितली लिखो, फूल लिखो, 
रेशम लिखो, प्रेम लिखो,
जो भी लिखो,
प्रशंसा, पैसा और सम्मान के जरूरतमंद लिखो,
चमक लिखो, दमक लिखो,
ठसक और खनक लिखो,
देश, विश्व, सत्ता के बदलते समीकरण लिखो,
अच्छा लिखो, नफीस लिखो,
ऊँचा लिखो, दमकदार लिखो,
जिनकी पढ़ने की हैसियत है,
उनकी हैसियत के अनुसार लिखो,
मुख्य धारा लिखो, बिकने वाला लिखो,
शोहरत वाला लिखो, चर्चा लायक लिखो,
छप्पर मत लिखो, साथ में नाला मत लिखो,
खून मत लिखो, भूख मत लिखो,
सडती हुई लाश पर मंडराते चील, कौवे मत लिखो,
औरत की कोख में ठूंसे गये पत्थर बिल्कुल मत लिखो,
दिवानों, पागलों और सनकियों की बात मत लिखो,
देश मत लिखो, समाज मत लिखो,
गांव मत लिखो, गरीब मत लिखो,
विकास लिखो, खनिज लिखो,
हवाई अड्डा और होर्डिंग लिखो,
ए.सी. लिखो, कार लिखो, स्काच लिखो,
सेंट लिखो, लड़की लिखो,
पैसा लिखो, मंत्री लिखो,
साहब लिखो, फाइल क्लियर लिखो,
जली हुई झोंपड़ी, लूटी हुई इज्जत, मरा हुआ बच्चा
पिटा हुआ बुढा बिल्कुल मत लिखो,
पुलिस की मार, फटा हुआ ब्लाउज ,
पेट चीरी हुई लड़की की लाश मत लिखो,
महुआ मत लिखो, मडई मत लिखो,
नाच मत लिखो, ढोल मत लिखो,
लाल आँख मत लिखो, तनी मुट्ठी मत लिखो
जंगल से आती हुई ललकार मत लिखो,
अन्याय मत लिखो, प्रतिकार मत लिखो,
सहने की शक्ति का खात्मा और बगावत मत लिखो,
क्रान्ति मत लिखो, नया समाज मत लिखो,
संघर्ष मत लिखो, आत्म सम्मान मत लिखो,
लाईन है खींची हुई, अक्लमंद और पागलों में,
अक्लमंद लिखो , पागल मत लिखो

नये नेताओं के अलग-अलग विचार - भगत सिंह (1928) (भगत सिंह के सुभाष बाबू और नेहरु के बारे में विचार )

नये नेताओं के अलग-अलग विचार - भगत सिंह (1928)
(भगत सिंह के सुभाष बाबू और नेहरु के बारे में विचार )


[हिमांशु कुमार ]

असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद जनता में बहुत निराशा और मायूसी फैली। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों ने बचा-खुचा साहस भी खत्म कर डाला। लेकिन देश में जब एक बार जागृति फैल जाए तब देश ज्यादा दिन तक सोया नहीं रह सकता। कुछ ही दिनों बाद जनता बहुत जोश के साथ उठती तथा हमला बोलती है। आज हिन्दुस्तान में फिर जान आ गई है। हिन्दुस्तान फिर जाग रहा है। देखने में तो कोई बड़ा जन-आन्दोलन नजर नहीं आता लेकिन नींव जरूर मजबूत की जा रही है। आधुनिक विचारों के अनेक नए नेता सामने आ रहे हैं। इस बार नौजवान नेता ही देशभक्त लोगों की नजरों में आ रहे हैं। बड़े-बड़े नेता बड़े होने के बावजूद एक तरह से पीछे छोड़े जा रहे हैं। इस समय जो नेता आगे आए हैं वे हैं- बंगाल के पूजनीय श्री सुभाषचन्द्र बोस और माननीय पण्डित श्री जवाहरलाल नेहरू। यही दो नेता हिन्दुस्तान में उभरते नजर आ रहे हैं और युवाओं के आन्दोलनों में विशेष रूप से भाग ले रहे हैं। दोनों ही हिन्दुस्तान की आजादी के कट्टर समर्थक हैं। दोनों ही समझदार और सच्चे देशभक्त हैं। लेकिन फिर भी इनके विचारों में जमीन-आसमान का अन्तर है। एक को भारत की प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है तो दूसरे को पक्का पश्चिम का शिष्य। एक को कोमल हृदय वाला भावुक कहा जाता है और दूसरे को पक्का युगान्तरकारी। हम इस लेख में उनके अलग-अलग विचारों को जनता के समक्ष रखेंगे, ताकि जनता स्वयं उनके अन्तर को समझ सके और स्वयं भी विचार कर सके।
लेकिन उन दोनों के विचारों का उल्लेख करने से पूर्व एक और व्यक्ति का उल्लेख करना भी जरूरी है जो इन्हीं स्वतन्त्रता के प्रेमी हैं और युवा आन्दोलनों की एक विशेष शख्सियत हैं। साधू वासवानी चाहे कांग्रेस के बड़े नेताओं की भाँति जाने माने तो नहीं, चाहे देश के राजनीतिक क्षेत्र में उनका कोई विशेष स्थान तो नहीं, तो भी युवाओं पर, जिन्हें कि कल देश की बागडोर संभालनी है, उनका असर है और उनके ही द्वारा शुरू हुआ आन्दोलन ‘भारत युवा संघ’ इस समय युवाओं में विशेष प्रभाव रखता है। उनके विचार बिल्कुल अलग ढंग के हैं। उनके विचार एक ही शब्द में बताए जा सकते हैं — “वापस वेदों की ओर लौट चलो।” (बैक टू वेदस)। यह आवाज सबसे पहले आर्यसमाज ने उठाई थी। इस विचार का आधार इस आस्था में है कि वेदों में परमात्मा ने संसार का सारा ज्ञान उड़ेल दिया है। इससे आगे और अधिक विकास नहीं हो सकता। इसलिए हमारे हिन्दुस्तान ने चौतरफा जो प्रगति कर ली थी उससे आगे न दुनिया बढ़ी है और न बढ़ सकती है। खैर, वासवानी आदि इसी अवस्था को मानते हैं। तभी एक जगह कहते हैं —
“हमारी राजनीति ने अब तक कभी तो मैजिनी और वाल्टेयर को अपना आदर्श मानकर उदाहरण स्थापित किए हैं और या कभी लेनिन और टॉल्स्टाय से सबक सीखा। हालांकि उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि उनके पास उनसे कहीं बड़े आदर्श हमारे पुराने ॠषि हैं।”
वे इस बात पर यकीन करते हैं कि हमारा देश एक बार तो विकास की अन्तिम सीमा तक जा चुका था और आज हमें आगे कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि पीछे लौटने की जरूरत है। आप एक कवि हैं। कवित्व आपके विचारों में सभी जगह नजर आता है। साथ ही यह धर्म के बहुत बड़े उपासक हैं। यह 'शक्ति’ धर्म चलाना चाहते हैं। यह कहते हैं, “इस समय हमें शक्ति की अत्यन्त आवश्यकता है।” वह ‘शक्ति’ शब्द का अर्थ केवल भारत के लिए इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन उनको इस शब्द से एक प्रकार की देवी का, एक विशेष ईश्वरीय प्राप्ति का विश्वास है। वे एक बहुत भावुक कवि की तरह कहते हैं —
“For in solitude have communicated with her, our admired Bharat Mata, And my aching head has heard voices saying... The day of freedom is not far off.” ..Sometimes indeed a strange feeling visits me and I say to myself – Holy, holy is Hindustan. For still is she under the protection of her mighty Rishis and their beauty is around us, but we behold it not.
अर्थात् एकान्त में भारत की आवाज मैंने सुनी है। मेरे दुखी मन ने कई बार यह आवाज सुनी है कि ‘आजादी का दिन दूर नहीं'...कभी कभी बहुत अजीब विचार मेरे मन में आते हैं और मैं कह उठता हूँ — हमारा हिन्दुस्तान पाक और पवित्र है, क्योंकि पुराने ॠषि उसकी रक्षा कर रहे हैं और उनकी खूबसूरती हिन्दुस्तान के पास है। लेकिन हम उन्हें देख नहीं सकते।
यह कवि का विलाप है कि वह पागलों या दीवानों की तरह कहते रहे हैं — “हमारी माता बड़ी महान है। बहुत शक्तिशाली है। उसे परास्त करने वाला कौन पैदा हुआ है।” इस तरह वे केवल मात्र भावुकता की बातें करते हुए कह जाते हैं — “Our national movement must become a purifying mass movement, if it is to fulfil its destiny without falling into class war one of the dangers of Bolshevism.” अर्थात् हमें अपने राष्ट्रीय जन आन्दोलन को देश सुधार का आन्दोलन बना देना चाहिए। तभी हम वर्गयुद्ध के बोल्शेविज्म के खतरों से बच सकेंगे। वह इतना कहकर ही कि गरीबों के पास जाओ, गाँवों की ओर जाओ, उनको दवा-दारू मुफ्त दो — समझते हैं कि हमारा कार्यक्रम पूरा हो गया।
वे छायावादी कवि हैं। उनकी कविता का कोई विशेष अर्थ तो नहीं निकल सकता, मात्र दिल का उत्साह बढ़ाया जा सकता है। बस पुरातन सभ्यता के शोर के अलावा उनके पास कोई कार्यक्रम नहीं। युवाओं के दिमागों को वे कुछ नया नहीं देते। केवल दिल को भावुकता से ही भरना चाहते हैं। उनका युवाओं में बहुत असर है। और भी पैदा हो रहा है। उनके दकियानूसी और संक्षिप्त-से विचार यही हैं जो कि हमने ऊपर बताए हैं। उनके विचारों का राजनीतिक क्षेत्र में सीधा असर न होने के बावजूद बहुत असर पड़ता है। विशेषकर इस कारण कि नौजवानों,युवाओं को ही कल आगे बढ़ना है और उन्हीं के बीच इन विचारों का प्रचार किया जा रहा है।
अब हम श्री सुभाषचन्द्र बोस और श्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों पर आ रहे हैं। दो-तीन महीनों से आप बहुत-सी कान्फ्रेंसों के अध्यक्ष बनाए गए और आपने अपने-अपने विचार लोगों के सामने रखे। सुभाष बाबू को सरकार तख्तापलट गिरोह का सदस्य समझती है और इसीलिए उन्हें बंगाल अध्यादेश के अन्तर्गत कैद कर रखा था। आप रिहा हुए और गर्म दल के नेता बनाए गए। आप भारत का आदर्श पूर्ण स्वराज्य मानते हैं, और महाराष्ट्र कान्फ्रेंस में अध्यक्षीय भाषण में अपने इसी प्रस्ताव का प्रचार किया।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू स्वराज पार्टी के नेता मोतीलाल नेहरू ही के सुपुत्र हैं। बैरिस्टरी पास हैं। आप बहुत विद्वान हैं। आप रूस आदि का दौरा कर आए हैं। आप भी गर्म दल के नेता हैं और मद्रास कान्फ्रेंस में आपके और आपके साथियों के प्रयासों से ही पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव स्वीकृत हो सका था। आपने अमृतसर कान्फ्रेंस के भाषण में भी इसी बात पर जोर दिया। लेकिन फिर भी इन दोनों सज्जनों के विचारों में जमीन-आसमान का अन्तर है। अमृतसर और महाराष्ट्र कान्फ्रेंसों के इन दोनों अध्यक्षों के भाषण पढ़कर ही हमें इनके विचारों का अन्तर स्पष्ट हुआ था। लेकिन बाद में बम्बई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ गई।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस जनसभा की अध्यक्षता कर रहे थे और सुभाषचन्द्र बोस ने भाषण दिया। वह एक बहुत भावुक बंगाली हैं। उन्होंने भाषण आरंभ किया कि हिन्दुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष सन्देश है। वह दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। खैर, आगे वे दीवाने की तरह कहना आरम्भ कर देते हैं — चांदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह सूझ का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार ने लिखा है कि हममें यह हमारे आँसू ही जमकर पत्थर बन गए हैं। वह भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं। आपने अपने पूना वाले भाषण में ‘राष्ट्रवादिता’ के सम्बन्ध में कहा है कि अन्तर्राष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है। हिन्दुस्तानी राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है, न निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ है अर्थात् सच,कल्याणकारी और सुन्दर।
यह भी वही छायावाद है। कोरी भावुकता है। साथ ही उन्हें भी अपने पुरातन युग पर बहुत विश्वास है। वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग की महानता देखते हैं। पंचायती राज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं। ‘पंचायती राज और जनता के राज'वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नई चीज नहीं है। खैर, उन्होंने सबसे ज्यादा उस दिन के भाषण में जोर किस बात पर दिया था कि हिन्दुस्तान का दुनिया के लिए एक विशेष सन्देश है। पण्डित जवाहरलाल आदि के विचार इसके बिल्कुल विपरीत हैं। वे कहते हैं —
“जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष सन्देश है। इंग्लैंड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता। सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत यकीन है।” जवाहरलाल कहते हैं — “Every youth must rebel. Not only in political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have not much use for any man who comes and tells me that such and such thing is said in Koran, Every thing unreasonable must be discarded even if they find authority for in the Vedas and Koran.” [यानी] “प्रत्येक नौजवान को विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्र में भी। मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे कि फलाँ बात कुरान में लिखी हुई है। कोई बात जो अपनी समझदारी की परख में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और कुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा गया हो, नहीं माननी चाहिए।”
यह एक युगान्तरकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राज-परिवर्तनकारी के विचार हैं। एक के विचार में हमारी पुरानी चीजें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए। एक को भावुक कहा जाता है और एक को युगान्तरकारी और विद्रोही। पण्डित जी एक स्थान पर कहते हैं —
“To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the Vedic age in India. I say, that it is inconceivable that you can bring back the hoary past. The world of reality will not retrace its steps, the world of imaginations may remain stationary.”
वे कहते हैं कि जो अब भी कुरान के जमाने के अर्थात् 1300 बरस पीछे के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं, जो पीछे वेदों के जमाने की ओर देख रहे हैं उनसे मेरा यह कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह युग वापस लौट आएगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता महसूस करते हैं।
सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज पश्चिम के वासी हैं। हम पूर्व के। पण्डित जी कहते हैं, हमें अपना राज कायम करके सारी सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए। उसके लिए पूरी-पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने की आवश्यकता है। सुभाष बाबू मजदूरों से सहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते हैं। पण्डित जी एक क्रांति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं। सुभाष भावुक हैं — दिल के लिए। नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के लिए। दूसरा युगान्तरकारी है जो कि दिल के साथ-साथ दिमाग को भी बहुत कुछ दे रहा है।
“They should aim at Swaraj for the masses based on socialism. That was a revolutionary change with they could not bring out without revolutionary methods...Mere reform or gradual repairing of the existing machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General Masses.” अर्थात् हमारा समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार पूर्ण स्वराज होना चाहिए, जो कि युगान्तरकारी तरीकों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। केवल सुधार और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी-धीमी की गई मरम्मत जनता के लिए वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती।
यह उनके विचारों का ठीक-ठाक अक्स है। सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है। परन्तु पण्डित जी राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गए हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे सामने दोनों विचार आ गए हैं। हमें किस ओर झुकना चाहिए। एक पंजाबी समाचार पत्र ने सुभाष की तारीफ के पुल बाँधकर पण्डित जी आदि के बारे में कहा था कि ऐसे विद्रोही पत्थरों से सिर मार-मारकर मर जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब पहले ही बहुत भावुक प्रान्त है। लोग जल्द ही जोश में आ जाते हैं और जल्द ही झाग की तरह बैठ जाते हैं।
सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक खुराक नहीं दे रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों को इन युगान्तरकारी विचारों को खूब सोच-विचार कर पक्का कर लेना चाहिए। इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख्त जरूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्धे पैरोकार बन जाना चाहिए। लेकिन जहाँ तक विचारों का सम्बन्ध है, वहाँ तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्कलाब के वास्तविक अर्थ, हिन्दुस्तान के इन्कलाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्कलाब का स्थान क्या है,आदि के बारे में जान सकें। सोच-विचार के साथ नौजवान अपने विचारों को स्थिर करें ताकि निराशा, मायूसी और पराजय के समय में भी भटकाव के शिकार न हों और अकेले खड़े होकर दुनिया से मुकाबले में डटे रह सकें। इसी तरह जनता इन्कलाब के ध्येय को पूरा कर सकती है।
Date Written: July 1928