Friday, March 24, 2017

रमन सरकार रावघाट खदान के लिए आदिवासियों का गांव उझाड़ रही ।




रमन सरकार रावघाट खदान के लिए आदिवासियों का गांव उझाड़ रही ।
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रावघाट में आयरन ओर का खदान बनने से इलाका का वन, प्रकृति, परिबेश, पेड़-पौधे, जीव-जानवर, कीटपतंग, नदी-नाला-झरनाओ नष्ट हो जाएगा एवं साथ ही साथ उक्त पहाड़ में युग-युगांत से रहते हुए आदिवासी-मुलनिवासी ग्रामवासियों का जीवन भी तहस-नहस हो जाएगा.

माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ नें भारत एवं राज्य सरकार का निर्दिष्ट मन्त्रको एवं विभाग एवं भीलाई इस्पात संयंत्र को नोटिस भेजा है.

बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता तिरु. अरविन्द नेताम के साथ साथ कांकेर जिला की अंतागढ़ क्षेत्र का दो साहसी एवं अनुभवी आदिवासी नेता तिरु. रामकुमार दर्रो और तिरु. राईपाल नुरेटी ने मिलके छत्तीसगढ़ का मुख्य न्यायलय बिलासपुर में NM D C  तथा भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा संचालित होनेवाला कांकेर एवं नारायणपुर जिले का रावघाट घाटी का 883.22  हेक्टेअर इलाका में निर्माणाधीन आयरन ओर खदान के खिलाफ जनहित जाचिका दायर किए है. उक्त जाचिका में भिलाई इस्पात संयंत्र के साथ साथ अपने अपने लापरवाही के इलज़ाम देते हुए छत्तीसगढ़ सरकर का वन विभाग एवं भारत सरकार का पर्यावण एवं वन मंत्रालय एवं मिनिस्ट्री ऑफ़ ट्राइबल अफेयर्स को भी पार्टी बनाया गया है

अभियोग काफी सारे है. उक्त खदान का जो एनवायरनमेंट असेसमेंट रिपोर्ट है उस में लिखा गया है की उक्त खदान इलाका में कोई गांव है ही नहीं. लेकिन ताजुब का बात ये है की एक राइट टू इनफार्मेशन आवदेन का जवाब में अंतागढ़ का तहसीलदार स्वयं १० गांव का नाम दिया है जो खदान इलाका में आते है. आप को शायद याद रहेगा, सन 2013 में बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स द्वारा हिंसा एवं वलपूर्वक रावघाट घाटी का दो गांव - आंजरेल एवं पल्लाकसा को खली करवाया गया था. हाल में पूरा रावघाट पहाड़ी में 30 से भी ज्यादा बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स एवं सशत्र सीमा वल का कैंप बैठाया गया है, एवं रावघाट अंचल का विस्तृत जगहों में २ किलोमीटर दुरी में एक एक करके फौजी कैंप है, जो इलाका का आदिवासी-मूलनिवासियों से सहमति नहीं लेते हुए ही बनाया गया था.

सिर्फ ये ही नहीं, पूरा रावघाट घाटी में २० से भी ज्यादा गांव से वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के अनुसार सही प्रारूप में सामूहिक, उपचारिक एवं व्यक्तिगत वनाधिकार पत्रक का आवेदन अभी भी अंतागढ़ का तहसील, साब-डिवीज़नाल ऑफिस आदि कछेरीओं में पड़े हुए है. ऐसे परिस्थिति ने, भारत सरकार का आदिवासी मंत्रालय द्वारा दिए हुए गेजेट नोटिफिकेशन के अनुसार  को भी वनभूमि का ऐसे खदान, कारखाना आदि तथाकथित 'डेवलपमेंटल' प्रोजेक्ट्स के लिए डायवर्सन के पहोले ऐसे वनभूमि का वनाधिकारों का सेटलमेंट हो जाना ज़रूरी है. रावघाट घाटी में अवस्थित २० से भी ज्यादा गांव का वनाधिकार दवाओं का सेटलमेंट नहीं होने के बावजूद भी भिलाई इस्पात संयंत्र को खदान के लिए कैसे सम्पूर्ण फारेस्ट क्लीयरेंस मिल गया, ये सवाल उठता है.

सवाल तो ये भी उठता है की, माननीय सुप्रीम कोर्ट कस नियमगिरि जजमेंट, जिस में उक्त न्यायलय नें स्पष्ट बताया है की आदिवासियों का धार्मिक महत्वपूर्णता समन्वित कोई भी इलाका को इलाका में पंचायत (एक्सटेनशन) टू शिड्यूल्ड एरियास एक्ट 1996 के अनुसार सही ढंग से अनुष्ठित ग्राम सभायों के माध्यम से गांववालों के सहमति नहीं लेते हुए किसी भी कारन से हस्तांतरण नहीं किया जायेगा, के देश का कानून के रूप में रहते हुए भी किस उपाय से गोंड आदिवासियों का धार्मिक घाटी रावघाट में माइनिंग का परमिशन मिला? याचिकाकर्ताओं नें शिकायत किए है की रावघाट खदान के  इलाका में ऐसे सहमत लाने के वास्ते कोई भी ग्राम सभा सही एवं क़ानूनी ढंग से हुआ ही नहीं था.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 एवं 26 हर इंसानों को आपने धार्मिक विश्वास के साथ जीने का मुलभुत अधिकार स्वीकृत किया है, एवं, जाचिकार्ताओं का शिकायतों के अनुसार, रावघाट पहाड़ी में खदान बनने से उक्त अंचल का गोंड एवं अबुझमाड़िया आदिवासियों का उक्त अधिकारों का हनन हो रहा है.

रावघाट में आयरन ओर का खदान बनने से इलाका का वन, प्रकृति, परिबेश, पेड़-पौधे, जीव-जानवर, कीटपतंग, नदी-नाला-झरनाओ नष्ट हो जाएगा एवं साथ ही साथ उक्त पहाड़ में युग-युगांत से रहते हुए आदिवासी-मुलनिवासी ग्रामवासियों का जीवन भी तहस-नहस हो जाएगा. इस समस्या को देखते हुए डाला हुआ याचिका रिट पिटीशन (पीआईएल) क्र. 26/2017 में 23/03/2017 को एडमिट करते हुए माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ नें भारत एवं राज्य सरकार का निर्दिष्ट मन्त्रको एवं विभाग एवं भीलाई इस्पात संयंत्र को नोटिस भेजा है.

और भी एक ज़रूरी बात ये है की उक्त खदान के सुविधा के लिए निवेदित हांल में निर्माणशील रेलरास्तों के कारन भी प्रभूत परिमाण में वनभूमि एवं आदिवासियों के लिए महत्वपूर्ण देवस्थलों, मरघटों, सामूहिक एवं व्यक्तिगत ज़मीनों को चपेटते हुए तथाकथित 'विकास' का काम किया जा रहा है भारत सरकार द्वारा। इस दौरान दल्ली-राजारा से भानुप्रतापपुर हो के अंतागढ़ हो के रावघाट पहाड़ी का गहन वन में अवस्थित कुरसेल-ताड़ोकी-तुमापाल हो के खदान का कोर इलाका भैंसगांव तक वनभूमि साफ़, समतलीकरण एवं कुछ कुछ कंस्ट्रक्शन का काम भी हो चूका है. इस के खिलाफ दिल्ली का पर्यावरण कोर्ट (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) का मुख्य बेंच में भी प्रकरण चल रहे है. बस्तर जिला में जगदलपुर से रावघाट पहाड़ी और बढ़ता हुआ निर्माणाधीन रेलरास्ता के लिए भी आदिवासी मरघट, देवस्थल आदि का नष्ट होने का आरोप है. कुल मिलाके, रावघाट पहाड़ी में माइनिंग को ले के वहां का वास्तविक परिस्थिति बहुत ही गंभीर है.

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तामेश्वर सिन्हा की पोस्ट 

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