Sunday, November 1, 2015

इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के 15 साल पूरे

इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के 15 साल पूरे

  • 43 मिनट पहले
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Image copyrightAFP
अनशन पर बैठी मणिपुर की इरोम शर्मिला को रविवार को भूख हड़ताल करते 15 साल पूरे हो गए हैं.
इन 15 वर्षों में शर्मिला के इस आंदोलन को मणिपुर से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार विशेषज्ञों तक का समर्थन मिला, लेकिन शासन-व्यवस्था में कहीं कोई फर्क नज़र नहीं आया.
मानव अधिकार की पैरवी कर रही 42 वर्षीय शर्मिला की मांग है कि मणिपुर के विभन्न हिस्सों में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ़्स्पा) को पूरी तरह हटाया जाए.
शर्मिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चिट्ठी लिख चुकी हैं.
शर्मिला की देखभाल करने वाले डॉक्टर कई बार कह चुके हैं कि इतने लंबे समय से भोजन नहीं करने की वजह से उनकी हड्डियां बेहद कमजोर हो गई हैं और ऐसे में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ेगा.
शर्मिला के इस अनशन को मणिपुर में मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रहे लोगों की ताकत बताने वाले ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइटोंगबम ने बीबीसी से बातचीत की.
उन्होंने बताया कि आफ़्स्पा को लेकर भले ही भूख हड़ताल पर बैठी इरोम शर्मिला को अभी सफलता नहीं मिली है, लेकिन उनके इस आंदोलन ने मानवाधिकार की लड़ाई को हिंदुस्तान और दुनिया में एक बड़ा मुद्दा बना दिया है.
उन्होंने कहा, "शर्मिला के आंदोलन की वजह से आज मणिपुर के माहौल में बदलाव दिखा रहा है. उसकी आवाज़ अब सैकड़ों लोगों की आवाजों को बुलंद कर रही है."
Image copyrightDilip Sharma
Image captionडॉक्टर विजयलक्ष्मी बरारा
मणिपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विषय की डॉक्टर विजयलक्ष्मी बरारा कहती हैं 15 साल का शर्मिला का आंदोलन यूं ही बेकार नहीं जाएगा.
विजयलक्ष्मी कहती हैं, "यह शर्मिला का आंदोलन ही है जिससे लोगों का नज़रिया बदला है. इफांल नगर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाया जा चुका है, उम्मीद है कि आने वाले समय में इस कानून को समूचे मणिपुर से हटा लिया जाएगा."
मणिपुर के स्थानीय पत्रकार जेम्स खंगेनबम कहते है कि शर्मिला का आंदोलन कभी कमजोर नहीं पड़ सकता.
वो कहते हैं, "मणिपुर के लोग जानते है कि अगर शर्मिला का आंदोलन नहीं होता तो इतनी ताकत के साथ मानवाधिकार की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती थी."
Image copyrightDileep Sharma
Image captionस्थानीय पत्रकार जेम्स खंगेनबम
मणिपुर में अलगाववाद से निपटने के लिए राज्य में कई दशकों से सेना तैनात है, जिसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून के इस्तेमाल की छूट है.
इसके तहत सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस क़ानून की आड़ में सेना ने कई मासूमों की फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में हत्या की है.
राजधानी इंफाल के मालोम इलाके में असम राइफ्ल की गोलीबारी में मारे गए 10 मणिपुरी युवकों की मौत के बाद आज ही के दिन वर्ष 2000 में शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठी थीं.

अफसरों के सामने पेश किया दुष्कर्म पीड़ितों को, जांच के बाद एफआईआर Raipur : Rape victims presented of Officers

अफसरों के सामने पेश किया दुष्कर्म पीड़ितों को, जांच के बाद एफआईआर
Raipur : Rape victims presented of Officers 

सुरक्षा बल के जवानों द्वारा दुष्कर्म करने के मामले में एक बालिका सहित तीन पीड़ित महिला��"ं को महिला संगठनों ने आला अफसरों के सामने पेश किया ��"र इसके बाद उनकी मेडिकल जांच जिला अस्पताल में की गई

रायपुर/बीजापुर. जिले के चिन्नागेलूर और पेदागेलूर सहित कई गांव की महिलाओं के साथ सुरक्षा बल के जवानों द्वारा दुष्कर्म करने के मामले में एक बालिका सहित तीन पीड़ित महिलाओं को महिला संगठनों ने आला अफसरों के सामने पेश किया और इसके बाद उनकी मेडिकल जांच जिला अस्पताल में की गई। वहीं, विभिन्न महिला संगठनों ने आरोपियों की पहचान करवाने और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर एसपी को अर्जी दी।

स्वयंसेवी संस्था सहेली और महिला अधिकार मंच की सदस्य बेला भाटिया, रिनचिन, महीन मिर्जा, शिवानी तनेजा, श्रेया खेमानी, अनुराधा बैनर्जी के साथ आम आदमी पार्टी की नेता सोनी सोड़ी ने� शनिवार को गांवों में जाकर पीड़ित बालिका, महिलाओं और बच्चों से मुलाकात की थी। ये प्रतिनिधि चार पीडि़तों को जिला मुख्यालय लेकर पहुंचीं और रविवार को कलक्टर यशवंत कुमार, एसपी केएल ध्रुव और एएसपी आईके ऐलेसेला के सामने पेश किया। अफसरों को ग्रामीणों से बातचीत की वीडियो रिकॉर्डिंग भी दिखाई गई।

ये आरोप लगाए

महिला संगठनों का आरोप है, 21 अक्टूबर को पेद्दागेलूर के जंगल में मवेशी चरा रही 14 साल की बालिका से उसकी चाची की मौजूदगी में आंख पर पट्टी बांध जबरिया सामूहिक अनाचार किया। इससे बालिका होश खो बैठी। उसे उसकी चाची घर लेकर आई। इसी दिन इसी गांव में एक गर्भवती को नाले में डुबोकर निर्वस्त्र किया और सामूहिक अनाचार किया गया। चिन्नागेलूर और पेद्दागेलूर में ही कम से कम 15 महिलाओं और गुंडम, बुडग़ीचेरू सहित अन्य गांवों में महिलाओं को निर्वस्त्र करने, मारपीट करने� और फिर से यौन हिंसा की धमकी देने के आरोप लगाए गए हैं। खाद्य सामग्री, पशु और� रुपए लूटने, पका-पकाया भोजन छीनने और डराने का आरोप लगाते महिला संगठनों ने पीडि़तों के नाम भी बताए।

जवानों की पहचान करना मुश्किल

महिला प्रतिनिधियों ने पत्रकारों को बताया, ऐसे मामले में दोषियों की पहचान और पीडि़तों को न्याय दिलाना मुश्किल होता है, क्योंकि फोर्स के जवान वर्दी में होते हैं और एक जैसे दिखते हैं और मुंह पर कपड़े बांधे होते हैं। दोषियों की पहचान करने की जवाबदारी पुलिस की होनी चाहिए।
एफआईआर होगी
बीजापुर कलक्टर यशवंत कुमार ने कहा, मामले की जांच की जा रही है। पीड़ित महिलाओं का मेडिकल परीक्षण किया जा रहा है। इसमें जो दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा गया है।

सरकार के नक्सल मोर्चे पर तैनात जवानो ने आदिवासी ग्रामीण महिलाओ के साथ शारीरिक यातना प्रतड़ना एवं बलात्कार को दिया अंजाम ..

घर में घुस कर सारे सामनो को फेक घर को तहस- नहस कर दिया गया ,

 40 से अधिक महिलाओं के साथ जानवरों की तरह पिटा गया , लगभग  7 से 10 महिलाओं के साथ शारीरिक यातना एवम् प्रताड़ना को अंजाम दिया गया, नदी में नहा रही गर्भवती महिला के साथ जबरिया बलात्कार का प्रयास किया गया, दुष्कृत को रोकने का प्रयास कर रही महिला को मारा-पिटा गया सारे कपडे छीन कर महिला को निह्वस्त्र कर पेटी कोर्ट में महिला अपने घर गई, महिलाओ को अर्धनग्न कर यातनाये दी गयी ।13 साल की नाबालिक लड़की जो गाय बैल चराने का काम करती थी बारी-बारी से बलात्कार को अंजाम दिया गया, बर्तन देने से मना करने पर बच्चे को दूध पिला रही महिला को बच्चे को छुडा कर उसके स्तनों के साथ दुष्कृत कर महिला के साथ लैंगिग अपराध को अंजाम दिया गया|  


                          चौकिये मत यह सब दुष्कृत्य को सरकार के नक्सल मोर्चे में तैनात जावानो ने अंजाम दिया है | पुरे मामले का खुलासा बस्तर के पत्रकार, महिला मंच, और सामजिक कार्यकर्ताओं ने किया है | 
 विभिन्न जन संघटनो, मंचो के द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार बासागुडा थाना अंतर्ग्रत 20 से 25 तारीख को संयुक्त सर्चिग अभियान जिसमे crpf,कोबरा, और drg के जावन शामिल थे पैदागैलुर,गुड्गीचुरू,गुडम के आदिवासी समुदाय के ग्रामो में जावनो खूब उत्पात मचाते हुए महिलाओं के साथ बलात्कार, लैंगिग अपराध और ग्रामीणों के घरो को तोड़ दिया गया है, 

Dear all,

This is a quick update about from the team here. On the first day the team
divided into two and went to Sukma and Nilavaya to cover two different set
of inicidents there.
Day before yesterday, the team went to Sarkeguda to meet the villagers
there. Just few weeks before that we(shalini and I) had recieved
information from few journalists about an encounter and rape inicdent in
the villages surrounding sarkeguda. In bijapur, the team met the women from
those villages (peddagellur aur budgicheru) who told them that between
18-21, CRPF forces including local police were in these villages. 2 women
were raped( one pregnant and one juvenile), one woman was asked to milk her
breasts to prove that she had just given birth, kids (including girls and
boys were stripped naked) and much more. Women further informed that no one
was killed in their village but they have heard of some deaths in other
villages. Villagers also informed that after the incident, they all tried
to meet the collector but were stopped by the forces on the way to the
Collector's office. Day before, after meeting these women WSS team went to
the collector and complained about the incident, who then asked all of them
to stay back and get women from the village to the collectorate so that
their statements could be taken by the SDM. The Team stayed back in Bijapur
and yesterday, 31-10-15, brought some of the women to bijapur.  Shalini and
Soni Sori also joined them yesterday. More gory details of the incident
have since come out. I had a talk with them in the morning, the team along
the villagers are still in bijapur where women were going to give
statements to the collector/SDM.Their phones have been out of network so I
don't know what has happened since then. They all plan to come back tonight.

Will keep you all informed, as and when i know more.


Isha






कैसा होगा इनका भारत! -शीबा असलम फ़हमी

कैसा होगा इनका भारत!   -शीबा असलम फ़हमी


कभी कभी मेरे मन में ख्याल आता है की कैसा होगा इनका भारत?
क्या उसमे ताज महल, मकबरे, मीनारें, इमाम बाड़े होंगे?
क्या उसमे मुग़ल गार्डन, निशात बाग़, शालीमार बाग़ होंगे?
क्या नर्गिस, गुल हिना, इत्र, गुलाब, तब भी महका करेंगे?
क्या तब भी शेरवानी, अचकन, गरारे-शरारे लहराया करेंगे?
क्या तब भी झूमर-झुमके गुलूबंद-शौक़बंद के लश्कारे दमकेंगे?
क्या तब भी बिरयानी-पुलाव, मुतनजन-क़ोरमे, कबाब-शीरमाल, वाज़वान से दस्तरख्वान आरास्ता होंगे?
क्या तब भी कोहेनूर, मुग़लेआज़म, लैला-मजनू, मियां मक़बूल, पाकीज़ा परदे का मुंह देखेंगी?
क्या तब भी शहज़ादा सलीम, अनारकली, साहेब जान, उमराओ जान की सरकशी के क़िस्से आम होंगे?
क्या तब भी बड़े ग़ुलाम अली, बेगम अख़्तर, मो रफ़ी, ए.आर.रहमान की सदाएं दिलों में उतरा करेंगी?
क्या तब भी मीर-अमीर-दबीर, ग़ालिब-जालिब, लुधयानवी-जलन्धरी के नग़मे गूंजा करेंगे?
क्या तब भी मुरादाबादी नक़्क़ाशी, फ़िरोज़ाबादी क़ुमक़ुमे, कश्मीरी ग़लीचे, नस्तालीक ख़ुश-ख़ती से अशोका-हॉल रौशन होगा?
क्या तब जी टी रोड, उसकी कोस-मीनारें, उसके मुसाफ़िर खाने, वली दकनी के मज़ार की तरह ज़मींदोज़ कर दिए जाएंगे?
ख़ाली-ख़ाली रीता-रीता, सूना-सूना फीका-फीका, आधा-अधूरा ग़रीब-गुरबा, क्या ऐसा होगा इनका भारत?
---शीबा असलम फ़हमी

छत्तीसगढ़ ने पूरा किया 15 साल का सफर, लेकिन बाकी है मंजिल का मिल जाना

छत्तीसगढ़ ने पूरा किया 15 साल का सफर, लेकिन बाकी है मंजिल का मिल जाना







rajkumar soni 



Posted:IST   Updated:ISTRaipur : Chhattisgarh accomplished 15-year journey, but the rest of the floor to get
छत्तीसगढ़ ने 15 साल का सफर पूरा कर लिया है, प्रदेश में राजनीतिक स्थिरता बनी रही लेकिन विकास में कहीं आगे तो कहीं पीछे भी रह गए।
रायपुर. बात नवम्बर 2000 से कुछ पहले की है। जब यह साफ होने लगा था छत्तीसगढ़ देश का 26वां राज्य घोषित कर दिया जाएगा। तब यह सवाल भी उठ रहा था कि अगर राज्य बना तो इसका फायदा किसको मिलेगा।
दिल्ली-भोपाल के चैनलों की दस्तक होने लगी थी और राजनेता यह बताने में लग गए थे कि सर्वाधिक आबादी आदिवासियों की है इसलिए सबसे ज्यादा लाभ के हकदार इसी तबके के लोग होंगे। मगर अन्य तबकों को भी इसलिए निराश नहीं होना पड़ेगा, क्योंकि राज्य प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है।
कहा जा रहा था कि जब खनिज का उपयोग स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाएगा तो हर हाथ के पास काम होगा। कई तरह सामाजिक- राजनीतिक सभा- सम्मेलनों के बाद देखते-देखते ही राज्य बन गया और विधायकों की संख्या के आधार पर कांग्रेस की सरकार बन गई। वर्ष 2004 में भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला।

अजीत जोगी बने पहले सीएम
आईएएस रहे अजीत जोगी प्रदेश के पहले सीएम बनाए गए। उन्होंने सबसे पहले किसानों से धान खरीदने की घोषणा की और कारखानों को आक्सीजन देने का काम किया। उन्होंने फसल चक्रपरिवर्तन कार्यक्रम चलाकर संदेश दिया किया कि अगर अमीर धरती के गरीब लोग चाहे तो अपनी किस्मत बदल सकते हैं। गरीबों की तकदीर तो नहीं बदली अलबत्ता तेजी से बदले राजनीतिक घटनाक्रमों से उन पर तानाशाह सीएम होने का ठप्पा जरूर लग गया।
अंबरीश कुमार, जो उन दिनों एक दैनिक के संपादक थे कहते हैं, सरकार की शुरूआत बहुत बढिय़ा थी। बाद में उन्हें नौकरशाहों के भरोसे चलने वाला सीएम कहा जाने लगा। बची-खुची कसर उनके पुत्र अमित जोगी ने पूरी कर दी। तमाम तरह के राजनीतिक अंर्तविरोधों के बावजूद जोगी शासनकाल की सबसे अच्छी बात यह थी कि 1 नवम्बर 2000 को राज्य पर जो 8 हजार करोड़ का कर्ज था वह कुछ दिनों में ही रिजर्व बैंक को लौटा दिया गया।
पूर्व वित्त मंत्री रामचंद्र सिंहदेव कहते हैं, हमें पता था कि लोग हमें कंजूस बोलेंगे, लेकिन हम एक गरीब-आदिवासी राज्य में फिजूलखर्ची को बढ़ावा देने के पक्ष में नहीं थे। वर्ष 2004 में जब राज्य की सत्ता का चेहरा बदला तो एक बार फिर यह कहा जाने लगा कि अब सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा।
कांग्रेस शासन की तुलना में भाजपा सरकार ने नई राजधानी बनाने, हर जिले में बड़े शासकीय भवनों के निर्माण और कुछ इलाकों में सड़कों का जाल बिछाने में पर्याप्त ध्यान दिया लेकिन यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि सरकार योजनाओं को धरातल पर पहुंचाने में नाकाम रही है।
बाहर आएं खूनी प्रदेश की पहचान से
छत्तीसगढ़ का एक बड़ा और खौफनाक सच माओवाद भी है। एक दशक में जिस ढंग से माओवाद ने पूरे प्रदेश को अपनी गिरफ्त में लिया है उसके बाद छत्तीसगढ़ की इमेज एक खूनी प्रदेश के रुप में बनी है। माओवाद मामलों के जानकार अजय साहनी कहते हैं- जब माओवादी पड़ोसी राज्यों से छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर रहे थे तब उन्हें पनपने का पूरा मौका दिया गया।
माओवाद के खात्मे के लिए कभी कोई कांक्रीट नीति नहीं बनाई गई। सरकार कभी कहती रही कि माओवादियों को घुसकर मारेंगे तो कभी कहती है गले लगाने को तैयार है। केंद्र ने वन अधिकार कानून लागू किया तो आदिवासियों को पट्टा देने में तंगदिली दिखाई गई। आदिवासियों को कभी कुछ अपना समझकर नहीं दिया गया।
विकास हुआ, लेकिन ज्यादा की जरूरत
ऐसा भी नहीं है कि भाजपा शासनकाल में रेखांकित करने लायक कुछ भी नहीं हुआ हो।� इसे किस्मत कहिए या यहां के आवाम की तासीर... 15 साल में महज एक बार जब जोगी ने भाजपा के विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर लिया था और दूसरी बार जब आदिवासी नेता बलीराम कश्यप को मुख्यमंत्री बनाने की कवायद हुई थी, के अलावा कभी राजनीतिक अस्थिरता नहीं आई।
छत्तीसगढ़ का अभी झंझावतों के दौर से गुजरना थमा नहीं है। सारे झंझावत घरेलू है, जिनसे निपटने और कहीं-कही समेटने की गुंजाइश अभी बाकी है। एक नया राज्य 15 साल पहले अपने सफर में निकला था... उसकी मंजिल अभी आनी बाकी है।
बंद हो खनिज संपदा की लूट
एक संस्था ने पड़ताल में माना है कि खनिज संपदा लूट में छत्तीसगढ़ सबसे आगे हैं। खनिज मामलों के जानकार आलोक शुक्ला कहते हैं, सरकार कार्पोरेट सेक्टर को ही फायदा पहुंचाने की नीयत से काम कर रही है। आदिवासी बहुल राज्य में यह सवाल उठा है कि आदिवासियों की संख्या घट रही है।
सर्व आदिवासी समाज के महासचिव बीएस रावटे कहते हैं, बस्तर के एक लाख से ज्यादा आदिवासी इसलिए इधर-उधर हो गए। छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है, लेकिन अब कटोरे में भी सूराख हो चला है। कृषि विशेषज्ञ संकेत ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंघोपाध्याय मानते हैं कि सरकार ने ठोस उपाय नहीं किए। प्रदेश में मानव तस्करी, हाथी-मानव संघर्ष की समस्या तो मौजूद है ही। भ्रष्टाचार भी बड़ी चुनौती है।
(स्टेट ब्यूरो चीफ राजकुमार सोनी )
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यहां 45 गांव के लोग जी रहे गुमनाम जिंदगी, जहां अंदर जाना है जानलेवा ; रावघाट से

 यहां 45 गांव के लोग जी रहे गुमनाम जिंदगी, जहां अंदर जाना है जानलेवा ; रावघाट से रावघाट से पुनीत कौशिक की रिपोर्ट
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Posted:IST   Updated:ISTBhilai : 45 villagers living anonymous lives, where to go in the murderous

लौह अयस्क के अकूत भंडार ��"र धुर मा��"वादी क्षेत्र रावघाट के 45 गांवों के लोगों की जिंदगियां ऐसी जकड़ी हुई है कि यहां लगी फोर्स की इजाजत के बगैर परिंदा भी पर नहीं मार सकता।











दुर्ग/भिलाई. क्या आप आजाद देश के अपने राज्य में किसी ऐसे क्षेत्र की कल्पना कर सकते हैं, जहां आमजन के जाने की मनाही और वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी नजरबंद हो। लौह अयस्क के अकूत भंडार और धुर माओवादी क्षेत्र रावघाट के 45 गांवों के लोगों की जिंदगियां ऐसी जकड़ी हुई है कि यहां लगी फोर्स की इजाजत के बगैर परिंदा भी पर नहीं मार सकता। नतीजा, गांव के लोग मूलभूत सुविधाओं शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली से कोसों दूर हैं।
जंगलों में बसे इन गांवों के लोग तो इस बात से भी अनजान हैं कि उन्हें लौह अयस्क खनन से पहले हटा दिया जाएगा। सरकारी व्यवस्था ऐसी है कि ग्रामीणों को उनकी जमीं से जब बेदखल किया जाएगा तो उनकी आवाज भी जंगलों में ही दम तोड़ देंगी, क्योंकि ये गांव अब तक राजस्व ग्राम का दर्जा भी हासिल नहीं कर सके हैं।
पत्रिका टीम की पड़ताल में पूरे मंजर का खुलासा करती रपट-रावघाट के दायरे में आने वाले 45 गांवों में से 27 कांकेर जिले और 18 नारायणपुर जिले में आते हैं, जहां प्रशासन की पहुंच शून्य है। प्रशासनिक गतिविधियों और शासन की योजनाओं को अंतागढ़ और नारायणपुर तक ही समेट दिया गया है। यह ऐसा इलाका है, जिसे अतिसंवेदनशील घोषित कर सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया गया है।
तारकोल गांव के करीब पहुंचे तो हमें पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों ने आगे बढऩे से रोक दिया। हमने हाट बाजार में कोरगांव, अजरेल, सूपगांव, परलभाट, खडग़ांव, रावडोंगरी समेत आठ गांव से आए लोगों से उनका हाल जानने की कोशिश की, लेकिन वे इतने सहमे और डरे हुए दिखे कि अपना नाम भी बताने से बचते रहे।
बाजार आने के लिए सुरक्षा बलों की अनुमति और जांच से होकर गुजरना पड़ता है तो अंदर माओवादियों को बताना पड़ता है। मालूम हुआ, जंगल में रहने वाले ग्रामीणों को डेढ़ से दो किलोमीटर दूर से पहाड़ी नालों या झरनों से पानी लाना पड़ता है। अन्य सुविधाओं की बात कर तो उनके साथ मजाक करने जैसा है।
अब कोई नहीं करता हक की बात
पहले यहां के वनवासियों की सुध लेने जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ता पहुंचते थे। उनका आना-जाना भी बंद हो गया है। मोर्चा के अध्यक्ष जीतगुहा नियोगी का कहते हैं, वनवासियों के हित की बात करो तो विकास विरोधी कहा जाता है। रावघाट के वनवासी पैरामिलिट्री फोर्स के हवाले हैं, जो उन्हें दवाई और कपड़े दे देते हैं, जिससे कुछ होने वाला नहीं। वनवासियों को मुख्यधारा से जोड़कर ही विकास के लिए सोचने की जरुरत है।
बेदखल किए जाने पर आवाज भी दबी रह जाएगी
कांकेर कलक्टर शम्मी आबिदी भी मानती हैं, लौह अयस्क के खनन के दौरान विस्थापित किए जाने के बाद इन ग्रामीणों को मुआवजा मिलना मुश्किल होगा, क्योंकि ये वनग्राम राजस्व रिकॉर्ड में नहीं हैं। वे कहती हैं, ये गांव रावघाट की दुर्गम पहाडिय़ों और कठोर चट्टानों के बीच बसे हैं, जहां बोर के लिए गाड़ी नहीं जा सकती। इन गांवों में स्कूल, राशन की दुकानें और अस्पताल भी नहीं हैं।
नारायणपुर कलक्टर टामनसिंह सोनवानी कहते हैं, स्वास्थ्य कैंप� व कुपोषित बच्चों के लिए कैंप करवाते हैं, जो नारायणपुर में लगता है। रावघाट परियोजना के प्रभारी और भानुप्रतापुर पश्चिम वन मंडलाधिकारी बीएस ठाकुर ने कहा, अब कोई वनग्राम रहा नहीं, इसलिए वन विभाग की ओर से इन गांवों में कोई काम नहीं है।
रेल लाइन बिछाने के लिए पेड़ों की कटाई का काम ही देख रहे हैं। दल्लीराजहरा से रावघाट तक बिछाई जा रही रेल लाइन का काम चार साल से देख रहे इंजीनियर अजीत जैन कहते हैं, ट्रेन चलेगी तो क्षेत्र में विकास के द्वार खुलेंगे। उन्होंने कहा, यह काम 2013 में पूरा हो जाना था।
25 किमी चलकर लाते हैं राशन
राशन के लिए 20 से 25 किमी पैदल चलना पड़ता है। तोडाकी या बाजार हाट वाले गांवों में राशन की दुकानें खोली गई हैं। पैरामिलिट्री फोर्स की सुरक्षा में वहां अनाज पहुंचाया जाता है। कांकेर के खाद्य अधिकारी जीआर ठाकुर ने माना, वे रावघाट के दायरे में आने वाले सुदूर गांवों में कभी नहीं गए। वे बताते हैं, पीडीएस की यहीं व्यवस्था है। उन्हें अनाज मिलता है या नहीं, कितना मिलता है, इसकी मॉनिटरिंग नहीं होती।
(रावघाट से पुनीत कौशिक की रिपोर्ट
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फसल बर्बाद होने व कर्ज में दबे एक और किसान ने पीया कीटनाशक

फसल बर्बाद होने व कर्ज में दबे एक और किसान ने पीया कीटनाशक






Posted:IST   Updated:ISTraipur: Crop failure and farmer drank pesticide and buried in debt
रात में माहो मारने वाली कीटनाशक पीने के बाद रेखराम को उल्टियां होना शुरू हुईं तो परिजन उसे संजीवनी 108 से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया।
दुर्ग/बालोद/गुरुर. प्रदेश में एक और किसान ने फसल बर्बाद होने और कर्ज के बोझ से व्यथित होकर जान दे दी। गुरुर ब्लॉक के दर्रा गांव के 50 वर्षीय किसान रेखराम साहू ने शुक्रवार की रात साढ़े 8 बजे कीटनाशक पी लिया। तीन साल से लगातार फसल खराब होने और करीब 80 हजार रुपए के कर्ज हो जाने से रेखराम बेहद परेशान था। विधायक भैयाराम सिन्हा ने मदद के रूप में 10 हजार रुपए परिवार को दिए।� रात में माहो मारने वाली कीटनाशक पीने के बाद रेखराम को उल्टियां होना शुरू हुईं तो परिजन उसे संजीवनी 108 से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया।
देर से पहुंचा शासकीय अमला
जानकारी के अनुसार किसान रेखराम की मौत शुक्रवार रात 11 बजे हुई थी। घटना के दूसरे दिन सुबह 10 बजे उसके शव को घर पहुंचा दिया गया था। घटना के बाद शोकजदा परिवार को सांत्वना देने के लिए सभी लोग पहुंचे, लेकिन शासकीय अमला शनिवार दोपहर ढाई बजे के बाद पहुंचा। इसमें पुलिस, तहसीलदार, एसडीएम, कृषि अधिकारी शामिल थे। शासकीय कार्यवाही देर शाम तक चलती रही। शासकीय अमले ने पूरी जांच के बाद रिपोर्ट कलक्टर तक पहुंचाने की बात कही।
जमीन नहीं है
रेखराम के पास जमीन नहीं थी, इसलिए वह रेगहा लेकर खेती कर रहा था। उसके लिए वह कर्ज लिया था। रेखराम ने दोनों पुत्र और पुत्री की शादी उधार लेकर की थी। मृतक के पास पहले छह एकड़ खेती थी, जो बिक चुकी है। गांव में 350 हेक्टर कृषि भूमि : दर्रा में कुल 350 हेक्टेयर कृषि भूमि है। इसमें से आधे से अधिक फसल में माहो का प्रकोप है। इससे फसल बर्बाद होने के कगार पर है। गुरुर ब्लॉक में वर्तमान में 27198 हेक्टेयर में धान की फसल है। कृषि विस्तार अधिकारी जेपी सोनी के अनुसार विकासखंड में 350 हेक्टेयर में माहो का प्रकोप है।
फसल की बर्बादी के कारण हुई घटना :� बालोद विधायक भैयाराम सिन्हा ने कहा, प्रशासनिक लापरवाही के कारण किसान ने आत्महत्या की है। प्रशासन फसलों की स्थिति पर ध्यान नहीं दे रहा है। कर्ज व फसल की बदहाली को देखकर किसान ने आत्महत्या की। प्रशासन अपनी नाकामी छुपाने के लिए गलत रिपोर्ट बनाई है। पूरे जिले की फसल में माहो का प्रकोप है।
किसान ने नहीं लिया कर्ज : गुरुर के तहसीलदार डीआर मरकाम ने कहा,हमने मामले में उनके परिजन और ग्रामीणों से पूछताछ की है। किसान ने कर्ज नहीं लिया है। किसान कर्ज से आत्महत्या नहीं की है।
फसल में तीन साल से नुकसान
पुत्र दौलत ने बताया, उनके पिता बीते तीन साल से रेगहा में धान फसल ले रहे थे, लेकिन एक भी साल फायदा नहीं हुआ। वह कर्ज लेकर खेती कर रहा था। नुकसान के कारण रेखराम पिछले साल खेत मालिक को पांच क्विंटल धान नहीं दे पाए थे। इस साल दो एकड़ खेत रेगहा लिए थे, लेकिन दोनों एकड़ फसल माहो की चपेट में आने के कारण बर्बाद हो गया। इससे रेखराम चिंतित था। पता चला है कि मृतक शराब का आदी था।
साहूकारों से 50 हजार व ग्रामीण बैंक से 34 हजार कर्ज
किसान के पुत्र दौलत ने बताया, कीटनाशक दवा के लिए भी पैसे उधार लिए थे। खेती के लिए उसने साहूकारों से 40-50 हजार रुपए लिया था। छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक से करीब 34 हजार रुपए कर्ज ले रखा था। परिवार मजदूरी करता है।
घर में रोता था रेखराम
किसान की पत्नी नेमीन ने बताया, फसल बर्बाद होने के कारण रेखराम दो सप्ताह से परेशान था। कर्ज की चिंता को लेकर रात में रोता था। घर में वह एक ही बात करता था कि पिछले तीन साल से फसल में घाटा हो रहा है। कर्ज भी है। माहो ने फसल को बर्बाद कर दिया है। अब क्या करें।
कांग्रेस करेगी जांच �
राजनांदगांव छुरिया किरगाहाटोला के किसान ईश्वर लाल कोर्राम और धमतरी के किसान रेखराम की खुदकुशी मामले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने अलग-अलग समिति गठित की है। छुरिया में शंकर लाल ताम्रकार और गुरूर में घनाराम साहू को संयोजक बनाया गया है।
कर्ज नहीं, पारिवारिक विवाद है वजह
घटना की जानकारी मिलने के बाद तहसीलदार और एसडीएम जांच के लिए घटनास्थल भेजा गया। जांच में पता चला कि मृतक का कहीं कोई बैंक में कर्ज नहीं है। पारिवारिक विवाद के कारण किसान ने कीटनाशक दवा सेवन कर आत्महत्या की। मृतक नशे का भी आदी था। जांच में फसल के नुकसान को सिरे से नकारा गया है। घटना का मुख्य कारण पारिवारिक विवाद है।
राजेश सिंह राणा, कलक्टर, बालोद
विरोधाभासी
गांव में चर्चा है, पिता-पुत्र के बीच विवाद होता था। किसान की पत्नी ने कहा, घर पर सभी खुश थे। कहीं विवाद नहीं हुआ। किसान के पुत्र दौलत का कहना है, ग्रामीण बैंक में 34 हजार रुपए का कर्ज है। फसल की स्थिति ठीक नहीं है, इससे परेशान होकर पिता ने आत्महत्या की। अब सवाल उठ रहा है, मामले में प्रशासन की रिपोर्ट सही है या किसान के परिजन सही।

सुरक्षाबल के जवानों पर महिलाओं के साथ मारपीट और दुष्कर्म का आरोप ; महिला संघटनो की जाँच दल की रिपोर्ट

सुरक्षाबल के जवानों पर महिलाओं के साथ मारपीट और दुष्कर्म का आरोप ; महिला संघटनो की जाँच दल की रिपोर्ट

Posted:IST   Updated:ISTBijapur : Security forces beat up women and rape charges




बासागुड़ा थाना क्षेत्र के चिन्नागेलूर में बालिका ��"र विवाहिता के साथ अनाचार का आरोप गश्त पर गए सुरक्षाबल के जवानों पर लगाया गया है।









बीजापुर. बासागुड़ा थाना क्षेत्र के चिन्नागेलूर में बालिका और विवाहिता के साथ अनाचार का आरोप गश्त पर गए सुरक्षाबल के जवानों पर लगाया गया है। महिला अधिकार मंच और सहेली संस्था की प्रतिनिधियों ने कलक्टर यशवंत कुमार और एएसपी आईके ऐलेसेला को इसकी शिकायत की है, लेकिन 10 दिन बाद भी न तो प्रार्थी का पता है और न ही कथित पीडि़ता सामने आई है।
छत्तीसगढ़ महिला अधिकार मंच की रिनचिन, महिला मंच मप्र की शिवानी, महिला मंच छत्तीसगढ़ की महिन, सहेली नई दिल्ली की अनुराधा, रायपुर की श्रेया और बेला भाटिया घटना का सच पता करने यहां पहुंची हैं। इनके साथ अधिवक्ता शालिनी और आम आदमी पार्टी की सोनी सोढ़ी भी जिला मुख्यालय आईं।
महिलाओं से की मारपीट
फैक्ट फाइंडिंग टीम का कहना है, 20 अक्टूबर को दोपहर ढाई बजे सीआरपीएफ और डीएफ के जवान तीन-चार समूह में गश्त पर चिन्नागेलूर पहुंचे थे और वहां महिलाओं से मारपीट की। पेदागेलूर में 15 वर्षीय बालिका से अनाचार किया और 20 साल की विवाहित के साथ जबरदस्ती की।
घर से लूट ले गए सात हजार
टीम का आरोप है, गांवों में जवानों ने महिलाओं के कपड़े फाड़े और अश्लील हरकत की। मेटापारा की अधेड़ महिलाओं को पीटा और एक से पैसे छीन लिए। घरों में घुसकर मुर्गी जबरन ले लिए। गुंडम गांव में एक घर से 7 हजार लूटे। अगस्त में भी जवानों ने यहां मारपीट की थी। इस बार 20 से 24 अक्टूबर को जवानों ने चिन्नागेलूर, पेद्दागेलूर, पेगड़ापल्ली, बुडग़ीचेरू व गुंडम में उत्पात मचाया।
एसडीएम पहुंचे
एनजीओ की शिकायत के बाद कलक्टर के निर्देश पर एसडीएम बासागुड़ा पहुंचे और शाम तक प्रार्थी के आने का इंतजार करते रहे। इधर, सहेली और महिला अधिकार मंच के प्रतिनिधियों ने पीडि़ताओं को थाने लाकर एफआईआर दर्ज कराने की बात कही, लेकिन बारिश के चलते शाम तक चिन्नागेलूर से बासागुड़ा नहीं पहुंच सके थे।