Friday, February 6, 2015

जशपुर [छत्तीसगढ] मे कॉंग्रेस प्रतिनिधि द्वारा ईसाइयो को अपशब्द बोलने और धमकाने के खिलाफ

जशपुर [छत्तीसगढ] मे कॉंग्रेस प्रतिनिधि द्वारा ईसाइयो को अपशब्द बोलने और धमकाने के खिलाफ पीयूसीएल द्वारा चुनाव आयोग को शिकायत ,

CHHATTISGARH LOK SWATANTRYA SANGATHAN
(PEOPLE’S UNION FOR CIVIL LIBERTIES, CHHATTISGARH)
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                                                                                                                                                                                                                06.02.2015
To,                
                                Shri Praful Chandra Dalei,
                                The Chief Election Commissioner,
                                State Election Commission,
                                Near DKS Bhavan, Old Mantralaya, Raipur, C.G.

                                Smt. Nidhi Chhibbar,
                                Chief Election Officer

                                Shri  Ishwarlal Thakur
                                District Election Officer, District Jashpur.

                                Shri RS Bhagat,
                                District Election Observer, District Jashpur.

Subject:               To bring to the notice of the concerned Officers of the State Election Commission, the commission of an offence under Section 125 of the Representation of People’s Act, 1951 and Section 153A of the Indian Penal Code and a request for appropriate action.

Dear Sir/ Madam,
Kindly note the contents of the audio tape attached, which is a tape of the speech of Mr Prakash Mishra, candidate for the DDC (Zila Panchayat) election, Duldula Block delivered at Duldula Chowk, on 31stJanuary 2015 at 5.15 pm.
It is clear that the speaker in the tape has used highly objectionable, provocative and threatening language towards the Christian minority community, in connection with an election, and has thereby attempted to manipulate and influence such election.
It is also thus clear that Mr Prakash Mishra has committed an offence under Section 125 of the Representation of People’s Act, 1951 as well as Section 153A of the Indian Penal Code.

We request you to urgently take appropriate action in the matter to ensure free, fair and constitutional elections. We are ready to co-operate with any enquiry initiated in this regard.
Thanking you,

                                                                                                                                                                Yours sincerely,

                                                                                                                                                              Sudha Bharadwaj
                                                                                                                                                     Mobile No. 09926603877
Janhit, Near Indu Medical Chemist, Ring Road No. 2, Maharana Pratap    Chowk, Bilaspur, Chhattisgarh.                  

दिल्ली चलो, दिल्ली चलो, किसान - मज़दूर महारैली 24, फरवरी, 2015, जंतर मंतर, दिल्ली



कॉर्पोरेटभू माफि़आबिल्डरों को ज़मीन की लूट की छूट देने वाले

भूमि-अध्यादेश को रद्द करो!


दिल्ली चलोदिल्ली चलोकिसान मज़दूर महारैली
24, फरवरी, 2015, जंतर मंतरदिल्ली


साथियोजैसा की आप जानते हैं भूमि अधिग्रहण को आसान बनाने के लिए राजग सरकार ने पिछली साल अमल में आये कानून में संशोधन करके एक अध्यादेश पारित किया हैइस अध्यादेश को लाकर सरकार ने अपनी दो मंशाएं स्पष्ट की हैं-
1. इस सरकार को संसदीय प्रक्रिया और मर्यादा की परवाह नहीं है
2. देश के तथाकथित आर्थिक विकास के लिए किसानों से ज़मीनें छीनकर उन्हें देशी-विदेशी कार्पोरेट्स को देना है.
साथियोदेश के तमाम जन आन्दोलन आजादी के बाद से ही भूमि के समान वितरण,ज़मींदारी उन्मूलनकाश्तकारों को ज़मीन देने और बड़े पैमाने पर भूमि-सुधार के लिए सरकार के साथ संघर्ष में रहे हैंअंग्रेजों द्वारा बनाए गए 1894 के भूमि-अधिग्रहण कानून का विरोध समाज में इस मुद्दे पर रहा है कि यह किसानों और भूमि-मालिकों को यह हक नहीं देता कि वो अपनी ज़मीनें सरकार को देना चाहें या नहींइस कानून की मूल भावना में ‘राज्य की प्रभुसत्ता’ का सिद्धांत था जिसके अनुसार देश की समस्त प्राकृतिक संपदा अन्ततरू राज्य के नियंत्रण में हैहालांकि यहाँ उल्लेखनीय है कि यह औपनिवेशिक कानून फिर भी भू-धारकों के भू-अधिकारों पर केन्द्रित था यानी राज्य ज़मीन तो आपसे लेगा पर इस तरह से कि आपके भूमि-अधिकारों को मान्यता भी मिलेइस कानून में समय समय पर संशोधन होते रहे और1984 में इसे निजी कंपनियों के लिए भी लागू कर दिया गयाइसका ज़बरदस्त विरोध भी हुआइसके बाद जब बड़े पैमाने पर परियोजनाओं से विस्थापित होने वाली आबादी को सरकार ने उनके हाल पर छाड़ दिया तब जनांदोलनों के दबाव में पुनर्वास और पुनर्स्थापन की तरफ ध्यान देना पड़ा.
साथियो यह जनांदोलनों का दबाव ही था कि 2007 से भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए नए कानून बनाने की कवायद शुरू हुई और तमाम मसौदे पेश किये गए.संप्रग सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में दो अलग अलग कानून बनाने की कोशिश की लेकिन इसे कानून की शक्ल नहीं दी जा सकीइसके बाद संप्रग सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में दोनो कानूनों को जोड़कर एक कानून लाने की प्रक्रिया शुरू कीइस कानून के मूल मसौदे में जन आन्दोलनों के प्रभावी हस्तेक्षेपों के कारण सरकार की मंशा पूरी तरह से चल नहीं पाईऔर अंततः 2013 में ‘उचित मुआवजाभूमि अधिग्रहण में पारदर्शितापुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार अधिनियम, 2013’ आया उसमें नीयत ज़रूर पूंजीवादी वयवस्था की ज़रूरतों की पूर्ति की रही पर प्रक्रियाओं में यह कानून कुछ हद तक जनतांत्रिक थाहम जानते हैं इस कानून बनने की प्रक्रिया में देश के समस्त जन आन्दोलनों ने संघर्ष की लंबी श्रृखला चलाईऐसा नहीं है कि यह कानून जन आकांक्षाओं और विशेष रूप से किसानों और मजदूरों के हक में था पर फिर भी इसमें तमाम ऐसे प्रावधान थे जिनसे किसानों और मजदूरों के हितों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता थाविशेष रूप से ज़मीन धारकों की सहमति का प्रावधान,सामाजिक प्रभाव आंकलनभूमि-अधिग्रहण के बाद परियोजना शुरू होने की निश्चित समयावधिपुनर्वास और पुनर्स्थापन के स्पष्ट प्रावधान बगैरहयह कानून जनवरी 2013 में लागू हुआ और इसी के साथ 1894 के औपनिवेशिक कानून को खारिज कर दिया गया.गौरतलब है कि इस कानून के माध्यम से किसी एक परियोजना के लिए ज़मीन लेने का एक भी प्रयोग नहीं हुआ और राजग सरकार ने अपने आठ महीनों के अल्प कार्यकाल के दौरान ही इसमें संशोधन करते हुए एक ऐसा अध्यादेश लागू कर दिया है जो इस कानून में संशोधन की तरह नही बल्कि इसे पूरी तरह रद्द करने जैसा हैहम जानते हैं कि इस कानून के आने पर भी औद्योगिक जगत ने इसका विरोध किया थाइस सरकार ने केवल और केवल औद्योगिक जगत को ध्यान में रखकर यह संशोधन किये हैंजिन महत्वपूर्ण और जनतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन करने के प्रावधान इस कानून में थे उन्हें पूरी तरह खारिज करते हुए इसे वापिस उसी औपनिवेशिक कानून से भी खतरनाक बना दिया गया हैहम जानते हैं कि यह किसके दबाव में हो रहा है. ‘मेक इन इण्डिया’ का नारा देने वाले हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री बाहरी निवेश को बढ़ावा देने और देशी पूंजीपतियों की तिजोरियां भरने के लिए यह कहते हुए नहीं थकते कि हमारे देश में आपको सस्ता श्रमसस्ती मीन तो मिलेगी हीहम ऐसे कानून भी बनाएंगे जो किसी भी प्रकार से आपके निवेश और मुनाफे के रास्ते में रोड़ा नहीं बनेंगेंइस कानून में अध्यादेश के ज़रिये किये जा रहे रद्दोबदल प्रधानमंत्री की उसी घोषणा की परिणति है जो उन्होंने अमेरिका में बस गए हमारे देशी पूंजीपतियों के समक्ष अपने ‘शो’ में कहे थे कि उन्हें हर रोज देश के एक कानून को खत्म करने में आनंद की अनुभूति होगी.
इस अध्यादेश के जरिये वो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए बची-खुची गुंजाइश को भी पूरी तरह खत्म कर देना चाहते हैंइस अध्यादेश के माुर्फ़त वो तमाम बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि-अधिग्रहण को न केवल सरल बना देना चाहते हैं बल्कि बड़ी चालाकी से निजी कंपनियों को मनचाही ज़मीन देने के लिए रास्ता खोल देना चाहते हैं और इसलिए इस अधायादेश में औद्योगिक गलियारेविशेष आर्थिक क्षेत्रों जैसी विनाशकारी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण को आसान बनाया गया हैजन आंदोलन पहले भी इस तरह की बड़ी बड़ी परियोजनाओं का पुरजोर विरोध करते रहे हैं और बहुत मामलों में किसानों और मजदूरों ने अपनी आजीविका के साधन बचा पाए हैंअगर इस अध्यादेश को संसद के अंदर हरी झंडी मिल जाती है तो फिर जन आन्दोलनों के लिए लड़ाई के अवसर भी नहीं बचेंगे और मजदूर-किसान अपनी आजीविका के साधनों से बेदखल कर दिए जायेंगेहम कई लड़ाइयां जीते क्योंकि कानून हमारे पक्ष में थे पर इस अध्यादेश के लागू होने से कानून का सहारा हमें मिलने वाला नहीं है.
इस अध्यादेश में सामाजिक प्रभाव आंकलनअधिग्रहीत ज़मीन का नियत सीमा में उपयोग, 70-80 प्रतिशत भू-धारकों की सहमतिग्राम सभा की भूमिका जैसे प्रावधान खत्म करते हुए सरकार ने न केवल देश के भू-धारकों से उनकी ज़मीन छीनने का षणयंत्र रचा है बल्कि इसे एकतरफा फरमान की तरह बनाकर संविधान प्रदत्त हमारे न्यूनतम नागरिक अधिकारों का भी बलात हनन किया है.
साथियोइस सरकार ने जिस तेज़ी से अध्यादेशों को पारित किया हैवह चाहे कोयले के निजीकरण का होबीमा व रक्षा क्षेत्र में एफडीआई हो उससे पूरे भारतीय समाज में हलचल मची है और लोगों का भ्रम जल्द ही इस सरकार से टूट गया हैइस तरह से अध्यादेश लाना बताता है कि पूरी सरकार किस कदर घबराहट में कदम उठा रही हैउसमें इतना सहस नहीं है कि लोगों का विश्वास जीत पाएसंसद का भरोसा जीत पाएयह इन अध्यादेशों के ऊपर जागरूक जन आन्दोलनों का दबाव ही है कि भारत के राष्ट्रपति को एक बार नहीं बल्कि दोदो बार सरकार से यह पूछना पड़ा कि इस तरह अध्यादेश लाने की हड़बड़ी क्यों है?
यह सरकार बहुत कम समय में अपनी वैधता खो चुकी है लेकिन संसदीय लोकतंत्र की सीमाओं को समझते हुए हम यह भी जानते हैं कि अगले पांच साल तक इसे शासन में रहना है और यह इसलिए भी खतरनाक है कि इसके मंसूबे हमें पूरी तरह पता हैंअगले पांच साल काफी हैं देश में एक तानाशाही व्यवस्था कायम करने के लिएइस सरकार का सपना है कि समूल प्राकृतिक संपदा जितने जल्दी हो सके पूंजीपतियों के हवाले कर दी जाएइसके अलावा जिस तरह से यह सरकार लम्पट तत्वों को बढ़ावा दे रही है वो इनकी सिविल फ़ोर्स बनाने की तैयारी है जिसे ऐसे अवसरों पर समाज के अंदर बैमनस्य बढ़ानेऔर शांतिमयलोकतांत्रिक आन्दोलनों का दमन करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगाइसलिए संघर्ष अब दो तरफ़ा हैजहां एक तरफ हमें सरकार के इन तानाशाही अध्यादेशों से लड़ना है वहीं दूसरी तरफ हमें समाज के उन लम्पट तत्वों से भी लड़ना होगा.
ऐसी परिस्थितयों में हम समझते हैं कि सरकार ने पुनरू ज़मीन के मुद्दे को देश की राजनीति के केंद्र में ला दिया है और इतिहास के पन्नों को दुबारा खोला हैइसे हमें एक अवसर की तरह देखना चाहिएअगर सरकार ज़मीन अधिग्रहण करने के लिए एक तरफ़ा कानून ला रही है तो हमें भी अपनी वर्षों पुरानी न्यायपूर्णतार्किक और जन पक्षीय मांगों को समाज में स्थापित करने के प्रयास करने चाहिएऐसे में 23-24 जनवरी को नई दिल्ली में विभिन्न जन आन्दोलनों ने संयुक्त रूप से दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन किया थाइसमें यह प्रस्ताव आया था कि अब समय आ गया है जब सामाजिक जन आंदोलनों और मुख्य धारा के राजनैतिक दलों को एक साथ आकर इस अध्यादेश का कड़ा विरोध करना चाहिएइसी क्रम में यह तय हुआ है कि देश के तमाम जन आंदोलन और वाम पंथीसमाजवादी किसान आंदोलन और मजदूर संघ संयुक्त रूप से 24 फरवरी को संसद काघेराव करेंगेंयह समय है जब संसद के अंदर बजट सत्र चल रहा होगा और इसी दौरान यह सरकार इस अध्यादेश को संसद में पारित करवाने की कोशिश करेगी.
इस समय सामाजिक आन्दोलनों और राजनैतिक दलों का एक साथ आकार दबाव बनाना एक कारगर रणनीति हो सकती हैइसके अलावा हमें लड़ाइयों के कई केंद्र बनाने होंगेइस अध्यादेश का विरोध जिला स्तर भी हो और अपने निर्वाचन क्षेत्र के सांसद पर भी संसद के अंदर इस कानून का विरोध करने का दबाव बनाया जाए.
तो साथियोहम आप सभी से अनुरोध करते हैं कि आगामी 24 तारीख को जन्तर मंतर पर इस अधायादेश के विरोध में देश की तानाशाही सरकार पर दबाव बनाने के लिए भारी संख्या में आयें और इस सरकार को यह सन्देश दें कि देश के किसानमजदूर और तमाम मेहनतकाश वर्ग अभी गूंगा बहरा नहीं हुआ हैवह ज्यादा जागरूक और अपने हको को लेकरदेश के समुचित विकास और एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने को लेकर सरकार से कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध है.
इस अध्यादेश को हम पारित नहीं होने देंगे!
जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), अखिल भारतीय वन श्रम जीवी मंच,राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठनएकता परिषद्जन संघर्ष समन्वय समितिछत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलनजनपहलकिसान संघर्ष समितिसंयुक्त किसान संघर्ष समितिइन्साफ,दिल्ली समर्थक समूहयुवा क्रांति


संपर्क: 9958797409, 9810423296, 9818905316, 9911955109

Thursday, February 5, 2015

गाँधी की नजरों में आरएसएस रामपुनियानी

गाँधी की नजरों में आरएसएस


रामपुनियानी 

मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही, गांधीजी को इस रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास हो रहे हैं, जिससे आरएसएस को लाभ हो। पहले, गांधी जयंती (2 अक्टूबर) से ''स्वच्छता अभियानÓÓ की शुरूआत की गई। फिर, यह दावा किया गया कि गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का आरएसएस से कोई लेना देना नहीं था। अब गांधी से इस आशय का प्रमाणपत्र हासिल करने के प्रयास हो रहे हैं कि ''आरएसएस बहुत अच्छा संगठन हैÓÓ।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल (जनवरी 2015) में गुजरात के गांधीनगर में गांधीजी पर केंद्रित संग्रहालय ''डांडी कुटीरÓÓ में आने वाले दर्शकों को एक मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन दिखाया जा रहा है, जिसमें यह बताया गया है कि सन् 1930 में गांधीजी, घनश्यामदास बिडला के साथ, वर्धा में आरएसएस के एक शिविर में पहुंचे थे। गांधीजी, आरएसएस की कार्यप्रणाली से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने संघ के संस्थापक हेडगेवार से मिलने की इच्छा प्रगट की। यह भी दावा किया गया है कि गांधीजी, अगले दिन, हेडगेवार से मिले भी।
जो कुछ हमें निश्चित तौर पर ज्ञात है, उससे ये दावे खोखले प्रतीत होते हैं। यह सर्वज्ञात है कि संघ, गांधीजी की राजनीति का घोर विरोधी था। वह असहयोग आंदोलन से आम लोगों को जोड़कर, राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक स्वरूप देने के गांधीजी के प्रयास का भी आलोचक था। इस आंदोलन से देश में व्यापक जाग्रति आई और आमजन ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन से जुड़े। यह भारत के ''निर्माणाधीन राष्ट्रÓÓ बनने की राह में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। संघ, इस भारतीय राष्ट्रवाद का कटु आलोचक था। आरएसएस के संस्थापक, गांधीजी के हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के प्रयास से भी इत्तेफाक नहीं रखते थे। वे असहयोग आंदोलन के भी खिलाफ थे। हेडगेवार ने आगे चलकर लिखा, ''महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के नतीजे में देश का उत्साह ठंडा पड़ गया और जिन सामाजिक बुराईयों को इस आंदोलन ने जन्म दिया, वे अपना डरावना सिर उठाने लगींÓÓ। उनके अनुसार, ''इस आंदोलन के कारण ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण टकराव स्पष्ट सामने आ गयाÓÓ (केशव संघ निर्माता, 1979; सीपी भिसीकर, पुणे, पृष्ठ 7)। जिसे हेडगेवार, ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण टकराव बता रहे थे, दरअसल, वह दलितों का भू-अधिकार व सामाजिक गरिमा हासिल करने और जातिगत पदानुक्रम के विरूद्ध संघर्ष था। अस्त होती औद्योगिक सामाजिक व्यवस्था के मूल्यों के प्रति अपनी वफादारी के चलते, हेडगेवार इस आंदोलन के विरोधी थे। गैर-ब्राह्मण आंदोलन तो असल में समाज में जातिगत रिश्तों के यथास्थितिवाद को चुनौती दे रहा था।
हेडगेवार के उत्तराधिकारी गोलवलकर ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की आलोचना इसलिए की क्योंकि वह ''केवल ब्रिटिश-विरोधीÓÓ था। वे लिखते हैं, ''क्षेत्रीय राष्ट्रवाद व समान शत्रु के सिद्धांत, जो राष्ट्र की हमारी अवधारणा का आधार हैं, ने हमें हमारे असली हिंदू राष्ट्रवाद की सकारात्मक व प्रेरणास्पद अंतर्वस्तु से वंचित कर दिया। ब्रिटिश-विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद का पर्याय माना जाने लगा, इस प्रतिक्रियावादी सोच ने स्वाधीनता आंदोलन, उसके नेताओं और उसके समर्थकों पर विनाशकारी प्रभाव डालाÓÓ (बंच ऑफ थॉट्स, बैंगलोर, 1996, पृष्ठ 138)। गांधीजी और भारतीय राष्ट्रवाद की गांधी की अवधारणा व भारत को राष्ट्र-राज्य के रूप में एक करने के उनके संघर्ष के बारे में संघ के ये विचार थे।
और गांधी संघ को किस नजर से देखते थे? चूंकि काफी लंबे समय तक आरएसएस 'चुपचापÓ काम करता रहा इसलिये स्वाधीनता आंदोलन के दौरान आरएसएस की भूमिका की विशेष चर्चा तत्कालीन साहित्य में नहीं है। चूंकि संघ, राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं था इसलिए इस आंदोलन में उसकी भूमिका के बारे में भी हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। परंतु उपलब्ध स्त्रोतों से जो भी जानकारी हमें मिलती है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि गांधीजी, आरएसएस के प्रशंसक तो कतई नहीं थे। 'हरिजनÓ के 9 अगस्त 1942- के अंक में गांधी लिखते हैं, ''मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी गतिविधियों के बारे में सुना है। मैं यह भी जानता हूं कि यह एक सांप्रदायिक संगठन है।ÓÓ उन्होंने यह टिप्पणी 'दूसरेÓ समुदाय के खिलाफ नारेबाजी और भाषणबाजी के संबंध में एक शिकायत के प्रति उत्तर में कही। इसमें गांधी, आरएसएस कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण की चर्चा कर रहे हैं जिसके दौरान कार्यकर्ता ये नारे लगाते थे कि यह राष्ट्र केवल हिंदुओं का है और अंग्रेजों के देश से जाने के बाद हम गैर-हिंदुओं को अपने अधीन कर लेंगे। सांप्रदायिक संगठनों द्वारा की जा रही गुंडागर्दी के संबंध में वे लिखते हैं, ''मैंने आरएसएस के बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं। मैंने यह भी सुना है कि जो शैतानी हो रही है, उसकी जड़ में संघ हैÓÓ, (कलेक्टिव वर्क्स ऑफ गांधी, खंड 98, पृष्ठ 320-322)।
आरएसएस के संबंध में गांधीजी के विचारों का सबसे विश्वसनीय स्त्रोत उनके सचिव प्यारेलाल द्वारा वर्णित एक घटना है। सन् 1946 के दंगों के दौरान, प्यारेलाल लिखते हैं, ''गांधीजी के साथ चल रहे लोगों में से किसी ने पंजाब के शरणार्थियों के एक महत्वपूर्ण शिविर वाघा में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की कार्यकुशलता, अनुशासन, साहस और कड़ी मेहनत करने की क्षमता की तारीफ की। गांधीजी ने तुरंत पलटकर कहा, 'पर यह न भूलो कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी ये गुण थेÓ। गांधी आरएसएस को तानाशाहीपूर्ण सोच वाला एक सांप्रदायिक संगठन मानते थे।ÓÓ (प्यारेलाल, महात्मा गांधी- द लास्ट फेज, अहमदाबाद, पृष्ठ 440)।
स्वतंत्रता के बाद, दिल्ली में हुई हिंसा के संदर्भ में (राजमोहन गांधी, मोहनदास, पृष्ठ 642), ''गांधी जी ने आरएसएस के मुखिया गोलवलकर से हिंसा में आरएसएस का हाथ होने संबंधी रपटों के बारे में पूछा। आरोपों को नकारते हुए गोलवलकर ने कहा कि आरएसएस, मुसलमानों को मारने के पक्ष में नहीं है। गांधी ने कहा कि वे इस बात को सार्वजनिक रूप से कहें। इस पर गोलवलकर का उत्तर था कि गांधी उन्हें उद्धत कर सकते हैं और गांधीजी ने उसी शाम की अपनी प्रार्थना सभा में गोलवलकर द्वारा कही गई बात का हवाला दिया। परंतु उन्होंने गोलवलकर से कहा कि उन्हें इस आशय का वक्तव्य स्वयं जारी करना चाहिए। बाद में गांधी ने नेहरू से कहा कि उन्हें गोलवलकर की बातें बहुत विश्वसनीय नहीं लगीं।ÓÓ
आज, सत्ता में आने के बाद, आरएसएस, स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से स्वयं को किसी भी प्रकार से जोडऩे के लिए बेचैन है। यह तब, जब वह इस आंदोलन से दूर रहा था और उसने इस आंदोलन की इसलिये आलोचना की थी क्योंकि उसमें सभी समुदायों की हिस्सेदारी थी। आरएसएस का लक्ष्य हिंदू राष्ट्र है, ठीक उसी तरह मुस्लिम लीग का लक्ष्य मुस्लिम राष्ट्र था। आज आरएसएस गांधी से प्रमाणपत्र चाहता है। इसलिये उनके कहे वाक्य को अधूरा प्रस्तुत किया जा रहा है। आरएसएस कार्यकर्ताओं के 'अनुशासन और कड़ी मेहनतÓ के बारे में गांधी के कथन को तो उद्धृत किया जा रहा है परंतु उसके बाद जो उन्होंने कहा था अर्थात ''हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी ये गुण थेÓÓ, उसकी चर्चा नहीं की जा रही है। दोनों प्रकार के राष्ट्रवादों में जो मूल विरोधाभास हैं उनके चलते आरएसएस के प्रति गांधीजी के दृष्टिकोण के संबंध में किसी प्रकार के संदेह के लिए कोई जगह नहीं है। संघ परिवार चाहे कुछ भी दावा करे, यह मानना असंभव है कि गांधीजी कभी भी आरएसएस जैसे संगठन के प्रशंसक हो सकते हैं।

Wednesday, February 4, 2015

Statement protesting arrest of Shirin Dalvi, Editor, Awadhnama

Statement protesting arrest of Shirin Dalvi, Editor, Awadhnama

FEBRUARY 5, 2015
We, members of the Mumbai based human rights group Hum Azaadiyon Ke Haq Mein  are disturbed at reports of the multiple cases lodged against Shirin Dalvi, the editor of Awadhnama, Mumbai, and her arrest by Thane district police on January 28, for publishing a news-item on the Charlie Hebdo issue and one of the covers of the magazine on January 17, 2015. We are also shocked at the reports of the continual harassment of Shirin Dalvi.
Responding to readers’ views, she issued a clarification denying any intention to hurt religious sentiments and tendered a public clarification the very next day. However, cases have been registered against her in different police stations in Mumbra and Rabodi (Thane district), Malegaon and Mumbai on charges of violating Sec 295 of the Indian Penal Code (outraging religious feelings by insulting a religion with malicious intent).
While she has sought, and obtained, anticipatory bail in one set of cases from Mumbai Additional Sessions Court judge S D Tekale on January 23, she was arrested in Mumbra, Thane district, and granted bail the same day on Jan 28.
The Mumbai based human rights group Hum Azaadiyon Ke Haq Mein is disturbed at the attempts made to defame her character. Baseless statements appeared in several Urdu newspapers that a colleague had tried to dissuade her from using the Charlie Hebdo cover but the colleague identified was actually not even in office on that day and had resigned a few days ago. Other attempts to defame her included statements that she had joined the RSS women’s wing and was a ‘follower’ of Bangladeshi writer in exile Taslima Nasreen!
Shirin Dalvi is a respected journalist with more than 20 years of experience in Urdu journalism. She is perhaps the only woman editor in Urdu journalism in India, has written on issues concerning women’s rights and politics and is well-known for her literary skill and learning.
The manner in which she is being hounded bodes ill for free debate and discussion and for peaceful resolution of controversy. Besides, the incident is also being used as a pretext to ratchet up polarized public opinion, which is a dangerous game and detrimental to freedom of speech and expression in a democratic society, besides causing immense personal harm and a threat to her life and safety.
We request those who have filed cases against her to accept her clarification in the right spirit with which it has been given and to withdraw all the cases against her.
We also demand that Shirin Dalvi be provided necessary protection forthwith.
sd/-
Hasina Khan
Dr. Ram Puniyani
Adv.Irfan Engineer – Director, Centre for Study of Society and Secularism
Javed Anand – General Secretary, Muslims for Secular Democracy
Sukla Sen
Ammu Abraham
Sameera Khan
Nasreen Fazalbhoy
Mario D’Penha
Divya Taneja
Kamayani Mahabal
Geeta Seshu
Brinelle D’souza – Tata Institute of Social Science
Teesta Setalvad, Editor, Communalism Combat
Rukmini Sen, Hillele Combat TV
Veena Gowda
Anjali Kanitkar
Saaz Shaikh
Rohini Hensman
Chhaya Datar
Susan Abraham
and members and organisations of Hum Azaadiyon ke Haq Mein Reddi 

जिस महिला सुकड़ी का पुलिस ने अपहरण किया था उसे गाँव वालों ने सर्वसम्मति से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .


जिस महिला सुकड़ी का पुलिस ने अपहरण किया था उसे गाँव वालों ने सर्वसम्मति से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
हिमांशु कुमार 
मैंने दो सप्ताह पहले लिखा था कि छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में पुलिस द्वारा एक आदिवासी को जबरन आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया जा रहा था .
वह आदिवासी नहीं मिला तो पुलिस ने उसकी पत्नी जिसका नाम सुकड़ी है, का अपहरण कर लिया था .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने थाने को तीन दिन तक घेर कर रखा .
सोनी सोरी इन आदिवासियों का नेतृत्व कर रही थी .
तीन दिन बाद घबरा कर पुलिस द्वारा उस महिला सुकड़ी को आदिवासियों को वापिस देना पड़ा .
लेकिन बदला लेने के लिए दो दिन बाद पुलिस ने फिर से उन आदिवासियों के गाँव पर हमला किया और पन्द्रह आदिवासियों को पकड़ कर नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
दो दिन पहले अदालत ने सभी पन्द्रह निर्दोष आदिवासियों को ज़मानत दे दी.
सभी आदिवासी अपने गाँव वापिस आ गए
जिस महिला सुकड़ी का पुलिस ने अपहरण किया था उसे गाँव वालों ने सर्वसम्मति से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
इसे कहते हैं आदिवासियों की ताकत .
मोदी तुम्हारे दमन का पंजा आदिवासी ही तोड़ेंगे

Monday, February 2, 2015

मोदी के पास अक्ल नहीं: राजेंद्र सिंह

मोदी के पास अक्ल नहीं: राजेंद्र सिंह

पीएम नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही गंगा को लेकर बड़े बड़े सपने सजा रखे हों लेकिन इसके लिए काम करने वाले पर्यावरणविदों ने पीएम के इस सपने को तोड़ने का मन बना लिया है. मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता और जलपुरुष के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह ने मोदी के गंगा प्रोजेक्ट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. राजेंद्र सिंह ने पीएम मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उसके पास अक्ल नहीं है और वो गंगा की हत्या करने आया है.मोदी के गंगा नेविगेशन प्रोजेक्ट के लिए बैराज के डीपीआर काम शुरू होते ही पर्यावरणविदों ने मोदी को निशाने लेना शुरू कर दिया है. राजेंद्र सिंह ने कहा कि मोदी के इस प्रोजेक्ट के खिलाफ बिहार ही उनकी कर्मभूमि होगी, जहां से जीते जी वो इस प्रोजेक्ट को शुरू ही नहीं होने देंगें. राजेंद्र सिंह ने कहा कि हल्दिया से इलाहाबाद तक 10 बड़े बैराज के लिए डीपीआर का काम शुरू हो चुका है, जो गंगा की अविरलता को खत्म कर इसे झील और तालाब में तब्दील कर देगी. ऐसे में उनका आंदोलन बिहार से शुरू होगा.
राजेंद्र सिंह ने कहा कि बिहार में गंगा किनारे बसे इलाकों में इसके खिलाफ बड़े आंदोलन की शुरुआत हो चुकी है और उनके जीते जी इसे बनने नहीं दिया जाएगा. राजेंद्र सिंह मोदी के खिलाफ इतने गुस्से में हैं कि वो प्रधानमंत्री के खिलाफ बोलते-बोलते भाषा की मर्यादा तक भुला बैठे. उनके साथ समाजवादी नेता रामविहारी सिंह और केदारनाथ पांडे भी इस मुहिम से जुड़ गए हैं.
राजेंद्र सिंह ने कहा, 'हम गंगा पर अब किसी और बांध और बैराज का विरोध करते हैं, वो अपने मैनीफेस्टो के वादों का सम्मान करें. अगर वो सम्मान नहीं करते तो हम उसका सम्मान जबरदस्ती करवाएंगे. जब तक हम जिंदा है हम कोई बैराज नहीं बनने देंगे. गंगा के दोनों ओर के लोगों ने इसके विरोध करने का मन बना लिया.'
गुस्से में राजेंद्र सिंह बोले, 'हम दावे के साथ कहते हैं मोदी जी हमारे जीते जी कोई बैराज नहीं बनेगा. क्योंकि गंगा हमारी मां है हम मां को टुकड़ो के रूप में नहीं देख सकते. मां मां की तरह बहनी चाहिए. ये बैराज जो मां का शरीर काट कर तलाब में, झीलों में बदलने की साजिश है. अरे वो मोदी सिर्फ बोलता है कि मैं गंगा का बेटा हूं उसने आजतक किसी को नहीं पूछा. हम गंगा पर पिछले 20 साल से काम कर रहे हैं उसको अक्ल ही नहीं है कि गंगा पर काम करने वाले को बुलाना चाहिए पूछना चाहिए. वो प्रधानमंत्री बन गया पर वो केवल गंगा के कारण चुनाव जीतकर आया है, वो गंगा की हत्या करवाएगा चुनाव जीतकर.'
राजेंद्र सिंह यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा, 'मैं किसी अदालत में नहीं जाऊंगा और जनता से कहूंगा कि जिस मोदी को तुमने इतने वोटों से जिताया है वो देश को कैसे धोखा दे रहा है.'

Sunday, February 1, 2015

बहादुर माँ को सलाम , सफ़दर हाश्मी की माँ का निधन

 बहादुर माँ को सलाम , सफ़दर हाश्मी की माँ  का निधन 


आज की रात सफदर हाशमी की मां कमर हाशमी का निधन हो गया। वे ऐसी बहादुर माँ थीं जिन्होंने सफदर की म्रत्यु पर उसके साथियों से कहा था कि कामरेड'स आँसू पौँछ लीजिए और मशालें उठा कर उन्हें जला लीजिए। मशाल की लपलपाती लौ अँधेरे की चादर को फाड़ देगी। सड़कों पर उन गीतों को गाओ जो सफदर को बहुत पसन्द थे। हम सफदर का शोक नहीं मनाएंगे, हम उसे आयोजनों में याद करेंगे। नौ साल की उम्र में बुरका उतार कर फेंक देने वाली श्रीमती हाशमी ने एक शिक्षिका के रूप में अपने पाँच बच्चों को पालने में परिवार को सहयोग किया और साथ साथ लगातार शिक्षा भी ग्रहण की। अपना एमए उन्होंने सत्तर साल की उम्र में उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद से किया। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी और सम्पादित की हैं। उन्होंने अपनी मृत्यु पर कोई धार्मिक कार्य न करने का निर्देश दिया था इसलिए उनकी आँखें दान में दे दी गयीं व अब से थोड़ी देर बाद ही दिल्ली में विद्युत शवदाह ग्रह में उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा।
Virendra Jain साहब की वाल से साभार