Tuesday, September 27, 2016

कामरेड नियोगी लाल जोहार शहीद दिवस

कामरेड नियोगी लाल जोहार
शहीद दिवस



Wednesday, September 28, 2016
( Cg khabar )

सुदीप ठाकुर
ठीक पच्चीस वर्ष पूर्व 28 सितंबर, 1991 को छत्तीसगढ़ के मशहूर मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी को दुर्ग स्थित उनके अस्थायी निवास पर तड़के चार बजे के करीब खिड़की से निशाना बनाकर गोली मारी गई थी. देर रात वह रायपुर से लौटे थे. महज 48 वर्ष के नियोगी सिर्फ एक ट्रेड यूनियन नेता भर नहीं थे, बल्कि एक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. उनकी लड़ाई चौतरफा थी. एक ओर शराब से लेकर लोहे के धंधे से जुड़े बड़े उद्योगपतियों से वह आर्थिक समानता और श्रम की वाजिब कीमत की लड़ाई लड़ रहे थे, तो दूसरी ओर विचारधारा के स्तर पर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से. एक अन्य स्तर पर वह सामाजिक बुराइयों, जातिवाद और नशाखोरी से भी लड़ रहे थे.

यह विडंबना ही है कि जब देश आर्थिक उदारीकरण की रजत जयंती मना रहा है, नियोगी की पच्चीसवीं बरसी है! क्या वह नई आर्थिक नीति के पहले शहीद थे?

नियोगी जानते थे कि उनकी लड़ाई बहुत ताकतवर लोगों से है, इसके बावजूद उस रात भी वह निहत्थे थे. जो लोग उन्हें मारना चाहते थे, वह भी जानते थे कि रात के अंधेरे में ही उन पर कायराना हमला कर गोली चलाई जा सकती है. उनकी लड़ाई बेहद खुली थी, किसी से छिपी नहीं थी. संभवतः 1970 के दशक की शुरुआत में नियोगी जलपाईगुड़ी से छत्तीसगढ़ पहुंचे थे. यह नक्सलबाड़ी के हिंसक आंदोलन के आसपास की बात है. शुरुआत में उन्होंने संभवतः भिलाई इस्पात संयंत्र में अस्थायी नौकरी भी की थी. लेकिन बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा बनाकर एक बड़ा मजदूर आंदोलन खड़ा कर दिया. आपातकाल के दौरान वह जेल में भी रहे.

दल्ली राजहरा माइंस को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले नियोगी ने लोहे की खदान में मजदूर के रूप में काम भी किया. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के रूप में उन्होंने एक बड़ा श्रमिक संगठन बनाया. वह छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत से वाकिफ थे, लिहाजा एक ओर तो वह औद्योगिक और खदान मजदूरों की लड़ाई लड़ रहे थे, तो दूसरी ओर उद्योगों और खदानों के कारण अपनी जमीन से बेदखल हो रहे किसानों के संघर्ष में साथ थे. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा आदिवासियों, किसानों और मजदूरों का संगठन था. जिन लोगों ने नियोगी की मजदूर रैलियां देखी हैं, उन्हें याद होगा कि उनके आंदोलन में महिलाओं की भी बराबर की भागीदारी होती थी. उनके आंदोलन का दर्शन इस एक नारे में समझा जा सकता है, ‘कमाने वाला खाएगा’ यानी खेत में या उद्योगों में जो काम कर रहा है, हक उसी का है.

नियोगी थे तो कम्युनिस्ट और उनके आंदोलन के दौरान गोलीकांड भी हुए, लेकिन उन्होंने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि गांधीवादी रास्ता ही विकल्प है. उन्होंने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को श्रमिक संगठन के साथ ही एक सामाजिक आंदोलन में भी बदलने का प्रयास किया. जिसमें नशाबंदी को लेकर चलाई गई उनकी मुहिम का असर भी देखा गया.

नियोगी ने खुद कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को राजनीतिक तौर पर खड़ा करने की कोशिश की. हालांकि छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो बार ही अपना एक विधायक विधानसभा तक पहुंचा सका. 1989 के लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने छत्तीसगढ़ के जाने माने कवि हरि ठाकुर को राजनांदगांव से उम्मीदवार बनाया था. उनके नामांकन दाखिल करने के समय नियोगी भी जिला कार्यालय में मौजूद थे. मैंने और मेरे दिवंगत चचेरे भाई और मित्र अक्षय ने नियोगी से पूछा था, दादा आप चुनाव नहीं लड़ते? नियोगी का जवाब था, नहीं रे बाबा, बड़े लोगों का काम है. पता नहीं वह खुद क्यों चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे. बहुत संभव है कि यदि वे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को एक राजनीतिक दल में बदल पाते और खुद भी चुनावी राजनीति में आते तो शायद स्थिति कुछ और होती. राज्य सत्ता और उद्योगपतियों के लिए चुनौती बन गए नियोगी की लोकप्रियता को कोई खारिज नहीं कर सकता था.

उनसे हुई कुछ गिनी चुनी मुलाकातों में एक बार नियोगी ने अक्षय और मुझसे से कहा था, तुम लोगों को आंदोलन से जुड़ना चाहिए.

उनसे आखिरी मुलाकात 28 सितंबर, 1991 को हुई थी, जब वह दुनिया को छोड़ चुके थे. उस रात मैं अक्षय के साथ ही उसके घर पर था. तड़के लैंडलाइन पर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के राजनांदगांव के नेता प्रेमनारायण बाबू का फोन आया, बोले, नियोगी ला मार दिस ( नियोगी को मार दिया)! डेढ़ घंटे के भीतर ही हम तीनों दुर्ग के उनके निवास पर थे, तब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे. उन दिनों अक्षय कृषक युग नामक टेबलायट अखबार निकालते थे, जिसे मेरे चाचा विद्याभूषण ठाकुर ने शुरू किया था. हमने खबर लिखी… नियोगी को मार डाला….

दल्ली राजहरा में उनकी अंतिम यात्रा में हजारों का हुजूम था. चारों और नारे लग रहे थे, लाल हरा झंडा जिंदाबाद, नियोगी भैया जिंदाबाद…मैंने आज तक कोई इतनी विशाल अंतिम यात्रा नहीं देखी है..

कामरेड नियोगी लाल जोहार….

रंडी कौन है ... पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल - श्वेता यादव

रंडी कौन है ... पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

 श्वेता यादव

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जिस दिन अमिताभ बच्चन ने अपनी नातिन और पोती को एक भावुक चिट्ठी लिखी थी मन तो उसी दिन हो गया था कि एक पत्र लिखूं बच्चन साहब के नाम और उनसे कुछ सवाल करूं। लेकिन अगले ही दिन पता चला कि दरअसल वो चिट्ठी तो फिल्म पिंक के प्रमोशन का एक हिस्सा थी। फिर मन में आया रूकती हूं पिंक देखती हूं फिर लिखूंगी।


पिंक की बात करें तो कुछ बातों को छोड़ कर सच में पिंक आज के माहौल के लिए एक जरूरी फिल्म है जिसे सबको देखनी चाहिए। सिर्फ मर्दों को ही नहीं आज की कामकाजी औरतों, लड़कियों और घर के परिवेश में अपमान झेल रही स्त्रियों के लिए भी एक जरूरी फिल्म है पिंक, इसलिए देखना चाहिए सबको।


बेटी को अपने पिता के साथ, पत्नी को अपने पति के साथ, गर्लफ्रेंड को अपने ब्वायफ्रेंड के साथ देखनी चाहिए पिंक। याद रखिये असली आज़ादी तभी है जब आप ले जाएं सिनेमाघरों तक अपने पुरुष साथी को .. आपका पुरुष साथी आपको नहीं!


मैंने पिंक की कई सारी समीक्षाएं पढ़ी हैं। लगभग हर समीक्षा में यह कहा गया कि फिल्म में कुछ कमियां हैं लेकिन फिल्म इतनी जरूरी है कि उन कमियों को नज़रअंदाज करके फिल्म जरूर देखनी चाहिए। अच्छी बात है फिल्म सच में बेहद जरूरी है लेकिन सोचिए क्या सच में हम अभी भी उसी दौर में जी रहे हैं जहां एक जरूरी फिल्म की कमियों पर बात करने का समय अभी तक नहीं आ पाया है।



अगर आपका जवाब हां है तो मैं यही कहूंगी की फिर अपने आपको प्रगतिशील और संवेदनशील कह कर खुद को ठगना बंद करिए। क्योंकि अभी आपको अपनी पोंगापंथी से निकलने में बहुत समय है।




पिंक देखने के बाद मेरे मन में कई सवाल उठे हैं फिल्म को लेकर, समाज को लेकर, बच्चन साहब आपकी चिट्ठी को लेकर। समझ लीजिए कि खुन्नस ही उठी है मेरे मन में। इसके अलावा फिल्म की कमियों को लेकर भी बहुत सारे सवाल हैं मेरे मन में। अपनी बात को आगे रखने से पहले आप सभी पाठकों से मेरा यही अनुरोध है कि इसे सिर्फ एक फिल्म की समीक्षा समझ कर मत पढ़िएगा यक़ीनन आपको निराशा ही हाथ लगेगी।


हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहां एक भारत में कई भारत बसते हैं। जाति, धर्म, लिंग की बात अगर अभी छोड़ भी दें तो यहां आर्थिक रूप से भी तीन तरह के भारत हैं। जी हां! तीन तरह के भारत..



पहला वो जिसकी कैटगरी में बच्चन साहब आते हैं। जहां आप क्या खाते हैं क्या पहनते हैं वो सब बाकी भारत के लिए फैशन और आधुनिकता के नाम पर अनुकरणीय हो जाता है। क्योंकि आप जो करते हैं वह सामाजिक रूप से यह कह कर स्वीकार्य हो जाता है कि भाई बड़े लोग हैं। दूसरा वो लोग जो आर्थिक रूप से इस हद तक सक्षम तो हैं कि थोड़ा बहुत इन्हें फालो कर सकते हैं लेकिन अपनी परम्परागत रुढियों और सामाजिक मान्यताओं से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये लोग करना तो सब चाहते हैं लेकिन एक दायरे में .. कोई देखे नहीं कोई जाने नहीं टाइप से आखिर इज्जत की बात है। और इनकी इज्जत इनके घर की स्त्रियों की वेजाइना से शुरू होती है और वही पर आकर ख़तम भी हो जाती है। तीसरे वह लोग जो इन दोनों में से किसी को फालो नहीं कर सकते बस देखकर और भी ज्यादा कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।



अब बच्चन साहब मुझे आप यह बताइये कि आप के घर की बच्चियां जींस पहने या गाउन किसकी हिम्मत है कि उन्हें कुछ कहेगा? बल्कि वो जो भी करेंगी बाकी भारतीयों के लिए तो वो फैशन के नाम पर अनुकरणीय हो जाएगा। दूसरी बात यह कि आप अगर इतने ही प्रगतिशील माइंडसेट के हैं.. तो आपको अपने बेटे की शादी से पहले अपनी बहु की शादी किसी पेड़ से करने की जरूरत क्यों पड़ गई? यह मेरी नज़र में दोगलापन है इससे ज्यादा कुछ नहीं।


तो साहब यह अपना हाई प्रोफाइल ड्रामा बंद करिए, क्योंकि आपको इस देश में बहुत सारे लोग अपना भगवान मानते हैं, क्यों मानते हैं यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। एक एक्टिंग के अलावा आपकी और क्या उपलब्धि है यह मुझे नहीं पता। क्या है ना कि मेरा जनरल नॉलेज थोड़ा कम है। हां एक उपलब्धि पनामा मामला है और एक गुजरात की खुशबु है ..गुजरात की बदबू तो पत्र भेजने के बाद भी नहीं सूंघ पाए आप।


अब थोड़ी बात पिंक की कमियों पर कर लेते हैं। फिल्म के कई दृश्य अच्छे हैं लेकिन इससे इसकी कमियां नहीं दबाई जा सकती, क्योंकि जब आप यह दावा करते हैं कि आप इस समाज की बुराई को सामने ला रहे हैं तो फिर आपसे यह उम्मीद बढ़ जाती है कि आप इमानदार रहें।



पहली बात तो यह की यह फिल्म तीन लड़कियों के संघर्ष की कहानी है तो इस फिल्म के स्टार कास्ट अमिताभ क्यों हो गए वो लडकियां क्यों नहीं? आप कह सकते हैं की यह फिल्म की कमाई का मसला था। चलिए मान लिया.. पूरी फिल्म में तीन दृश्यों को छोड़ दूं तो बाकि जगहों पर इन लड़कियों को एक तरह के गिल्ट में दिखाया गया है। यहां तक की कोर्ट के सामने भी वो अपने मन की बात डरे सहमें अंदाज में ही रखती हैं।



ऐसा दिखाना जरूरी था क्या? आप क्या दिखाना चाहते हैं कि बाहर निकलने वाली लड़कियों को अभी भी डर कर रहना चाहिए। इसके अलावा आप ने एक चीज और साबित की .. कि मारेगा भी वही और बचाएगा भी वही। कातिल भी वही, खंजर भी वही, और तो और दवा और तीमारदार भी वही .. गजब! आपको वकील के रूप में भी एक पुरुष ही मिला कोई महिला क्यों नहीं मिली?

 
पिंक फिल्म के एक दृश्य में पुलिसकर्मी लड़कियों से कहता है- आपके  जैसी  अच्छी  लड़कियां.. कहीं जाती हैं ऐसे लड़कों के साथ.. आपके जैसी लड़कियां। करते आप सब हो.. मतलब जाते अपनी मर्जी से हो दारु सारु पीते हो.. और बाद में वो जो फ़ौज है ना पीछे पड़ जाती है हमारे। मतलब मोमबत्ती जलाने लगती हैं कि जी हम सेफ नहीं हैं ...! पूरे संवाद के दौरान इंस्पेक्टर आपके जैसी लड़कियों पर जोर.. हर बार जोर देते हुए अपनी बात कहता है।


कहां से आया है ये शब्द आपके जैसी लड़कियां, क्या मतलब है इस शब्द का। शब्द कहीं आसमान से नहीं टपकते ये हमारी सोच का ही नमूना होते हैं| हम जैसा सोचते हैं वैसे ही हमारे शब्द भी निकलते हैं। शिल्पा शेट्टी ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था “मैं घर पर भंगियों जैसी रहती हूं।” कहने को तो ये सिर्फ एक नॉर्मल शब्द हैं मात्र चंद शब्द जो मजाक में कहे गए। लेकिन क्या वास्तव में यह सिर्फ शब्द है जी नहीं ..भंगी एक पूरा समुदाय है जो सदियों से सिर पर मैला ढोने जैसा काम करने को अभिशप्त है। अब ले जाए कोई शिल्पा जी को और दिखाए की क्या होता है भंगियों का जीवन कैसे रहते हैं वो। यकीन मानिए दोबारा पूरे जीवन शिल्पा शेट्टी भंगी शब्द भूल न गईं तो कहिएगा।


अब कुछ सवाल हमारे सेंसर बोर्ड के सदस्यों से.. साहेबान् आपने फिल्म के लास्ट सीन में राजबीर नामक पात्र के मुहं से निकलने वाले शब्द को सेंसर कर दिया है लेकिन लिप्सिंग रहने दी है जिससे साफ़ समझ में आ रहा है कि वह क्या कहना चाहता है।



अब मेरा सवाल है- जोर से हंस दिया तो रंडी.. छोटे कपड़े पहन लिया तो रंडी.. किसी लड़के के साथ दिख गई तो रंडी.. किसी अजनबी से अपनेपन से बात कर लिया तो रंडी... रंडी, रंडी, रंडी... हर उस एक बात पर रंडी जो इस समाज के मानकों से परे है.. तो सेंसर बोर्ड जी अब आप ये बताइये की फिर किस हिसाब से आपने इस शब्द को पिंक में सेंसर किया?


"उड़ता पंजाब" में पूरी स्क्रिप्ट में स्टोरी से ज्यादा गालियां हैं, इतनी गालियां कि कानों को चुभने लगती हैं ये थोड़ी देर बाद..। उन्हें आपको सेंसर करने की जरूरत नहीं पड़ी तो फिर इस शब्द को क्यों। "बुद्धा इन ट्रैफिक जाम" में हजार बार फक शब्द का इस्तेमाल हुआ है उसे कहीं भी म्यूट करने की जरूरत नहीं पड़ती ना ही सेंसर करने की। क्यों नहीं पड़ती क्या इसलिए की फक शब्द आपको दूसरी दुनिया में ले जाता है और रंडी यथार्थ में लाकर पटक देता है।



बहुत सारी फ़िल्में हैं जिनमें मां-बहन को लेकर बनी गालियां खुलेआम दिखाई जाती हैं, कहीं कोई सेंसर नहीं। फिर इस एक शब्द से इतनी आपत्ति क्यों? वैसे यह सच में आपत्ति ही थी या डर कि समाज का नंगा सच यही है जिसे दिखने में आपके भी पसीने छूट गए।




मैं गावं में पली बढ़ी हूं जहां शादी से पहले किसी लड़की का सजना संवरना अच्छा नहीं माना जाता। लिपस्टिक, बिंदी, चूड़ी इनको पहनने का अधिकार सिर्फ शादीशुदा महिलाओं को है। यहां तक कि शादीशुदा लड़कियां जब मायके में आती हैं तो सिर्फ सिंदूर लगाती हैं, वो भी मांग के भीतर छिपाकर.. कि कहीं पिता या भाई को दिखे नहीं।



मुझे आज भी याद है गांव की महिलाएं और मर्द दोनों ही बड़ी आसानी से उस लड़की को रंडी बोल दिया करते थे जो कि शादी से पहले सजती संवरती हो। खुलेआम ऐसी लड़कियों को लोग कहते थे देखो कैसा रंडियों कि तरह बन ठन कर रहती है। इसे तो भाई-बाप, दुनिया, समाज किसी से भी शर्म लिहाज रह ही नहीं गया है। जोर से हंसना, बोलना या अन्य किसी तरह का काम करने का मतलब रंडी। क्योंकि समाज के हिसाब से ऐसे काम सभ्य घरों की लड़कियां नहीं करतीं। ऐसे स्वछन्द तो सिर्फ रंडियां रहती हैं। कौन हैं ये रंडियां और इन्हें कौन बनाता है?


अब एक सवाल समाज के इन सभ्य ठेकेदारों से... एक बात बताओ ठेकेदारों, जहां तक मुझे पता है भारत में देह व्यापार क्राइम है फिर ये रंडियां आम लड़कियों से रंडियां बन कैसे जाती हैं? कौन है इनका खरीदार? और अगर सच में इनका कोई खरीदार नहीं है तो फिर भारत में देह व्यापार का धंधा इतने बड़े पैमाने पर फल-फूल कैसे रहा है?



मेरी एक पोस्ट पर अनुपम वर्मा जी ने कमेंट किया था उसे ठीक उसी तरह इस लेख में शामिल कर रही हूं-
“यही होता है! यहां चीखती चिल्लाती उस नंगी सच्चाई को फटी बोरी से ढका जाता है जो हर चौराहे पर खड़ी हुई हो!
चोरी छिपे दाम देकर आदमी जिन गलियों से मुंह छिपा कर निकले....
उन गलियों की आंखो मे आंखे डाल कर बातें करने वाली औरत रंडी !!
बोर्ड मे बैठे हुए दोगले इंसान अधिकार के दम पर वही तय करेंगे जो यहां का रिवाज़ है! कोई जवाब नही है इनके पास श्वेता जी!
यह वो देश है जहां बलात्कार के बाद बलात्कारी के बालिग होने की पुष्टि की जाती है!”
 
कितना यथार्थ है अनुपम की बातों में.. जिन गलियों में रात के अंधेरे में जाने वाला सफ़ेदपोश उन गलियों में रहने वालियों को जन्नत की हूर से कम नहीं मानते, सुबह होते ही वही उनके लिए रंडियां हो जाती हैं।




पूरी फिल्म में इस एक बात को लेकर बहस है कि लड़कियों ने पैसे लिए, इसलिए उनका इनकार कोई मायने नहीं रखता। समूची बहस में दोनों वकील इसी बात को साबित करने में लगे हुए हैं। और अंत में फलक के मुहं से यह कहलाया गया कि “हां हमने लिए थे पैसे, लेकिन पैसे लेने के बाद मीनल का मन बदल गया और उसने नहीं कर दिया”



अब सवाल यह उठता है कि इस समाज में नहीं सुनने की आदत तो अभी तक पति को भी नहीं है तो एक खरीदार कैसे नहीं सुनेगा? देह व्यापार में ज्यादातर महिलाएं दलित-वंचित तबकों से ही हैं। अपनी मर्जी से इसे अपनाने वाली महिलाओं की बात नहीं कर रही मैं।



इस मामले में मैं वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द शेष से सहमत हूं वह लिखते हैं- यह फिल्म समाज की हाशिए की महिलाओं के लिए एक अमूर्त-सी जगह बनाती भी है तो इस तबके की उन तमाम महिलाओं को अपमानित करती है जो अपनी पसंद या चुनाव की वजह से नहीं, बल्कि अपने खिलाफ एक आपराधिक घटना के तहत देह-व्यापार के त्रासद पेशे में होती हैं। तो क्या यह फिल्म अनजाने में कथित मुख्यधारा की स्त्री-विमर्श की फिल्म के रूप में सिमट कर रह जाती है, जिसमें दलित-वंचित जातियों-वर्गों के सवालों के लिए कोई जगह नहीं है?



मीनल, फ़लक और रिया को बाकायदा क्रमशः 'हिंदू', मुसलिम और पूर्वोत्तर की आदिवासी के रूप में दर्ज किया जा सकता है। तो इनके साथ एक दलित पृष्ठभूमि की लड़की भी होती तो क्या यह फिल्म थोड़ी और पूरी नहीं हो सकती थी? बाजार के दबाव में या दृष्टि के अभाव में अमिताभ बच्चन को उन बहादुर लड़कियों का संरक्षक बना कर क्या दर्शाया गया? लेकिन इन बातों पर गौर करने की दृष्टि और हिम्मत कहां से आएगी? सामाजिक मसलों पर फिल्म बनाते समय थोड़ी-सी हिम्मत और ईमानदारी की जरूरत होती है। यों, इस फिल्म की अहमियत अपनी जगह पर अब भी है। लेकिन पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' एक उदाहरण है कि इस्लामी पृष्ठभूमि के बावजूद किसी सामाजिक और खासतौर पर स्त्री प्रश्न को कैसे बेहतरीन तरीके से डील किया जा सकता है। 'बोल' से सीखा जा सकता है।




अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहती हूं, कि जब तक हममें हां को स्वीकारने की हिम्मत नहीं आएगी। जब तक हम किसी महिला को सेक्स के लिए हां करने पर उसके चरित्र को आंकना बंद नहीं करेंगे .. तब तक किसी स्त्री की ना को समझना हमारे लिए मुश्किल ही होगा।




फिल्म की सार्थकता के साथ ही साथ इसकी कमियों पर भी बात जरूरी है तभी हम सही मायने में समाज को समझने और स्त्री को सिर्फ लिंग से परे मानव मानने में सफल हो पाएंगे। अन्यथा यह पोंगापंथ से ज्यादा और कुछ न हो पाएगा कि कुछ हुआ तो छाती पीट ली हाय-हाय कर ली और फिर आगे बढ़ गए।



(लेखिका एक पत्रकार हैं, यह उनके निजी विचार है
हम इनसे सहमत है)

बस्तर: दो किशोरों की मौत -बीबीसी

बस्तर: दो किशोरों की मौत




आलोक प्रकाश पुतुल रायपुर
 से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

छत्तीसगढ़ के बस्तर में दो किशोरों के कथित रूप से पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.

शनिवार को बस्तर पुलिस ने बुरगुम गांव में कथित रूप से एक मुठभेड़ में दो माओवादियों के मारे जाने का दावा किया था.

अगले दिन रविवार को बस्तर के आईजी पुलिस शिवराम प्रसाद कल्लुरी और पुलिस अधीक्षक आरएन दास ने इस कथित मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को एक लाख रुपये का नकद इनाम भी दिया.

लेकिन गांव वालों का आरोप है कि पुलिस दोनों किशोरों को उनके रिश्तेदार के घर से शनिवार को तड़के उठा कर ले गई और बाद में उनकी हत्या कर दी गई

आदिवासी नेता सोनी सोरी मंगलवार को दोनों किशोरों के अंतिम संस्कार में पहुंची.

सोनी सोरी ने कहा, "गड़दा गांव का रहने वाला मुरिया आदिवासी सोनकू राम अपने एक दोस्त सोमड़ू के साथ शुक्रवार को अपनी बुआ के घर पहुंचा था. वहां रात होने के कारण दोनों रुक गये. सुबह चार बजे के आसपास सुरक्षाबलों की एक टीम पहुंची और दोनों किशोरों को अपने साथ लेकर चली गई."

इधर मृतकों के गांव जा रही दंतेवाड़ा की कांग्रेस विधायक देवती कर्मा ने आरोप लगाया कि उन्हें सुरक्षा का हवाला देकर बास्तानार में रोक दिया गया.

इसके बाद मंगलवार को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल ने इस पूरे मामले में बस्तर में पार्टी के सात विधायकों के नेतृत्व में एक जांच दल बनाने की घोषणा की है.

दूसरी ओर बस्तर में भारतीय जनता पार्टी के सांसद दिनेश कश्यप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "इस विषय पर जानकारी लूंगा और अगर ऐसा हुआ है तो निश्चित तौर पर यह जांच का विषय है."

दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों ने भी इस कथित मुठभेड़ की कड़ी आलोचना की है.

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह का कहना है कि बस्तर में माओवादियों के नाम पर एक के बाद एक फर्ज़ी मुठभेड़ का सिलसिला चल रहा है.

डॉक्टर लाखन सिंह ने बताया, "बस्तर में सुरक्षाबलों ने हत्याओं का अभियान चलाया हुआ है. बच्चों और बड़ों को घरों से उठा कर ले जाती है और उन्हें माओवादी बता कर मार डालती है. अगर महिलाएं हुईं तो उनके साथ बलात्कार किया जाता है. यह एक भयानक स्थिति है और राज्य सरकार इसकी अनदेखी कर रही है.

इस मामले पर कई कोशिश के बाद भी पुलिस का पक्ष हमें नहीं मिल पाया.

(बीबीसी हिन्दी के  लिए)



आलोक प्रकाश पुतुल रायपुर
 से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

छत्तीसगढ़ के बस्तर में दो किशोरों के कथित रूप से पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.

शनिवार को बस्तर पुलिस ने बुरगुम गांव में कथित रूप से एक मुठभेड़ में दो माओवादियों के मारे जाने का दावा किया था.

अगले दिन रविवार को बस्तर के आईजी पुलिस शिवराम प्रसाद कल्लुरी और पुलिस अधीक्षक आरएन दास ने इस कथित मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को एक लाख रुपये का नकद इनाम भी दिया.

लेकिन गांव वालों का आरोप है कि पुलिस दोनों किशोरों को उनके रिश्तेदार के घर से शनिवार को तड़के उठा कर ले गई और बाद में उनकी हत्या कर दी गई

आदिवासी नेता सोनी सोरी मंगलवार को दोनों किशोरों के अंतिम संस्कार में पहुंची.

सोनी सोरी ने कहा, "गड़दा गांव का रहने वाला मुरिया आदिवासी सोनकू राम अपने एक दोस्त सोमड़ू के साथ शुक्रवार को अपनी बुआ के घर पहुंचा था. वहां रात होने के कारण दोनों रुक गये. सुबह चार बजे के आसपास सुरक्षाबलों की एक टीम पहुंची और दोनों किशोरों को अपने साथ लेकर चली गई."

इधर मृतकों के गांव जा रही दंतेवाड़ा की कांग्रेस विधायक देवती कर्मा ने आरोप लगाया कि उन्हें सुरक्षा का हवाला देकर बास्तानार में रोक दिया गया.

इसके बाद मंगलवार को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल ने इस पूरे मामले में बस्तर में पार्टी के सात विधायकों के नेतृत्व में एक जांच दल बनाने की घोषणा की है.

दूसरी ओर बस्तर में भारतीय जनता पार्टी के सांसद दिनेश कश्यप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "इस विषय पर जानकारी लूंगा और अगर ऐसा हुआ है तो निश्चित तौर पर यह जांच का विषय है."

दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों ने भी इस कथित मुठभेड़ की कड़ी आलोचना की है.

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह का कहना है कि बस्तर में माओवादियों के नाम पर एक के बाद एक फर्ज़ी मुठभेड़ का सिलसिला चल रहा है.

डॉक्टर लाखन सिंह ने बताया, "बस्तर में सुरक्षाबलों ने हत्याओं का अभियान चलाया हुआ है. बच्चों और बड़ों को घरों से उठा कर ले जाती है और उन्हें माओवादी बता कर मार डालती है. अगर महिलाएं हुईं तो उनके साथ बलात्कार किया जाता है. यह एक भयानक स्थिति है और राज्य सरकार इसकी अनदेखी कर रही है.

इस मामले पर कई कोशिश के बाद भी पुलिस का पक्ष हमें नहीं मिल पाया.

(बीबीसी हिन्दी के  लिए)



दलित युवक सतीश नोरंगे की पुलिस अभिरक्षा में मौत की पीयूसीएल छत्तीसगढ़ एवं अन्य संगठन की तथ्यपरक रिपोर्ट .



दलित युवक सतीश नोरंगे की पुलिस अभिरक्षा में मौत की पीयूसीएल छत्तीसगढ़ एवं अन्य संगठन की तथ्यपरक रिपोर्ट .



दिनांक 24 सितम्बर 2016

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नरियरा के  दलित युवक सतीश नोरंगे की हत्या  दुर्घटना अथवा उत्तेजना में नहीं, वरन् जातीय घृणा और निजिकरण के कारण उपजे वैमनस्य का नतीजा है.

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परिपेक्ष्य ;

नरियरा के युवक सतीश नोरंगे की मृत्य दुर्घटना अथवा उत्तेजना में नहीं, वरन् जातीय घृणा और निजिकरण के कारण उपजे वैमनस्य का नतीजा है। सतीश के परिवार, पड़ोसियों, घटनास्थलों से मिले साक्ष्य एक सोची समझी हत्या की ओर संकेत करते हैं। सतीश के नौवीं पढ़ रहे बड़े पुत्र के सामने ही टीआई राजपूत ने उसे मारा और जब वह खून की उल्टी किया तो उसके बेटे से धुलवाया और जब सतीश ने अपने बेटे से अस्पताल ले चलने की बात किया तो दरोगा ने गाली देकर नाटक करता है कह पेट में लात मारा जिसके बाद सतीश मरणासन्न हो गया।


परंतु इस सारे विवाद की जड़ में जो घटना है वह है विजली वितरण को ठेके पर दिया जाना।यह छत्तीसगढ़ के तमाम गाँव में देखा जा रहा है कि दलित बस्तियों में बिजली कई दिनों नहीं रहती, जबकि संपन्न और सवर्णों के मुहल्लों में स्थित वैसी नहीं रहती।

नरियरा में भी वही हुआ, सागर पारा जहां  सतीश का घर है में 4दिन से बिजली नहीं था। बिजली ठेकेदार का कर्मी रोज  टालमटोल करता था 17तारीख को जब सतीश और उसके चार  पांच मित्र बिजली कर्मी के पास ट्रांसपोर्ट का इंतजाम करने पैसे लेकर गए तो वहां पर फिर टालमटोल करने पर आक्रोश में आकर इन नवजवानों ने पूरे गांव की बिजली बंद करवा दिया। इससे गांव के ही ठाकुर जमींदार के बेटे के पेट्रोल पंप बंद हो गया और उसने बिजली आफिस के बड़े बाबू लवसिंह ठाकुर को बुलवा भेजा जिसने सबस्टेशन पहुंच, सतीश के मित्रों को ट्रांसफार्मर लोड करने के लिए और आदमी लाने भेज दिया और अकेले सतीश की ठेका कर्मचारी के साथ मिलकर पिटाई शुरू कर दिया और पुलिस बुलवाकर  सतीश को थाने में भिजवा दिया।

   छत्तीसगढ़ में बिजली विभाग रमनसिंह के पास है और वह इसे निजी हांथों सौंपना चाहते हैं इसलिए तमाम काम ठेकेदारों को दे रखा है। और जांजगीर चांपा जिले के ठेकेदारों की दबंगई प्रसिद्ध है, खासकर मीटर शिफ्टिंग घोटाले में इंजीनियर तक जेल गए परंतु दोषी ठेकेदारों का कुछ नहीं बिगड़ा।

   नरियरा में भी यही दिख रहा, एक  समझदार नेतृत्वकारी दलित युवा को ठाकुरों के जातीय घृणा और बिजली विभाग के ठेका प्रथा ने मार डाला।

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घटना क्रम

16 और 17 सितम्बर 2016

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सतीष नोरगे के परिजनों से हुई बातचित से पता चला कि उनके मुहल्ले ( दलित बस्ती )का ट्रांसफार्मर ख़राब होने के कारण लगभग हफ्ते भर से लाईट नहीं थी।

चूँकि सतीष जागरूक लड़का था इसलिए उसने अपने मोहल्ले का नेतृत्व करते हुए इसकी शिकायत बिजली कार्यालय नरियरा में किया हुआ था ,किन्तु कोई सुनवाई नहीं हो रही थी ,जब कि दूसरी बस्ती में सामान्यत: बिजली बनी रहती है .

मोहल्ले वालों ने ट्रांसफार्मर लाने के लिए वाहन किराया के लिए चंदा के द्वारा लगभग 15 सौ रूपये इकठ्ठा किये जिसे सतीष ने 16 सितंबर को बिजली कार्यालय नरियरा में जमा किया.

17 सितंबर को घटना के दिन सतीष मोहल्ले के तीन लोगों के साथ बिजली कार्यालय नरियरा पहुंचा और ट्रांसफार्मर के लिए बात किया किन्तु ट्रांसफार्मर फिर भी उपलब्ध नहीं हुआ, तब सतीष ने बिजली कार्यालय वालों पर दबाव बनाया की सभी जगह की बिजली गुल करो तभी ट्रांसफार्मर जल्दी आएगा और अपने साथ आये तीन लोगों से कहा कि आप लोग मोहल्ले वापस जाओ और वहाँ से और आदमी लेकर आओ, ट्रांसफार्मर को गाड़ी में चढ़ाने के लिए जरुरत पड़ेगी फिर सतीष की बात सुनकर वे लोग वापस चले गए. सतीष वहाँ अकेले रहा और बिजली ठेकेदार के आदमी  देवेन्द्र साहू जो वहाँ ड्यूटी पर था उससे कहा कि हमारे ही मोहल्ले की बिजली बार बार क्यों गुल होती है और हमारा ट्रासफार्मर ही क्यों खराब होता है ,जब कि बांकी सारे मोहल्ले में हमेशा बिजली बनी रहती है .


यदि एसा ही है तो  सभी जग़ह की लाइट गुल करो,तब ठेकेदार के आदमी   देवेंद्र साहू डीओ गिरा दिया जिससे सभी जगह की लाईट चली गई.

जिससे गाँव के गौटिया नन्हे सिंह ठाकुर का पेट्रोल पंप भी प्रभावित हुआ, नन्हे सिंह ठाकुर ने बिजली कार्यालय में बड़े बाबू के पद पर पदस्थ अपने बड़े बेटे लव सिंह को कॉल करके पूछा की बिजली क्यों गुल किये तो उसने बताया कि सतीष  ने दबाव बनाकर लाईट गुल करवाया है, फिर नन्हें सिंह ने अपने रिश्तेदार मुलमुला थाना प्रभारी राजपूत को कॉल कर के सतीष की ख़बर लेने को कहा,फिर थाना प्रभारी राजपूत दलबल के साथ बिजली कार्यालय पहुँचा और सतीष के दोनों हाथों को बांध कर ठेकेदार के कर्मचारी और अपने पुलिस बल के साथ उसके पिटाई करने लगे


जिसे बग़ल में संचालित स्कुल में पढ़ रही सतीष की भतीजी ने देखा और अपने शिक्षक से छुट्टी माँगने गयी की मेरे चाचा को मार रहे है मुझे जाना है किंतु शिक्षक ने उसे डाँट कर कहा कि क्या तुम्हारे जाने से उसे मार नही पड़ेगी.

बिजली आँफिस जो दस कदम दूर है और,17 सितंबर को सैकेण्ड सटरडे के कारण बंद था ,फिर भी इस कार्यालय में पदस्थ लवसिंह वहाँ पहुंच गया और पेट्रोल पम्प के मालिक नन्हे सिंह के रिश्तेदार होने के करण सतीश को मारने पीटने में शामिल हो गया.

यहीँ सतीश को हाथ बांध कर बुरी तरह पीटा गया जिसे पचास कदम  सामने कन्या शाला की बच्चीयों ने देखा जिसमें सतीश की भतीजी भी शामिल थी.


 स्कूल के छुट्टी के बाद विद्यार्थी जब रास्ते से लौट रहे थे तो रास्ते में सतीष के चाचा को बताया  की सतीष को मार रहे है , और उन्हें थाने ले गये है .मिठाई लाल  उनके चाचा थाने पहुँचे,सतीष को थानाप्रभारी राजपूत थाना ले आया था और अपने आरक्षकों के साथ मिलकर उसकी फिर पिटाई किये.


सतीष का 10-12 साल का बेटा प्रकाश थाना पहुँच चूका था,सतीष अपने बेटे से दर्द में तड़पते हुए बोला की मुझे चार पाँच पुलिस वाले बहुत मारे है मुझे अस्पताल ले चलो। इसी बीच फिर थाना प्रभारी राजपूत ने सतीष को  घृणा पूर्वक बोला साले नाटक करते हो कहकर उसके बेटे के सामने डंडे से तीन बार मारा फिर लात से उसके पेट को मारा। फिर सतिष खून की उल्टी किया जिसे थाना प्रभारी ने सतीष के बेटे से साफ करवाया और सतीष को दूसरे कमरे में रखवाया सतीष दूसरे कमरे में भी उल्टी किया, जिसे थाना प्रभारी राजपूत ने फिर से सतीष के बेटे से साफ करवाया और सतीष को बहार बरामदे में फिकवा दिया।

तब तक सतीष के चाचा मिठाई लाल भी वहाँ पहुँच गये थे उनके सामने थाना प्रभारी ने शराब का बोतल से शराब सतीष के मुँह को जबरदस्ती खोलते हुए डाल दिया।

सतीष के चाचा ने बताया कि सतीष का दम उखड़ने लगा था आँखे ऊपर की तरफ़ चढ़ गई थी, सतीष का शरीर मिट्टी हो चूका था, फिर थाना प्रभारी ने सतीष को छूकर देखा और तुरंत उसे अपनी गाड़ी में डाला,सतीष का लड़का बस गाड़ी में बैठ पाया था कि वो गाड़ी लेकर पामगढ़ निकल गया। सतीष का चाचा किसी के साथ मोटरसायकल से पामगढ़ अस्पताल पहुंचा.


तो वहाँ थाना प्रभारी राजपूत  डॉक्टर को दबाव बना रहा था कि वो सतीष को बिलासपुर रिफ़र करें, किन्तु सतीष तो थाने में ही मर चुका था,और डॉक्टर मृत शरीर को रैफर  नहीं किया.

फ़िर थाना प्रभारी अस्पताल में किसी दूसरे डॉक्टर को लेकर आया उस डॉक्टर ने सतीष को चेक करने की कोशिश किया तो सतीष के चाचा ने कहा कि इसे क्या चेक कर रहे हो ये तो मर गया है।

इतने में पामगढ़ थाना प्रभारी आया और सतीष के चाचा को अपने बातों में उलझते हुए कहा कि मैं रिपोर्ट लिख कर तुम्हें पावती देता हूँ और इसी बीच में मुलमुला थाना प्रभारी राजपूत को फ़रार करा दिया गया।

इस समय तक गांव और पामगढ़ से बहुत से लोग थाने पहुंच गये थे और पत्रकार भी बडी संख्या में आ गये थे.

ग्रामवासियों ने सतीश के शव को लेकर सडक जाम भी किया .

घटना के बाद बैकफुट पर आई सरकार ने एकल सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग के गठन की घोषणा की थी। साथ ही दंडाधिकारी जांच भी की जा रही है. मामले में चौतरफा बवाल होने के बाद 4 लोगों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई थी। रविवार को मुलमुला के तत्कालीन थानेदार जितेन्द्र सिंह राजपूत, आरक्षक दिलहरण मिरी, सुनील ध्रुव एवं नगर सैनिक राजेष दाउद को पहले निलंबित किया फिर जनदबाव के कारण उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया.

बिजली विभाग के चार कर्मचारी भी निलम्बित किये गये।

चौबीस सितम्बर को पीयूसीएल और अन्य संगठनों का 15 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल पुलिस अधिकारियों से मिला और दबाव बनाया कि 302 के पुलिस के अपराधियों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा रहा है तब अगले दिन 25 सितंबर को चारों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया.

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प्रमुख गठजोड़

 इस हत्या में निश्चित ही जातिगत घृणा है जो वर्षों से उच्च जातियों में दलितों के प्रति बनी हुई है जो गाहेबगाहे सामने आती रहती है .

यह घटना तो बहुत मामूली थी ,

इस घटना क्रम में एक है गांव के गोटिया नवीन सिंह एक   नन्हे सिंह  जो पेट्रोल पम्प के मालिक  भी है और उनका बेट लवसिंह है तो बिजली विभाग में बडा बाबू लेकिन  कहा यही जाता है कि वहीं असली अधिकारी है और फिर उनके ही रिश्तेदार थाना प्रभारी है  जीतेंद्र सिंह राजपूत .

इन सब ने और उनके साथियों ने सतीश की नृशंस हत्या कर दी .

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पुलिस ने बिजली विभाग से  रिपोर्ट लिखवाई  सतीश के ही खिलाफ ही.

मुलमुला थाने ने बिजली के ठेकेदार की शिकायत दर्ज की है कि सतीश ने जोर जबरदस्ती से बिजली गुल करवाई जिससे जन आक्रोश होने की संभावना पैदा है गई इसलिए प्रताबंधित कानून की धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया.

पोस्ट मार्टम रिपोर्ट भी परिवार को प्राप्त हुई जिसमें चोट से मोत की पुष्टि की गई है (संलग्न)

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कुछ प्रमुख बयान

( 1.) राजकुमार नोरंगे सतीश के छोटे चाचा


17  सितंबर को दोपहर तीन बजे जब में बाज़ार में था तो लोगों ने बताया कि झगड़ा करके सतीश को मुलमुला थाने ले गये है .वही बुलाया है, यह भी कहा कि जमीन का पट्टा और रूपया लेके बुलाया है .

मोटर स्टेंड पर नवीन सिंह मिले तो उन्होंने कहा कि उसके पेट्रोल पंप जो भतीजा बैठा है अमित से फोन कराओ ,में वहाँ गया तो नवनीत फोन करने बगल में चला गया हमारे सामने फोन नहीं  किया ,बाद में आके बताया कि थाने जाने की जरूरत नहीं है उसकी तबीयत ठीक नहीं है ,उसका इलाज कराकर घर भेज दिया जायेगा.

जब हम वापस घर आ रहे थे तो रास्ते में नवीन के रिश्तेदार ने कहा कि सतीश  को पामगढ़ ले गये है तब में भागा भागा पामगढ पहुचा तब देखा की थाने के बाहर स्ट्रेचर पर मूंह पर कपड़ा ढंका था ,हमने मूंह से कपड़ा हटा कर देखा तब तक उनकी मौत हो चुकी थी .

गांव वाले इकट्ठा हो रहे थे तब ही पामगढ़ के थानेदार ने मुलमुला के थानेदार राजपूत को वहाँ से भगा दिया.

हम लोगों ने अस्पताल के सामने ही शाम सात बजे से शव को लेके सडक जाम किया .

उन्होंने कहा कि सतीश मजदूरी का काम करते थे .और छोटा मोटा काम बिजली सुधारने का भी करते थे गांव में. एक सप्ताह से हमारे मोहल्ले का ट्रासफार्मर खराब था ,इसके कारण पीने और खेत में पानी का संकट हो गया था .वह गांव में समस्याओं को लेके नेतृत्व भी करता था.

गांव वालों ने ट्रासफार्मर लाने के लिये गाड़ी की व्यवस्था के लिये चंदा करके  1500  रूपये सतीश को दिया .

सतीश तीन चार लोगों के साथ संजय नगर  स्थित बिजली आँफिस पहुचा था ,वह अकेला रूक गया ओर साथी से कहा कि ट्रासफार्मर लाने के लिये गाँव से और लोगों को लेके आ जायें. बिजली आफिस में लवसिह के साथ तू तू मेमे हुआ, सतीश ने कहा कि हमारे सागर मोहल्ला में  एक सप्ताह से बिजली नहीं है जबकि और सब जगह बिजली जल रही है .

बिजली आफिस के एकदम पास में कन्या स्कूल है यही सतीश की भतीजी विनीता ने देखा कि चाचा को हाथ पीछे  बांधकर बिजली आफिस और पुलिस वाले बुरी तरह मार रहे है .विनीता ने शिक्षिका से कहा भी कि उसे जाने दें लेकिन उसे बाहर नहीं जाने दिया. उसने देखा कि लवसिंह ,गोटिया नन्हे सिंह ओर पुलिस के लोग मार रहे थे.

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 ( 2 .) सतीश (मृतक) का बेटा प्रकाश नोरगे  14 साल


में अपने पिता के साथ थाने में था ,मेनू उन्हें पानी पिलाया मेरे साथ चाचा रविन्द्र भी थे ,पापा ने मुझे कहा कि पुलिस वाले बहुत मारे है मुझे किसी डाक्टर के पास ले चलो, यह सुनकर थानेदार राजपूत ने जोर से लात मारा और कहा साले नाटक करता है.

मेरे पिता को खून की उल्टी हुई  ,हमारे सामने बहुत बुरी तरह से मारा .

पुलिस के लोग ने कहा कि तू खुन की उल्टी की सफाई कर तब में ने पानी से उल्टी साफ किया इसके बाद फिर मेरे पिता को लात और डंडे से मारा तो उन्हें फिर खून की उल्टी हुई तो फिर हम लोगों ने खून साफ किया .

उन्होंने मेरे पापा को थाने के बाहर मैदान में पटक दिया .

मेरे पापा थाने में ही मर चुके थे ,उन्होंने हाथ लगातार देखा तो उन्हें भी लगा कि वो मर चुके है तो जल्दी जल्दी में अपनी गाड़ी में लादकर पामगढ ले गये.

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( 3 .)मिठाई लाल नोरगे (बड़े चाचा )


मिठाई लाल जी घर में सबसे बड़े है ,उन्होंने बताया कि

में दोपहर तीन बजे  मुलमुला पहुचा तब ही स्कूल के बच्चे जो स्कूल से छुट्टी करके आ रहे थे उन्होंने कहा कि सतीश को बिजली आफिस में मार रहे थे अभ थाने ले गये है तब  में थाने पहुचा तो देखा कि थाने में पुलिस के लोग निर्ममता से मिलकर पीट रहे थे तो दो बार खून की उल्टी हूई तो नाती को कहा कि चल गंदगी साफ कर ,उसने करी अगरबत्ती लगवाई और फिनायल से धुलवाया भी.और थाना के बाहर पुलिस के लोगों ने सतीश को फेक भी दिया. उसका  गाल फूल गया था, पसली टूट गई थी जांघ फूल गई थी.

में ने कहा भी की में बंगाली डाक्टर को बुला लेता हूं तो वो वोला कि हम इलाज करवा देते  है ,तुम चिंता नहीं करो.

इतने में एक पुलिस के आदमी ने थाने में से एक शराब की शीसी लाकर सतीश के  मू़ह में शराब उडेल दिया जै बाहर तक फैल गया.

सतीश यही मर चुका था ,इसे अपनी गाडी में मर के पामगढ सरकारी अस्पताल लेकर चले गये। हम लोग भी पीछे पीछे चले गये.

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थाना प्रभारी राजपूत ने मुझसे चिल्ला कर कहा कि हां

हमने सतीश को मारा है ,जो करना है कर लो .

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कलेक्टर और एसपी 18  सितंबर को घर आये और पच्चीस हज़ार रूपिया दिया अंतिम संस्कार के लिये

और कहा कि लाश को जल्दी जला दो ,लेकिन हम लोगों ने लाश को दफनाया .

24 तारीख तक परिवार को एफआईआर और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई ,यधपि 26 सितंबर को दोनों रिपोर्ट मिल गई .

20 सितंबर को मजिस्ट्रेट के सामने परिवार के राजकुमार ,मिठाई लाल,प्रकाश, राजेन्द्र कुमार ,रविन्द्र कुमार ,गोलू पाटले और विनीत का बयान लिया गया है लेकिन उन्हें बयान की प्रति नहीं दी गई है उन्हें यह भी आशंका है कि जो बोला है वही लिखा है कि नहीं .


नौकरी का प्रस्ताव दिया गया


आदिम जाति कल्याण विभाग के अधिकारी परिवार से मिले थे ,उनका प्रस्ताव छात्रावास में अस्थायी रूप से नियमित रसोइया के पद पर दिया है .

अभी घरके लोग निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है ,उन्होंने कहा है कि वे तुरंत सोच कर निर्णय करेंगे.

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बिजली विभाग के अधिकारियों से मिला प्रतिनिधि मंडल .


नरियरा में बिजली विभाग में सहायक यंत्री सौरभ विश्वकर्मा से चर्चा की ,वे अभी अभी घटना के बाद पदस्थ हुये है ,जैसा कि होता है घटना के दिन का सारा स्टाफ ट्रांसफर कर दिया अब वहाँ एसा कोई नहीं था जो घटना बता पायें.

वे बहुत कुछ बताना नहीं चाह रहे थे ।

उन्होंने कहा कि घटना के दिन यहाँ आदित्य सक्सैना पदस्थ थे ,अब उनका और अन्य चार का स्थानान्तरण हो गया है.

घटना स्थल बीस कदम दूर सब स्टेशन  है ,उस दिन सैकेण्ड सटरडे था इसलिए अवकाश था यह कार्यालय बंद था यहाँ कोई नहीं था.

सब स्टेशन में आपरेटर देवेन्द्र साहू जो ठेकेदार का आदमी है उसने पुलिस और जेई को सूचना दिया कि सतीश ने फीडर बंद कर दिया है .

सब स्टेशन ठेके पर चलता है जिसका ठेका हरसिद्धि कंपनी को दिया गया है,उसके मालिक का नाम मालुम नहीं है . सामान्यत: सात दिन में ट्रासफार्मर सुधर जाता है, 14 सितंबर को शिकायत आया था

घटना के बारे में मुझे कुछ नहीं मालुम ,वो यह बोले कि घटना के तुरंत बाद जूनियर इंजीनियर अदित्य सक्सैना ,बडा बाबू लव सिंह ,विजेन्द्र चेलकर लाइनमैन और अमृत लाल मन्नेवार लाईन मैन का ट्रांसफर कर दिया गया .

मेरी जानकारी में मेरे विभाग ने ग्रमीणों के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की .

बिजली विभाग और घटना स्थल एक ही परिसर में है

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मूलमुला थाना में चर्चा



मुलमुला थाने में नये थाना प्रभारी विजय चौथरी से बात हुई उनहोंने बताया कि उनकी नियुक्ति 18..9.16

को घटना के दूसरे दिन हुई है .

अपराध क्रमांक 128/16 दिनांक 18.9.16 को कायम हुई है .पूर्व थाना प्रभारी राजपूत और दो सिपाही एक होमगार्ड सिपाही को निलंबित किया गया और उनके खिलाफ धारा  302( 34) sc

/st  3(1)(5) के तहत जुर्म दर्ज हुआ है ,मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिये गये है ,.

जिला जज़ ने दो सदस्यीय कमेटी बनाई है जिसमें श्री खाखरा और जायसवाल साहब को जांच सोंपी गई है।

पामगढ में मर्ग  कायम किया गया है ,पुलिस इंक्वायरी डीएसपी जेपी अनंत कर रहे है .

थाना प्रभारी ने पूछने पर यह भी कहा कि गांव वालों या अन्य किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है ,क्योंकि कि उन्होंने एसा कुछ किया नहीं है

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निष्कर्ष और प्रशासन से मांग

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नरियरा गांव मुलमुला से अकलतरा जाने वाले मुख्य मार्ग पर है यहाँ शुरू से ठाकुरों का दबदबा रहा है,यहाँ से जनप्रतिनिधि भी एक जैसे परिवार से चुनें जाते रहे है .

दलितों के साथ पहले भी अपमानजनक घटनाएँ होती रही है .यह घटना सामान्य सी दिखने वाली है जो लगभग सभी जगह होती रहती है ,लेकिन उच्च जाति का दलितों के प्रति जातिगत घृणा और भेदभावपूर्ण व्यवहार के परिणामस्वरूप एक ही परिवार और जाति के लोगों ने पुलिस (वह भी उनमें से एक) ने मिलकर एक दलित नौजवान की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी .

राज्य सरकार ने बिजली की पूरी  व्यवस्था ठेकेदारों के हाथ में सोंप दी है ,इस गांव में भी विधुत उप केन्द्र ठेकेदार के हाथ में है, हो सकता है कि ठेकेदार भी उसी ठाकुर परिवार का हो.

जातीय दबंगई ,पुलिस, प्रशासन और ठेकेदारी ने मिलकर नौजवान की हत्या कर दी ।

हमारी मांग है कि ;

1 विधुत उप केन्द्र पर हत्याकांड के समय उपस्थित लव सिंह और उसके साथ अन्य  दो जिन्हें बाद में विभाग ने ट्रा़ंसफर किया  गया  विजेन्द्र चेलकर लाइनमैन और अमृत लाल मन्नेवार लाईन मैन उन पर भी हत्या का केस दर्ज किया  जायें,क्योंकि इन सबने मिलकर ही सतीश को मारा पीटा गया है .

2 पेट्रोल पंप के मालिक नन्हे सिंह ओर उनके साथी जिन्होंने सतीश की हत्या में उत्प्रेरक की भूमिका की उनके खिलाफ भी  हत्या कि केस दर्ज किया जायें.

3 सतीश के परिवार को दबंगों से संभावित हमले और दबाव से सुरक्षा प्रदान की जावे.

4  सतीश की पत्नी को सम्मान और गरिमा युक्त सरकारी नोकरी दी जाये.

5 सतीश के दोनों बच्चों की मुफ्त पढाई की व्यवस्था की जायें.

6 सतीश की पत्नी को दस लाख का मुआवजा तत्काल प्रदान किया जाये.

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जांच दल में शामिल रहे :-

 1 नंद कुमार कश्यप ,डिग्री प्रसाद चौहान ,रिनचिन और डा. लाखन सिंह ( छत्तीसगढ़ पीयूसीएल)

2 दीपांशु कश्यप और विजय शंकर पात्रे (छात्र युवा संघर्ष समिति cyss)

3 विभीषण पात्रे ,उमेश प्रधान ,सुभद्रा दिनकर,     अनुसुईया कश्यप (दलित अधिकार अभियान )

4 शिप्रा देवी ( छत्तीसगढ़ महिला मंच शक्ति)

5  लखन महेश्वरी (निवेदिता फाउंडेशन डभरा  )












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THE BARSOOR BOYS

THE BARSOOR BOYS








Today, newspapers reported that three former women Naxalites had joined the police in their anti Naxal Operations for the first time, and had also achieved great 'success' - in their very first operation in the Sanguel forests of Burgum Bastar, they had killed two Naxalites!

“For the first time in Bastar district of Chhattisgarh, three women commandos, who formerly fought against security forces alongside naxals, took part in an anti-Maoist operation in which two ultras were gunned down,”
Thus read the police press release, carried as news.[1]

The SP Shri RN Dash gushed,
“If Maoists can have women in their ranks, why not the security forces. These women commandos have been given special training in combating insurgency.”

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Well, it appears that the women commandos are just as bad as their male counterparts when it comes to picking out Naxalites.  The two “ultras” they have killed appear to be young men from Barsoor, aged 16 and 18 years, who had come to Burgum to inform their relatives of a death in the family.

Today, scores of villagers, numbering 200-250, assembled at the Barsoor Police Station, demanding justice for their young men who had been encountered. The two young men who had been killed were Sonaku Ram s/o Payako, aged 16 years, and Bijno s/o Nadagi, aged 18 years, both residents of village Garada in village Bhatpal of PS Barsoor, District Dantewada.

​(Villagers congregated outside the Barsoor Police Station)

On the 23rd of September (Friday), the two boys, who were from the same extended family, had gone to Saungel village in PS Burgum, Dist Bastar, to inform their relative, Pakalo, of the demise of a six year old child in their family. They reached their relative’s home in the late afternoon, and since it was getting dark, they decided to spend the night there itself.  While they were sleeping in Pakalo’s house, at around 4 am in the early morning, security forces entered the house and dragged out the two boys, in full view of their families.  They were shot soon after.

The hour-long "fierce gun-battle" between the Naxals and security forces in the a "densely forested hill"[2] in which the women commandos showed their bravery, was just as fictitious as the many others preceding this one.


(Payako, the father of Sonaku, clutching at his son’s marksheets, flanked on the left by Nadagi, father of Bijnu)



Young Sonaku had been a student in the residential Porta Cabin school in Etameta till last year. Having completed 8th standard, which is as far as the Porta Cabin school goes – he had been helping out in the fields for the past year. Bijnu was completely unlettered, but possessed an Aadhaar card. Ironically, he tried to show the security forces his Aadhaar card in order to prove his bona fides as a villager and not as a Naxalite, when he was dragged out and shot.


(School report card of Sonaku)​

The villagers say that they are not burning the bodies till they get justice.  At the Barsoor Police Station, the SHO flatly refused to accept their memorandum seeking the registration of an FIR, saying that the matter related to another police station – only the deceased lived in his jurisdiction, but the crime had happened in a different location. Multiple recitations of SC judgments, saying that a zero-numbered FIR should be registered at the first instance, and then transferred to the appropriate Police station fell on deaf ears.  Privately, the SHO pleaded with the villagers that while they were correct in their understanding of the law, he would personally get into great trouble were he to register such an FIR.  The letter of complaint, submitted at Barsoor PS, was returned with the notation that the applicants have been referred to Burgum thana in the neighbouring district of Bastar, some 50 kms away.

Attempts were being made to get the FIR registered at the Burgum PS till late evening, and it is not clear whether they were eventually successful or not. The villagers, meanwhile, have returned to guard their dead bodies.



Dated – 26.09.2016

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Monday, September 26, 2016

आठवीं के छात्र सुकालू राम और उसके दोस्त पाचवी के छात्र सोमडू राम को पुलिस ने मारी गोली .

* आठवीं के छात्र सुकालू राम और उसके दोस्त  पाचवी के छात्र सोमडू राम को  पुलिस ने मारी गोली .


* कांग्रेसी विधायक देवती कर्मा ने लगाया हत्या का आरोप, पुलिस ने रास्ते में  रोका बरगुम जाने से विधायक को.
* सुकालू के पिता ने अपने बेटे की पढाई के दस्तावेज़ दिखाये सबको.
**सोनी सोरी  और उनके साथ गांव वालों को थाने जाने से रोका ,आज फिर जा रही है बरगुम.
* लाश अभी भी पडी है गांव में ,परिवार ने अंतिम संस्कार करने से किया इंकार.
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दंतेवाड़ा /
अभी दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अग्नि की ललकार रैली के बाद घोषणा किया था कि  बस्तर से माओवाद खतम हो गया है .
और कल ही दंतेवाड़ा के बारसूर ब्लॉक के पोटा केबिन में पढने वाले आठवीं में पढने वाले छात्र  सुकालू राम और उसके दोस्त जो पांचवीं में पढता है सोमडू राम को बस्तर पुलिस ने माओवादी बता कर गोली मार दी .
सुकालू राम के पिता पायकू राम ने बताया कि शुक्रवार को सुकालू अपने दोस्त सोमाडू के साथ बुआ के घर शोक की खबर देने गया था , रात देर होने के कारण उन्हें गाँव में ही रोक लिया था .
गाँव में देर रात पुलिस पहुची और दोनों बच्चों को उठा कर अपने साथ ले गई, इसके बाद बरगुम से कुछ लोग आये तब खबर मिली की दोनों बच्चों को पुलिस ने गोली से मार दिया है .
सुकालू के पिता अपने बेटे के पोटाकेबिन में पढाई के दस्तावेज़ कांग्रेस नेताओं के समक्ष रखे और कहा कि दोनो बच्चे स्कूल में पढ रहे थे.
दंतेवाड़ा की विधायक देवती कर्मा ने दोनों बच्चों की हत्या का पुलिस पर आरोप लगाया और कहा कि जब वो घटना की खबर लेने बगरुम जा रही थी तो पुलिस  के एसडीओपी केशलूर उमेश कश्यप ,कोडेनार थाना प्रभारी दुर्गेश शर्मा और सीआरपीएफ के जवानों ने सुरक्षा का हवाला देकर बास्तानार से आगे नहीं बढने दिया.देर रात तक देवती कर्मा लोगों के साथ बास्तानार में ही डटी रहीं.
बस्तानार को पुलिस ने छावनी में तब्दील कर दिया है ताकि कोई भी बच्चों के गाँव बगुरम न पहुँच पायें.
उधर पुलिस का दावा है कि उसने दोनों माओवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया है.
सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने एक पोस्ट में घटना का विवरण दिया है कि ;

दन्तेवाड़ा से चित्रकूट जाते समय मारडूम गॉव है,
यहाँ के दो आदिवासी किशोर रिश्तेदारों के यहाँ किसी की मौत की सूचना पहुँचाने गये ,
इनमे से एक पांचवी और दूसरा आठवीं मे पढ़ता है,
पुलिस गश्त पर आयी ,
पुलिस दोनों लड़कों को अपने साथ ले गई ,
पुलिस ने दोनों लड़कों को गोली मार दी,
लाशें गांव मे पड़ी हैं ,
गांव वाले कह रहे हैं जब तक हमारे बच्चों के मारने की रिपोर्ट दर्ज नहीं करोगे ,
हम अन्तिम संस्कार नहीं करेंगे ,
कल सोनी सोरी के साथ पांच हज़ार आदिवासी गांव से थाने की ओर बढ़े ,
लेकिन सैन्य बलों ने आगे बढ़ने नहीं दिया ,
आज सोनी सोरी फिर से उस गांव मे जा रही है
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मनीष के मंच पर कब्जा किया अग्नि और पुलिस के लोगों ने .



* मनीष के मंच पर कब्जा किया अग्नि और पुलिस के लोगों ने .


* कल सुकमा और आसपास के क्षेत्र में मनीष कुंजाम के समर्थन में अभूतपूर्व बंद रखा गया था ,इससे बोखलाई पुलिस और अग्नि संस्था के राष्ट्रीय संयोजक अपने दलबल के साथ सुकमा पहुंच गये उनके साथ थे बस्तर के आईजी सुकमा के एसपी और बहुत से पुलिस के लोग.
* इन लोगों ने मनीष कुंजाम द्वारा आयोजित सभा को तितरबितर कर दिया और मंच पर कब्जा करके उनके ही खिलाफ भाषण देने लगे.
* इसके पहले भी आदिवासी महासभा की यात्रा के समय भी जगह जगह सभा के मंच पर कब्जा करके इनके खिलाफ नारे लगवाने और सभा भंग करने का काम पुलिस के लोग करते थे ,जिस कारण मजबूर होकर यात्रा खतम करने का एलान करना पडा.
* यह घटना कल सोमवार की है ,और कमाल यह कि अपनी इस कारनामे की खबर सोशलमीडिया पर बड़े गर्व से पोस्ट भी की है.
* बस्तर आई जी, एसपी और अग्नि के पदाधिकारियों ने मनीष कुंजाम के मंच पर कब्जा करके उन्हें खदेडा
* आप भी पढ लीजिए लोकतांत्रिक देश की पुलिस के कारनामे़.
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दूसरे समूह में आई खबर ज्यों की त्यों निम्न है .

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मनिषासुर की मांद मे घुसकर अग्नि ने दी चेतावनी
बंद का विरोध करने वाले व्यापारियों और स्थानीय आदिवासीयों का किया सम्मान
सुकमा पहुँची अग्नि की टीम,आईजी एसपी भी रहे मौजूद
आराध्य देवी मॉ दुर्गा के प्रति अपमानजनक और अश्लील टिप्पणी करने वाले मनीष कुंजाम के सुकमा बंद का विरोध करने सोमवार को अग्नि की टीम ने सुकमा मे दस्तक दी !
अग्नि के राष्ट्रीय संयोजक आनंद मोहन मिश्र के नेतृत्व मे सुकमा पहुँचे बचेकाध्यक्ष ऋषि हेमाणी, संपत झा, पी.विजय, राजेश दास, सुब्बाराव एवं फ़ारूक़ अलि ने बंद का विरोध कर अपनी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को खोलकर रखने वाले व्यापारियों और स्थानीय आदिवासियों से मिलकर उनके साहसिक निर्णय का स्वागत किया । इस अवसर पर अग्नि के सदस्यों ने सुकमा बस स्टेण्ड मे मनीष कुंजाम के मंच मे ही पहुँच कर मनीष कुंजाम का नामकरण मनिषासुर के रूप मे करते हुए अपने भाषण मे मनीष को जमकर लताड़ा !

अग्नि के सदस्यों ने सुकमा पहुँचते ही मनीष कुंजाम के मंच मे उपस्थित गिनती के लोगों को खदेड़ कर मंच पर क़ब्ज़ा करते हुए जैसे ही मंच संभाला वैसे ही अचानक अग्नि के सदस्यों को सुनने लोगों का हुजुम उमड़ पड़ा । ओजस्वी भाषण सुनकर आनन फ़ानन मे एकत्रित हज़ार से अधिक सुकमावासीयों ने मनीष कुंजाम के खिलाफ दिये गये भाषण पर जमकर तालियाँ बजाया !!
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बस्तर रेंज के आईजी,एसपी बस्तर और एसपी सुकमा भी पहुँचे सभास्थल !!
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सुकमा-कोंटा सड़क निर्माण कार्य का अवलोकन करने रामाराम जा रहे

बस्तर रेंज के आईजी एसआरपी कल्लुरी,एसपी बस्तर आरएन दाश और एसपी सुकमा आईके एलेसेला भी रास्ते मे हो रही सभा को देखकर मंच पर पहुँचे और जनसमूह को संबोधित भी किया !!!!
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बस्तर आई जी एसपी और अग्नि के पदाधिकारियों ने मनीष कुंजाम के मंच पर कब्जा करके उन्हें खदेडा