This Blog is dedicated to the struggling masses of India. Under the guidance of PUCL, Chhattisgarh, this is our humble effort from Chhattisgarh to present the voices of the oppressed people throughout India and to portray their daily struggles against the plunder and pillage that goes on against them throughout the country.
धमतरी | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में खेतों के लिये पानी मांग रहे हजारों किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. इस लाठीचार्ज में कई किसान घायल हुये हैं. लेकिन इसके बाद भी किसानों ने हार नहीं मानी और लाठीचार्ज के बाद किसान धरने पर बैठ गये.
गौरतलब है कि राज्य के आधे से अधिक ज़िले सूखे की चपेट में हैं लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि जिन बांधों में 50 फीसदी पानी है, वहां से किसानों को पानी नहीं दिया जाएगा.
गुरुवार को कांग्रेस के नेतृत्व में किसानों के गंगरेल बांध से पानी छोड़ने और गंगरेल कूच करने की चेतावनी के मद्देनजर भारी सुरक्षाबल तैनात किया गया था. हाईवे समेत सभी सड़कों पर पुलिस ने जगह-जगह बैरिकेटिंग की थी. पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी सभी स्थानों में तैनात थे. लेकिन किसान रैली निकालने में सफल रहे.
धमतरी में जब किसानों का दल पहुंचा तो पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज कर दिया. इस लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में किसान घायल हो गये. इसके बाद भी किसानों ने हार नहीं मानी और वे धरना पर बैठ गये.
नन्द कश्यप हार्दिक पटेल को लेकर कितने कयास लगाए जा रहे हैं सोशल मीडिया में, एक फोटो अरविन्द केजरीवाल के गुजरात दौरे में ड्राइवर की, एक फोटो प्रवीण तोगड़िया के साथ पिस्तौल लिए हुए वह सब तो ठीक है परंतु इसमें पाटीदार समाज या गुजरात के कथित विकास जिसको बेचकर नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने उसकी सचाई या झूठ को नकारने का काम करते हैं यदि उसके साथ विष्लेषण न हो।जिस विकसित गुजरात की मारकेटिंग की गई उसकी शासकीय आंकड़ों से ही परख कर ली जाए ।अपने जीवन यापन के लिए प्रति व्यक्ति प्रति माह खर्च गुजरात1536 ₹वहीं राष्ट्रीय औसत1430₹है।भारतीय सांख्यिकी संस्थान फरवरी 2015 report.इसका मतलब हुआ वाईब्रेन्ट गुजरात में भी एक व्यक्ति 50₹में जीता है। आज से कुछ साल पहले यानि नई आर्थिक नीतियों से पहले गुजरात पंजाब पश्चिम उप्र दक्षिण के राज्यों में कृषि आधारित कुटीर उद्योग जनता में सम्पन्नता के प्रतीक थे। नई आर्थिक नीति के बाद 2006 में विश्व बैंक ने 2025 तक दुनिया की आधी आबादी के शहरीकरण का लक्ष्य लिया जिसके तहत भारत को शहरीकरण के लिए अच्छी खासी रकम का वादा किया गया। इस काम में चिदम्बरम साहेब के खासमखास मुख्य मंत्रियों में मोदी जी भी थे। इसी शहरीकरण की मुहिम ने गुजरात सहित देश के अनेक हिस्सों मे कृषि संकट को जन्म दिया किसानों की आत्महत्याओं में इजाफा हुआ। खैर गुजरात में भी पिछले वर्षो में ग्रामीण खाद्य प्रसंस्करण एवं आजीविका यथा दर्ज़ी, खादी, हेंडलूम, सिलाई कढ़ाई, गुड़, अचार, पापड़, दूध प्रसंस्करण जैसे उद्योगों का स्थान बड़े पूंजीपतियों ने ले लिया किसानों की जमीन जबरदस्ती उद्योगों को दिया। गांवों की छोटी छोटी आमदनियां बंद होने का असर धीरे धीरे व्यापक होते जा रहा है। उससे उपजे असंतोष और गुस्से को या तो बेहतर विकल्प मिले अन्यथा बस एक तीली ही पर्याप्त है।वैसे आजकल अपने सभी मित्रों को एक सवाल करता हूँ, योरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद वो सारी दुनिया को अपना उपनिवेश बना उसका२०० वर्ष तक शोषण किया। आज उनके पास उस लूट का वैभव है।सारी तकनीकी विशेषज्ञता है। आबादी वृद्धि दर भी कम है फिर भी वो बार बार मंदी और आर्थिक संकट में क्यों फंसता है? फिर हम क्यों उन्हीं के नक्शेकदम पर चलकर अपने ,ही देश में दो और तीन भारत बना रहे। असल सवाल यही है और इस मामले में सबसे ज्यादा झूठे, कपटी निकले आरएसएस और भाजपा जो स्वदेशी को ठीक वैसे ही ओढे रहे जैसा भेड़िया गाय की खाल ओढ़ धोखा देता है। सत्ता में आने के बाद मोदी विश्व बैंक की चाकरी कर रहे और इस बार अमेरिका जाकर अपने मालिक को बतलाऐंगे मैं शहरीकरण के लिए executive order निकाल दिया हूँ। अब किसान विरोध करेगा तो उससे कानूनन जबरजस्ती जमीन छीन ली जायेगी और उसे सस्ते में बिल्डरों को दे दी जाएगी ताकि आपका शहरीकरण प्रोजेक्ट सफल हो सक
आदिवासी महिलाओ के टार्चर सेल में तब्दील हुआ छत्तीसगढ़ ; हर दिन में दो अपराध और हर तीसरे दिन दुष्कर्म की घटनाये
शर्मनाक हालत बेहाल आदिवासी छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिलाओ के साथ होने वाली घटनाये बेहद शर्मनाक है ,सरकारी आँकड़े ही बताते है की आदिवासी महिलाओ के दुष्कर्म के मामले में छत्तीसगढ़ देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है , सरकारी आंकड़े कहते है की सिर्फ 2014 में ही 721 अपराधो में 121 मामले बलात्कार के हैं ,इसका मतलब यही हुआ की हर दिन में दो अपराध और हर तीसरे दिन बलात्कार की घटना आदिवासी महिलाओ के साथ हो रही हैं। पिछले साल एससी एसटी एक्ट के तहत 475 मामले दर्ज़ हुए पिछले वर्ष दुष्कर्म के 88 मामले आये थे ,पहले बात तो यह की बहुत से मामले थाने तक पहुंच ही नहीं पते उर जो पहुंचते है उनकी एफआईआर भी मुश्किल से लिखी जाती है। जयादातर तो पुलिस आरोपियों के साथ कड़ी दीखती है। जेल में विचाराधीन कैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है ,अब तक करीब 150 मामलो में हाई पवार कमिटी ने रिहाई की अनुशंषा की थी ,लेकिन मामले कोर्ट में अभी भी लटके हुए हैं। जब की सरकार ने जमानत का विरोध न करने का भी निर्णय लिया था। जेलों में आदिवासियों की संख्या जगदल पुर जेल में 546 विचाराधीन कैदी उसमे से 512 आदिवासी है दंतेवाड़ा में 377 कैदी उनमे 372 विचाराधीन कैदी है कांकेर में 144 में से 134 कैदी विचाराधीन आदिवासी दुर्ग में 57 विचाराधीन मेसे 61 कैदी आदिवासी है
पांच निरपराध आदिवासियों की गिरफ्तारी के विरोध में उतरे 2000 लोगो ने किया हाईवे जाम ;सुकमा
माओवादी के शक में पांच आदिवासियों के गिरफ्तारी के विरोध में दो हजार आदिवासी ग्रामीणो ने आज थाना कुकानार का घेराव किया ,और अपने को छुड़ाने के लिए नेशनल हाइवे 30 को चार घंटे जाम भी किया गया। जिसका असर तेलंगाना आंध्र सहित उड़ीसा जाने वाले वाहनो पे भी पड़ा। ग्रामीणो ने बताया की बुधवार सुबह सर्चिंग पे निकली पुलिस फ़ोर्स ने बड़े तोंगपाल और गादम में खेती में काम कर रहे बट्टी कोसा ,कवासी हिरमा ,बेट्ट्टी हिरमा ,पाइके और बेट्टी तारा को अकारण पुलिस पकड़ के ले गई। ग्रामीणो ने कहा की पुलिस बेवजह आदिवासियो को पकड़ के जेल ले जाती है और प्रताड़ित करती हैं ,बाद में पुलिस के आश्वासन पे जाम छोड़ दिया गया ,
Image copyrightImage captionपल्माइरा पर किए गए विस्फोट की तस्वीर
चरमपंथी संगठन इसलामिक स्टेट नें पल्माइरा के एक प्राचीन मंदिर बाल्शेमिन को विस्फोटकों से गिराए जाने की तस्वीरें जारी की हैं.
ये तस्वीरें आईएस प्रचार के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ट्विटर अकाउंट्स पर जारी की गई हैं.
एक तस्वीर में चरमपंथी पहले इस मंदिर में विस्फोटकों को लगाते हुए दिख रहे हैं.
और फिर धमाके की तस्वीर है.
सीरिया के अधिकारियों ने सोमवार को कहा था कि मंदिर को विस्फोट में उड़ा दिया गया है.
संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को के मुताबिक, सीरिया की सांस्कृतिक धरोहर को यूं नष्ट करना एक युद्ध अपराध है.
यूनेस्को ने पिछले हफ्ते पल्माइरा के सेवानिवृत्त प्रमुख पुरातत्ववेत्ता खालिद अल असद का आईएस द्वारा सर क़लम करने पर भी रोष ज़ाहिर किया था.
खालिद अल असद ने दशकों तक इस प्राचीन स्थल की देखभाल की थी और उन्होंने आईएस का सहयोग करने से इनकार कर दिया था.
मलबे का ढेर
Image copyrightImage captionपल्माइरा के सबसे पुराने स्थल की 2014 की तस्वीर
बाल्शेमिन का मंदिर करीब 2000 साल पुराना था और पल्माइरा के प्राचीन स्थल में दूसरी सबसे अहम इमारत थी.
सीरिया के प्राचीन वस्तुओं से जुड़े विभाग के निदेशक मामून अब्दुल करीम ने बताया कि आईएस के चरमपंथियों ने इस मंदिर में बड़ी मात्रा में विस्फोटक लगा दिए थे.
रविवार को उन्होंने इसे उड़ा दिया. इस विस्फोट से मंदिर का गर्भगृह और उसके चारों ओर लगे खंबे ढह गए.
इन तस्वीरों की अलग से पुष्टि नहीं हो सकी है लेकिन इनमें वो प्रतीक चिन्ह लगा है जिसका इस्तेमाल आईएस ने पल्माइरा से अक्सर किया है.
आईएस ने पल्माइरा पर मई में कब्ज़ा कर लिया था.
इस चरमपंथी गुट ने इसी तरह के प्राचीन स्थलों को इराक में भी नष्ट किया है. उनके मुताबिक ये स्थल मूर्ति पूजा के प्रतीक हैं.
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'जश्न को शोक में बदल देती है एक गोली';बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
शाहज़ेब जिलानीबीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
43 मिनट पहले
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कश्मीर के विवादित क्षेत्र में पाकिस्तान की ओर एक जंगल भरी पहाड़ी में नक्याल सेक्टर में एक छोटा सा गांव है. यहां से हरे-भरे पहाड़ों का ख़ूबसूरत नज़ारा दिखता है.
लेकिन इस तस्वीर से कोई निष्कर्ष निकालना आपको भ्रम में डाल सकता है.
भारत और पाकिस्तान को बांटने वाली सीमा, भारी सैन्य बंदोबस्त वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा, से यह गांव बस कुछ सौ मीटर ही दूर स्थित है.
ये पहाड़ियां सेना के चेक पोस्ट से भरी हुई हैं.
हिंसा-प्रिय सैनिकों की अचानक कभी भी की जाने वाली हिंसा यहां एक बड़ा ख़तरा है.
आठ अगस्त को इस तरह की सबसे ताज़ा मौत हुई है और शिकार बनी चार साल के बच्चे की मां.
'कश्मीरियों की परवाह नहीं'
Image copyrightBBC World Service
मारी गई महिला के पति तारिक़ मोहम्मद के अनुसार गांववाले रात को एक शादी समारोह मना रहे थे जब एक निशानेबाज़ की गोली आकर उनकी पत्नी के सिर में लगी.
वह गांव से नज़र आ रही भारतीय सीमा चौकी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "गोली वहां से आई थी. उन्होंने (भारतीयों ने) हमारे जश्न को शोक में बदल दिया और वह भी बिना किसी वजह के."
पत्नी की मौत के दो हफ़्ते बाद तारिक़ अपने नुक़सान और अपनी तकलीफ़ पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे हैं. वह भारत के प्रति ग़ुस्सा तो हैं ही लेकिन पाकिस्तान पर भी अपने लोगों की सुरक्षा कर पाने में नाकामी का आरोप लगाते हैं.
वह कहते हैं, "हम दो सेनाओं के बीच पिस रहे हैं और इसकी भारी क़ीमत चुका रहे हैं. वे कहते हैं कि वह कश्मीर के लिए लड़ रहे हैं लेकिन उनमें से कोई भी सचमुच कश्मीर के लोगों की परवाह नहीं करता."
क़रीब 740 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा के दूसरी ओर भी ऐसी ही कहानियां हैं.
Image copyrightBBC World Service
नवंबर, 2003 में हुए युद्धविराम का उल्लंघन करते हुए दोनों ओर की सेनाएं अक्सर भारी मशीनगनों और मोर्टार से गोलीबारी करती हैं.
हाल ही के वक़्त में हुई हिंसा में बड़ी संख्या में दोनों ओर के आम आदमी मारे गए हैं, जिसके लिए दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे पर 'अकारण' हमले का आरोप लगाया है.
'हमें भूल गए हैं'
पहाड़ी पर दस मिनट की चढ़ाई के बाद हम ज्वार के खेतों से गुज़रते हुए ताज़ा पानी के नाले को पार कर एक दूसरे घर में पहुंचे.
वहां हमें जावेद अहमद मिले जो एक सेवानिवृत्त सैनिक हैं. उन्होंने हमारे सामने टेबल पर इस्तेमाल किए हुए मोर्टार के गोले और अन्य भारतीय गोलाबारूद रख दिए जो उन्होंने अपने आस-पड़ोस से इकट्ठे किए थे.
पिछले कुछ सालों में सीमा पार से हुई गोलीबारी में उनके चाचा की मौत हो चुकी है. कुछ अन्य हमलों में उनके रिश्तेदार घायल हुए हैं, पशुधन का नुक़सान हुआ है और जायदाद नष्ट हो गई है.
दुख के साथ वह कहते हैं, "पाक-प्रशासित कश्मीर से कोई भी हमारी सुध लेने नहीं आया."
Image copyrightBBC World Service
"हमें कभी भी कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालांकि हम लोग ही कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की भारत के साथ जंग के अग्रिम मोर्चे पर रह रहे हैं."
हाल ही में सीमा-पार से हुए हमलों से डर इतना ज़्यादा बढ़ा कि इसकी वजह से सैकड़ों गांववालों ने सुरक्षित ठिकाने की तलाश में अपने घर छोड़ दिए.
अगस्त के मध्य से क़रीब 260 परिवारों को नक्याल क़स्बे के बाहरी इलाक़े में बसाया गया है. पहाड़ी ढलानों में चीड़ के ऊंचे पेड़ों के तले अस्थाई शिविर बनाए गए हैं- मुख़्यतः अपनी-मदद ख़ुद करें की तर्ज़ पर.
लेकिन किसी तरह की सरकारी मदद के अभाव में ये शिविर दयनीय हालत में रहते हैं.
चार बच्चों की मां ज़ुलेखा ख़ातून कहती हैं, "मेरे बच्चे मोर्टार के उन हमलों से डर गए थे और सदमे में थे. कई बार तो हम खा और सो भी नहीं पाते थे. मैं उन्हें वापस गांव नहीं ले जा सकती."
आंसू उनके गालों पर बहते हैं, जब वह कहती हैं, "बच्चों की परवरिश का कोई सही तरीक़ा नहीं है. हमें ऐसा लगता है कि (पाकिस्तानी) अधिकारी हमें भूल गए हैं."
'दुनिया को पता न चले'
Image copyrightBBC World Service
पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर में आज आमतौर पर निराशा की यह भावना व्याप्त है.
इस बारे में ख़बरें नहीं आतीं इसकी एक वजह यह है कि पाकिस्तान सरकार कश्मीर की अपनी व्याख्या पर मज़बूत पकड़ बनाए रखना चाहती है.
यह ऐसा करती है स्वतंत्र पत्रकारों को इस क्षेत्र में जाने से रोककर और उनके वहां काम करने को मुश्किल बनाकर.
कश्मीर में काम कर रहे कई पत्रकारों को पाकिस्तानी सेना ने धमकाया और परेशान किया है. हमारी टीम को भी वहां रहने के दौरान कुछ इसी तरह का अनुभव हुआ.
ऐसा लगता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के पाकिस्तानी हिस्से में मानव जीवन की क़ीमत कुछ भी नहीं है और अक्सर दुनिया को इसका पता भी नहीं चलता.
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भारत में पिछले 10 सालों में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी बढ़ने की रफ़्तार में गिरावट आई है.
ऐसा भारत में जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर में आई कमी की वजह से हुआ है.
हिंदू, मुस्लिम ही नहीं, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन, इन सभी समुदायों की जनसंख्या वृद्धि की दर में गिरावट आई है.
भारत में जनगणना हर दस साल में होती है. साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक़ हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 16.76 फ़ीसद रही जबकि 10 साल पहले हुई जनगणना में ये दर 19.92 फ़ीसद पाई गई थी.
यानी, देश की कुल आबादी में जुड़ने वाले हिंदुओं की तादाद में 3.16 प्रतिशत की कमी आई है.
मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की बात की जाए तो उसमें ज़्यादा बड़ी गिरावट देखी गई है.
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पिछली जनगणना के मुताबिक़ भारत में मुसलमानों की आबादी 29.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जो अब गिरकर 24.6 फ़ीसद हो गई है.
ये कहा जा सकता है कि भारत में मुसलमानों की दर अब भी हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक है, लेकिन यह भी सच है कि मुसलमानों की आबादी बढ़ने की दर में हिंदुओं की तुलना में अधिक गिरावट आई है.
वहीं, ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर 15.5 फ़ीसद, सिखों की 8.4 फ़ीसद, बौद्धों की 6.1 फ़ीसद और जैनियों की 5.4 फ़ीसद है.
जनसंख्या की कहानी
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जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ देश में हिंदुओं की आबादी 96.63 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 79.8 फ़ीसद है. वहीं मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ है, जो कि जनसंख्या का 14.23 फ़ीसद होता है.
ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 2.3 फ़ीसद और सिखों की आबादी 2.08 करोड़ (2.16 फ़ीसद) और बौद्धों की आबादी 0.84 करोड़ (0.7 फ़ीसद) है.
वहीं 29 लाख लोगों ने जनगणना में अपने धर्म का जिक्र नहीं किया.
पिछले एक दशक में जनसंख्या 17.7 फ़ीसद की दर से बढ़ी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ 2001 से 2011 के बीच मुसलमानों की आबादी 0.8 फ़ीसद बढ़ी हैं तो हिंदुओं की आबादी में 0.7 फ़ीसद की कमी दर्ज की गई.
साल 2001 में हुई जनगणना के मुताबिक़ भारत की कुल आबादी 102 करोड़ थी. इसमें हिंदुओं की जनसंख्या 82.75 करोड़ (80.45 फ़ीसद ) और मुसलमानों की आबादी 13.8 करोड़ (13.4 फ़ीसद) थी.
जातिगत आंकड़े अभी नहीं
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फिलहाल सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी नहीं किए हैं.
राजद, जदयू और डीएमके सरकार पर लगातार दबाब बना रहे हैं कि वो जातिगत जनगणना के आंकड़े भी सार्वजनिक करे.
जनसंख्या के सामाजिक आर्थिक स्तर आधारित आंकड़े इस साल तीन जुलाई को जारी किए गए थे.
आंकड़ों के मुताबिक़ 2011 में भारत की जनसंख्या 121.09 करोड़ थी.
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