Monday, October 5, 2015

अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस - प्रभाकर चौबे


अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस

05, OCT, 2015, MONDAY 11:41:47 PM
गांधी जयंती 2 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने  'विश्व अहिंसा दिवसÓ के रूप में स्वीकार किया है। दुनिया भर के देश 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय  योग दिवस के रूप में स्वीकार किया है। गांधीजी का जन्मदिन अहिंसा के रूप में मनाने और दुनिया को अहिंसा का संदेश देने की आज ज्यादा ही जरूरत महसूस की जा रही है। लेकिन यह आश्चर्य की बात दिखी कि 21 जून को विश्व योग दिवस को लेकर भारत सरकार जितनी उत्साहित हुई और देश में बड़े पैमाने पर योग दिवस सरकारी स्तर पर भी मनाया गया, वैसी ललक अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर सरकार ने नहीं दिखाई। एक तरह से बड़ा ठण्डा-ठण्डा सा ही रहा आया अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस। गांधीजी हमारे देश के हैं, उनके जन्मदिन पर अहिंसा दिवस मनाया जा रहा है। अत: हमारे लिए ज्यादा प्रसन्नता की बात है। योग दिवस पर सरकार व कुछ संगठन अति उत्साह में दिखे। कुछ ने योग करते समय सूर्य प्रणाम न करने की बात की तो ऐसा विचार रखने वालों को कुछ संगठनों के पदाधिकारियों ने लताड़ा- यहां तक कि योग न करने वालों को पाकिस्तान चले जाने तक की बात की। योग दिवस पर पूरा देश योग करने को झोंक दिया गया। मीडिया पर भी योग के महत्व को लेकर लम्बी-लम्बी बहस कराई जाती रही। इस बात का उल्लेख बार-बार किया जाता रहा कि भारत के प्रयास के कारण और विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास के कारण यू.एन.ओ.  को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस स्वीकार किया है। मीडिया में यह भी बताया जाता रहा कि कितने देश इस बात को लेकर प्रसन्न हैं और उत्साहित हैं कि भारत का एक योग पूरी दुनिया को स्वस्थ रखने के काम आ रहा है। भारत के इस अवदान को पूरी दुनिया सराह रही है यह भी मीडिया में आता रहा। 15 दिन देश योगमय बना दिया गया और 21 जून को मीडिया ने योग करते लोगों का स्कूली छात्र-छात्राओं का सीधा प्रसारण दिखाया। पूरे देश में योग को लेकर उल्लास पैदा किया जाता रहा। लेकिन वैसा उत्साह  2 अक्टूबर अहिंसा दिवस को लेकर नहीं दिखा। क्या हमारी सरकार वर्तमान परिदृश्य में, विशेषकर देश में फैल रहे तरह-तरह के हिंसक वारदातों व हिंसक प्रवृत्तियों के बढऩे को लेकर चिंतित नहीं है और क्या वह देश में हिंसा के उत्तर में अहिंसा को सामने रखकर अहिंसा के महत्व को प्रतिपादित करने में रुचि नहीं ले रही- क्या सरकार को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस उतना नहीं भा रहा जितनी जरूरत है। देश में और विश्व में हिंसा का दौर चल रहा है। लेकिन विडम्बना है कि सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस का उपयोग अहिंसा की भावना बढ़ाने के लिए नहीं किया। मीडिया में वैसी चर्चा भी नहीं कराई गई जैसी चर्चा योग दिवस की कराई गई थी। गांधी जयंती को स्वच्छता में समेट दिया गया।
अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस भारत सरकार मनाए या न मनाए, गांधी को कोई फर्क तो पड़ता नहीं। गांधी ने कहने भी नहीं आए थे यू. एन.ओ. से कि उनके जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाए। यह तो यूएनओ में महसूस किया और इस तिथि को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। दुनिया में चारों ओर अशांति है, पश्चिम एशिया के देशों में जबरदस्त हिंसा का वातावरण है। लाखों लोग देश छोड़कर बाहर जा रहे हैं और यूरोप के कुछ देशों में शरण ले रहे हैं। आतंकवाद अपने चरम पर है। रोज ही विस्फोट और सैकड़ों लोग मारे जाने की खबरें आ रही हैं। अपने देश में भी विभिन्न प्रकार की हिंसा का दौर शुरू हुआ है। गांधी के लिए अहिंसा का आशय के हत्या के खिलाफ ही नहीं था। मनुष्य को पीड़ा में डालने वाली हर नीति, हर कार्यक्रम उनके लिए हिंसा की श्रेणी में रखे जाते और मानव को पीड़ा से मुक्त करने अहिंसा का प्रयोग उन्होंने किया, उनका अर्थ भी यही था कि हर तरह की मानव विरोधी, मनुष्य को उत्पीडि़त करने वाली नीति के खिलाफ आवाज उठाना और हर तरह की हिंसा को रोकना ही अहिंसा है।  किसी को धमकाना, उनकी मर्जी के खिलाफ काम लेना भी गांधी अर्थ में हिंसा ही है। अपने यहां इन वर्षों में धमकाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। शब्दों के प्रयोग में शालीनता का क्षरण सामने दिखाई पड़ रहा है। साम्प्रदायिक सौहाद्र्र बिगाडऩे वाली ताकतें कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो रही हैं। उन्हें देश का माहौल बिगाड़ कर अपना स्वार्थसिद्ध करने की पड़ी है। साम्प्रदायिक सद्भाव खत्म किये जाने की कोशिश जोरों पर है और कुछ जगह साम्प्रदायिक दंगे भी कराये जा चुके हैं। ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल बढ़ा है जिससे किसी खास समुदाय की भावनाएं आहत हों। ऐसा लगता है सरकारों ने ऐसे तत्वों पर लगाम लगाने की बात स्थगित कर रखी है। धार्मिक आयोजनों में साम्प्रदायिक प्रतीकों की बाढ़ सी आ गई है। एक तरह से देश में संदेह, भय, कुण्ठा, हताशा के भाव हवा में तैर रहा है। इन्हें और हवा दी जा रही है। बड़बोलों की पूछ-परख बढ़ी है। देश साम्प्रदायिकता की ओर ढकेला जा रहा है और इसमें अपने हित को चिन्हित किया जा रहा है। ऐसे हालात में भी सरकार की उपस्थिति नगण्य सी हो गई है।
गांधीजी के लिए किसी भी तरह पीड़ा पहुंचाना हिंसा है। किसानों की जमीन उनकी मर्जी के बगैर हड़प लेना भी हिंसा की श्रेणी में आएगी। भूमिअधिग्रहण केवल आर्थिक सवाल नहीं है यह परपीड़ा से जुड़ा मानवीय सवाल भी है। संत कवि तुलसीदास ने कहा है-
परहित सरिस धरम नहीं भाई,
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।

यह परपीड़ा हिंसा है इस तरह जबरदस्त भूमिअधिग्रहण का विधेयक हिंसा की श्रेणी में आता है। यह तो भला हो कि सरकार को सद्बुद्धि आई, किसी भी कारण से आई, कांग्रेस व अन्य विरोधी दलों के जबरदस्त विरोध से आई कि उसने फिलहाल भूमिअधिग्रहण विधेयक पर विराम लगा दिया है। गांधीजी अपनी अहिंसा को किसी पर लादते नहीं थे वरन ''सत्याग्रहÓÓ सत्य के साथ ''आग्रहÓÓ उनका हथियार रहा। दुनिया भर में, अपने देश में भी जो हिंसा का वातावरण है वह समतावादी समाज निर्माण, आर्थिक गैरबराबरी दूर करने, सबको रोटी-कपड़ा-मकान देने की नीति व कार्यक्रम अख्तियार करने से नियंत्रण में आ सकती है। घोर गरीबी और जबरदस्त अमीरी के बीच लोकतंत्र में शांति की किस तरह उम्मीद की जाए। गरीबी में लोकतंत्र नहीं रह सकता। गरीबी के साथ लोकतंत्र केवल दिखावा है और कुछ चतुर-चालाक लोगों को लाभ पहुंचाने वाली व्यवस्था है। शिक्षा, स्वास्थ्य, हर क्षेत्र में भयानक गैरबराबरी है। गरीबों की भूख मिटाने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था हमेशा असफल ही रही है। बैंकों से लाखों रुपये कर्ज लेकर वापस न करने वाले वर्ग के प्रति नरमी और जरूरत के लिए थोड़ा कर्ज लेकर समय पर वापस न करने वाले वर्ग को प्रताडऩा, लोकतंत्र में यह भेदभाव घोर असंतोष को जन्म देता है। असंतोष से कभी-कभी हिंसा का उदय हो जाता है। अत: लोकतंत्र को कायम रखने के लिए भेदभाव की नीति का परित्याग भी जरूरी है। यह सरकारी हिंसा है- गांधीजी ऐसी सरकारी हिंसा का भी प्रतिकार करते रहे। अपना देश इस समय भयानक पाखण्ड के दौर से गुजर रहा है। इस पाखंड को खत्म करना भी जरूरी है।
2 अक्टूबर गांधी जयंती को व्यापक पैमाने पर अहिंसा दिवस मनाना था- सरकार से बड़ी चूक हुई है। इस तरह दिवस मनाने से स्कूली बच्चों, कॉलेज के विद्यार्थियों, नौजवानों और समाज तक एक सकारात्मक संदेश  पहुंचाया जा सकता था। लेकिन सरकार ने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया।

prabhakarchaube@gmail.com

ग्रामीणों को पकड़ नक्सली बताने में तुली,हाजरो की संख्या में ग्रामीणों ने किया थाना का घेराव

ग्रामीणों को पकड़ नक्सली बताने में तुली,हाजरो की संख्या में ग्रामीणों ने किया थाना का घेराव




बस्तर की पुलिस झूटी सफलता की कहानी रच रही ।
ग्रामीणों को पकड़ नक्सली बताने में तुली,हाजरो की संख्या में ग्रामीणों ने किया थाना का घेराव
मोखपाल थाना कुआकोंडा से बस्तर पुलिस द्वारा रसद पहुँचाने के मामले में 5 तथाकथित नक्सलियों के सहयोगी के आरोप में गिरफ्तार किये लोगो को बेकसूर आदिवासी ग्रामीणों को पकड़ कर नक्सली बताने का आरोप और प्रतड़ना का आरोप लगाते मोखपाल/गुड़रा के ग्रामीण कुआकोंडा थाने का शांतिपूर्वक घेराव कर दिये है ।
मोखपाल के ग्रामीणों को नक्सली बता कर पकड़े गये ग्रामीणों
 को बेकसूर बताते रिहाई की मांग करते हुए थाने के सामने डटे हुये है। खबर है कि गुड़रा के कई सौ ग्रामीण कुआ कोंडा थाने का घेराव कर दिया गया है।
बस्तर पुलिस और सरकार की सोची समझी साजिश के तहत नक्सली बता कर लगातार बेकसूर आदिवासी ग्रामीणों को गिरफ्तार कर जेल में डाला जा रहा तथा फर्जी आत्मसमर्पण का ढोंग रचा जा रहा है । इस पुरे खेल में बस्तर पुलिस के एक उच्चअधिकारी जो बस्तर के सभी आदिवासियों को नक्सली समझता है, और उनके अन्याय के खिलाफ लिखने वाले ,समाजिक कार्यकर्ताओ को भी जेल जाने की धमकी देते रहता है।
इस पुलिस अधिकारी के रहता नक्सलवाद बस्तर में खत्म नही बल्कि पनप रहा है बेगुनाहो को जेल, में डाला जा रहा है

रमन सिंह जी आपको तो पता ही होगा ये लड़कियाँ कहाँ हैं ? दिलवा दीजिए प्लीज़ !

रमन सिंह जी आपको तो पता ही होगा ये लड़कियाँ कहाँ हैं ? दिलवा दीजिए प्लीज़ !




इन लड़कियों को वापिस कर दीजिए रमन सिंह जी 


लड़कियों का नाम मडकम हूँगी और वेको बजारे . लड़कियों की उम्र हूँगी- १२ साल , बजारे की- २२ साल . गांव का नाम नेन्द्रा जिला सुकमा ( पुराना नाम जिला दंतेवाड़ा ) जब आपका गाँव खाली कराओ अभियान ( जिसे आपने सलवा जुडूम कहा और जिसे आपने शांती अभियान बता कर देश को गुमराह किया और बाद में जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया ) के तहत जब आपके निर्देश पर आदिवासियों के गाँव के गाँव जलाए जा रहे थे . तब एक गाँव नेन्द्रा को भी जला दिया गया था ! इस गाँव की चार लड़कियाँ भी गायब कर दी गयी थीं ! 

कर्तम जोगा ,नंदिनी सुन्दर और राम चन्द्र गुहा ने सर्वोच्च न्यायालय में सलवा जुडूम के खिलाफ याचिका दायर करी सजा के तौर पर कर्तम जोगा को थाने में उल्टा बाँध कर पीटा गया और वो अभी भी कांग्रेसी नेता के घर पर हमले के उसी आरोप में जेल में हैं और उसी केस में आपने सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी को फर्जी तौर पर फंसाया है .

राम चन्द्र गुहा को भैरमगढ़ थाने में जान से मारने की कोशिश की गयी . नंदिनी सुन्दर का एक फर्जी फोटो तैयार किया गया जिसमे वह नक्सली केम्प में वर्दी पहन कर खड़ी है . नंदिनी ने जब आपके एसपी को इस फर्जी फोटो के विषय में चुनौती दी तो आपके एसपी ने लिखित माफी माँगी ( एस पी का माफी नामा आपको दिखा दिया जाएगा ) .

खैर सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दल को दंतेवाड़ा भेजा ! काफी सारे आदिवासी अपनी बात् कहने के लिये इस दल के पास आये ! ऊपर लिखी लड़कियों के परिवारजन भी आये ! अपनी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दल को बताने के बाद जब ये आदिवासी वापिस जा रहे थे तो नेन्द्रा गांव के इन आदिवासियों को कोंटा थाने की पुलिस और सलवा जुडूम के नेता सोयम मुक्का ( जो कि एक फरार अपराधी है जिसके वारंट मेरे पास हैं ) ने रोक लिया .

 इन आदिवासियों को दिन भर पीट कर शाम को इनसे स्टाम्प पेपर पर “हमें सलवा जुडूम से कोई शिकायत नहीं “ लिख कर अंगूठे लगवा कर भगा दिया गया . मैं और नंदिनी सुंदर दिन भर आपके एसपी के सामने बैठे रहे लेकिन एसपी ने इन पिटते हुए आदिवासियों की कोई मदद नहीं की . बाद में अजीत जोगी ने डीजीपी विश्वरंजन को फोन पर कार्यवाही करने के लिये कहा . हमने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दल से इन आदिवासियों की मदद करने के लिये कहा उन्होंने कहा “ हमारा काम तो इनके बयान लेने तक सीमित है इसके बाद पुलिस की जिम्मेदारी है “ .

खैर इन आदिवासियों को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने मुंह खोलने की सजा के तौर पर पुलिस और सलवा जुडूम ने इनके गाँव को चार दिन बाद फिर जला दिया गया !


इस बार  आदिवासियों पर हुए हमले को हमने चुनौती के रूप में लिया था .  हमने इस गाँव को दोबारा बसाने का फ़ैसला किया . हमने एक मानव कवच दल का निर्माण किया और आपको बता दिया कि अब अगर आपने इन आदिवासियों को मारने की कोशिश की तो आपको पहले हमारी हत्या करनी होगी !आपका सलवा जुडूम और आपकी पुलिस हमारी ये हिम्मत देख कर हडबडा गयी .

 आपको हमारी इस पहल का कोई जवाब नहीं सूझ रहा था ! हमने इस गाँव में रहना शुरू किया ! गाँव की चार लड़कियाँ गायब थीं ! गाँव वालों ने बताया कि चारों को सलवा जुडूम और पुलिस वाले उठा कर ले गये थे !हमने चुपचाप पता लगाया दो लड़कियाँ इंजरम सलवा जुडूम कैम्प में थीं ! एक तो कैम्प के नेता बोददु राजा के घर में थी !( बोड्दू राजा भी फरार आरोपी है और वर्तमान में सुकमा जिला पंचायत का उपाध्यक्ष है इसके भी वारंट मेरे पास हैं ) हमारी महिला कार्यकर्ताओं ने चुपचाप इन दो लड़कियों को इंजरम कैम्प में से निकाल कर वापिस उन के माँ बाप को सौंप दिया .
 
रमन सिंह जी बाकी की दो लडकियां कहाँ हैं ? इन में से एक वेको बजारे को आपके लोग उसके बूढ़े बाप के साथ पकड़ कर ले गये थे ! अगले दिन इंजरम कैम्प में बाप की गर्दन काट दी गयी . सबको दिखाने के लिये बाप की लाश को बीच में रख दिया गया . लेकिन बेटी का आज तक पता नही चला .लड़की का भाई मेरे पास आया . मैंने कहा चलो एस पी को लिखते हैं . एस पी ने कोई जवाब नहीं दिया . हम हाई कोर्ट में गये . इस बीच मुझे दंतेवाड़ा छोड़ देना पड़ा .

पुलिस मेरे दंतेवाड़ा छोड़ने के बाद इस लड़की के भाई को उठा कर हाई कोर्ट में ले गयी ! लड़की के भाई के वकील ने कहा मी लार्ड पुलिस तो आरोपी है और आरोपी खुद पीड़ित को पकड कर आपके सामने कैसे पेश कर सकते हैं ! यह दबाव में है इसे कम से कम एक दिन पुलिस के दबाव से अलग रखिये फिर इसका बयान लीजिए ! मैं इसका वकील हूं इसे जो कहना होगा मेरे मार्फत कहेगा . जज साहब ने कहा वकील साहब आप अगर इस तरह के मामलों में हाथ डालेंगे तो आपका कैरियर खराब हो जाएगा ( ये धमकी थी जो डायस पर बैठा एक जज न्याय की मदद करने वाले को दे रहा था वाह! ) लड़की के भाई का बयान तुरंत लिया गया उसने लिखित बयान पर अंगूठा लगाया जिसमे लिखा था कि “ हाँ ये सच है कि मेरी बहन का अपहरण हुआ , ये भी सच है की मेरे पिता की हत्या हुई . लेकिन मैं नहीं जानता कि ये किसने किया ?” 

जज साहब ने उसी वख्त पुलिस के खिलाफ ये मुकदमा खरिज कर दिया ! लड़की के भाई ने फोन पर मुझे ये सब बताया मैंने उससे पूछा जज के सामने झूठ क्यों बोला ? उसने कहा पिता जी रहे नहीं , माँ को मैं ही पालता हूं , पुलिस वालों ने कहा था कि अगर ये बयान नहीं दूंगा तो मुझे भी पिताजी की तरह काट कर सडक पर रख देंगे ! मैं डर गया था ! जहां पुलिस ने कहा मैंने जज के सामने अंगूठा लगा दिया . 

रमन सिंह जी दूसरी लड़की बारह साल की थी.  उसकी खोज में भी हम छत्तीसगढ़ की हर जेल में गये . हर जिले के किशोर सुधार गृह में भी गये कि शायद उसे वहाँ रखा गया हो . इस लड़की को एक लड़के ने बाल सुधार गृह में देखा था ! हम इस लड़की के भाई को लेकर हर जिले में गये . पर पता नहीं पुलिस द्वारा लड़की कहाँ गायब कर दी गई है .

रमन सिंह जी आपको तो पता ही होगा ये लड़कियाँ कहाँ हैं ! दिलवा दीजिए प्लीज़ ! हम अपनी हार मानते हैं ! अब आपके बीच में नहीं आयेंगे ठाकुर साहब . इन आदिवासी लड़कियों को माफ कर दो .हमारी बेटियाँ वापिस दे दो ठाकुर साहब !


इस बार इसे हमने चुनौती के रूप में लिया और हमने आपको इसकी सूचना दे दी थी ! हमने इस गाँव को दोबारा बसाने का फ़ैसला किया ! हमने एक मानव कवच दल का निर्माण किया और आपको बता दिया कि अब अगर आपने इन आदिवासियों को मारने की कोशिश की तो आपको पहले हमारी हत्या करनी होगी !आपका सलवा जुडूम और आपकी पुलिस हमारी ये हिम्मत देख कर हडबडा गयी ! आपको हमारी इस पहल का कोई जवाब नहीं सूझ रहा था ! हमने इस गाँव में रहना शुरू किया ! गाँव की चार लड़कियाँ गायब थीं ! गाँव वालों ने बताया कि चारों को सलवा जुडूम और पुलिस वाले उठा कर ले गये थे !हमने चुपचाप पता लगाया दो लड़कियाँ इंजरम सलवा जुडूम कैम्प में थीं ! एक तो कैम्प के नेता बोददु राजा के घर में थी !( बोड्दू राजा भी फरार आरोपी है और वर्तमान में सुकमा जिला पंचायत का उपाध्यक्ष है इसके भी वारंट मेरे पास हैं ) हमारी महिला कार्यकर्ताओं ने चुपचाप इन दो लड़कियों को इंजरम कैम्प में से निकाल कर वापिस उन के माँ बाप को सौंप दिया ! 
रमन सिंह जी बाकी की दो लडकियां कहाँ हैं ? इन में से एक वेको बजारे को आपके लोग उसके बूढ़े बाप के साथ पकड़ कर ले गये थे ! अगले दिन इंजरम कैम्प में बाप की गर्दन काट दी गयी ! सबको दिखाने के लिये बाप की लाश को बीच में रख दिया गया ! लेकिन बेटी का आज तक पता नही चला !लड़की का भाई मेरे पास आया ! मैंने कहा चलो एस पी को लिखते हैं ! एस पी ने कोई जवाब नहीं दिया ! हम हाई कोर्ट में गये ! इस बीच मुझे दंतेवाड़ा छोड़ देना पड़ा !पुलिस मेरे दंतेवाड़ा छोड़ने के बाद इस लड़की के भाई को उठा कर हाई कोर्ट में ले गयी ! लड़की के भाई के वकील ने कहा मी लार्ड पुलिस तो आरोपी है और आरोपी खुद पीड़ित को पकड कर आपके सामने कैसे पेश कर सकते हैं ! यह दबाव में है इसे कम से कम एक दिन पुलिस के दबाव से अलग रखिये फिर इसका बयान लीजिए ! मैं इसका वकील हूं इसे जो कहना होगा मेरे मार्फत कहेगा ! जज साहब ने कहा वकील साहब आप अगर इस तरह के मामलों में हाथ डालेंगे तो आपका कैरियर खराब हो जाएगा ( ये धमकी थी जो डायस पर बैठा एक जज न्याय की मदद करने वाले को दे रहा था वाह ) लड़की के भाई का बयान तुरंत लिया गया उसने लिखित बयान पर अंगूठा लगाया जिसमे लिखा था कि “ हाँ ये सच है कि मेरी बहन का अपहरण हुआ , ये भी सच है की मेरे पिता की हत्या हुई ! लेकिन मैं नहीं जानता कि ये किसने किया ?” 
जज साहब ने उसी वख्त पुलिस के खिलाफ ये मुकदमा खरिज कर दिया ! लड़की के भाई ने फोन पर मुझे ये सब बताया मैंने उससे पूछा जज के सामने झूठ क्यों बोला ? उसने कहा पिता जी रहे नहीं , माँ को मैं ही पालता हूं , पुलिस वालों ने कहा था कि अगर ये बयान नहीं दूंगा तो मुझे भी पिताजी की तरह काट कर सडक पर रख देंगे ! मैं डर गया था ! जहां पुलिस ने कहा मैंने जज के सामने अंगूठा लगा दिया ! 

रमन सिंह जी दूसरी लड़की बारह साल की थी उसकी खोज में भी हम छत्तीसगढ़ की हर जेल में गये ! हर जिले के किशोर सुधार गृह में भी गये ! इस लड़की को एक लड़के ने बाल सुधार गृह में देखा था ! हम इस लड़की के भाई को लेकर हर जिले में गये ! पर पता नहीं लड़की कहाँ गायब हो गयी !
रमन सिंह जी आपको तो पता ही होगा ये लड़कियाँ कहाँ हैं ! दिलवा दीजिए प्लीज़ ! हम अपनी हार मानते हैं ! अब आपके बीच में नहीं आयेंगे ठाकुर साहब !इन आदिवासियों को माफ कर दो !हमारी बेटियाँ वापिस दे दो ठाकुर साहब !

Friday, October 2, 2015

अखलाख …धर्म .... और समाज

अखलाख …धर्म .... और समाज

[नथमल शर्मा सम्पादकीय ]
धर्म का समाज में अहम स्थान है। यदा यदा ही … संभवामि युगे युगे , हम बचपन से सुनते आये है। लेकिन सिर्फ सुनते और सुनाते। अपने जीवन में नहीं उतार पाते। तब ही तो कभी गोधरा होता है तो आज बसेहड़ा । दोनों मामले अलग,लेकिन दोनों में ही उन्मादी भीड़ द्वारा निर्दोष /निर्दोषों को मार दिया जाना। हत्या किया जाना। 

उत्तरप्रदेश के दादरी के पास एक गाँव बसेहड़ा । छोटा सा गांव। बरसों से भाईचारा ,सदभाव कायम। सब मिल-जुलकर रहते। कभी कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ। एक -दूसरे के सुख-दुःख के सब साथी। इसी गाँव में दो दिन पहले सैकड़ो लोगों की भीड़ ने अखलाख के घर पर धावा बोल दिया। आरोप की उसने घर में गोमांस रखा है। इसकी घोषणा बकायदा मंदिर के लाउडस्पीकर पर की गयी। इसी घोषणा के बाद उन्मादी लोग अख्लाख़ के घर की तरफ बढे। लोहारी का काम कर किसी तरह गुजर-बसर करने वाला अखलाख और उसका परिवार कुछ समझ ही नहीं पाया। भीड़ ने उसके पूरे परिवार से मारपीट की। घर का सामान तहस -नहस कर दिया। फ्रिज में रखा मांस निकाल फेका। परिवार का कहना था की वह बकरे का मांस है। लेकिन रोते -चीखते,गिड़गिड़ाते परिवार की किसी ने नहीं सुनी अखलाख कीं पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। उसके बेटे की हालत भी गंभीर है। पत्नी और जवान लड़की किसी तरह खुद को बचा पाए अन्यथा उनके साथ भी गोधरा होने में कितना वक़्त लगता ? भीद और से उन्मीदी भीड़। कुछ भी कर सकती थी। करती ही है। इसी भीड़ ने एक निर्दोष मेहनतकर्मी की जान ले ली। उसके परिवार सहारा छीन लिया। 

बसेहड़ा गाँव ,दिल्ली के ज्यादा दूर नहीं है। हालांकि उनके लिए आज भी दिल्ली दूर ही है। उत्तरप्रदेश के इस गाँव में आज तक कभी दंगा-फसाद नहीं हुआ। और जातीय,झगडे तो नहीं ही हुए। इसी गाँव में मंदिर की घंटियाँ बजती रही मस्जिद से अजान की आवाज़ें भी आती रही। इन्ही आवाज़ों के साथ अखलाख नामक पचास वर्षीय लोहार हथोड़े की थक-थक भी गूंजती रही। वह हर किसान के लिए हल तैयार करके देता रहा। जिससे खेतों में फसल लहलहाती रही। मेहनती अखलाख का घर जिस मोहल्ले में था उसके आस-पास सारे हिन्दु रहते थे। अखलाख और उसके परिवार को कभी कोई परेशानी नहीं हुई। अचानक उस दिन मंदिर के लाउडस्पीकर जिससे आरती की आवाज़ आती थी ,एक घोषणा हुई की उसके घर या और भी घरों में गोमांस है। ऐसा सन्देश कई लोगों मोबाइल पर भी आया। बस उन्मादी लोग चल पड़े उसके घर। तबाही मचा दी। अखलाख की हत्या कर दी गयी। परिवार कहते रहा की फ्रिज में रखा मांस बकरे का है। पर कौन सुने। अब हत्या पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। मांस को परिक्षण के लिए लैब भेजा है। गाँव तैनात है। बिलखता अखलाख परिवार दहशत में है। उसकी जवां बेटी का रो-रोकर बुरा हाल है। बेटा गंभीर हालत में अस्पताल में है। गाँव में देश के अखबारों /चैनलों के पत्रकार पहुँच रहे है। किसी नेता (जी ) का अभी तक दौरा नही हुआ। मंदिर के पुजारी का कहना है घोषणा उसने नहीं की। स्वीकार किया की किसी ने यहाँ आकर माइक से घोषणा की। पर किसने ? नहीं पता।

यह बात तो अब आईने की तरह साफ़ है की केंद्र में मोदी सरकार आने सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ कुछ ज्यादा ही जहर उगला जा रहा है। पहला ही बयान आया था की दिल्ली में साढ़े सात सौ बरस बाद हिन्दू सरकार काबिज हुई है। बाद में स्वामियों ,नाथों के हिंदुत्व,धर्म को लेकर बयान आते रहे। एक डरावना माहौल तैयार हो रहा है। ग़र्व से कहो हम हिन्दू है.…वाला भाव अब ज्यादा महिमामंडित किया जा रहा है। जबकि हमें भारतीय होने पर गर्व है/होना ही चाहिए। हमने संविधान में धर्म निरपेक्षता को अपनाया है। सबको सामान आदर भाव और अपने-अपने आराध्य के लिए प्रार्थना की आज़ादी। हालांकि अधिसंख्य भारतीय इसी भावना से ओत -प्रोत है। हाल ही में बकरीद की नमाज़ तस्वीर व्हाट्स एप पर लोगो। मस्जिद में नमाज़ियों के लिए जगह कम पड़ गई थी। पास में ही लगे गणेश पंडाल के आयोजकों ने पंडाल में उन्हें जगह दी। यह भारतीय भाईचारा है। सदभाव है। सरकारें और संकीण सोच वाले इससे क्यों नहीं कुछ सीखते ?वैशवीकरण के इस दौर में धर्मान्धता के दिन लद जाने चाहिए लेकिन पूरी दुनिया में ही इसे बढ़ावा मिल रहा है। इससे समाज को बांटने और बोलने की ताकत ख़त्म करने आसानी होती है। इससे कुर्सियों के पाये सलामत रखने में में आसानी होती है। खून अमिट स्याही नहीं होता लेकिन कुछ लोग निर्दोष जनों बहाकर ही उससे अमिट स्याही बनाते है और कुर्सियां हासिल करते है। अखलाख का खून भी क्या ऐसी ही अमिट स्याही ?पता नहीं जांच होगी। मुआवजा मिलेगा। अभी तो सरकार विदेश घूम आई है और बिहार के गाँवों में कब्जे की तैयारी में है। उत्तरप्रदेश और बिहार में लगभग एक सामान सामाजिक व्यवस्था है। जागरूक और प्रतिबद्ध नागरिकों के सामने गंभीर सवाल है। संविधान से पोषित लोकतंत्र से अपने अपने 'लोक ' और तंत्र बचाये और बनाये रखने की। बाजार की चकाचौंध अखलाख नहीं पहुंची है लेकिन उन्माद का शोर पहले पहुँच गया। इंसानियत दब जाएगी क्या ?सरकारें ,समाज और हम सब कब तक चुप रहेंगे ?

Thursday, October 1, 2015

भटरीमऊ के ग्रामीणों के संकल्प का सच उजागर होने के डर से उठाया था संतोष को दरभा के कुल तीन में से दो पत्रकार नक्सली मामले में जेल में : दोनों पत्रिका से

भटरीमऊ के ग्रामीणों के संकल्प का सच उजागर होने के डर से उठाया था संतोष को 

दरभा के कुल तीन में से दो पत्रकार नक्सली मामले में जेल में : दोनों पत्रिका से

दो साल से अधिक समय से बार-बार दरभा थाना तो कभी जगदलपुर बुलाकर पूछ-ताछ करने के बहाने प्रताड़ित और अब नक्सली बता कर गिरफ्तार किये गए संतोष यादव के बारे में यह पुष्टि हो गयी है कि वह पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से आंचलिक पत्रकार के रूप में काम कर रहा था | नवभारत और दैनिक छत्तीसगढ़ को तो दरभा क्षेत्र में काफी समय से वितरण व इनके लिए गांवों की ख़बरें भेज ही रहा था | पिछले दो माह से उसे दैनिक पत्रिका ने भी अपना प्रतिनिधि बना लिया था | यह तब हुआ जब दरभा में संतोष से पहले पत्रिका चला रहे सोमारू नाग को पुलिस ने दो माह पहले ही नक्सली बताकर जेल भेज दिया था , जो अभी भी सलाखों के पीछे है | इस तरह से दरभा में कुल तीन आंचलिक पत्रकार जो पूरे प्रदेश स्तरीय अख़बारों के वितरण और उन्हें आस-पास के गांवों की खबर दे रहे थे , उनमे से अब दो जेल चले गए हैं |
नियम विरुद्ध ४८ घंटों बाद पेश किया कोर्ट में , कोरे कागजों में कराए दस्तखत
संतोष यादव को पुलिस ने जब कल एक अक्तूबर को न्यायालय में पेश किया तो उसने माननीय न्यायालय को बताया कि उसे काफी धमकाया गया और कई कोरे कागज पर उसके दस्तखत लिए | उसने कुछ माह पहले भी प्रदेश के जिम्मेदार अधिकारीयों को विधिवत शिकायत की थी कि उसे प्रताड़ित किया जा रहा है | संतोष के मित्रों और उसकी पत्नी के अनुसार दरभा पुलिस ने कई तथा कथित नक्सलियों को गिरफ्तार करने के बाद आस-पास के क्षेत्रों में योजनाबद्ध रूप से यह अफवाह भी फैला रखा था कि उन सबकी गिरफ्तारी के लिए संतोष ने ही मुखबिरी की थी | जिससे संतोष की जन को अब नक्सलियों से भी खतरा उत्पन्न हो गया है | इस पूरे षड्यंत्र में संभाग का पुलिस मुखिया कल्लूरी शामिल था , इस बात की पुष्टि स्वयं संतोष ने अपनी गिरफ्तारी के दो माह पूर्व जगदलपुर के कुछ पत्रकार मित्रों से की थी |

भटरीमऊ के ग्रामीणों के संकल्प का सच उजागर होने के डर से उठाया था संतोष को

दरभा ब्लॉक के भटरीमऊ के ग्रामीणों से पूछ ताछ और कल्लूरी की नक्सली उन्मूलन की नीति से असंतुष्ट जगदलपुर के ही एक पुलिस अधिकारी द्वारा नाम ना उजागर करने की शर्त पर दी गई जानकारी से जो कहानी सामने आ रही है उसके अनुसार संतोष की गिफ्तारी की असली कहानी इस समाचार से जुडी है

 इस समाचार की रचना बाकायदा कल्लूरी की जानकारी और निर्देश पर पिछले महीने भर से चल रही थी | इस योजना के तहत भारी संख्या में पुलिस दल पैरामिलिट्री फ़ोर्स के साथ घोर नक्सल प्रभावित गांव भटरीमऊ गाँव का तीन चक्कर सर्चिंग के नाम पर लगा चुकी थी | इस दौरान ग्रामीणों की ना केवल निर्मम पिटाई की गयी बल्कि कुछ को नक्सली बता पकड़ कर दरभा थाना लाकर भी कई दिन तक पीटा गया | ग्रामीणों के अनुसार जब ग्राम के कुछ लोग अपने साथियों का पता करने दरभा थाना आये तो एडिशनल एसपी विजय पाण्डेय ने उन्हें धमकाया कि एक साथ सभी ग्रामीण २९ सितम्बर दिन मंगलवार को ११ बजे तक थाना आ जाओ तभी गिफ्तार ग्रामीणों को छोड़ेंगे |
ग्रामीणों को समझाने के लिए संतोष यादव पर भी दबाव बनाया गया था | तब ग्रामीणों को बताया ही नहीं गया था कि उन्हें नक्सलपंथ से किनारे करने तथा नक्सलियों को मार भगाने का संकल्प करने के आयोजन के लिए बुलाया गया है | इधर पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत जिला मुख्यालय के कुछ पत्रकारों के साथ बस्तर आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी , एसपी अजय यादव तथा एडिशनल एसपी विजय पांडेय दरभा में ११ बजे पंहुच चुके थे | मगर साथ गए पत्रकारों ने भी जो देखा वह नही छापकर पुलिस विभाग द्वारा परम्परागत जारी बिना हस्ताक्षर कि विज्ञप्ति को ही प्रकाशित कर दिया |
संतोष को उस दिन उठाने ( गिफ्तार करने ) की कोई योजना पुलिस की नहीं थी | यह स्थिति अचानक तब आई जब ग्रामीणों ने अपने गिरफ्तार साथियों को छुडाने के लिए संतोष से बात शुरू की , और वादा के अनुसार छुडवाने के लिए संतोष पर दबाव बनाया | संतोष ने दरभा थानेदार से बात की, उनके द्वारा ग्रामीणों को छोड़ने से मना करने पर उसने खुद सच लिखने और जगदलपुर के पत्रकारों को सच बताने की बात कर घर चला गया | इसके बाद जब इस बात की जानकारी पुलिस के उच्च अधिकारीयों को हुई तो तुरंत उसे कल्लूरी साहब बुला रहे हैं कहकर थाना बुला लिया गया | तब भी पुलिस की योजना उसे गिरफ्तार करने की नहीं बस डरा-धमकाकर छोड़ देने की थी |
सोशल मिडिया और प्रदेश से सैकड़ों फोन की वजह से मजबूरी में कोर्ट में पेश करना पडा
लेकिन पूरी रात संतोष के घर वापस नहीं पहुँचने और दरभा थाना द्वारा उसके वहां नहीं होने कि जानकारी देने से घबराए संतोष के मित्रों और पत्नी ने दक्षिण बस्तर के पत्रकारों को फोन करना शुरू कर दिया | ३० सितम्बर की संध्या तक मामला सोशल मिडिया में भी छा गया जिससे कल्लूरी , यादव व पाण्डेय सहित दरभा थानेदार तक रायपुर और कई स्थानों से फोन आने शुरू हो गए | जिसके बाद मज़बूरी में पुलिस ने एक अक्तूबर को हद-बड़ी में कोर्ट में पेशकर उस पर झीरम घाटी हमले में शामिल रहने और नक्सलियों को पुलिस की गतिविधियों की सूचनाएं लीक करने का आरोप लगाया | न्यायालय ने साक्ष्य इकट्ठा करने और पूछताछ करने के लिए संतोष को दो दिन के रिमांड पर फिर से पुलिस को सौंप दिया है |

जगदलपुर के पत्रकारों को एडिशनल एसपी विजय पांडेय ने बताया कि 21 सितम्बर को झीरम घाटी में एसटीएफ पार्टी पर नक्सलियों द्वारा किए गए हमले तथा सड़क व पेड़ काटने के मामले में अन्य नक्सलियों के समेत संतोष यादव के विरूद्घ दरभा थाने में नामजद एफआईआर दर्ज किया गया था। पड़ताल में यह भी जानकारी मिली कि संतोष यादव माचकोट एलओएस कमांडर शंकर से निरंतर संपर्क में रहता है। उसके द्वारा पुलिस की गतिविधियों की जानकारी नक्सलियों तक भेजी जाती थी। उसके विरूद्घ महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलने के उपरांत गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने संतोष यादव के विरूद्घ आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 341, 120 बी, 431, 307, 302 समेत छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम के तहत अपराध दर्ज किया है।http://ghotul.blogspot.in/2015/10/blog-post_2.html

संतोष की निशर्त रिहाई की मांग को लेकर प्रदेश भर के पत्रकार जगदलपुर में देंगे गिरफ्तारी

                   आंचलिक पत्रकार संतोष यादव को पूरे तीन साल तक पूरेशान करने के बाद सीधे नक्सली बताकर गिरफ्तार करने की घटना एक सामन्य घटना नही है | आपको पता होना चाहिए कि पूरे देश में ९०% ख़बरें आंचलिक पत्रकार ही  उपलब्ध कराते हैं | अनेक राष्ट्रीय स्तर की मीडिया बकायादा इनके नाम से या उस स्थान का प्रिंट लाईन में उल्लेख कर इनकी खबरें प्रकाशित या प्रसारित करती है | आप रोज का अखबार देख लीजिये तहसील ,,, ब्लाक या पंचायत मुख्यालय तक के नाम से आपको खबरें पढने को मिल जाएगी | सभी जगह संतोष यादव जैसे पत्रकार मिलेंगे जिन्हें इनका अख़बार बस अपना एजेंट तो मानती है , इनकी खबरों से अपना अखबार भी चलाती है | इन पर विज्ञापन के लिए दबाव भी बनाती है | होली, दिवाली, १५ अगस्त , २६ जनवरी , या किसी नेता के जन्म दिन पर अरबों रुपयों का बोझ इन अख़बारों के लिए यही आंचलिक पत्रकार उठाते हैं | अनेकों बार इनकी खबरें राष्ट्रीय स्तर कि बनती है , कई बार इनके नाम या इनके स्थान के प्रिंट लाइन से खबरें लगती है | राष्ट्रीय स्तर की खबरों के लिए भी यही पत्रकार बड़े पत्रकारों के पार्श्व में होते हैं | मुसीबत में काम आयेंगे करके यही संतोष यादव जैसे पत्रकार जिनके नाम जनसंपर्क की सूचि में नहीं होता , पत्रकार संघों के नाम से धंधा कर रहे किसी ना किसी गिरोह के चक्कर में पड़ जाता है कि चालों कुछ ले-देकर अगर एक आईकार्ड मिल जा तो जायेगा |  पर मुसीबत आने पर इन संघों के नेता चुप्पी साध लेते हैं | 
            

    अकसर इन संघों में सक्रिय पत्रकार जुड़ते ही नहीं है जुड़ते भी है तो संघ की बैठक में ही उन्हें पत्रकारिता की समझदारी सिखाई जाती है इन  संघों  ने पत्रकारों के बीच अपनी छवि खो  दी है पत्रकारों की लड़ाई लड़ने के बजाय ये आपस में ही लड़ाई लड़ रहें है छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की बहुत बूरी स्थिति है एक नंबर की लड़ाई की प्रतिस्पर्धा में शामिल पत्रिका भास्कर हरिभूमि नवभारत में ही पूरे प्रदेश में सम्पादकीय व फिल्ड मिलाकर पांच  हजार से ज्यादा पत्रकार बिना नियुक्ति पत्र के दिहाड़ी मजदूर से बूरी स्थिति में काम कर रहे है हाकर की स्थिति तो अब सुधर जाएगी क्योकि सरकार ने उन्हें भी असंघठित मजदूर मान कर स्मार्ट कार्ड 
देने का निर्णय कर लिया पर दुर्भाग्य तो उन पत्रकारों का है जो जान जोखिम में डाल कर इन अख़बारों के लिए टीआरपी बढाने का काम करते है यही पत्रकार है जो शोषण उत्पीडन की खबर खोज कर सबको न्याय दिलाने का काम करते है जबकि उनकी खुद की कोई सुनवाई नहीं है |सरकार ने तरह - तरह का वेतन मान घोषित कर रखा है पर यह लालीपाप ही साबित हुआ इन सबका फायदा लेने के लिए वह नाक रगड़ कर भी नियुक्ति पत्र हासिल नहीं कर सकता 
       एक अनुमान के अनुसार पूरे प्रदेश में हजार से ज्यादा पत्रकार मालिकों के शोषण के शिकार होकर पूरे परिवार के भविष्य के लिए खतरा उठा कर केवल शौक या सेवा के नाम पर इस पेशा को अपनाये हुए है इनमे वे  लोग शामिल नहीं है जो इस पवित्र व्यवसाय को अपने काले - पीले धंधे की आड़ के लिए इस्तेमाल कर रहे है |  पत्रकारिता में निर्भीकता व निरपेक्षता दिखाने- करने वाले पत्रकारों से ये संस्थान उस समय नाता ही तोड़ लेते है जब इस जवाबदारी के निर्वहन की वजह से उन पर कोई मुसीबत आती है हत्यारों के शिकार बनने के तुरंत बाद उमेश राजपूत से और फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने के बाद हेमचन्द्र पाण्डेय से "नई दुनिया" का बेशर्मी से नाता तोड़ना आपको याद होगा |  
       देश में एक हजार से अधिक पत्रकार संघ है छत्तीसगढ़ में ५० से ज्यादा संघ है |  एक सज्जन तो अकेले तीन-तीन पत्रकार संघ के अध्यक्ष है इनका  नाम  कभी भी पत्रकारिता के लिए नहीं जाना गया जब से पत्रकारिता जगत में  पैदा हुए है नेता बनकर ही हुए है | रायपुर प्रेस क्लब तो केवल वीआइपी पत्रकारों का क्लब है , यहाँ तो वैसे भी सामान्य और किसी मुसीबत में पड़ सकने वाले पत्रकार की एंट्री होना भी मुश्किल है | यहाँ के सारे सदस्य सीधे मुख्यमंत्री या किसी अन्य मंत्री से सम्न्धित ( सम्बन्ध बनाये हुए होते हैं ) होते हैं | पूरे  प्रदेश के सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकारों का ९५% रायपुर में ही  बसते हैं | इन सबको किसी ग्रामीण पत्रकार की पीड़ा से वैसे भी क्या मतलब ??? 
                              संतोष यादव जो दरभा में नवभारत, पत्रिका और छत्तीसगढ़ अख़बार का प्रतिनिधि था , और दो  दिन पहले भी उसने अपनी सुरक्षा मांगने बडारी महू गाँव के लोगों को लेकर हुए नाटकीय पुलिसिया कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की , पर उसे जब बिना किसी अपराध के पुलिस उठा ले गयी तो बाकी किसी अखबार या चैनल तो छोडिये इन अख़बारों ने भी एक लाईन खबर नही छापा !! कल्लूरी से इतना ज्यादा डरतें है ये बड़े- बड़े मिडिया वाले !!! ध्यान रहे कि कल से सोशल मिडिया में चलाये गए अभियान के बाद आज मजबूरी में कल्लूरी ने हत्या सहित दस से ज्यादा धारा लगाकर पूरे प्रदेश के आंचलिक पत्रकारों को ना केवल अपमानित किया बल्कि चेतावनी भी दे दिया कि सबका यही हाल हो सकता है | अब बेचारा संतोष न्याय के लिए जेल और न्यायालय के बीच फंसे रहेगा | संतोष को पिछले दो साल से कई बार थाने बुलाकर धमकाया गया , मुखबिर बनाने के लिए वैसे ही दबाव डाला गया जैसे कि स्व नेमीचंद जैन के साथ किया गया था | पिछले अगस्त माह में ही उसके ऊपर एक और फर्जी मामला बनाया गया था | उसे पांच लाख रुपयों का लालच भी दिया गया | उसकी पत्नी और दोस्तों के अनुसार पुलिस थाने में उसके बार - बार जाने को लेकर वह नक्सलियों की नजर में भी आ गया है | ठीक यही हाल नेमीचंद और साईं रेड्डी का हुआ था |अब जेल से बहार आने पर इसकी जान को भी खतरा हो सकता है | 

 "पत्रिका" ने मेरे साथ जो कुछ किया वह भी सभी साथी भूले नहीं होंगे अब आगे की जिंदगी पत्रकारिता के साथ ही पत्रकार साथियों के हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए जिऊंगा | अब मुझे जीने के लिए एक बढ़िया कारण भी मिल गया है | इन कार्पोरेट घरानों के खिलाफ लड़ाई में प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष मदद करने वाले साथियों की जरुरत है | इस मुद्दे पर पूरे प्रदेश के पत्रकारों को आह्वान कर रहा हूँ कि आप इसे गंभीरता से लें , एक बड़ा आन्दोलन खडा करें | इस आन्दोलन में अगर कोई पत्रकार संघ साथ आना चाहता है तो आये , उनका स्वागत है | मगर इस आन्दोलन का बैनर किसी संघ के नाम से ना हो , समर्थन देने वाले संघ अपना बैनर साथ ला सकते हैं | मगर मुख्य बैनर केवल "  समस्त आंचलिक पत्रकार संघ छत्तीसगढ़  " का हो | मुद्दा ना केवल संतोष की अवैध तरीके से गिरफ्तारी के खिलाफ बल्कि मिडिया संस्थानों के रवईय्या सुधारने के लिए हो | सारे मुद्दे जगदलपुर में इकट्ठा होकर करतें हैं | मेरी सलाह है कि दिन तिथि तय कर अधिक से अधिक संख्या में जगदलपुर पहुंचकर संतोष के समर्थन में गिरफ्तारी दें | अगर संतोष नक्सली है तो उसका समर्थन करने के कारण इकट्ठा होने वाले हजारों पत्रकार को जन सुरक्षा अधिनियम लगाकर गिरफ्तार करने के लिए मजबूर करें | इसी पोस्ट में इस सम्बन्ध में आप सभी साथी के विचार आमंत्रित है , सब मिलकर एक नेत्रित्व मंडल चुने जिसमे प्रत्येक जिले से कम से कम दो साथी रहें | सब मिलकर नेता होंगे  और सब मिलकर लड़ेंगे | हमारे इस आन्दोलन में जो भी संगठन साथ आना चाहे उनका भी स्वागत है 

दुनिया का सबसे बड़ा झूट है की इन हिंसक घटनाओ से धर्म का कोई वास्ता नहीं है ,

दुनिया का सबसे बड़ा झूट है की इन हिंसक घटनाओ से धर्म का कोई वास्ता नहीं है ,पहले बीमारी तो पहचानो तब ही न इलाज़ करोगे


दुनिया का सबसे बड़ा झूट है की इन हिंसक घटनाओ से धर्म का कोई वास्ता नहीं है ,पहले बीमारी तो पहचानो तब ही न इलाज़ करोगे

धर्म हाँ धर्म ही नफरत सिखाता है धर्म ही हिंसा   ज़ायज़  ठहराता हैं धर्म ही उकसाता है और धर्म के आधार पे ही हमले और लोगो को मारा जाता है ,कोई किसी धर्म का  भगवान आके हथियार नहीं पकड़ता लेकिन कोई भगवांन  किसी को रोकता भी नहीं है। 
जब तक हिंसा की जड़ में नहीं जाओगे और खुल के अच्छे बुरे धर्म की बात करोगे तब तक आप भी हिंसा में भागीदार होगे  ही। 
आखिर ये हिंसक लोग कहाँ से खुराक पाते है ,धर्म से ही न ?
अब ये बहुत हो गया की धर्म थोड़े ही नफरत और हिंसा सिखाता है ,धार्मिक  किताबे दोनों को तर्क उपलब्ध कराती है ,किसी भी हत्यारे से पूछ लो वो हजारो तरीके से समझा देगा की क्यों उसने सही सही किया और आप जो धर्म के उदार चरित्र को लेके उसका झंडा लिए घूम रहे है उसे भी तर्क उपलब्ध करवा देता है। 
धर्म दोहरी तलवार नहीं इकहरी तलवार ही है जो समाज को हजारो साल से कई बार खून में डुबाया है ,नही मानो तो आपकी मर्जी ,एक  दो  नही कई धर्मिक युद्द  में हजारो लोग की जान गई और उन्हें धर्म पे जीत बताया गया।

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है की कैसे एक पढ़े लिखे ,एयर फ़ोर्स के जवान के परिवार में से सबसे बड़े भाई को घर में ही मार मार  के जान ले ली ,और  कुछ  खून के प्यासे लोग   इसे जायज बताने की जुर्रत कर रहे है , धिक्कार है ऐसे धर्म पे और उसके अनुआई पे। 
मेरे छत्त्तीसगढ़ के बस्तर में कई आदिवासी अभी भी बड़ी संख्या में गाय  और  सूअर  का मास खाते  है , मेने कभी उनके बीच इसपे चर्चा नहीं सुनी।