Friday, May 1, 2015

वो 30 मिनट, जब सिक्किम बना भारत का अंग ,या कैसे किया भारत ने सिक्किम का सत्ता पलट

वो 30 मिनट, जब सिक्किम बना भारत का अंग ,या  कैसे किया भारत ने सिक्किम का सत्ता पलट 

  • 1 घंटा पहले
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चोग्याल अपनी पत्नी होप कुक के साथ
छह अप्रैल, 1975 की सुबह सिक्किम के चोग्याल को अपने राजमहल के गेट के बाहर भारतीय सैनिकों के ट्रकों की आवाज़ सुनाई दी.
वह दौड़ कर खिड़की के पास पहुंचे. उनके राजमहल को चारों तरफ़ से भारतीय सैनिकों ने घेर रखा था.
तभी मशीनगन चलने की आवाज़ गूंजी और राजमहल के गेट पर तैनात बसंत कुमार चेत्री, गोली खा कर नीचे गिरे. वहां मौजूद 5,000 भारतीय सैनिकों को राजमहल के 243 गार्डों को काबू करने में 30 मिनट का भी समय नहीं लगा.
उस दिन 12 बज कर 45 मिनट तक सिक्किम का आज़ाद देश का दर्जा ख़त्म हो चुका था. चोग्याल ने हैम रेडियो पर इसकी सूचना पूरी दुनिया को दी और इंग्लैंड के एक गांव में एक रिटायर्ड डॉक्टर और जापान और स्वीडन के दो अन्य लोगों ने उनका ये आपात संदेश सुना.
इसके बाद चोग्याल को उनके महल में ही नज़रबंद कर दिया गया.

पढ़िए विवेचना

बीएस दास, रेहान फ़ज़ल
बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ बीएस दास.
दिल्ली के नगरपालिका आयुक्त बीएस दास दिन का भोजन कर रहे थे कि उनके पास विदेश सचिव केवल सिंह का फ़ोन आया कि वह उनसे मिलने तुरंत चले आएं.
तारीख थी 7 अप्रैल, 1973. जैसे ही दास विदेश मंत्रालय पहुंचे, केवल सिंह ने गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हुए कहा, "आपको सिक्किम सरकार की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तुरंत गंगटोक भेजा जा रहा है. आप के पास तैयारी के लिए सिर्फ़ 24 घंटे हैं."
जब दास अगले दिन सिलीगुड़ी से हैलीकॉप्टर से गंगटोक पहुंचे तो वहां उनके स्वागत के लिए चोग्याल के विरोधी काज़ी लेनडुप दोरजी, सिक्किम के मुख्य सचिव, पुलिस आयुक्त और भारतीय सेना के प्रतिनिधि मौजूद थे.
दास को जुलूस की शक्ल में पैदल ही उनके निवास स्थान ले जाया गया. अगले दिन जब उन्होंने चोग्याल से मिलने का समय मांगा तो उन्होंने बहाना बनाया कि वह अपने ज्योतिषियों से सलाह कर ही मिलने का समय दे पाएंगे.
दास कहते हैं कि, "यह तो एक बहाना था. दरअसल वह यह दिखाना चाहते थे कि वह मुझे या मेरे ओहदे को मान्यता नहीं देते."

सिक्किम गोवा नहीं है

अगले दिन चोग्याल ने दास को बुलाया, लेकिन ये बैठक बहुत कटुतापूर्ण माहौल में शुरू हुई. चोग्याल का पहला वाक्य था, "मिस्टर दास इस मुग़ालते में न रहिएगा कि सिक्किम, गोवा है."
उनकी पूरी कोशिश थी कि उन्हें भी भूटान जैसा दर्जा दिया जाए, "हम एक स्वतंत्र, प्रभुसत्ता संपन्न देश हैं. आपको हमारे संविधान के अंतर्गत काम करना होगा. भारत ने आपकी सेवाएं मेरी सरकार को दी हैं. इस बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं रहनी चाहिए. कभी कोशिश मत करिएगा हमें दबाने की."
बीएस दास
भारत में सिक्किम के विलय में बीएस दास की अहम भूमिका थी.
अगले दिन बीएस दास जब वहां तैनात अपने दोस्त शंकर बाजपेई से मिलने इंडिया हाउस पहुंचे तो उनका पहला सवाल था कि वह केवल सिंह से उनके लिए क्या निर्देश ले कर आए हैं.
दास याद करते हैं, "मेरे पास कोई साफ़ निर्देश नहीं थे सिवाए इसके कि सिक्किम के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में हम उनकी मदद करें. हमेशा की तरह इंदिरा गांधी ने कोई औपचारिक राजनीतिक वादा नहीं किया था. विलय शब्द का तो कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया."
इंदिरा गाँधी
उनके अनुसार, "यहां तक कि हमारा संचालन कर रहे केवल सिंह ने निजी बातचीत में भी इस शब्द का प्रयोग कभी नहीं किया था. लेकिन बिना कहे ही मुझे और शंकर बाजपेई दोनों को पता था कि हमें क्या करना है."

1962 का चीन युद्ध

इंदर मल्होत्रा
वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा
मशहूर राजनीतिक विश्लेषक इंदर मल्होत्रा मानते हैं कि सिक्किम को भारत में शामिल किए जाने की सोच 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद शुरू हुई.
सामरिक विशेषज्ञों ने महसूस किया कि चीन की चुंबी घाटी के पास भारत की सिर्फ़ 21 मील की गर्दन है जिसे ‘सिलीगुड़ी नेक’ कहते हैं.
वह चाहें तो एक झटके में उस गर्दन को अलग कर उत्तरी भारत में घुस सकते हैं. चुंबी घाटी के साथ ही लगा है सिक्किम.
वहाँ के चोग्याल ने एक अमरीकी लड़की होप कुक से शादी की. उन्होंने उन्हें उकसाना शुरू किया और चोग्याल को लगा कि अगर वह सिक्किम को पूरी तरह से आज़ाद कराने की मांग करेंगे तो अमरीका उनका समर्थन करेगा. भारत यह स्वीकार नहीं कर सकता था.

अमरीकी पत्नी ने चोग्याल का साथ छोड़ा

चोग्याल और होप कुक
चोग्याल अपनी पत्नी होप कुक के साथ.
चोग्याल की अमरीकी पत्नी होप कुक का पूरा व्यक्तित्व रहस्यमयी था.
चोग्याल को भारत के ख़िलाफ़ भड़काने में उनकी बड़ी भूमिका थी. उन्होंने स्कूलों की पाठ्य-पुस्तकें बदल दीं. युवा अफ़सरों को बुला कर हर हफ़्ते वह बैठक करती थीं.
जब वह चोग्याल की रानी की भूमिका निभातीं तो सिक्किम के कपड़े पहन कर बहुत विनम्रता से धीमे-धीमे फुसफुसा कर बोला करतीं, लेकिन दूसरी तरफ़ जब वह नाराज़ हो जातीं तो आपे से बाहर हो जातीं.
चोग्याल की ज़रूरत से ज़्यादा शराब पीने की आदत उन्हें बहुत तंग करती और दोनों में महाभारत शुरू हो जाता. एक बार चोग्याल उनसे इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उनका रिकॉर्ड प्लेयर राजमहल की खिड़की से बाहर फेंक दिया.
अंतत: होप कुक ने सिक्किम छोड़ कर अमरीका वापस जाने का फ़ैसला किया. चोग्याल ने उनसे अनुरोध भी किया कि इस मुश्किल समय में वह उनके साथ रहें लेकिन उन्होंने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया.
दास उन्हें छोड़ने गए. उनके आखिरी शब्द थे, "मिस्टर दास, मेरे पति का ख़्याल रखिएगा. अब मेरी यहां कोई भूमिका नहीं है."
दास बताते हैं कि उन्हें ये कहते हुए बहुत शर्म महसूस हो रही है कि तब तक उन्हें पता चल चुका था कि होप ने शाही महल की कई बहुमूल्य कलाकृतियाँ और पेंटिंग्स चोरी-छिपे अमरीका पहुंचा दी थीं.

सिर्फ़ एक सीट

सत्यजीत रे के साथ चोग्याल
चोग्याल के साथ सत्यजीत रे जिन्होंने सिक्किम के बारे में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी.
दास कहते हैं कि चोग्याल ने 8 मई के समझौते पर दस्तख़त करने के बाद भी कभी दिल से इस स्वीकार नहीं किया. उन्होंने बाहर के कई लोगों से मदद मांगी.
उन्होंने एक महिला वकील को यह वकालत करने के लिए रखा कि ये समझौता ग़लत है. जब चुनाव की घोषणा हुई तो चोग्याल ने दक्षिण सिक्किम का दौरा करने की मंशा ज़ाहिर की. दास ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी.
पहले जब वह इन इलाको में जाते थे तो लामा सड़कों पर लाइन लगा कर उनका स्वागत करते, लेकिन इस बार जब वो गए तो उनके चित्र पर उन्हें जूते लटके हुए दिखाई दिए.
चुनाव में चोग्याल के समर्थन वाली नेशनलिस्ट पार्टी को 32 में से सिर्फ़ 1 सीट मिली. जितने भी नए सदस्य जीत कर आए उन्होंने कहा कि वह चोग्याल के नाम से शपथ नहीं लेंगे और अगर वह एसेंबली में आएंगे तो वह उसकी कार्रवाई में भाग नहीं लेंगे.
दास के लिए ये बहुत धर्म संकट की स्थिति थी, क्योंकि वह नई एसेंबली के स्पीकर भी थे. "तब यह तय हुआ कि चोग्याल अपना विरोध लिख कर भेज देंगे जिसे मैं असेंबली में पढ़ दूंगा सबके सामने और यह लोग सिक्किम के नाम पर शपथ लेंगे."

चोग्याल की नेपाल यात्रा

चोग्याल
इस बीच वह नेपाल के राजा के राज्याभिषेक में राजकीय अतिथि के तौर पर गए, जहाँ उन्होंने पाकिस्तानी राजदूत और चीन के उप प्रधानमंत्री चिन सी लिउ से मुलाक़ात कर अपनी परेशानियों में उनका सहयोग मांगा.
बीएस दास ने उन्हें एक लिखित दस्तावेज़ दिया था, जिसमें बताया गय़ा था कि वह बाहरी सहयोग लेने के चक्कर में न पड़ें, "आपका राजवंश बरकरार रहेगा. आपका बेटा आपका उत्तराधिकारी होगा. लेकिन आपको मानना पड़ेगा कि आप प्रोटेक्टेड हैं और आप 8 मई के समझौते को मानते हैं."
वह इस बात पर अड़ गए कि, "मेरा तो आज़ाद देश है. इसको मैं छोड़ूंगा नहीं."

इंदिरा गांधी से वह आख़िरी मुलाकात

चोग्याल, पीएन धर के साथ
इंदिरा गांधी के साथ आख़िरी मुलाक़ात के बाद उनके कार्यालय से बाहर निकलते चोग्याल और इंदिरा के सचिव पीएन धर.
उन्होंने इंदिरा गांधी को अपने पक्ष में करने की अंतिम कोशिश 30 जून, 1974 को की.
इंदिरा गांधी के सचिव रह चुके पीएन धर अपनी पुस्तक 'इंदिरा गांधी, द एमरजेंसी एंड इंडियन डेमोक्रेसी' में लिखते हैं, "जिस तरह से चोग्याल ने अपना पूरा केस इंदिरा गांधी के सामने रखा उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ. उन्होंने कहा कि भारत सिक्किम में जिन राजनीतिज्ञों पर दांव लगा रहा है वह विश्वास के काबिल नहीं हैं."
इंदिरा ने कहा कि वह जिन राजनीतिज्ञों की बात कर रहे हैं वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं. चोग्याल अभी कुछ और बात करना चाहते थे कि इंदिरा चुप हो गईं.
उन्होंने चुप्पी को एक नकारात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर इस्तेमाल करने में महारत हासिल कर रखी थी. वह एक दम से खड़ी हुईं... रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कराईं और अपने दोनों हाथ जोड़ दिए. चोग्याल के लिए यह इशारा था कि अब वह जा सकते हैं.
दिलचस्प बात ये थी कि यह वही चोग्याल थे, जो 1958 में जवाहरलाल नेहरू के अतिथि बन कर दिल्ली आए थे और उनके निवास स्थान तीनमूर्ति भवन में ठहरे थे.
चोग्याल एक अनूठे व्यक्तित्व के धनी थे. उन्होंने कभी भी सिक्किम की पृथक पहचान से समझौता नहीं किया.
दास कहते हैं कि सिर्फ़ एक बार उन्होंने चोग्याल को हार स्वीकार करते हुए देखा. जब उनके बेटे और वारिस की एक दुर्घटना में मौत हो गई तो उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश की.
इस बीच उनकी पत्नी होप कुक भी अपने दो बच्चों के साथ उन्हें छोड़ कर चली गईं. उनके लिए यह सब बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल था. 1982 में उनकी कैंसर से मौत हो गई.

विलय का विरोध

चोग्याल अपनी पत्नी होप कुक के साथ.
चोग्याल अपनी पत्नी होप कुक के साथ.
जब सिक्किम के भारत में विलय की मुहिम शुरू हुई तो चीन ने इसकी तुलना 1968 में रूस के चेकोस्लोवाकिया पर किए गए आक्रमण से की.
तब इंदिरा गांधी ने चीन को तिब्बत पर किए उसके आक्रमण की याद दिलाई. भूटान ज़रूर इसलिए ख़ुश हुआ क्योंकि इसके बाद से उसे सिक्किम के साथ जोड़ कर नहीं देखा जाएगा.
लेकिन सबसे अधिक विरोध नेपाल में हुआ. क़ायदे से उसे सबसे अधिक ख़ुश होना चाहिए था, क्योंकि सिक्किम में सबसे बड़ी 75 फ़ीसदी आबादी नेपाली मूल के लोगों की थी.
भारत के अंदर कई हल्कों में इसका विरोध हुआ.
जॉर्ज वर्गीज़ ने हिंदुस्तान टाइम्स में ‘अ मर्जर इज़ अरेंज्ड’ नाम से संपादकीय लिखा, "जनमत संग्रह इतनी जल्दबाज़ी में कराया गया कि यह पूरी मुहिम संदेहों के घेरे में आ गई. जनमत संग्रह में सवाल पूछा गया कि क्या आप इस बात से सहमत हैं कि चोग्याल का पद समाप्त किया जा रहा है और सिक्किम अब से भारत का हिस्सा होगा. ये दोनों अलग अलग मुद्दे थे जिनका आपस में कोई संबंध नहीं था. ताज्जुब ये था कि यह गांधी और नेहरू के देश में हुआ."

रॉ की भूमिका

रॉ प्रमुख रामनाथ काव बाईं ओर
रॉ प्रमुख रामनाथ काव बाईं ओर
सिक्किम के भारत के साथ विलय में राजनयिकों के साथ साथ भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
दास कहते हैं कि उन दिनों रॉ के अधिकारियों से उनकी पार्टी वगैरह में मुलाकात होती थी, "मैं उनसे पूछा करता था कि मुझे बताओ तो कि क्या हो रहा है, लेकिन वे लोग मुझे कुछ भी नहीं बताते थे. एक दिन वे मेरे घर आए और बोले- सॉरी सर हम आपसे कोई बात नहीं कर सकते. हमारे पास निर्देश हैं कि मुख्य कार्यकारी अधिकारी को सिक्किम में हो रही किसी घटना के बारे में नहीं बताया जाए क्योंकि वह चोग्याल के मुलाज़िम हैं और वह इसके बारे में उन्हें बताने की ग़लती कर सकते हैं."
"मैं आपको ईमानदारी से बता रहा हूँ कि आख़िरी दिन तक सिक्किम में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी मुझे भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों से कभी नहीं मिली."
इंदर मल्होत्रा का मानना है कि रॉ ने सिक्किम के विलय में निर्णायक भूमिका ज़रूर निभाई थी, लेकिन इस बारे में दिशानिर्देश राजनीतिक नेतृत्व ने जारी किए थे.
इंदिरा गांधी ने रॉ प्रमुख रामनाथ काव, पीएन हक्सर और पीएन धर की बैठक बुलाई थी. जब काव से कहा गया कि वह इस मामले में सलाह दें तो उनका जवाब था, "मेरा काम सरकार के फ़ैसले को अमल में लाना है, सलाह देना नहीं."

इंदिरा गांधी की भूमिका

इंदिरा गांधी और चोग्याल
दास कहते हैं, "हमें यह अंदाज़ा था कि इस पूरे प्रकरण की इंदिरा गांधी को लगातार जानकारी दी जा रही थी. मैंने इंदिरा गांधी के साथ 11 साल काम किया है. उनके बारे में ख़ास बात थी कि जब उन्हें ये अहसास हो जाता था कि कोई इंसान उनके साथ पंगा ले रहा है तो वह उसे बख़्शती नहीं थीं. चोग्याल के बारे में भी उन्हें लग गया था कि उन्हें कभी बदला नहीं जा सकता. वह पूरे सिक्किम प्रकरण की प्रधान नायिका थीं. हम लोग तो उनके प्यादे थे.’’
सिक्किम को भारत का 22वां राज्य बनाने का संविधान संशोधन विधेयक 23 अप्रैल, 1975 को लोकसभा में पेश किया गया. उसी दिन इसे 299-11 के मत से पास कर दिया गया.
राज्यसभा में यह बिल 26 अप्रैल को पास हुआ और 15 मई, 1975 को जैसे ही राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने इस बिल पर हस्ताक्षर किए, नाम्ग्याल राजवंश का शासन समाप्त हो गया.
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औरतों से छेड़छाड़ से किसी को नहीं पड़ता फ़र्क़ ?

औरतों से छेड़छाड़ से किसी को नहीं पड़ता फ़र्क़ ?

  • 2 घंटे पहले
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भारत, बलात्कार विरोध
पंजाब के मोगा कस्बे में बस में एक लड़की और उसकी मां के साथ छेड़छाड़ का आरोप, उसे बस से फ़ेंका गया या उसने बस से छलांग लगाई इस पर दिन भर बहस होती रही.
इस मुद्दे पर सियासत के 'बादल' छाने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा.
बस में क्या हुआ, कैसे हुआ, बस कंपनी बादल परिवार की है या नहीं और उस पर हुई सियासी बहसा-बहसी से परे, कुल जमा 'हासिल' ये रहा कि 14 साल की एक नाबालिग़ लड़की की मौत हो गई.

कुछ नहीं बदला ?

भारत, बलात्कार विरोध
14 साल वह उम्र होती है जब बचपन धीरे-धीरे अपनी चादर उतार एक ऐसी उम्र की ओर दबे पाँव बढ़ रहा होता है जहां मन में हज़ारों तरंगे हिलोरें मार रही होती हैं. कई मीठे सपने उड़ान भरने से पहले ही उधेड़-बुन में होते हैं.
लेकिन हम शायद ये कभी नहीं जान पाएंगे कि उसके सपने क्या थे, वह ज़िंदगी में क्या करना चाहती थी. और उस मां का क्या जिसने आंखों के सामने अपनी बच्ची को खो दिया...
भारत, बलात्कार विरोध
मैने अपना बचपन पंजाब में ही गुज़ारा है. ठीक यही उम्र रही होगी... कोई 13-14 साल. मोगा में जो कुछ इस लड़की के साथ हुआ उसे देखकर और सुनकर सबसे पहले एक ही ख़्याल मन में आया- क्या पिछले 10-15 सालों में चीज़ें कुछ भी नहीं बदली हैं.
अगर बदली होती तो क्या उस लड़की को अपनी जान गंवानी पड़ती?
सड़क पर आते-जाते छेड़छाड़, छीटांकशी, घर-परिवार-दोस्तों के दायरे में दुर्व्यहार... छोटी उम्र से ही इस सबसे सामना शुरू हो जाता है.
अगर आप इसका कोई वैज्ञानिक सुबूत मांगेगे तो माफ़ कीजिएगा शायद मेरे पास न हो लेकिन सामाजिक सुबूत हर दूसरे कदम पर मिल जाएंगे. और आपको सूबूत चाहिए ही तो महिला अपराध से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों का एक बड़ा अंबार है.

क्या माँ को डर लगा होगा?

अपनी बात करूं तो दस-एक साल की उम्र रही होगी जब शायद पहली बार मैं किसी ऐसे बर्ताव का शिकार बनी. फिर उसके बाद जैसे-जैसे बड़ी होती गई, कुछ चीज़ों की आदत सी पड़ती गई.
भारत, बलात्कार विरोध
वह साइकिल से स्कूल जाते समय किसी का पीछे-पीछे आना, कॉलेज में बस से आते समय किसी का अनचाहा स्पर्श, पैदल ऑफ़िस आते समय किसी राह चलते मनचले का किसी फूहड़ गाने के बोल सुनाना...
इन वाक्यों में से 'मैं' निकालकर अगर मैं किसी और महिला का नाम लिख दूं तो शायद कइयों की कहानी बहुत अलग नहीं होगी.
वैसे ये बात किसी से बांटी तो नहीं पर आज कलम ख़ुद ब ख़ुद जैसे ये मुझसे लिखवा रही है. बचपन में एक दफ़ा मैं और मम्मी पंजाब में ही किसी दूसरे शहर से बस से शाम को लौट रहे थे.
बग़ल में बैठा व्यक्ति बार-बार ग़लत तरीके से सट रहा था.
कुछ देर बाद माँ ने उसे ज़रा कड़क आवाज़ में समझाया. उन चंद घंटों में मैंने बहुत असहज महसूस किया था, लगा सारी बस हमारी तरफ़ देख रही हो.
तब तो मैं काफ़ी छोटी थी पर आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो सोचती हूँ कि मां ने उस वक़्त क्या महसूस किया होगा.

अनसुलझे सवाल

भारत, बलात्कार विरोध
मेरी और अपनी हिफ़ाज़त में मां ने आवाज़ उठाई होगी पर क्या अंदर ही अंदर वह डर गई होंगी?
आपको भी पढ़ने में शायद यह असहज लग रहा हो. लेकिन कड़वा सच यही है कि इस तरह की घटनाएं आए दिन होती हैं.
शायद आपमें से कइयों के साथ हुआ हो. और अगर आप पुरुष हैं तो ज़रा पांच मिनट निकालकर बस अपनी किसी महिला दोस्त, बहन, मां, पत्नी, महिला कर्मचारी से पूछिए.
घूम फिरकर दिमाग़ में मोगा की उसी लड़की का ख़्याल आता है जिसकी ज़िंदगी छिन गई...
वह होती तो किसी भी 14 साल की लड़की की तरह आंगन में इधर से उधर कूद-फांद कर रही होती, टीवी पर पंसदीदा शो देखने के लिए भाई या बहन के साथ टीवी रिमोट के लिए लड़ रही होती.
सहेलियों के साथ मस्ती करती, मां के आगे-पीछे घूम रही होती. लेकिन अब पीछे बची हैं तो ज़ख्मी मां और कुछ अनसुलझे सवाल. हमारे और आपके लिए.
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पोलावरम डेम से होंगे हजारों आदिवासी प्रभावित, आवाज दबाने में लगी सरकार

पोलावरम डेम से होंगे हजारों आदिवासी प्रभावित, आवाज दबाने में लगी सरकार

Posted:   Updated: 2015-04-29 11:21:05 ISTJagdalpur : Polavaram Dame will affect thousands of tribal
पोलावरम बांध का विरोध करते  रैली निकालने सुकमा जा रहे कांग्रेसियों को सुरक्षा व विश्रामगृह दिलाने पुलिस व प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कांग्रेसी विधायकों ने इसे भाजपा सरकार की साजिश करार देते कहा कि कांग्रेसी पोलावरम के हजारों प्रभावित आदिवासियों की आवाज उठाने की कोशिश कर हैं, जिसे सरकार दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
जगदलपुर. पोलावरम बांध का विरोध करते मंगलवार को रैली निकालने सुकमा जा रहे कांग्रेसियों को सुरक्षा व� विश्रामगृह दिलाने पुलिस व प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। इसकी लिखित सूचना कांग्रेसी विधायकों को दे दी गई। कांग्रेसी विधायकों ने इसे भाजपा सरकार की साजिश करार देते कहा कि कांग्रेसी पोलावरम के हजारों प्रभावित आदिवासियों की आवाज उठाने की कोशिश कर हैं, जिसे सरकार दबाने की कोशिश कर रहे हैं।� इसके बावजूद विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम यथावत रखा जाएगा और इस दौरान उनके साथ कोई हादसा होता है तो इसकी पूरी जवाबदारी सरकार की होगी।
पोलावरम बांध के विरोध में कोंटा में विरोध प्रदर्शन करने जा रहे कांग्रेस के छह विधायक� सोमवार को कोंटा विधायक कवासी लखमा के नेतृत्व में जगदलपुर पहुंचे थे। यहां पहुंचकर सुरक्षा को लेकर उन्होंने बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी से मुलाकात की।� इस पर कल्लूरी ने मंगलवार को संभागीय मुख्यालय में होने वाले अधिकारियों की बैठक का हवाला देते सुरक्षा देने से इंकार कर दिया।
इसके बाद सभी विधायक स्थानीय फारेस्ट रेस्ट हाउस पहुंचकर पत्रकार वार्ता ली, जहां� कांग्रेस के छह विधायक कवासी लखमा, दीपक बैज, लखेश्वर बघेल, मनोज मण्डावी, संतराम नेताम व शंकर धुरवा मौजूद थे। इस दौरान कांगे्रसी नेता हेमू उपाध्याय, अनवर खान समेत अन्य कांग्रेसी मौजूद थे।
बीस दिन पहले दी थी सूचना
पत्रकारवार्ता में विधायक कवासी लखमा व मनोज मण्डावी ने बताया कि विधायक लखमा व लखेश्वर बघेल ने धरना कार्यक्रम की सूचना करीब बीस दिन पहले ही प्रशासन को दी थी।� सुकमा� एसपी डी श्रवण ने सुरक्षा दिए जाने का आश्वासन दिया था। सत्कार अधिकारी से भी� विधायकों के ठहरने के लिए विश्राम गृह का इंतजाम करने कहा था, जिस पर उन्होंने विश्राम गृह में कमरा दिलाने का आश्वासन भी दिया। इधर अब से चार दिन पहले बस्तर आईजी कल्लूरी से मिलकर धरना व रैली के लिए सुरक्षा की मांग की गई थी, जिसमें उन्होंने सुरक्षा देने की बात कही थी। अब धरने के एक दिन पहले प्रशासन सुरक्षा देने से इंकार कर रहा है।
माओवादियों का शहीदी सप्ताह जारी
इधर माओवादियों ने एक मई तक शहीदी सप्ताह को लेकर भी बंद का आहवान किया है। एेसी स्थिति में बांध के प्रभावितों के पक्ष में सुरक्षा के अभाव में कांग्रेसी विधायकों का जाना और सरकार से सुरक्षा को लेकर पुख्ता जवाब नहीं मिलना कठिन परिस्थितियों को जन्म दे रहा है।
कार्यक्रम में नहीं करेंगे बदलाव
विधायक दल ने पहले से तय नियत कार्यक्रम में बदलाव नहीं करने की बात कही है। विधायकों ने कहा कि सरकार आदिवासियों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। प्रोटोकॉल में विधायक मुख्य सचिव से भी उपर होते हैं पर सरकार के नुमाइंदे उन्हें सुरक्षा देने से इंकार करते पर्याप्त� सुरक्षा बल नहीं होने को बता  रहे हैं 

बस्तर में छठी अनुसूची लागू करने होगा आंदोलन

बस्तर में छठी अनुसूची लागू करने होगा आंदोलन









Posted:   Updated: 2015-04-29 23:54:52 ISTjagdalpur: Sixth Schedule shall apply for will be agitation
मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में अखिल भारतीय आदिवासी महासभा सड़क पर आ रही है। सीपीआई के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम चार सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन का एेलान कर चुके हैं।
जगदलपुर. मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में अखिल भारतीय आदिवासी महासभा सड़क पर आ रही है। सीपीआई के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम चार सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन का एेलान कर चुके हैं। मंगलवार को� पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश� वापस लेने के साथ ही बस्तर में संविधान की छठी अनुसूची लागू करने को लेकर 5 से 14 मई तक पद यात्रा की जाएगी।
अखिल भारतीय आदिवासी महासभा� ने भरी हुंकार
इन दो विशेष मांगों के साथ बस्तर की मूल जातियों माहरा, तेलगा, राउत, धाकड़, कलार, लोहार, कम्हार, कुड़क, सुंडी व बंजारा को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग भी की जाएगी। पोलावारम बांध का भी पद यात्रा कर विरोध करेंगे। दंतेवाड़ा के समलवर से तैयारी : पांच मई से दंतेवाड़ा के समलवर गांव से पदयात्रा शुरू होगी। सैकड़ों गांव में छोटी सभाओं के साथ काफिला 14 मई को संभागीय मुख्यालय पहुंचेगा।

श्रमिक विरोधी है मोदी सरकार- javed anees

श्रमिक विरोधी है मोदी सरकार




javid
                                                        जावेद अनीस
असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूरों के लिए श्रम कानून पहले ही बेमानी हो चुके थे इधर लेकिन “अच्छे दिनों’’ के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी-सरकार के राज में तो संगठित क्षेत्र के मजदूरों की हालत भी बदतर हो गयी है, सत्ता में आते ही इस सरकार ने श्रम-कानूनों में बदलाव को जोर-शोर से आगे बढाने में लग गयी थी, पिछले वर्ष ही केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फैक्टरी कानून, एप्रेंटिस कानून और श्रम कानून (कुछ प्रतिष्ठानों को रिटर्न भरने और रजिस्टर रखने से छूट) कानून में संशोधन को मंजूरी भी दे थी, इसके अलावा केंद्र सरकार ने लोकसभा के इस सत्र में कारखाना (संशोधन) विधेयक, 2014 भी पेश किया था , इस पूरी कवायद के पीछे तर्क था कि इन ‘सुधारों’’ से निवेश और रोजगार बढेंगे। पहले कारखाना अधिनियम, जहाँ 10 कर्मचारी बिजली की मदद से और 20 कर्मचारी बिना बिजली से चलने वाले संस्थानों पर लागू होता था वहीँ संसोधन के बाद यह क्रमशः 20 और 40 मजदूर वाले संस्थानों पर लागू होगा। ओवर टाइम की सीमा को भी 50 घण्टे से बढ़ाकर 100 घण्टे कर दिया गया है और वेतन सहित वार्षिक अवकाश की पात्रता को 240 दिनों से घटाकर 90 दिन कर दिया है। ठेका मजदूर कानून अब बीस की जगह पचास श्रमिकों पर लागू होगा। औद्योगिक विवाद अधिनियम के नए प्राविधानों के तहत अब कारखाना प्रबंधन को तीन सौ कर्मचारियों की छंटनी के लिए सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी, पहले यह सीमा सौ मजदूरों की थी। अप्रेंटिसशिप एक्ट, 1961 में भी बदलाव किया गया है, अब अप्रेंटिसशिप एक्ट न लागू करने वाले फैक्ट्री मालिकों को गिरफ्तार या जेल में नहीं डाला जा सकेगा। यही नहीं कामगारों की आजीविका की सुरक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में समरूपता लाने संबंधी उपाय राज्य सरकारों की मर्जी पर छोड़ दिए गए हैं। स्पष्ट है कि तथाकथित “सुधार” मजदूर हितों के खिलाफ हैं। इससे मजदूरों को पहले से मिलने वाली सुविधाओं में कानूनी तौर कमी आएगी।
इस मामले में तो राजस्थान भी भाजपा सरकार तो केंद्र सरकार से भी आगे निकल गई है, राजस्थान सरकार ने राजस्थान विधानसभा में औद्योगिक विवाद (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2014, ठेका श्रम (विनियमन और उत्पादन) राजस्थान संशोधन विधेयक, कारखाना (राजस्थान संशोधन) विधेयक और प्रशिक्षु अधिनियम रखा था जो की पारित भी हो चूका है । औद्योगिक विवाद अधिनियम में बदलाव के बाद अब मजदूरों की छंटनी और कारखाना बंदी के लिये 100 के स्थान 300 कर्मचारियों तक के कारखानो को ही सरकार की अनुमति की बाध्यता रह गई है, जाहिर तौर पर इससे बडी संख्या में कारखानों को छंटनी करने या बनावटी रूप में कारखाना बंदी करने की छूट मिल जायेगी क्योंकि वे अपने अपने रिकॉर्ड में स्थाई श्रमिको की संख्या 299 तक ही बतायेंगे और बाकी श्रमिको को ठेका मजदूर के रूप में बतायेंगे। इसी तरह से ठेका मजदूर कानून भी अब मौजुदा 20 श्रमिकों के स्थान पर 50 कर्मचारियों पर लागू होगा। पहले किसी भी कारखाने में किसी यूनियन के रूप में मान्यता के लिए 15 प्रतिशत सदस्य संख्या जरूरी थी लेकिन इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है, इसका अर्थ यह होगा कि मजदूरों के लिए अब यूनियन बनाकर मान्यता प्राप्त करना मुश्किल हो गया है, इससे नियोजको को यह अवसर मिलेगा कि वे अपनी पंसदीदा यूनियनो को ही बढावा दे।
कारखाना अधिनियम में बदलाव के बाद कारखाने की परिभाषा में बिजली के उपयोग से चलने वाले वही कारखाने आयेंगे जहाँ 20 श्रमिक काम करते हो पहले यह संख्या 10 थी। इसी तरह से बिना बिजली के उपयोग से चलने वाले वाले 20 के स्थान पर 40 श्रमिको की संख्या वाले कारखाने ही इसके दायरे में आयेंगें। इसका मतलब यह होगा कि अब और बड़ी संख्या में श्रमिको को श्रम कानूनो से मिलने वाले फायदे जैसे सफाई, पीने का पानी, सुरक्षा, बाल श्रमिको का नियोजन, काम के घंटे, साप्ताहिक अवकाश, छुट्टियां, मातृत्व अवकाश, ओवरटाईम आदि से महरूम होने वाले हैं।
कुल मिलकर यह संशोधन श्रमिको के अधिकारों को कमजोर करने वाले हैं। शायद इसका मकसद नियोक्ताओं व कॉरपोरेट घरानों को बिना किसी जिम्मेवारी व जवाबदेही के आसानी से अनापदृशनाप मुनाफे कमाने के लिए रास्ता खोलना है।
मोदी सरकार का सरमायेदारों (कार्पोरेट) ने जोरदार स्वागत किया था,इस सरकार से उन्हें बड़ी उम्मीदें हैं, उनके विचारक और पैरोकार बहुत शिद्दत से “आर्थिक विकास” सुनिश्चित करने के लिए “कारोबारी प्रतिकूलताएं” दूर करने की वकालत कर रहे हैं, जिसमें तेजी से आर्थिक एवं कारोबार संबंधी नीतिगत फैसले लेने, सब्सिडी या आर्थिक पुनर्वितरण की नीतियों को सही तरीके से लागू करने की दिशा में कदम उठाने, बुनियादी क्षेत्र में निवेश आदि बातें शामिल हैं। मोदी के विजय के बाद भारत में पूँजीवाद के मुखर चिन्तक गुरचरन दास ने उत्साहित होकर लिखा था कि “मोदी की जीत के बाद से देश दक्षिणपंथी विचारधारा की तरफ नहीं वरन आर्थिक स्तर पर यह दाहिनी ओर झुक गया है”। श्रम कानूनों में बदलाव की शुरुवात के बाद कॉरपोरेट जगत के हितेषी संतुष्टि प्रकट करते हुए कह रहे हैं कि मोदी श्छोटी सरकार, बड़ा शासनश् का वादा बहुत अच्छे से निभा रहे हैं, “इन सुधारों से हमारे आधे कारखानों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और बिजनेस करना आसान हो जाएगा”।
आखिर कोई वजह तो रही होगी कि एक जमाने में पूंजीपतियों की चहेती कांग्रेस पार्टी, उनके नजरों से उतर गयी और उसकी जगह बीजेपी ने ले लिया। यही नहीं भारत में नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के पोस्टर पुरुष रहे मनमोहन सिंह की चमक भी फीकी पड़ गयी ,उन्हें एक तरह से नाकारा मान लिया गया और उनकी जगह मोदी की नए पोस्टर पुरुष के रूप में नियुक्ति कर दी गयी है। इसके जवाब के लिए हमें पांच साल पीछे जाना पड़ेगा जब देश के बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने की तैयारी पूर्व शुरू कर दी थी। जिस स्तर का मोदी का चुनाव अभियान था वह कॉरपोरेट के मदद की बिना असंभव ही नहीं हो सकता था। 2014 का आम चुनाव सही मायने में देश का पहला कार्पोरेट चुनाव था।
गौरतलब है कि साल 2009 के ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन में भारती समूह के प्रमुख सुनील मित्तल ने कहा था कि ‘मोदी को सी.इ.ओ. कहा जाता है, लेकिन असल में वे सी.इ.ओ. नहीं हैं, क्योंकि वे कोई कंपनी या क्षेत्र का संचालन नहीं करते हैं। वे एक राज्य चला रहे हैं और देश भी चला सकते हैं।’ इसी सम्मेलन में अनिल अंबानी ने भी मित्तल के हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा था कि ‘नरेंद्र मोदी ने गुजरात में बहुत अच्छा काम किया है और आप कल्पना कीजिए कि अगर वे देश का नेतृत्व करेंगे तो कितना कुछ हो जाएगा।’ रतन टाटा ने भी कहा था कि ‘मोदी की अगुआई में गुजरात दूसरे सभी राज्यों से अग्रणी है। सामान्य तौर पर किसी प्लांट को मंजूरी मिलने में नब्बे से एक सौ अस्सी दिन तक समय लगता है, लेकिन ‘नेनो’ प्लांट के संबंध में हमें सिर्फ दो दिन में जमीन और स्वीकृति मिल गई। विदेशी उद्योगपतियों के संगठनों द्वारा भी इसी तरह की बातें कही गयी थीं।
मोदी शायद इन्हीं उम्मीदों पर खरे उतरने की कोशिश कर रहे हैं तभी तो उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में लाल किले से अपने पहले संबोधन में पूरी दुनिया को “कम,मेक इन इंडिया” का आमंत्रण दिया था और अब दुनिया भर में घूम दृ घूम कर इसकी मुनादी कर करते हुए भारत को एक ऐसे बाजार के तौर पर पेश कर रहे हैं जहाँ सस्ते मजदूर और कौड़ियों के दाम जमीन उपलब्ध हैं। सरकार श्रम कानून को दंतहीन बनाने के क्रम में पूरी मुस्तैदी से आगे बढ़ रही है है। श्रम कानूनों में बदलाव के पीछे मोदी सरकार का तर्क है कि इनमें सुधार किए बिना देश में बड़े विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षित नहीं किया जा सकता है, इसके अलावा इसके पीछे मैन्यूफैक्चरिंग की धीमी रफ्तार को तोड़ने, रोजगार के नए अवसर सृजन का तर्क भी दिया जा रहा है। दबे जुबान से यह भी कहा जा रहा है कि मजदूर संगठन श्रम कानूनों का इस्तेमाल निवेशकों को प्रताडि़त करने के लिए करते हैं। इसके पीछे मारुति, हीरो होंडा, कोलकाता की जूट मिल कंपनियों की बंदी से उत्पन्न संघर्ष का उदाहरण दिया जा रहा है।
ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि मोदी सरकार के लिए मजदूरों के हितों की जगह देशी, विदेशी पूंजी निवेश ज्यादा महत्वपूर्ण है। श्रम कानूनों में सुधार का फायदा किसी भी कीमत पर मुनाफा कूटने में लगी रहने वाली देशी-विदेशी कंपनियों को ही मिलेगा, मजदूरों को पहले से जो थोड़ी बहुत आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिली थी उन्हें भी छीना जा रहा है। यह कहना भ्रामक है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में धीमी गति और नए रोजगार सृजन में श्रम कानून बाधक हैं। श्रम कानून तो इसलिए बनाये गये थे कि सरमायेदारों की बिरादरी अपने मुनाफे के लिए मजदूरों के इंसान होने के न्यूतम अधिकार की अवहेलना न कर सकें। धीमी मैन्यूफैक्चरिंग और बेरोजगारी की समस्या तो पूंजीवादी सिस्टम की देन है। वाकई में अच्छे दिन आ गये हैं लकिन गरीब -मजदूरों के नहीं बल्कि देशीदृविदेशी सरमायेदारों के।

गुजरात मॉडल की सच्चाई

गुजरात मॉडल की सच्चाई

01, MAY, 2015, FRIDAY 11:43:57 PM


देशबन्धु]
भारत में श्रम कानूनों में सुधार को लेकर भारी विवाद छिड़ा हुआ है। पिछले साल मई महीने में केन्द्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद कहा जा रहा है कि भारतीय श्रम कानून काफी पुराने होने के कारण वे देश के आर्थिक विकास में रोड़े बन रहे हैं। श्रमिकों को कानूनन जरूरत से ज्यादा सुरक्षा देने के कारण विदेशी निवेश नहीं आ रहे और इस प्रकार न कल-कारखाने लग रहे हैं और न ही रोजगार के अवसरों का सृजन हो पा रहा है। हर साल देश में एक करोड़ तीस लाख नौजवान श्रमिक समुदाय में शामिल हो रहे हैं। न सिर्फ इनके लिए बल्कि पहले से रोजगार के अवसर ढूंढने वालों के लिए काम देने की भारी समस्या है। आजादी के तुरंत बाद 1948 में फैक्ट्रीज एक्ट पारित हुआ था जो अब भी जारी है। वह भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत बन गया है। देशी-विदेशी नए निवेशक आने से घबराते हैं।
कई लोगों का मानना है कि यदि श्रम कानूनों में छोटे-मोटे नहीं, बल्कि आद्योपांत बदलाव कर दिए जाए तो अन्य देशों की अपेक्षा यहां श्रम सस्ता होने के कारण निवेशकर्ता खिंचे चले आएंगे। जिससे हमारा उत्पादन और व्यापार तेजी से बढ़ेगा। वर्ष 1947 में औद्योगिक विवाद एक्ट बना। वर्ष 1976 में उसमें संशोधन हुआ। इसके बाद मजदूरों को निकाल पाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया। निवेशकों का कहना है कि उनको ''हायर और फायरÓÓ की पूरी 
आजादी न होने के कारण वे यहां अपनी पूंजी नहीं लगा पाते। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में कार्यरत् अर्थशास्त्री साइमन डिकिन और अंतरा हाल्दर का मानना है कि ''देश के स्तर पर श्रम का लचीलापन आर्थिक विकास की पर्याप्त शर्त नहीं है, और यहां तक कि वह आवश्यक शर्त भी नहीं है।ÓÓ इसके बदले ऐसे संस्थान विकसित किए जाने चाहिए जो श्रम बाजार से जुड़़ी जोखिमों पर ध्यान दें।
मारग्रेट थैचर और रोनाल्ड रीगन के आगमन के बाद नवउदारवाद का डंका बजा। जॉन विलियम्सन ने ''वाशिंगटन आम रायÓÓ के दस बिंदुओं को प्रस्तुत किया जिनके पीछे अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, गार और अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट का समर्थन था। उन दस बिंदुओं में श्रम कानूनों को समाप्त कर ''हायर और फायरÓÓ के लिए मार्ग प्रशस्त करना शामिल था। कहा गया कि पूंजी और श्रम के बीच विवाद में सरकार को नहीं पडऩा चाहिए और उसको हस्तक्षेप की नीति से दूर रहना चाहिए। यह धारणा प्रभावी थी कि यदि बाजार में कोई हस्तक्षेप न हो तो देर-सबेर वह संतुलन की अवस्था में आ जाएगा। कोई भी बाहरी हस्तक्षेप आर्थिक कल्याण के ऊपर नकारात्मक प्रभाव डालेगा। स्पष्ट है कि सरकार तदस्थ रहे और श्रमिकों और पूंजी के विवाद में कोई हस्तक्षेप न करे। 
16 मई 2014 को नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने और इसके साथ ही विकास का ''गुजरात मॉडलÓÓ चर्चा में आया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा कि सत्ता में आते ही जैसे उन्होंने अपने गृह राज्य गुजरात को विकसित किया है वैसे ही सारे भारत को बड़ी तेजी से विकास और आर्थिक समृद्धि के मार्ग पर बढ़ाएंगे। श्री मोदी गुजरात में एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहे हैं और उनकी ख्याति व्यवसायियों के प्रति नरमी का रुख अपनाने को लेकर रही है। उन्होंने व्यवसायियों को सड़कें ही नहीं, बल्कि बन्दरगाह तक दिए हैं। बेहतर प्रशासन (जिसमें भ्रष्टाचार कम था और नौकरशाही पर सरकार का नियंत्रण था) दिया। जन विकास केंद्र के जरिए अफसरशाही का शिकंजा ढीला किया। जमीन और श्रम व्यवसायियों को उनकी दृष्टि से अनुकूल शर्तों पर दिए गए। गुजरात में विशेष आर्थिक जोन बनाकर देशी विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया गया। बड़े पैमाने पर किसानों से बलात् जमीन लेकर उन्हें दी गई। वर्ष 2004 में गुजरात औद्योगिक विवाद (संशोधन)अधिनियम और साथ ही गुजरात विशेष आर्थिक जोन का कानून बना। विशेष आर्थिक जोन में अधिकतर राष्ट्रीय श्रम कानूनों को निष्प्रभावी बना दिया गया। उदाहरण के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम के भाग पांच बी को काफी कुछ निष्प्रभावी बना दिया गया। मजदूरों को आसानी से हटाया जा सकता था और उन्हें पहले की अपेक्षा काफी कम मुआवजा नौकरी जाने पर मिलती।
तत्काल गुजरात सरकार श्रम कानूनों में अभूतपूर्व सुधारों का डंका पीट रही है और उसका दावा है कि मजदूरों को इन सुधारों के कारण काफी फायदा हुआ है। साइमन डिकिन और अंतरा हाल्दर ने 21 मार्च 2015 को ''इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकलीÓÓ में एक विशेष लेख ''हाऊ शुड इंडिया रिफॉर्म इट्स लेबर लॉज 2ÓÓ शीर्षक से प्रकाशित किया है जिसमें मोदी के गुजरात मॉडल का विश्लेषण किया गया है। उनका मानना है कि गुजरात मॉडल को लेकर काफी विवाद है। लोकसभा चुनाव के दौरान इस मॉडल के समर्थकों ने उद्योग और निवेश तथा आधारभूत ढांचा और बिजली को इस मॉडल की मुख्य विशेषताएं बतलाईं। यह दावा किया गया कि वर्ष 2001-2004 के दौरान प्रतिवर्ष औद्योगिक विकास 3.95 प्रतिशत था जो बढ़कर 2005-2009 के दौरान 12.65 प्रतिशत प्रतिवर्ष पर पहुंच गया। कृषि के क्षेत्र में उत्पादन की वृद्धि बिजली, पानी और सड़क निर्माण का परिणाम थी। यह भी दावा किया जाता है कि 2001 और 2010 के बीच कृषि उत्पादन में वृद्धि 10.97 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही। स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण को लेकर कई दावे किए गए हैं मगर वे विवादों के घेरे में हैं।
गुजरात कई बड़े औद्योगिक घरानों का ठिकाना बन गया है।  रिलायंस, एस्सार, अडानी और टाटा ने गुजरात में काफी निवेश किया है। हम गुजरात मॉडल की तुलना केरल मॉडल से कर सकते हैं। केरल में मानव कल्याण पर काफी जोर रहा है। वहां शत प्रतिशत साक्षरता है। महिला सशक्तिकरण  पर विशेष जोर रहा है। साथ ही साम्प्रदायिक सौहाद्र्र रहा है। इसके विपरीत गुजरात मॉडल में जोर संवृद्धि दर पर रहा है। मानवीय कल्याण की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। हम आदिवासियों की स्थिति और महिला सशक्तिकरण को देख सकते हैं। महिलाओं के स्वास्थ्य पर वैसा ध्यान नहीं दिया गया है जितना केरल में दिया जाता रहा है। याद रहे कि सेन-भगवती विवाद की जड़ में यही रहा है। इस संदर्भ में हम 2013 में प्रकाशित ड्रेज और सेन तथा 2012 में छपे भगवती और पानागढिय़ा के लेखों को देख सकते हैं।
गुजरात मॉडल का जोर कानून के शासन और डिरेगुलेशन पर रहा है। केन्द्र में शासन में आने के बाद श्रम संबंधी कानूनों में बदलाव लाने की बात की जा रही है। श्रम कानूनों को लागू करवाने के लिए नियुक्त इंस्पेक्टरों के अधिकारों और हस्तक्षेप को कम करने की बात चर्चा में है। अब तक औद्योगिक विवाद से जुड़े कानून में फेरबदल का कोई विस्तृृत प्रस्ताव सामने नहीं आया है। हो सकता है आने वाले समय में इस दिशा में कदम उठाए जाएं।
कुछ लोगों का मानना है कि गुजरात मॉडल की सफलता स्थानीय कारणों तथा स्थितियों पर निर्भर रही है। यहां पर कहा जा सकता है कि उद्यमिता की लंबी परंपरा और गुजरात की भौगोलिक स्थिति का गुजरात मॉडल के पीछे भारी हाथ रहा है। ये दोनों तत्व अन्य राज्यों में काफी कुछ अनुपस्थित हैं।
कई लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना वांछनीय है। यह माडल भूमि, श्रम और ऋण-व्यवस्था में सुधार पर आधारित है। कार्ल पोलान्यी की 1944 में प्रकाशित पुस्तक ''द ग्रेट ट्रांसफॉर्मेंशन : द पोलिटिकल एंड इकॉनामिक ओरिजिंस ऑफ आवर टाइमÓÓ में रेखांकित किया गया है कि भूमि, श्रम और मुद्रा को विशुद्ध माल के रूप में नहीं देखा जा सकता। बाजार अर्थव्यवस्था की रचना के लिए सिर्फ सरकारी नियंत्रण को हटाना ही आवश्यक नहीं है बल्कि सांस्थानिक क्षमता के निर्माण की जरूरत है। इस संदर्भ में हम गुजरात मॉडल को लें तो उसकी क्या विशेषता है यह स्पष्ट नहीं है। वह उदारीकरण और डिरेगुलेशन की बात करता है और संयंत्रों को स्थान विशेष पर  लगाने के लिए सब्सिडी•ा का आश्वासन देता है जो अस्थायी उपाय है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि गुजरात के डिरेगुलेटरी दृष्टिकोण से संवृद्धि की गारंटी हो सकती है। गुजरात के पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र को देख सकते हैं जिसकी अर्थव्यवस्था ने गुजरात के मुकाबले तेजी से प्रगति की है और आगे बढ़ा है। गुजरात मॉडल में ऐसी कोई बात नहीं है जो अद्वितीय संवृद्धि के मार्ग पर ले जाय। गुजरात मॉडल को लेकर यह प्रश्न उठता है कि यदि संवृद्धि की दर बढ़ती है तो समाज के विभिन्न वर्गों को उसका किस हिसाब से फायदा मिलता है। उदाहरण के लिए उसका कितना हिस्सा श्रम को प्राप्त होता है और स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला साक्षरता और शिशु मृत्यु को रोकने पर कितना खर्च होता है। कहना न होगा कि उपर्युक्त मदों पर गुजरात में खर्च बहुत कम होता है। मानवीय विकास की दृष्टि से गुजरात में बहुत कम व्यय होता है। यही कारण है कि वह अल्प विकसित राज्यों की कोटि में आता है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार गुजरात में डॉक्टरों की कमी 34 प्रतिशत है जबकि सारे देश में यह आंकड़ा 10 प्रतिशत है। वर्ष 2013 के आकलन के अनुसार गुजरात में तीन में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है।
इसलिए यह कहना कि देश में श्रम संबंधी कानून ही विदेशी निवेश के आने के मार्ग में बाधक है सर्वथा गलत है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि निवेश को काफी हद तक कर मुक्त करने तथा भरपूर सब्सिडी देने से वे यहां दौड़ते हुए आएंगे और प्रधानमंत्री के ''मेक इन इंडियाÓÓ के स्वप्न को साकार बनाएंगे।
श्रमिकों को मिलने वाली सुरक्षा को पूरी तरह समाप्त करने से विदेशी निवेशक धड़ल्ले से आएंगे। सच्चाई यह है कि उनकी दिलचस्पी रोजगार बढ़ाने में कतई नहीं है। वे पूंजी-प्रधान तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

डॉ. गिरीश मिश्र के आलेख