Friday, April 3, 2015

महाराष्ट्र में पूर्ण गोहत्या बंदी लागू करी गयी है .

महाराष्ट्र में पूर्ण गोहत्या बंदी लागू करी गयी है .

हिमांशु कुमार 


महाराष्ट्र में पूर्ण गोहत्या बंदी लागू करी गयी है .
लेकिन सरकार के इस कदम के पीछे खेती में बैलों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का कोई उद्देश्य नहीं है .
पुलिस द्वारा नागरिकों को अपनी गाय बैलों के फोटो पुलिस थाने में जमा कराने के आदेश दिए जा रहे हैं .
इससे किसी की गाय मर जाने या खो जाने पर पुलिस का दमन गरीब नागरिकों पर किये जाने का रास्ता साफ़ हो जायेगा .रिश्वतखोरी बढ़ जायेगी .
गोहत्या के फर्ज़ी आरोप लगा कर मुस्लिम युवकों को जेलों में डाले जाने का अंदेशा है .
यह कदम पूरी तरह से हिंदू समुदाय को गोपालक , भारतीय संकृति का रक्षक , अहिंसक और मुस्लिम समुदाय को आतातायी , क्रूर हिंसक और गोभक्षक रूप में चित्रित करने की गंदी योजना के तहत उठाया गया खतरनाक कदम है .
एक तरफ सरकार अपने लालच के लिए गाय काटने के बड़े बड़े कत्लखाने चला रही है .
महाराष्ट्र में ही देओनार में एक बड़ा कत्लखाना चलता है जिसका पूरा मांस दूसरे देशों को भेजा जाता है .
सरकार मुनाफा कमाने के लिए उस कारखाने को आज भी चालू रखे हुए है .
इस कत्लखाने में जान बूझ कर टांगें तोड़ तोड़ कर बढ़िया बैलों को लाकर विकलांग कह कर काटा जा रहा है .
मैंने अपने विद्यार्थी काल में सर्वोदय आंदोलन के दौरान गोरक्षा के लिए उपवास किया था . हमारे साथ अनेकों मुस्लिम साथी भी गोहत्या के विरोध में उपवास पर थे .
उसके बाद बस्तर में मैंने अट्ठारह साल उन आदिवासियों के साथ काम किया है जो गाय का मांस खाते थे .
मुझे आदिवासियों का गाय खाना कोई गलत काम नहीं लगा .
आदिवासी गाय पालते थे उससे खेती भी करते थे , ज़रूरत होने पर खा भी लेते थे .
उससे उनकी खेती के तरीकों या अर्थ व्यस्था पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता था .
मैं आज भी मानता हूँ कि अगर छोटे किसान को जिंदा रखना है तो खेती को ट्रैक्टर और महंगे रासायनिक उर्वरकों से करने के बजाय गाय बैलों और भैंसों से करने को बढ़ावा देना
चाहिये .
लेकिन मैं गाय बचाने के इस तरह के सरकारी दमनात्मक और साम्प्रदायिक तरीकों का विरोध करता हूँ .

कहाँ है सर्वशक्तिमान ईश्वर , केन्या में छात्रों से पहले पूछा धर्म फिर 147 बच्चो को मार दी गोली



कहाँ  है सर्वशक्तिमान  ईश्वर , केन्या  में छात्रों  से पहले पूछा धर्म  फिर  147 बच्चो को मार  दी गोली 







केन्या  में आतंकवादियों ने प्रार्थना  सभा के बाद यूनिवर्सिटी  में घुस के 147  छात्रों की हत्या कर दी ,
हर छात्र से पहले पूछा उनका धर्म ,
अलशबाब ने कहा की हाँ हमने  उन्हें मारा  हैं 
585  छात्र अभी भी लापता हैं ,
इसके पहले भी दुनिया   ऐसी  ही धर्म के आधार पे हत्याएं की हैं ,
ऐसे ही पाकिस्तान में 187  स्कुल के बच्चो को मार  दिया था , 
भारत में तो ऐसी कई घटनाये हुई है ,जिसमे सिर्फ इसलिए उन्हे मार दिए  की वो  दूसरे धर्म को मानते थे ,
हाशिमपुरा जैसे कई , उदाहरण है हमारे यहाँ ,
ज्यादातर मारने  वाले और मरने  वाले के अलग अलग धर्म होते है ,
लेकिन कई जगह एकधर्म के हो दोनों समुदाय से है , फिर भी उन्हें अपने ही धर्म  की किसी  अवधारणा  के कारण उन्हें मौत के घाट उत्तर दिया गया ,
कभी  भी हत्यारों ने अपने कृत्य पे अफ़सोस जाहिर नहीं किया ,
उन्हें पूरा भरोसा  था की वे इन हत्याओ से अपने आका [ ईश्वर भी कह सकते है ] को खुश कर रहे हैं ,
आप कह सकते है ,और ज्यादा तर धर्म ध्वजा उठाये लोग यही तर्क देते है की ,इसमें धर्म का क्या दोष। 
वे ये भी कहते है की ईश्वर तो  सबका भला चाहते  है, और हाँ वो यह भी कहते है की ईश्वर  हमेशा निर्बल ,ईमानदार का साथ देते हो और अत्याचारी को सजा  भी   देते है , 
और हाँ हमारे धर्म में तो ये भी लिखा है की जब  धरती पे अधर्म ज्यादा हो जाता है तो भगवन अवतार लेके भक्तो की रक्षा  भी करते है। 
ऐसी ही थोड़ी  बहूत कम  ज्यादा  अवधारणा  सभी धर्मो में हैं। 
माना की कोई ईश्वर किसी को निर्दोष मरने के लिए नहीं कहता ,तो क्या सिर्फ इतना ही काफी है उसकी भूमिका। 
क्या उसने कभी दुनिया के किसी भी भाग में कभी भी किसी निर्दोष की हत्या या किसी  अन्याय के खिलाफ कुछ किया है   , अगर किया हो तो कोई बताये ? 
पौराणिक या   धर्म ग्रंथो  की कहानी  मत सुनाये ,क्योकि उसे आज तक कोई प्रमाणित नहीं कर सका हैं। 
और न ही आज तक उसका  कोई उदाहण हैं ,
सभ्यता के नाम से हजारो लोगो को मारा गया ,
विकास  के नाम पे  करोड़ लोग समाप्त होगये ,
कई सभ्यताए खत्म हो गई,
धर्मके नाम  पे कई युद्द हुए , धर्म केसाथ खड़े हो के  हजारो लोगो  ने हजारो लोगो का मारा,
पहले दूसरे विश्वयुध्द में लोग मारे  गए ,  
योरोप अमेरिका  ने  कई देश बर्बाद किये ,
और अब ,,,,और अब,,,
 धार्मिक आतंकवाद ,कार्पोरेट की अंधाधुन्द  लूट में लाखो  लोग  प्रभावित हो रहे हैं  है ,
तो  कहाँ है तुम्हारा ईश्वर ?
कुछ नहीं कर सकता है ,क्यों की आज तक उसने कुछ नहीं क्या है ,
हम उसके नाम का कितना भी झंडा लिया घूमते रहे ,उसके नाम से कितनी भी आस्था की बात करे ,
वो कुछ कर ही नहीं सकता ,सिवाय हमे इन अत्याचार को अलग अलग परिभाषा देने के, 
मुक्ति पाना है इन झगड़ो से तो सबसे पहले इस ईश्वर नाम से झुटकार पाइये। 

[ मेने जानबूझ कर ईश्वर नाम का स्तेमाल किया है , वैसे  उसका आशय अल्लाह या प्रभु से भी हो सकता हैं ,या जो भी नाम स्तेमाल करते हो उसके लिए। ]   


Thursday, April 2, 2015

कवासी कोसा की हत्या के विरोध में थाने का घेराव ,पथराव और लाश रख के प्रदर्शन



कवासी कोसा की हत्या के विरोध में थाने  का घेराव ,पथराव और लाश रख के प्रदर्शन 







सुकमा / मुठभेड़ में मारे गए कवासी कोसा को निर्दोष  बताते हुए  आदिवासियों ने उसके शव को चिंतागुफा थाने के सामने रखकर गुरुवार की सुबह सैकड़ों ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया। बताया गया है कि कुछ आक्रोशित ग्रामीणों ने चिंतागुफा थाना कैंप पर पथराव भी किया। 

इससे पहले बुधवार शाम को पोस्टमार्टम के बाद परिजन कवासी कोसा का शव लेकर चिंतागुफा पहुंचे जिसके बाद नाराज परिजन और ग्रामीणों ने पथराव किया। चिंतागुफा में गुरुवार को एक दर्जन गांव के करीब दो हजार ग्रामीण एकजुट हुए थे। उन्होंने एक बड़ी रैली भी निकली ,पुलिस ने लाठी चार्ज करके ग्रामीणो को भगा भी दिया ,जैसा की कल बताया गया था की बुर्कापाल के  सरपंच पारा  निवासी कवासी  कोसा को घर से लेजा के मुठभेड़ में मारा हुआ बताया ,जब की परिवार के लोगो का आरोप है की उसे जंगल में गोली मार  दी ओर  उसके  पास से एक मॅगझिन मेगझीन  बरामद बता  दिया गया ,जब की उसके पास तो कुछ भी नहीं था  ,कुछ ग्रामीणो का ये भी कहना है की कोसा महुआ बिन जंगल गया थ्य ,वह से उस ेपकड़ लिया गया।   कवासी कोसा के परिजनों का आरोप है की फोर्स जबरन कोसा को अपने साथ ले गई थी। 
कवासी कोसा की हत्या के विरोध में चिंतागुफा में लगने वाले साप्ताहिक बाजार का बहिष्कार भी किया ,ग्रामीण ने बाजार में आये ब्यपारियो को भगा दिया।   

सुबह शव रखकर थाने के सामने प्रदर्शन करने के बाद दोपहर को ग्रामीण रैली निकालते हुए शव को अंतिम संस्कार के लिए ले गए। इस दौरान फोर्स के खिलाफ ग्रामीणों ने जमकर नारेबाजी की। [ भास्कर ,पत्रिका ,4 ,4 ,15 ]

आयता एक आदिवासी युवक है .


आयता एक आदिवासी युवक है .

[himanshu kumar]

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं .

महुआ बीनने गए गामीण कवासी कोसा को फ़ोर्स ने गोली मारी , ग्रामीणो ने किया विरोध

महुआ  बीनने  गए गामीण  कवासी कोसा को  फ़ोर्स  ने गोली मारी , ग्रामीणो ने किया विरोध 






छत्तीसगढ़ / सुकमा में  दोरनापाल  के बुर्कापाल  में मंगलवार को आदिवासी ग्रामीण कवासी  कोसा जो महुआ बीनने  गया था ,उसे फ़ोर्स ने गोली मार  दी ,बुर्कापाल के ग्रामोनो ने आज इसके    विरोध में ठाणे जेक प्रदर्शन हबी किया ,उन्होंने आरोप  लगाया कि कवासी कोसा चिंतागुफा में सरपंचपूरा   में रहता था कोसा की पत्नी कवासी हिड़मे ने कहा की उसके पति पे माओवादी होने का रूप गलत हैं ,वो सीधा साधा  ग्रामी ण  था ,उसका माओवाद से कोई लेने देना नहीं था ,
जब की फ़ोर्स का कहना है   की हमने मुठभेड़ में माओवादी को मारा हैं ,उसके पास से एसएलआर की मेगझीन  बरामद की हैं ,,जब की ग्रामीणो ने इस मुठभेड़  को फर्जी बताया है और दोरनापाल जाके  विरोध किया हैं  [ पत्रिका 2 /4 /15 ]   

Wednesday, April 1, 2015

गुजरातः टाडा, मकोका और पोटा के बाद... जस्टिस राजिंदर सच्चर

गुजरातः टाडा, मकोका और पोटा के बाद...

  • 7 घंटे पहले
गुजरात हिंसा
भारत में सामान्य क़ानूनों में पुलिस के सामने अपराध क़ुबूल कर लेना इंसाफ़ के लिहाज़ से स्वीकार्य नहीं होता है.
लेकिन गुजरात की सरकार ने अपने नए चरमपंथ निरोधक कानून में इस प्रावधान को रखा है कि पुलिस के सामने आरोप क़ुबूल करना अदालत में स्वीकार किया जाएगा.
हम लोगों को इस बात पर आपत्ति है. इस मामले में सभी सरकारों का रवैया एक जैसा ही रहा है. कांग्रेस के वक्त टाडा बना था, एनडीए के दौरान पोटा लाया गया.
दोनों ही कानूनों में पुलिस को दिए गए इक़रारनामे को कोर्ट में स्वीकार्य क़रार दिया गया था.

नागरिक अधिकार

गुजरात हिुंसा
नए क़ानून के मुताबिक पुलिस अभियुक्तों को ज़्यादा दिन तक हिरासत में रख सकती है. ये प्रावधान शुरू में टाडा में भी था.
नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग इसकी मुख़ालफ़त शुरू से कर रहे हैं.
टाडा हो या पोटा या फिर मकोका, नागरिक अधिकारों को लेकर सरकारों की सोच एक ही लाइन पर रही हैं.
जितनी भी सरकारें आती हैं, वे अपने फायदे के लिए इस किस्म का कानून बनाती रही हैं. जब वे विपक्ष में होते हैं तो शोर मचाती हैं.

चरमपंथ विरोधी

गुजरात हिंसा
गुजरात के चरमपंथ निरोधक कानून पर राष्ट्रपति ने अतीत में तीन बार दस्तख़त करने से इनकार कर दिया था. लेकिन मोदी को अब लग रहा है कि वे केंद्र में हैं तो इसे पारित करा सकते हैं.
इस क़ानून को अभी लाए जाने की बात बेतुकी है. इस वक्त ऐसे हालात भी नहीं हैं कि इस क़ानून को वाज़िब ठहराया जा सके.
हालांकि ये सवाल उठाया जा सकता है कि तीन बार वापस लौटा दिए जाने के बाद राष्ट्रपति नए क़ानून पर क्या रुख अख़्तियार करेंगे.
गुजरात हिंसा
लेकिन राष्ट्रपति अपनी तरफ़ से कुछ नहीं कर सकते हैं, उनका रवैया सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर करता है.
नए क़ानून से सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि पुलिस को दिए गए इक़रारनामे का कोर्ट में अभियुक्त के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है.
टाडा, पोटा, मकोका जैसे अपवादों को छोड़ दें तो आम क़ानून इसकी इजाज़त नहीं देते. इस लिहाज़ से यह नागरिक अधिकारों पर हमला है.
(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)
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प्राकृतिक संशाधनों का अधिग्रहण क्यों?- जेके कर

प्राकृतिक संशाधनों का अधिग्रहण क्यों?- जेके कर 


छत्तीसगढ़ खबर 
Wednesday, April 1, 2015
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सूखा
बिलासपुर | जेके कर: भूमि अधिग्रहण का अर्थ प्राकृतिक संसाधन पर कब्जा कर लेने से है.राष्ट्रीय राजनीति में भूमि अधिग्रहण को लेकर खेमेबाजी जोरों पर है. मोदी सरकार के लिये यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है. वहीं, विपक्षी कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा को मात देने की कोशिश में अपनी गोटियां फिट कर रहीं हैं. इन सब से दूर जिस किसान की भूमि अधिग्रहित की जानी है वह अलग-अलग राजनीतिक दलों के खेमों में अपने लिये जमीन तलाश रहा है. उसके बाद भी किसान की भूमि बच पायेगी की नहीं उसकी गारंटी देने वाला कोई नहीं है.
भूमि अधिग्रहण को समझने के लिये देश की वास्तविक आर्थिक हालात को समझने की जरूरत है. तमाम जीडीपी के विकास दर के दावों के बीच महंगाई इतनी है कि पेट काटकर परिवार चलाना पड़ रहा है. यह हालत किसानों की ही नहीं मध्यमवर्ग की भी है. जिस तुलना में महंगाई सुरसा के मुंह के समान फैल रही है उस परिणाम में न तो वेतन बढ़ रहा है और न ही महंगाई भत्ता मिल पा रहा है. महंगाई भत्ते की गणना न जाने किस गणित से की जाती है कि दो जमा दो, एक ही हो रहा है. कहना चाहिये कि आज के बाजारवाद के युग में अवाम की खरीदने की क्षमता लगातार घटती जा रही है.
दूसरी तरफ सरकार एवं निजी क्षेत्र देश के बेरोजगारों को रोजगार देने में अक्षम हैं. इन सब के बीच में पैसा कहां से आयेगा यह यक्ष प्रश्न सभी को परेशान कर रहा है.
ऐसे हालात में बड़े कारोबारियों के लिये अपना मुनाफा बरकरार रखने के लिये बिक्री बढ़ाना भी संभव नहीं है. इसका हल निकाला गया है कि प्राकृतिक संशाधनों पर कब्जा करके अपने परिसंपत्ति को बढ़ाया जाये. हमारे देश के लिये प्राकृतिक संशाधनों का अर्थ कोयला, पानी तथी कृषि योग्य जमीन है.
आज जो कांग्रेस भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रही है कल उसी ने देश के बहुमूल्य कोयले को पानी के भाव बड़े घरानों की मिल्कियत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. आज जब एनडीए सरकार इसकी नीलामी कर रही है तो जिंदल जैसे घराने उसके नीलामी में फिक्सिंग करने से बाज नहीं आ रहें है.
हम बात कर रहें थे औने-दाम पर भूमि अधिग्रहण कर अपनी संपत्ति बढ़ाने की जिसमें दो फसली जमीने भी शामिल हैं. इससे कारोबारियों को दो फायदा होने जा रहा है. एक तो उनकी परिसंपत्ति में इज़ाफा हो रहा है दूसरे गांव में किसानों की जमीन ले लेने से वे बेरोजगारों की फौज में शामिल हो रहें हैं जो देर सबेर कम मेहताने पर उद्योगों में काम करने के लिये मजबूर हो जायेंगें. आखिरकार मुआवजा जितना भी मिल रहा हो उससे एक पीढ़ी का भी गुजारा नहीं चलने वाले जबकि जमीन पीढ़ियों से परिवार का पेट भरती आई हैं. मुआवजे की रकम फिर से उन कारोबारियों के पास दूसरे सामान जैसे टीवी, फ्रिज तथा विलासिता के सामान की खरीद में वापस चले जानी है.
छत्तीसगढ़ के भूमि अधिग्रहण का नमूना देख लीजिये. सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, “मंत्रि-परिषद ने भू-अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम की धारा-10 पर विचार किया. विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि भू-अर्जन के प्रकरणों में राज्य को इकाई माना जाए और राज्य के कुल सिंचित बहु-फसली भूमि के कुल रकबे के मात्र दो प्रतिशत तथा कुल शुद्ध बोआई क्षेत्र के एक प्रतिशत का ही भू-अर्जन किया जाए.”
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में करीब 57 लाख हेक्टेयर में कुल बुआई होती है. जिसका अर्थ है कि छत्तीसगढ़ में 142.5 लाख एकड़ भूमि में फसले उगाई जाती हैं. यदि इसके एक फीसदी को लिये गये निर्णय के अनुसार अधिग्रहित करने दिया जाये तो छत्तीसगढ़ में करीब 1.425 लाख एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जा सकेगा.
छत्तीसगढ़ में नदियों के पानी को किसानों की जमीन को सिंचित करने से पहले ही उद्योगों को दे दिया जा रहा है. जिसके लिये उद्योग पूरा भुगतान नहीं करते है. छत्तीसगढ़ में कई नदियों पर निजी जमींदारी दी जा रही है. निजी कंपनियों को मनमाना पानी उपलब्ध कराने के लिए नदियों पर बैराज बन रहे हैं. बैराज बनाते ही मूल धारा से पानी गायब हो जाता है. आम लोगों की जिंदगी मुश्किल होती जा रही है. अब राज्य की हर छोटी-बड़ी नदी पर बांध बनाए जा रहे हैं और इन नए बांधों का उद्देश्य सिंचाई के लिए पानी नहीं उपलब्ध कराना है बल्कि औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाना है. किसानों का पानी छीनकर औद्योगिक घरानों को जल सुरक्षा दी जा रही है.
छत्तीसगढ़ में पानी से जुड़ी सरकारी प्राथमिकताओं का यह बदलाव ग्रामीण इलाकों में कृत्रिम जल संकट पैदा कर रहा है. इस खतरनाक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं. पानी की कमी के कारण छत्तीसगढ़ की उपजाऊ भूमि से फसल लेना मुश्किल होता जा रहा है. उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ के सबसे सिंचित जिला चांपा-जांजगीर में जिस तरह से पॉवर प्लांट खड़े किये जा रहें हैं, जमीन अधिग्रहित की जा रही है, उद्योगों को पानी दिया जा रहा है उससे आने वाले समय में फसले कम और प्रदूषण ज्यादा रहा जायेगा.
ऐसा नहीं है कि केवल हमारे प्रदेश या देश में ही प्राकृतिक संशाधनों पर कब्जा करने की मुहिम चल रही है. विदेशों में भी तेल को लेकर इसी तरह की जंग छिड़ी हुई है. साल 2012 में अमरीकी सेना की टुकड़िया सद्दाम हसैन के राज को नेस्तनाबूद करने के बाद वापस चली गई लेकिन वापस जाने से पहले उसने वहां के तेल के अकूत भंडार पर अमरीकी, ब्रितानी तथा फ्रांस की तेल कंपनियों की हुकूमत कामय कर दी थी. सवाल यह उठता है कि इराक युद्ध से किसने पाया और किसने खोया?
इस युद्ध का खर्चा किसने उठाया ? किसे जन हानि हुईं? यदि आप गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि दीवाल पर लिखा है- अमरीकी प्रशासन ने अमरीकी कर दाताओं के पैसे से ईराक पर कब्जा जमाया एवं अमरीकी तेल कंपनियों को फायदा पहुचाया. ये खरबों डालर आम अमरीकी जनता की गाढी कमाई से आया था लेकिन इनका युद्ध में निवेश कर तेल कंपनियां आज भी खरबों डालर कमा रही हैं.
उद्योग जरूरी हैं परन्तु किसानों की उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण करके यदि इनकों लगाया जाता है तो आने वाले समय में इससे देश के सामने ऐसा खाद्य संकट उत्तपन्न हो जायेगा जिसकों हल करना मुश्किल होगा.
प्राकृतिक संशाधनों का प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ने का नतीजा देश के लिये भयावह होगा. इससे एक तरफ तो गरीबी बढ़ेगी दूसरे तरफ कुछेक घरानों की संपत्ति में अकूत इजाफ़ा होने जा रहा है. भूमि अधिग्रहण का सामाजिक-आर्थिक पहलू यही है.
मामला कुल मिलाकर व्यवस्था का है. इसके पास लोगों को रोजगार मुहैया कराने की कूवत नहीं है, वेतन देने की औकात नहीं है, शिक्षा तथा स्वास्थ्य को इसने एक महंगे जिंस के रूप में तब्दील कर दिया है. जिसे खरीदना हर किसी के वश की बात नहीं है. यह तो केवल प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण कर हालिया तौर पर अपनी भूख मिटा रहा समस्या का स्थाई समाधान इसके पास नहीं है. कुल मिलाकर व्यवस्था गर्भवती महिला के शरीर के समान बेढ़ंगा हो गया है जो नये के जन्म का पूर्व संकेत है.