Thursday, April 27, 2017

MHA’s Linking Niyamgiri’s Dongria Kondh Tribals with ‘Maoists” Strongly Protested

MHA’s Linking Niyamgiri’s Dongria Kondh Tribals with ‘Maoists” Strongly Protested

Written by Sabrangindia Staff | Published on: April 19, 2017

The petition urges the MHA to retract the statements made about the NSS in its report, to stop the intimidation of the adivasis and attempts to restart the mining, and to allow the Dongria Kondh and other communities of the Niyamgiri hills to live a dignified life of self-determination for their present and future.



Image: Business Today

 
Leading citizens, lawyers and activists have strongly protested the Ministry of Home Affairs, which has linked the Niyamgiri Surakshya Samiti (NSS) with ‘Maoist’ organisations. The Annual report (2016-17) of the MHA states that Maoists ‘guide’ the activities of the NSS. A strongly worded petition addressed to the president, Pranab Mukherjee, prime minister, Narendra Modi , the ministry of tribal affairs and the chief minister of Orissa, Naveen Patnaik has protested this stand of the MHA.

The Niyamgiri Surakshya Samiti is a collective of the Dongria Kondh tribal people and other local communities who have been organizing themselves against bauxite mining in Niyamgiri hills (Odisha), which is their only home, for more than a decade.

The petition raises a pertinent issue of whether, the continued targeting of the Dongria Kondh community (with a population of less than ten thousand people) in reports like these (and in continued state actions on the ground) raises serious doubts: is this being purposely done to break their continued resolve to oppose the mining of the Niyamgiri hills, and fragment their movement?

Further, the petition sees as devious the attempts by the state government to surreptitiously introduce the proposal to start mining from the backdoor, despite the Supreme Court having ordered that the Dongria Kondh need to be consulted about mining in the region in April 2013. Following the Supreme Court order, “and the complete and overwhelming rejection by the Dongria Kondh gram sabhas of the mining in the hills thereafter, “ the petition observes that these backdoor efforts continue. Recently, the Odisha Mining Corporation filed a petition in the Supreme Court to reopen the mining. The Supreme Court has refused to admit the petition and has asked the government to make the 12 gram sabhas that had earlier rejected the mining parties in the petition.

Besides, apart from these attempts, there has been constant intimidation and violence on the community by security forces. In the last 2-3 years, several Dongria Kondh youth and elders have been arrested, harassed, and killed, and one has committed suicide after repeated harassment and alleged torture by security forces. In none of these cases, have the forces been able to produce evidence linking them to so-called Maoists. One young adivasi was charged with arson, murder, attacking security forces, etc, and with absconding … the last one a blatantly false claim given that he was picked up from the main market of Muniguda town! 

The Ministry of Home Affairs appears to have ignored the overwhelming response of the Dongria Kondh, when Maoist organisations told them to oppose or boycott the gram sabha meetings organised by the state at the behest of the Supreme Court order of April 2013. Hundreds of Dongria Kondh had flocked from village to village to take part in the meetings, openly defying this call[1][1].

The Government should also pay heed to the wisdom of the Supreme Court expressed in the case of Nandini Sundar and Ors vs The State of Chhattisgarh (Writ petition no 250/2007), also referred to as the Salwa Judum Judgement. In this reiterated that the current social order which treats any person speaking for human rights and questions the current paradigm of the State, as a maoist or a maoist sympathiser, has become a serious problem affecting our nation and that any peaceful dissent or dissatisfaction which is a positive feature of democracy, is often not recognized by the authorities and is met with severe repression.

The petition urges the authorities to use their responsibility of upholding the Constitution, and in particular the safeguards for Adivasis contained in it, to direct the MHA to retract the statements made about the NSS in its report, to stop the intimidation of the adivasis and attempts to restart the mining, and to allow the Dongria Kondh and other communities of the Niyamgiri hills to live a dignified life of self-determination for their present and future.

नर्मदा डूब प्रभावितों की विशाल चुनौती रैली, 4 मई 2017 को भोपाल चलो संघर्ष संवाद


नर्मदा घाटी से लाखों की पुकार। डूबे नहीं मानव अधिकार।

नर्मदा डूब प्रभावितों की विशाल चुनौती रैली, 4 मई 2017 को भोपाल चलो

 संघर्ष संवाद


4 मई : भोपाल मे विशाल चुनौती : विस्थापन और विकास पर मध्य प्रदेश शासन से सवाल।

नर्मदा घाटी के लोग सरदार सरोवर बाँध के सभी पहलुओं पर 31 सालों के संघर्ष के बाद अभी भी गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं। हमारे कई समर्थक, देश भर में फैले सहयोगी, सभी न जाने क्या सोच रहे हैं! कईयों को लगता होगा, बाँध तो पूरा हुआ और सर्वोच्च अदालत के अभी अभी (8.2.2017) घोषित हुए फैसले ने विस्थापित किसानों को प्रत्येक 60 लाख रुपये दिए तो पुनर्वास भी पूरा हुआ! लेकिन यह सही नहीं है। आज फिर से लड़ाई चोटी पर पहुंची है।

नरेन्द्र मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनते ही गुजरात के पक्ष में बाँध की ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय लिया और कार्य पूरा भी कर दिया, बस 17 मी. के गेट्स बंद करना बाकी है। बाँध की ऊंचाई 2006 में 122 मी. पर इसलिए रोकी गयी थी क्योंकिहजारों परिवारों का पुनर्वासतो हुआ किन्तु हजारों हज़ार का अभी भी बाकी है।लगभग 40,000 से 45,000 परिवार डूब क्षेत्र में ही बसे हैं, जो विशेषतः मध्य प्रदेश के निमाड़ के गाँवों में है। महाराष्ट्र और गुजरात के भी मूल गाँवों  और  बसावटों में बसे हुए परिवारों का संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ है,तथा सैकड़ों का पुनर्वास बाकी है।

मध्य प्रदेश के गाँवों में हजारों घर, केला, पपीता, कपास, गन्ना, सोयाबीन, गेंहू, मकई, सब्जियों के साथ हजारों हेक्टेयर खेत, गाँव - गाँव में शालाएं, धर्मशालाएं, मंदिर-मस्जिदें, सब होते हुए, राज्य शासन ने केंद्रीय प्राधिकरण से जुड़कर,‘पुनर्वास पूरा हुआ’, यह झूठा दावा अपने हलफनामों से सर्वोच्च अदालत में पेश किया। बाँध की ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय, नर्मदा ट्रिब्यूनल फैसला, जो कानून है, और सर्वोच्च अदालत के ही कई आदेशों का उल्लंघन है, इस बात पर सुनने से स्वयं सर्वोच्च न्यायाधीश ने ही 2014 में नकार दिया है।

अब 2017 में न्यायाधीश खेहार की खंडपीठ ने कुछ सुनवाई की लेकिन वह भी परिपूर्ण नहीं हो पायी! अदालत ने माना कि मध्य प्रदेश सरकार के दावों में सच्चाई नहीं है, फिर भी मध्य प्रदेश सरकार ने शपथ पत्रों में गलत आंकडें पेश किये। तीन राज्यों के, करीबन 15000 परिवारों ने, नगद राशि न लेते हुए, कृषिभूमि ली है, यह बात अदालत तक नहीं पहुंचायी। हजारों महिला खातेदारों को भूमि के अधिकार से वंचित रखना; 2002 और 2005 में भूमि न देते नगद राशि देने की योजना से 1589 फर्जी रजिस्ट्रियों का तथा भूमिहीनों को आजीविका के बदले अनुदान और पुनर्वास स्थलों का निर्माण जैसे हर कार्य में हुआ करोड़ों का भ्रष्टाचार; 15946 परिवारों को,आधे लाभ देने के बाद बैकवाटर लेवल्स, अवैज्ञानिक, गैर कानूनी आधार पर बदलकर डूब क्षेत्र से बाहर बताना आदि गंभीर हकीकत अदालत तक सही रूप से पहुँचने व उनपर बहस होने नहीं दी!

आन्दोलन ने पिछले 31 सालों में लड़कर, कानून, नीति और जन अधिकारों को मैदानी तथा कानूनी संघर्ष से आगे बढ़ाया। सह-खातेदारों को व वयस्क पुत्र/पुत्री को स्वंतंत्र परिवार मानकर प्रत्येक की 5 एकड़ जमीन पायी। तीनों राज्य और केंद्र शासन को विस्थापितों के पुनर्वास के मुद्दे पर कार्यरत रहना पड़ा। जमीन देने के बदले हुआ रजिस्ट्रियों का फर्जीवाड़ा और पुनर्वास स्थलों पर निर्माण कार्य में हुए 1500 करोड़ रुपये के भष्टाचार की जाँच करवाई। न्या. झा आयोग के द्वारा 7 सालों के बाद प्रस्तुत किये रिपोर्ट पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में शासनकर्ताओं ने सुनवाई नहीं होने दी । रिपोर्ट से स्पष्ट होता है  की संपूर्ण भ्रष्टाचार के लिए नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधिकारी और दलालों का मजबूत गठजोड़ मुख्यतः जिम्मेदार है। फिर भी कुछ 150 विस्थापित और बेगुनाह भूमि विक्रेताओं को शासन ने जेल में डाला। आखिर में सर्वोच्च न्यायाधीश ने भ्रष्टाचार संबंधी सभी सिविल व अपराधी प्रकरण अदालत से ही रद्द घोषित किये। फिर भी मध्य प्रदेश शासन ने ना सिर्फ अधिकारियों और दलालों को मात्र बचाया; विस्थापित अभी तक जमानत के चक्कर में फँसे हैं। न्यायलायीं आदेशों की अवमानना मध्य प्रदेश शासन का गुण-धर्म है!
    
फैसला ही न्याय!

इस स्थिति में सर्वोच्च न्यायाधीश की खंडपीठ ने जल्द गति से सुनवाई के बाद 8 फरवरी 2017 के रोज फैसला दिया। उन्होंने कहा, ‘अब संघर्ष खत्म होना जरुरी है। दोनों पक्षों का नुकसान हो रहा है (सरकार और विस्थापित) तो कानून को बाजू में रखकर रास्ता निकालना होगा’। शासन के आंकड़े अंदाजित मानते हुए अदालत ने 681 किसानों को 5 एकड़ कृषि भूमि खरीदने के लिए मध्य प्रदेश शासन के 5.58 लाख रुपये के पैकेज के बदले 60 लाख रुपये मंजूर किये। प्रत्यक्ष में यह संख्या हजारों की है और न्यायमूर्ति जी ने छूटे हुए परिवारों को शिकायत निवारण प्राधिकरण से मंजूरी लेने को कहा है। फर्जीवाड़े में फसायें गए 1358 परिवारों को 15 लाख रुपये प्राप्त राशि उसी में से काटकर। 5.58 लाख रुपये के पैकेज की दोनों किश्त (पूरी राशि) सालों तक रूककर आखिर दलालों तथा अधिकारियों के दवाब में ले चुके सैकड़ों विस्थापितों को कोई नई राशि नहीं दी। 60% जनसँख्या भूमिहीन, कृषि से अलग व्यावसायिकों, मछुआरें, कारीगर, मजदूर, कुम्हार, व्यापारीइत्यादि होते हुए उन्हें नहीं बक्शा गया| डूब क्षेत्र में हजारों परिवार, करीबन 2-2.5 लाख होते हुए, 31.7.2017 को बाँध के गेट्स बंद करना मंजूर करते हुए लोगों को नगद राशि लेने के पहले वचनपत्र के द्वारा 31 जुलाई के पूर्व भूमि छोड़ने की शर्त मानने का आदेश है। डूब क्षेत्र में 31 जुलाई के बाद कोई व्यक्ति बचने पर राज्य शासन को बलपूर्वक हटाने की भी मंजूरी दी गयी है। क्या न्यायपूर्ण पुनर्वास, पुनर्वास स्थलों पर सुविधायें, पात्र परिवारों को जमीन, भूमिहीनों हो आजीविका के साथ इस अंतिम तिथि के पहले होगा?

फैसले के बाद नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और मध्य प्रदेश शासन ने शपथपत्रों द्वारा दी हुई संख्या बिलकुल अपूर्ण होने के कारण आन्दोलन से सूचियाँ मांगी। लेकिन पहले सूची नहीं हैकहकर, फिर 681 के बदले मात्र 608 की सूची देकर कहा, यह बदल सकती है। प्रत्यक्ष में कुछ और सैकड़ों याहज़ार विस्थापित पात्र होंगे, उनके बारे में अभी निर्णय बाकी है। पुनर्वास स्थलों पर निर्माण / सुधार के आदेश, विस्थापितों द्वारा दर्ज की हुई शिकायतों पर शिकायत निवारण प्राधिकरण जवाब कब देगा और न.घा.वि.प्रा. कार्य कब करेगा? भ्रष्टाचारी इंजिनियर तो हटाये गए लेकिन कम गुणवत्ता के उनके कार्य को सुधारना तो आजतक शुरू नहीं हुआ, पूरा होगा तो कब? डूब क्षेत्र में ही रहनेवाले हजारों परिवार उन स्थलों पर या जहाँ जमीन खरीदेंगे, वहाँ घर बांधेंगे कब? मूल गाँवों में सभी सांस्कृतिक, सामजिक, धार्मिक स्थलों का स्थानांतरण, नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले अनुसार होगा कब? मकान बांधना संभव नहीं, क्यूंकि 2000 के पहले था, तत्काल बाद कम से कम मुआवजा देकर, आजतक काली कपास की मिटटी के बहुतांश स्थलों पर नींव तक नहीं बाँध पाएं हैं, न पायेंगे, 60% से अधिक परिवार। इसीलिए तो कई स्थल खाली हैं, निमाड़ के गाँव भरपूर जनसँख्या के साथ जीवित! इन गाँवों में पूर्ण क्षेत्र अनुसूचित जनजाति का होने के कारण ‘पेसा’ कानून लागू हैं, पर सुनता हैं कौन? ग्रामसभाओं के प्रस्तावों को मानता हैं कौन?

सच तो यह है कि 2013 के नये भू-अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) के तहत जैसे याचिकाओं में विस्थापित परिवारों को घर / संपत्ति से हटाने या डूबाने से मनाही की है, उच्च न्यायालय के आदेशों से। यह अधिकार तो डूब क्षेत्र के सभी गाँवों के, न डूबे हो ऐसे सभी मकान, भूमि और संपत्ति के मालिक फिर बन गए हैं किसान व आम नागरिक जिन से आजतक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने कब्ज़ा नहीं लिया। क्या ये हक भी डूबायेंगें शासनकर्ता या 2013 कानून का पालन करके कम से कम उन्हें पर्याप्त मुआवजा देंगे ताकि वे नई जगह बच्चे-बूढ़ों के साथ बस सकें। क्या इस स्वतंत्र कानूनी दायरें में, न्याय पायेंगे विस्थापित? यह सब लेकर बड़े, छोटे गाँव भी खाली होंगे, 31 जुलाई के पहले?

गुजरात सरकार न अपने संघर्ष पर उतरे आदिवासियों को जवाब दे रही है ना ही किसे कितना लाभ, किसानों को या कंपनियों को यह भी स्पष्ट करना टाल रहीं है। कोका कोला इत्यादि को पानी देने बाद अब अम्बानी, अदानी, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में पानी पहुंचाना है। महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश को एक बूँद पानी पर अधिकार नहीं, मात्र 27% व 56% बिजली मिलनी हैं, वह भी नहीं मिली है इसलिए तो महाराष्ट्र मांग रहा है, 1800 करोड़ रुपये की नुकसान भरपाई। मध्य प्रदेश शासन इसपर भी चुप है।

‘नर्मदा सेवा’ के नामपर ‘मेवा’

यह सब होते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, ‘नर्मदा सेवा’ का नर्मदा की रक्षा का नाम लेकर घूमते रहे हैं नर्मदा घाटी में। इस यात्रा के दौरानकरोड़ों रुपये खर्च करके चली यात्रा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी ने एक भी डूब क्षेत्र में गाँव के विस्थापितों को याद नहीं किया, न ही विस्थापन पर कोई बात की। वे डरकर या भ्रष्टाचार छिपाने के लिए टाल गए। लेकिन उन्हीं की सरकार, यात्रा में जहाँ आरती उतारी, जहाँ भोजन किया, जहाँ करोड़ों रुपये खर्च कर आमसभा में मुख्यमंत्री पधारे, जहाँ सवाल उठाते ही गिरफ्तारी की, उन्हीं को डूबाने में, 31.7.2017 को बाँध के गेट्स बंद करने की मंजूरी देने में मध्य प्रदेश शासन क्या कुछ सोचेगी या नहीं?

आन्दोलन यह चुनौती स्वीकारता है। यह नदी को मानव क्या, माता ही मानकर आजतक बचाती आई नदी घाटी की जनता पर आक्रमण है। यह विकास के नाम पर हिंसा है।

इस भ्रष्टाचारी, अत्याचारी विकास पर सवाल उठाने, नर्मदा के 31 सालों से संघर्षरत विस्थापितों ‘न्याय लेके रहेंगे’ की आवाज उठाने हजारों लोग भोपाल पहुंचेंगे।

4 मई, 2017 के रोज भोपाल में आप जरुर पधारें। विविध जनसंगठन जो 31 सालों से हमारे संघर्ष के साथी, सहयोगी रहे सभी को यह एलान है। विकास की चुनौती लेकर शोषक शासनकर्ताओं को चुनौती देने के लिए साथ रहे जरुर। इस कार्यक्रम का ब्यौरा आप तक जल्द ही भेजेंगे। आप के अधिकतम व्यक्तियों के साथ आने की खबर करें।

आपके विनीत,

भागीरथ धनगर, बालायादव,  पेमा भिलाला,  कमला यादव, देवराम कनेरा, श्यामा मछुआरा,  रमेश प्रजापति, सनोबरबी मंसूरी,  मोहन पाटीदार, देवेंद्र तोमर,  सरस्वती, बाबु भाईबलाई,  मुकेश भगोरिया,पवन यादव,  राहुल यादव,  मेधा पाटकर

संपर्क: 091 79 617513/ 9826811982/ 9423965153

ब्राजील : अपनी जमीन बचाने संसद में घुसे आदिवासियों पर पुलिस ने फेंके आंसू गैस के गोले

ब्राजील : अपनी जमीन बचाने संसद में घुसे आदिवासियों पर पुलिस ने फेंके आंसू गैस के गोले


26 अप्रैल 2017 के दैनिक हिंदुस्तान में छपी खबर के अनुसार अपनी जमीन के लिए सड़क पर प्रदर्शन कर रहे ब्राजील के अमेजोनियन आदिवासी के लोग तीर-कमान लेकर पुलिस से भिड़ गए। इसके अलावा कई आदिवासियों ने गुलेल लेकर पुलिस पर हमला कर दिया। ये सभी पुलिस द्वारा छोड़े गए आंसू गैस के गोलों से नाराज थे। एक अंग्रेजी वेबसाइट में छपी खबर के अनुसार, बड़ी संख्या में आदिवासी ब्राजील की राजधानी ब्राजीलिया में प्रदर्शन कर रहे थे। अपनी जमीन वापस लेने के अलावा इन आदिवासियों की मांग प्रशासन द्वारा उनको और अधिक अधिकार दिए जाने की थी। प्रदर्शन में तमाम आदिवासी ताबूत को भी लेकर पहुंचे थे।

58 वर्षीय इतिहासकार मारजी डी ओलीवेरा का कहना है कि ये ताबूत बीते कुछ सालों में 305 जातीय समूह के आदिवासियों की हुई मौतों का प्रतीक है। वहीं, प्रदर्शनकारियों ने जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस के साथ हुई इस भिड़त में चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। हालांकि, पुलिस ने इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी। इस जुलूस की कोऑर्डिनेटर सोनिया गुआजाजारा ने बताया कि इस प्रदर्शन में तकरीबन 4000 लोग शामिल हुए। वहीं, पुलिस ने बयान जारी कर कहा है कि प्रदर्शनकारियों ने अपनी सीमाओं को लांघा है। उन्होंने पुलिस के साथ किए गए समझौते का पालन नहीं किया। वे लगातार आक्रमण की धमकी दे रहे थे। 

यह युद्ध थमना चाहिए क्योंकि इसमें जीत किसी की नहीं: बेला भाटिया

यह युद्ध थमना चाहिए क्योंकि इसमें जीत किसी की नहीं: बेला भाटिया

महताब आलम| Updated on: 26 April 2017, 18:03 IST






सोमवार की दोपहर छत्तीसगढ़ के सुकमा में माओवादियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 26 जवानों की हत्या कर दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हमले को ‘कायराना और भयावह ’ कहा है. वहीं कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों ने भी माओवादियों की इस कार्रवाई पर सख़्त नाराज़गी जताई है.

भारत के सबसे बड़े मानवाधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता समूह (पीयूसीएल) ने जवानों पर हमले को ‘बर्बरतापूर्ण कार्रवाई’ करार दिया है और उस पर नाराज़गी जताई है. संगठन की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष डॉ. लाखन सिंह और महासचिव सुधा भारद्वाज ने कहा, छत्तीसगढ़ पीयूसीएल माओवादियों द्वारा 24 अप्रैल को सुकमा जिले में चिंतागुफा थाना क्षेत्र में हुए हमले की कड़ी निंदा करता है. साथ ही 25 जवानों के मारे जाने पर शोक व्यक्त करता है, जो कि ज्यादातर गरीब परिवारों के युवा सदस्य थे.
बस्तर के विशेष जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने भी हमले की निंदा करते हुए मृतकों के परिजनों को एक-एक करोड़ का मुआवजा देने की मांग की है. साथ ही उन्हें मृतकों को शहीद घोषित करने की भी मांग की है. उन्होंने ट्वीट करके लिखा ‘‘मैं सुकमा में माओवादियों द्वारा सीआरपीएफ के 24 जवानों की हत्या किए जाने की निंदा करता हूं. मैं प्रत्येक मृतक के लिए 1-1 करोड़ रूपए के मुआवजे और उन्हें शहीद घोषित करने की मांग करता हूं.’’


सरकारी नीति में हो बदलाव


डीयू प्रोफेसर और ‘द बर्निंग फॉरेस्टः इंडियाज वार इन बस्तर’ की लेखिका नंदिनी सुंदर ने कैच न्यूज को कहा, सुकमा में निर्दोष जवानों की बेवजह मौत का बेहद दुख है. आखिर सरकार कब यह स्वीकार करेगी कि उग्रवादियों के खिलाफ उसकी नीति नाकारा साबित हुई है? उन्होंने कहा, ‘अगर 5 पुलिस थाने ओर सीआरपीएफ की 15 बटालियनें मिल कर भी हालात पर काबू नहीं रख पा रही हैं तब तो कम से कम सरकार को यह मान लेना चाहिए कि लोगों को उनके अधिकारों से अवगत करवाने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

आदिवासियों के लिए काम कर रहीं बस्तर निवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी ने दंतेवाड़ा से फोन पर कैच न्यूज को कहा ‘‘मुझे इस घटना से काफी सदमा लगा है. ऐसी घटनाएं तुरंत रोकी जानी चाहिए.’’ सोरी ने कहा, बंदूकों के बल पर क्षेत्र में सामान्य हालात बहाल नहीं किए जा सकते. ‘‘ आदिवासी समूहों, सिविल सोसायटी संगठन और राजनीतिक दलों के सहयोग से तुरंत शांति प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए.’’ कुछ लोगों का कहना है यह सब कुछ इसलिए हुआ है क्योंकि बस्तर के आईजी एसआरपी कल्लुरी का तबादला हो गया है, मगर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि उनके कार्यकाल में ही आदिवासियों के साथ रेप हुआ और उनकी हत्या की गई.’’

आत्म समर्पण कर चुके माओवादियों संबंधी सरकारी नीति पर सवाल उठाते हुए सोरी ने कहा, ‘‘एक ओर तो सरकार मानवाधिकार कार्यर्ताओं पर जरूरत से ज्यादा संदेह कर उन्हें ‘माओवादी’ घोषित कर रही है और दूसरी ओर यह उन्हीं लोगों पर अत्यधिक भरोसा कर रही है, जो कुछ समय पूर्व तक सरकार के दुश्मन माने जाते थे. आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.’’


थमना चाहिए ये युद्ध


करीब दो दशकों से बस्तर में काम कर रहे गांधीवादी विचारक हिमांशु कुमार ने कहा, दरअसल इस तरह की घटनाएं हमारी सरकार द्वारा एक कमजोर वर्ग को दूसरे के सामने लाकर खड़ा कर देने का नतीजा है. जितना अधिक ये घटनाएं जारी रहेंगी, आदिवासी और आम सुरक्षा बलों के जवान मारे जाते रहेंगे.
हिमांशु कुमार के मुताबिक अगर सरकार वाकई में हिंसा का दुष्चक्र रोकना चाहती है तो उसे प्राकृतिक संसाध्नों पर आदिवासियों को उनका हक देना होगा. वह उन्हें उनकी आजीविका के प्रमुख स्रोत जमीन, पानी और जंगल से दूर नहीं कर सकती. पीयूसीएल ने भी अपने बयान में यह कहा, हिंसक घटनाओं में कमी लाने के लिए सरकार को आदिवासियों के हितों की रक्षा करने वाले कानून पेसा व वन अधिकार कानून कड़ाई से लागू करने होंगे ताकि आदिवासी और जनजातीय लोग सरकार पर भरोसा कर सकें.

उन्होंने कहा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, कल्याणकारी गतिविधियां, न्याय और पहचान मिलने की संभावना, लोक प्रशासन की बहाली (कुछ अंदरूनी इलाकों में सुरक्षा बल लोक प्रशासन के विरोध में हैं), इसके अलावा सर्व आदिवासी समाज या अन्य स्थानीय आदिवासी संगठनों द्वारा उठाई जाने वाली मांगें पूरी करना इस समस्या के राजनीतिक समाधान हो सकते हैं.

बार-बार माओवादियों की ‘समर्थक’ बताई जाने वाली बस्तर की एक शोधकर्ता बेला भाटिया ने कहा, ‘‘यह युद्ध समाप्त होना ही चाहिए. बहुत मार-काट हो चुकी. दोनों ही पक्षों को कुछ हासिल नहीं हुआ. दोनों पक्षों की गतिविधियों से समाज तरक्की करने के बजाय कहीं बहुत पीछे रह गया.’’

बेला भाटिया ने कहा, ‘‘बस्तर की जनता की भलाई के लिए युद्ध विराम का आह्वान करना होगा और दोनों पक्षों को इसका सम्मान करना चाहिए. दोनों ही पक्षों को राजनीतिक समाधान निकालना होगा. आम नागरिक को इस युद्ध का मूक दर्शक बनकर चुप नहीं बैठना है, जिसका कोई मकसद नहीं है और कोई इसमें जीतने वाला नहीं है.’’
First published: 26 April 2017,

ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है - वर्षा डोंगरे ,पुलिस अधिकारी

वर्षा डोंगरे की रिपोर्ट भी कह रही संविधान को मानने ,नागरिक अधिकार बहाली और आदिवासियों का विश्वास जीतकर ही बस्तर में हिंसा को ख़त्म किया जा सकता है
छत्तीसगढ़ में तैनात सुरक्षा बल जंगलों में जाते हैं, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार करते हैं,
जंगल में लड़कियों के स्तनों को दबा कर दूध निकाल कर सिपाही जांच करते हैं कि लडकियां शादी शुदा हैं कि नहीं ?
थानों में लड़कियों को नंगा रखा जाता है बिजली से उनके स्तन जलाए जाते हैं ?
राष्ट्रीय मानवाधिकार जांच करता है और इसे सच घोषित करता है,
लेकिन आप इसे मानने के लिए तैयार नहीं हैं,
क्योंकि आप शहर में बैठ कर हराम की खा रहे हैं,
अगर सिपाही गाँव और जंगल से लूट कर नहीं लायेंगे तो आप शहर में बैठ कर क्या खायेंगे ?
आप एक हिंसक और लुटेरी अर्थव्यवस्था और राज्य व्यवस्था का समर्थन कर रहे हैं,
हिंसा का समर्थन मत कीजिये, अपनी हिंसा का भी समर्थन मत कीजिये,
जिसमें दम हो आये हमारे साथ हम एक अहिंसक और शांतिप्रिय समाज बनाने का रास्ता जानते हैं,
इसके साथ रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे का स्टेट्स शेयर कर रहा हूँ जिन्होंने जेल में ऐसी जलाई गयी आदिवासी लड़कियों को देखा है जिनके स्तनों को थानों में बिजली से जलाया गया है "

मगर मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुदबखुद सामने आ जाऐगी... घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं...भारतीय हैं । इसलिए कोई भी मरे तकलिफ हम सबको होती है । लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना... उनकी जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाऐं नक्सली है या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दुध निकालकर देखा जाता है । टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का.... 
आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ... ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता ।
मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था । उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैने स्वयं देखे । मैं भीतर तक सिहर उठी थी...कि इन छोटी छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए...मैनें डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा ।
हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें...।
इसलिए सभी को जागना होगा... राज्य में 5 वी अनुसूची लागू होनी चाहिए । आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए । उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे । आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं । हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक... पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे ...किसान जवान सब भाई भाई है । अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा...। संविधान में न्याय सबके लिए है... इसलिए न्याय सबके साथ हो... 
हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए... लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं । लेकिन हमने इनके सारे ईरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई... आगे भी होगी ।
अब भी समय है...सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे ।
ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे....
जय संविधान जय भारत

Varsha Dongre

सेना के जवान हमारे दुश्मन नहीं: माओवादी- बीबीसी

सेना के जवान हमारे दुश्मन नहीं: माओवादी

छत्तीसगढ़इमेज कॉपीरइटCG KHABAR
सोमवार को छत्तीसगढ़ के सुकमा में 25 जवानों के मारे जाने के बाद माओवादियों ने कहा है कि वे हिंसावादी नहीं हैं.
माओवादियों ने मीडिया में आई उन ख़बरों का भी खंडन किया है कि मारे गए जवानों के शवों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ की गई थी या कथित रूप से उनके गुप्तांग काटे गए थे.
सीपीआई माओवादी के दंडकारण्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी के प्रवक्ता विकल्प ने गुरुवार को अपने एक बयान में कहा है कि चिंतागुफा सीआरपीएफ के जवानों पर किया गया ताज़ा हमला, 11 मार्च को सुकमा ज़िले के ही भेज्जी में 12 जवानों के मारे जाने की निरंतरता है.
सुकमाइमेज कॉपीरइटCG KHABAR
विकल्प ने कहा, "हम हिंसावादी नहीं हैं, लेकिन सामंती शक्तियों, देसी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का प्रतिनिधित्व करने वाली केंद्र-राज्य सरकारों द्वारा हर पल किए जा रहे हिंसा के प्रतिरोध में और पीड़ित जनता के पक्ष में खड़े होकर अनिवार्यतः हिंसा को अंजाम देने के लिए हम बाध्य हैं."
माओवादी प्रवक्ता ने सुकमा के ताज़ा हमले को पिछले साल सुकमा में 9 माओवादियों और ओडिशा में कथित रूप से 9 ग्रामीणों समेत 21 माओवादियों की हत्या के जवाब में की गई कार्रवाई बताया है.
माओवादियों ने कहा है कि सुरक्षा बलों के मिशन 2017 को परास्त करने के लिए ही यह हमला किया गया है.
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विकल्प ने अपने बयान में कहा है कि पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के हमलों में मारे गए पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों के शवों के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं करते हैं.
विकल्प ने उन ख़बरों का खंडन किया है, जिसमें कहा गया था कि सुकमा के ताज़ा हमलों में मारे गए जवानों के गुप्तांग काट दिए गए थे.
इसके उलट विकल्प ने आरोप लगाया है कि बस्तर में माओवादियों के शवों के साथ पुलिस हमेशा दुर्व्यवहार करती रही है.
विकल्प ने महिला माओवादियों के शवों की अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए जाने और उन्हें सोशल मीडिया में प्रसारित करने का भी आरोप लगाया है.
विकल्प ने कहा, "सशस्त्र बलों के जवान व्यक्तिगत तौर पर हमारे दुश्मन नहीं हैं, वर्ग दुश्मन तो कतई नहीं हैं.''
उन्होंने कहा, ''शोषणमूलक राज सत्ता के दमनकारी राज्य मशीनरी के हिस्से के तौर पर जन दमन के औजार के रूप में वे क्रांतिकारी आंदोलन के आगे बढ़ने के रास्ते में प्रत्यक्ष रूप से आड़े आ रहे हैं.''
उन्होंने कहा, ''पार्टी, पीएलजीए, जनताना सरकारों और जनता पर हमलों को अंजाम दे रहे हैं, इसलिए अनिवार्य रूप से पीएलजीए के हमलों का शिकार बन रहे हैं."
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विकल्प ने सुरक्षाबल के जवानों से अपनी नौकरियां छोड़ कर राज्य के ख़िलाफ़ खड़े होने का आह्वान किया है.
दूसरी तरफ इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है कि सुरक्षाबल के जवानों के लगातार बढ़ते दबाव के कारण माओवादी बौखला गए हैं. मुख्यमंत्री ने सुकमा को माओवादियों की अंतिम लड़ाई करार दिया है.
मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है कि घात लगाकर हमला करना नक्सलियों की कायरतापूर्ण हरकत है. हमारे बहादुर जवानों का आमने-सामने मुकाबला करने की हिम्मत नक्सलियों में नहीं है.
उन्होंने कहा, "सुरक्षा बलों का दबाव नक्सलियों पर लगातार बढ़ रहा है. इस वजह से वे बौखला गए हैं. केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के इन जवानों ने बस्तर में जनजीवन की सुरक्षा के लिए कर्तव्य के मार्ग पर अपने प्राणों की आहुति दी है. उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी."
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