Thursday, March 23, 2017

मोहब्बत से नफरत का एजेंडा, पराजित होता भारतीय लोकतंत्र*

*दैनिक 'छत्तीसगढ़’ का संपादकीय*
23 मार्च 2017
*मोहब्बत से नफरत का एजेंडा, पराजित होता भारतीय लोकतंत्र*
उत्तरप्रदेश में नई योगी सरकार ने अपनी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र और आमसभाओं में किए गए वायदे के मुताबिक पुलिस के रोमियो दस्ते बनाए हैं जो कि लड़कियों को छेडख़ानी और प्रताडऩा से बचाने का काम करेंगे। इस कार्रवाई में दो दिक्कतें हैं। पहली बात तो यह कि रोमियो के नाम को इस तरह की बातों से जोडऩा प्रेम के महत्व को खत्म करना है, और प्रेम को अपमानित करना भी है। शेक्सपियर की कहानी में रोमियो और जूलियट के बीच शुद्ध प्रेम रहता है, किसी तरह की छेडख़ानी या ज्यादती, या जुल्म या बलात्कार जैसी कोई बात नहीं रहती है। लेकिन जिस देश की संस्कृति मूर्खों जैसा बर्ताव करने पर आमादा हो, उन्हें रोमियो-जूलियट की कहानी पढ़ाने से भी उनकी समझ में कुछ नहीं आएगा। जिस तरह प्रेम के प्रतीक वेलेंटाइन डे का विरोध भारत का एक धर्मान्ध तबका इसलिए करता है कि वह एक पश्चिमी परंपरा है, ईसाई परंपरा है, और उसे खत्म करना चाहिए। वेलेंटाइन डे को खत्म करते-करते उसके विरोधी यह भी भूल जाते हैं कि कृष्ण की कहानियों से लेकर कालीदास के साहित्य तक प्रेम और श्रंृगार रस की चाशनी बिखरी हुई है, और उसे धर्मान्ध लोग सारी मेहनत करके भी धो नहीं पाएंगे। इस देश में ऐसा बर्ताव करना कि लड़के-लड़की के बीच प्रेम अनैतिक है, अपराध है, यह एक ऐसा दकियानूसी पाखंड है जो न अपने बीते कल को मानने को तैयार है, न ही आने वाले कल पर इस जिद के बुरे असर को मानने को तैयार है, और वह आज हिंसा पर आमादा महज इसलिए है कि उसके इलाके की सत्ता से उसे ऐसी हिंसा की रियायत मिली हुई है।
हिन्दुस्तान को एक पढ़े-लिखे, जानकार, और सभ्य देश की तरह बर्ताव करना चाहिए, और सरकारों को कहीं रोमियो के नाम पर, तो कहीं मजनूं के नाम पर ऐसे दस्ते बनाने की परले दर्जे की बेवकूफी छोडऩी चाहिए जो कि इतिहास की कहानियों में प्रेम जैसी पवित्र भावना का अपमान भी है, और देश में प्रेम के खिलाफ नफरत पैदा करने का एक जुर्म भी है। एक दूसरी दिक्कत उत्तरप्रदेश में यह हो रही है कि ऐसे रोमियो दस्ते बाग-बगीचे में बैठे लड़के-लड़कियों को पकड़-पकड़कर सड़कों पर उनसे उठक-बैठक करवा रहे हैं, धमका रहे हैं, और उनको बेइज्जत कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि नौजवान पीढ़ी की भावनात्मक जरूरतों के भी खिलाफ है। यह अजीब पत्थरयुग का वक्त आ गया है जब नफरत को तो वाहवाही मिलती है, लेकिन प्रेम को पीछा करके, घेरकर मारा जाता है। हमारे हिसाब से यह मामला तुरंत ही अदालत की दखल का बनता है, और चाहे उत्तरप्रदेश हो, चाहे कोई और राज्य, ऐसी सरकारी हिंसा और अराजकता के खिलाफ अदालत को खुद मामला शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह की नैतिक-चौकीदारी के लिए पुलिस ने ऑपरेशन मजनूं चलाया है, जिनमें पुलिसकर्मी जाकर लड़के-लड़कियों को पकड़कर सजा देने का काम करते हैं। इसमें पुलिस को लड़के-लड़कियों को पीटते हुए भी कैमरे में कैद किया जा चुका है।
यह असभ्य देश अपनी नौजवान पीढ़ी को कुंठा में डालकर उसकी सभी तरह की संभावनाओं को खत्म कर रहा है। आज जब दुनिया के विकसित देश अपने लोगों के बुनियादी अधिकारों का सम्मान करते हुए अधिक से अधिक उदारता की तरफ बढ़ रहे हैं, तब कृष्ण प्रेमकथाओं के इतिहास से संपन्न यह देश यह साबित करने में जुट गया है कि इसके इतिहास में प्रेम कभी रहा ही नहीं। यह शुद्धतावादी, कट्टरतावादी, पवित्रतावादी सोच इतनी हिंसक हो चल रही है कि इसके झांसे में आकर बहुत से मां-बाप अपनी ही आल-औलाद को मारकर फेंक रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी से प्रेम हो गया। मोहब्बत के खिलाफ नफरत इस पूरे देश को ऐसा नुकसान पहुंचा रही है जो कि पीढिय़ों तक दूर नहीं हो सकेगा। उत्तरप्रदेश में इस नफरत के पीछे यह सोच भी है कि कोई मुस्लिम लड़का किसी हिन्दू लड़की को मोहब्बत के जाल में फंसाकर मुस्लिम आबादी में इजाफा न कर ले, लेकिन छांट-छांटकर ऐसी निगरानी हो नहीं सकती, और इसके चक्कर में पूरी की पूरी नौजवान पीढ़ी एक ऐसे अंत की तरफ धकेली जा रही है जिसमें वह इस देश-प्रदेश से नफरत करने लगे, और दुनिया के किसी सभ्य देश में जाकर बसने की सोचने लगे। भारत का लोकतंत्र विकसित होने के बजाय पराजित होते चल रहा है।
*-सुनील कुमार*

Wednesday, March 22, 2017

अजमेर ब्लास्ट : RSS के भावेश पटेल, देवेंद्र गुप्ता को उम्र क़ैद

अजमेर ब्लास्ट : RSS के भावेश पटेल, देवेंद्र गुप्ता को उम्र क़ैद

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जयपुर – अजमेर दरगाह ब्लास्ट केस में जयपुर की एनआईए कोर्ट ने दोनों दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनाई है। भावेश पर 10 हजार और देवेंद्र पर 5 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस मामले में कोर्ट ने आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार और स्वामी असीमानंद समेत पांच लोगों को क्लीन चिट देते हुए बरी कर दिया था। दरगाह धमाके के आरोपी देवेंद्र गुप्ता, भावेश पटेल और सुनील जोशी को दोषी करार दिया था। इनमें सुनील जोशी की मौत हो चुकी है।
इसी बीच दोनों पक्षों को दरखास्त सुनने के बाद न्यायालय ने दोनों पक्षों से नजीरें पेश करने के लिए कहा। वकीलों को 18 मार्च तक का समय दिया गया है कि वे अपनी अपनी अपीलों को लेकर नजीरें पेश करे। 18 मार्च को दोनों पक्ष ने नजीरें पेश की थी।

एक आरोपी सुनील जोशी की हो चुकी है मौत 
जयपुर में एनआईए की स्पेशल कोर्ट ने अजमेर ब्लास्ट मामले में फैसला सुनाते हुए तीन लोगों को दोषी करार दिया था। दोषी पाये गये आरोपियों में से सुनील जोशी की मौत हो चुकी है। कोर्ट ने देवेन्द्र गुप्ता, भावेश पटेल और सुनील जोशी को आईपीसी की धारा 120 बी, 195 और धारा 295 के अलावा विस्फोटक सामग्री कानून की धारा 34 और गैर कानूनी गतिविधियों का दोषी पाया है। जिन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
अदालत में सजा पर हुई बहस
इससे पहले कोर्ट में सुनवाई के दौरान सजा तय किए जाने के बिन्दुओं पर चर्चा हुई। सीआरपीसी और यूएपीए के सेक्शन को लेकर दोनों पक्षों में बहस हुई। इस दौरान कोर्ट परिसर में दोनों आरोपी देवेन्द्र गुप्ता और भावेश पटेल मौजूद रहे।
NIA और बचाव पक्ष आमने-सामने 
एनआईए के एडवोकेट अश्विनी शर्मा ने कहा कि बम ब्लास्ट मामले में मुख्य षड़यंत्रकारी में शामिल होने के कारण इन दोनों आरोपियों को अन लॉ फुल एक्टिविटीज प्रिविन्सन एक्ट की धारा 18 के तहत सजा सुनाई जाए, लेकिन बचाव पक्ष के एडवोकेट जे एस राणा का कहना था कि सीआरपीसी के सेक्शन के तहत सजा तय की जाए।
दरगाह मामले में 13 आरोपी
बताते चलें कि इस मामले में RSS से जुड़े हिंदूवादी संगठनों के 13 लोग आरोपी थे। जिनमें स्वामी असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, चंद्रशेखर लेवे, मुकेश वासनानी, लोकेश शर्मा, हर्षद भारत, मोहन रातिश्वर, संदीप डांगे, रामचंद कलसारा, भवेश पटेल, सुरेश नायर और मेहुल शामिल थे।
11 अक्टूबर 2007 को हुए थे ब्लास्ट 
बता दें कि अजमेर दरगाह में 11 अक्टूबर 2007 को हुए धमाके में तीन लोगों की मौत हुई थी और 15 लोग घायल हुए थे। इस मामले में कुल 184 लोगों के बयान दर्ज किए गए थे। जिसमें से 26 महत्वपूर्ण गवाह अपने बयान से मुकर गए थे। जिनमें एक मंत्री भी शामिल हैं।

प्रभावितो को उचित मुवावजा और पुनर्वास दिए बिना ही खनन के कार्य को आगे बढ़ाना गैरकानूनी

* प्रभावितो को उचित मुवावजा और पुनर्वास दिए बिना ही  खनन के कार्य को आगे बढ़ाना गैरकानूनी ।

* आंदोलनरत ग्रामीणों को  तत्काल रिहा करो ..
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कोरबा जिले में एस ई सी एल प्रबंधन के द्वारा प्रभावित किसान, आदिवासियों  के हकों को सुनिश्चित किये बिना ही गैर कानूनी रूप से खनन परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा हैं। जानकारी अनुसार  कोरबा जिले के  सराईपाली खुली खदान से प्रभावित ग्राम बुडबुड  में 2004 में भू अधिग्रहण किया गया और 2013 में
1,24000 प्रति एकड से दर से जमीन का मुआवजा यह कहकर गांव वालो को दिया गया कि जब भी मुआवजा राशि बढेगा....तो बढाकर दिया जायेगा। लेकिन SECL प्रबंधन ने आज तक मुआलजा राशि को नही बढाया और नही किसी को रोजगार दिया और न ही पुनर्वास हेतु अन्य जमीन । आज एस ई सी एल द्वारा
जंगल की कटाई शुरू करवा दी गई जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया। व्यापक विरोध को देखते हुए प्रबंधन के इशारे पर पुलिस द्वारा 2 ग्रामीणों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन एस ई सी एल की मनमानी और इस पुलिसिया कार्यवाही का पुरजोर विरोध करता हैं और गिरफ्तार ग्रामीणों की शीघ्र रिहाई की मांग करता हैं । इसके साथ ही जब तक बेहतर  पुनर्वास और उचित  मुवावजा का वितरण नहीं किया जाता खदान के कार्य को आगे न बढ़ाया जाए।
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 नंद कशयप ,आनंद मिश्रा
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन

छत्तीसगढ़ में कैद में है नदी -

छत्तीसगढ़ में कैद में है नदी

 March 22, 2017 cgkhabar
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छत्तीसगढ़ की नदियां,जल दिवस, शिवनाथ नदी

रायपुर | संवाददाता: नदियों को मनुष्य की तरह बताने के फैसलों के बीच छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी अपनी मुक्ति के लिये छटपटा रही है.

एक सप्ताह के भीतर नदी को मुक्त कराने के विधानसभा की लोकलेखा समिति की अनुशंसा को दस साल गुजर गये हैं लेकिन राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार उस फाइल पर कुंडली मार कर बैठी हुई है.छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी को यूं तो कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जमाने में एक निजी कंपनी को सौंप दिया गया था लेकिन तब सरकार का विरोध करने वाली राज्य की भाजपा सरकार के मुखिया रमन सिंह इस पर चुप्पी साधे हुये हैं.

छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी को गिरवी रखे जाने की फाईल छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रिमंडल में कैद है. विधानसभा की लोक लेखा समिति ने जो अनुशंसाएं की थी, उस पर विधि मंत्री और जल संसाधन मंत्री फाइल-फाइल खेलते रहे. दावा ये किया जा रहा है कि मंत्रिमंडल के निर्देशानुसार अग्रिम कार्रवाई की गई है लेकिन यह कार्रवाई क्या है, यह बताने की हालत में कोई नहीं है.

गौरतलब है शिवनाथ नदी के 23 किलोमीटर हिस्से को रेडियस वाटर नामक निजी कंपनी को 22 सालों के लिये गिरवी रखने का समझौता तत्कालीन मध्यप्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर के प्रबंध संचालक गणेश शंकर मिश्रा ने 5 अक्टूबर 1998 को किया था. देश और दुनिया भर में नदी को बेचे जाने को लेकर हंगामा हुआ. भाजपा ने भी तत्कालीन दिग्विजय सिंह और बाद में अजीत जोगी की सरकार के खिलाफ खूब हंगामा किया. इसके बाद सरकार ने मामले की जांच विधानसभा की लोक लेखा समिति से करवाने की घोषणा की. रमन सिंह की सरकार में लोक लेखा समिति ने 16 मार्च 2007 को जब विधानसभा में जांच रिपोर्ट भी पेश कर दी लेकिन पिछले 10 सालों से लोकलेखा समिति की अनुशंसा को जाने किस दबाव और प्रलोभन में आज तक दबा कर रखा गया है.

16 मार्च 2007 को लोकलेखा समिति ने तीन प्रमुख अनुशंसाएं की थीं- रेडियस वॉटर लिमिटेड के साथ मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक केन्द्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर) के मध्य निष्पादित अनुबंध एवं लीज डीड को, प्रतिवेदन सभा में प्रस्तुत करने के एक सप्ताह की अवधि में, निरस्त करते हुए समस्त परिसम्पत्तियों एवं जल प्रदाय योजना का अधिपत्य छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम द्वारा वापस ले लिया जाए.

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि- “जल प्रदाय योजना की परिसम्पत्तियां निजी कंपनी को लीज़ पर मात्र एक रुपये के टोकन मूल्य पर सौंपा जाना तो समिति के मत में ऐसा सोचा समझा शासन को सउद्देश्य अलाभकारी स्थिति में ढकेलने का कुटिलतापूर्वक किया गया षड़यंत्र है, जिसका अन्य कोई उदाहरण प्रजातांत्रिक व्यवस्था में मिलना दुर्लभ ही होगा….
दस्तावेजों से एक के बाद एक षडयंत्रपूर्वक किए गए आपराधिक कृत्य समिति के ध्यान में आये, जिसके पूर्वोदाहरण संभवतः केवल आपराधिक जगत में ही मिल सकते हैं. प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई शासकीय अधिकारी उद्योगपति के साथ इस प्रकार के षड़यंत्रों की रचना कर सकता है, यह समिती की कल्पना से बाहर की बात है.”

लोक लेखा समिति सिफारिश की थी कि रेडियस वाटर लिमिटेड के साथ मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड रायपुर (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम) के तत्कालीन प्रबंध संचालक गणेश शंकर मिश्रा द्वारा किये गये अनुबंध एवं लीज़-डीड को प्रतिवेदन सभा में प्रस्तुत करने के एक सप्ताह की अवधि में निरस्त करते हुए समस्त परिसम्पत्तियां एवं जल प्रदाय योजना का आधिपत्य छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकाल निगम द्वारा वापस ले लिया जाए.

सिफारिश में कहा गया था कि मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड एवं मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर के तत्कालीन प्रबंध संचालकों एवं मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक निगम लिमिटेड के मुख्य अभियंता के विरुद्ध षड़यंत्रपूर्वक शासन को हानि पहुँचाने, शासकीय सम्पत्तियों को अविधिमान्य रूप से दस्तावेजों की कूटरचना करते हुए एवं हेराफेरी करके निजी संस्था को सौंपे जाने के आरोप में प्रथम सूचना प्रतिवेदन कर उनके विरुद्ध अभियोजन की कार्यवाही संस्थापित की जाए और इस आपराधिक षडयंत्र में सहयोग करने और छलपूर्वक शासन को क्षति पहुँचाते हुए लाभ प्राप्त करने के आधार पर रेडियस वॉटर लिमिटेड के मुख्य पदाधिकारी के विरुद्ध भी अपराध दर्ज कराया जाए.

सिफारिश में कहा गया था कि मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर एवं जल संसाधन विभाग के तत्कालीन अधिकारी जिनकी संलिप्तता इस सम्पूर्ण षडयंत्र में परिलक्षित हो, इस संबंध में भी विवेचना कर उनके विरुद्ध भी कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही एक माह की अवधि में आरंभ की जाए.

लोक लेख समिति ने यह भी कहा कि समिति द्वारा अनुशंसित सम्पूर्ण कार्यवाही सम्पादित करने की जिम्मेदारी सचिव स्तर के अधिकारी को सौंपते हुए शासन का हित रक्षण करने के लिए उत्कृष्ट विधिक सेवा प्राप्त करते हुए आवश्यकतानुसार न्यायालयीन प्रकियाओं में विधिक प्रतिरक्षण हेतु भी प्रयाप्त एवं समुचित कार्यवाही सुनिश्चित की जाए ताकि विधिक प्रतिरक्षण के अभाव में अथवा कमज़ोर विधिक प्रतिरक्षण के कारण शासन को अनावश्यक रूप से अलाभकारी स्थिति में न रहना पड़े.

लेकिन कांग्रेस सरकार में शिवनाथ नदी को गिरवी रखे जाने के मुद्दे पर हाय-तौबा मचाने वाली भाजपा जब सरकार में आई तो उसने एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई करने की विधानसभा की लोकलेखा समिति की रिपोर्ट का क्या किया, जरा इसे भी देखें और फाइलों की रफ्तार तो देखने लायक है ही.

दस्तावेज बताते हैं कि 16 मार्च 2007 को विधानसभा में पेश की गयी लोक लेखा समिति की रिपोर्ट 21 मार्च 2007 को प्राप्त होती है और इसे विधि विभाग के माध्यम से 4 महीने बाद 19 जुलाई 2007 को महाधिवक्ता, उच्च न्यायालय की राय के लिये भेजा गया. उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता को इस फाइल पर अपनी राय देने में 7 महीने लगे और सरकार को 11 फरवरी 2008 को उनकी राय मिल गई.

इसके महीने भर बाद 6 मार्च 2008 को इस मामले को मंत्रिमंडल में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया गया. लेकिन उससे पहले वित्त और विधि विभाग की राय प्राप्त करते हुये इसे मंत्रिमंडल में पेश करने का प्रशासकीय अनुमोदन प्राप्त करने में लगभग 2 साल लग गये और 4 जनवरी को 2010 को मंत्रिमंडल की बैठक में यह मामला विचार के लिये लाया गया.

महाधिवक्ता, वित्त और विधि की राय के बाद मंत्रिमंडल में पेश किये गये इस मामले में मंत्रिमंडल का निर्णय गौरतलब है. मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया कि प्रमुख सचिव वित्त एवं योजना, प्रमुख सचिव विधि और विधायी कार्य विभाग तथा सचिव वाणिज्य एवं उद्योग विभाग द्वारा प्रकरण का विस्तृत परीक्षण कर माननीय मंत्रीजी, जल संसाधन, उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री जी का अनुमोदन प्राप्त कर कार्यवाही की जाये.

फिर 5 महीने बाद 18 मई 2010 को सचिव स्तरीय समिति का गठन किया गया. 8 महीने बाद 25 जनवरी 2011 को सचिव स्तरीय समिति का प्रतिवेदन प्राप्त हुआ. इस बात को 2 साल से अधिक समय गुजर चुके हैं. सरकार का दावा है कि सचिव स्तरीय समिति का प्रतिवेदन मिलने के बाद अग्रिम कार्रवाई की जा रही है लेकिन यह कार्रवाई क्या है, इसे बताने वाला कोई नहीं है

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अंजलि चौहान ,शेख अनवर और मुजीब खान के 5 साल जेल में रहने के बाद निर्दोष रिहाई से उठते स्वाभाविक सवाल .

** हमेशा की तरह पुलिस की झूठी कहानी और हमेशा की  तरह ही कई वर्ष  जेल में काटने के बाद रिहाई.
** अंजलि चौहान ,शेख अनवर और मुजीब खान के
5 साल जेल में रहने के बाद निर्दोष रिहाई से  उठते  स्वाभाविक सवाल .
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पुलिस की कहानी हमेशा की तरह झूठी साबित हुई
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 पचायत सचिव सचिव  और सामाजिक  कार्यकर्ता अंजलि चौहान उनके पति शेख अनवर जो पेशे से पत्रकार और उनके भाई मुजीब खान  जो शिक्षिकर्मी हैं को  मओवादियो का बड़ा लीडर और हथियार सप्लायर  बता कर  5 साल पहले  गिरफ्तार किया .

 5 साल तीनो जेल में रहे ,,केस चलता रहा तारीख पर तारीख लगती रही ,पुलिस ने चार्जशीट पेश की ,सत्र न्यायधीश ने चार्ज शीट में ही कमियां बताते हुये तीनो को निर्दोष मानते हुए कल रिहाई के आदेश दे दिए.

हमेशा की तरह पुलिस की झूठी कहानी और हमेशा की  तरह ही कई वर्ष  जेल में काटने के बाद रिहाई.

बस्तर में ऐसे नब्बे फीसदी लोग ऐसे ही पकडे जाते है और सात आठ साल वाद निर्दोष झूट भी जाते है.
किसी न्ययालय या किसी और अथोरिटी ने कभी यह  नही कहा की इस प्रकार के झूठे केस बनाने वाले और उसके कारण लम्बी लम्बी अवधि की जेल भुगतने के लिये कौन जिम्मेदार होगा.उन पुलिस कर्मीयों के खिलाफ कोइ कार्यवाही क्यों नहीं होती जिनके कारण  निर्दोश लोगो को इतना अपमान और अपनी नोकरी से महरूम होना पडेगा .

उदाहरण का लिये अंजली चौहान और उनके पति की कहानी ही सुन लेते है .

:अंजलि  चौहान  वे 5 साल पहले एक दिन एलिक्स पाल मेनन कलेक्टर से मिलने बस से जा रही थी की रास्ते में रोक कर पकड लिया उनके पति शेख अनवर रायपुर के एक होटल में पत्रकार वार्ता ले रहे थे ,वे समाजिक कार्यकर्त्ता और पत्रकार भी ही और यही मुजीब खान भी साथ थे की पुलिस  ने इन दोनों को पकड लिया .
अब पुलिस ने कोर्ट और मिडिया को जो कहनी बताई
वह निम्न है !

केस डायरी के अनुसार जून 2012 में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया था। पुलिस को शक था कि वे नक्सलियों का सहयोग करते हैं। पुलिस ने उनके पास से स्वचालित हथियार व कारतूस जब्त किया था। पुलिस को सूचना मिली थी कि कुछ नक्सली रायपुर पहुंचे हैं। सूचना मिलते ही पुलिस सतर्क हुई और रावणभाठा दशहरा मैदान से मुजीब को गिरफ्तार करके एके 47 और एसएलआर की 210 गोलियां बरामद की थीं। मुजीब ने पूछताछ में अंजली का नाम बताया था। तब सरोना रेलवे स्टेशन से अंजली को गिरफ्तार कर 60 कारतूस बरामद किए गए थे।

पुलिस की यह झूठी कहानी बहस में एक दिन भी ठहर नही सकी . परत दर परत झूठ खुलता गया और न्याय के पहले पायदान पर ही कोर्ट ने ईस झूठी कहानी को नकार दिया .
रायपुर के वरिष्ठ एडवोकेट  फरहान खान इनकी ओर से पैरवी कर रहे थे ॥
लेकिन इस कहानी को झूठ सिद्ध करने में 5 साल लग गये .
पुलिस ज्यादातर एसे ही कहानियाँ बनाते है , ज्यादातर झूठ पकड़े जाते हैं और कभी कभी निर्दोष लोग सजा भी पा जाते हैं.

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Monday, March 20, 2017

स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और उससे लिखने वाले प्रोपेगेंडा कर रहे हैं: रवीश कुमार


स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और उससे लिखने वाले प्रोपेगेंडा कर रहे हैं: रवीश कुमार

BY रवीश कुमार ON 20/03/2017



एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त हैं. वे पत्रकार नहीं हैं, सरकार के सेल्समैन हैं. जब भी जनादेश आता है पत्रकारों को क्यों लगता है कि उनके ख़िलाफ़ आया है. क्या वे भी चुनाव लड़ रहे थे? क्या जनादेश से पत्रकारिता को प्रभावित होने की ज़रूरत है?



रवीश कुमार. (फोटो साभार: ट्विटर)

(वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को पहले कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया गया है. सम्मान समारोह में उन्होंने यह वक्तव्य दिया.)

उम्र हो गई है तो सोचा कुछ लिखकर लाते हैं. वरना मूड और मौका कुछ ऐसा ही था कि बिना देखे बोला जाए. ख़ासकर एक ऐसे वक़्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, अपमान के नए-नए मुहावरे गढ़ रही है.

एक ऐसे वक़्त में जब हमारी सहनशीलता कुचली जा रही है ठीक उसी वक़्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना दीवार पर टंगी उस घड़ी की तरफ़ देखना है जो टिक-टिक करती है. टिक-टिक करने वाली घड़ियां ख़त्म हो गई हैं.

इसलिए हमने आहट से वक़्त को पहचानना बंद कर दिया है, इसलिए हमें पता नहीं चलता कि हमारे बगल में कब कौन-सा ख़तरनाक वक़्त आकर बैठ गया है. हम बेपरवाह हो गए हैं.

हमारी संवेदनशीलता ख़त्म होती जा रही है कि वो सुई चुभाते जा रहे हैं और हम उस दर्द को बर्दाश्त करते जा रहे हैं. हम सब आंधियों के उपभोक्ता बन गए हैं, कनज़्यूम करने लगे हैं.

जैसे ही शहर में तूफान की ख़बर आती है. बारिश से गुड़गांव या दिल्ली डूबने लगती है या चेन्नई डूबने लगती है, हम मौसम समाचार देखने लगते हैं. मौसम समाचार पेश करने वाली अपनी शांत और सौम्य आवाज़ से हम सबको धीरे-धीरे आंधियों और तूफान के कन्ज़्यूमर में बदल रही होती है और हम आंधी के गुज़र जाने का बस इंतज़ार कर रहे होते हैं.

अगली सुबह पता चलता है कि सड़क पर आई बाढ़ में एक कार फंसी थी और उसमें बैठे तीन लोग पानी भर जाने से दम तोड़ गए दुनिया से.

मरना सिर्फ़ श्मशान या कब्रिस्तान में दफ़न कर देना या जला देना नहीं है. मरना वो डर भी है जो आपको बोलने से, आपको लिखने से, आपको कहने से और सुनने से डराता है. हम मर गए हैं. हम उसी तरह के कन्ज़्यूमर में बदलते जा रहे हैं जो मौसम समाचार पेश करने वाली एंकर चाहती है. हम सबको इम्तेहान के एक ऐसे कमरे में बिठा दिया गया है, जहां समय-समय पर फ्लाइंग स्क्वाड या उड़न दस्तों की टोली धावा बोलती रहती है.

वो कभी आपकी जेब की तलाशी लेती है, कभी आपके पन्ने पलटकर देखती है. आप जानते हैं कि आप चोरी नहीं करते हैं लेकिन हर थोड़े-थोड़े समय के बाद उड़न दस्तों की टोली आकर उस दहशत को फिर से फैला जाती है.

आपको लगता है कि अगले पल आपको चोर घोषित कर दिया जाएगा. आपको लगता है कि ऐसा नहीं हो रहा है तो आसपास नज़र उठाकर देखिए कि कितने लोगों को मुक़दमों में फंसाया जा रहा है.

ये वही फ्लाइंग स्क्वाड हैं जो आते हैं आपकी जेब की तलाशी लेते हैं और वे कभी चोर को नहीं पकड़ते लेकिन आपको चोर बनाए जाने का डर आपके भीतर बिठा देते हैं.

तो मुक़दमे, दरोगा, इनकम टैक्स आॅफिसर… ये सब आज कल बहुत सक्रिय हो गए हैं. इनकी भूमिका पहले से कहीं ज़्यादा सक्रिय है और न्यूज़ एंकर हमारे समय का सबसे बड़ा थानेदार है.

वो हर शाम को एक लॉकअप में बदल देता है और जहां विपक्ष, विरोध की आवाज़ या वैकल्पिक आवाज़ उठाने वालों की वो धुलाई करता है उस हाजत (जेल) में बंद करके. अभी तक आप फर्स्ट डिग्री, थर्ड डिग्री, फेक डिग्री में फंसे हुए थे वो आराम से हर शाम थर्ड डिग्री अप्लाई करता है.

वो एंकर आपके समय का सबसे बड़ा गुंडा है और मुझे बहुत ख़ुशी है कि उसी समय में जब मीडिया चैनलों के एंकर गुंडे हो गए हैं… वो नए तरह के बाहुबली हैं तो इसी समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो एंकर को सम्मानित करने का जोख़िम भी उठा रहे हैं.

आने वाला समाज और इतिहास जब से आंधी और तूफान गुज़र जाएगा और एंकर को गुंडे और उनकी गुंडई की भाषा और भाषा की गुंडई उस पर लिख रहा होगा तो आप लोग इस शाम के लिए याद किए जाएंगे कि आप लोग एक एंकर का सम्मान कर रहे हैं.

ये शाम इतनी भी बेकार नहीं जाएगी. हां, आप जनादेश नहीं बदल सकते हैं, पर वक़्त का आदेश अगर वो भी है तो ये भी है. शुक्रिया, गांधी शांति प्रतिष्ठान में इस पुरस्कार में पत्रकारों को पसीना है. अपने पेशे की वजह से कुछ भी मिल जाए तो समझिए दुआ कुबूल हुई.

हम सब कुलदीप नैयर साहब का आदर करते रहे हैं. करोड़ों लोगों ने आपको पढ़ा है सर! आपने उस सीमा पर जाकर मोमबत्तियां जलाई हैं जिसके नाम पर इन दिनों रोज़ नफरत फैलाई जा रही है.

इस मुल्क में उस मुल्क नाम इस मुल्क के लोगों को बदनाम करने के लिए लिया जा रहा है. शायद वक़्त रहते गुज़रे ज़माने ने आपकी मोमबत्तियों की अहमियत नहीं समझी होगी. उसकी रोशनी को हम सबने मिलकर थामा होता तो वो रोशनी कुछ लोगों के जुनून का नहीं ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की समझ का उजाला बनती.

हमने तब भी यही ग़लती की अब भी यही ग़लती कर रहे हैं. मोहब्बत की बात कितने लोग करते हैं. मुझे तो शक़ है इस ज़माने में लोग मोहब्बत भी करते हैं. ये सोचकर डर जाता हूं कि एंटी रोमियो दस्ते के लोगों को किसी से प्रेम हो गया तो क्या होगा? प्रेम के तख़्त में वे किसी पुराने कुर्ते की तरह चराचरा कर फट जाएंगे. दुआ करूंगा कि एंटी रोमियो दस्ते को कभी किसी से प्यार न हो. प्रार्थना करूंगा कि उन्हें कम से कम किशोर कुमार के गाने सुनने की सहनशक्ति मिले.

शेक्सपीयर के कहानी के नायक के ख़िलाफ़ ये जनादेश आया है आपकी यूपी में. हम रोमियो की आत्मा की शांति के लिए भी प्रार्थना करते हैं. आप सब जीवन में कभी किसी से मोहब्बत की है तो अपनी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कीजिएगा.

उम्मीद करता हूं कि अमेरिका के किसी चुनाव में प्रेमचंद के नायकों के ख़िलाफ़ भी कभी कोई जनादेश आएगा. क्या पता आ भी गया हो. एंटी होरी, एंटी धनिया दल नज़र आएंगे.

अनुपम मिश्र जी हमारे बीच नहीं हैं, हमने इस सच का सामना वैसे ही कर लिया है जैसे समाज ने उनके नहीं होने का सामना उनके रहते ही कर लिया था. काश मैं ये पुरस्कार उनके सामने लेता, उनके हाथों से.

जब भी कहीं कोई साफ़ हवा शरीर को छूती है, कहीं पानी की लहर दिखती है मुझे अनुपम मिश्र याद आते हैं. वे एक ऐसी भाषा बचा कर गए हैं जिसके सहारे हम बहुत कुछ बचा सकते हैं.

प्रतिक्रिया में हमारी भाषा हिंसक न हो जाए, इसकी चिंता दुनिया के सामने कोई मिसाल नहीं बनेगी, उसके लिए ज़रूरी है हम फिर से अपनी भाषा को साफ़ करें. अपने अंदर की निर्मलता कई तरह की मलिनताओं से दब गई है. इसलिए ज़रूरी है कि हम अपनी भाषा और विचारों को थोड़ा-थोड़ा संपादित करें. अपने भीतर सब सही नहीं है उनका संपादन करें.

हम संभावनाओं का निर्माण नहीं करते हैं. वो कहां बची हुई है, किस-किस में बची है, किस-किस ने बचाई है, उसकी तलाश कर रहे हैं. ऐसे लोगों के भीतर की जो संभावनाएं हैं वो अब मुझे कभी-कभी कातर लगती हैं.

हम तब तक बचे हुए की चिंता में जीने का स्वाद भी भूल रहे हैं, बचाने का हौसला खो दे रहे हैं. अपने अकेले की संभावनाओं को दूसरों से जोड़ के चल… अंतर्विरोधों का रामायण पाठ बहुत हो गया. जिससे मिलता हूं वो किसी न किसी अंतर्विरोध का अध्यापक लगता है.

अगर आप राजनीति में विकल्प खोजना चाहते हैं तो अंतर्विरोधों को सहेजना सीखिए. बहुतों को उनके समझौतों ने और अधमरा कर दिया है. आज जो भी समय है उसे लाने में उनकी भी भूमिका है, जिनके पास बीते समय में कुछ करने की जवाबदेही थी.

उन लोगों ने धोख़ा दिया. बीते समय में लोग संस्थानों में घुसकर उन्हें खोखला करने लगे. चंद मिसालों को छोड़ दें तो घुन का प्रवेश उनके दौर में शुरू हुआ. विकल्प की बात करने वालों का समाज से संवाद समाप्त हुआ.

समाज भी बदलाव के सिर्फ़ एक ही एजेंट को पहचानता है, राजनीतिक दल. बाकी एजेंटों पर भी राजनीति ने कब्ज़ा कर लिया है. इसलिए राजनीति से भागने का अब कोई मतलब नहीं. अगर कोई एक साल के काम को सौ साल में करना चाहता है तो अलग बात है.

जब अच्छे फेल होते हैं तभी जनता बुरों के साथ जोख़िम उठाती है. हर बार हारती है लेकिन अगली बार किसी बड़े राजनीतिक दल पर ही दांव लगाती है. गांधीवादी, आंबेडकरवादी, समाजवादी, वामपंथी और जो छूट गए हैं वे तमाम वादी. आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं. बोनसाई का बागीचा बनने से बचिए.

आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है. वहां परिवारवाद हावी हुआ, कॉरपोरेट हावी हुआ. सांप्रदायिकता से डरने की शक्ति न पहले थी और न अब है.

ये उनके लिए अफ़सोस हम क्यों कर रहे हैं? अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को ये चुनौती स्वीकार करनी चाहिए. मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं, राजनीतिक दलों की तरफ़ लौटिए, इधर-उधर मत भागिए.

सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलने का वक़्त आ गया है. वे अकादमिक विमर्श की जगहें हैं, ज़रूरी जगहें हैं लेकिन राजनीतिक विकल्प की नहीं हैं. राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन करना पड़ेगा. फिर से उन दलों की तरफ लौटिए और कब्ज़ा कीजिए. वहां जो नेता बैठे हैं वे नेतृत्व के लायक नहीं हैं उन्हें हटा दीजिए.

ये डरपोक लोग हैं… बेईमानी से भर चुके लोग हैं… उनके बस की बात नहीं है. उनकी कायरता, उनके समझौते समाज को दिन-रात तोड़ने का काम कर रहे हैं. एक छोटी से चिंगारी आती है उनके समझौतों के कारण सब कुछ जलाकर चली जाती है.

हम सब के पास अब भी इतना मानव संसाधन बचा हुआ है और इस कमरे में जितने भी लोग हैं वे भी काफी हैं कि हम राजनीति को बेहतर बना सकते हैं.

पत्रकारिता के लिए पुरस्कार मिल रहा है. उस पर भी चंद बात कहना चाह रहा हूं.

मुझे ये बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि आज पत्रकारिता पर कोई संकट नहीं है. ये पत्रकारिता का स्वर्ण युग चल रहा है. राजधानी से लेकर जिला संस्करणों के संपादक इस आंधी में खेत से उड़कर छप्पर पर पहुंच गए हैं. अब जाकर उन्हें पत्रकार होने की सार्थकता समझ में आई है. क्या हम नहीं देख रहे थे कि कई दशकों से पत्रकारिता संस्थान सत्ता के साथ विलीन होने के लिए कितने प्रयास कर रहे थे. जब वे होटल के लाइसेंस ले रहे थे, मॉल के लाइसेंस ले रहे थे, खनन के लाइसेंस ले रहे थे तब वे इसी की तो तैयारी कर रहे थे.

मीडिया को बहुत भूख लगी हुई है. विकल्प की पत्रकारिता को छोड़ अब विलय और विलीन होने की पत्रकारिता का दौर है. सत्तारूढ़ दल की विचारधारा उस विराट के समान है जिसके सामने ख़ुद को बौना पाकर पत्रकार समझ रहा है कि वो भगवान कृष्ण के मुख के सामने खड़ा है.

भारत की पत्रकारिता या पत्रकारिता संस्थान इस वक़्त अपनी प्रसन्नता के स्वर्ण काल में भी हैं. आपको यकीन न हो तो कोई भी अख़बार या कोई भी न्यूज़ चैनल देखिए. आपको वहां उत्साह और उल्लास नज़र आएगा. उनकी ख़ुशी पर झूमिए तो अपनी तकलीफ़ कम नज़र आएगी.

सूटेड-बूटेड एंकर अपनी आज़ादी गंवाकर इतना हैंडसम कभी नहीं लगे. एंकर सरकार की तरफदारी में इतनी हसीन कभी नहीं लगीं. न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वॉशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाए, ऐसी प्रतियोगिता है वहां. मैं न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं. उसी ख़राबे में ये भी सुनने को मिल रहा है. भारत के न्यूज़ रूम से पत्रकार विदा किए जा रहे हैं. सूचना की आमद के रास्ते बंद हैं. ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है.

एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त हैं. वे पत्रकार नहीं हैं, सरकार के सेल्समैन हैं. जब भी जनादेश आता है पत्रकारों को क्यों लगता है कि उनके ख़िलाफ़ आया है. क्या वे भी चुनाव लड़ रहे थे? क्या जनादेश से पत्रकारिता को प्रभावित होने की ज़रूरत है?

मगर कई पत्रकार इसी दिल्ली में कनफ्यूज़ घूम रहे हैं कि यूपी के बाद अब क्या करें? आप बिहार के बाद क्या कर रहे थे? आप सतहत्तर के बाद क्या कर रहे थे? आप सतहत्तर के पहले क्या कर रहे थे? 1947 के पहले क्या कर रहे थे और 2025 के बाद क्या करेंगे?

इसका मतलब है कि पत्रकार अब पत्रकारिता को लेकर बिल्कुल चिंतित नहीं है. इसलिए काम न करने की तमाम तकलीफ़ों से आज़ाद आज के पत्रकारों की ख़ुशी आप नहीं समझ सकते, आपके बस की बात नहीं है.

आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. जाकर देखिए वे कितने प्रसन्न हैं, कितने आज़ाद महसूस कर रहे हैं किसी श्मशान, किसी राजनीतिक दल और सरकार में विलीन होकर. उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना आप नाप नहीं सकते.

प्रेस रिलीज़ तो पहले भी छाप रहे थे, फर्क़ यही आया है कि अब गा भी रहे हैं. इसको लेकर वे रोज़ गाते हैं. कोई मुंबईवाला ही कर सकता है इस तरह का काम लेकिन अब हम टेलीविजन वाले कर रहे हैं. चाटुकारिता का एक इंडियन आइडल आप कराइए. पत्रकारों को बुलाइए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है. अगली बार उसे भी सम्मानित कीजिए. ज़रूरी है कि वक़्त रहते हम ऐसे चाटुकारों का भी सम्मान करें.

अगर आपको लड़ना है तो अख़बार और टीवी से लड़ने की तैयारी शुरू कर दीजिए. पत्रकारिता को बचाने की मोह में फंसे रहने की ज़िद छोड़ दीजिए. पत्रकार नहीं बचना चाहता. जो थोड़े-बहुत बचे हुए हैं उनका बचे रहना बहुत ज़रूरी नहीं.

उन्हें बेदख़ल करना बहुत मुश्किल भी नहीं है. मालूम नहीं कि कब हटा दिया जाऊं. राह चलते समाज को बताइए कि इसके क्या ख़तरे हैं. न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं.

एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है. राजनीतिक दल बनने के लिए बनाने के लिए भी आपको इन नए राजनीतिक दलों से लड़ना पड़ेगा. नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं. जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो चुकी है कि लोग पूछने आ जाते हैं कि आप ऐसे सवाल आप क्यों पूछते हैं?

स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगेंडा कर रहे हैं. ये भारतीय पत्रकारिता को प्रोपेगेंडा काल है. मगर इसी वर्तमान में हम उन पत्रकारों को कैसे भूल सकते हैं जो संभावनाओं को बचाने में जहां-तहां लगे हुए हैं.

मैं उनका अकेलापन समझ सकता हूं. मैं उनका अकेलापन बांट भी सकता हूं. भले ही उनकी संभावनाएं समाप्त हो जाएं लेकिन आने वाले वक़्त में ऐसे पत्रकार दूसरों के लिए बड़ा उपकार कर रहे हैं.

ज़िलों से लेकर दिल्ली तक कई पत्रकारों को देखा है जूझते हुए. उनकी ख़बर भले ही न छप रही हों लेकिन उनके पास ख़बरें हैं. समाज ने अगर इन पत्रकारों का साथ नहीं दिया तो नुकसान उस समाज का होगा. अगर समाज ने पत्रकारों को अकेला छोड़ दिया तो एक दिन वो अपना एकांत और अकेलापन नहीं झेल पाएगा. तो ज़रूरत है बताकर, आंख से आंख मिलाकर उस समाज को बोलने के लिए कि आप जो हमें अकेला छोड़ रहे हैं और आप जो हमें गालियां दे रहे हैं… आप ये काम हमें हटाने के लिए नहीं अपना वज़ूद मिटाने के लिए कर रहे हैं.

आप उन लोगों से इस तकलीफ के बारे में पूछिए जो आज भी न्यूज़ रूम में हैं और टेलीविजन के न्यूज़ एंकर को आज भी रोज़ दस चिट्ठियां आती हैं. हाथ से लिखी हुई आती हैं. उनकी ख़बरें जब नहीं होती होंगी तो वे किस तकलीफ से गुज़रते होंगे और कहां-कहां लिखते होंगे.

ये समाज पत्रकारों को गाली दे रहा है, ऐसे लोगों की तकलीफ को और बढ़ा रहा है. वे अपने ही हिस्से में जो बेचैन हैं उनकी बेचैनियों को उनकी बेचैनियों के साथ उन्हें मार देने की योजना में वो शामिल हो रहा है.

…तो कई बार समाज भी ख़तरनाक हो जाता है.

बहरहाल जो भी पत्रकारिता कर रहा है, जितनी भी कर रहा है, उसके प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूं. जब भी सत्ता की चाटुकारिता से ऊबे हुए या धोख़ा खाए पत्रकारों की नींद टूटेगी और जब वे इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाएंगे उन्हें ऐसे ही लोग आत्महत्या से बचाएंगे.

तब उन्हें लगेगा कि ये वो कर गया है ये मुझे भी करना चाहिए. इसी से मैं बचूंगा. इसलिए जितना हो सकता है संभावनाओं को बचा कर रखिए. अपने समय को उम्मीद और हताशा के चश्मे से मत देखिए.

हम उस पटरी पर है जिस पर रेलगाड़ी का इंजन बिल्कुल सामने है. उम्मीद और हताशा के सहारे आप बच नहीं सकते. उम्मीद ये है कि रेलगाड़ी मुझे नहीं कुचलेगी और हताशा ये है कि अब तो ये मुझे कुचल ही देगी. वक़्त बहुत कम है और इसकी रफ्तार बहुत तेज़ है.

आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया.



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Thursday, March 16, 2017

हां हमें डरना चाहिए . जरूर डरना चाहिए .



हां  हमें डरना चाहिए .
जरूर डरना चाहिए .
लेकिन इसके लिये यदि समय रहते क
 कुछ नही किया तो बहुत देर हो चुकी होगी .

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यूपी में भाजपा का प्रचंड बहुमत डराने वाला है .
इससे देश के बड़े समुदाय ,दूसरे धर्म को मानने वाले और वचिंत वर्ण के लोग सहमे हुये है,.
आपको डरना शब्द शायद कडा लग रहा हो तो
में उसकी जगह असहज लिख देता हूँ .
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हाँ ,हम उनकी परिभाषा में न  देशभक्त हो सकते है ओर न  राष्ट्रवादी .
वे सहमे है ,
* जिनको सिर्फ धर्म के आधार पर उनकी देशभक्ति की परिक्षेत्र पल पल ली जाती हो ,आतंकवादी कहने में क्षणभर भी देरी न लगती हो ,जिन्हें बिना किसी आधार के वर्षो जेल मे सडाया गया हो .जिनकी जान मुठभेड़ में आसानी से ली जा रही हो ,वे सहमे हुये है ,उन्हें लगने लगा है की ऐसे धार्मिक अपराधी लोग अपने आप को सही सिद्ध करने के लिये इन चुनाव को अपने लिये प्रमाण मानेंगे .
*दलित समुदाय भी अचंभित है ,उनकी बडी नेता की इतनी बुरी हार उन्हें पच नही रही ,वे पूरी इलेक्शन प्रक्रिया पर प्रश्न ऊठा रहे है .उन्हें लग रहा है की ऊना में दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले और रोहित वैमूला के हत्यारों को जस्टीफिकेशन मिल गया है . जिस वर्ण ने लगातार दलितों के साथ अत्याचार किये उन्हें अपमानित किया उनकी हत्यायें की उनकी महिलाओं के साथ दुशकर्म किये और गांव में उन्हें अलगथलग कर दिया ,ऐसी ताकते अपने आपको विजयी मान रही है और उनसे खतरे और बढ गये है.
*  एक और अल्पसंख्यक वर्ग भी असहज है ,वो इसलिए कि जिस धर्म सैना और बजरंग दल आदि ने धर्म परिवर्तन के आरोपों के साथ  चर्चों पर हमले किये ,तोडफोड की ,विश्वासी लोगो के घरो पर लूटपाट की और पादरियो के जूलूस निकाले वह सब अब और सीना तान कर अपने किये फर गर्व कर रहे है .पहले भी पुलिस कुछ नही करती थी अब और नहीं करेगी पुलिस को भी  लगेगा की इस चुनाव ने उन्हें   सही सिद्ध किया है .पुलिस का  साम्प्रदायिककरण तो बहुत पहले हो गया हैं.
* सुरक्षा बल जो बस्तर आदि संवेदनशील स्थानों पर तैनात है वे बडे प्रफुल्लित है ,बस्तर के आई जी तो बाकायदा भाजपा के पक्ष मे वीडियो जारी कर चुके है  यूपी चुनाव के परीणाम से  उन्हें लग रहा कि ऊनकी ज्यादतियों के पक्ष में  जनादेश मिल गया है.
यहाँ के अधिकारी लोग सीधे डोभाल से आदेश लेते है.
* वो सब कारपोरेट भारी प्रसन्न है जो बिना किसी कायदे कानून के आदिवादियो की जमिन कब्जा रहे थे ,वे सेना और फोर्स का स्तेमाल अपने लठैतों की तरह करते थे.
** गली गली में बडा सा टीका लगायें  भगवा गमछा पहने गुण्डों को जायज ठहरा दिया है इस यूपी चुनाव ने .
मुसलमान  ,इसाई , सेक्युलरिज्म ,आजादी ओर बुद्धजीवियों शब्द देशद्रोही होने के लिये पर्याप्त है.
* हिन्दी बेल्ट में  मुसलमान वर्सेज सारे  की तर्ज  पर चुनाव होने की पूरी तैयारी है यही हुआ तो देश विघटन की ओर  तेजी से बढेगा ही .यही  चिंता का प्रमुख कारण है .
* हिंदुत्व  के  लिये  पूरा मीडिया ,जूडिशरी से लेकर सारे सत्ताप्रतिष्ठान एक हो गये हैं. पुलिस ओर सैना का तो कहना ही क्या ..
इस रास्ते से लगने लगा है की दो हजार उन्नीस का  चुनाव ये आसानी से जीत रहे हैं.यदी एसा ही हुआ तो देश हिन्दू डिक्टेशनशिप में बदल  जायेगा ,,ओर हमारा देश  तेजी से विघटन की तरफ चला जायेगा यही बेहद चिंता का सबब है .
हम बेहद गंभीर संकट की और तेजी से जा रहे है.
सचमुच डरने की बात है .
भारत आजादी के बाद सबसे कठिन दौर में पहुच गया हैं. एक तरफ हिन्दुत्ववादी उन्मादी गिरोह,  पूजी ,मीडिया, मदमस्त नोकरशाही  ,लठैत की तरह काम करने वाली फ़ोर्स ,ओर सबसे ऊपर संघ के मोहन भागवत .
ओर दूसरी तरफ खड़े है हम सब यानी सेक्युलर ,समता वादी ,सामाजिक न्याय , भगत सिंह और गाँधी की प्रतिरोध की विरासत थामे बिखरी हुई  ताकतें .
*
तो ,  अब आपको तय करना है कीआप किनके साथ है.
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 डा. लाखन सिंह
15.3.17