Wednesday, May 3, 2017

नियमगिरि की आंदोलनकारी कुनी सिकाका की सीआरपीएफ द्वारा अवैध गिरफ्तारी :

बुधवार, 3 मई 2017

नियमगिरि की आंदोलनकारी कुनी सिकाका की सीआरपीएफ द्वारा अवैध गिरफ्तारी : अपडेट साझा कर विरोध दर्ज करें

संघर्ष संवाद 

तत्काल सूचना व निवेदन!

दबाव बनाने के लिए कृपया 06856-222304 पर एसपी-रायगढ़ कार्यालय को फोन करें।

उड़ीसा के नियमगिरि की कुनी सिकाका नाम की एक युवा डोंगरिया कोंध महिला साथी को सीआरपीएफ द्वारा मध्य रात्रि में उनके गांव गोरोता से उठा लिया गया है। उनकी रिहाई मांगने गई महिलाओं को यह स्पष्टीकरण दिया गया है कि कुनी एक खतरनाक माओवादी हैं।

यह बात महत्वपूर्ण है कि वह दोदो पुसिका की बेटी और लोदो सिकाका की भतीजी हैं, और वे दोनों नियमगिरि के बहुत ही नामी कार्यकर्ता हैं। यह गोरोटा से दूसरी गैरकानूनी गिरफ्तारी है, पहली गिरफ्तारी दस्रु कदरका की हुई थी


ताज़ा जानकारी के अनुसार, कुनी सिकाका को शायद एक माओवादी के रूप में जल्द ही स्थानीय मीडिया के सामने परेड कराई जाएगी।

आपसे अनुरोध है कि इस खबर को प्रसारित करें और अपना विरोध दर्ज करें

Tuesday, May 2, 2017

बस्तर में तब तक नहीं होगा माओवाद का ख़ात्मा जब तक...



Home » छत्तीसगढ़ » Sukma Attack: FB post of Raipur Central Jail official on Maoist creates ruckus in Chhattisgarh

बस्तर में तब तक नहीं होगा माओवाद का ख़ात्मा जब तक...

राजकुमार सोनी| Updated on: 2 May 2017, 11:42 IST
(वर्षा डोंगरे)
छत्तीसगढ़ की सेंट्रल जेल रायपुर में पदस्थ सहायक जेल अधीक्षक वर्षा डोंगरे की बस्तर के मामले पर फेसबुक में की गई टिप्पणी से बवाल मच गया है. जेल विभाग के पुलिस महानिदेशक गिरधारी नायक ने उनकी वॉल पर चस्पा सभी पोस्ट पर जांच के निर्देश दिए हैं. जेल डीआईजी केके गुप्ता ने बताया कि सुश्री डोंगरे की फेसबुक वॉल की सभी टिप्पणियों को एक पेन ड्राइव में सुरक्षित रख लिया गया है. सुश्री डोंगरे ने किन परिस्थितियों में शासन के खिलाफ टिप्पणियां की है इसकी पड़ताल जेल के उप अधीक्षक आरआर राय को सौंपी गई है.


यह लिखा है फेसबुक में
छत्तीसगढ़ में पीएससी के परीक्षाफल में गड़बड़ी को लेकर पहले उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट में सरकार को कठघरे में खड़ी कर चुकी सुश्री डोंगरे की वॉल पर वैसे तो कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की पोस्ट चस्पा है, लेकिन बस्तर के सुकमा जिले में 24 अप्रैल को माओवादी हमले में जवानों की मौत के बाद सुश्री डोंगरे ने जो कुछ लिखा वह इस प्रकार है:
मुझे लगता है कि एक बार हम सबको अपना गिरेबान झांकना चाहिए. सच्चाई खुद-ब-खुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ से मरने वाले अपने देशवासी है... भारतीय हैं, इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में लागू करवाना... उनके जल-जंगल-जमीन को बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिला नक्सली हैं या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है. टाइगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान पांचवीं अनुसूची के अनुसार सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को हड़पने का...आखिर ये सब कुछ क्यों हो रहा है? नक्सलवाद का खात्मा करने के लिए... लगता नहीं.
सुकमा हमले में 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए थे (एएनआई)
बस्तर में सब कुछ सही है तो डरती क्यों है सरकार ?
बस्तर के जगदलपुर जेल में भी लगभग चार सालों तक पदस्थ रही सुश्री डोंगरे ने आगे लिखा है, "सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल-जंगल-जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है. वे नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं, लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं. उन्हें फर्जी केसों में चारदीवारी में सड़ने के लिए भेजा जा रहा है, आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाए? ये सब मैं नहीं कह रही बल्कि सीबीआई रिपोर्ट कहती है. सुप्रीम कोर्ट कहती है. जमीनी हकीकत कहती है. जो भी आदिवासियों की समस्या का समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानवाधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार...उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सब कुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है? ऐसा क्या कारण कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता है."
'आदिवासी बच्चियों को नग्न कर किया जाता है प्रताड़ित'
सुश्री डोंगरे लिखती हैं, "मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 साल की माड़िया- मुड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर कर नग्न कर प्रताड़ित किया गया था. उनके दोनों हाथों की कलाइयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था. जिसके निशान मैंने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टॉर्चर किए गए. मैंने डॉक्टर से उचित उपचार और आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा."
'आदिवासियों पर न थोपें विकास'
वर्षा ने सोशल मीडिया में कुछ सुझाव भी दिए हैं. उन्होंने लिखा है, "हमारे देश का संविधान और कानून किसी को यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें. इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में पांचवीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए. उन पर जबरदस्ती विकास न थोपा जाए. जवान हो किसान सब भाई-भाई है. अत: एक-दूसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और न ही विकास होगा. संविधान में न्याय सबके लिए है."
वर्षा ने अपने अनुभवों को साक्षा करते हुए आगे लिखा है, "हम भी सिस्टम के शिकार हुए, लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े. षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई. प्रलोभन और रिश्वत का ऑफर भी दिया गया. हमने सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई...आगे भी होगी."
सरकार के शराब बेचने के फैसले पर भी वर्षा ने फेसबुक पर टिप्पणी की है. उन्होंने लिखा है, "सरकार चाहती ही नहीं कि आम जनता स्वस्थ मस्तिष्क के साथ अगले चुनाव में वोट दे. इनकी औकात बाहर आ जाएगी... इसलिए नशे में डुबोकर फिर से निचोड़ने की तैयारी है. बाहरी पतन तो पहले ही था... इस फैसले से सरकार का नैतिक पतन भी स्पष्ट हो गया है." फेसबुक पर अपनी टिप्पणियों के संदर्भ में वर्षा का कहना है कि उन्होंने पोस्ट लिखी है या नहीं लिखी है. वह जायज है या नहीं है, इस बारे में वह उचित मंच पर ही जवाब देंगी.

Monday, May 1, 2017

मानव अधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद का कुल पत्र


मानव अधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद का कुल पत्र
वेंकैय्या नायडू को .
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वेंकैय्या नायडू जी,

सुकमा में हुए माओवादी हमले के बाद आपने मानवाधिकार संगठनों पर यह सवाल उठाया है कि वे सरकारी हिंसा की तो आलोचना करते हैं लेकिन जब माओवादी या अलगाववादी इस तरह के हमले  करते हैं तो वे चुप्पी साध लेते हैं।

आपका यह पत्र आज के ‘इण्डियन एक्सप्रेस में’ प्रकाशित भी हुआ है। मैं इस पत्र के माध्यम से एक मानवाधिकारकर्मी होने के नाते कोई सफाई नहीं देने जा रही, जैसा कि आपके बयान के बाद हमारे कुछ साथी करने भी लगे हैं।

मैं इस पत्र के माध्यम से आपके पत्र में दी हुई कुछ बातों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहती हूं, जो कि बेहद असंवैधानिक हैं और उससे भी महत्वपूर्ण कि जो खुद यह बता देती हैं कि मानवाधिकार संगठन आपका विरोध क्यों करते हैं।

इसके अलावा आप लोगों के दोहरे चरित्र और कुछ झूठ को भी सामने रखना चाहती हूं।

नायडू जी, मानवाधिकार संगठन मानवाधिकारों की हिफाजत के साथ मूल तौर पर संविधान की रक्षा का काम करते हैं। संविधान कहता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा ही उसके किसी भी अधिकार से वंचित किया जा सकता है। इसके लिए कानून बनाये गयें हैं, जो कि यह तय करते हैं कि व्यक्ति का अपराध क्या है, और उसे क्या दण्ड मिलना चाहिए। जब भी इसका उल्लंघन होता है मानवाधिकार संगठन इसके खिलाफ बोलते हैं, इसका ज्यादा उल्लंघन संविधान को मानने की कसम खाने के बावजूद आप ही लोग करते हैं जैसे कि आपने पत्र में खुद ही संविधान विरोधी बात कही है कि ‘मानवाधिकार मानवों का होता है, आतंकवादियों का नहीं।’ नायडू साब ये किसने तय किया कि कौन मानव है और कौन आतंकवादी? क्या आतंकवादी मानव नहीं हैं या इस देश के नागरिक नहीं है।
आपकी यह बात घोर गैरकानूनी, असंवैधानिक और फासीवादी है। और आप लोगों ने यह बात राज्य की सारी संस्थाओं यानि एटीएस, एसटीएफ एनआईए के दिमाग में भी बिठा दी है।

 खुद मुझसे और कई अन्य मानवाधिकार कर्मियों से इन संस्थाओं के अधिकारियों ने अभिरक्षा के समय आपकी इसी बात को दोहराया है, कि ‘ऐसे लोगों को तो देखते ही गोली मार देना चाहिए।’ आतंकवादियों के सारे मानवाधिकारों को खत्म कर देने की बात एक बार को मान भी लें, तो पहले विधि द्वारा उन्हें साबित तो होने दीजिये कि वे आतंकवादी हैं, जैसा कि संविधान में लिखा है।

आपकी परिभाषा के हिसाब से तो पूरे देश का बड़ा हिस्सा आतंकवादी ही है, जो अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़े वो आतंकवादी, जो आपके द्वारा थोपे गये विकास का विरोध करे वो आतंकवादी, जो बोलने की आजादी की रक्षा की बात करे वो आतंकवादी, जो रोटी कपड़ा और मकान की मांग सड़क पर उतर कर करे वो आतंकवादी, जो आदिवासी महिलाओं, कश्मीर की महिलाओं और आन्दोलन के इलाकों में महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार का विरोध करे, वो आतंकवादी, अपना जंगल, नदी बचाने के लिए लड़ रहा आदिवासी आतंकवादी, विस्थापन के खिलाफ खड़े नागरिक आतंकवादी, दूसरा धर्म मानने वाले आतंकवादी, फीस वृद्धि का विरोध करने वाले छात्र आतंकवादी, आपकी विचारधारा न मानने वाला पूरा विश्वविद्यालय आतंकवादी.........सूची इतनी लम्बी है कि पूरा देश इसके दायरे में आ सकता है।

 क्या आप जैसे संविधान विरोधी बात बोलने वालों के कहने से हम मान लें कि कौन आतंकवादी है, कौन नहीं?

दूसरी बात ये कि आपकी इस सोच पर भी आपका चरित्र कितना दोहरा है, इसके भी बहुत सारे उदाहरण हैं।

एक उदाहरण साध्वी प्रज्ञा का है। आपकी विचारधारा की इस साध्वी पर आतंकवाद का मुकदमा चल रहा है, आपकी संस्थायें साध्वी और इनके साथ इसी तरह की आतंकवादी कार्यवाहियों में पकड़े गये इन सारे लोगों को बचाने के लिए कितनी नरमी से पेश आ रही हैं, इसकी बात मैं यहां नहीं करूंगी।

मैं ये याद दिलाउंगी कि इन पर आतंकवाद का केस लगा तो आपकी सोच के मुताबिक तो ये आतंकवादी हो गयीं और इनके सारे अधिकार छीन लिये जाने चाहिए फिर भी जेल के अन्दर साध्वी का  कैंसर से इलाज हुआ, फिर आपने इनका विरोध क्यों नहीं किया। अगर इसका दोष साबित भी हो जाय (हलांकि आपकी सरकार रहते यह नहीं होगा) तो भी संविधान और कानून इन्हें कुछ अधिकार देता है, जो कि हम मानवाधिकार वालों के हिसाब से लागू होना भी चाहिए। लेकिन आपके विचार के हिसाब से तो इनका मानवाधिकार नहीं होना चाहिए।

नायडू साब, ऐसे कई उदाहरण हैं, जो ये साबित करते हैं कि मानवाधिकारों के मामलों में दोहरा चरित्र आप और आपकी तरह से सोचने वालों का है किसी मानवाधिकार संगठन का नहीं।

दूसरी बात ये है कि आप लोग केवल संविधान और कानून का उल्लंघन के साथ शुद्ध हिंसा ही नहीं करते हैं, जिसका हम विरोध करते हैं, बल्कि संरचनागत हिंसा भी करते ही जा रहे है।

 संकेत में आपने जिन लोगों के मानवाधिकारों के न होने की बात कही है, उन लोगों पर आप और आप की पूर्ववर्ती सरकारें लगातार संरचनागत हिंसा करती ही जा रही हैं। कारपोरेट घरानों के विकास (मुनाफे) के लिए आप पूरे देश की एक बड़ी आबादी को उजाड़ रहे हैं। आप तो शहरी विकास मंत्री हैं, ‘स्मार्ट सिटीज’ के नाम पर लाखों लोगों तो आप खुद उजाड़ने की योजना तैयार कर रहे हैं। लेकिन इसे आप हिंसा नहीं मानते हैं, जबकि हम मानवाधिकार संगठन इस हिंसा के खिलाफ भी बोलते हैं। हमारा यह बोलना आपको काफी अखरता है, इसलिए इसलिए इस बार आपने हम पर भी निशाना साधा है।

तीसरे कुछ झूठे तथ्यों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहते हैं। आपने लिखा है कि ‘हम तब भी नहीं बोलते जब माओवादी विकास विरोधी काम करते हैं यानि स्कूल और सड़के उड़ा देते हैं।’

नायडू जी हम जानते हैं कि आप आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों की इमारत खड़ी कर उससे सेना की छावनी का काम लेते हैं, उनमें बच्चे पढ़ने कभी नहीं जाते। आप जब सड़के बनाते हैं, तो उनसे गांव वालों को कोई फायदा नहीं मिलता, बल्कि कारपोरेट घरानों की बड़ी गाड़ियां इस देश का संसाधन इसपर से ढो कर ले जाती हैं, जिनमें उस क्षेत्र के लोेगों का खून भी मिला होता है। वे ऐसी सड़कों से डरते हैं। पर आप इसे ही विकास कहते हैं।

नायडू जी, आप लोगों के ऐसे कारनामों के कारण ही हिंसा  नहीं रूक रही है, बल्कि यह बढ़ती ही जा रही है।

हम आपसे अपील करते हैं कि हम पर दोषारोपण करने की बजाय आप इस बातचीत के रास्ते इस समस्या को हल कीजिये। इस वक्त आपकी सरकार में संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, जिस तरह से आपकी पार्टी से की विचारधारा से जुड़े तमाम समूहों का असंवैधानिक निगरानी समूह पनप गया है, उससे यह हिंसा और बढ़ रही है। यदि मानवाधिकारों को और भी मजबूत करने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं तो कम से कम कृपया संविधान और कानून को मानें . (बेशक कुछ कानूनों को हम मानवाधिकार विरोधी मानते हैं और उसकी लड़ाई लड़ते रहेंगे)। वरना हम तो बोलते ही रहेंगे। आप का यह हमलावर पत्र हमें इसकी रक्षा करने से नहीं रोक सकता।

सीमा आजाद
मानवाधिकार कार्यकर्ता
1 मई 20017

आदिवासी परिवार का दो वर्षों से सामाजिक बहिष्कार

 

आदिवासी परिवार का दो वर्षों से सामाजिक बहिष्कार
,रीयल टाइम्स
01-05-2017

बेटे, बेटियों से शादी को कोई तैयार नहीं

दो वर्षों से बहिष्कार का दंश झेलने को मजबूर परिवार

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रायपुर/पिथौरा(realtimes) राजधानी रायपुर से करीब 100 किलोमीटर दूर ’पिथोरा’ विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंडरी खार में एक आदिवासी संतराम का परिवार सहित सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है. संतराम के परिवार में सात बेटे, बेटियां विवाह योग्य हैं लेकिन सामाजिक बहिष्कार के चलते उनका विवाह नहीं हो पा रहा है.


संतराम का इतवारी गोड़ से जमीन को लेकर विवाद चल रहा है मामला आयुक्त कार्यालय रायपुर में वर्षो से लंबित है. इसी बीच इतवारी के पक्ष में 2 साल पहले एक सामाजिक बैठक हुई और समाज के लोगों ने संतराम और उसके परिवार को यह फरमान सुनाया की इतवारी के पक्ष में जमीन को छोड़ दें. जिसपर संतराम ने कहा कि यह मेरी पैतृक भूमि है मैंने मेहनत कर भूमि को कृषि योग्य बनाया है मैं जमीन को नहीं छोड़ सकता.


संतराम ने यह भी निवेदन किया कि मामला न्यायालय में चल रहा है आप लोग इस पर कोई निर्णय ना दें. इस बात से नाराज़ बैठक में उपस्थित समाज के ठेकेदार भड़क उठे और तत्काल निर्णय सुना दिया कि आज के बाद संतराम के परिवार को समाजिक कार्यों में सम्मिलित नहीं किया जाएगा और उनसे कोई भी बेटी रोटी का रिश्ता नहीं रखेगा.


समाज की ओर से बकायदा लिखित में एक सूचना जारी कर उक्त आदेश का प्रचार प्रसार करने के लिए निर्देशित किया गया है. संतराम के परिवार से आए धनसाय मानसिंह जगसु ने बताया कि समाज के पदाधिकारियों ने उनका 2 साल से सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है. कोई भी सामाजिक व्यक्ति उनके परिवार से कोई वास्ता नहीं रख रहा है. परिवार में सात पुत्र पुत्रियां विवाह योग्य हैं लेकिन सामाजिक बहिष्कार के चलते उनका विवाह नहीं हो पा रहा है. उनके विवाह की उम्र निकलते जा रही है.


संतराम ने राज्यपाल तथा राज्य मानवाधिकार आयोग सहित कलेक्टर एसपी व आला अधिकारियों के नाम से तैयार ज्ञापन में  समाज के पांच पदाधिकारियों के विरुद्ध नामजद शिकायत करते हुए दंडात्मक कार्यवाही की मांग की है.उन्होंने समाज के पदाधिकारियों के ऊपर आरोप लगाया है कि उनका योजनाबद्ध ढंग से सामाजिक बहिष्कार किया गया है जिससे परिवार बहिष्कार का दंश झेलने के लिए मजबूर हो गया है।

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वर्षा डोंगरे के पोस्ट पर सरकारी नोटिस --सीजी खबर



वर्षा डोंगरे के पोस्ट पर सरकारी नोटिस

 May 1, 2017
 सीजी खबर
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रायपुर | संवाददाता: फेसबुक पर बस्तर के मुद्दे पर टिप्पणी करना रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को भारी पड़ सकता है. राज्य सरकार ने उन्हें नोटिस जारी करते हुये जवाब तलब किया है.

वर्षा डोंगरे राज्य सरकार के लिये पहले से ही मुश्किल का कारण बनी हुई हैं. छत्तीसगढ़ की बदनाम पीएससी के परीक्षाफल को लेकर उनकी याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पहले ही फटकार लगाई थी और वर्षा डोंगरे के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया है. हालांकि वर्षा इस मामले को फिर से सुप्रीम कोर्ट में ले कर जा चुकी हैं.


अब बस्तर के मामले में सोशल मीडिया पर सरकार, माओवादियों और सुरक्षाबल के जवानों के खिलाफ उनकी टिप्पणी देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. सरकार ने इस मामले में रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को इस मामले में नोटिस जारी कर कार्रवाई की बात कही है.

वर्षा डोंगरे ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा था कि- मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं…भारतीय हैं. इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना… उनकी जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दुध निकालकर देखा जाता है. टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान अनुसार 5 वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को हड़पने का….आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है. नक्सलवाद खत्म करने के लिए… लगता नहीं.

वर्षा के अनुसार- सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है. वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चारदीवारी में सड़ने भेजा जा रहा है. तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जायें. ये सब मैं नहीं कह रही सीबीआई रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहती है, जमीनी हकीकत कहती है. जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार… उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है. ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता.

मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था. उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था, जिसके निशान मैंने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए. मैंने डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा.

वर्षा डोंगरे ने सोशल मीडिया में लिखा- हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें. इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में 5 वीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए. उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जाये. आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं. हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक… पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझें …किसान जवान सब भाई-भाई हैं. अतः एक दूसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा. संविधान में न्याय सबके लिए है, इसलिए न्याय सबके साथ हो.

अपने अनुभवों को साझा करते हुये वर्षा डोंगरे ने लिखा कि- हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई, प्रलोभन रिश्वत का ऑफर भी दिया गया, वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का पैरा 69 स्वयं देख सकते हैं. लेकिन हमने इनके सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई… आगे भी होगी.

वर्षा ने लिखा है- अब भी समय है, सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे. ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे. जय संविधान, जय भारत.

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बर्ख़ास्त जज प्रभाकर ग्वाल के फ़ैसले अच्छे मगर गुण घातक और भाषा असंसदीय'



'बर्ख़ास्त जज प्रभाकर ग्वाल के फ़ैसले अच्छे मगर गुण घातक और भाषा असंसदीय'

राजकुमार सोनी|
1 May 2017, 12:12 IST

बस्तर के माओवाद प्रभावित सुकमा जिले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रहे प्रभाकर ग्वाल को बीते साल एक अप्रैल 2016 को उच्च न्यायालय की अनुशंसा के बाद छत्तीसगढ़ के विधि विभाग ने 'जनहित' में बर्खास्त कर दिया था. नेताओं और अफसरों के खिलाफ दिए गए सख्त फैसलों के चलते सुर्खियों में रहे इस दलित मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी के बाद यह बहस चल पड़ी थी कि जनहित ही उनकी बर्खास्तगी की वजह थी या कुछ और?


इधर बर्खास्तगी के एक साल बाद 10 अप्रैल 2017 को उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार की ओर से लिखे गए गोपनीय प्रतिवेदन में कहा गया है कि ग्वाल के भीतर न्यायिक कार्य को लेकर जो गुण होना चाहिए वह मौजूद हैं, लेकिन उनके द्वारा माननीय उच्च न्यायालय से जो भी पत्राचार किया गया है उसकी भाषा और शब्दावली असंसदीय है. इसके अतिरिक्त उनमें और भी जो गुण है वह न्याय जगत, संस्था और हम सभी के लिए घातक है.



देर रात दी गई सूचना


ग्वाल फिलहाल महासमुंद जिले की तहसील सरायपाली के एक गांव नानकपाली में न्यायिक सेवा के लिए अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को टयूशन देकर गुजर-बसर कर रहे हैं. उन्होंने बताया जब उन्हें बर्खास्त किया गया था तब उसकी एकमात्र वजह जनहित बताई गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार की तरफ से जो गोपनीय प्रतिवेदन उन्हें भेजा गया है उसमें साफ कहा गया है कि न्यायिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त गुण मौजूद हैं.



उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब उनके द्वारा सारे फैसले जनहित में लिए गए हैं तो फिर जनहित में उनकी बर्खास्तगी कैसे हो सकती है? उन्होंने बताया कि बर्खास्तगी के एक साल बाद 15 अप्रैल को न्यायालय का एक कर्मचारी देर रात उनके घर डाक लेकर पहुंचा था. वे घर पर मौजूद नहीं थे, लेकिन परिजनों ने जो पत्र रिसीव किया उसमें 10 अप्रैल की तिथि अंकित है.



कौन सा अपराध?


ग्वाल ने बताया कि जब छत्तीसगढ़ में पीएमटी पर्चा लीक कांड हुआ था तब भाजपा के एक विधायक रामलाल चौहान ने उनके कक्ष में यह कहकर धमकाया था कि उन्हें किसी झूठे मामले में फंसा दिया जाएगा. पर्चालीक कांड में उनके द्वारा रायपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा की भूमिका को भी संदिग्ध बताते हुए न केवल तल्ख टिप्पणी की गई थी बल्कि फैसले की एक कॉपी पुलिस महानिदेशक को भेजते हुए पुलिस अधीक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने को लिखा गया था.

सीबीआई का विशेष मजिस्ट्रेट रहने के दौरान जब उन्होंने बिलासपुर के तात्कालीन पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा की मौत के मामले में मृतक के रिश्तेदारों, विवेचक और घटनास्थल पर मौजूद गवाहों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया तब बहुत से लोग बौखला गए थे. 21 अक्टूबर 2014 बिलासपुर जिले के भदौरा इलाके के एक जमीन घोटाले में जब उन्होंने पटवारी, उपसरपंच समेत तीन आरोपियों को सश्रम कारावास की सजा सुनाई तब भी भाजपा के एक कद्दावर मंत्री की भूमिका उजागर हुई.

ग्वाल ने बताया कि कभी उन्हें निर्णय बदलने के लिए प्रलोभन दिया गया तो कभी बाहुबली और ताकतवर लोगों ने कहा कि उनके फैसले सरकार को खटक रहे हैं. उन्हें अपनी जान का खतरा बना हुआ था जो अब है. ऐसे में अगर उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं के पास किसी तरह की शिकायत की है तो कौन-सा अपराध कर दिया है?



कैसे ख़त्म हो माओवाद


ग्वाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में नेताओं और अफसरों का खतरनाक गठजोड़ साफ दिखाई देता हैं. यह गठजोड़ आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और माओवादी मोर्चे पर कायम है. उन्होंने बताया उन्हें बतौर सजा बस्तर के माओवाद जिले सुकमा में भेजा गया था, लेकिन वहां पर पदस्थ रहने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि माओवाद के नाम पर हर रोज बेगुनाह आदिवासियों को फंसाया जा रहा था. उनकी अदालत में हर रोज ऐसे आदिवासी लाए जाते थे जो सीधे-सादे ग्रामीण होते थे. जो बंदूक और हथियारों के बारे में नहीं जानते पुलिस उन्हें माओवादी बताने में तुली रहती थी.


जब उन्होंने बेगुनाह आदिवासियों को बचाने का काम किया तब वहां की पुलिस ने कहा कि मैं उनके काम में अडंगे डाल रहा हूं. सुकमा के कलक्टर ने तो यहां तक कहा कि किसी भी तरह का फैसला लेने से पहले मैं उनसे पूछ लिया करूं. बस्तर में माओवाद की समस्या सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो रही है क्योंकि नेता और अफसर दोनों ही नहीं चाहते हैं कि इस समस्या का कोई समाधान हो. ग्वाल ने बताया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार फिलहाल उन्हें यह जानने का हक तो है कि उनके कौन-कौन से पत्र की भाषा गंदी और भद्दी है? वे यह भी जानना चाहेंगे कि उनका कौन-सा गुण समाज के लिए घातक हैं?

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संघ और मई दिवस खग जाने खग की ही भाषा !



संघ और मई दिवस
खग जाने खग की ही भाषा !
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कल एक  संघी मित्र ने पूछ ही लिया कि मई दिवस का भारत से क्या संदर्भ  है .
उसका आशय मई दिवस भारत के बाहर से आने से था .
तो मेने भी पूछ लिया कि राजाओ की वेशभूषा पहने ये विश्वकर्मा कैसे मजदूर बन गया .
तो उसने कहा की विशवकर्मा  ने सारी दुनिया का निर्माण एक दिन में कर दिया .तो वो ही न पहला मजदूर हुआ .
अब बारी मेरी थी ,
विश्वकर्मा ने पूरी दुनिया बनाई या सिर्फ भारत का निर्माण किया.
तब थोडा हिचका ,फिर कहा ,सारी दुनियां !
तो फिर यही तय हुआ न !
की सारी दुनियां का निर्माण मजदूरों  ने ही किया ?
में ऊनके अनुसार ही चल रहा था .
तो भाई विश्वकर्मा तो राजा रहे होंगे ,तो उन्होंने काम के लिए मजदूर भी लगाये होंगे,बड़ा काम था न !
एशिया ,योरोप ,अफ्रीका ,अमेरिका वगैरह वगैरह बनाना जो पडा .
हाँ ..हाँ .वो तो होगा ही
भगवान विश्वकर्मा और उनके साथी चोबिस घंटे काम करते होंगे ?
हाँ ये तो सही है
तो उन्हें और उनके मजदूरों को नित्य क्रिया ,भोजन भजन ,घर बार , बच्चो ,आराम की भी जरुरत होगी की नहीं ?
घरबार चलाने के लिए कुछ वेतन फेतन भी चाहिए ही होगा ,कि नही ?
तो मेरे चड्डी से फुल पेंट  हुए भाई ,
जब तुम्हारे विश्वकर्मा जी मजदूरों से दिन रात बिना वेतन के कम करवा रहे थे तो मजदूरों ने हड़ताल कर दी और बड़ा आन्दोलन फैल गया .
मजदूरों पर फरसे लाठी चलवा दी ,बहुत से मजदूर शहीद हो गये .
तब जाकर मजदूरों और मालिको में   एक मई को समझौता हुआ की मजदूर दिन में आठ घंटे से ज्यादा काम नहीं करेगा .
तब से मजदूरों के काम के घंटे  तय हुए .
और धीरे धीरे मजदूरों ने और लड़ाई लड़ कर जीत हासिल की !
तो आखरी में नये नये फुल पेंट हुए मित्र ने  अपना आखरी शस्त्र चलाया ,,
ओह . .. तो आप कम्युनिस्ट हो .
तभी बार बार मजदूर मजदूर बोल रहे हो
हमारी विश्वकर्मा जी को भी मजदूर सिद्द कर दिया .
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तो लीजिये !
अब कारपोरेट सामने है
कारपोरेट क्या सरकार भी ऐसी ही है.
आठ नहीं 12 ,12 घंटे काम करवा रहा है
न जॉब की कोई गारंटी और न वेतन का कोई निर्धारण
न कोई श्रम कानून,न औधोगिक न्यायलय की झंझट
न ट्रेड यूनियन के हक और न मजदूरों के प्राथमिक  हक़ .
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तो ..तो..
मजदूर दिवस मनाने से कुछ नही होगा ,
अब वही लडाई शुरू करना होगी जो कभी हमारे पूर्वजों ने लड़ी थी.
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