Friday, March 3, 2017

पुलिस अधीक्षक सुकमा पर शीघ्र सक्षम कारवाही की जाये – पीयूसीएल छत्तीसगढ़

CHHATTISGARH LOK SWATANTRYA SANGATHAN
(PEOPLE’S UNON FOR CIVIL LIBERTIES, CHHATTISGARH) PUCL chhattisgarh

                                  दिनांक   03.03.2017

पुलिस  अधीक्षक सुकमा पर शीघ्र सक्षम कारवाही की जाये – पीयूसीएल छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन को समाचार पत्रों से जानकारी मिली  है कि 2 मार्च को पंडरीपानी
(बस्तर) में एक निजी ऑटोमोबाइल कंपनी की नयी उच्च-तकनीक वाहनों के उद्घाटन कार्यक्रम में भाग लेते हुए,  सुकमा के पुलिस अधीक्षक इंदिरा कल्याण एलेसेला ने कहा कि , ऐसे नए बड़े-बड़े वाहनों के नीचे शालिनी गेरा  और  ईशा खंडलेवाल जैसे मानव  अधिकार कार्यकर्ताओं कै कुचल दिया जाना चाहिए .उन्होंने शोधकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया  की ओर इशारा करते हुए कहा कि कुछ लोग अपना कुत्ता-बिल्ली घुमाते रहते है और पुलिस पर   इलज़ाम लगाते हैं.
ऐसा श्री एलेसेला ने, वर्तमान में रायपुर  मुख्यालय में पदस्थ श्री एस.आर.पी. कल्लूरी और
बस्तर पुलिस  अधीक्षक श्री आर.पी.दाश की उपस्थित  में कहा. इसी कार्यक्रम में SP सुकमा ने मीडिया से कहा कि वह समझे कि यह एक युद्ध हैऔर पुलिस को हत्यारा साबित नहीं करें. बाद में मीडिया  द्वारा स्पष्टीकरण मांगने  पर श्री एलेसेला ने कहा कि उन्हें अपना कथन किया है वैसे भी बोलने की आज़ादी भी है .
हम इस बयान की कड़ी निंदा करते हैं. जिस प्रकार पुलिस और प्रशासन, व्यवस्था को बनाये रखने का
अपना काम करते हैं; उसी प्रकार न्याय प्रणाली में अधिवक्ता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकार और मानव अधिकार कार्यकर्ता भी मानव अधिकार  हनन के मामलों में न्याय दिलाने का अपना कार्य  करते हैं. इनके कायों के बिना  लोकतंत्र जीविका नहीं रह सकता.
महिला  मानव अधिकार कार्यकर्ताओं  - सुश्री शालिनी  गेरा, ईशा खंडेलवाल और बेला भाटिया के विरुद्ध दिये गये SP सुकमा के बयान से - बस्तर पुलिस  का मानवधधकारों के प्रति  घोर  तिरस्कार  और लापरवाही का दृष्टिकोण  ,कार्यकर्ताओं के प्रति व्यक्तिगत रंजिश और मतभेद रखने वालो के साथ अपने बल का  दुरप्रयोग करने की आपराधिक पृवत्ति स्पष्ट झलकती है .

एक निजी कार्यक्रम को अनावश्यक रूप से सामाजिक कार्यकर्ताओं को धमकी दिये जाने का मंच बनाना पुलिस आचरण नियमों के खिलाफ भी है .
 आज जब राष्रीय मानव अधधकार आयोग के समक्ष इन्ही अफसरों के सम्बन्ध में में शिकायतों  की जांच चल रही है, जब माननीय उच्च न्यायलय में कई फजी मुठभेड़ आदि मामले लंबित है, जब साकेगडुा मामले के जांच आयोग की सुनवाई चल रही है; तब ऐसे मामलों में ग्रामीणों की ओर से उपस्थित  होने वाले वकीलों या मानव अधिकार कार्यकर्ताओं  की शिकायत
के बारे में इस प्रकार का घिनौना अपराध  और धमकी पूर्ण बयान देना निश्चित ही पेशेवर आचरण नहीं है और
वास्तव में अपनी प्रभाव का  दुर्पयोग है. यह भारतीय संविधान के अंतर्गत अपराध है.

ऐसा विवादित बयान  वरिष्ठ अधिकारी  श्री कल्लूरी और श्री दाश की उपस्थित में ,मानवाधिकार हनन की शिकायतो के आधार पर ही श्री कल्लरूी को बस्तर आई जी के पद से हटाया गया था, कार्यकर्ताओं की ।शिकायतों और शंकाओं की पुष्टि करता है .
हम पुलिस महानिरीक्षक और छत्तीसगढ़ शासन से मांग करते हैं कि पुलिस अधीक्षक सुकमा इंदिरा कल्याण एलेसेला पर शीघ्र सक्षम कारवाही की जाये. साथ ही इस निजी कार्यक्रम में  श्री कल्लूरी व श्री दाश की इस उपस्थिति  और एक उद्घाटन कार्यक्रम को राजनैतिक मंच बनाने के उनके आचरण की उच्च स्तरीय जांच की जावे.
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डा.लाखन सिंह       सुधा भारद्वाज अधिवक्ता
अध्यक्ष                    महासचिव

छत्तीसगढ़ पीयूसीएल की ओर से जारी बयान दिनांक 3.3 . 2017

आखिर ऐसा क्या कर दिया शालिनी और ईशा ने कि एसपी उन्हें कुचलकर मार देना चाहते है





** आखिर ऐसा क्या  कर दिया शालिनी और ईशा ने कि एसपी उन्हें कुचलकर मार देना चाहते है और आई जी उनके पुतले जलवाते है

**#सुकमा ज़िले के एसपी आईके एलेसेला ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कुचल देने की बात कही है
जगदलपुर में ,एक निजी समारोह में सार्वजनिक तौर पर भाषण देते हुये कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता ईशा खंडेलवाल और शालिनी गेरा जैसों को इन नये बड़े वाहनों से सड़क पर कुचल देना चाहिये.

**उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादी समर्थक बताते हुये कहा कि उन्हें आधुनिक तकनीकों वाली वाहनों के नीचे सड़कों पर कुचल देना चाहिये. उन्होंने कहा कि लोग पालतु कुत्ते-बिल्ली को लेकर घूमते हुये पुलिस पर आरोप लगाते हैं.

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गुरमेर कौर  की कहानी से बहुत पुरानी बात है शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल की . पेशे से दोनों वकील है ,चूंकि वे वकील है तो मानवाधिकार के लिये तो काम करना स्वाभाविक ही है .
दोनो अपना सुनहरा कैरीयर छोडकर छत्तीसगढ़ के बसकतर में पीड़ित आदिवासीयो़ को कानूनी सहायता उपलब्ध करने की मंशा से बस्तर में जगदलपुर लीगल एड ग्रुप बना कर काम करने आई़ थी .देश भर  से और  भी  समर्पित महिला वकील (ज्यादातर )आते जाते रहे ,लेकिन आखरी तक यही दोनों टिकी रही .
इनके पास एसे आदिवासियों ने संपर्क किया जिनके के स में वर्षों से कोई सुनवाई नहीं हो रही थी ,बहुतों की चार्जशीट तक दायर नहीं हुई थी तो क ई  जमानत के लिये बहुत साल से भटक रहे थे .
ईशा कहती हैं, "हमने जगदलपुर लीगल एड ग्रुप बनाने के बाद शुरुआती दौर में बड़ी संख्या में न्यायालय और पुलिस के मामलों को लेकर सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाये और जो तथ्य हमारे सामने आये, वो हैरान करने वाले थे. हमने ऐसे मुक़दमे चिन्हांकित किए, जिनमें आदिवासी लंबे समय से जेल में थे."


ऐसे  सैकड़ों मामले अदालत में लंबित थे, जिनमें आदिवासियों की बरसों से पेशी नहीं हुई थी. यहां तक कि कई मामलों में वे सज़ा से अधिक दिन जेल में गुजार चुके थे लेकिन उनकी जमानत नहीं हो पाई थ

अधिकांश मामलों में आदिवासियों को अपने मुक़दमे की स्थिति के बारे में भी कुछ भी पता नहीं था. स्थानीय वक़ीलों की मदद से उन्होंने इन मामलों की पैरवी शुरु की.
पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा कथित रुप से आदिवासियों को फ़र्ज़ी मामलों में जेल भेजने, फर्ज़ी मुठभेड़ और महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसे मामलों को अदालत तक ले जाने वाला जगदलपुर लीगल एड ग्रुप जल्दी ही एक ऐसे संगठन के रुप में आदिवासियों के बीच लोकप्रिय हो गया, जिसके वकील बिना पैसे लिए आदिवासियों के मुक़दमे लड़ रहे थे.

लेकिन ऐसे मामलों ने पुलिस और सरकार के लिये मुश्किल पैदा कर दी. आरोप लगा कि जगदलपुर लीगल एड ग्रुप मूलतः माओवादियों के मामले अदालत में लेकर आ रहा है और माओवादियों को इससे मदद मिल रही है
.यह वो समय था तब इनके ग्रुप पर हमले शुरू हो गये ,सबसे पहले जगदलपुर जिला कोर्ट में ,तरह तरह से इन्हें काम करने से रोका गया ,स्थानीय स्तर पर संघ के कार्यकर्ता जो पेशे से खराब वकील  माने जाते है वे बारकांसिल के सचिव भी थे ,उन्होंने माहौल बनाया कि वे माओवादी समर्थक के और इनके पास वकालत करने का लायसेंस नहीं है ,इसलिए यह कोर्ट में पेश नहीं हो सकते ,वकीलों ने बायकाट किया और तो और जिला जज भी इनकी भाषा बोलने लगे थे .
बस्तर में फर्जी मुठभेड की बाढ आ गई थी ,गांव के गांव लूटना ,लोगों खासकर महिलाओं के साथ मारपीट और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार के साथ बलात्कार की घटनाएँ आम हो गई थी ,आदिवासियों को घरों से खींच कर गोली मार देना और उनके शव के साथ अमानवीय सलूक की शिकायत मिलने लगी थी ,स्कूली बच्चों तक को घर से घसीट कर मारने की घटनाएँ हुई और महिलाओं के साथ बलात्कार के भी केस उजागर होने लगे .॥
बस्तर में जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के लोग गांव जाने लगे उनके बयान और अदालती कागजात पूरे किये जाने लगे और इस आधार पर जिला कोर्ट से लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक आदिवासियों को रिलीफ देने लगा.॥
बस यही अपराध था इन दोनों का .
और उसके बाद जगदलपुर से ऐनकेन प्रकरेण इन अधिवक्ताओं को भगाने  के षडयंत्र को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया ,जहाँ कार्यालय और निवास था ,वहाँ रोज कल्लूरी के निर्देशन में जुलूस नारेबाजी पथराव किये गये ,इसका नेतृत्व किया सामाजिक एकता मंच ने जो पुलिस ने ही गैरकानूनी हमलों के लिये तैयार किया था.
जब बात फिर भी नही बनी तो मकान मालिक को धमकाया गया और मजबूर किया गया कि वे अपना कार्यालय बंद करके चले जाये.
ईशा और शालिनी ने अपने वकील मित्रों के साथ बिलासपुर से काम शुरू किया ,थोड़ी परेशानी तो जरूर थी लेकिन फिर भी कानूनी सहायता का काम और इनका आना जाना बदस्तूर जारी रहा .
पुलिस ने पीड़ितों के परिजनों को ,गवाहो और प्रभावितों को डराना धमकाना जारी रखा ,बस्तर में इन्हें आने जाने के लिये गाड़ी किराये पर लेना मुश्किल हो गया ,कभी कभी रास्ते में ड्राइवर इन्हें उतारकर गाड़ी ले कर भाग भी गये .
जैसे तैसे प्रतिबद्ध पत्रकारों के सहयोग से कहानियाँ बाहर आती रही और समय समय पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इनका हौसला बनायें रखा .॥
और एक दांव खेला पुलिस ने ,जब हाईकोर्ट के आदेश पर शव के पोस्टमार्टम की देखरेख के लिये कमिश्नर के निर्देश पर जगदलपुर पहुचे तो शालिनी, प्रियंका  पर नोटबंदी के बाद नोट बदलवाने का हास्यास्पद आरोप लगा कर इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई .

शालिनी और ईशा जैसी कमिटमेंट के साथ काम करने वाले वकील इन सबसे डरे नही है ,वे अभी भी बस्तर वापस लौटना चाहते है,,उनका कहना है कि आदिवासियों को हमारी जरूरत है और हम उनकी सहायता जरूर करेंगे .
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4.3.2017

Thursday, March 2, 2017

मानवाधिकार वालों को कुचल देना चाहिये-एसपी

मानवाधिकार वालों को कुचल देना चाहिये-एसपी


 March 3, 2017
cgkhabar

जगदलपुर | संवाददाता: सुकमा ज़िले के एसपी आईके एलेसेला ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कुचल देने की बात कही है.
उन्होंने जगदलपुर में एक मोटर कंपनी के निजी समारोह में सार्वजनिक तौर पर भाषण देते हुये कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता ईशा खंडेलवाल और शालिनी गेरा जैसों को इन नये बड़े वाहनों से सड़क पर कुचल देना चाहिये.

बस्तर के पूर्व आईजी शिवराम प्रसाद कल्लुरी इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, जबकि बस्तर के एसपी आरएन दाश विशिष्ट अतिथि के तौर पर इस कार्यक्रम में उपस्थित थे.

एक मोटर कंपनी की एजेंसी की शुरुवात के अवसर पर आयोजित समारोह में सुकमा ज़िले के एसपी आईके एलेसेला ने कहा कि बस्तर में इस तरह की गाड़ियों के लिये सड़कें नहीं हैं. जनता ने साथ दिया तो दिसंबर तक कोंटा तक सड़कें बन जायेंगी.

उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादी समर्थक बताते हुये कहा कि उन्हें आधुनिक तकनीकों वाली वाहनों के नीचे सड़कों पर कुचल देना चाहिये. उन्होंने कहा कि लोग पालतु कुत्ते-बिल्ली को लेकर घूमते हुये पुलिस पर आरोप लगाते हैं.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिवराम प्रसाद कल्लुरी ने माओवादियों के ख़िलाफ चलाये जा रहे अभियान और विकास के मुद्दे पर कहा कि बस्तर में शांति स्थापना के लिये हरसंभव कोशिश जारी रहनी चाहिये.

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एक और सीआरपीएफ के जवान ने की आत्महत्या ,खुदकशी का सिलसिला थम नहीं रहा .

एक और सीआरपीएफ के जवान ने की आत्महत्या ,खुदकशी का सिलसिला थम नहीं रहा .
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  2.3.2017
पत्रिका

बीजापुर. छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों में तैनात जवानों की खुदकुशी का सिलसिला थमने का नाम ही ले रहा, जवान एक के बाद एक लगातार खुदकुशी कर अपनी जान दे रह हैं। गुरुवार सुबह एक और जवान ने पहाड़ से कुछकर खुदकुशी कर ली। मृतक जवान सीआरपीएफ का जवान था और वह उसूर थाने में पदस्थ था। मृतक कुछ ही दिनों पहले छुट्टी से वापस लौटा था।

वह तनावग्रस्त नजर आता थ

यह जवान कुछ ही दिन पहले कुआकोंडा से अवकाश बिताकर काम पर लौटा था। किसी समस्या को लेकर वह तनावग्रस्त नजर आता था। मेहतरराम नाग नाम का यह जवान अपनी समस्या को लेकर किसी से जिक्र नहीं करता था। सुबह ड्यूटी के दौरान यह कैंप से निकल गया।
सुरक्षा बल के एक जवान का शव नदी में देखकर चौंके लोग
अता- पता नहीं चलने पर जवानों ने खोजबीन शुरु की
इसके बाद इसका अता- पता नहीं चलने पर जवानों ने खोजबीन शुरु की। कुछ ही दूरी पर इस जवान को किसी ने पहाड़ी की ओर जाते हुए देखा था। इसकी तस्दीक करते सभी लोग पहाड़ी की ऊंचाई पर पहुंंचे। आगे जाने का रास्ता नहीं था। नीचे देखने पर मेहतरराम का शव नजर आया।

आधी रात जवान ने गर्दन में लगाई राइफल फिर अंगूठे से दबा दिया ट्रिगर
इसका खुलासा नहीं हो पाया है
फिलहाल मामला हत्या या आत्महत्या का है इसका खुलासा नहीं हो पाया है। बीते दिनों दंतेवाड़ा के संखिनी नदी में भी एक जवान सूर्यभान थापा का शव बहता हुआ देखा गया था। इन दिनों जवानों की जान गंवाने की संख्या दिनों- दिन बढ़ती जा रही है।
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पुरंगेल फर्जी मुठभेड़ में मारे गये भीमा कडती और सुखमती हेमला के दोबारा पोस्टमार्टम का आदेश बिलासपुर हाईकोर्ट ने दिया

बड़ी खबर

पुरंगेल फर्जी मुठभेड़ में मारे गये भीमा कडती और सुखमती हेमला के दोबारा पोस्टमार्टम का आदेश बिलासपुर हाईकोर्ट ने दिया
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किरंदुल के बाजार से लौटते वक्त सुरक्षा बलों के द्वारा पुरंगेल के जंगल में फर्जी मुठभेड़ में मारे गये भीमा कडती और सुखमती हेमला के दोबारा पोस्टमार्टम का आदेश आज  बिलासपुर हाईकोर्ट ने दिया ।

आम आदमी पार्टी की नेत्री सोनी सोरी ने फर्जी मुठभेड़ की शिकायत होने पर ग्राम गमपुड़ का दौरा किया थी और मृतकों के परिजनों से मिली थी । जहां ग्रामीणो ने बताया कि वे दोनों का दाह संस्कार तभी करेंगे जब  इस मामले की न्यायिक जाँच के साथ इनका दोबारा पोस्टमार्टम हो ।

आम आदमी पार्टी की लीगल सेल के वकील अमरनाथ पांडे, रजनी सोरेन और किशोर नारायण ने पुरे प्रकरण की याचिका तैयार कर भीमा और सुखमती की माताओं उंगी कड़ती और भीम हेमला की ओर से हाईकोर्ट में 19 फ़रवरी को अर्जी दायर की गयी  थी ।
कल 1 मार्च की इस मामले की सुनवाई जस्टिस गौतम भादुड़ी ने करते हुए आज 2 मार्च को दोबारा पोस्टमार्टम का आदेश जारी किया ।

आप नेता एवम् दिल्ली सरकार क्व मंत्री गोपाल रॉय ने फर्जी मुठभेड़ एवम् महिलाओ से मारपीट की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से 23 फ़रवरी को की है ।

पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है -

28 जनवरी को भीमा कडती अपने नवजात बच्चे की छट्ठी कार्यक्रम की पूजा की तैयारी हेतु अपनी साली सुखमती हेमला के साथ अपने ग्राम गमपुड़ से किरंदुल की ओर निकले ।

किरंदुल बाजार में पूजा सामग्री खरीदने हेतु साथ लायी सल्फी को उन्होंने बाजार में बेचा लेकिन वे दोनों घर वापस नही लौट पाये ।

29 जनवरी को भीमा के बड़े भाई बामन को पुलिस ने सुचना दी कि भीमा और सुखमती माओवादी थे और पुरंगेल के जंगल में मुठभेड़ में मारे गए, उनकी लाश दन्तेवाड़ा के अस्पताल से उन्हें दी गई ।

भीमाके परिजनों ने पाया कि सुखमती के देह पर तरह तरह के निशान थे, जिससे उसके साथ बलात्कार किये जाने की पुष्टि हुई, उनके शवों के साथ छेड़छड़ भी गया प्रतीत हुआ हुआ ।

बामन कड़ती ने अपने निर्दोष भाई और उसकी साली को सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ में मार दिए जाने की शिकायत उच्च स्तर के पुलिस अधिकारियों से करने का फैसला लिया ।

31 जनवरी की पुलिस ने उसे घर से उठाकर थाना बन्द में बन्द कर दिया । बामन के साथ पुलिस ने जमकर मारपीट की, उसके घटनों को चाकू जैसे धारदार हथियार से काट डाला । पुलिस ने उसे माओवादी घोषित कर दिया ।

फर्जी मुठभेड़ और जबरन गिरफ्तारी की मांग मीडिया में फैली, गांववालों ने आम आदमी पार्टी की नेत्री सोनी सोरी से पूरे मामले की शिकायत की और निवेदन किया कि उनकी टीम गाँव का दौरा करे ।

सोनी सोरी ने मामले की प्रारम्भिक जानकारी इकट्ठा कर पाया कि भीमा और सुखमती निर्दोष थे, भीमा बचपन से खेती कर अपने परिवार का गुजर बसर करता था और उसका भाई बामन किरंदुल में ठेका श्रमिक का काम करता था । सुखमती मात्र 15 साल की  थी और उसका परिवार भी ग्राम गमपुड़ में रहता है, उसकी बड़ी बहन की शादी भीमा से लगभग 8 साल पहले हुई थी, जिसकी बड़ी लड़की होने के बाद बेटा एक माह पूर्व हुआ था । भीमा की पत्नी की एक आँख से नही दिखता है ।

भीमा और उसके परिवार की जाँच करने के बाद सोनी सोरी आप के साथियों और दो पत्रकारों के साथ रविवार 12 फ़रवरी को लगभग 15 किमी की पैदल पहाड़ी रास्ता तयकर गमपुड़ पहुंची ।

जहां भीमा की बेवा पत्नी ने रो रोकर पूरी घटना का विवरण दिया । सारे गांववाले भीमा के घर एकत्रित हो गए थे, सभी में सरकार के प्रति जबरदस्त नाराजगी थी,  वे लोग बलात्कार और दोनों हत्याओं के दोषी सुरक्षबलों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे । उपस्थित सैकड़ो ग्रामीणों ने दोनों के सहेजकर रखे गये शवों को दिखाया । ग्रामीणों का कहना था जब तक इन दोनों की हत्या के अपराध में सुरक्षा बलों पर एफआईआर दर्ज नही हो जाता तब तक वे मृतकों का आदिवासी रीति रिवाज अंतिम संस्कार नहीँ करेंगे ।

ग्रामीणो ने सोनी को बताया कि पुलिस ने जब शवो को परिजनों को सुपुर्द किया तभी लगा कि मृतकों के शव से आँखे निकाली गई थी । दोनों के शवों की चीरफाड़ की गई थी, शव क्षत विक्षत हो गए थे ।

ग्रामीण सोनी सोरी के नेतृत्व में इन हत्याओं की एफआईआर कराने की मांग करने लगे ।
15 फ़रवरी को लगभग 600 ग्रामीण पैदल चलकर किरंदुल पहुंचे । जहां सोनी सोरी के नेतृत्व में  थानेदार से माँग किये की पूरे मामले की रिपोर्ट दर्ज हो, दोबारा पोस्टमार्टम हो और यदि वे दोनों माओवादी थे तो उनके खिलाफ दर्ज रिपोर्ट की कॉपी उपलब्ध करायें । थानेदार ने तीनों मांगों को अस्वीकार कर दिया ।
15 फ़रवरी की रात किरंदुल में गुजारने के पश्चात् 16 फ़रवरी को ग्रामीण और भीमा के परिजन सोनी सोरी के साथ दंतेवाड़ा कलेक्टर से अपनी मांगों को लेकर मिले । भीमा और सुखमती की माताओं की ओर से ज्ञापन सौंपा गया,तब कलेक्टर ने कहा की इस मामले की जाँच कोर्ट के आदेश पर ही सम्भव है, क्योंकि पुलिस एफआईआर दर्ज़ कर अपने स्तर पर जाँच कर चुकी है ।

16 फ़रवरी की रात को भीमा और सुखमती के व्यथित परिजनों को सोनी सोरी ने अपने सहयोगी  रिंकी के साथ बिलासपुर हाईकोर्ट रवाना किया । बाकी ग्रामीण अपने गाँव की ओर लौट गए ।

17 फ़रवरी को रायपुर से आप नेता डॉ संकेत ठाकुर भीमा-सुखमती की माताओ, एक भाई और बहन को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट पहुंचे । बिलासपुर जाने के रस्ते पर सोनी सोरी ने  सुचना दी कि भारी संख्या में पुलिस फ़ोर्स गमपुड़ के लिये बीजापुर से निकल गई  है और वहाँ जाकर शवो का अग्नि संस्कार करवा सकती है, क्योंकि यह खबर फैली हुई थी कि ग्रामीणों ने शवो को अपने पास ही रखा है । तत्काल एक आवेदन बिलासपुर से भीमा और सुखमती की ओर फेक्स किया गया कि दिनों शवों से छेड़छाड़ उनकी अनुपस्थिति और अनुमति के बिना नहीं किया जाये ।
18 फ़रवरी की रात्रि को बिलासपुर में हाईकोर्ट के लिये याचिका तैयार कर भीमा के परिजन अपने गाँव वापसी के लिये रवाना हो गए ।

19 फ़रवरी को गमपुड़ पहुँचने पर भीमा के परिजनों को पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में सुरक्षा बलों ने गाँव में घुसकर ग्रामीणों और रिश्तेदारों से खूब मारपीट की । सुरक्षा बलों ने किरंदुल थाना घेराव करने का आरोप लगाकर ग्रामीणों को बन्दूक के कुन्दो से खूब पीटा । लगभग 40 ग्रामीणों और भीमा के रिश्तेदारों को सुरक्षा बलों से मार पड़ी जिनमे से 15  महिलाओं सहित अनेको की हालत गंभीर हो गई ।

इस मारपीट की सुचना सोनी सोरी को दी गई, 21 फरवरी को सोनी सोरी घायलों से मिलने गमपुड़ अपने साथियो के साथ गई, 22 घायलों जिनमे 15 महिलायें शामिल हैं,  को उनका इलाज कराने अपने साथ जगदलपुर के महारानी अस्पताल लेकर आई ।
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प्रियंका शुक्ला की रिपोर्ट 

फिर चर्चा में कल्लूरी, पीएम मोदी को बाहुबली बना यूपी में किया जीत का दावा


फिर चर्चा में कल्लूरी, पीएम मोदी को बाहुबली बना यूपी में किया जीत का दावा
रायपुर। बस्तर रेंज के पूर्व आईजी एसआरपी कल्लूरी एकबार फिर से सुर्खियों में हैं। उन्होंने अपने व्हाट्सएप से एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें यूपी चुनाव के बारे में पीएम मोदी और भाजपा की जबरदस्त जीत का दावा किया गया है। वीडियो में पीएम मोदी को बहुचर्चित फिल्म बाहुबली में हीरो के एक्शन में दिखाया गया है। अखिलेश, राहुल, मायावती और अरविंद केजरीवाल को उन्हें चुपचाप देखते हुए दिखाया गया है।
पूर्व आईजी एसआरपी कल्लूरी द्वारा बनाया गया वीडियो।


कल्लूरी ने यह वीडियो बस्तर इलाके के पत्रकारों और अधिकारियों से जुड़े एक व्हाट्सअप ग्रुप्स में शेयर किया है। वीडियो ने यूपी चुनाव में भाजपा की जीत का दावा किया है। वीडियो में नरेंद्र मोदी बाहुबली फिल्म के एक सीन में शिवलिंग उठाते दिख रहे हैं। इस मौके पर राहुल गांधी सहित बाकि नेता बगल में खड़े होकर उनका मुंह ताक रहे हैं। 

 पढ़ें:-'जब दूसरे कांग्रेस के नेताओं को मार रहे थे, मैं पुलिस को रोकने में जुटी थी'

जानकारों की मानें तो किसी प्रशासनिक अधिकारी का इस तरह से वीडियो वायरल करना सिविल सेवा के नियमों का उल्लंघन है। कल्लूरी को कुछ दिन पहले ही बस्तर आईजी के पद से हटाया गया है। इसके बाद वे स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर छुट्टी पर चले गये। फिर जल्दी ही लौटे। सरकार ने उनको पुलिस मुख्यालय में तैनात कर रखा है। अभी तक उनको कोई प्रभार नहीं दिया गया है। 



कल्लूरी बस्तर में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और वकीलों पर कार्रवाई के कारण लगातार निशाने पर रहे हैं। मौलिक तौर पर यह वीडियो फिल्म बाहुबली का है और उसके साथ छेड़छाड़ कर यूपी चुनाव में प्रचार के लिहाज से बनाया गया है। यूपी में बीजेपी की सरकार बनाने का दावा करने वाले वीडियो को सोशल मीडिया में वायरल करने के बाद एकबार फिर से वे सुर्ख़ियों में हैं। 

पढ़ें:-क्यों नहीं खत्म हो रहा जवानों की आत्महत्या का सिलसिला ?

कल्लूरी को कुछ दिन पहले ही बस्तर आईजी के पद से हटाया गया है। इस बात की भी चर्चा है कि वे 2019 में होनेवाले विधानसभा चुनाव में लड़ सकते हैं।  

Wednesday, March 1, 2017

रेप की भाषा में संवाद की वैचारिकी ---- बादल सरोज

रेप की भाषा में संवाद की वैचारिकी
बादल सरोज
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अपने हिस्से की बहादुरी दिखाकर गुरमेहर कौर दिल्ली छोड़ गयीं हैं !! आज गुरमेहर कौर हैं, कल कोई और होंगी. आज उनका एक कथन है, कल किसी का कुछ और बोलना होगा,या जो न बोला गया हो उसे ही बोला हुआ बता दिया जाए,यह भी हो सकता है कि न बोलना ही मुद्दा बना दिया जाए. यहाँ प्रसंग सिर्फ घटना या व्यक्ति विशेष नहीं है. यहाँ सवाल जुगुप्सा जगाने वाली प्रवृत्ति है. ढीठ आपराधिकता है. आज इस दुष्ट भाव पर राष्ट्रवाद का झीना आवरण है, कल धर्म का, परसों जाति का और अगले दिन लिंग का होगा. इन्ही पत्तियों और काँटों में उलझ कर रह जाइयेगा तो जड़ तो छोड़िये तने और शाखाओं तक भी पहुंचना मुश्किल हो जाएगा.

सवाल है कि किसी सभ्य समाज में कोई संतुलित मनुष्य किसी 19-20 साल की मेधावी बच्ची के साथ बलात्कार करने की बात सोच भी कैसे सकता है. जिसका पिता कारगिल युध्द में या आतंकियों से लड़ते में मारा गया हो उस बेटी को, उसी देश में जिसके लिए वह 2 साल की उम्र में पिता के संरक्षण और स्नेह से वंचित हो गयी थी, उसे घर से खींच कर चौराहे पर सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाने की धमकी लिखा-पढ़ी में देने वाले कौन है ? इनकी समस्या क्या है ? इस काम को विशेषज्ञ मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ देना ठीक विकल्प नहीं होगा. हालांकि उन्हें भी फ़ौरन से पेश्तर इसका विश्लेषण करना चाहिए और समाधान सुझाना चाहिए.

इन दिनों जितनी संक्रामकता के साथ यह संहारक रोग बढ़ा है, वह थोड़े से गहरे अवलोकन की मांग करती है. क्यूंकि न तो यह अनायास है न अपवाद. न अतिरेक है न असंतुलन. इसकी एक वैचारिकी है, उसके कुछ समाजार्थिक आयाम हैं. इन्हें समझे बिना न तो इस मैलिग्नेंसी को समझा जा सकता है, ना ही इसका उपचार किया जा सकता है. यूँ भी विषधर को पूंछ से नहीं फन से पकड़ना होता है.

गुरमेहर कौर के साथ बर्ताब न आदि है न अन्त.
कुछ वर्ष पहले यह जुगुप्सा गुजरात में अमल आती नजर आई थी जब एक गर्भवती महिला को मारकर उसके 7 माह के भ्रूण को विजयध्वज की भाँति त्रिशूल पर लहराया गया था. गौहाटी में दिखी थी जब आदिवासियों के एक जलूस पर हमला कर उसमे शामिल महिलाओं को एकदम नंगा कर उनके कोमल अंगों पर जघन्य वार किये गए थे. हाल ही में इसके एक बड़े नेता, जिसके उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाने की आशंका हवाओं में तैरती दिख रही है, के मृत महिलाओं के साथ तक बलात्कार करने के वीरतापूर्ण उदघोष में सुनाई दी थी. ओड़िसा में एक कोमल सी मासूम बच्ची को उसके उतने ही कोमल भाई तथा डॉक्टर पिता के साथ ज़िंदा जलाके मारने वाली आग में चमकी थी. यह प्रवृत्ति अपनों को भी नहीं बख्शती. यह प्रवृत्ति निरपेक्ष है- इन्ही बंधु- बांधवों ने अपनी ही एक नेता की राजनीतिक बगावत के बाद उनके निजी जीवन को लेकर अपनी गढ़ी पूरी जन्मपत्री खोलकर रख दी थी. अपने अब तक के सबसे बड़े वरिष्ठ नेता के निजी जीवन के बारे में रस ले लेकर अफवाहें उड़ाई थीं. ऐसी सैकड़ों कहानियां और भी है. यहां सिर्फ नमूने भर के उल्लेख किये हैं जो अलग अलग आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

अब यही विषधर युध्द में मारे गए एक सैनिक की युवा होती बेटी के साथ बलात्कार करने के लिए फनफना रहे हैं. कौन हैं ये ?

राष्ट्रवादी तो पक्के से नहीं हैं. राष्ट्रवादी होते तो सबसे पहले उन्हें सजा देने की बात करते जिन्होंने कारगिल की लड़ाई में मरे सैनिकों के ताबूतों की खरीद में कमीशन खाया था. जिनकी तबकी सरकार ने बीच युध्द के दौरान भी पाकिस्तान के साथ व्यापार को जारी रखना पक्का किया था. उस पार्टी को सजा देने की मांग करते जो आतंकवादियों को दहेज़ समेत कंधार में छोड़ कर आयी थी. उस आत्मप्रचारलिप्सा के शिकार नेता के पुतले जलाते जो, बिनबुलाये नवाज़ शरीफ की नातिन की शादी में भात लेकर पहुँच गये थे. उस पार्टी के दफ्तर को फूंकते जिसके 12 लोग आईएसआई के लिए जासूसी के आरोप में अभी अभी मध्यप्रदेश में हिरासत में लिए गए हैं. उन नेताओं को घेरते जिनके साथ वे मंच साझा करते दिखाए दे रहे हैं. उस ट्रम्प के विरुद्ध बोलते जिसके नफ़रती अभियान का पहला शिकार युवा भारतीय इंजीनियर श्रीनिवासन हुआ है, और दुनिया जानती है कि वह आख़िरी नहीं है.

राष्ट्रवादी होते तो लाखों करोड़ रुपयों के रोजाना के आर्थिक लेनदेन को चीनी अलीबाबा की पेटीएम का सौंपने का विज्ञापन करने वाले को न बख्शते, उसे देश पर जबरिया न थोपने देते. जिओ के सिमों के जरिये देश की जनता के आधार कार्ड की जानकारी दूसरे देशों तक नहीं पहुंचाते. भारत के रक्षा से लेकर खुदरा व्यापार, उद्योग से लेकर वित्त तक यहां तक कि शिक्षा और मीडिया तक में खुलेआम विदेशी मगरमच्छो और भेड़ियों को न्यौता देकर घर में नहीं घुसाते. जिसे पड़ोसी कभी पूरा नहीं कर पाये, देश की एकता को तोड़ने का वह नापाक मंसूबा खुद अंजाम नहीं देते.

फिर कौन हैं ये ? भारतीय संस्कृति के रक्षक !! ये तो पक्के से. क्योंकि इन्हें न तो भारत के इतिहास की जानकारी है, न उसके साथ इनका कोई रिश्ता हैं. इन्हें तो हिन्दू शब्द तक की व्युतपत्ति नहीं पता. हाँ भूगोल के साथ इनका सम्बन्ध है सो भी कुछ इस तरह कि इनकी इसी तरह की प्रवृत्ति ने पहले भी इस देश का भूगोल बिगाड़ा है, आईंदा भी बिगड़ा तो इन्ही की वजह से बिगड़ेगा.

इस देश की सांस्कृतिक विरासत की मजबूती यह है कि वह इन जैसों की लाख कोशिशों के बावजूद मनु या गौतम की स्मृति या मुसोलिनी से सीखी वर्दी और हिटलर से समझी निर्ममता पर नहीं टिकी है. वह कभी रावण की कैद से सलामत छूटी सीता के रूप में महाकाव्यों में सुनाई पड़ती है तो कभी दरबार में अपहृत करके लाई गयी शत्रु पक्ष की युवती को “काश इतनी सुन्दर मेरी माँ होती” कहते शिवाजी के व्यवहार के रूप में इतिहास में नजर आती है. ये दरअसल भारत और उसकी सांस्कृतिक विरासत में जो भी सकारात्मक है उसका विलोम हैं.

फिर कौन हैं ये ?
ये “टू इन वन” हैं. पूँजी की छुट्टा लूट और सामन्तों के पाशविक शोषण के अश्वमेध (सामयिक विमर्श की तर्ज पर कहें तो गर्दभमेध) यज्ञ की यात्रा के नए चरण के शिकार भी हैं भारवाहक भी हैं. ये उसके द्वारा रचित संकट की अर्थी पर सवार भी हैं और सीधे वंचना, बेकारी और विपन्नता के श्मशान तक लेजाने वाली खुद की अंतिम यात्रा के तुरहीवादक और बैंड वाले भी हैं. ये साम्राज्यवादी शकुनि की कुटिल शतरंज की बाजी के वे पैदल हैं, जिनका रिमोट भी उन्ही कुटिल हाथों में हैं. इनकी अफीम कही उतर न जाए, ये कहीं सोचने, समझने, विचारने न लगें, इसलिये समय समय पर नयी खुराक इनके गले में उतारी जाती रहती है और ये भजनमण्डली की धुन पर हिलते हिलते इतने खतरनाक पतन के शिकार हो कर क्रोनिक सैडिस्ट बन जाते हैं, जहां एक 19-20 वर्ष की बच्ची के साथ बलात्कार की बातें इन्हें प्रमुदित करने लगती है.
एक ख़ास तरह की सामाजिक आर्थिक दशा इस तरह की वैचारिकी की विष बेलों को खाद पानी देती है. वे जहां एक व्यवस्था का शीराज़ा बिखरने का परिणाम हैं वहीँ उससे भी बदतर निज़ाम की ईंट और गारे भी हैं. यह एक दु:स्वप्न के टूटने के बाद उससे भी खराब दु:स्वप्न की पूर्वपीठिका हैं. वे कहीं ट्रम्प है तो कही ला पेन, कहीं लादेन हैं तो कहीं किसी और नाम के उसके बिरादर. भारत में वे अपनी कल्पित पुरातनता की प्राणप्रतिष्ठा बलात्कारों के शौर्य, विश्विद्यालयों के पराभव और लिखने पढ़ने बोलने वालों के क़त्ल से करना चाहते हैं.

इसलिए बात सिर्फ गुरमेहर कौर की हिफाजत या हिमायत भर से नहीं बनने वाली. वैचारिकी से वैचारिकी के मैदान में जूझना होगा तो साथ ही समाजार्थिक वजहों से उसके कारणों-परिणामों दोनों ही धरातलों पर लड़ना होगा. फैज़ साब की मशहूर नज़्म की तरह इन पैदलों की गैरत जगाने के लिए इनकी सोयी हुयी दुम हिलाने के जतन करने होंगे. झूठ और निराधार भावनात्मकता की अफ़ीम को उतारने के लिए धीरज के साथ किन्तु आक्रामक तरीके से तर्कों और तथ्यों का उपचार देना होगा- और यह सब एक के बाद एक करके नहीँ, एक साथ करना होगा. वरना न क़ानून का राज बचेगा, न संविधान. खुद उनके घरों सहित किसी भी घर की छोटी, बड़ी गुरमेहर सुरक्षित नहीं बचेगी. और जो जो बचेगा उसका बचना भी कोई बचना है क्या ?
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