Sunday, December 4, 2016

बस्तर में आना मना है -बीबीसी - सलमान रावी रिपोर्ट

बस्तर में आना मना है -बीबीसी 

  • 2 घंटे पहले
बस्तर का 'नो एंट्री ज़ोन'
दूर तक सड़क पर किसी इंसान का नाम-ओ-निशां नहीं है. गाड़ियां भी नदारद हैं. जंगलों के बीच से गुज़रती हुई यह सड़क कभी इतनी वीरान नहीं हुआ करती थी. सुकमा से कोंटा जाने वाली इस सड़क पर अब खौफ़ साफ़ झलक रहा है.
छत्तीसगढ़ के बस्तर के हर ग्रामीण इलाक़े में कम-ओ-बेश यही आलम है जहां किसी भी अनहोनी का ख़तरा हमेशा मंडराता रहता है.
मेरी गाड़ी की स्पीड ब-मुश्किल 10 से 15 किलोमीटर प्रति घंटा है क्योंकि इस सड़क का हाल बहुत बुरा है. पिछले कई सालों से यह सड़क बन नहीं पायी है.
स्थानीय अधिकारियों का आरोप है कि माओवादी छापामार बस्तर की ज़्यादातर सड़कों को बनने नहीं दे रहे हैं.
माओवादी छापामार बस्तर की ज़्यादातर सड़कों को बनने नहीं दे रहे हैं
Image captionमाओवादी छापामार बस्तर की ज़्यादातर सड़कों को बनने नहीं दे रहे हैं
मगर, कुछ हफ्ते पहले जब मैं वहां से गुज़रा तो सन्नाटा कुछ अलग कारणों से था. पास ही में स्थित ओडिशा के मलाकनगिरी में आंध्र प्रदेश पुलिस के विशेष दल -'ग्रे हाउंड' ने 28 माओवादियों को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था जिसके विरोध में इस भूमिगत संगठन ने पूरे इलाक़े में बंद का आव्हान किया था.
हर क़दम पर प्रतिबंधों का साया
क्या होता है जब एक दिन का बुलाया गया बंद दो दिनों तक चले? पूरा जन जीवन अस्त व्यस्त. हालांकि यह यहां के लिए अब एक आम बात है.
वैसे यह सब कुछ सिर्फ माओवादियों के प्रतिबंध तक ही सीमित नहीं है. यहां हर क़दम पर प्रतिबंधों का ही साया है.
माओवादियों का पर्चा
Image captionयहां हर क़दम पर प्रतिबंधों का ही साया है
प्रतिबंध तो यहां पिछले कुछ महीनों में बने 'विजिलांटे' गुट, यानी क़ानून के 'स्वयंभू रक्षक' होने का दावा करने वाले गुटों ने भी लगा रखा है. बस्तर में बाहर से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार इनके निशाने पर ज़्यादा रहते हैं.
हाल ही में दरभा घाटी के आगे तोंगपाल के इलाक़े में माओवादियों ने श्यामनाथ बघेल की ह्त्या कर दी जो पुलिस द्वारा कथित रूप से प्रायोजित 'टंगिया गुट' का सदस्य बताया जाता है.
नक्सल विरोधी रैली
Image captionपिछले कुछ महीनों में बने 'विजिलांटे' गुट, यानी क़ानून के 'स्वयंभू रक्षक' गुटों ने भी लगा रखा है
इस ह्त्या के विरोध में 'विजिलांटे' गुट 'अग्नि' यानी 'एक्शन ग्रुप फॉर नेशनल इंटेग्रिटी' ने भी सड़क को जाम कर रखा है.
बघेल की ह्त्या के सिलसिले में बस्तर की पुलिस ने दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेस्सर और सामजिक कार्यकर्ता नंदिनी सुन्दर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रचना प्रसाद और इंस्टिट्यूट आफ सोशल स्टडीज़ के वनीत तिवारी के अलावा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता संजय पराते के ख़िलाफ़ ह्त्या और 'आर्म्स एक्ट' का मामला दर्ज किया.
पुलिस का आदेश
Image captionबस्तर की पुलिस ने नंदिनी सुन्दर और सामजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है
'अग्नि' के निशाने पर सामजिक कार्यकर्ता और बाहर से आने वाले पत्रकार हैं जिनके पुतले बीच सड़क पर जलाए जा रहे हैं.
अग्नि के फ़ारूक़ अली
ऐसा ही कुछ बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में विशेष पुलिस अधिकारी यानी 'एसपीओ' भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं.
'अग्नि' के फ़ारूक़ अली का आरोप है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और बाहर से आने वाले पत्रकार माओवादियों का समर्थन करते हैं. इस लिए उन्हें बस्तर में घुसने नहीं दिया जाएगा.
इन 'विजिलांटे' गुटों की गतिविधियों के कारण सामजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को आने जाने में परेशानी हो रही है.
नक्सल विरोधी रैली
Image caption'अग्नि' का आरोप है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और बाहर से आने वाले पत्रकार माओवादियों का समर्थन करते हैं.
हथियारबंद गुट 'सलवा जुडूम' के अगुवा महेंद्र कर्मा के पुत्र और कांग्रेस के नेता छवींद्र कर्मा का आरोप है कि नक्सल विरोधी अभियान सिर्फ एक दिखावा है.
छविंद्र कर्मा, काँग्रेस नेता
उनका आरोप है कि नक्सलियों का विरोध करने के लिए बनाये गए यह संगठन लोगों को डराकर पैसों की उगाही कर रहे हैं.
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में सुरक्षा बलों और माओवादी छापामारों के बीच चल रहे संघर्ष में 1088 हिंसक वारदातें हुई हैं.
आम लोगों को ज़्यादा नुकसान
इन वारदातों में मरने वाले 168 आम लोग थे जबकि 58 सुरक्षा बलों के जवान और 89 माओवादी थे. यह आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि इस संघर्ष में आम लोगों को ज़्यादा नुकसान हो रहा है.
हिंसा
Image captionसुरक्षा बलों और माओवादी छापामारों के बीच चल रहे संघर्ष में 1088 हिंसक वारदातें हुईं
सबसे ज़्यादा बुरे हालात छत्तीसगढ़ के बस्तर के पांच ज़िलों - बस्तर, कोंडागांव, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा - में हैं.
बस्तर से लगा हुआ ओडिशा के मलकानगिरी का इलाक़ा भी इस संघर्ष का केंद्र बनता जा रहा है.
बस्तर
Image captionमाओवादी बस्तर के एक बड़े हिस्से को अपना 'लिबरेटेड ज़ोन' यानी 'मुक्त अंचल' बनाना चाहते है
बस्तर की अगर बात की जाए तो यह ऐसा लड़ाई का मैदान है जहां लकीरें साफ़ खिचीं हुईं हैं. एक तरफ सरकार तो दूसरी तरफ माओवादी छापामार. यह संघर्ष कई दशकों से चलता आ रहा है जिसमें हज़ारों लोग मारे गए हैं.
यह संघर्ष है इस इलाक़े को 'मुक्त' करने का. सरकार इसे माओवादियों से मुक्त करना चाहती है तो माओवादी इसे अपना 'लिबरेटेड ज़ोन' यानी 'मुक्त अंचल' बनाना चाहते हैं.
यूं तो पूर्वी और मध्य भारत के अलावा दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में माओवादियों का ख़ासा प्रभाव है.
नक्सल विरोधी पुलिस अभियान
Image captionसरकार इस इलाक़े में चलाये जा रहे अभियान की सफलता का भी दावा कर रही है
मगर छत्तीसगढ़ के बस्तर का इलाक़ा इस संघर्ष का एक ऐसा केंद्र रहा है जिसने कई मौतें देखीं हैं.
लगभग 4000 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाक़े के बारे में सरकार का दावा है कि लंबे अरसे से यह माओवादियों के बड़े नेताओं की शरणस्थली है.
वो इसलिए क्योंकि इस इलाक़े की सीमाएं ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के जंगल के इलाक़ों से लगी हुई हैं.
पुलिस बलों का विश्राम स्थल
Image captionअधिकारी दावा कर रहे हैं कि अभियान की वजह से बड़े पैमाने पर नक्सलियों ने आत्म समर्पण करना शुरू कर दिया है.
सुरक्षा बलों का यह भी दावा है कि बस्तर और इससे लगे इलाक़ों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जब भी किसी राज्य में माओवादी छापामारों के ख़िलाफ़ कोई अभियान चलाया जाता है तो उन्हें इलाक़ा बदलने में आसानी होती है.
पिछले दो वर्षों से चलाये जा रहे सघन अभियान के बाद सरकार का यह भी दावा है कि उसने माओवादी छापामारों के प्रभाव को कम किया है.
सरकार इस इलाक़े में चलाये जा रहे अभियान की कामियाबी का भी दावा कर रही है. अधिकारी दावा कर रहे हैं कि अभियान की वजह से बड़े पैमाने पर नक्सलियों ने आत्म समर्पण करना शुरू कर दिया है.
मगर बड़े पैमाने पर माओवादियों का आत्मसमर्पण करवाने के सरकार के दावों पर भी विवाद छिड़ा हुआ है. इसके अलावा बस्तर में हुई कई मुठभेड़ भी विवादों में हैं.
हथियारबंद गुटों की रैली
Image captionसरकार पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि 'सलवा जुडूम' नामक नक्सल विरोधी अभियान पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबन्ध के बाद उसने इस तरह के कई हथियारबंद निजी गुटों को खड़ा किया है
छत्तीसगढ़ की सरकार पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि 'सलवा जुडूम' नामक नक्सल विरोधी अभियान पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बाद उसने इस तरह के कई हथियारबंद निजी गुटों को खड़ा किया है जो 'क़ानून अपने हाथों' में लेकर 'क़ानून की हिफाज़त' का दावा कर रहे हैं.
इस साल सितंबर माह में बस्तर ज़िले के बुरगुम के जंगलों के पास दो छात्रों की मुठभेड़ में हुई मौत भी पुलिस के गले की हड्डी बनी हुई है.
गांववालों का आरोप है कि सोनाकु और बिज्नो नाम के यह दो लड़के परिवार में हुई किसी की मौत की सूचना देने दंतेवाड़ा के बारसूर के इलाके से बुरगुम आये थे.
आरोप है की दोनों ही छात्र अपने रिश्तेदार की झोपड़ी में सो रहे थे जब पुलिस उन्हें उठाकर ले गयी. हालाँकि पुलिस का दावा है कि उसने नदी के पास इन दोनों को मुठभेड़ में मारा था.
उप सरपंच बुमरा राव मंडावी
Image captionबुरगुम के उपसरपंच बुमरा राम मंडावी
मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में विचाराधीन है.
बुरगुम के उपसरपंच बुमरा राम मंडावी से मेरी मुलाक़ात उसी जगह हुई जहाँ पुलिस ने दोनों छात्रों को माओवादी होने के शक में मुठभेड़ में मारने का दावा किया था.
मंडावी कहते हैं कि जंगल के गावों में रहने वाले लोग माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच पिस रहे हैं. उनका कहना है कि माओवादी भी आते हैं और किसी को मुखबिर कहकर मार देते हैं जबकि पुलिस भी किसी को माओवादी बताकर मार देती है.
मैं उपसरपंच से बात कर ही रहा था कि तब तक पुलिस वालों ने मुझे रोका और कहा कि मुझे पहले थाने आना चाहिए और फिर पुलिस की अनुमति के बाद ही इलाक़े में जाना चाहिए.
बस्तर के बुरगुम थाने के एक अधिकारी
वर्ष 2011 में अविभाजित दंतेवाड़ा ज़िले के ताड़मेटला के इलाके में हुई एक घटना ने भी पुलिस की मुश्किलें और बढ़ा दीं हैं. इस घटना में जंगल में रह रहे 252 आदिवासियों के घरों में पुलिस की ओर से आगज़नी करने के आरोप हैं.
शुरू में घटना को अंजाम दिए जाने का इलज़ाम माओवादियों पर डाला गया मगर केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी जांच रिपोर्ट में कुछ और बताया.
इस रिपोर्ट में स्थनीय पुलिस बल और विशेष पुलिस अधिकारियों पर घटना को अंजाम देने की बात कही है.
दूर रखने की कवायद
सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि जब वो घटना की जांच करने ताड़मेटला जा रहे थे तब स्थानीय पुलिस और विशेष पुलिस अधिकारियों ने उन पर भी हमला किया था.
मामला इस लिए भी तूल पकड़ रहा है क्योंकि बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक शिवराम प्रसाद कल्लूरी उस वक़्त दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक थे.
दोनों ही मामलों में पुलिस कटघरे में है. जानकारों का आरोप है कि शायद यही कारण हैं कि बस्तर में जो भी चल रहा है, उस से उन लोगों को दूर रखा जा रहा है जो हक़ीक़त सामने ला सकते हैं.
(बीबीसी हिन्दी के

जनधन खातों में छत्तीसगढ़ की हक़ीकत -बीबीसी

जनधन खातों  में छत्तीसगढ़ की हक़ीकत -बीबीसी

  • 4 दिसंबर 2016
फ़ाइल फोटोImage copyrightPMJDY
देश भर में नोटबंदी के बाद छत्तीसगढ़ में ग़रीबों के लिए खुलवाए गए प्रधानमंत्री जन धन खातों पर बहस शुरू हो गई है. सरकार यह मान कर चल रही है कि जन-धन खातों की जांच के बाद बड़ी रक़म सामने आएगी.
राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा का कहना है, "सभी ज़िलों में अधिकारियों को जन-धन खातों पर नज़र रखने के लिए कहा गया है. माओवाद प्रभावित इलाकों में खास तौर पर इन खातों की जांच-पड़ताल के लिए कहा गया है. हम यह मान रहे हैं कि इन खातों में काला धन जमा करने की कोशिश हो सकती है."
लेकिन अभी तक के आंकड़े बता रहे हैं कि नोटबंदी के तीन हफ्ते बाद भी छत्तीसगढ़ में ये जन-धन खाते खस्ताहाल में हैं.
पूरे देश में खोले गये जन-धन खातों में 22.84 प्रतिशत खाते ज़ीरो बैलेंस वाले हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसे ज़ीरो बैलेंस वाले खातों की संख्या पूरे देश में सबसे अधिक है.
फ़ाइल फोटोImage copyrightPMJDY
प्रधानमंत्री जन धन योजना की वेबसाइट पर जारी आंकड़ों के अनुसार 30 नवंबर तक छत्तीसगढ़ में जन धन खातों की संख्या 1 करोड़ 19 लाख 14 हज़ार 626 है, लेकिन इनमें से 39 लाख 32 हज़ार 844 खातों में फूटी कौड़ी तक नहीं है. यह कुल खातों का 33 फ़ीसदी है.
30 नवंबर 2016 को देश में जन धन खातों की स्थिति
कुल खाते257847514
शून्य बैलेंस वाले खाते58914748
शून्य बैलेंस वाले खातों का प्रतिशत-22.84%
कुल जमा74321.56 करोड़ रुपए
प्रत्येक खाते में औसत जमा2882.38 रुपये
छत्तीसगढ़ में जन धन खातों का हाल
कुल खाते11914626
शून्य बैलेंस वाले खाते3932844
शून्य बैलेंस वाले खातों का प्रतिशत33%
कुल जमा1842.86 करोड़ रुपये
प्रत्येक खाते में औसत जमा1546.72 रुपये
अगर छत्तीसगढ़ में सभी जन धन खातों में जमा रक़म की बात की जाए तो यह 1842.86 करोड़ रुपए है. इस तरह औसतन हर खाते में लगभग 1547 रुपए जमा हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ों की पड़ताल करें तो पता चलता है कि 9 नवंबर तक देश में ज़ीरो बैलेंस वाले खातों की संख्या 5 करोड़ 93 लाख 67 हज़ार 309 थी. 30 नवंबर तक इनमें से केवल 452561 खाते ऐसे थे, जिनमें पैसे जमा कराये गए, यानी नोटबंदी की घोषणा के बाद से 30 नवंबर तक ज़ीरो बैलेंस वाले केवल 0.76 प्रतिशत खातों में ही पैसे डाले गये हैं.
छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के नेता आनंद मिश्रा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने मुरादाबाद की रैली में भी जनधन खातों को लेकर बात की लेकिन वो उन उद्योगपतियों, नेताओं की बात नहीं कर रहे हैं, जिनके पास काला धन है.
जनधन योजना के प्रचार में महिलाImage copyrightPMJDY
आनंद मिश्रा कहते हैं- "नोटबंदी के पूरे फ़ैसले में ग़रीब आदमी प्रताड़ित हो रहा है. जबकि सरकार खुद ही काले धन को सफ़ेद धन में बदलने के कदम बता रही है. ध्यान पलटने के लिये जनधन खाता और कैशलेस इकॉनामी की बात हो रही है."

Saturday, December 3, 2016

धर्म बदलते ही आतंकी से अपराधी क्यों बन गये नाभा जेल से भागे क़ैदी?

धर्म बदलते ही आतंकी से अपराधी क्यों बन गये नाभा जेल से भागे क़ैदी?

Posted on 27 Nov 2016 by Admin     
धर्म बदलते ही आतंकी से अपराधी क्यों बन गये नाभा जेल से भागे क़ैदी?
खबरों के मुताबिक रविवार सुबह पुलिस की वर्दी में आए 10 हथियारबंद लोगों ने नाभा जेल में हमला कर खालिस्तान लिबरेशन फोर्स के आतंकी हरमिंदर सिंह मिंटू समेत 5 लोगों को भागकर ले गए हैं। 
चार अन्य फरार बदमाशों के नाम गुरप्रीत सिंह, विकी गोंदरा, नितिन देओल और विक्रमजीत सिंह है।
हथियारबंद लोगों ने जेल में करीब 100 राउंड फायरिंग की। फिलहाल घटनास्थल पर पुलिस पहुंच गई है और मामले की जांच की जा रही है। ये आज की सबसे बड़ी खबर है, इसके बहूत सारे पहलू हैं|
1. खालिस्तान लिबरेशन  फ्रंट का मक़सद अटूट भारत को तोड़ कर पंजाब को एक अलग देश खालिस्तान बनाना है, अब आप तै करलें कि ये संगठन देशद्रोही, आतंकी और ग़द्दार है या नहीं?
2. इसका मुखिया हरमिंदर सिंह मिंटू एक कुख्यात आतंकी है, जो 2008 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम और हलवाड़ा एयरफोर्स स्टेशन आतंकी हमले जैसे कई बड़े आतंकी धमाकों में शरीक था| ये KLF के लिये फंड जुटाने और नेटवर्किंग का काम करता था, यह दुनिया के कई देशों में जा चुका है, 2013 में पाकिस्तान में भी था, 2014 में इसे भारत से फरार होते हुये IGI एयरपोर्ट पर गिरिफ्तार किया गया था, अब आप ही बतायें कि एैसे कुख्यात, देशद्रोही को फक़त अपराधी कहेंगें या आतंकवादी???
3. पंजाब के नाभा जेल जैसे अतिसुरक्षित जेल से जहां हाईप्रोफाईल सेक्योरिटी होती है वहां 10 बदमाश आते हैं और बड़े आराम से 100 राऊण्ड गोलियां चलाकर 6 लोगों को भगा ले जाते हैं, ना कोई जेलकर्मी ज़ख्मी या हताहत हुआ, ना ही किसी तरह का कोई नुक़सान, ये भी एक बड़ा सवाल है|

4. अकाली दल, भाजपा शासित इस राम राज्य की पूलिस ने एक लड़की को फरार कैदी समझ कर गोली मार दी, लड़की की मौत भी हो गई, क्या राज्य सरकार ने इन फरार आतंकियों को अंधाधुंध मारने की इज़ाजत दे दी है??
अब आईये बात करते हैं भोपाल जेल से भगाये गये कैदियों और नाभा जेल से भागे आतंकियों के बारे में मीडिया की नीति पर, भोपाल जेल से रात के 3 बजे 8 विचाराधीन क़ैदियों को प्रशासन द्वारा भाग जाने को कहा जाता है, उन सबको नये कपड़े और एक जैसे डिज़ाईन के ब्रान्डेड जूते दिए जाते हैं, और जेल से 10 किमी दूर एक जंगल में छोड़ दिया जाता है कि चले जाओ और फिर घेरकर निहत्थे लोगों 
को मार दिया जाता है।

क्युँकि इस एनकाऊन्टर में मारे गये बेगुनाहों का ताल्लुक़ सिमी नामी एक एैसे संगठन से था, 15 वर्ष पहले ही जिसे भारत में प्रतिबंध लगाकर समाप्त कर दिया गया था, तब इन बेकुसूरों का बचपन था, उसी सिमी के यह 8 लोग जब 25-30 साल की उम्र के हुये तो सिमी के खूँखार आतंकवादी बना दिये गये, मीडिया ने इन्हें इंटरनेशनल आतंकी और भारत की सुरक्षा के लिये खतरनाक बताया था|
अब आईये आज की बात करते हैं, नाभा जेल से फरार हरमिंदर सिंह मिंटू और उसके संगठन दोनों से ही देश की एकता व अखंडता को खतरा है| ये भारत को विभाजित करने की कोशिश में लगे हैं| हरमिंदर कई बड़े आतंकी हमलों का मास्टरमाईन्ड है, और इसे व इसके साथियों को एक अतिसुरक्षित जेल से दिनदहाड़े हथियारों के दम पर छुड़ा लिया जाता है और हमारी मीडिया इन्हें सिर्फ़ अपराधी कहकर दामन छुड़ा लेती है| क्या इस लिये कि वहां मुसलमान थे और यहां गैर मुस्लिम?

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि मीडिया को ये हक़ किसने दिया है कि वो एक आतंकी पर फक़त उसके मुस्लिम ना होने की वजह से नर्म रुख अपना लेती है और आतंकी, देशद्रोही, ग़द्दार को एक आम अपराधी बना देती है| अब ये तो आप तै करेंगें कि लोकतंत्र के इस चौथे सतम्भ मीडिया पर कैसे  विचारधारा के लोगों का क़ब्ज़ा है? और मीडिया समाज को किस तरह से बांटा जा रहा है? और क्या इन खालिस्तानी आतंकियों का एनकाऊन्टर कर दिया जायेगा या मामूली अपराधी कह कर बाईज्जत मेहमान खाने में वापस ले आया जायेगा|
मेहदी हसन एैनी क़ासमी

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Friday, December 2, 2016

शान्ति काल में पूँजी के हाथों हुए सबसे बड़े हत्याकाण्ड का नाम है भोपाल*






भोपाल गैस त्रासदी की 32वीं बरसी (3 दिसम्बर) पर*
*शान्ति काल में पूँजी के हाथों हुए सबसे बड़े हत्याकाण्ड का नाम है भोपाल*
शिवार्थ

मुनाफे की हवस में भागती पूँजी की रक्तपिपासु राक्षसी की प्यास इंसानी ज़िन्दगियों को हड़पे बिना शान्त नहीं होती। पूँजीवाद का पूरा इतिहास बर्बर हत्याकाण्डों और नृशंस जनसंहारों से भरा हुआ है। मुनाफे के बँटवारे के लिए लड़े जाने वाले युद्धों के दौरान वह हिरोशिमा और नागासाकी जैसे हत्याकाण्ड रचता है और शान्ति के दिनों में भोपाल जैसे जनसंहारों को अंजाम देता है। कम से कम बीस हज़ार लोगों को मौत के घाट उतारने और करीब छह लाख लोगों को अन्धेपन से लेकर दमा जैसी बीमारियों का शिकार बनाने वाली इस घटना को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह दुर्घटना नहीं थी। इस हादसे ने एक बार फिर बस यही साबित किया कि पूँजीपतियों के लिए इंसानों की ज़िन्दगी मुनाफे से बढ़कर नहीं होती। एक ओर मुनाफे के लिए बेहद ज़हरीली गैसें तैयार की जाती हैं और दूसरी ओर पैसे बचाने के लिए सुरक्षा के सारे इंतज़ाम ताक पर धर दिये जाते हैं।

भोपाल में भी यही हुआ था। 2 दिसम्बर 1984 की रात को अमेरिकी कम्पनी यूनियन कार्बाइड की भारतीय सब्सिडियरी यूसीआईएल की भोपाल स्थित कीटनाशक फैक्ट्री से निकली चालीस टन ज़हरीली गैसों ने हज़ारों सोये हुए लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

दो और तीन दिसम्बर की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे कारख़ाने में काम करने वाले मज़दूरों ने एक विशाल टैंक से रिस रही गैस के कारण ऑंखों में जलन की शिकायत करनी शुरू की। करीब साढ़े बारह बजे खतरे का अलार्म बजाया गया और पानी का छिड़काव शुरू किया गया। शहर में किसी को कोई खबर नहीं थी। फैक्ट्री के चारों ओर बसी मेहनतकश लोगों की बस्तियों में दिनभर की मेहनत से थके लोग सो रहे थे। सुबह करीब तीन बजे भीषण विस्फोट के साथ टैंक फट गया और 40,000 किलो ज़हरीली गैसों के बादलों ने भोपाल शहर के 36 वार्डों को ढँक लिया। इनमें सबसे अधिक मात्रा में थी दुनिया की सबसे ज़हरीली गैसों में से एक मिथाइल आइसोसाइनेट यानी एमआईसी गैस। कुछ ही देर में सोये हुए लोग गिरते-पड़ते घरों से निकलने लगे। गैस का असर इतना तेज़ था कि चन्द पलों के भीतर ही सैकड़ों लोगों की दम घुटने से मौत हो गयी, हज़ारों अन्धे हो गये, बहुत सी महिलाओं का गर्भपात हो गया, हज़ारों लोग फेफड़े, लीवर, गुर्दे, या मस्तिष्क काम करना बन्द कर देने के कारण मर गये या अधमरे से हो गये। बच्चों, बीमारों और बूढ़ों को तो घर से निकलने तक का मौका नहीं मिला। हज़ारों लोग महीनों बाद तक तिल-तिल कर मरते रहे और करीब छह लाख लोग आज तक विकलांगता और बीमारियों से जूझ रहे हैं। यह गैस इतनी ज़हरीली थी कि पचासों वर्ग किलोमीटर के दायरे में मवेशी और पक्षी तक मर गये और ज़मीन और पानी तक में इसका ज़हर फैल गया। जो उस रात मौत से बच गये वे 32 बरस बीत जाने के बाद भी आज तक तरह-तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं। इस ज़हर के असर से कई-कई वर्ष बाद तक उस पूरे इलाके में पैदा होने वाले बच्चे जन्म से ही विकलांग या बीमारियों से ग्रस्त होते रहे। आज भी वहाँ की ज़मीन और पानी से इस ज़हर का असर ख़त्म नहीं हुआ है। कई अध्‍ययनों ने साबित किया है कि माँओं के दूध तक में यह ज़हर घुल चुका है।

पूँजी के इस हत्याकाण्ड के बाद एक आज़ाद देश की सरकारों ने अपने ही नागरिकों के साथ जो सलूक किया वह इससे कम बर्बर और अमानवीय नहीं है। पिछले 32 वर्ष से भोपाल गैस पीड़ितों के साथ एक घिनौना मज़ाक जारी है। इसमें सब शामिल रहे हैं – केन्द्र और राज्य की कांग्रेस और भाजपा सरकारें, सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों तक पूरी न्यायपालिका और स्थानीय नौकरशाही।

आज तक इस हत्याकाण्ड के मामले में एक भी व्यक्ति को सज़ा नहीं हुई है। यूनियन कार्बाइड कम्पनी के प्रमुख वॉरेन एण्डरसन को भारत आते ही गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन छह घण्टे में ही उसकी न सिर्फ ज़मानत हो गयी बल्कि राज्य सरकार के विशेष विमान से उसे दिल्ली ले जाया गया जहाँ से वह उसी दिन अमेरिका रवाना हो गया। उसके बाद उसे भारत लाने के भारत सरकार के तमाम तथाकथित प्रयास बेकार साबित हुए। सरकार ने यूनियन कार्बाइड और अमेरिका के सामने घुटने टेकते हुए अपने देश के लाखों गैस पीड़ितों के हितों का बेशर्मी के साथ सौदा कर लिया। अमेरिकी अदालतों में यूनियन कार्बाइड बार-बार उसे ठेंगा दिखाती रही और अमेरिका का उसे पूरा समर्थन मिलता रहा।

भारत की अदालतें भी इससे कुछ कम नहीं साबित हुईं। लम्बी कानूनी नौटंकी के बाद 1989 में सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड पर कुल 47 करोड़ डॉलर का जुर्माना किया। (उस वक्त क़े मूल्य से यह रकम 713 करोड़ रुपये हुई।) शायद यह पहली बार हुआ होगा कि किसी अपराधी पर जुर्माना उसकी मर्ज़ी से किया गया। जुर्माने की यह रकम इस सरकारी ऑंकड़े पर आधारित थी कि गैस हादसे में कुल 3000 लोग मारे गये और 1,05,000 लोग घायल या बीमार हुए। सरकार के इस ऑंकड़े का कोई भी आधार नहीं है क्योंकि आज तक उस दुर्घटना से प्रभावित होने वाले लोगों की वास्तविक संख्या जानने के लिए किसी सरकार ने कोई सर्वेक्षण कराया ही नहीं। विभिन्न एजेंसियों और संगठनों के अनुमानों और गैस पीड़ितों द्वारा खुद अदालत में पेश किये गये साक्ष्यों के आधार पर माना जाता है कि मृतकों और गैस पीड़ितों की वास्तविक संख्या क्रमश: 20,000 और 5,75,000 है। जुर्माने की इस मामूली सी रकम में से 113 करोड़ रुपये मवेशियों और मकानों को हुए नुकसान के लिए देने के बाद बचे 600 करोड़ रुपये पौने छह लाख गैस पीड़ितों में बाँटे गये जिन्हें बरसों के इंतज़ार के बाद औसतन प्रति व्यक्ति 12,410 रुपये मिले। जले पर नमक रगड़ने की इस कार्रवाई के विरोध में गैस पीड़ित जब दोबारा सुप्रीम कोर्ट के पास गये तो उन्हें राज्य सरकार के पास भेज दिया गया। राज्य सरकार के कल्याण आयुक्त ने अधिक मुआवज़ा देने का उनका दावा खारिज कर दिया। इसके बाद भी गैस पीड़ित मुआवज़े के लिए लम्बी लड़ाई लड़ते रहे। और 30 नवम्बर 2009 को मध्‍यप्रदेश उच्च न्यायालय ने भी उनकी अपील खारिज कर दी।

देशी-विदेशी पूँजीपतियों की सेवा में बिछी जा रही सरकारों से इसके अलावा और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। भोपाल में मरने और विकलांग होने वाले लोगों का एक दोष यह भी था कि उनमें से ज्यादातर मेहनतकश और ग़रीब तबके के लोग थे। इस व्यवस्था में उनकी जान की कीमत यूँ भी कुछ नहीं होती। कुछ हज़ार ग़रीबों के लिए भला कोई पूँजीवादी सरकार अपने देशी-विदेशी आकाओं की नाराज़गी क्यों मोल लेगी। किसी विराट मल्टीनेशनल कम्पनी के अफसर को गिरफ्तार करके या उस पर मुआवज़ा ठोंककर वह देश में पूँजी निवेश का माहौल भला क्यों ख़राब करेगी? वैसे तो यूनियन कार्बाइड कम्पनी के अलावा भारत सरकार को भी गैस पीड़ितों को उचित मुआवज़ा देना चाहिए था क्योंकि इस हादसे के लिए वह भी उतनी ही ज़िम्मेदार है। लेकिन पूँजीपतियों को मन्दी से बचाने के लिए अरबों रुपये का बेलआउट पैकेज देने वाली सरकार के पास अपने ग़रीब नागरिकों की उजड़ी हुई ज़िन्दगी बहाल करने के लिए चन्द करोड़ रुपये भी नहीं हैं।

हादसे के शिकार लोगों के प्रति सरकारी उपेक्षा का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतने सालों के दौरान आज तक उनके इलाज की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं की गयी है। ज़हरीली गैसों के असर पर आज तक न तो कोई चिकित्सकीय शोध कराया गया और न ही उसके कारण हुई बीमारियों का कोई उचित इलाज सुनिश्चित किया गया। भोपाल के विभिन्न अस्पतालों में आज भी रोज़ाना करीब 6000 गैस पीड़ित इलाज के पहुँचते हैं। ज्यादातर डॉक्टर लक्षणों के आधार पर उनका कामचलाऊ इलाज करते रहते हैं।

अब भी जारी लापरवाही का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यूनियन कार्बाइड के परिसर में 2 दिसम्बर, 1984 से आज तक 44,000 किलो लिसलिसा कचरा और 25,000 किलो अल्फा नेप्थॉल खुले में पड़ा हुआ है। कई अध्‍ययन बता चुके हैं कि इससे आसपास के बड़े इलाके की ज़मीन और भूजल में ज़हर घुल रहा है लेकिन सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी है। कारख़ाने के इर्द-गिर्द के इलाकों में बसी अनेक बस्तियों में आज भी पेयजल की पाइप द्वारा आपूर्ति की व्यवस्था नहीं है और लोग दूषित भूजल ही पीने के काम में लाते हैं।

भोपाल हादसे को इतने बरस हो गये मगर इस बीच अनेक छोटे-छोटे भोपाल देशभर में होते रहे हैं। उद्योगीकरण की अन्धाधुन्ध दौड़ में आज भी आये दिन छोटी-बड़ी दुर्घटनाओं में मज़दूरों और आम लोगों की मौत होती रहती है, जिनमें से कुछ अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बनती हैं, मगर बहुतों की तो ख़बर तक नहीं हो पाती। भोपाल हादसे की 32वीं बरसी ने एक बार फिर पूँजी के नरभक्षी चरित्र की याद दिलाने का काम किया है। हमें यह नहीं भूलना होगा कि जब तक पूँजीवाद रहेगा, भोपाल और चेर्नोबिल जैसे हादसे होते रहेंगे।

*तथ्य गवाह हैं कि यह हादसा नहीं, मुनाफे की दौड़ में इंसानों की बलि थी...*

अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड औद्योगिक गैसों से लेकर विभिन्न प्रकार के कीटनाशकों का उत्पादन करती थी। 1954 में इसने ‘सेवन’ नामक एक रसायन का उत्पादन शुरू किया जिसको तैयार करने के दौरान एम.आई.सी. नामक एक गैस पैदा होती है। एम.आई.सी. आज तक बनायी गयी सबसे जहरीली रासायनिक गैसों में से एक है। यह वही वुफख्यात गैस है जिससे प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हज़ारों सैनिकों को चंद मिनटों के भीतर मौत की नींद सुला दिया गया था। यू.सी.सी. के वैज्ञानिकों द्वारा जब इसका परीक्षण चूहों एवं अन्य जानवरों पर किया गया तो उसके नतीजे इतने खतरनाक थे कि वंफपनी ने इस शोध को प्रकाशित ही नहीं होने दिया। वैज्ञानिकों के अनुसार सुरक्षा इंतजाम में किसी भी तरह की चूक से, इसके लीक होने की सूरत में एक अत्यंत भयंकर विस्फोट को नहीं टाला जा सकता था। इसे लीक होने से बचाने के लिए एकमात्र उपाय था कि इसे 5 डिग्री या उससे कम तापमान पर रखा जाए। लेकिन भोपाल संयंत्र में गैस टैंक का तापमान कम रखने के लिये लगाया गया रेप्रिफजरेशन प्लाण्ट जून 1984 से ही बन्द पड़ा था। टैंक का वाल्व भी काफी समय से ख़राब था।

दुर्घटना की आशंका के कारण इस तरह के उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियाँ ज्यादातर अमीर देशों द्वारा तीसरी दुनिया के देशों में स्थापित की जाती हैं, और तैयार उत्पाद को निर्यात करा लिया जाता है। यू.सी.सी. ने भी भारत में अपना काम आज़ादी से पहले ही शुरू कर दिया था। 1966 में भारत सरकार और यू.सी.सी. के बीच हुए एक समझौते के अनुसार ‘सेवन’ रसायन के 5000 टन उत्पादन के लिए भोपाल के काल मैदान में एक फैक्ट्री लगानी थी। इस उत्पादन में से 1200 टन अमेरिका को निर्यात होना था। यू.सी.सी. ने अपने इस कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेदारी एदुआर्दो मुनोज़ नामक एक अर्जेण्टीनी इंजीनियर को सौंपी। एदुआर्दो ने तुरंत इस बात पर आपत्ति ज़ाहिर की कि 5000 टन सेविन के उत्पादन के लिए भारी मात्रा में एम.आई.सी. गैस का भण्डारण करना पड़ेगा जो अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता था। उन्हाेंने प्रस्ताव रखा कि भण्डारण के बजाए जरूरत के मुताबिक गैस का उत्पादन किया जाए। यह थोड़ा महँगा होगा, लेकिन इससे ख़तरा कम हो जायेगा। उनका प्रस्ताव अमेरिकी औद्योगिक नीति के ख़िलाफ था, और इसलिए उन्हें यह कहकर चुप करा दिया गया कि ‘आपको फिक्र करने की जरूरत नहीं है, हमारी भोपाल इकाई बिल्वुफल चॉकलेट फैक्ट्री जैसी सुरक्षित रहेगी। एदुआर्दो ने फैक्ट्री के लिए चुनी गयी जगह पर भी आपत्ति ज़ाहिर की, क्योंकि यह रिहायशी इलाके के बीच में थी। यह अपील भी ठुकरा दी गई।

नगरनिगम योजना के मानकों के अंतर्गत भी फैक्ट्री के लिए प्रस्तावित जगह रद्द कर दी जानी चाहिए थी, लेकिन मध्‍यप्रदेश सरकार ने यू.सी.सी. का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 1979 तक फैक्ट्री ने काम भी शुरू कर दिया गया, लेकिन काम शुरू होते ही कई दुर्घटनाएँ हुई। दिसंबर 1981, में ही गैस लीक होने के कारण एक मज़दूर की मौत हो गई और दो बुरी तरह घायल हो गए। लगातार हो रही दुर्घटनाओं के मद्देनज़र मई, 1982 में तीन अमेरिकी इंजीनियरों की एक टीम फैक्ट्री का निरीक्षण करने के लिए बुलाई गई। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि मशीनों का काफी हिस्सा खराब है, एवं गैस भण्डारण की सुविधा अत्यंत दयनीय है जिससे कभी भी गैस लीक हो सकती है और भारी दुर्घटना संभव है। इस रिपोर्ट के आधार पर 1982 में भोपाल के कई अखबारों ने लिखा था कि ‘वह दिन दूर नहीं, जब भोपाल में कोई त्रासदी घटित हो जाए।’ फिर भी न तो कम्पनी ने कोई कार्रवाई की और न ही सरकार ने।


Thursday, December 1, 2016

अडानी की जनसुनवाई पर सवाल उठाये छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने

अडानी की जनसुनवाई पर सवाल उठाये छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने .
Friday, December 2, 206
Cg khabar
रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में अडानी के प्रस्तावित सरगुजा रेल कॉरीडोर को लेकर शुक्रवार को होने वाली जनसुनवाई सवालों के घेरे में आ गई है. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने आरोप लगाया है कि इस जन सुनवाई के लिये निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है और अडानी व सरकार की मिलीभगत से सारे कानूनी प्रावधानों को किनारे किया जा रहा है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की ओर से जारी बयान में कहा गया है अडानी कंपनी द्वारा प्राइवेट रेल कॉरीडोर के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए कल 2 दिसम्बर को साल्ही गाँव में ग्राम पंचायत भवन में ऐसी जनसुनवाई कराई जा रही है, जिसकी ना तो क्षेत्रीय ग्रामीणों को, ना ही क्षेत्र के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को कोई सूचना है. जबकि सामाजिक प्रभाव आंकलन के लिए बने नियमों “भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवास्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार (सामाजिक समाघात निर्धारण, सहमति तथा जन सुनवाई) नियम 2016 के अनुसार किसी भी भूमि अधिग्रहण से पूर्व सामाजिक प्रभाव आंकलन रिपोर्ट तैयार की जानी है और उसका प्रकाशन पंचायत तथा प्रमुख स्थानों पर किया जाना है जिसके पश्चात जनसुनवाई का आयोजन किया जाना चाहिए.

अपने बयान में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की ओर से कहा गया है कि जनसुनवाई से पूर्व इस रिपोर्ट का विस्तृत प्रचार प्रसार कराना और ग्रामीणों को इसके सम्बन्ध में जनसुनवाई से पूर्व पर्याप्त समय देना अति आवश्यक है. धारा 12 के अनुसार इसकी बाकायदा पोस्टर चस्पा के अलावा विस्तृत मुनादी करवाना भी आवश्यक है. चूंकि यह क्षेत्र पाँचवी अनुसूची क्षेत्र है, इसलिए नियमों की धारा 13 के अनुसार यहाँ जनसुनवाई से पूर्व ग्राम सभा की सहमति की भी आवश्यकता है. परन्तु निर्धारित जनसुनवाई से पूर्व ना ही गाँव में इसकी कोई स्पष्ट सूचना पहुंची है और ना ही सामाजिक प्रभाव आंकलन रिपोर्ट की प्रति मिली है. यहां तक कि यहाँ इस सम्बन्ध में किसी ग्राम सभा का आयोजन किया गया है.

आंदोलन की ओर से कहा है कि रेल कॉरीडोर के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तो लगभग संपन्न भी होने आई है और कई लोगों की ज़मीन तो अधिग्रहित भी की जा चुकी है, जिसमें मुआवज़ा वितरण के साथ ही सहमति पत्र अनिवार्यता से ली जा रही है. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के बयान में कहा गया है कि यह काम कायदे से जनसुनवाई के बाद ही कराया जाना चाहिए, जिसमें प्रभावितों के साथ-साथ पूरे ग्रामवासियों को विचार-विमर्श किया जाना चाहिए और ग्राम सभा की मंज़ूरी ली जानी चाहिए. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने इस जन सुनवाई को रद्द करने की मांग की है.

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बंगाल में सेना तैनात-ममता Friday, December 2, 2016 सीजी खबर कोलकाता | संवाददाता: क्या बंगाल में सेना तैनात कर दी गई है? कम से कम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो यही दावा किया है. हालांकि सेना ने कहा कि वह पूरे पूर्वोतर में गाड़ियों की जांच कर रही है. लेकिन इन दोनों बयानों के बीच तेजी से अफवाह फैली कि पूर्वोत्तर में सेना को युद्ध की तैयारी के समय जितने वाहनों की जरुरत होगी, यह जांच उसी तैयारी का हिस्सा है. गुरुवार की रात ममता बनर्जी ने ट्वीट करके आरोप लगाया कि बंगाल राज्य सचिवालय के बाहर सेना तैनात कर दी गई है. उन्होंने कहा कि पुलिस के विरोध के बावजूद अति सुरक्षित इलाक़े में सेना भेजना दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं सचिवालय में ही हूं और नज़र रख रही हूँ अपने लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए. ममता बनर्जी ने कहा कि जब तक सचिवालय से सेना नहीं हटा ली जाती मैं लोकतंत्र की रक्षा के लिए सचिवालय में ही रहूंगी. हालांकि इसके उलट सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पूरे पूर्वोतर में सेना बड़ी गाड़ियों की जांच कर रही है. सेना के पूर्वी कमान ने ट्वीट कर के यह जानकारी दी कि उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में सेना टोल नाकों पर गाड़ियों की पूछताछ की रूटीन कार्रवाई कर रही है. इस बयान के अनुसार असम में 18 जगहों पर, अरुणाचल में 13, पश्चिम बंगाल में 19, मणिपुर में 6, मेघालय में 5 और त्रिपुरा और मिज़ोरम में एक-एक जगहों पर सेना गाड़ियों की जांच कर रही है. सेना ने दावा किया कि सेना की ये कार्रवाई एक रूटीन गतिविधि है और पश्चिम बंगाल की पुलिस की जानकारी में इसे किया जा रहा है. लेकिन सेना के इस बयान के बाद ममता बनर्जी ने फिर दावा किया कि सेना ग़लत बयानी कर रही है. ममता ने फिर से ट्वीट करते हुये कहा कि ईस्टर्न कमांड ने पूरी तरह ग़लत और ध्यान बंटाने वाले तथ्य दिए हैं. हम आपका पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन कृपया लोगों को गुमराह न करें. ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दार्जीलिंग, बैरकपुर, उत्तरी 24 परगना, हावड़ा, हुगली, मुर्शिदाबाद और बर्दवान ज़िलों में भी सेना तैनात की गई है. ***




बंगाल में सेना तैनात-ममता

Friday, December 2, 2016
सीजी खबर

कोलकाता | संवाददाता: क्या बंगाल में सेना तैनात कर दी गई है? कम से कम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो यही दावा किया है. हालांकि सेना ने कहा कि वह पूरे पूर्वोतर में गाड़ियों की जांच कर रही है. लेकिन इन दोनों बयानों के बीच तेजी से अफवाह फैली कि पूर्वोत्तर में सेना को युद्ध की तैयारी के समय जितने वाहनों की जरुरत होगी, यह जांच उसी तैयारी का हिस्सा है.

गुरुवार की रात ममता बनर्जी ने ट्वीट करके आरोप लगाया कि बंगाल राज्य सचिवालय के बाहर सेना तैनात कर दी गई है. उन्होंने कहा कि पुलिस के विरोध के बावजूद अति सुरक्षित इलाक़े में सेना भेजना दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं सचिवालय में ही हूं और नज़र रख रही हूँ अपने लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए. ममता बनर्जी ने कहा कि जब तक सचिवालय से सेना नहीं हटा ली जाती मैं लोकतंत्र की रक्षा के लिए सचिवालय में ही रहूंगी.


हालांकि इसके उलट सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पूरे पूर्वोतर में सेना बड़ी गाड़ियों की जांच कर रही है. सेना के पूर्वी कमान ने ट्वीट कर के यह जानकारी दी कि उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में सेना टोल नाकों पर गाड़ियों की पूछताछ की रूटीन कार्रवाई कर रही है.


इस बयान के अनुसार असम में 18 जगहों पर, अरुणाचल में 13, पश्चिम बंगाल में 19, मणिपुर में 6, मेघालय में 5 और त्रिपुरा और मिज़ोरम में एक-एक जगहों पर सेना गाड़ियों की जांच कर रही है. सेना ने दावा किया कि सेना की ये कार्रवाई एक रूटीन गतिविधि है और पश्चिम बंगाल की पुलिस की जानकारी में इसे किया जा रहा है.

लेकिन सेना के इस बयान के बाद ममता बनर्जी ने फिर दावा किया कि सेना ग़लत बयानी कर रही है. ममता ने फिर से ट्वीट करते हुये कहा कि ईस्टर्न कमांड ने पूरी तरह ग़लत और ध्यान बंटाने वाले तथ्य दिए हैं. हम आपका पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन कृपया लोगों को गुमराह न करें. ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दार्जीलिंग, बैरकपुर, उत्तरी 24 परगना, हावड़ा, हुगली, मुर्शिदाबाद और बर्दवान ज़िलों में भी सेना तैनात की गई है.

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Friday, December 2, 2016
सीजी खबर

कोलकाता | संवाददाता: क्या बंगाल में सेना तैनात कर दी गई है? कम से कम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो यही दावा किया है. हालांकि सेना ने कहा कि वह पूरे पूर्वोतर में गाड़ियों की जांच कर रही है. लेकिन इन दोनों बयानों के बीच तेजी से अफवाह फैली कि पूर्वोत्तर में सेना को युद्ध की तैयारी के समय जितने वाहनों की जरुरत होगी, यह जांच उसी तैयारी का हिस्सा है.

गुरुवार की रात ममता बनर्जी ने ट्वीट करके आरोप लगाया कि बंगाल राज्य सचिवालय के बाहर सेना तैनात कर दी गई है. उन्होंने कहा कि पुलिस के विरोध के बावजूद अति सुरक्षित इलाक़े में सेना भेजना दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं सचिवालय में ही हूं और नज़र रख रही हूँ अपने लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए. ममता बनर्जी ने कहा कि जब तक सचिवालय से सेना नहीं हटा ली जाती मैं लोकतंत्र की रक्षा के लिए सचिवालय में ही रहूंगी.


हालांकि इसके उलट सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पूरे पूर्वोतर में सेना बड़ी गाड़ियों की जांच कर रही है. सेना के पूर्वी कमान ने ट्वीट कर के यह जानकारी दी कि उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में सेना टोल नाकों पर गाड़ियों की पूछताछ की रूटीन कार्रवाई कर रही है.


इस बयान के अनुसार असम में 18 जगहों पर, अरुणाचल में 13, पश्चिम बंगाल में 19, मणिपुर में 6, मेघालय में 5 और त्रिपुरा और मिज़ोरम में एक-एक जगहों पर सेना गाड़ियों की जांच कर रही है. सेना ने दावा किया कि सेना की ये कार्रवाई एक रूटीन गतिविधि है और पश्चिम बंगाल की पुलिस की जानकारी में इसे किया जा रहा है.

लेकिन सेना के इस बयान के बाद ममता बनर्जी ने फिर दावा किया कि सेना ग़लत बयानी कर रही है. ममता ने फिर से ट्वीट करते हुये कहा कि ईस्टर्न कमांड ने पूरी तरह ग़लत और ध्यान बंटाने वाले तथ्य दिए हैं. हम आपका पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन कृपया लोगों को गुमराह न करें. ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दार्जीलिंग, बैरकपुर, उत्तरी 24 परगना, हावड़ा, हुगली, मुर्शिदाबाद और बर्दवान ज़िलों में भी सेना तैनात की गई है.

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कोयलीबेडा फर्जी मुठभेड़ क के खिलाफ आदिवासी लामबंद



कोयलीबेडा फर्जी मुठभेड़ क

के खिलाफ आदिवासी लामबंद


कांकेर @ भूमकाल समाचार. कोयलीबेड़ा फर्जी मुठभेड़ को लेकर क्षेत्र के ग्रामीण काफी आक्रोशित हैं । उन्हें इस लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का हक़ है इसलिए वे सड़क पर लोकतांत्रिक ढंग इस हत्यारी भाजपा सरकार के खिलाफ न्याय की गुहार लगाते सड़क पर उतरे । विकासखंड कोयलीबेड़ा अंतर्ग्रत ग्राम गट्टागाल के युवक सोबीराम कोवाची को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में पुलिस द्वारा हत्या किये जाने के विरोध में कोयलीबेड़ा अंतगर्त 17 पंचायतों के ग्रामीण और जन प्रतिनिधियों ने रैली निकाल कर गट्टागाल में फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जाँच कर दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही के लिए राज्यपाल के नाम तहसीलदार को ज्ञापन सौपा।
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क्या था मामला यहाँ पढ़े…
http://bhumkalsamachar.com/fake-encounter-killing-tribal-also-in-koylibeda/
समस्त जनप्रतिनिधियों ने कहा कि सोबीराम कोवाची पहाड़ी पर गया हुआ था, दुसरे दिन तक वह वापस नहीं आया बाद में परिवार वालों को पता चला कि पुलिस ने नक्सली बता कर सोबीराम कोवाची की हत्या कर दी है।  सोबीराम का पिता रामसिंह पुलिस से अपने बेटे का शव मांगने गया किन्तु हत्यारे पुलिस अफसरों ने उसके पुत्र के शव को भी उसे नहीं दिया। तीसरे दिन सोबीराम के शव को परिजनों को सौंपा गया।
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जन प्रतिनिधियों ने बताया कि सोबीराम कोवाची तीन सालों से तेंदूपत्ता फड़ मुंशी का कार्य करता आ रहा था। उसकी पत्नी सवित्री कोवाची क्षेत्र के सारे जनप्रतिनिधियों से न्याय की गुहार और वास्तविकता जानने के लिए पत्र लिखी थी ।जिस पर 29 नवम्बर को सारे जन प्रतिनिधियों ने घटना स्थल निरीक्षण किया और गट्टागाल जाकर परिजनों से मुलाकात कर कार्यवाही करने का भरोसा दिया। सारे जनप्रतिनिधियों ने पुलिस द्वारा किये गए फर्जी मुठभेड़ की जाँच कर कार्यवाही करने के लिए जंगी रैली निकाल कर शांति पूर्वक विरोध प्रदर्शन किया है।