Tuesday, October 4, 2016

आदिवासी किसानों को मारकर पुलिस ने कुछ गलत नहीं किया- जयंत सिन्हा

** आदिवासी किसानों को मारकर पुलिस ने कुछ गलत नहीं किया- जयंत सिन्हा




 **  इस घटना के वीडियो फुटेज को देखकर पता चल रहा है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों द्वारा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया।

** जयंत सिन्हा ने कहा कि निर्मला देवी और उनके पति योगेन्द्र साव(पूर्व राज्य कृषि मंत्री) गरीबों को साथ लेकर गन्दी राजनीति कर रहे हैं। वह गरीबों को विकास की तरफ से हटाकर विनाश की तरफ ले जाना चाहते हैं।
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Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 4.10.16

आदिवासी किसानों को मारकर पुलिस ने कुछ गलत नहीं किया- जयंत सिन्हा
हजारीबाग। झारखण्ड के हजारीबाग जिले के बड़कागांव में हुई पुलिस फायरिंग से चार ग्रामीणों की मौत में पुलिस की तरफ से कोई वॉयलेशन नहीं हुआ।

 ऐसा हम नहीं केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा कह रहे हैं।इस गोलीकांड मामले में हजारीबाग के सांसद और केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने पुलिस को क्लीन चिट दे दी है। केन्द्रीय मंत्री ने सिर्फ वीडियो फुटेज देखकर ही पुलिस को क्लीन चिट दे दी है।

आपको बता दें कि 1 अक्टूबर को झारखण्ड के हजारीबाग जिले के बड़कागांव में पंकरी बरवाडीह कोयला खादान की भूमि अधिग्रहण के विरोध में हुई पुलिस फायरिंग में चार ग्रामीण मारे गए थे। इसके खिलाफ विपक्षी दलों ने 24 अक्टूबर को राज्यव्यापी बंद का ऐलान किया है।

 विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने इसे पुलिस के द्वारा अघोषित हत्या करार दिया है। इसके बाद जयंत सिंहा दिल्ली से हजारीबाग पहुंचकर घायल अधिकारियों से मिले। सांसद और केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा है कि लोगों को इस घटना से राजनीति नहीं करनी चाहिए।

केंद्रीय मंत्री ने सफाई देते हुए कहा कि इस घटना से उन्हें गहरा दुख हुआ है। लेकिन इस घटना के वीडियो फुटेज को देखकर पता चल रहा है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों द्वारा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। क्लिप में साफ दिख रहा है कि सीओ शैलेश कुमार सिंह भीड़ से हाथ जोड़कर अनुरोध कर रहे हैं। मैंने वीडियो में देखा कि पुलिस अधिकारी ग्रामीणों से अपनी ड्यूटी निभाने को लेकर मिन्नतें कर रहे थे।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बरकागांव कांग्रेस विधायक निर्मला देवी की गिरफ्तारी भी प्रोटोकॉल के अन्तर्गत किया गया। जयंत सिन्हा ने हजारीबाग डीसी रविशंकर शुक्ल और एसपी भीमसेन तूती से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि निर्मला देवी को महिला कांस्टेबलों की उपस्थिति में गिरफ्तार किया गया था। जयंत सिन्हा ने कहा कि निर्मला देवी और उनके पति योगेन्द्र साव(पूर्व राज्य कृषि मंत्री) गरीबों को साथ लेकर गन्दी राजनीति कर रहे हैं। वह गरीबों को विकास की तरफ से हटाकर विनाश की तरफ ले जाना चाहते हैं।


गौरतलब है कि जिन चार लोगों की मौत हुई है उसमें तीन किशोर छात्र और एक जवान दर्जी शामिल है। इस हत्या की सफाई में जयंत ने कहा कि मैंने मुख्यमंत्री रघुवर दास से बात कर ली है। उन्होंने एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी है जो इसकी जांच करेगी। ग्रामीणों को जांच का इंतजार करना चाहिए।


ग्रामीण किसानों पर पुलिस की फायरिंग के बाद केंद्र सरकार की तरफ से दी गई क्लीनचिट से साफ है कि मामला स्थानीय नहीं बल्कि केंद्र सरकार तक के संज्ञान में है। भाजपा की सहयोगी पार्टी आजसू के प्रवक्ता देवशरन भगत भी किसानों का साथ देने की बात कह चुके हैं। लेकिन ताजा हालातों पर चुप्पी साधे हैं।

पुलिस इस मामले में अब किसानों का साथ देने वाली विधायक निर्मला देवी सहित 600 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर इस मामले की जांच करने जा रही है। दरअसल बड़कागांव में एनटीपीसी लगाया जा रहा है। जिन लोगों की जमीन इसके लिए अधिग्रहीत की गई है वे मुआवजे के साथ नौकरी की मांग कर रहे हैं। सरकार इस मांग को पूरा करने के पक्ष में नहीं है। आदिवासी किसानों का कहना है कि मुआवजे की राशि खत्म होने के बाद उनका जीवन निर्वहन कैसे होगा। अभी तक वे खेती के जरिए अपने परिवार का पालन करते आए हैं। न खेती रहेगी और न नौकरी तो उनका भविष्य क्या होगा। इसी बात को लेकर दो दिन पहले आंदोलनकारियों पर गोलीबारी की गई।

   http://www.nationaldastak.com/story/view/jayant-clean-chit-to-police

बस्तर आई जी को हटाने और फर्जी मुठभेड़ों के खिलाफ छात्रों ने कांकेर में निकाली रैली

सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

बस्तर आईजी को हटाने नारे बाजी, फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ छात्रों ने निकाला जंगी रैली


बस्तर में गोलीकांड में मारे गए स्कूली छात्रों के मामले में सोमवार को आदिवासी छात्र-छात्राओं ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। रैली के दौरान बस्तर आईजी को हटाने व आदिवासी छात्रों की हत्या बंद करने को लेकर जमकर नारेबाजी की गई। प्रशासन को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने और मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है। 
आदिवासी छात्र संगठन व गोंड़वाना गणतंत्र पार्टी का आरोप है कि 23 सितंबर को बस्तर के थाना बुरगुम के गांव सांगवल में पुलिस ने दो स्कूली छात्रों को माओवादी बताकर मौत के घाट उतार दिया। छात्र सोनलूराम व सोमड़ू को पुलिस पकड़कर जंगल ले गई और गोली मारी। पीजी काॅलेज के पास से सोमवार को छात्र-छात्राओं ने हाथों में तख्ती लिए रैली निकाली आैर पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की। 

रैली में पीजी काॅलेज के अलावा पीएमटी बालक, बालिका छात्रावास व महिला आईटीआई की छात्राएं शामिल हुईं। गोंगपा के युवा प्रभाग के प्रांतीय अध्यक्ष हेमलाल मरकाम ने इस दौरान कहा कि यदि पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिला, तो उग्र आंदोलन करते हुए बस्तर संभाग को बंद किया जाएगा। प्रदर्शन में छात्रसंघ अध्यक्ष मनीष कुमेटी, पार्षद अंकित पोटाई, लोकेश कुंजाम, योसीन कुमेटी, अनमोल मंडावी, सुबोध ध्रुव, आदि शामिल थे। 

नक्सल समस्या की आड़ में हत्या करने का आरोप नक्सल समस्या की आड़ में आदिवासियों का खात्मा, निर्दोषों से मारपीट कर झूठे केस में जबरदस्ती जेल में बंद करने और सुरक्षा बल पर तलाशी के नाम पर महिलाओं के साथ अश्लील हरकत करने का आरोप ज्ञापन में लगाया गया है। इसके लिए आईजी को कसूरवार बताते हुए हटाने की मांग भी की है। 
सूची जारी करने, जन सुरक्षा कानून हटाने की मांग छग विशेष जन सुरक्षा कानून और राष्ट्रीय अधिनियम जैसे दमनात्मक कानून वापस लेने की भी मांग भी की गई है। इसके अलावा मांग की गई है कि निर्दोष की हत्या कर नक्सली होने का आरोप लगाया जाता है। यदि पुलिस के पास उनके नक्सली होने की पुख्ता जानकारी है, तो वह जिलेवार नक्सलियों की सूची जारी करे। 

भास्कर न्यूज | कांकेर से साभार 

Monday, October 3, 2016

पुलिस ने मड़कम हिड़मे के चाचा की भी हत्या कर दी है-- हिमांशु कुमार


पुलिस ने मड़कम हिड़मे के चाचा की भी हत्या कर दी है,
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पुलिस ने मड़कम हिड़मे के चाचा की भी हत्या कर दी है,
पुलिस ने मड़कम हिड़मे के साथ बलात्कार किया था,
पुलिस ने मड़कम हिड़मे की योनी में चाकू डाल कर नाभी तक चीर दिया था,
मामला हाई कोर्ट मे पहुंचा था ,
उसके बाद पुलिस ने हिड़मे के गांव पर हमला कर दिया ,
गांव वालों को कोर्ट तक मामला ले जाने की सज़ा दी गई ,
पुलिस की पिटाई से कई गांव वालों के कान के पर्दे फट गये हैं ,
एक महिला की रीढ़ की हड्डी टूट गई है ,
पुलिस ने हिड़मे की मां को कोर्ट तक जाने से रोकने के लिये गांव से बाहर जाने वाले रास्ते बन्द कर दिये थे ,
हिड़मे की मां लक्ष्मी , जंगल मे चार दिन पैदल चल कर कोर्ट तक पहुँची है ,
आज दन्तेवाड़ा कोर्ट मे सरकारी वकील ने फिर चाल खेली ,
ताकि कोर्ट हिड़मे की मां का बयान ना ले सके ,
वकील ने तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर दी ,
अगली सुनवाई सात तारीख को होगी,
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हिमांशु कुमार

आप सब भी इस मामले पर नज़र बनाये रखिये ,

मुख्यमंत्री रमन सिंह, शहीद हिडमे की मां पर हमला करवा सकता है ,

आजाद हिंद फौज के कर्नल सहगल का स्मारक टूटा !!!

 **  आजाद हिंद फौज के कर्नल सहगल का स्मारक टूटा !!!



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** लाल किले से आई आवाज !!!
ढिल्लन, सहगल ,शाहनवाज !!!
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जी हां ,यह वही सहगल है कर्नल स्वर्गीय श्री प्रेम कुमार सहगल जी , जिन्हें दिल्ली के लाल किले से सन 1945 में अंग्रेजों द्वारा दी गई फांसी की सजा से सारा देश में आक्रोष फैल गया था | तब देश के शीर्षस्थ वकीलों ने केस लड़ कर इन तीनों वीर स्वतंत्रता सेनानियों को बरी कराया था |
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 अब कानपुर में सिविल लाइंस में, ऐतिहासिक नानाराव पार्क के बगल में स्थित कर्नल पी के सहगल पार्क में लगे स्मारक को असामाजिक तत्वों द्वारा तोड़ दिया गया है यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है |
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 अभी कुछ दिनों पूर्व 31 जुलाई 2016 को राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के साथ हम सभी ने जिसमें सौरभ बाजपेई, शाह आलम ,राहुल इंकलाब, प्रताप साहनी ,आदर्श बाजपेई ,क्रांति कुमार कटियार ,कुमुद साहनी ,मयंक चक्रवर्ती आदि सैकड़ों साथियों के साथ "आजाद संदेश यात्रा " का समापन कर्नल पी के सहगल पार्क में किया था | यह पी के सहगल पार्क दिनांक 27 जनवरी 1996 को राज्यपाल महामहिम मोतीलाल बोरा द्वारा कानपुर की मेयर श्रीमती सरला सिंह की उपस्थिति में किया गया था |
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 स्वतंत्रता सेनानी पीके सहगल जी आजाद हिंद फौज की कैप्टन रहीं पद्मभूषण डॉ. लक्ष्मी सहगल के पति है स्मारक तोड़े जाने को लेकर इनकी पुत्री ,कानपुर से पूर्व सांसद श्रीमती सुभाषनी सहगल ने विरोध जताया है |
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 हम सब इस प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग करते हुए और प्रशासन से असामाजिक तत्वों के खिलाफ अविलंब कार्रवाई करके उनकी गिरफ्तारी की मांग करते हैं |
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 प्रस्तुति ~~~ डॉ. सुमन बाला कटियार

दो स्कूली छात्रों को मारने के बाद उनके शव को केमिकल ( कीड़े ) से नष्ट किया गया.

 छत्तीसगढ़ सरकार का क्रूरतम चेहरा बस्तर में ,
दो स्कूली छात्रों को मारने के बाद उनके शव को  केमिकल ( कीड़े ) से नष्ट किया गया.






** सोनी के काफी कहने के बाद बच्चे के चेहरे से कपड़े को हटाया गया तो वे हैरान रह गई कि दो दिन बाद ही उसके चेहरा ओर पूरा बदन कीड़ों से भरा था ,
पूरा शरीर कीड़ों से बिलबिला रहा था .इससे यह भी मालुम करना संभव नहीं था कि उसे कहां  और कितनी गोली लगीं है ,  उन्हें गोली लगी भी है या नहीं,
** हत्या के बाद शव के पोस्ट मार्टम मे शरीर को केमीकल और जिन्दा कीड़ों को डालने का काम वीयतनाम इजरायल और पूर्वी भारत मे किया जाता गया  है , इसी तरह हत्या करने के बाद शरीर को गला देने का काम नाजी यहूदियो के साथ करते रहे है .
** यह शव की गरिमा के खिलाफ और राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कानून का जघन्य उलंघन है .
* जिन अधिकारियों के आदेश और निर्देश पर केमीकल  ( कीड़ों ) का उपयोग शव पर किया गया है उन सबके आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जायें तब तक उन्हें बर्खास्त किया जावे .
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सामाजिक  कार्यकर्ता सोनी सोरी ने बताया कि पोटाकेबिन में पढने वाले छात्र सोनकूराम और सोनाडू राम को उनके रिश्तेदार के घर से उठाकर जंगल में उनकी हत्या सुरक्षा बलों द्वारा कर दी गई यह तो स्थापित सत्य है.
लेकिन हत्या के तीसरे दिन दोनों बच्चों के शव को परिवार को सोंपे गये ,ओर जब उन्हें दफनाया जाना लगा तब पुलिस के काफी व्यवधान के बाबजूद वे और बेला भाटिया वहाँ पहुंच गई ,तब परिवार के  लोगों ने बताया कि उनके शव कीड़ों से भरे  हुयें है और पूरा शरीर सफेद पड गया है,उसमें तीव्र बदबू आ रही है,जिसे देखना भी भयावह है ,इसलिए उन्होंने उनका चेहरा ढांक दिया है .
सोनी के काफी कहने के बाद बच्चे के चेहरे से कपड़े को हटाया गया तो वे हैरान रह गई कि दो दिन बाद ही उसके चेहरा ओर पूरा बदन कीड़ों से भरा था ,
पूरा शरीर कीड़ों से बिलबिला रहा था .इससे यह भी मालुम करना संभव नहीं था कि उसे कहां  और कितनी गोली लगीं है ,  उन्हें गोली लगी भी है या नहीं, पर हां उसका गला कटा हुआ दिख रहा था ,उनके गले पर काटे जाने के निशाना जरूर दिख रहे थे.
पूरा शरीर शरीर सफेद पड गया था और  कीड़ों से भरा था  और लगभग नष्ट कर दिया गया था.,
 ऐसा हमने किसी शव को पहली बार देखा था.
 हत्या के बाद शव के पोस्ट मार्टम मे शरीर को केमीकल और जिन्दा कीड़ों को डालने का काम वीयतनाम इजरायल और पूर्वी भारत मे किया जाता गया  है , इसी तरह हत्या करने के बाद शरीर को गला देने का काम नाजी यहूदियो के साथ करते रहे है .

यह बस्तर में इसलिए भी किया गया क्योंकि मडकाम हिडमें की हत्या और बलात्कार के बाद हाईकोर्ट ने कब्र से हिडमें का शव निकालकर पोस्टमार्टम का आदेश दिया था .
सुरक्षा बलों ने ऐसी किसी संभावना से बचने के लिये  गोली की जगह गला काटकर हत्या की ताकि गोली शव से न निकले ओर शव को कैमीकल युक्त जिन्दा कीड़े से भरने से शव को नष्ट करने से है ताकि पोस्टमार्टम में कुछ सिद्ध न हो सके॥
यह शव की गरिमा के खिलाफ और राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कानून का जघन्य उलंघन है,
बस्तर में लगभग रोज फर्जी मुठभेड़ के नाम पर आदिवासियों की हत्या की मुहिम चलाई जा रही है .
आत्मसमर्पित नक्सलियों को हथियार देकर गांव में भेजकर लोगों को चुन चुन कर मारा जा रहा है ,पुलिस के आला अफसर सविर्स कंडेक्ट रूल के खिलाफ आचरण कर रहे है, स्थानीय आदिवासियों के खिलाफ संगठन ,रैली ,सभा और प्रदशर्न कर रहे है और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ,वकीलों ,पत्रकारों और सामाजिक,राजनैतिक संगठनों पर हमले करवा रहे है .

जिन अधिकारियों के आदेश और निर्देश पर केमीकल हथियार ( कीड़ों ) का उपयोग शव पर किया गया है उन सबके आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जायें तब तक उन्हें बर्खास्त किया जावे .
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( सोनी सोरी से रायपुर में दिनांक 2 .10. 16 को हुई चर्चा के आधार पर नोट )





बडकागांव बर्बर गोली कांड : संसाधन लूटने के लिए राज्यसत्ता कर रही है सुनियोजित हिंसा है !

रविवार, 2 अक्तूबर 2016


बडकागांव बर्बर गोली कांड : संसाधन लूटने के लिए राज्यसत्ता कर रही है सुनियोजित हिंसा है !


झारखण्ड के हजारीबाग जिले के बडकागांव के आदिवासी अपनी 15,000 एकड़ जमीन बचाने के लिए पिछले 15 दिनों से शांतिपूर्ण कफ़न सत्याग्रह चला रहे थे. 1 अक्टूबर की सुबह के 4 बजे पुलिस ने सत्याग्रह स्थल पर सो रहे लोगों पर बर्बर पुलिस फायरिंग की है जिसमे 4 लोगों की मौके पर ही मोत हो गई थी. कल शाम तक 6 लोगों का पोस्टमार्टम हो चुका था. मरने वालों में ज्यादातर नौजवान है . 13 साल के बच्चे  को भी गोली मारी गई है. पुलिस फायरिंग में लगभग 70-75 लोग घायल हुए है. 35 लोग रांची में भर्ती है तो बाकि घायल हजारीबाग के हॉस्पिटल में भर्ती है. पूरा इलाका छावनी बना दिया गया है. विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन ने एक बयान जारी कर इस बर्बरता पूर्ण घटना की कड़ी निंदा की है जिसे हम यहाँ पर साझा कर रहे है;

1 अक्टूबर 2016 को हजारीबाग के बडकागांव में पिछले 15 दिनों से इस क्षेत्र के किसानों ने एनटीपीसी द्वारा जबरदस्ती कोयला खनन के विरोध में कफ़न सत्याग्रह चला रहे है. प्रशाशन और पुलिस ने सत्याग्रह चला रहे किसानों पर फायरिंग कर ३ किसानों की हत्या एव आठ किसानों को घायल किया है. इसमे से एक किसान गंभीर रूप से घायल है. हमें आशंका है की और लोग इसमे मरे गए है. पुलिस ने लाशों को छुपाने की कोशिश की है. मृत किसानों की संख्या ७ और  घायल किसानों की संख्या डॉ दर्जन से अधिक हो सकती है.

विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन इस बर्बरता पूर्ण घटना की कड़ी निंदा करता है और इस हिंसक राज्यसत्ता के इन्ह दमन नीतियों का पुरजोर विरोध करता है. और साथ ही मंद करता है की एनटीपीसी द्वारा जबरजस्ती कोयला खनन परियोजना तुरंत रद्द की जाए. गोली कांड के दोषियों पर हत्या का मुक़दमा दर्ज किया जाए. मृत किसानों के परिवारों को तुरंत ५० लाख मुआवजा एव नौकरी दी जाए. घायल किसानों को समुचित इलाज की व्यवस्था की करते हुए मुआवजा दिया जाए.

एनटीपीसी के लिए कोयला खदान खोदने के लिए जमिनाधिग्रहण की प्रक्रिया का स्थानिक किसान और ग्रामसभावासी शुरुवात से ही विरोध करा रहे है. जबरन अधिग्रहण के लिए गयी जमीं पर साल में तिन फसले ली जाती है किसमे पुरे साल भर रोजगार मिलता है. एनटीपीसी को आवंटित १७,००० एकड़ जमीन में से लघबघ २,५०० एकड़ जमीन ये वन भूमि है, जिसमे वन अधिकार कानून के तहद ग्रामसभायों की सहमति लेना आवश्यक हिते हुए भी वो न लिए ही जबरन भूमिअधिग्रहण किया जा रहा था. स्थानिक किसानों के विरोध को नजरंदाज करते हुए उन्हके अधिकारों को कुचलकर मुनाफाखोरी करने का कम सर्कार द्वारा किया जा रहा है. और पुलिसी हिंसा के बलबुतें लोगो पर दमन किया जा रहा है.  हम हजारीबाग के बडकागांव में किये जा रहे इस दमन का विरोध करते है.

साथ ही हम सरकार के किसान विरोधी, आदिवासी विरोधी खनन नीतियों का और उन्हासे हो रहे विस्थापन का पुरजोर विरोध करते है. पूंजीवादी-साम्राजवादी हितों की रक्षा के लिए सरकार जल, जंगल, जमीन, प्राकृतिक संसाधन व् राजकीय पूंजी को साम्राजवादी पूंजीपतियो व् भारत के बड़े पूंजीपन्तीयो को सौप रही है. वन सौरक्षण के नाम पर आदिवासी बहुल इलाको से ग्रामीण को जंगल और जमीन से खदेड़ा जा रहा है.

खनिजों के उत्खनन और जमीन के कब्जे के लिए सरकार और कारपोरेट घरानों के गढजोड़ के द्वारा झारखंड, ओड़िसा, छतीसगढ़ एव अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रो मे सारे कानूनों को ताक पर रखकर जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है, किसानों से जबरजस्ती से जमीनों को छिना जा रहा है. तथा छोटा नागपुर काश्तकारी कानून और संथाल परगना काश्तकारी कानून जैसे कानून में बदलाव कर आदिवासियों की जमीन लुट को कानूनन करनेकी कोशिश की जा रही है. इसी प्रयास के तहत इन इलाको मे राजकीय सैनिकीकरण बढ़ाया जा रहा है.  विरोध में उतरी जनता के उपर दमन बढ़ रहा है . झारखंड, छतीसगढ़, ओड़िसा और एनी राज्यों में ग्रामीणों को पुलिस द्वारा सीधे तौर पर या फर्जी मुठभेडो में मारा जा रहा है. महिलाओ के साथ यौन हिंसा सुरक्षा बलों की रणनीति का हिस्सा बन गयी है. जिसे तमाम सरकारे आँख मुंद कर समर्थन दे रही ह. इस दमन का विरोध कर रहे वकील , सामाजिक कार्यकर्ता , पत्रकार , शोधकर्ताओ पर भी जुल्म ढहाया जा रहा है , इलाके से खदेड़ा जा रहा है , जेलों में डाला जा रहा है .

विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन, संसाधनों की लुट के लिए जिए जा रहे इन्ह तमाम  दमन नीतियों का विरोध करता है.

त्रिदिब घोष,
दामोदर तुरी,
विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन
(झारखंड राज्य इकाई)


गणतंत्र की जय हो : अनिल मिश्रा





नदी उस पार हैं वो गाँव। पर आप क्यों वहां जाएंगे। उसके कोरों पर हल्की मुस्कान कौंधी फिर तेजी से लुप्त हो गई।
क्यों नहीं जाएंगे सर। हमें पता होता तो पहले ही जाते। इनमें से एक बोला।
अभी चलो। दूसरे ने दृढ़ता से निर्णय सुनाया। वो जानता था अभी पीछे हटने पर उसे आरोप लगाने का मौक़ा मिल जाएगा। जानते सभी थे पर बाकी चार असमन्जस में थे। दो दिन बाद गणतंत्र का पर्व है। साल भर का कारोबार। अखबार इसी से चलता है।
आज कैसे जाएंगे। एक ने उस दिन के महत्व को रेखांकित किया। आज दिनभर काम होगा। मेटर भेजा जाएगा। प्रेस में रातभर ले आउट और डिजाइन बनेगी। कल दिन में विज्ञापनों के विशेष पेज छपेंगे। तब जाकर गणतंत्र दिवस पर लोगों को बधाई मिल पाएगी, अखबारों को रेवन्यू और फील्ड के कलमकारों को कमीशन तथा झटका।
अजब व्यक्ति है। एन मौके पर आ गया है। ललकार रहा। देखें तुम कैसे पत्रकार हो। भूख से, गरीबी से, तंगहाली से, मामूली बीमारियों से, एक मुट्ठी नमक की खातिर, नदी की बाढ़ में, फर्जी मुठभेड़ों में…। हर हाल में उन्हें मरना ही है। खबर आज नहीं छपेगी तो क्या बिगड़ जाएगा। कल भी तो वहां जा सकते हैं। गणतंत्र की परेड खत्म होते ही निकल लेंगे। पर क्या करें। इसे कैसे टालें।
आज तो बहुत काम है सर। परसों 26 जनवरी है। उसने मजबूरी सुनाई जो अखबार के अलावा दुकान भी चलाता था।
ओह। ठीक है आज नहीं कभी और सही। उसके चेहरे पर अब सरेआम व्यंग्य नुमायाँ था। इन्हें मुंह चिढाता रहा। बेचारे।
नहीं नहीं। आज ही चलते हैं। अभी 9 ही बजे हैं। 3 या 4 बजे तक लौट आएंगे। तब भी अपना काम हो जाएगा। वो बोला जो मौके की नजाकत समझता था। उसकी एक ही दुकान थी। अखबार की।
थोड़ा बहुत विरोध हुआ। आज कैसे। धंधा का दिन। रोज नहीं आता। साल भर का अवसर। ठीक है तुम जाओ।
दो जिन्हें विज्ञापन के साथ दुकानदारी भी देखनी थी नहीं गए। बाकी चार उस बोलेरो में बैठ गए जो उन्हें ले जाने आई थी। शहर से नदी के घाट तक। 22 किलोमीटर का सफर।
जल्दी आना है। एक बोला।
हाँ। बस गए और लौटे। दूसरे ने कहा।
मैं तो लिस्ट भी नहीं बनाया हूँ। उधर फोन भी नहीं लगेगा। दफ्तर वाले परेशान होंगे। तीसरा अब भी चिंतित था।
चौथा शांत रहा। उसे पता था होना कुछ नहीं है।
सड़क से उतर गाडी कुछ दूर कच्चे रास्तों पर चली फिर रुक गई। आगे एक किलोमीटर पैदल हई जाना होगा।
पैदल। ऐसे तो बहुत देर हो जायेगी। वो बोला जो गाडी में चुप था।
अब आ गए हैं तो चलो।
चल तो रहे ही हैं। इस नदी पर पुल क्यों नहीं बना देती सरकार। उस पार दर्जनों गाँव हैं।
गाँव हैं पर उधर खदानें नहीं हैं ना। उसने फिर व्यंग्य किया जो उन्हें उन गाँवों को दिखाने ले जा रहा था।
हा हा। ये भी सही है। तो कितने मरे हैं उधर।
कम से कम 6 तो एक ही गाँव के हैं। दूसरे गाँवों में और भी होंगे।
चलो देखते हैं।
तट पर पहुंच उन्होंने देखा इकलौती नाव उस पार थी। नदी का चौड़ा पाट। उस ओर खड़ा मल्लाह जंगल से आने वाली सवारियों का इंतज़ार करता रहा। इस ओर ये बेचैन होते रहे।
12 तो यहीं बज गए। उस पार 1 बजे तक पहुँच जाएंगे। फिर इक घण्टे रिपोर्टिंग। 3 तक वापस पहुंच जायेंगे। क्यों सर।
शायद। उस पार उतरकर 7 किलोमीटर पैदल जाना है। तब पहला गाँव आएगा। न किसी के पास राशनकार्ड है न मतदाता परिचय पत्र। अपनी धरती में अनाम अवैध आदिवासी। यह वाकई उनकी हालत पर दुखी था। चाहता था मीडिया जमीनी हकीकत से वाकिफ हो।
पर सर। आधा घण्टा ऐसे ही गुजर गया। पता नहीं नाव कब आएगी। ऐसे तो पहुंचने में ही शाम हो जायेगी। एक बोला।
आज अपन बेकार आ गए। बहुत काम था। दूसरे ने कहा।
लौट चलते हैं। तीसरे ने निर्णय दिया।
मैं तो पहले ही बोल रहा था। वो बोला जो पहले पूरे समय चुप रहा था।
वे वापस लौट आये। इस वादे के साथ कि फिर किसी रोज उन मौतों की रिपोर्टिंग करने जरूर जाएंगे। आज नहीं। धंधे का दिन है।
वो बोलेरो लेकर चला गया। जाते वक्त मुस्कुरा नहीं रहा था। खुलकर हंस रहा था। जानता हूँ तुम्हारी औकात।
कुछ देर बाद वो कलेक्टर के दफ्तर पहुंचा जो सबसे पहले नदी पार जाने को तैयार हुआ था।
साहब से मुलाक़ात हुई।
सर। गणतंत्र दिवस पर आपका इक एड लगाना है।
अरे नहीं नहीं। दूसरे मार डालेंगे।
कुछ नहीं होगा सर। प्लीज
नहीं। आप कहीं और से करिये। साहब ने फिर भी टालने की कोशिश की।
और क्या खबर है सर।
कुछ खास नहीं। तैयारी चल रही है। मंत्री जी कल शाम को पहुंचेंगे।
उधर नदी उस पार बीमारी फैली है क्या। कई मर गये हैं। अरे नहीं। वहां मेडिकल कैम्प लगाने कहा है। मौत की खबर सही नहीं है। एक आदमी मरा है। वो बूढ़ा था। 80 का।
हम उस पार गए थे सर।
अरे कब। उधर नक्सली हैं। इसीलिए दिक्कत आ रही। फिर भी कर रहे हैं। साहब दबाव में आ गए।
सर प्लीज। फुल नहीं तो हाफ पेज ही करवा दीजिये। अब सही मौक़ा था जिसका उपयोग बनता था।
साहब चुप हो गए। फिर बोले किसी को पता तो नही चलेगा।
नहीं सर। अपन आपने दिया किसी को बताएंगे थोड़े ही। आप बोल देना मैं नहीं जानता।
ओके। पर हाफ। फुल नहीं। साहब ने एक फाइल अपनी ओर खींच ली।
नदी के उस ओर से नाव कुछ और बीमारों को लेकर पहुंची थी। घाट पर न डाक्टर न एम्बुलेंस। आदिवासी कावड़ बनाते रहे। यहाँ गणतंत्र की जय जय होती रही।
—अनिल मिश्रा।
2 अक्टूबर 16ब