Saturday, August 20, 2016

दंतेवाडा से गोमपाड़ पदयात्रा में दिखी आदिवासियों पर दमन और बर्बरता की तस्वीर

अगस्त 18, 2016

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर राष्ट्र-राज्य द्वारा जारी बर्बरता अपनी चरम हैं. इस बर्बरता के कारण  आज इन क्षेत्रों के गांवों की आबादी घट गई है, कुछ गाँव में चंद वृद्ध बचे हैं, युवा और महिलाएं भयभीत और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, वनाधिकार कानून को दरकिनार कर जगह-जगह पुलिस कैंप खोलने के लिए आदिवासियों की जमीन पर कब्जे किए जा रहे है,  बड़े पैमाने पर फर्जी आत्मसमर्पण, गिरफ्तारियों , बलात्कार  की घटनाएँ  रोज सामने आ रही  हैं। तिरंगा यात्रा से लौट कर तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट;



नक्सल उन्मूलन के नाम पर बस्तर में आदिवासियों को नक्सली बता कर मारने, महिलाओं के साथ बलात्कार, निर्दोष को जेल भेजने,सरकारी हिंसात्मक गतिविधियों, लोकतंत्र की बहाली को लेकर विभिन्न जनसंघठनो द्वारा बस्तर बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले सोनी सोरी के नेतृत्व में 9 अगस्त से 15 अगस्त तक। अगस्त क्रांति तिरंगा पद यात्रा निकाला गया, यात्रा 9 अगस्त को दंतेवाड़ा से निकल कर 15 अगस्त को गोमपाड में तिरंगा झंडा के ध्वजारोहण के साथ समाप्त हुआ, गोमपाड में सुरक्षा बलों पर आरोप है कि मडकाम हिडमे को नक्सली बता कर अनाचार कर मार दिया गया था, सोनी सोरी को इंजरम कैम्प में घटना स्थल तक जाने से रोक लिया गया था, सोनी सोरी ने इन्ही कारणों से दंतेवाड़ा से पैदल यात्रा कर गोमपाड में तिरंगा झंडा लहराने का निर्णय लिया, जिसमे विभिन्न जनसघठनो ने अपनी भागीदारी निभाई।
गोमपाड स्वतंत्र भारत का एक एसा गाँव है जहा सरकार आज तक नही पहुच पाई है ,जहा सडक, बिजली, पानी मुलभुत सुविधाओं को छत्तीसगढ़ सरकार ने दरकिनार कर रखा है, सरकार ने इन गांवो में सिर्फ सुरक्षा बलों को तैनात कर रखा जो लगातार ग्रामीणों पर हिंसात्मक व्यवहार को अंजाम देती है, जहा के ग्रामीणों को सुरक्षा बलों का सिर्फ खौफ है 70 सालो में पहली बार यहाँ किसी ने तिरंगा झन्डा फहराया है इससे पहले नक्सली यहाँ काला झंडा फहराते आये है,गोमपाड़ गांव का नाम हाल ही में मड़कम हिड़मे के कारण चर्चा में आया था। मड़कम नाम की युवती को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया था। सुरक्षा बलों पर आरोप लगा कि यह फर्जी एनकाउंटर था। यहां तक कि उसकी लाश को दोबारा निकालकर पोस्टमार्टम किया गया। इस मामले में हाईकोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया था। देश-विदेश से कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराया था। इसके बाद से गोमपाड़ पर सुरक्षा बलों का पहरा सख्त हो गया।
सरकार की पीडीएस से लेकर अनेक सरकारी विभिन्न योजनाये यहा लागु नही होती है, स्वास्थ्य, शिक्षा का तो नामोनिशान नही है, है तो सिर्फ सरकारी जुल्मो-सितम, गोमपाड के आदिवासी ग्रामीण पुरे हिम्मत के साथ लड़ रहे है उनके संघर्षो की कहानी बहुत लम्बी है, सरकार यहाँ लोकतंत्र की बाहाली को लेकर नाकारा साबित हो चुकी है।
यात्रा का उद्देश्य उन लोगों को आईना दिखाना है जो देशभक्ति की आड़ में आदिवासियों का दमन कर रहे हैं और नैसर्गिक खनिज जंगल और पानी बेचकर पूंजीपतियों को लाभ पहुँचा रहे हैं, इन क्षेत्रोंके गावों की आबादी घट गई है, कुछ गाँव में चंद वृद्ध बचे हैं, युवाऔर महिलाएं भयभीत और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, ऐसेसमय में दमन और संघर्ष में तपकर सोनी सोरी बाहर आईं औरआसपास के बड़े क्षेत्र में पुलिस अत्याचार पीड़ितों के साथ खड़ीहुईं, आज भी गोमपाड़ के रास्ते के अधिकांश गांव आधारभूतसुविधाओं से वंचित हैं, उन गावों को शायद यह भी पता नहीं कि देशआजाद है और उसका एक राष्ट्रीय ध्वज भी है, दूसरी ओरमाओवाद के नामपर कुछ लोग बंदूक के आतंक पर आदिवासियों परअपनी हुकूमत कायम करने की कोशिशों में हैं, अगस्त क्रांति पद यात्रा बस्तर में जारी हिंसा के बिच शान्ति का एक पैगाम लेकर सोनी शोरी 180 किमी पैदल चल कर गोमपाड पहुंचा, जहा मडकाम हिडमे को श्रधांजलि देकर 15 अगस्त को तिरंगा ध्वजारोहण किया गया जहा आस-पास के दर्जनों गांवो के ग्रामीण इकट्ठा हुए |

“यात्रा को लेकर सोनी सोरी कहती है कि सरकार ने आजदी के बाद अबतक सिर्फ ग्रामीणों को सुरक्षा बलों का खौफ दिया है, मडकाम हिडमे को जब सुरक्षा बल के जवानो ने फर्जी तरीके से मारा तो मुझे रास्ते में ही रोक दिया गया, मुझे यहाँ तक आने नही दिया गया, नक्सली यहाँ काला झंडा फहराते है,लोकतंत्र यहा जीवित नही है, तब से ही मेने तिरंगा यात्रा कर गोमपाड आने का निर्णय लिया ताकि निर्दोष आदिवासियों की हत्याओ का न्याय दिला सकू लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों को ज़िंदा रख सकू मेरे आव्हान पर अनेक जनसंगठनो ने इस यात्रा में जाने का निर्णय लिया और हम गोपपाड में तिरंगा लहरा आये

गोमपाड के ग्रामीणों ने सुरक्षा बलों पर आरोप लगाया है कि आस-पास के गांवो में 11 ग्रामीणों को फर्जी मु

वही बस्तर आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी ने तिरंगा यात्रा में शामिल जनसंगठनो को नक्सली समर्थक करार दिया था, अखबारों में आई बयानों के अनुसार यात्रा को नक्सली समर्थक बताया था वही सोनी सोरी कहती है की बस्तर आई जी शिवराम प्रसाद कल्लूरी बस्तर का मुख्यमंत्री बन कर बैठा है, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालो को नक्सली समर्थक बता रहे है , नक्सलवाद समाप्त करने की बजाय निर्दोष आदिवासी की बलि चढ़ा रहे है | ”

ज्ञात हो कि तिरंगा यात्रा के दौरान सोनी सोरी पर हमले की भी कौशिश की गई , यात्रा के दौरान सोनी सोरी की न्यायलय में पेशी भी चल रही थी यात्रा से जगदलपुर पेशी में जाते वक्त उनके साथ बास्तानार घाट पर उनकी गाडी रोकी गई गाली-गलौज को अंजाम दिया उनके साथ पत्रकार लिंगा कोडोपी, कमल शुक्ला भी मौजूद थे उन्हें पेशी में जाने से रोका गया

तिरंगा यात्रा जब से दंतेवाड़ा से निकली पुलिस के लोग तस्वीर खीचते रहे, कइयो ने तो अफवाह भी फैलाई की सोनी सोरी तिरंगा यात्रा से लौट गई, यात्रा में पांच लोग बाकी है |

जानकारी हो कि तिरंगा यात्रा लगातार अपने लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहा था, यात्रा में विभिन्न जनसंघठन के 50 लोग निरन्तर चल रहे थे साथ ही कई पत्रकार मौजूद थे |

खबर है कि तिरंगा यात्रा को लेकर नक्सलियों के द्वारा एक आडियो टेप भी जारी किया गया था और तिरंगा यात्रा का स्वागत करने और फाहराने को लेकर बहिष्कार करने का आव्हान किया गया था, लेकिन सोनी सोरी की तिरंगा यात्रा निरंतर आगे बढ़ी|
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Police brand untertrial as Naxal; kill him in fake encounter

Posted on: Aug 17, 2016 11:20 PM IST | Updated on: Aug 17, 2016 11:20 PM IST


Bastar police allegedly kill an undertrial in a fake encounter after branding him as Naxal in Jagdalpur.

Police claimed that, Arjun Kashyap, was a wanted Naxal and was having bounty of Rs 3 lkah on his head

However, the Jagdalpur Legal Aid Group, known as 'JagLAG' who is fighting the case of Kashyap has alleged that he was intentionally killed in fake encounter.

30-year-old Arjun Kashyap hails from Chandmeta. He was arrested by police when he was 17 on the accusation of his involvement in ambulance blast case in which five CRPF jawan were killed.

Advocate Ishakhandel of JagLAG said that after the arrest, he was presented in CJM court in Jagdalpur where police had claimed that he is 30-year-old and his father name is Kodi.

On the contrary, his school certificates proofs that he was a school going boy of 17 years and his father’s name is Sulo.

However, with the efforts of JagLAG, the case was transferred to Juvenile Board and he was sent to juvenile home. Later, he was granted bail due to lack of evidences against him.

Infact, the entire chargesheet did not bear his name anywhere only a mention of 30-year-old Arjun was there that too in a confession document of co-accused.

Finally, on December 30, 2015, Arjun was granted bail by the Juvenile Board. Post his bail, he kept coming for hearing of the case.

The next hearing date was fixed on August 31, 2016, but before he could attend that he was allegedly assassinated in fake encounter by Bastar police. It is horrific, added Isha.

Kamal Shukla, the head of Sanyukt Patrakar Sangarsh Surkasha Samiti said, the killing of the innocent tribal guy in a fake encounter under the supervision of IG SRP Kalluri is very much heart rendering and termed it as cold-blooded murder.

He demanded fair probe in the case. The documents provided to Pradesh 18 testifies that Arjun was undertrial guy before Juvenile Board.

Juvenile Board's copy that proof Arjun was an untertrial.

However, after the encounter SP Jagdalpur Rajendra Dash claimed that Arjun was a notorious Maoist and Jan Militia Commander of Chandmeta and killed by joint team of DRG and STF in Tulsi Dongri.

He also claimed, huge cache of arms, ammunition and material of daily use recovered from his possession.



कोर्ट में चल रहा था केस, फैसले से पहले नक्सली बताकर भून डाला गोली से

राजकुमार सोनी
/रायपुर. बस्तर में आदिवासियों को मिलते-जुलते नामों का खामियाजा तो भुगतना पड़ रहा है, अब संविधान और कानून पर भरोसा भी उनकी मौत की वजह बन रहा है। सुकमा जिले के गोमपाड़ इलाके की मड़कम हिडमे सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दी गई थी, क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई एक याचिका में मड़कम हिड़मे नाम की एक अन्य युवती का नाम शामिल था। गंगालूर इलाके के पालनार इलाके में ग्रामीण किसान सीतू हेमला को भी सुरक्षाबलों ने सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया था, क्योंकि इस इलाके में इसी (सीतू हेमला) नाम के एक दीगर नक्सली कमांडर की तूती बोलती थीं।

इधर, स्वाधीनता दिवस के ठीक दूसरे दिन पुलिस ने अर्जुन नाम के युवक को नक्सली कमांडर बताकर गोलियों से भून डाला है उसके बारे में लीगल एड की अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल का कहना है कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था और साल भर पहले पुलिस ने उसे नक्सली होने के झूठे आरोप में गिरफ्तार किया था। अर्जुन को अदालत ने जमानत दे दी थी और वह नियमित रुप से कोर्ट की हर पेशी में उपस्थित होता था।

मुठभेड़ में मारने का दावा
16 अगस्त को आईजी शिवराम कल्लूरी और पुलिस अधीक्षक आरएन दास की ओर से मीडिया को बताया गया कि बस्तर के दरभा इलाके के गांव तुलसी डोंगरी, कोलेंग, मुड़ागढ़ व कांदानार इलाके में पुलिस की सर्चिंग चल रही थी तभी एक गांव चांदामेटा के जंगल में नक्सली और पुलिस जवान आमने-सामने हो गए। दोनों ओर से एक घंटे तक फायरिंग हुई। जब गोलीबारी खत्म हुई तो पुलिस को एक वर्दीधारी नक्सली का शव मिला जिसकी शिनाख्त जनमिलिशिया कमांडर एवं माचकोट के हार्डकोर नक्सली अर्जुन के रुप में की गई है। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि अर्जुन 3 लाख का ईनामी नक्सली था और वर्ष 2014 में संजीवनी वाहन विस्फोट की घटना में शामिल था। इस घटना में सीआपीएफ के दो जवान शहीद हुए थे। उसने इलाके के दर्जनभर ग्रामीणों की हत्या भी की थी।

पुलिस ने पकड़ा था 17 साल के अर्जुन को
इधर लीगल एड की अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल का कहना है कि चांदामेटा गांव के जिस अर्जुन को पुलिस ने मौत के घाट उतार दिया है उसे पहली बार पुलिस ने 15 अगस्त 2015 को एक बाजार से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के दौरान अर्जुन की उम्र महज 17 साल की थी, लेकिन पुलिस ने उसे 30 साल का व्यस्क बताकर जेल में ठूंस दिया था। स्कूल की मार्कशीट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर जब यह साबित हो गया कि अर्जुन नाबालिग है तो अदालत ने पूरा मामला किशोर न्यायालय के सुर्पुद कर दिया था। अर्जुन पर वाहन विस्फोट में शामिल होने का आरोप लगा था, लेकिन पुलिस की ओर से जो गवाह पेश किए गए थे वे झूठे निकले। अर्जुन जमानत पर रिहा कर दिया गया था और किशोर न्यायालय की ओर से मुकर्रर की गई हर पेशी में उपस्थित रहता था।

अदालत से छूट भी जाओगे तो जान से जाओगे?
अर्जुन की मौत को पूरी तरह से फर्जी करार देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, बस्तर से लोकतंत्र गायब है। अर्जुन को मुठभेड़ में मौत के घाट उतारकर पुलिस यह बताना चाहती है कि अगर अदालत से छूट भी जाओगे तो जान से हाथ धो बैठोगे। पुलिस द्वारा फंसाए जाने के बाद अर्जुन की पढ़ाई छूट गई थी मगर वह अपने माता-पिता का बोझ हल्का करने के लिए खेती-बाड़ी में उनका सहयोग करता था। 16 अगस्त को वह अपने घर की बकरियों को जंगल लेकर गया था तब पुलिस ने उसे गोलियों से भून डाला। यदि अर्जुन नक्सली होता तो क्या कोर्ट की हर पेशी में मौजूद रहता? अर्जुन की मौत से यह साबित होता है कि बस्तर में कानून का नहीं हिटलर का शासन संचालित है।

लड़ी जा सकती है कानूनी लड़ाई
लीगल एड अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल ने कहा कि फिलहाल हमें इतनी सूचना मिली है कि अर्जुन के माता-पिता को भी पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है। वे कब तक गिरफ्त में रहेंगे यह साफ नहीं है। यदि अर्जुन के अभिभावक कानूनी लड़ाई लडऩा चाहेंगे तो लीगल एड उनकी मदद जरूर करेगा।
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माओवाद: एक और मुठभेड़ को लेकर सुरक्षा बलों पर गहराया शक

राजकुमार सोनी@CatchHindi
| 19 August 2016, 8:13 IST


छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर इलाके में आदिवासियों को मिलते-जुलते नामों का खामियाजा तो भुगतना पड़ ही रहा है, अब संविधान और कानून पर भरोसा भी उनके जीवन की गारंटी नहीं है.

सुकमा जिले के गोमपाड़ इलाके में रहने वाली मड़कम हिड़मे की मौत को लेकर संशय के बादल अभी भी बने हुए हैं.

स्थानीय लोगों के मुताबिक मड़कम की हत्या सुरक्षा बलों ने एक अन्य इसी नाम की युवती के चक्कर में कर दी थी. सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगा रखी थी जिसमें मड़कम हिड़मे नाम की एक अन्य युवती का नाम शामिल थ

गंगालूर इलाके के पालनार इलाके में ग्रामीण किसान सीतू हेमला भी कथित तौर पर सुरक्षा बलों का सिर्फ इसीलिए निशाना बना क्योंकि उस इलाके में सीतू हेमला नाम के एक दीगर माओवादी कमांडर की तूती बोलती थीं.

स्वाधीनता दिवस के ठीक दूसरे दिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक बार फिर से अपनी पीठ थपथपाई है. सुरक्षाबलों ने अर्जुन नाम के युवक को मार गिराया है. पुलिस का दावा है कि अर्जुन माओवादी कमांडर था.

लेकिन पुलिस की कहानी पर कई सवाल उठने लगे हैं. अर्जुन के बारे में लीगल एड की अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल का कहना है कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था और साल भर पहले पुलिस ने उसे माओवादी होने के झूठे आरोप में गिरफ्तार किया था. अर्जुन को अदालत ने जमानत दे दी थी और वह नियमित रुप से कोर्ट की हर पेशी में उपस्थित होता था.

मुठभेड़ में मारने का दावा

16 अगस्त को आईजी शिवराम कल्लूरी और पुलिस अधीक्षक आरएन दास की ओर से मीडिया को जारी बयान में बताया गया कि बस्तर के दरभा इलाके के गांव तुलसी डोंगरी, कोलेंग, मुड़ागढ़ व कांदानार इलाके में पुलिस की सर्चिंग चल रही थी तभी एक गांव चांदामेटा के जंगल में माओवादी और पुलिस जवान आमने-सामने आ गए.

दोनों पक्षों के बीच एक घंटे तक फायरिंग हुई. जब गोलीबारी खत्म हुई तो पुलिस को एक वर्दीधारी माओवादी का शव मिला जिसकी शिनाख्त जनमिलिशिया कमांडर एवं माचकोट के हार्डकोर माओवादी अर्जुन के रुप में की गई है. पुलिस अधिकारियों ने कहा कि अर्जुन तीन लाख का ईनामी माओवादी था और वर्ष 2014 में संजीवनी वाहन विस्फोट की घटना में भी शामिल था. इस घटना में सीआरपीएफ के दो जवान शहीद हुए थे. उसने इलाके के दर्जन भर ग्रामीणों की हत्या भी की थी.

पुलिस ने पकड़ा था 17 साल के अर्जुन को



इधर लीगल एड की अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल का कहना है कि चांदामेटा गांव के जिस अर्जुन को पुलिस ने मौत के घाट उतार दिया है उसे पहली बार पुलिस ने 15 अगस्त 2015 को एक बाजार से गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के दौरान अर्जुन की उम्र महज 17 साल की थी, लेकिन पुलिस ने उसे 30 साल का व्यस्क बताकर जेल में ठूंस दिया था.


अर्जुन की स्कूल की मार्कशीट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर जब यह बात साबित हो गई कि अर्जुन नाबालिग है तो अदालत ने पूरा मामला किशोर न्यायालय के सुर्पुद कर दिया था. अर्जुन पर वाहन विस्फोट में शामिल होने का आरोप लगा था, लेकिन पुलिस की ओर से जो गवाह पेश किए गए थे वे झूठे निकले. अर्जुन जमानत पर रिहा कर दिया गया था और किशोर न्यायालय की ओर से मुकर्रर की गई हर पेशी में उपस्थित रहता था.

अदालत से छूट भी जाओगे तो जान से जाओगे?

अर्जुन की मौत को पूरी तरह से फर्जी करार देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, 'बस्तर से लोकतंत्र लापता है. अर्जुन को मुठभेड़ में मौत के घाट उतारकर पुलिस यह बताना चाहती है कि अगर अदालत से छूट भी जाओगे तो जान से हाथ धो बैठोगे.

पुलिस द्वारा फंसाए जाने के बाद अर्जुन की पढ़ाई छूट गई थी मगर वह अपने माता-पिता का बोझ हल्का करने के लिए खेती-बाड़ी में उनका सहयोग करता था. अर्जुन के परिजनों का कहना है कि 16 अगस्त को वह अपने घर की बकरियों को जंगल लेकर गया था जब पुलिस ने उसे मार गिराया. यदि अर्जुन माओवादी होता तो क्या कोर्ट की हर पेशी में मौजूद रहता? अर्जुन की मौत से यह साबित होता है कि बस्तर में कानून का नहीं   हिटलर का शासन संचालित है.।


लीगल एड की सदस्य ईशा खंडेलवाल कहती हैं, 'फिलहाल हमें इतनी सूचना मिली है कि अर्जुन के माता-पिता को भी पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है. वे कब तक गिरफ्त में रहेंगे यह साफ नहीं है. यदि अर्जुन के अभिभावक कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो हम उनकी मदद जरूर करेंगे.'
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दंतेवाडा से गोमपाड़ पदयात्रा : आधुनिक युग में आदिम युग और बर्बरता की झलक
**संकेत ठाकुर

बस्तर के सुकमा जिला के ग्राम गोमपाड़ से लौटकर रायपुर आये अभी 36 घंटे ही हुए है लेकिन 9 अगस्त से 15 अगस्त तक की अगस्त क्रांति – तिरंगा पदयात्रा की यादें जस की तस स्मृति पटल पर रह रहकर कौंध रही है.
खासकर तनाव भरे वो 48 घंटे जो 13 अगस्त से 15 अगस्त के मध्य हमने गुजारे.
9 अगस्त की शाम 5 बजे दंतेवाडा से बस्तर में आदिवासियों के निर्मम दमन, लोकतान्त्रिक अधिकारों के हनन, सैन्यीकरण तथा संसाधन की लूट के खिलाफ अगस्त क्रांति – तिरंगा पदयात्रा आम आदमी पार्टी की आदिवासी नेत्री सोनी सोरी जी के नेतृत्व में प्रारम्भ हुई थी. जब हम दंतेवाडा के दंतेश्वरी मंदिर स्थित नई धर्मशाला पहुंचे तभी से ही यह अहसास हो गया था कि यह यात्रा साधारण नही है. पुलिस के सादे वर्दी धारी सिपाहियों की चौकसी तत्काल प्रारम्भ हो गयी थी, जब एक बेहद साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति हमारी आपसी बातचीत की वीडियो रिकार्डिंग कर रहा था, हमने आपत्ति दर्ज की तो हमारी कथित सुरक्षा के लिए तैनात सब इंस्पेक्टर की ओर इशारा कर बताया कि उन्होंने ही वीडियो रिकार्डिंग का उसे आदेश दिया हुआ है. हमारी आपत्ति दर्ज कराने पर वीडियो रिकार्डिंग तो बंद हो गई, लेकिन रिपोर्टिंग जारी रही.
9 अगस्त से 13 अगस्त की सम्पूर्ण यात्रा का विवरण एक लाइन में यह है कि हम लगातार पुलिस की निगरानी में रहे. कभी मिडिया के नाम पर तो कभी आईबी, एलआईबी, एसआईबी के नाम पर कोई ना कोई व्यक्ति हमारी गतिविधियों की रिकार्डिंग करता रहा. यही नही हमें असहयोग करने के लिए स्थानीय निवासियों, दुकानदारों पर दबाव बना रहा. यह तब समझ आया जब हमे जिला मुख्यालय दंतेवाडा में एक अदद लाऊड स्पीकर किराये पर उपलब्ध नही हो सका. एक व्यवसायी ने तो साफ साफ कह दिया साहब पदयात्रा के लिए हम आपकी मदद नही कर सकते हमे माफ़ करें.
कुम्हाररास में 9 अगस्त को रात्रि विश्राम ग्राम के सरपंच के सहयोग से निर्माणाधीन पंचायत भवन के हाल में निर्माण श्रमिको के साथ हुआ. 10 अगस्त को सोनी जी को कोर्ट में पेशी हेतु जाना था अत: वे पदयात्रा में 2 घंटे शामिल होकर गन्जेनार से जगदलपुर के लिए निकल गयी और हम लोग नकुलनार, मैलावाडा (जहाँ गत मार्च में रोड ब्लास्ट में 7 सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए थे) होते हुए हम भूसारास पहुंचे. सोनी जी देर शाम को पुन: पदयात्रा में शामिल हुई. भूसारास में सोनी सोरी जी के रिश्तेदार के घर इस शर्त के तहत ठहरे कि उनका हमसे कोई राजनैतिक सम्बन्ध नहीं है. 11 अगस्त की सुबह सोनी सोरी जी थोड़ी देर पदयात्रा करने के बाद ग्राम कोर्रा से जगदलपुर के लिए निकल गयी. हमारी पदयात्रा कोर्रा, गादीरास, होते हुए सुकमा के निकट पहुंची. सुकमा में ठहरने की व्यवस्था करने मैंने स्थानीय सम्पर्क का इस्तेमाल किया तो मुझे दो टूक शब्दों में बता दिया गया कि आप लोगों के पल पल की खबर पुलिस-प्रशासन के पास है यहाँ आपको कोई मदद नही करने के हिदायत दी गई है. सुकमा में रात्रि विश्राम की व्यवस्था कठिन हो गयी थी, इसी बीच शाम को खबर आई कि सोनी सोरी जी पर दोपहर  12 बजे के करीब कोर्ट जाते वक्त कोडेनार के नजदीक उसी स्थान पर हमले की कोशिश की गई जहाँ 20 फरवरी 16 की रात्रि उन पर केमिकल हमला हुआ था. यह सुनकर हम सब स्तब्ध रह गये. यह प्रश्न पुन: उठा कि क्या इस यात्रा को किसी भी तरह से रोकने की शासन  चाल चल रहा है ? लेकिन हम सभी ने तय किया चाहे जो हो बस्तर के सच को हम बेनकाब करके रहेंगे. लेकिन अब हमे भी बेहद सावधान रहने की जरुरत महसूस हुई. हमने फिर तय किया कि हम सुकमा में ठहरने की बजाय कहीं और ठहरेंगे. सुकमा के स्थानीय पत्रकार साथी की मदद से एक सुरक्षित स्थान हमने ढूंढ निकाला. इस बार हमने सावधानी बरतते हुए इस स्थान को चिन्हांकित करने से बचा लिया. रात्रि हमारे क्रन्तिकारी पदयात्रियों की बैठक हुई हमने तय किया अब हम फोन का इस्तेमाल कम से कम करेंगे और सन्देश वाहक का प्रयोग ज्यादा करेंगे. सोनी जी को संदेश भिजवाया गया कि वे पहले जगदलपुर में कोर्ट का कार्य करें और वहीं रुक जाएँ रात्रि सफर ना करें. बिना किसी बाधा के रात्रि विश्राम कर भोर होते ही 12 अगस्त को हम सब सुकमा की ओर निकल पड़े. सुकमा में नाश्ता करने के बाद हम कोंटा की ओर निकल पड़े. एसआईबी और पुलिस के खोजी पत्रकार हमारी निगरानी करते रहे रिपोर्टिंग के बहाने.
रामाराम, केरलापाल होते हुए पूरे 38 किमी पैदल चलने के बाद पदयात्री दोंरनापाल पहुंचे. यहाँ एक राहगीर से विश्राम का पता पूछा तो उसने 1 घंटे लगातार साथ रहकर रात्रि विश्राम की व्यवस्था करने में अकल्पनीय मदद की. इस बीच खबर आई कि सोनी जी शाम को हमे ज्वाइन करना चाहती है. मैंने सन्देश भिजवाया कि वे सुबह हमें ज्वाइन करें तो बेहतर होगा और वे मान भी गई. दोरनापाल में रात्रि विश्राम के बाद 13 अगस्त की सुबह 7 बजे हमारा दल अगले पड़ाव की ओर रवाना हो गया. हम लोग हर 5 किमी में एक सीआरपीएफ केम्प को पार करते हुए एर्राबोर पहुंचे जहाँ सोनी सोरी जी ने हमे ज्वाइन किया. एर्राबोर से इंजरम होते हुए हमारा दल कोंटा पहुंचा तब तक रात्रि के 8 बज चुके थे. हमारे रुकने की व्यवस्था स्थानीय रेस्ट हाउस के बरामदे में हुई.
कोंटा में अनेक तरह की सूचनाएं मिली जिनका सार यह था कि पदयात्रियों के विरोध के लिए पूर्व सलवा जुडूम के एक नेता का आगमन शाम को ही हो चुका था और वे साहब रात्रि विश्राम के लिये रेस्ट हाउस की ही मांग एसडीएम से कर रहे थे. इस बाबत सुकमा के एसपी साहब का फोन भी आ गया था मानो जुडूम नेताजी राजकीय मेहमान हो. लेकिन गलत भी क्या पुलिस की मदद करने वाला हर व्यक्ति बस्तर में व्हिआइपी सुविधाये पाता ही है. जब सोनी जी के साथ हम सब कोंटा प्रवेश कर रहे थे तो अचानक दर्जनों की तादात में कथित प्रेस कर्मी प्रकट हो गये और लगातार कमरों से फ्लेश चमकने लगे. कोंटा की रात्रि में सन्नाटा पसरा हुआ था, देर रात पुलिस का सायरन बज रहा था, चौक-चौक पर सुरक्षा बलों का जमावड़ा था. ऐसा लगा रहा था मानो कर्फ्यू लगा हो. एक बात बड़ी स्पष्ट थी कि कोई बड़ी गडबडी हो सकती है. हम सबने देर रात बैठक की, एक एक मुद्दों पर गम्भीरता से विचार विमर्श हुआ, सम्भावित गडबड क्या क्या हो सकती है, विरोध की दशा में हमे कैसे संयम बरतना है, पुलिस-प्रशासन से चर्चा के लिए टीम बनायीं गयी आदि. कुल मिलाकर तय किया गया कि सम्भावित विरोध से बचने के लिए अल्लसुबह 5 बजे निकला जाये.
गोमपाड़ जाने का ऐसा जूनून कि हम सब रात्रि 1 बजे सोये और 4 बजे उठकर तैयार होने लगे. सुबह सुबह 6 बजे कोंटा की सडक-गली ”हिडमे को न्याय दिलाने गोमपाड़ चलो गोमपाड़ चलो” के नारों से गूंज उठा. कोंटा शहर पार करते ही सीआरपीएफ का केम्प पड़ा, जहाँ बेरियर लगाकर हमें रोक दिया गया. सीआरपीएफ के अधिकारी ने कहा आगे सडक जगह जगह से काट दी गयी है, आगे खतरा है, आप लोग नही जा सकते.... सोनी सोरी जी ने कहा हम खतरों से नही डरते, आप हमारी चिंता छोडो, हमें जाने दो. कुछ साथी तैश में आने लगे, अपने ही देश में आने जाने पर रोक टोक क्यों ? कुछ ही देर में बेरियर हटा दिया गया, हम चलते रहे, क्रांति के जनगीत गाते रहे....जंगल छोड़ब नाही, गाँव छोडब नाही... केम्प आता तो नारा शुरू हो जाता.
मुरलीगुडा के पास कोंटा क्षेत्र का सीआरपीएफ का अंतिम केम्प है, इस केम्प से जैसे ही आगे बढ़े सडक खत्म हो गई, पगडंडी प्रारम्भ हुई, उबड खाबड़ रास्ते मिले. बंडाग्राम के पास कच्ची सडक भी कटी हुई है, कही कही पर पेड़ काटकर फंसा दिया गया है. याने आगे जाने का रास्ता सिर्फ पैदल या बाइक से ही सम्भव.
बंडा गांव से आगे का ग्राम बेलपोसा है, वहां ग्रामवासियों ने हमारा जमकर स्वागत किया ख़ुशी जाहिर कि उनके क्षेत्र में पहलीबार इतने सारे शहरी लोग आये. बेलपोसा से 4 किमी आगे हमारी मंजिल गोमपाड़ थी, लेकिन साथी इतने व्याकुल थे कि बस अब पहुँच ही जाये. हम लोग पहाड़ का रास्ता चलकर गोमपाड़ 3 बजे पहुंचे. स्व. मडकम हिडमे की माँ लक्ष्मी और पिता कोसा से मुलाकात हुई. उन्होंने हमारे आवभगत की पूरी व्यवस्था कर रखी थी.
गोमपाड़ बस्तर का एक ऐसा गाव है जो होने को तो कोंटा से मात्र 25 किमी की दुरी पर स्थित है लेकिन यहाँ आदिम युग की झलक मिल जाती है. सड़क नही, बिजली नही, पानी नही, एक भी पक्का मकान नही, स्वास्थ्य केंद्र नही, स्कुल नही, राशन दुकान नही, आंगनबाड़ी नही, सरकारी कर्मचारी नही, कोई दुकान नही. लेकिन सभी 90 मकान साफ सुथरे. ढेंकी से धान कूटा जाता है, मसूर कुल्थी को दरा जाता है, इमली और मिर्ची की चटनी बनायी जाती है.
सुबह की थकान खटिया पर कुछ देर विश्राम के बाद मिटी. शाम को मिडिया के कुछ साथी रायपुर, रायगढ़, जगदलपुर से भी आ गये. शाम को अँधेरा गहरा गया, गाव में लालटेन भी नही क्योंकि मिट्टीतेल कहाँ से लाये ? शाम शाम होते खबर आई कि पुलिस के कुछ लोग गाव में घुस आये है, थोड़ी देर बाद खबर मिली की माओवादी भी आ सकते है. एक आशंका ने जन्म भी ले लिया कि अब क्या होगा ? सोनी जी के साथ गाव वालों ने बैठक की और कहा कि कल तिरंगा झंडा तो हम फहराएंगे लेकिन हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा ? पुलिस हमारे लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मारती है, माओवादी अलग परेशान करते है, जवान बच्चो को दलम में शामिल होने दबाव डालते है, और तो और जो कल तक माओवादी थे वे अब डीआरजी पुलिस बनकर हमे ही परेशान करते है. सोनी जी के साथ साथ हम सब तनाव में आ गये, यदि कल झंडा नही फहरा तो क्या होगा ? पुलिस आखिरी दम तक हमे रोकने का प्रयास करेगी. माओवादी कुछ अलग घटना को अंजाम दे सकते है. खबर यह भी उड़ी कि एक तरफ सुरक्षा बलों की टीम आसपास है तो माओवादी भी पास कहीं ठहरे है.... लेकिन हिडमे की माँ से मिलकर हम सबकी हिम्मत बढ़ गई जब उसने कहा कल तो सिर्फ तिरंगा झंडा ही फहरेगा !
रात्रि गहरा गयी थी, मैंने कोर टीम के 4 साथियों के साथ कल के प्लानिंग पर चर्चा की, सोनी जी की सहमती बनी और हमने तय किया कि हमारी योजना कल क्या होगी.
15 अगस्त की सुबह बेहद सुहानी थी, सुबह 4 बजे मुर्गे-मुर्गियों की बांग से हम सबकी नींद खुल गई. सुबह और भी कुछ साथी, पत्रकार आदि आ गये. हम सब तैयार होकर सबसे पहले मडकम हिडमे के समाधि स्थल पर गये, स्व. हिडमे को श्रद्धांजलि दी गयी. दृश्य बेहद करूण हो गया था जब हिडमे की दादी समाधि स्थल के पास आकर फूट फूट कर रोने लगी. हम सबकी भी ऑंखें भर आई, हिडमे की माता, छोटी बहन शांति की आँखों से आंसू थम नही रहे थे. सोनी जी के साथ साथ मैं भी भावुक हो गया....
श्रद्धांजलि के पश्चात् हम सब ध्वजारोहण स्थल की ओर गये. हमे बताया गया यहाँ पर हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को माओवादी काला झंडा फहराते है. हमने तय किया कि सुबह 10 बजे तक हम ध्वजारोहण कर लें और किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति से बचते हुए जल्द से जल्द गोमपाड़ से निकल जाये. नियत समय पर ध्वजारोहण हुआ, सोनी सोरी जी ने हिडमे की छोटी बहन लक्ष्मी के साथ मिलकर तिरंगा झंडा की पूजा की, सुकल दादा ने नारियल फोड़ा, मैंने अगरबत्ती जलाई और आज़ादी के 69 साल बाद पहली बार गोमपाड़ में सोनी सोरी ने तिरंगा फहराया. ध्वजारोहण के बाद भारत माता की जय, तिरंगा झंडा अमर रहे, वन्दे मातरम के नारों से गोमपाड़ का समूचा इलाका गूंज गया.
इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने लगभग 500 लोग जिनमे गोमपाड़ और पड़ोसी ग्राम के आदिवासियों सहित बड़ी संख्या में सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, मिडिया कर्मी और सादे वेश में सुरक्षा कर्मी शामिल हुए.
सोनी सोरी ने उद्बोधन गोंडी में किया, हिडमे की माँ लक्ष्मी ने ओजस्वी भाषण गोंडी में दिया, पत्रकार कमल शुक्ल ने क्रांति गीत गाया. इस बीच एक व्यक्ति ने एकाएक खबर दिया कि कुछ ही देर में 100-150 लोग आने वाले है और वे काला झंडा फहराएंगे. यह सुनकर मैं चौंक गया, अब क्या करें ? उस व्यक्ति से पूछताछ की गई तो उसने बताया कि वह पड़ोस के गाव का रहने वाला है और उसने गोमपाड़ आते आते कुछ लोगों को खाना बनाते देखा और सुना कि वे लोग खाना खाकर गोमपाड़ जायेंगे. हम सबने किसी भी अप्रिय स्थिति का सामना करने का निश्चय किया. इस दौरान सोनी जी को खबर दी गयी कि आसपास के 10-15 गावों के लोग अपनी व्यथा सुनाने आना चाहते है और हम सब वही गाव में उनका इंतजार करें. तब तक 11.30 बज चुका था. कोंटा शाम तक पहुचने के लिहाज से हमे निकल जाना था लेकिन हमने गोमपाड़ में कुछ और देर तक रुकने का निर्णय लिया.....
इस बीच यह खबर भी तेजी से फैली कि माओवादी आने वाले है, कुछ ने कहा उन्होंने सशस्त्र लोगो को आते देखा है, वे माओवादी है या सुरक्षा कर्मी मालूम नही ? याने आशंका बढ़ गयी, कुछ अनहोनी ना हो जाये ? कहीं यह पुलिस की तो कोई चाल नही ? कही यह माओवादियो की चाल तो नही ?
दोपहर 12 बजे तक उसी मैदान में फिर से भीड़ जुट गई. इस बार पहले से अधिक संख्या में लोग आये. गोमपाड़ के चारो दिशाओं से आदिवासी आते दिखे. सोनी सोरी जी के साथ हम कुछ अन्य साथी उनसे मिलने गये.
एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी व्यथा सुनाई कि उसका जवान बेटा पिछले 2 साल से लापता है !
एक महिला ने अश्रुपुरित नेत्रों से बताया कि उसके पति को 4 साल पहले पुलिस उठाकर ले गई लेकिन आज तक उसका पता नही चला !
एक अन्य महिला ने तस्वीर दिखाई कि 2009 से उसके गाव के पति-पत्नी का जोड़ा लापता है !
बेलपोसा का रमेश कोंटा में ग्यारहवी क्लास के आगे नही पढ़ सका क्योंकि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था बिना किसी जुर्म के !
एक एक कर अनेक व्यक्तियों ने जो व्यथा सुनाई वह रोंगटे खड़ी कर देने वाली है. वे सब एक ही बात कर रहे थे. वे पुलिस से डरते है, पुलिस उनके गाव आती है और उनके घर का सामान लूटकर ले जाती है, बर्तन, गहना, पैसा से लेकर मुर्गी तक ! माओवादी आते है और उन्हें मारते है. वे जाएँ तो जाये कहाँ ?
यह सब सुनकर हम सब सन्न रह गये. हिडमे की माँ लक्ष्मी का कहना था – “सरकार हमे आखिर कब इन्सान मानेगी ? हमारे साथ जानवरों जैसा बरताव् कब खत्म होगा ? आखिर कब तक माओवादी बताकर हमारे लोगो को मारा जाता रहेगा ? हमारे गाव में कोई कुत्ता अगर पागल हो जाता है तो भी उसके मालिक से पूछकर उसे मारा जाता है लेकिन यह सरकार तो हमारे लोगो को बस मारे जा रही है. अब तिरंगा हाथ में लिया है मैंने, अब माओवादियो और सरकार इन दोनों से मुकाबला अब मै तिरंगे के सहारे ही करूंगी.”
गोमपाड़ से यू तो लौट आया हूँ लेकिन हिडमे की माँ के शब्द और बहन शांति, लक्ष्मी की कातर आँखे 180 किमी की लम्बी पदयात्रा के थकान बाद भी मुझे सोने नही देती है. लगता है सरकार ने ठान रखा है आदिवासियों को आदिम युग में जीने देने के लिए, मरने के लिए. तभी तो बार बार मुझे लगता है जैसे गोमपाड़ जाकर मैंने आदिम युग की झलक देख ली हो जहाँ बर्बरता चरम पर है पुलिस सुरक्षा के नाम पर !
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ताकि सनद रहे वक्त जरूरत काम आये
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अगस्त क्रांति –तिरंगा यात्रा
दन्तेवाड़ा से गोमपाड 9 से 15 अगस्त
में शामिल पदयात्री.
स्थानीय जनसमूह के अलावा
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१. सोनी सोरी, गीदम २. सुकल प्रसाद नाग, मंतेमुर गीदम ३. कवासी हिडमे, गीदम  ४. लिंगाराम कोड़ोपी, गीदम  ५. रश्मि ठाकुर रिंकी, समेली, दंतेवाड़ा ६. संजय पन्त, दंतेवाडा  ७. तिरुपति येलम, बीजापुर ८.डॉ. संकेत ठाकुर, रायपुर   ९. सत्येन बोरदोलोई, मुंबई  १०. मलय तिवारी, कोलकाता  ११. अतीन्द्रियो, कांकेर १२. एपी जोसी, भिलाई  १३. अली मोहम्मद माज़, नयी दिल्ली १४. प्रियंका शांडिल्य, सरगुजा १५. प्रभात सिंह, दंतेवाडा १६. अनुपम रॉय, कोलकाता  १७. अफरोज आलम, नई दिल्ली  १८. सिराजुद्दीन, नई दिल्ली  १९. ईश्वर निर्मलकर, दल्ली राजहरा  २०. बसंत रावटे, दल्ली राजहरा  २१. कमलेश ठाकुर, दल्ली राजहरा २२. शत्रुघन साहू, दल्ली राजहरा २३.महाजन, दल्ली राजहरा २४. नंदू, दल्ली राजहरा   २५. डॉ. गोल्डी जार्ज, रायपुर २६. दुर्गा झा, रायपुर २७. नागेश बंछोर, रायपुर  २८. कमल शुक्ल, कांकेर २९. तामेश्वर सिन्हा, बस्तर ३०. निकिता अग्रवाल नई दिल्ली  ३१. तन्मय, बिहार  ३२. विजेंद्र तिवारी, भिलाई  ३३. वासुकी प्रसाद उन्मत, भिलाई   ३४. रोहित आर्य, जगदलपुर  ३५. समीर खान, जगदलपुर ३६. विवेक शर्मा, जगदलपुर  ३७. जगमोहन बघेल, बस्तर  ३८. गद्रे जी, बस्तर ३९. कलादास डहरिया, भिलाई  ४०. डॉ लाखन सिंह, बिलासपुर  ४१. आनंद मिश्र, बिलासपुर ४२. नन्द कश्यप, बिलासपुर ४३. आलोक शुक्ला, रायपुर   ४४. श्रेया, रायपुर   ४५. शालिनी गेरा, बिलासपुर  ४६. बेला भाटिया, जगदलपुर  ४७. परमेश रजा, जगदलपुर ४८. भावेश सत्पथी, जगदलपुर  ४९. शिल्पी लकड़ा, जगदलपुर ५०. अर्चना गुप्ता, जगदलपुर ५१. अरविन्द गुप्ता, दंतेवाड़ा ५२. पप्पू गुप्ता, दंतेवाड़ा ५३. जनकलाल ठाकुर, डोंडी लोहारा ५४. प्रसाद राव भिलाई, ५५. प्रकाश झारिया, रायपुर
  56 दंतिराम पोयम बस्तर   57 लक्षमण वेको बस्तर  58 अनंतराम भद्रे बस्तर    59 शोभा राघवन दिल्ली     60 अरुंधति दिल्ली मेकपीस एम्नेस्टी इंटरनेशनल बंगलौर   61 to 63  चंद्रशेखरन गांधी आश्रम चिंतुर और उनके चार साथी भी शामिल हुए , जिनके नाम नहीं मालूम 64 : अरुणा चंद्रशेखर  65  बंग  66  सौरा यादव व् उनके साथी   67 उमाप्रकाश ओझा आप
 67 पवन चन्द्राकर 67अरुणा चंद्रशेखर एमनेस्टी इंटरनेशनल   68 to  74  निरा, उर्मीला, रमाकांत ,भिलाई, संगिता ,चुन्नी रोशन
:75 निजाम भिलाई 76 .अमरनाथ पाण्डेय
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बस्तर में गानों के नाम पर स्टेट मशीनरी का कहर
20 August 2016 - 12:16pm

अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) : छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के बचेली पंचायत में रहने वाले मोहम्मद फ़िरोज़ को छत्तीसगढ़ पुलिस ने यह कहते हुए गिरफ़्तार कर लिया कि वह स्थानीय लोगों के मोबाइल में 'नक्सली गाने' डाउनलोड करता है.

यह आरोप इसलिए भी अजीबो-गरीब है क्योंकि इन विवादित गानों की भाषा ‘गोंडी’ है, लेकिन फ़िरोज़ व उसके परिवार वालों को गोंडी भाषा की कोई जानकारी नहीं है. फ़िरोज़ और उनका परिवार बिहार के औरंगाबाद जिले से ताल्लुक रखता है लेकिन रोज़ी-रोटी कमाने के ख़ातिर छत्तीसगढ़ में रह रहा है.

32 साल के मोहम्मद फ़िरोज़ के डेढ़ साल और चार साल के दो बच्चों के पिता हैं. फ़िरोज़ के पिता मोहम्मद अय्यूब का पांच साल पहले इंतकाल हो चुका है. अय्यूब बचेली की एक मस्जिद में इमाम थे. फ़िरोज़ भी यहां की स्थानीय मस्जिद कमिटी के सचिव हैं. उन्हें बीते 10 अगस्त को छत्तीसगढ़ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था.

बचेली में दर्जी का काम करने वाले फ़िरोज़ के बड़े भाई मोहम्मद सफ़दर घटना के बारे में बताते हैं, ‘10 अगस्त यानी बुधवार के दिन सुबह 11.30 बजे मेरे छोटे भाई की दुकान पर पुलिस आयी. उस समय फ़िरोज़ दंतेवाड़ा किसी काम से गया था. दुकान पर मेरा भतीजा बैठा हुआ था. पुलिस ने अचानक लैपटॉप उठाकर भतीजे को भी साथ चलने को कहा. इससे वो काफी डर गया. उसने मुझे फोन किया तो मैं तुरंत फ़िरोज़ की दुकान पर पहुंचा. पुलिस मुझे अपने साथ थाने लेकर गई. वहां लैपटॉप खोलकर जांच की और एक गाना चलाकर बताया कि यह नक्सली गाना है. मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं क्योंकि वो गाना गोंडी में है और मेरे पूरे परिवार में किसी को भी गोंडी नहीं आती. फ़िरोज़ भी गोंडी नहीं जानता है.’

सफ़दर बताते हैं कि उसके बाद पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया और कहा कि कल वे फ़िरोज़ को अपने साथ थाने लेकर आएं.

सफ़दर के मुताबिक़ अगले दिन सुबह वो खुद इलाक़े के कुछ व्यापारियों के साथ फ़िरोज़ को लेकर पुलिस थाना पहुंचे. वहां पुलिस ने फ़िरोज़ की एक बात सुने बग़ैर पकड़ कर लॉकअप में डाल दिया. उसके बाद उसके ख़िलाफ़ केस बनाकर उसे दंतेवाड़ा जेल भेज दिया गया. अभी फ़िरोज़ दंतेवाड़ा जेल में ही है.

सफ़दर बताते हैं कि इस घटना के बाद से उनका पूरा परिवार सदमे में हैं. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें।

फ़िरोज़ पर पुलिस ने ‘छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम -2005’ की धारा -8 (1)/(5) के तहत मुक़दमा दर्ज किया है.

यहां बताते चलें कि यहां के सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों द्वारा इस अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती दी जा चुकी है, जिसे बिलासपुर हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था. अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार को एक नोटिस भेज इस मामले में जवाब देने को कहा है.

इस अधिनियम की जानकारी रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अली मोहम्मद माज़ बताते हैं, ‘फ़िरोज़ पर लगी हुई धारा सख़्त है. इसके अंतर्गत किसी भी गैर-क़ानूनी गतिविधि का प्लान बनाना भी अपराध है. इसके साबित होने पर सात साल की सज़ा का प्रावधान है. हालांकि इस धारा को कोर्ट में साबित करना मुश्किल है, लेकिन पुलिस इस धारा का दुरूपयोग आसानी से कर सकती है. इसी साल मई महीने में जेएनयू के तीन प्रोफेसरों पर भी इसी अधिनियम के तहत बस्तर में आदिवासियों को नक्सलवादियों की सहायता के लिए भड़काने का आरोप लगाया गया है.’

दरअसल, फ़िरोज़ तक पुलिस की पहुंचने की कहानी भी काफी दिलचस्प है. पुलिस के मुताबिक़ फ़िरोज़ की गिरफ़्तारी के पूर्व भांसी थाने ने अपनी गश्त के दौरान धुरली के पटेलपारा गांव में बुधराम कर्मा नामक एक व्यक्ति को यह कहते हुए गिरफ़्तार किया कि वो बासनपुर इलाक़े में नक्सली बैनर व पोस्टर लगाने जा रहा था. इसकी गिरफ़्तारी के बाद पुलिस ने इससे एक मोबाइल ज़ब्त किया, जिसमें 'नक्सली गाने' पाए गए. पूछताछ में बुधराम ने बताया कि उसने यह गाना बचेली न्यू मार्केट में फ़िरोज़ के मोबाइल शॉप से भरवाए हैं. इसी आधार पर पुलिस फ़िरोज़ के दुकान पर पहुंच गई और उसके दुकान में मौजूद लैपटॉप को ज़ब्त किया. पुलिस की खोजबीन में 'नक्सली गाने' पाए गए.

‘ये नक्सली गाना क्या होता है?’ इसके बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पुलिस ही बेहतर बता सकती है. वैसे बताया जा रहा है कि यह नक्सली गाना पुलिस वालों के ख़िलाफ़ है, इसमें पुलिस वालों को गाली दी गई है. एक स्थानीय पुलिसकर्मी अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताता है कि फ़िरोज़ के लैपटॉप में पाया गया गाना लोगों को शासन के विरुद्ध भड़काने वाला था.

छत्तीसगढ़ में पुलिसिया आतंक की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. नक्सलियों की कमर तोड़ने के नाम पर पुलिस किस तरह से बस्तर के आम जनता की कमर तोड़ने पर आमादा है, इसके सबूत पूरे बस्तर के चप्पे-चप्पे में बिखरे पड़े हैं.

आलम यह है कि यहां के कपड़ा व्यापारियों को 10 मीटर से अधिक लाल कपड़ा बेचने तक पर पाबंदी है, क्योंकि पुलिस का मानना है कि 10 मीटर से अधिक लाल कपड़ा बेचने का मतलब है – नक्सिलयों का मददगार होना. इसी तरह से बिजली के तार (वायर) बेचने की भी सीमा तय कर दी गई है. अगर किसी दुकानदार को 20 मीटर से अधिक वायर बेचते हुए पकड़ा गया तो उस पर बेहद ही ख़तरनाक क़ानूनों के दायरे में कार्रवाई की जाती है. इसी प्रकार कोई दर्जी काले कपड़े की कोई पोशाक नहीं सिल सकता. कोई जूता व्यापारी अधिक संख्या में स्पोर्ट्स शूज़ नहीं बेच सकता.

ग़लती से भी ऐसा कर जाने वाले न जाने कितने बेगुनाह और सीधे-साधे आदिवासी पुलिस के मकड़जाल में फंसकर अपनी ज़िन्दगी बरबाद कर चुके हैं. यह सिलसिला अब भी जारी है.

यहां के दुकानदारों की आंखों में पुलिस व नक्सलियों का ख़ौफ़ आसानी से देखा जा सकता है. खासतौर मुस्लिम दुकानदारों के आंखों में इससे भी कहीं अधिक यहां अल्पसंख्यक होने का डर है. यहां कई स्थानीय दुकानदार फ़िरोज़ को बेगुनाह मानते हैं और पुलिस से उसे छोड़ देने की अपील भी कर चुके हैं. लेकिन पुलिस ने इनकी मांग को खारिज कर दिया.

बचेली न्यू मार्केट में ही जूते की दुकान चलाने वाले फ़िरोज़ नवाब, जो यहां के वार्ड पार्षद भी हैं, का कहना है कि फ़िरोज़ ने जान-बूझकर कुछ भी नहीं किया. उसे तो गोंडी भी नहीं आती.

वो बताते हैं, ‘हम लोग तो बारूद के ढ़ेर पर बैठे हैं. अब आप ही बताइए कि कोई आदमी आम वेशभूषा में हमारी दुकानों पर सामान खरीदने आता है तो हम कैसे पहचानेंगे कि वो नक्सली है. और अगर उसने हमसे लाल कपड़ा या 20 मीटर से अधिक बिजली के तार या अधिक संख्या में जूते की मांग कर भी लिया तो हम कैसे उसे मना कर सकते हैं. उसके सामने हम पुलिस को भी इंफॉर्म नहीं कर सकते और न ही फ़ौरन पुलिस आ सकती है. ऐसे में हम क्या करें?’

वो आगे बताते हैं, ‘हमने फैसला किया है कि यहां के सारे दुकानदार जल्द ही इस मसले को लेकर एक मीटिंग करने वाले हैं, इसमें पुलिस अधिकारियों को भी बुलाएंगें.’

बताते चलें कि छत्तीसगढ़ का राज्य प्रशासन लगातार इस बात का दावा करता है कि वह आदिवासियों व गांवों में बसने वाले आम लोगों को मुख्य-धारा में लाना चाहता है. केन्द्र सरकार ने भी इस बात का ज़ोर-शोर से ऐलान कर रखा है. लेकिन बस्तर की ज़मीन पर क़दम रखते ही इन तमाम दावों की हक़ीक़त सामने आ जाती है.

स्टेट मशीनरी यहां नक्सलियों से लोहा लेने के नाम पर चुन-चुनकर यहां के जंगलों में रहने वाली आम आदिवासी जनता का शिकार कर रही है. यहां आतंक का पूरा साम्राज्य खड़ा कर दिया गया है. पुलिस को खुली छूट है कि वह जब जिसे चाहे नक्सली का मददगार बता गिरफ़्तार कर ज़िन्दगी तबाह कर सकती है. ऐसी तबाह हो चुकी जिंदगियां बस्तर की जंगलों और गांवों में हर तरफ़ दिखती हैं

अर्जुन की हत्या डेमोक्रेटिक प्रोसेस को हथियारबंद चेतावनी है .
हथियारों से हथियारों का मुकाबला ही उन्हें मुआफ़िक  बैठता है.
वे संविधान और जनतांत्रिक प्रतिरोध के खिलाफ है .
***
 पंद्रह अगस्त को बस्तर के एक गांव में बकरी चराते सत्रह साल के अर्जुन की हत्या सिर्फ फोर्स ने इसलिए  कर दी क्योंकि ठीक उसी दिन गोमपाड में संविधान और तिरंगा लेके डेमोक्रेटिक तरीके से शांतिपूर्ण तरीके से पूरे देश से आये शांतिकामी लोग अर्धसैनिक बलों की हत्यारी मुहिम के विरोध में राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहे थे.
बस्तर में  पिछले  कई महीनों से सरकार और फोर्स द्वारा की जा रही फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ धरना, प्रदर्शन ,सभाओं और रैली का दौर शुरू हुआ है ,जो विरोध के  जनतांत्रिक और अहिंसक तरीके को व्यक्त करता है.
 पिछले दो माह में उनमें से तीन घटना बहुत महत्वपूर्ण है .
1 . पुलिस की कार्यवाही के खिलाफ सर्व आदिवासी समाज ,सोनी सोरी और आदिवासी महासभा के आव्हान पर पूरा बस्तर संभाग स्वस्फूर्त बंद रहा ,व्यापारियों  सहित सभी वर्ग ने इसका समर्थन किया ,यह बंद इस मामले में एतिहासिक था कि जिला ब्लॉक से लेकर गांव कस्बे तक बंद रहे.
यह प्रतिरोध अभी तक का सबसे बडा  आंदोलन था।
इस बंद में मिले समथर्न ने सुरक्षा बलों और शासन की आंखें खोल दी.
2 .  विश्व आदिवासी दिवस नौ अगस्त को    महत्वपूर्ण प्रतिरोध हुये.
इस दिन पूरे संभाग में जिला ब्लॉक और तहसील स्तर पर बहुत बडी सभायें हुई ,एक एक सभा में पांच से आठ हज़ार तक आदिवासी एकत्रित हुये, अगर मोटा हिसाब लगाया जाये तो आदिवासी दिवस में चार से पांच लाख लोग इकठ्ठे हुये.
इन सभाओं में मूल विरोध था आदिवासियों के उपर हो रहे हिंसक हमले .
मेने खुद एसी करीब पांच सभायें देखी और उनके ताप को मेहसूस  भी किया.
यह सभायें भी फोर्स और सरकार को बैचेन करने वाली  थी.
3 , बस्तर में एक और बडी जनतान्त्रिक पहल होना बांकी थी.
पिछले माह सोनी सोरी ने लंबी पदयात्रा का एलान  कर दिया था और सामाजिक संगठनों छात्र नौजवानों को इस पदयात्रा में शामिल होने का आग्रह किया.
बस्तर संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले प्रदेश के 24  जनसंठन और भाजपा कांग्रेस विहीन राजनैतिक दल इस यात्रा में  शामिल हुये.
नौ अगस्त को दंतेवाड़ा में डा, अम्बेडकर की मूर्ति से प्रारंभ हुई यह पद यात्रा 180 किलोमीटर चल के पंन्द्रह अगस्त को गोमपाड पहुँच कर आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फैहराया.
हाथ में संविधान और कंधे पर तिरंगा लेके सोनी सोरी ओर कवासी हिडमें यात्रा का नेतृत्व कर रही थी.
यह यात्रा हर मामले में एतिहासिक सिद्ध हुई. इसमें पूरे देश से आये छात्र ,नौजवान  और सामाजिक संगठनों के अलावा  बडी संख्या में पत्रकार और राजनैतिक दल के लोग शामिल हुये.
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर और जीने खाने रहने लायक सुविधाओं से विहीन गाँव और रहवासी शायद पहली बार संविधान और तिरंगे से रूबरु हो रहे थे.
सरकार और फोर्स के पदयात्रियों के विरोध  में भारी प्रचार ओर रोडा अटकाने के बाबजूद  यात्रा सही और तय समय पर गोमपाड पहुची, वहाँ  हिरमें की कब्र पर पुष्प अर्पित किये और ध्वजारोहण के बाद तिरंगे को  गांव के लोगों को सोंप दिया.
बस्तर के पुलिस प्रमुख ने हर संभल पदयात्रा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया ,उनकी पूरी कोशिश रही कि इस यात्रा को  सिर्फ माओवादियों के खिलाफ खडा कर दिया जायें .उनके और पुलिस संरक्षित संगठन अग्नि  ने पहले विरोध फिर समर्थन और अंत मे हिसक हमले तक गये.
पदयात्रियों के संविधान ,तिरंगा , देशभक्ति  और ह्दय परिवर्तन को लेके  बार बार कमेंट किये गये और आखरी में सोनी पर हमला भी किया .
उनकी कोशिश थी कि यात्रा रास्ते में ही बंद कर दी जाये. उन्होंने पदयात्रा की सुरक्षा से पूरी तरह हाथ खींच लीये और कहा  भी कि इन्हें सुरक्षा देने की कोई जरूरत नहीं है ।
वाकई हमें पुलिस सुरक्षा की कतई जरूरत भी नहीं थी.
लेकिन सुरक्षा के नाम पर यात्रा को डराने की कोशिश अनवरत जारी रही. पूरी यात्रा  में पुलिस के कारिंदे लगातार आगे पीछे रहे जो पल पर की खबर अपने आकाओं को  भेज रहे थे.

खेर .....

इन तीनों घटनाओं ने सरकार को जनतांत्रिक तरीके अपनाने का नैतिक चैलेंज कर दिया था, इनका यही संदेश था कि सरकार और फोर्स संविधान के अनुसार काम करें, कानून का राज कायम हो .जिन सुविधाओं के यह लोग हकदार है वह इन्हें उपलब्ध कराई जायें हम ऐसा कुछ नहीं कह या मांग रहे थे जो कानून या संविधान के परे हों.

सभी आंदोलनों का यही  संदेश था कि आदिवासियों को भारत के अन्य नागरिक की तरह जीने और रहने दिया जाये ,प्राकृतिक संसाधनों की कारपोरेटिक लूट को बंद करें और माओवादियों के नाम पर हत्या ,लूट और बलात्कार बंद हों, जो जघन्य अपराध में लिप्त है उन्हें सजा मिले और बेगुनाह आदिवासी जो जेलो में पडे है उन्हें रिहा किया जायें.
यही सब ह़क हमें संविधान देता है इसीलिए हमारे हाथ में संविधान है ,हमारा आव्हान है कि सत्ता के मद में डूबे सियासतदां लोग एक बार कानून तो पढ ले़.

** बस यही  तो सरकार और पुलिसतंत्र नही चाहता.

कानून का पालन करोगे तो आपको कोर्ट को मानना पडेगा ,गेरकानूनी हत्यारी मुहिम और संस्थाओं को भंग करना होगा.
फर्जी रूप से मुठभेड़ के नामपर हत्यायें बंद करना होगी, बलात्कार ,महिलाओं का अपमान और गांव के गांव की लुटपाट ओर उजाडने की जिम्मेदारी तय करनी होगी , यह इन्हें मालूम है कि यदि ऐसा हुआ तो इनकी चूले़ हिल जायेगी.
कानून मानेंगे तो हजारों बेगुनाह आदिवासियों को जेल से रिहा करना होगा और अंधाधुंध गिरफ्तारी से तौबा करनी पडेगी.
जल जंगल जमीन लोहा पानी और दूसरे प्राकृतिक संसाधन की लूट के लिये कारपोरेट की गुलामी बंद करनी पडेगी, कारपोरेट के लठैत की भूमिका में सरकार और फोर्स ऐसा करेगी तो  फिर सैना की कोई जरूरत ही नहीं रहेगी.
सवाल सिर्फ बस्तर का ही नहीं ,सरगुजा ,रायगढ ,जांजगीर में आप और आपकी सैना यही कर रही है .

  ** इसीलिए अर्जुन की हत्या इनका जबाब है

बस्तर में लगातार अन्याय के विरोध में जनतांत्रिक विरोध की गुंजाइश खतम करने के लिये है  ही फोर्स और छत्तीसगढ़ सरकार ने ठीक पंन्द्रह अगस्त को ही एक एसे बच्चे की हत्या कर दी जो कोर्ट में नाबालिग सिद्ध होने और लगभग बेगुनाह पाये जाने  पर जमानत पर रिहा होने और हर पेशी पर नियमित उपस्थित होने वाले  अर्जुन की हत्या कर शांतिकामियों और  जनतान्त्रिक कानून में भरोसा रखने वालों को खुली चेतावनी है ,कि  बस्तर में ऐसे ही न्याय होगा ,.
सरकार यही चाहती है कि बस्तर में ऐसे ही फोज बनी रहे ,फौज के औचित्य के लिये शशस्त्र प्रतिरोध  बना रहना चाहिए ,फासिस्ट तरीका  भी यही है कि यदि आपके सामने दुशमन नही़ है तो दुश्मन इज़ाद करो ताकि लड़ाई चलती रहे और लूट कायम रहे.

हम हारेंगे नहीं ..

हम हारे नहीं है संवैधानिक तरीके से ही आताताइयों का मुकाबला करेंगे और आज कुछ हज़ार है कल लाख होंगे और फिर सब उठ खड़े होंगे ,निश्चित  ही तुम्हारा अंत होगा क्योंकि इतिहास ने भी हमारी जीत ओर तुम्हारी हार तय कर दी है .
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डा.लाखन सिंह