Monday, June 1, 2015

गौ-मांस भक्षण पर चर्चा के बहाने...


Sunday, 31 May 2015

गौ-मांस भक्षण पर चर्चा के बहाने...

गौ-मांस भक्षण पर चर्चा के बहाने..
[samjay parate]
रिजिजू के बयान के बाद भाजपा-संघ को सांप सूंघ गया है. न उगलते बन रहा है, न निगलते. यह अलग बात है कि रिजिजू ने यू-टर्न ले लिया है, लेकिन खान-पान पर बहस फिर तेज हो गई कि कुछ लोगों की आस्थाओं के आधार पर या नापसंदगी के आधार पर इसका निर्धारण कैसे किया जा सकता है?
भारत बहुलतावादी देश है. इसका अर्थ है कि न केवल संस्कृति के मामले में, बल्कि खान-पान के मामले में भी वह बहुलतावादी है. यह बहुलता केवल मांसाहारियों में ही नहीं, बल्कि शाकाहारियों में भी पाई जाती है. ऐसे बहुत से शाकाहारी पाए जायेंगे, जो प्याज, लहसून से भी परहेज करते हैं. कुछ लोग कटहल को भी छूना तक पसंद नहीं करते. तो क्या इससे उन्हें यह अधिकार मिल जाता है कि वे प्याज, लहसून, कटहल खाने वालों के खिलाफ जिहाद छेड़ दें? क्या सरकार को इस वर्ग की भावनाओं का सम्मान करते हुए इसके उगाने पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए--भले ही इसको उगाने वाले किसानों को आत्महत्या का रास्ता अपनाना पड़े?
यही हालत मांसाहारियों के मामले में मिल जाएगी. मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं, जो मुर्गा/मुर्गी और बकरा/बकरी या कछुआ या केंकड़ा नहीं खाते, क्योंकि उनका मानना है कि उनके वंश की उत्पत्ति इन्हीं जीवों से हुई है. ऐसे लोग भी मिल जायेंगे, जो बकरा या मुर्गा तो खाते हैं, लेकिन बकरी या मुर्गी नहीं खाते, क्योंकि वे मानते हैं कि प्रकृति का अस्तित्व मादा से ही है. तो क्या ऐसे लोगों की आस्थाओं के आधार पर कोई अभियान चलाया जा सकता है?
यही बात गाय के मामले में भी लागू होती है. संघी गिरोह इसे हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जुडी बात बताता है, जिसका सम्मान बाकी सभी धर्मों के लोगों को करना चाहिए. लेकिन सभी जानते हैं कि संघी गिरोह के लिए गाय सम्मान का नहीं, सांप्रदायिक उन्माद फैलाने का मामला है. कौन नहीं जानता कि हिन्दुओं में दलितों सहित कई ऐसे समुदाय हैं, जो गाय का मांस बड़े चाव से खाते है, क्योंकि उनके लिए सस्ते प्रोटीन का यही विकल्प है. आदिवासियों में भी गाय के मांस से परहेज नहीं है, जिसे संघी गिरोह जबरदस्ती हिन्दुओं में गिनता है. आदिवासियों को गाय देकर उनका आर्थिक सबलीकरण करने की भाजपाई रमन सरकार की कोशिश इसीलिए विफल हो गई थी कि कुछ तो भ्रष्टाचार के कारण स्वस्थ्य गाय उन्हें नहीं दी गई और बहुत बड़ा कारण यह कि गौ-मांस खाना उन्हें प्रिय है. सभी भाजपाईयों को चुनावों में उन्हें रिझाने के लिए गाय/बैल भेंट देना पड़ता है, हालांकि कोई खुले-आम इसे स्वीकारता नहीं है. यही हालत दूसरे धर्मों की है, जहां कुछ समुदाय गौ-भक्षक है, तो दूसरे इसे सख्त नापसंद करते हैं. गौ-मांस भक्षण के संदर्भ हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों में बिखरे पड़े है, जहां धार्मिक रिवाजों में गाय और घोड़ों की बलि दी जाती थी और ब्राह्मण भी इसे खाते थे. गायों की बलि देने का रिवाज हिन्दुओं में आज भी पाया जाता है. तो क्या हिन्दुओं का एक प्रभुत्वशाली तबका और उनकी प्रतिनिधि एक सवर्ण पार्टी तथा वर्णवादी हिन्दू समाज की स्थापना की कल्पना को लेकर चलने वाले एक संगठन के अभियान पर गौ-मांस भक्षण पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए? या इन संगठनों को इस देश की करोड़ों की आबादी के खान-पान का निर्धारण का अधिकार दिया जा सकता है?
जिन अल्पसंख्यकों और विशेषकर मुस्लिमों के खिलाफ संघी गिरोह अभियान चला रहा है, उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि बाबर से लेकर अकबर और तमाम मुस्लिम सम्राटों ने मुस्लिम समुदाय से स्वेच्छा से गौ-मांस भक्षण को छोड़ने की अपील की थी, ताकि हिन्दू उच्च वर्ण की भावनाएं आहत न हो. यही कारण है कि मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा भी आज गौ-मांस भक्षण से दूर रहता है.
आस्थाओं के सवाल पर ही. मुस्लिम सुअर नहीं खाते. क्या हिन्दुओं को सुअर खाना बंद कर देना चाहिए या उनकी आस्थाओं के आधार पर कोई अभियान चलाने की यह सरकार उन्हें इजाज़त देगी? इस देश के कुछ राज्यों में कुत्ते भी खाए जाते है, जबकि एक बड़े हिस्से में कुत्तों को मनुष्य समाज का रखवाला माना जाता है. तो क्या बहुसंख्य की ताकत के आधार पर श्वान-भक्षण पर प्रतिबन्ध लगाने की मुहिम चलाई जाएगी??
संघी गिरोह का दूसरा तर्क गाय की उपयोगिता के बारे में है. गाय की उपयोगिता हमारे जैसे कृषि प्रधान देश में सबसे ज्यादा है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. गाय का दूध और गोबर मनुष्य के लिए उपयोगी है, तो उसका चमड़ा और मांस भी कोई कम उपयोगी नहीं है. गाय के मांस का खाद्य के रूप में इस्तेमाल ही नहीं होता, बल्कि उसके चमड़े से बने जूते-चप्पल पहनकर संघी गिरोह के नेता कथित गौ-सेवा भी करते हैं. आज तक, और इसमें अटलबिहारी की गौ-प्रेमी सरकार भी शामिल है, गौ-मांस का निर्यात, गाय के चमड़े से बनी चीजें हमारे विदेशी मुद्रा भंडार का बहुत बड़ा स्रोत है. इसी मुद्रा भंडार में वृद्धि का मोदी सरकार आज बखान कर रही है, तो इसमें गौ-हत्या का भी बहुत बड़ा योगदान है. सभी जानते हैं कि बूचड़ खानों में गाय काटने वाले कसाई भले ही मुस्लिम हो, लेकिन कटी गाय को बेचकर उससे मोटी कमाई करने वाले और इस मोटी कमाई का एक हिस्सा और ज्यादा मुनाफे की आस में मोदी के चुनाव में लगाने वाले हिन्दू ही हैं. मोदी राज में यह धंधा काफी फला-फूला ही है.
तो मित्रो, किसी राज्य में भाजपा के सत्ता में आने से ही कोई राज्य हिन्दू राज्य नहीं ही जाता. उसी प्रकार मोदी के सत्ता में आने से ही यह देश हिन्दू राष्ट्र नहीं हो गया. यह देश संविधान पर टिका राज्य है, जिसकी बुनियाद बहुलतावाद और धर्म-निरपेक्षता है. यही बुनियाद इस देश को सब लोगों का देश बनाता है, चाहे उनका धर्म, भाषा, संस्कृति और खानपान ही भिन्न क्यों न हो. संघी मित्रों, इस पर हमला करोगे, धर्म-विद्वेष के आधार पर दूसरे धर्मों के लोगों की रोजी-रोटी छीनने की कोशिश करोगे, तो तुम्हारे प्रधान को चौकीदारी की यह जो नौकरी मिली है, वह भी सुरक्षित नहीं रहेगी. कुछ इतिहास से सबक लो, जो यही बताता है कि बड़े-बड़े तानाशाह आये, नफरत के आधार पर उन्होंने अपने साम्राज्य को अक्षुण्ण रखने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए. आज तो राजाओं का नहीं, बादशाहों का नहीं, लोकतंत्र का राज है. यहां तानाशाही और नफरत नहीं जीतती, जीतता है केवल प्यार, सहिष्णुता, सद्भाव.
इस देश की बहुलतावादी खानपान की संस्कृति जिन्दा रहेगी. माँसाहारी के साथ शाकाहारी लोग भी रहेंगे. गौ-भक्षकों के साथ बकरा, सुअर और मुर्गा भक्षक भी प्यार से ही रहेंगे. न नेपाल हिन्दू राष्ट्र रहा, न भारत बनेगा. इतिहास ने इस देश की नियति कर दी है कि सघी गिरोह के चंगुल में वह नहीं फंसेगा.

परमाणु बिजली परियोजना के खिलाफ चुटका में विरोध सभा

















जबलपुर (मध्य प्रदेश ) जून 1, 2015 । कल दिनांक 31 मई 2015 को परमाणु बिजली परियोजना के खिलाफ चुटका में हुई स्थानीय लोगों की विरोध सभा में शामिल होने के बाद वैज्ञानिक सौम्य दत्ता और परमाणु-विरोधी आन्दोलनों के राष्ट्रीय मंच सीएनडीपी से जुड़े शोधकर्ता कुमार सुन्दरम् ने जबलपुर में प्रेस वार्ता की और चुटका परियोजना के खतरों से आगाह किया।















डॉ सौम्य दत्ता ने कहा कि देश की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए परमाणु परियोजना की अपरिहार्यता का तर्क असल में एक मिथक है। बेहतर बिजली प्रबंधन, अक्षय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग और बिजली उपभोग के समुचित नियंत्रण से वर्तमान स्थिति में ही भारत में पर्याप्त बिजली बनाई जा सकती है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार सर्वाधिक बिजली की मांग के समय एक लाख छप्पन हज़ार मेगावाट की ज़रुरत पड़ती है जबकि इस समय भारत में दो लाख तिरसठ हज़ार मेगावाट क्षमता के विद्युत उत्पादन संयंत्र मौजूद है जिनका अस्सी प्रतिशत भी यदि ठीक से उपयोग हो तो देश में आवश्यकता से अधिक बिजली उत्पादन संभव है। इस परियोजना के लिए जिन आदिवासियों को विस्थापित किया जा रहा है, उनको इस व्यवस्था में बिजली नसीब नहीं होगी। पिछले पच्चीस सालों में बिजली उत्पादन की कुल क्षमता 63 हज़ार मेगावाट से बढ़ाकर दो लाख तिरसठ हज़ार हो गई है लेकिन बिजली-वंचित जनसंख्या में इस अनुपात में कमी नहीं आई है और आज भी 28 प्रतिशत लोग बिजली से वंचित है। इससे साफ़ होता है की उत्पादन बढ़ाने से गरीबों को बिजली मिल जाएगी यह सच नहीं है। चुटका में संघर्ष कर रहे लोग 80 के दशक में बरघी बाँध से विस्थापित हुए लोग हैं और उनको आज तक ना बिजली मिली, न समुचित मुआवजा और न ही नौकरी।
 परमाणु ऊर्जा के बेहतर, सस्ते, टिकाऊ और पर्यावरण-हितैषी विकल्प मौजूद हैं लेकिन बड़ी कंपनियों के हितों के लिए सरकार उन विकल्पों से आँख मूँद लेती है।


चुटका परमाणु संघर्ष समिति के जबलपुर स्थित समर्थन समूह द्वारा आयोजित इस प्रेस वार्ता में कुमार सुंदरम ने कहा कि चुटका के अलावा देश के अन्य कई हिस्सों - महाराष्ट्र के जैतापुर, तमिलनाडु के कूड़नकुलम, गुजरात के मीठी विर्दी, हरियाणा के गोरखपुर, आंध्र प्रदेश के कोव्वाडा, पश्चिम बंगाल के हरिपुर, राजस्थान के माही बांसवाड़ा इत्यादि स्थानों में साधारण किसान और मछुआरे परमाणु परियोजना के खतरों और इन प्रोजेक्टों से होने वाले विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं। दुनिया भर के देश जापान के फुकुशिमा में दुर्घटना के बाद अपने यहां परमाणु संयंत्र बंद कर रहे हैं जबकि विदेशी कंपनियों के फायदे के लिए भारत में इन संयंत्रों को लगाया जा रहा है। परमाणु तकनीक के दीर्घकालिक खतरे बहुत गंभीर हैं और ख़ास तौर पर भारत में परमाणु सुरक्षा नियमन करने की स्वतंत्र प्रणाली नहीं है। चुटका में परमाणु दुर्घटना की स्थिति में जबलपुर पर भी संकट आएगा।
निवेदक:
राजकुमार सिन्हा
चुटका परमाणु संघर्ष समिति, समर्थक समूह
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अच्छे' दिनों की शुरुआत, भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश के बाद ‘राजीव आवास योजना’ भी खटाई में



मुंबई | 1 जून 2015;  महाराष्ट्र में मुंबई के हजारों हज़ार गरीब परिवारों ने पिछले 10 सालो से चलाया घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन ने हर बार हर सरकार को याद दिलाया की मुंबई के करीब 60% लोग गरीब बस्तियों में रहते है | वह श्रमिक है, मुंबई बनाते, बसाने एवं साफ़ भी रखते है | उन्हें हर बुनियादी ज़रूरत के साथ-साथ आवास का भी अधिकार है | मुंबई की जो 9% केवल ज़मीन इन बस्तियों के नीचे है, उस ज़मीन पर ही उनका विकास और आवास होना चाहिए, ना ही पूंजीनिवेशकों के नाते बिल्डरों को उसी ज़मीन में हिस्सा, कमर्शियल टावर्स और मकान, दुकाने बनाने की मंज़ूरी देनी चाहिए | CAG ने मार्च 2011 के रिपोर्ट से साबित हुआ है कि ‘’झोपड़ पट्टी विकास योजना’’ संपन्न नहीं हुई और 40 लाख घरों के दावे के बावजूद केवल दो लाख घर आवंटित हुए लेकिन हर SRA परियोजना में बिल्डर/विकासक का फ़ायदा हुआ|

इस परियोजना में गरीब बस्तियों को केवल SRA का आमिष दिखाना, भ्रष्टाचार के रूप में उनकी ज़मीन हड़पने के लिए बिल्डरों ने झूठे कागज़ात, सूचियों, झूटी बैठकों के अवाल बनाना.....और अन्य बस्तियों पर शासन- प्रशासन ने पुलिस के बल पर बुलडोज़र चलाने, घरों को बनाते रहना मंज़ूर नहीं था | आंदोलन ने गोलीबार, कोलीवाडा, चंदिवली आदि उदाहरणों से भ्रष्टाचार सामने लाया, लेकिन सरकार ने उसकी जांच करवाने के बावजूद अंतिम निर्णय और गैर कानूनी कार्य के खिलाफ कार्यवाही नहीं की | ऐसी स्थिति में गरीबों के आवास की ऐसी योजना जिसमे मुफ्त घर नहीं दें लेकिन अपनी ही ज़मीन पर खुद के योगदान के साथ शासकीय सहभाग जोड़ कर घर बने...इसका आग्रह राज्य के साथ पिछली केंद्र सरकार के सामने देश भर के शहरी गरीब संगठनो को लेकर हमने रखा और ‘स्लम फ्री सिटी’- झोपड़पट्टी मुक्त शहर, गरीबी हटाओ के बदले ‘गरीब हटाओ’ की दिशा में नहीं हो सकता, यह चेतावनी दी | जन आन्दोलनो के बहुत से मुद्दे लेकर बनी ‘राजीव आवास योजना’ | पिछली UPA शासन के साथ संवाद बना रहा | कुमारी शेलाजा ने काफी सहयोग किया, जैसे हव्केर्स जोन बनने में, वैसे ही ‘राजीव आवास योजना’ में भी | लेकिन मुंबई में इसका अमल होने के लिए हमे संघर्ष ही करना पड़ा |


उपवास, धरना, 2013 तक का संघर्ष ‘राजीव आवास योजना’ को बोर्ड पर लाया.....मुंबई में केन्द्रीय मंत्री आकर, महापोर, आमदार, बिल्डर्स के साथ आंदोलन के प्रतिनिधि उम्र भाई, सोनू बहन, अनवरी , मेधा पाटकर आदि भी संमेलन में शामिल हुए | आखिर मुंबई सहित 25 महानगर पालिकाओं को प्रत्येक 1 करोड़ तक केंद्र से ‘राजीव आवास योजन’ के लिए आवंटित हुआ | फिर हुआ संघर्ष 10 दिन तक आज़ाद मैदान में जिसके बाद ही एम-वार्ड को चिन्हित करके, बस्ती-बस्ती का सर्वे शुरू हुआ मंडाला के बस्ती के 5 हज़ार घर तोड़े गए थे इसलिए उसे छोड़कर अन्य बस्तियों का सर्वे करीबन पूरा हुआ, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल की एक संस्था को टेंडरिंग द्वारा महानगर पालिका ने इसके लिए नियुक्त किया था | साठे नगर, मानखुर्द की जगह चुनी गयी जहाँ घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन के संघर्ष ने उजागर किया था की बॉम्बे सोप फैक्ट्री को 2016 तक लीज पर दी गयी ज़मीन खाली पड़ी है जो शासन ने अपने कब्ज़े में ले ली |


लेकिन आज जबकि मंडाला की बस्ती 2009 से प्रस्तुत किये अपने गृह निर्माण से विकास के प्रस्ताव पर शासन से आग्रह कर रही है, सत्याग्रह के द्वारा मानखुर्द की 55 एकड़ ज़मीन पर बैठकर, कुछ जगह और सामाजिक अवकाश की मांग करते, तब स्पष्ट हुआ है की महाराष्ट्र की नयी सरकार ने अब ‘राजीव गाँधी योजना’ की योजना पूर्णता बाजू में रख दी है और साठे नगर का DPR भी नहीं बनाने के आदेश हैं | खबर है की अब फिर से पीडीपी मॉडल ही आएगा जो बिल्डर्स के फायदे में और गरीबो के खिलाफ, करोड़ों का नफा और अमूल्य ज़मीन धनिको की और मोड़ लेगा |


देश भरके शेहरी गरीबों को, 2013 के भूमिअधिग्रहण कानून के तहत भी विस्थापन के साथ पुनर्वास का लाभ नहीं मिला है, न ही हीरानंदानी जैसे बिल्डर्स को 40 पैसे/ एकड़ से झूठे आधार पर गैरकानूनी रूप से, दी गयी वैसी ज़मीन लीज़ पर मिली | उनके कुछ पक्ष में आई ‘राजीव आवास योजना’ भी अब मोदी जी की सरकार रद्द करने चली...और अदानी जैसे का मुंबई के गृहनिर्माण प्रवेश भी ज़ाहिर हो चुका है|

इसका धिक्कार और विरोध करेगा ‘घर बनाओ घर बचाओ आन्दोलन’| हमारा ऐलान है की देश भर के शहरी गरीब और मुफ्त नहीं, सस्ते घरों की, गरीब और माध्यम वर्गीय का ही हक देने वाली योजना का आग्रह रखें |

‘राजीव आवास योजना’ रद्द करके, नई कोई भी योजना मोदी सरकार ने 1 साल में नहीं लायी है| बल्कि गरीबों की आवास योजना के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण का प्रावधान भी ‘अध्यादेश’ के द्वारा राष्ट्रीय भूमि-अधिग्रहण कानून में लाना, न केवल शहर के अन्दर की किन्तु ग्रामीण पड़ोस, गरीब पारंपरिक समाजों की (जैसे, मुंबई के कोलिवाड़े) ज़मीन हड़प कर बिल्डरों के खाते में डालने की साजिश है | देश भर के संवेदनशील लोग, जन संगठनों को, राजनितिक दलों को इस पर तत्काल भूमिका लेना ज़रूरी है |


आज आवास हक सत्याग्रह का सातवां  दिन है और शासन प्रशासन की ओर से कोई सुनवाई नहीं हुई बल्कि पुलिस की तरफ से डराना धमकाना जारी रहा | सत्याग्रहियों का आज एक दल पानी की सुचारू रूप से सत्याग्रह स्थल पर सप्लाई हो व शौच गाड़ी का प्रबंध हो का आवेदन एम वार्ड ऑफिसर को देकर आया जिसमे पानी की मांग मंज़ूर कर ली गयी व शौच की सुविधा के लिए दुसरे विभाग से पूछकर बताने को कहा है तब तक सत्याग्रही महिलाओं को दिक्कत उठाते रहना पड़ेगा |



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शिक्षा में धंधेबाजी -रोमिला थापर

शिक्षा में धंधेबाजी -रोमिला थापर

Sunday, May 31, 2015
[सीजी खबर ]
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एचआरडी यूजीसी
रोमिला थापर
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कुछ दिन पहले घोषणा की कि वह केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की संरचना और तौर-तरीकों में बदलाव लाने जा रहा है.देश में फिलवक्त 40 के करीब केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं. प्रस्तावित यूनिवर्सिटी एक्ट के जरिए इन बदलावों को सार्वजानिक किया गया. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न कालेजों और विश्वविद्यालयों के अकादमिकों ने बड़ी तादाद में सुझावों की जांच-पड़ताल की.
उन्होंने प्रस्तावित बदलावों का गहराई से अध्ययन किया, क्योंकि प्रस्तावित बदलाव अगर लागू हुए तो ये कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर की उच्च शिक्षा को व्यापक रूप से प्रभावित करेंगे. छः महीने के गहन विचार-मंथन के बाद उन्होंने संयुक्त रूप से एक दस्तावेज जारी किया- ‘भारतीय विश्वविद्यालयों का क्या करें? चिंतित शिक्षकों के विचार.’
दस्तावेज बताता है कि क्यों उन्होंने अकादमिक वजहों से ज्यादातर प्रस्तावित सुझावों को स्वीकार किए जाने योग्य नहीं पाया. यह दस्तावेज फेसबुक पर उपलब्ध है और कई उपयोगी पोस्टों में प्रकाशित हो चुका है. बड़ी संख्या में शिक्षकों की ओर से जारी किया गया यह महत्वपूर्ण वक्तव्य है, जिसमें प्रस्तावों पर मांगी गईं उनकी प्रतिक्रियाएं शामिल हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि इन प्रतिक्रियाओं पर मानव संसाधन मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और स्नातक व स्नातकोत्तर शिक्षा से जुड़े अन्य तमाम संगठन व्यापक रूप से विचार करेंगे.
इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मौजूदा या पिछली सरकारों ने शिक्षा को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया. पहले ही शर्मनाक ढंग से कम शिक्षा-बजट को अब 3 फ़ीसदी की अतिसूक्ष्म मात्रा तक घटा दिया गया है.
इसके बावजूद एक धुंधली सी उम्मीद बंधी हुई है कि विकास की सीढ़ियां चढ़ी जा सकती हैं. विकास के लिए ठीक से पढ़े-लिखे लोग चाहिए अन्यथा यह कहीं नहीं ले जाता. क्या राजनेताओं को शिक्षित नागरिकों से डर लगता है?
शिक्षा को सुधारने के लिए सरकार गलत सिरे से शुरुआत करती दिखाई पड़ती है. केन्द्रीय विश्वविद्यालयों औरआईआईटी, आईआईएम जैसी संस्थाओं की ज्यादा संख्या की वकालत करते हुए वह इस तरह उच्च स्तर पर नाटकीय परिवर्तन लाने की योजना बना रही है.
जैसा कि अकसर कहा जाता है कि मौजूदा संस्थाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए. तथापि शिक्षा का दारोमदार स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में निहित है. यूपीए-2 सरकार की ओर से पेश किया गया विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव मौजूदा सरकार को भी जंच गया लगता है.
मगर भारत में शिक्षा व्यवस्था में गंभीर सुधार के लिए प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बुनियाद को मजबूत करने की ज़रूरत है. ऐसा इनकी गुणवत्ता को व्यवस्थित और तार्किक ढंग से सुधारकर ही संभव है.
यह बात पाठ्यक्रम पर भी उतनी ही गहराई से लागू होती है जितनी कि सुविधाओं पर.
बड़े बजट से स्कूलों की संख्या बढ़ा पाना संभव है और बेशक इनकी बेहद ज़रूरत भी है. लेकिन संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होता. स्कूल की स्थापना ऐसी जगह होनी चाहिए कि इस पर ऊंची जातियों और पैसे वालों का दबदबा कायम न हो. नहीं तो सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर लोग शिक्षा से वंचित रह जायेंगे.
स्कूल पर्याप्त रूप से साधनसंपन्न भी होने चाहिए. शिक्षक ठीक से प्रशिक्षित हों और शिक्षा के लाभ स्पष्ट दिखाई पड़ने चाहिए.
इस काम को उच्च शिक्षा की तरह बेहद संजीदगी से किए जाने की ज़रूरत है. स्कूली शिक्षा अच्छी न हो तो उच्च शिक्षा संस्थान विकलांग हो जाते हैं. घटिया स्कूली शिक्षा प्राप्त छात्र उच्च शिक्षा हासिल करने में लड़खड़ाते हैं और इसके लिए खर्च की गयी भारी-भरकम राशि बेकार चली जाती है.
शिक्षा के कई लक्ष्य हैं. इन्टरनेट की तरह यह सूचनाएं मुहैया कराती है. लेकिन फर्क यह है कि शिक्षा से विश्वसनीय सूचनाएं मिलती हैं. साथ ही यह तार्किक और विश्लेषणात्मक ढंग से विचार करना सिखाती है. अगर ज्ञान को आगे बढ़ाना है तो मौजूदा ज्ञान पर सवाल खड़े होने चाहिए. चाहे वह विज्ञान हो या फिर समाज विज्ञान या मानविकी, ऐसा आलोचनात्मक निरीक्षण शिक्षा के किसी भी क्षेत्र का महत्वपूर्ण बिंदु है. संयोगवश एक छात्र को नौकरी के लिए सबसे अच्छा प्रशिक्षण भी शिक्षा ही देती है. बच्चे की कल्पनाशक्ति के विकास के लिए मिथकों को गढ़ना ज़रूरी है किन्तु शिक्षा और विद्वता के साथ इसका घालमेल ठीक नहीं.
स्कूली शिक्षा को उच्च शिक्षा के साथ जोड़ने का संबंध प्रस्तावित यूनिवर्सिटी एक्ट के कुछ सुझावों पर दी गई प्रतिक्रियाओं से भी है. सुझावों में सिलेबस के मानकीकरण और केंद्रीकरण को शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने का एक जरिया बताया गया है.
यह भी कहा गया है कि शिक्षकों और छात्रों की केंद्रीकृत भर्ती से उन्हें गतिशील बनाया जा सकेगा. क्या सभी 40 विश्वविद्यालयों के सभी विषयों के लिए समूचे सिलेबस का केंद्रीकरण और मानकीकरण संभव है? यह एक भीमकाय और गैर-ज़रूरी कवायद और हो सकता है कहीं विपदा ही साबित न हो जाय.
इसके बाद पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं के लिए लगभग दोगुने बजट की ज़रूरत पड़ेगी. अन्यथा शिक्षा कुछ वक्तव्यों को रटने तक सीमित नहीं रह जाएगी? सिलेबस के मानकीकरण के सिलसिले में कमतर संस्थाओं को ऊपर उठाने की खातिर अच्छी संस्थाओं को अपना स्तर गिराना पड़ेगा. शिक्षा की गुणवत्ता का मानक न्यूनतम समापवर्तक हो जाएगा.
ऊंचा स्तर विविधता और ज्ञान के सतत व विश्वसनीय उन्नयन की मांग करता है. बौद्धिक जिज्ञासा के विकास के लिए यह ज़रूरी है. मानकीकरण और केंद्रीकरण के बाद विश्वविद्यालय शिक्षा की दुकानों और कोचिंग स्कूलों में बदल जाएंगे. संयुक्त प्रवेश परीक्षा के परिणामस्वरूप महानगर के विश्वविद्यालयों की ओर भीड़ बढ़ने लगेगी, क्योंकि अच्छी नौकरियों के लिए ये बेहतर प्रवेश द्वार हैं. ऐसे में आरक्षण की व्यवस्था और कोटे को कैसे लागू किया जाएगा? क्या संख्याओं को लगातार बदलते रहना होगा?
दूसरे बड़ी समस्या भाषा की होगी. आज, ज्यादातर विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय भाषाएं शिक्षा का प्रभावी माध्यम हैं, खास तौर पर स्नातक स्तर पर. तो क्या शिक्षकों व छात्रों को एक जगह (जैसे पंजाब) से दूसरी जगह (जैसे केरल) यह मांग करते हुए भेजा जाएगा कि उन्हें नई जगह में जो भी भाषा चलाई जा रही हो उसका इस्तेमाल करना ही होगा?
या विरोध को दबाने के हथियार के तौर पर शिक्षकों व छात्रों को दंडस्वरूप स्थानांतरित किया जाएगा? द्विभाषा- एक क्षेत्रीय और एक सार्विक भाषा- एक हल हो सकता है, बशर्ते सर्विक भाषा पर सबकी सहमति हो.
गरीबों और अमीरों के लिए स्कूल अगर प्रस्तावित बदलाव लागू हुए तो किस किस्म की समस्याएं खड़ी होंगी उनकी यह बानगी भर है. इस भविष्यवाणी के लिए ज्यादा दूरदृष्टि की ज़रूरत नहीं कि बदलावों की गाज हमारी विश्वविद्यालयी व्यवस्था में किस-किस पर गिरेगी.
घटिया शिक्षा पाए और नौकरी के इच्छुक मगर अयोग्य ठहराए गए नौजवानों की बड़ी तादाद एक स्वस्थ समाज की तस्वीर नहीं पेश करती. न विज्ञान और न ही समाज विज्ञान 40 विश्वविद्यालयों में महज एक जैसी सूचना के बतौर नहीं पढ़ाए जा सकते. हर विषय के लिए सोच-विचार, सवाल और बहस-मुबाहिसे की दरकार होती है, क्योंकि प्रत्येक विषय की अपनी बौद्धिक विषयवस्तु होती है, जो उसकी समझ के निर्माण के लिए आवश्यक है. इस बहस को ऊपर से निर्धारित नहीं किया जा सकता. एक सिलेबस जिसे ‘ऊपर से’ थोपा गया हो और जिस पर शिक्षकों ने विचार न किया हो, रटंत सूचना बनकर रह जाता है.
अगर सरकारी विश्विद्यालय घटिया शिक्षा देंगे तो अच्छी शिक्षा के लिए लोग प्राइवेट विश्वविद्यालयों की ओर जाएंगे, क्योंकि ये इस तरह के प्रतिबन्ध नहीं लगाते. लेकिन प्राइवेट विश्वविद्यालय अमूमन ज्यादातर छात्रों की हैसियत से बाहर हैं. नतीजतन सरकारी विश्वविद्यालय गरीबों के शिक्षा संस्थान बनकर रह जाएंगे, जैसा कि सरकारी स्कूलों में दिखाई देता है.
एक बड़ी समस्या विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के खत्म हो जाने की होगी, जैसा कि दिल्ली के अकादमिकों ने अपने प्रत्युत्तर में इंगित किया है. किसी विश्वविद्यालय की संभावनाएं एक ऐसी स्वायत्त संस्था के रूप में बने रहने में निहित है जो उच्च स्तर को बनाए रखने व नई से नई पहल की जिम्मेदारी ले.
सार्वजानिक विश्वविद्यालय व्यवस्था की गुणवत्ता और इसकी निरंतरता किसी भी आधुनिक समाज के लिए निर्णायक होती है. प्राइवेट विश्वविद्यालय, चाहे कितने भी अच्छे क्यों न हों, हर किसी को उच्च शिक्षा उपलब्ध नहीं करा सकते. प्रस्तावित बदलाव शैक्षिक संस्था के रूप में विश्वविद्यालय के कार्यभार और भूमिका के कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण पहलू को नष्ट कर डालेंगे.
अंग्रेजी से अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय | patrakar praxis

'शिक्षा नीति पर स्मृति ईरानी के दावे गलत' कहते हैं अनिल सद्गोपाल

'शिक्षा नीति पर स्मृति ईरानी के दावे गलत'

कहते हैं अनिल सद्गोपाल

  • 1 जून 2015
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स्मृति ईरानी, मानव संसाधन मंत्री, भारत
शिक्षा नीति को लेकर मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के दावों को लेकर शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने गंभीर सवाल उठाए हैं.
उन्होंने मोदी सरकार द्वारा शिक्षा बजट में हज़ारों करोड़ रुपए की कटौती को शिक्षा का बाज़ारीकरण बताया है.
अनिल सद्गोपाल ने शिक्षा के निजीकरण और बाज़ारीकरण में राज्य की भाजपा सरकारों के योगदान पर भी सवाल करते हुए कहा कि मोदी सरकार वो करने जा रही है जो पिछले साठ सालों में किसी सरकार ने नहीं किया.

पढ़ें, क्या कहते हैं अनिल सद्गोपाल

नरेंद्र मोदी
मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने शुक्रवार को अपनी बातचीत में दो बातें कहीं जो सही नहीं थीं.
पहला ये कि मौजूदा शिक्षा नीति दिल्ली में बैठे चंद एक लोग बनाते हैं और पूरे देश के ऊपर थोप देते हैं. यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है.
1986 में शिक्षा नीति संसद में पारित हुई. इससे एक साल पहले 1985 में केंद्र सरकार ने ‘शिक्षा की चुनौती’ नाम से एक दस्तावेज़ तैयार कर पूरे देश के हायर सेकेण्डरी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को भेजा. इसमें बड़े पैमाने पर गांवों और कस्बों तक के लोगों ने हिस्सा लिया. तब जाकर इसके आधार पर एक नई शिक्षा नीति बनी.
दूसरा ये कि पिछले 20-22 सालों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इससे बड़ी कोई भ्रामक बात नहीं हो सकती है.
पिछले 20-22 सालों में भारत की शिक्षा नीति वर्ल्ड बैंक, विश्व व्यापार संगठन और तमाम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों के पास गिरवी रख दी गई और देश के संविधान से भटक गई.
इस सारी प्रक्रिया में अकेले कांग्रेस ही शामिल नहीं है, संसद में शामिल सभी पार्टियां इसमें हिस्सेदार रहीं. भाजपा ख़ुद इसमें हिस्सेदार रही.

शिक्षा बजट में कटौती

बजट
और भाजपा की जिन राज्यों में सरकारें थीं, उनमें उन्होंने शिक्षा के निजीकरण, बाजारीकरण करवाने और उसे बिकाऊ माल के रूप में मुनाफ़ाखोरी का धंधा बना देने में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया. सब इसमें शामिल हुए.
पिछले एक साल में मोदी सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कोई अहम क़दम तो उठाया नहीं.
पिछली सरकारों ने शिक्षा के लिए जो निजीकरण का एजेंडा बनाया था उसे इस सरकार ने और तेज करने का काम किया है.
इसका सबसे बड़ा सबूत ये कि इस साल (2014-2015) जो बजट पेश किया गया था उसमें शिक्षा के बजट को 83 हज़ार करोड़ रुपये से घटाकर उसे 69 हज़ार करोड़ रुपए कर दिया गया, यानी 13,700 हज़ार करोड़ रुपए की कमी कर दी गई. कुल मिलाकर 16.5 प्रतिशत की कटौती.
हम पिछले सरकारों को इसलिए कोसते थे कि जितना बजट बढ़ाना चाहिए उतना वो बढ़ाते नहीं थे.
साठ साल के इतिहास में पहली बार ये हुआ है कि किसी सरकार ने शिक्षा का बजट बढ़ाने की बजाए घटा दिया.

एजेंडा निजीकरण

शिक्षा
कुल मिलाकर इस समय एजेंडा निजीकरण और बाज़ारीकरण का है और शिक्षा को मुनाफ़ाखोरी का धंधा बना देने का है.
और इस मामले में मोदी सरकार पिछली सरकारों को मात करने वाली है.
अभी मानव संसाधन मंत्री कहती हैं कि हम शिक्षा नीति पर लोगों से बात करेंगे लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों का एक एक्ट लगभग तैयार है और इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं है.
पिछले साल बिना किसी से पूछे यूजीसी ने नौकरशाहों का तैयार किया हुआ नवीन पाठ्यक्रम सारे केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर थोप दिया. उनको आदेश दे दिया गया कि इसका पालन करो.
जो साठ सालों के इतिहास में नहीं हुआ, मोदी जी वो करवाने जा रहे हैं.
(शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल के साथ बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी की बातचीत के आधार पर)

कोल डस्ट से जीना मुहाल प्रबंधन नहीं ले रही सुध लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर

कोल डस्ट से जीना मुहाल प्रबंधन नहीं ले रही सुध

लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर







पाण्डवपारा/कटकोना [नईदुनिया ]
कोयलांचल क्षेत्र पाण्डवपारा में रहने वाले लोग कोल डस्ट की समस्यां से परेशान हो रहे हैं वर्तमान समय में सड़कों पर जिस तरह कोल डस्ट उड़ रहा है उस वजह से न सिर्फ लोगों की दिक्कतें बढ़ गई है बल्कि इस डस्ट से कई बीमारियां भी लोंगो को हो रही हैं कोयलांचल के पाण्डवपारा खदान से लेकर पटना साइडिंग तक कोल डस्ट का गुबार है यहां पर पूरे दिन सड़कों से कोयले का डस्ट उड़ता रहता है और शाम को तो इस डस्ट की वजह से नजारा ऐसा हो जाता है ठीक से सड़क भी नजर नहीं आतीि।
यहां सड़क के किनारे व्यापारी वर्ग व ग्रामीणों के आवास में आये दिन कोल डस्ट जमी रहती है जिस वजह से इन व्यापारियों के कारोबार पर भी असर पड़ता है ठंड व गर्मी में यह समस्या और बढ़ जाती है कोल डस्ट की समस्या से लोगों को निदान नहीं मिल पा रहा है कालरी प्रबंधन भी इन समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही ।
२४ घंटे वाहनों का आवागमनि
सहक्षेत्र पाण्डवपारा में खदान होने के कारण यहां कोयले से लदी डम्फर व हाईवा २४ घंटे चलते हैं इन वाहनों से कोयले के छोटे-छोटे टूकड़े सड़को पर गिरते रहते हैं जो वाहनों के पहिए में दबकर डस्ट बन जाती है और वाहनों के आवागमन के दौरान उड़कर लोगों के चेहरे, कपड़े व आंखों में घूसते हैं जो बीमारी को आमंत्रण देने जैसा है वहीं लोगों की माने तो उनके घर, दुकान के अन्दर डस्ट घूस जाता है जिसे रोजाना साफ करना लोगों के लिए अतिरिक्त कार्य बन गया है प्रतिदिन साफ कपड़े सुबह से शाम तक गंदे हो जाते हैं जिससे लोगों में काफी आक्रोश है व कालरी प्रबंधन से इस समस्या से निजात दिलाने की मांग कर रहे हैं लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है
वाहनों का ओवर लोड डस्ट का मुख्य कारण
प्रतिदिन २४ घंटे इन सड़कों पर डम्पर व टे्रलर क्षमता से अधिक कोयला लेकर बिना तिरपाल के दौड़ते हैं जिस वजह से इन ओव्हरलोड वाहनों से कोयले गिरकर सड़कों पर आता है और उन्हीं ट्रकों के पहियों से पीसकर डस्ट बन लोगों के चेहरे, कपड़े, आंखों व घर, दूकानों में पड़ता है जो डस्ट का मुख्य कारण व लोगों की परेशानी बना हुआ है

दो साल से ओपन कास्ट में लगी है आग अफवाहों की वजह से ग्रामीणों में भय का माहौल

दो साल से ओपन कास्ट में लगी है आग

अफवाहों की वजह से ग्रामीणों में भय का माहौल[ रायगढ़ ]



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[विनय पाण्डेय रायगढ़ ]





गारे पेलमा ४/१ कोल ब्लॉक अंतर्गत नागरामुड़ा गांव से २ किमी दूर खुली कोयला खदान में आग लगने के बाद उठी अफवाहों से ग्रामीण परेशान हैं गांव वालों को सही तथ्य बताने की फुर्सत न तो प्रशासन के पास है और न ही कंपनी के पास आग नागरामुड़ा गांव से दो किमी दूर खुली कोयला खदान के कुछ कोयले के ढेर में लगी है ।
इस खदान के एक तरफ जंगल और दूसरी ओर ५०० मीटर बाद दूसरी खदान है चर्चा के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि खदान में यह आग पिछले २ सालों से लगी है लेकिन पिछले कुछ दिनों से गांव की तरफ आग आ रही है कि अफवाह फैलने से लोगों में डर समा गया है,यह पूछने पर कि दो साल से लगी यह आग कितनी आगे खिसकी है, उनका जबाव था, यह जहां पर थी वहीं हैं यह आगे नहीं खिसक रही है लेकिन ग्रामीणों को सही तथ्यों से प्रशासन परिचित नहीं करा पा रहा है, जिससे ग्रामीणों में भय का माहौल है खुली खदान के करीब २०० मीटर क्षेत्र में ४ जगह आग लगी है और आग सिर्फ वहीं लगी है, जहां कोयला खुले में पड़ा है ।
अब तक कोई नुकसान नहीं
ग्रामीण बुधराम डनसेना ने बताया कि दो जगहों पर आग ६ माह पहले लगी थी, बाकी में पहले से आग लगी हैं उन्होंने बताया कि आग से न तो पेड़ों को कुछ नुकसान पहुंचा है और न ही गांव को लेकिन कुछ लोगों ने जब यह बताया कि यह आग गांव की तरफ आ रही है, तब हमें चिंता हुई यह पूछने पर कि क्या इस आग की तपन गांव तक महसूस होती है ? उनका कहना था की यह राजनैतिक  प्रतिक्रिया है। 
कोयले में और पृथ्वी के भीतर कई तरह की गैस होती है इनमें से कुछ गैस ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर जल उठती है यही कारण है कि कोयले को खुला में नहीं छोड़ा जाता यह एक प्राकृतिक घटना है जानकारों के मुताबिक इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है।
वन विभाग ने किया मुआयना 
वन विभाग की टीम गांव के आसपास के जंगलों में जाती रहती है हालांकि उन्होंने गांव वालों को बताया कि यह आग आगे नहीं बढ़ेगी और इससे जंगल को न तो कोई नुकसान है और न ही खतरा लेकिन बाकी के प्रशासनिक विभाग की टीम आजतक नहीं पहुंची है ।
नहीं पहुंचा प्रशासन
 ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय प्रशासन से लेकर कलेक्टर तक को यहां लगी आग की शिकायत की है, लेकिन आग की स्थिति को देखने प्रशासन का कोई दल नहीं पहुंचा हालांकि यह कहा जा रहा है कि आग बुझाने फायर टेंडर मंगाया जा रहा है लेकिन एसईसीएल अधिकारियों से बातचीत करने पर यह महसूस नहीं होता कि उन्हें इसकी चिंता है कि वहां आग लगने से कुछ नुकसान हो रहा है