Saturday, January 3, 2015

Govt. targets climate groups

Govt. targets climate groups

 
SUHASINI HAIDAR- MEENA MENON

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politics

national politics

MHA says it will not compromise on national interest

After taking action against the international environment group Greenpeace, the government has clamped down on four American NGOs working in the same field — Avaaz, Bank Information Centre (BIC), Sierra Club and 350.org.
Over the past month, the Ministry of Home Affairs (MHA) has directed the Reserve Bank of India (RBI) to stop all foreign funding into the accounts of these NGOs or their representatives without MHA clearance. A letter issued by the Director of the Monitoring unit for NGOs said it had been decided “to keep a watch on all the activities funded by U.S.-based donor agencies” and lists the four groups.
The order could create a controversy ahead of U.S. President Barack Obama’s visit to India this month, given that the U.S. has in the past issued statements regarding India’s restrictions on international NGOs.
In 2013, after India took similar action against anti-nuclear groups in Kudankulam, the U.S. State Department had denied it was linked to the NGOs, but said such groups “are among the essential building blocks of any healthy democracy.” Later, the funding for Greenpeace was also frozen.
As a result of the latest MHA order, every fund transfer from abroad for their activists in India will be held back pending clearance.
According to RBI records, the international NGOs were not registered with the government. Neither had their employees in India applied for FCRA clearance. The MHA is also going to inquire into all remittances into India from these groups since January 2013.
Last year also saw the leak of an IB report titled “Concerted efforts by select foreign-funded NGOs to take down Indian development projects.” It contended that several foreign-funded environmental NGOs were targeting development projects across the country. Apart from Greenpeace, Sierra Club and 350.org were mentioned in Annexure B of the IB report in a graph.
Home Ministry and Foreign Ministry officials did not comment on the order and declined to speak about why U.S.-based NGOs had been singled out for scrutiny.
Reason to worry, says NGO representative
A representative of an American green NGO, one of four whose foreign funding will be stopped unless they are cleared by the Ministry of Home Affairs (MHA), told TheHindu that the move appeared to question democratic effort that individuals and organisations could exercise in the country. “False allegations against activists of political subversion are becoming commonplace and that is enough reason to worry,” he said.
A letter the representative received dated December 10 said the MHA Foreigners Division (FCRA wing) regulates receipt of foreign contribution by NGOs to ensure that it is utilised for bonafide welfare activities, without compromising on concerns about national interest and security.
The government has clamped down on four American NGOs — Avaaz, Bank Information Centre (BIC), Sierra Club and 350.org. Earlier it had acted against Greenpeace.
With a claimed membership of about 40 million worldwide, New York-based Avaaz works on several public issues and in September 2014, it had organised a ‘People’s climate march’ in Delhi.
The Bank Information Centre (BIC) is an NGO-based in Washington that tracks World Bank and Asian Development Bank (ADB) funded projects worldwide, but has a special focus on India. According to a description on its website, its work involves public debate on coal and energy projects in India, as “there is a complete lack of transparency and the agencies who receive these borrowings are not accountable to the people.”
BIC was particularly critical of the Tata Mundhra 4,000 MW Ultra Mega Power Project in Gujarat, a key project for the Gujarat government.
New York-based NGO 350.org which works on climate-change and the California-based Sierra Club have been opposing coal imports from Australia for Indian thermal plants, including deals that were finalised during Prime Minister Narendra Modi’s visit to Australia in November 2014.
 
V.B.Chandrasekaran, Chatti Mahatma Gandhi Aashramam,
Chatti Post, Chinthur Mandal, East Godavari District,
Andhra Pradesh, Pin Code: 507129.
Email: verivaan2049@yahoo.com antarbharatid2010@gmail.com;
Mobile: +919490109358 +918297977970

ईसाइयो पे मोदी सरकार बनने के बाद बढ़ गए हमले' शुरैह नियाज़ी

ईसाइयो पे मोदी सरकार बनने के बाद बढ़ गए हमले'

  • 5 घंटे पहले
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भारत अफ़गान ईसाई
फ़ाइल फ़ोटो
धर्मांतरण पर बीबीसी की ख़ास सीरीज़ में बात मध्य प्रदेश की, जहां ईसाई समुदाय काफ़ी डरा हुआ है.
ईसाई धर्म नेताओं का कहना है कि पिछले कुछ वक़्त में यहां समुदाय पर हमलों की संख्या बढ़ गई है.
क्रिसमस के दौरान भी ईसाई हिंदू संगठनों के हमलों के शिकार हुए हैं.
किरन भदोले को सन् 2007 का वह दिन याद है जब वह अपने दो साथियों के साथ खरगोन ज़िले के गांव डोगल चीचली में एक घर में प्रार्थना करवाने गए थे.

पुलिसिया हथियार

खाना खाने के बाद वे लोग प्रार्थना के लिए तैयार हो ही रहे थे कि हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों ने घर पर हमला बोला.
पुलिस ने भदोले को धर्मांतरण कराने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया.
मंडला चर्च हमला
फ़ाइल फ़ोटो, मंडला चर्च हमला
हिंदू संगठनों का आरोप था कि वे लोग इस तरह की प्रार्थना सभा आयोजित कर लोगों को पैसे देकर ईसाई बना रहे हैं.
किरण भदोले ने बीबीसी को बताया, "धर्मांतरण के मामले में यदि केस दर्ज हो जाए तो व्यक्ति अपने ख़ुद के धर्म का भी पालन करने से डरता है. कब वह प्रार्थना कर रहा हो और पुलिस हिंदू संगठनों के साथ आकर गिरफ़्तार कर ले."

आरोप

लगातार कोर्ट के चक्कर लगाने के बाद 2013 में भदोले इन आरोपों से बरी हो पाए.
वह कहते हैं, "हम लोग हमेशा निशाने पर रहते हैं. कभी भी हम पर हमला बोला जा सकता है. आरोप यही होता है कि हमने पैसा देकर लोगों को ईसाई बनाया है. हमें परेशान करने का यह सबसे आसान हथियार है."
इस साल क्रिसमस सप्ताह के दौरान खरगोन, खंडवा और बुरहानपुर ज़िलों में धर्मांतरण का आरोप लगाकर ईसाई समुदाय पर हमला किया गया.
खंडवा ज़िले में 16 लोगों को धर्मांतरण के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. उनमें महिला-पुरुषों के साथ उनके छोटे बच्चे भी हैं.

बहुत बुरा वक़्त

ईसाई क्रॉस और हिंदू त्रिशूल
भदोले के मुताबिक़ पुलिस आमतौर पर हिंदू संगठनों के साथ खड़ी नज़र आती है.
लेकिन मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक सुरेन्द्र सिंह ऐसा नहीं मानते. वह कहते हैं, "अगर मेरे पास कोई शिकायत आएगी तो मैं उसकी जांच ज़रूर करवाऊंगा. पुलिस आख़िर किसी एक के पक्ष में क्यों खड़ी होगी."
मिनिस्टर ऑफ़ जीजस क्राइस्ट संगठन के शिबू थॉमस आरोप लगाते हैं कि मध्य प्रदेश में ईसाई समुदाय पर हमले राज्य में भाजपा सरकार के बनने के साथ ही तेज़ हो गए थे लेकिन केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद ये बढ़ गए हैं.
मध्य प्रदेश क्रिश्चियन एसोसिएशन की अध्यक्ष इंदिरा आयंगर कहती हैं कि यह वक़्त ईसाइयों के लिए बहुत खराब है.

धर्मांतरण

वह कहती हैं, "हम अपने आप को एकदम अकेले पा रहे हैं. हालात यह है कि धर्मगुरुओं को लगने लगा है कि उनके साथ कभी भी कुछ भी किया जा सकता है. किसी भी प्रार्थना सभा में हमला हो सकता है. कुछ स्थानों पर चर्च को भी बंद किया गया है.
उन्होंने कहा, "हमले तो पहले से ही हो रहे थे लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद ये हमले बहुत ज़्यादा बढ़ गए हैं."
बजरंग दल
लेकिन बजरंग दल के प्रदेश सह-संयोजक कमलेश ठाकुर आरोप लगाते हैं कि ईसाई समुदाय सेवा के नाम पर लोगों का धर्मांतरण कराने के काम में लगा हुआ है.
उन्होंने कहा, "ये लोग प्रलोभन देकर ग़रीब लोगों को ईसाई बनाने के काम में लगे हुए हैं. आख़िर इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है."

शिकायत

वह कहते हैं, "जब-जब युद्ध हुआ है धर्म के लिए ही हुआ है. धर्मांतरण को लेकर भी युद्ध हो सकता है. इसीलिए हम चाहते है कि धर्मांतरण को लेकर जल्द से जल्द केंद्रीय कानून बने. हिंदू कभी भी किसी का धर्मांतरण नहीं करता यह काम ईसाई मिशनरी ही कर रही हैं."
मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ के फादर आनंद मुटुंगल इस बात को सिरे से ख़ारिज करते हैं.
उनका कहना है, "आख़िर कौन व्यक्ति होगा जो सिर्फ पैसों के लिए अपना धर्म बदल लें. साज़िश के तहत ये सब चल रहा है ताकि ईसाइयों को निशाना बनाया जा सकें. समुदाय के लोग सिर्फ और सिर्फ सेवा भावना में विश्वास रखते हैं और किसी अन्य चीज़ में नहीं."
आदिवासी इलाक़ों में रह रहे ईसाई अब ये मान रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए पुलिस के पास मौखिक शिकायत ही काफ़ी है और हिंदू संगठनों की मनमानी को रोकने वाला कोई नहीं है.

क्या कहता है क़ानून

मंडला चर्च हमला
फ़ाइल फ़ोटो. मंडला चर्च हमला
  • मध्य प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी क़ानून को पिछले साल, मध्य प्रदेश धर्म स्वतांत्र्य (संशोधन) विधेयक 2013, के ज़रिए और सख्त बनाया गया.
  • इसके तहत जो भी धर्मगुरू किसी को अपने धर्म में शामिल करना चाहता है तो उसे इसकी सूचना 30 दिन पहले प्रशासन को देनी होगी.
  • जिस पर भी लालच देकर धर्मांतरण करने का आरोप सिद्ध हो जाता है, उसे जेल होती है.
  • ऐसे में धर्मांतरण करने वाले के पुरुष होने पर धर्मगुरू को तीन साल की सज़ा और महिला या दलित होने पर चार साल तक की सज़ा होगी.

ईसाइयों पर हुए कब-कब हुए हमले

  • 2014 सितंबर में मंडला ज़िले के पकरीटोला घुटास गांव में एक चर्च को आग लगा दी गई.
  • 2008 में जबलपुर में सेंट पीटर और पॉल केथेड्रल को आग लगा दी गई थी.
  • भोपाल में जनवरी 2006 को कुछ लोगों ने ईसाइयों की एक सभा पर रॉड और लाठियों से हमला बोल दिया था. इस हमले में ईसाई समुदाय के 12 लोगों घायल हो गए थे. हमला करने वाले लोग ईसाइयों के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे थे.
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धान बोनस की मांग को लेकर किसान करेंगे आंदोलन

धान बोनस की मांग को लेकर किसान करेंगे आंदोलन

farmers protest on dhan bonus demand

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farmers protest on dhan bonus demand














धान बोनस की मांग को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा 5 जनवरी को प्रदेशव्यापी आंदोलन करेगी। इस दौरान
संगठन के पदाधिकारियों द्वारा ग्रामीण इलाकों में जनजागरण अभियान भी चलाया जाएगा।

किसान नेता पप्पू कोसरे और वीरेंद्र पांडेय ने बताया कि किसानों को धान का बोनस, समर्थन मूल्य, भू-अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध, मंडी में न्यूनतम मूल्य पर धान खरीदी सहित अन्य मुद्दों को लेकर अभियान चलाया जाएगा।

    भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ पूरे छत्तीसगढ़ में भारी विरोध , रायपुर ,बिलासपुर , रायगढ़ ,धरमजयगढ़ और जशपुर में अध्यादेश जलाया गया ,राज्यपाल को ज्ञापन

    भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ पूरे  छत्तीसगढ़ में भारी  विरोध , रायपुर ,बिलासपुर , रायगढ़ ,धरमजयगढ़  और जशपुर में अध्यादेश जलाया गया ,राज्यपाल को ज्ञापन 










    छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और अन्य जन  संघटनो ने मिल के कल रायपुर में भूमिअधिग्रहण  अध्यादेश  के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और अध्यादेश को जलाया ,सभ केबाद में राज्यपाल को ज्ञापन  सौंपा गया ,मोदी सरकार ने कार्पोरेट जगत को लाभ पहुचने और किसानो आदिवासियों से जमींन  छीनने  की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए जान किरोड़ी निर्णय लेके भूमि अधिग्राहण   अध्यादेश  पास  किया है ,जिसे हम सारे संघटन अस्वीकार करते हैं। अध्यादेश में रक्षा ,ओधोगिक कॉरिडोर ,ग्रामीण आधारभूत संरचना ,बिजली तथा पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप  के तहत भूमिअधिग्रहण के लिए 80  प्रतिशत भूमि स्वामियों की सहमति और सामाजिक प्रभाव अध्यन  की जरुरत की समाप्त कर दिया गया हैं। साथ ही इसमें बहुफसली जमींन  के अधिग्रहण की भी अनुमति  हैं। 

    अभी इस कानून  को बने एक साल भी पूरा नही हुआ है ,इसके जमींन में लागु होने भी नहीं हो पाया था ,फिर  विकास  के  नाम पर अध्यादेश के माध्यम से संशोधन करना  जनतांत्रिक  मूल्यो और संविधान का गाला घोंटना ही हैं ,यह अध्यादेश  बहुदलीय सहमति और  संसदीय परंपरा का मखोल उड़ाता हैं। सत्ता में आते ही  महज  6 महीने में ही अडानी  अम्बानी को लाभ पहुचने के लिए लगातार  तीन  अध्यादेश लाके  जनता के लोकतांत्रिक अधिकार और कानून की जनतंत्रिय परमपरा को ब्यापार के नाम पे संसद में बेचने की कोशिश हैं। 
    इससे भाजपा का गरीब विरोधी और कार्पोरेट प्रेमी का असली चेहरा उजागर हुआ हैं ,

    विरोध  प्रदर्शन में सीपीआई  के सीआर बक्शी ,सीपीआईएम के संजय पराते ,सीपीआईएमएल के सौरा यादव ,
    आप पार्टी के संयोजक संकेत ठाकुर ,वरिष्ठ नेता आनंद मिश्रा ,आदिवासी महासभा के सीएल पटेल ,छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा [मजदुर कार्यकर्ता  समिति] की सुधा भारद्धाज , किसान सभा के  नन्द कश्यप ,नदी घाटी घाटी मोर्चा के गौतम बंदोपाध्याय ,अधिवक्ता राजेंद्र सायल ,अरण्य बचाओ समिति के जयनंदन पोर्ते ,जशपुर जिला संघर्ष समिति के जेकब कुजूर ,पीयूसीएल के डा लाखन  सिंह ,छत्तीगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक  शुक्ल ,रमाकांत बंजारे ,नई  राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति के उत्तम साहू सहित कई संघटन के प्रतिनिधि शामिल  हुए ,
    ऐसे ही विरोध  प्रदर्शन बिलासपुर ,रायगढ़ ,धर्मजयगढ़  और जशपुर में भी हुए ,

    Thursday, January 1, 2015

    सपने जगाने वाली सियासत से बचायेगा कौन ? पुण्य प्रसून बाजपेयी



    सपने जगाने वाली सियासत से बचायेगा कौन ? पुण्य प्रसून बाजपेयी


    पुण्य प्रसून बाजपेयी
    सपने विकास के जागे रुबरु गोडसे से लेकर धर्मांतरण से होना पड़ा। सपने भ्रष्टाचार और बाप बेटे की सरकार के खिलाफ जागे रुबरु घोटले की जांच में फंसे रघुवर दास और उमर अब्दुल्ला तक से होना पड़ रहा है। सपने दामाद के खिलाफ जागे तो सरकारी फाइल ने ही धोखा दे दिया। सपने मुंबई में वसूली करने वालों के खिलाफ जागे तो रुबरु वसूली करने वालो के साथ सरकार बनाने और बचाने के खेल से होना पड़ा। अब सपने दिल्ली पर आ टिके हैं क्योंकि पाश कह गये हैं सपनों का मरना सबसे खतरनाक होता है। तो दिल्ली से दिल्ली तक के सपने का इंतजार फिर से जाग रहा है। क्योंकि बदलाव का सपना सबसे पहले दिल्ली ने ही देखा। और २०१३ में सपने को पूरा भी किया। और उसके बाद २०१४ की हवा में बदलाव का सपना कुछ इस तरह उड़ान भरने लगा कि केन्द्र से लेकर महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर तक की तो सियासत पलट गई। हर जगह कांग्रेस सत्ता में थी और हर जगह अब बीजेपी की सत्ता है या बननी वाली है। कांग्रेस हर जगह बूरी तरह पिटी। और हर जगह भगवा खूब लहराया।

    अब याद कीजिये तो बदलाव की पहली नींव दिल्ली में ही पड़ी थी और वह साल २०१४ नहीं बल्कि २०१३ था। और जिस कांग्रेस का सूपड़ा साफ जनता ने किया, उसी जनता ने पहला पत्थर कांग्रेस के खिलाफ दिल्ली में ही उठाया। हैट्रिक बनाने वाली शीला दीक्षित दिल्ली में ना सिर्फ खुद हारी बल्कि दिल्ली के इतिहास में कांग्रेस की सबसे बूरी गत दिल्ली ने देखी और कांग्रेस को दिखायी। और उसके बाद का सिलसिला तो मोदी-मोदी के नारो में जिस तेजी से चुनाव में घुमा उसने अर्से बाद देश के तमाम राजनीतिक दलों के सामने यह सवाल तो खड़ा कर ही दिया कि कल तक की बीजेपी के गागर में वोटो का सागर यूं ही नहीं समा रहा है। बल्कि किसी पार्टी का कोई चेहरा ऐसा बचा ही नहीं है जिसके आसरे सपने भी पाले जा सकें। तो २०१४ के बीतते ही पहला सवाल हर किसी के जहन में यही आयेगा कि जिस दिल्ली ने काग्रेस की जमी जमायी १५ बरस की सत्ता को उखाड़ फेंका, क्या वही दिल्ली एक बार फिर दिल्ली के तख्त तले दिल्ली सरीखे केन्द्र शासित राज्य के जरीये ही कोई नया सपना दिखा सकती है। या फिर मोदी मोदी की गूंज दिल्ली को भी हड़प लेगी। दिल्ली के सपनों की शुरुआत यहीं से होती है। क्या साल भर के भीतर दिल्ली के नये सपने मोदी के सपनों को चुनौती दे सकते हैं। या फिर देश के साथ कदमताल करने के लिये दिल्ली तैयार है। देश के साथ कदमताल का मतलब मोदी सरकार है। और नये पैगाम का मतलब मोदी सरकार का विकल्प है।

    वैसे बिहार चुनाव से पहले मोदी सरकार का चुनावी विकल्प बनने की तैयारी में जनता परिवार भी खुद को धारदार बना रहा है। लेकिन दिल्ली का सवाल चुनावी विकल्प बनना या बनाना नहीं बल्कि विकास के नाम पर धारदार होती सत्ता को सामाजिक-आर्थिक बिसात पर चुनौती देना और सत्ता में सिमटती जनता की मजबूरी को मुक्त कराना है। यह सवाल दिल्ली के चुनाव में कैसे उठ सकता है या इसे कौन उठा सकता है यह अपने आप में सवाल है। लेकिन दिल्ली चुनाव का दूसरा मतलब शायद चुनावी प्रबंधन का विकल्प बनना भी हो चला है। जाहिर है ऐसे मोड़ पर दिल्ली के पन्नों को पलटें तो १४ फरवरी २०१४ के बाद तीन महीने तक दिल्ली में हारी कांग्रेस की अगुवाई में दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग ने ही सत्ता संभाली और बीते सात महीनों से बीजेपी की अगुवाई में वही उप-राज्यपाल नजीब जंग ही दिल्ली को चला रहे हैं। यानी जिस शीला दीक्षित के विकास की अंधेरी गली को दिल्ली वालों ने पलट दिया उस दिल्ली वालों के सामने २८ दिसंबर २०१३ से १४ फरवरी २०१४ के बाद अपने दर्द का जिक्र करने वाला आया ही नहीं। और इसी दौर में देश के सारे चुनावी पर्दे बदल गये। तो दिल्ली का मतलब है क्या और होगा क्या।

    दरअसल शीला दीक्षित दिल्ली में इसलिये नहीं हारी कि उन्होंने विकास नहीं किया। बल्कि हारीं इसलिये क्योंकि केन्द्र की मनमोहन सरकार के घपले घोटालों की फेरहिस्त के बीच अन्ना आंदोलन ने पहली बार देश के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया कि सत्ता का मतलब ताकत या राजा बनना नहीं होता। और उसी दौर में जनता ने जैसे ही अन्ना के चश्मे से संसद और सत्ता को देखना शुरु किया तो उसे लगा कि उसकी ताकत तो लोकतंत्र की चौखट पर सत्ता से भीख मांगने के अलावे कुछ है ही नहीं। आंदोलन की सबसे बडी ताकत सत्ताधारियों को सेवक मानने और खुले तौर पर कहने की सोच से उभरी। सत्ता पाना और सरकार चलाने के रुतबे में कांग्रेसियो की आंखें फिर भी ना खुली कि सत्ता उनका जन्मसिद्द अधिकार नहीं है। और सत्ता पाने के लिये लालयित बीजेपी भी कमोवेश उसी अंदाज में निकलना चाह रही थी कि कांग्रेस के बाद सत्ता पाना तो उसका अधिकार है। ध्यान दें तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने २०१३ में सत्ता की बात कभी कही ही नहीं और उसी दौर में दिल्ली के तख्तोताज पर नजर जमाये नरेन्द्र मोदी को भी इसका एहसास हुआ कि सत्ता पाने के लिये सत्ता की जगह सेवक होकर चुनाव जीतना ज्यादा आसान है। और दोनों जगहों पर परिवर्तन या सत्ता पलटने में जनता ने सपना देखा कि सत्ताधारी सेवक हो चला है तो साथ सेवक का ही दिया। अपने अपने घेरे में सपने दोनों ने जगाये। केजरीवाल के सपने सत्ता के तौर तरीके बदलकर सत्ता चलाने के थे। नरेन्द्र मोदी के सपने सुविधाओं का पिटारा खोलने वाले रहे। केजरीवाल जनता को भागीदार बनाकर राजा-प्रजा की लकीर को खत्म करने का सपना दिखा रहे थे। मोदी राजा बनकर रात-रात भर जाग कर जनता का हित साधने का सपना पैदा कर रहे थे।

    केजरीवाल जनता में यह भरोसा जता रहे थे कि सत्ताधारियों को भी सड़क का सिपाही बनाकर रात रात भर खड़ा किया जा सकता है। नरेन्द्र मोदी सत्ताधारियों में अनुशासन और ईमानदारी का पाठ पढ़ाने का वायदा कर जनता को भरोसे में लेते रहे। केजरीवाल भूखे पेट रहकर सत्ता के संघर्ष को जनता से जोड़ने का सपना पाले रहे। और मोदी हर क्षण जनता के दर्द के साथ जुड़कर सत्ता की जमीन और छत दोनो दिलाने के सपने जगाते रहे। दोनों के निशाने पर भ्रष्टाचार था। दोनों की निगाहों में ईमानदारी थी। दोनों ने खुद को पाक साफ साबित करने के लिये सत्ताधारियों को ही निशाने पर लिया। केजरीवाल ने मनमोहन सरकार के कैबिनेट मंत्रियों के भ्रष्टाचार के अनकहे किस्सों से लेकर क्रोनी कैपटलिज्म की अनकही कहानियों को ही सार्वजिक कर कानून चलाने वालो पर चोट कर दी। नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह की जगह गांधी परिवार और दामाद पर सीधा हमला कर आम जनता की उस नब्ज को छुने की कोशिश की जहां रंक साजा से टकराने की हिम्मत करता हुआ दिखायी थे। दोनों ही अपने अपने घेरे में खूब सफल हुये । और दोनो ने ही देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को ही हराया। लेकिन अब ना तो २०१३ है ना ही २०१४ । अब २०१५ शुरु हो रहा है और संयोग से दिल्ली में टकराना इन्हीं दोनों को है। कांग्रेस नहीं है। गांधी परिवार के अनकहे किस्से नहीं है। भ्रष्ट मंत्रियों की फेहरिस्त नहीं है। राजनीतिक प्रयोग की नयी बिसात है। सपनों को जगाने का जमावड़ा है। चुनाव कैसे जीता जाता है इसकी खुली प्रयोगशाला पार्टी संगठन के नायाब प्रयोग है। हर वोटर के घर तक पहुंचने की ख्वाहिश है। हर वोटर के दिल में सपनों को जगाने की चाहत है और सत्ता हर हाल में मिल जाये इसके लिये सेवको की कतार है।

    तो फिर दिल्ली के सपने होंगे क्या। क्या सबसे बड़ा सपना यही हो चला है कि दिल्ली में २०१३ की सियासी टकराव की धारा २०१५ में तीन सौ साठ डिग्री में घूमकर फिर वही आ खड़ी हुई है , जहां उसे नये सपने जगाने होंगे। व्यवस्था बदलने की ठाननी होगी। दूरियां बढाती बाजार व्यवस्था को थामना होगा। विकास के सपने तले जिन्दगी की त्रासदियों के सच को समझना होगा। दो जून की रोटी के लिये संघर्ष और जमा देने वाली ठंड में बिन छत जीने की मजबूरी वाले हालात किसने खड़े किये उस सियासत से भी टकराना होगा। हक के सवाल सत्ता से बडे होते है, यह मानना होगा। यानी चुनावी बिसात सामूहिकता के संघर्ष का बोध भर ना कराये। वोट के लिये मारा-मारी जिन्दगी सुकुन बनाने के पैकेज पर ना टिके। चुनावी जीत के बाद की सत्ता चंद हाथो के जरीये सपने पूरा करने वाले एहसास पर ना टिके इसके लिये दिल्ली को तैयार होना ही होगा।

    लेकिन यह संभव कैसे है। एक तरफ केन्द्र सरकार अगर खुद को चुनाव जीतने के कारखाने में बदल लेने पर आमादा हो और दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी भी अब चुनाव जीतने की कवायद में खुद को प्रोफेशनल बनाने पर तुली है। तो फिर वह सपने कैसे जागेंगे जिसमें जिक्र स्वराज का होना है। जहां रोजगार और विकास के सपने नहीं चाहिये बल्कि मौजूदा व्यवस्था के तौर तरीको को बदलते हुये राज्य को स्वावलंबी बनाने की दिशा में उठते कदम हो। बिजली-पानी की कीमत वसूली या सडक टैक्स किसी कारपोरेट के मुनाफे से ना जुड़ें। सुशासन का मतलब नौकरशाही की सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक नौकरी भर ना हो। विकास का मतलब किसी भी नीतियों के लागू करने का एलान भर ना हो। योजनाओं को लेकर ब्लू प्रिंट के बगैर देश को बदलने का सपना जगाने का ना हो। हर हाल में चकाचौंध का सपना और सूचना क्रांति के जरीये ज्यादा ज्यादा से माध्यमों से सिर्फ अपनी बात हर किसी के कानों में गूंजाने भर का ना हो। लूटियन्स की दिल्ली में ही नये बरस के जश्न में दिल्ली के पकवानों को बेचने और खाने वालो के बीच फेका हुआ झूठन चुन चुन कर खाने की जद्दोजहद करते लोगो की तरफ आंख मूंद कर अपनी गरम जेब टटोलने भर का ना हो। असल में २०१५ का दिल्ली चुनाव सिर्फ बदलाव की हवा बहाने वाले जीत के दो नायकों के सपनो का नहीं होना चाहिये बल्कि किन रास्तों पर देश को चलना है, वह रास्ता दिखाने वाला होना चाहिये। जिसकी उम्मीद की जाये या यह मान कर चला जाये कि एक की उड़ान को थामने भर के लिये दूसरे को जीता दें। और फिर कल कोई दूसरा उड़ान भरे तो उसके पर कतरने के लिये वोट बैंक का आसरा ले लिया जाये। सियासत के ऐसे चुनावी प्रयोग ही बीते साठ बरस का सच है। जनता ऐसे सपनो को देखते देखते थक चुकी है। इसलिये मनाइये कि २०१५ में दिल्ली सरीखा छोटा सा राज्य ही कोई राह दिखा दे तो लोकतंत्र की जय कहा जाये। विदेशी पूंजी और चोखे कारपोरेट के आसरे दिल्ली ना चले  बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य , पानी, सफर और छत मुहैया कराने के जिम्मेदारी खुद राज्य ले लें तो ही सपने जागेंगे। नहीं तो फिर सपने टूटेंगे। २०१३-२०१४ का भरोसा डिगेगा और जनता का गुस्सा फिर किसी आंदोलन के इंतजार में लोकतंत्र को नये सिरे से जीने का इंतजार करेगा । हो सकता है फिर वहां से कोई नायक निकले जो कहे सबसे खतरनाक है सपनों का मर जाना। और देश फिर सपनों की उड़ान भरने लगें।

    नए साल का संकल्पः 2016 तक ज़िंदा रहना! राजनीतिक कार्टूनिस्ट की नजर में

    नए साल का संकल्पः 2016 तक ज़िंदा रहना! राजनीतिक कार्टूनिस्ट की नजर में 

    • 8 घंटे पहले
    एक आम आदमी के लिए नए साल का क्या मतलब है. वह नए साल को किस तरह से देखता है. कार्टूनिस्ट मंजुल की नज़र से देखें.
    नए साल पर मंजुल के कार्टून
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    नए साल पर मंजुल के कार्टून
    नए साल पर मंजुल के कार्टून
    नए साल पर मंजुल के कार्टून
    Manjul Cartoon on New Year, 2015, नए साल पर मंजुल के कार्टून

    मुंबई, दिल्ली में रहते हैं ज़्यादातर किसान! -पी साईनाथ

    मुंबई, दिल्ली में रहते हैं ज़्यादातर किसान! -पी साईनाथ

    • 6 घंटे पहले
    ग्रामीण महिलाएं, किसान, दक्षिण भारत
    साल 2014 कैसा रहा? इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप समाज के किस तबके से आते हैं.
    अगर आप व्यापारी हैं तो ये साल आपके लिए बेहद अच्छा रहा है क्योंकि आर्थिक नीति आपके समर्थन में है जैसा कि पहले भी रही है.
    आप अगर छोटे किसान हैं तो आपके लिए साल 2014 अच्छा नहीं रहा और साल 2015 भी अच्छा नहीं रहने वाला है.
    भारत के कई इलाकों में ख़ासतौर पर तेलांगना, मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों की आत्महत्या अब तक रुकी नहीं है.

    पढ़ें पूरा विश्लेषण

    भारतीय किसान
    मराठवाड़ा के विभागीय आयुक्त कार्यालय की जानकारी के मुताबिक, नवंबर के आखिर तक विभाग के 422 किसानों ने आत्महत्या की थी.
    इनमें सबसे ज्यादा 122, बीड ज़िले में हुई है. हर दिन किसानों की कम से कम तीन आत्महत्याएं दर्ज हो रही हैं.
    ज्यादातर आत्महत्याएं फसल की उपज न होने से या दिवालियापन के कारण हुई है. ऐसा ही हाल लगभग कई दूसरे राज्यों में भी है.

    क्यों खुदकुशी न करें किसान?

    भारतीय किसान
    नैशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक एक औसत किसान का परिवार पूरे महीने में साढ़े छह हजार से कम कमाता है.
    उनकी आमदनी का जरिया भी बहुत अनिश्चित होता है. आप इस आमदनी को किसी भी दूसरे पेशे से जोड़ कर देख लीजिए तो साफ है कि खेती में आमदनी बहुत कम है.
    हर साल सरकार कहती है कि खेती के लिए दिए जाने वाले कर्जे को बढ़ा दिया गया है.

    फ़ायदा किसको?

    भारतीय किसान
    कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की- दोनों ही सरकारों ने खेती के लिए कर्ज़ की सीमा को बढ़ाया है लेकिन सवाल ये है कि ये कर्ज़ किसके हाथ में जा रहा है.
    महाराष्ट्र में इस कर्ज़ का केवल 37 प्रतिशत ग्रामीण बैंक के ज़रिए बांटा जा रहा है, बाक़ी 63 प्रतिशत गैर-ग्रामीण बैंकों की शाखाओं से बंट रहा है.
    50 प्रतिशत से ज़्यादा लोन तीन शहरी ब्रांचों के ज़रिए बंटे हैं. ये शहर हैं मुंबई, पुणे और नाशिक.

    शहरों में खेती!

    किसान महिला, भारत
    सोचने की बात ये है कि इन शहरी-धनी इलाकों में कौन किसान हैं और किसको खेती के लिए कर्ज़ चाहिए.
    आप खुद सोचिए कि यहां से किसको फ़ायदा जा रहा है. यह बात केवल महाराष्ट्र के लिए भर ही सही नहीं है.
    भारत के बैंक एम्प्लॉई यूनिएन एसोसिएशन के आकंड़ो के अनुसार पिछले कुछ सालों में दिल्ली और चंडीगढ़ में खेती के नाम पर 32 हजार करोड़ रुपए का कर्ज़ बांटा गया है.
    सवाल ये है कि इन शहरों में कहाँ खेती हो रही है.

    कर्ज़ लेने वाले लोग कौन?

    भारतीय किसान
    आपको ये जानकर शायद हैरानी हो कि जिस दर में कृषि लोन लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है वो दर है 10 करोड़ से 25 करोड़ के बीच का लोन.
    भारत जैसे देश में ऐसे कितने किसान हैं जो इतनी बड़ी राशी का लोन ले सकते हैं? किसानो की ये कहानी नई नहीं है.
    1991 से जो नई आर्थिक नीति आई और 1995 से खेती को लेकर जो नीतियां बनीं उसने किसानों के हाथों से बहुत कुछ छीन लिया है.
    केवल खेती के लिए कर्ज़ ही नहीं, खेती के लिए बेहद ज़रूरी चीज़ पानी भी किसानों के हाथों से निकलकर उद्योगपतियों के हाथों में जा रहा है.

    नए साल में किसानों की हालत

    भारतीय किसान
    नए साल में किसानों के लिए स्थिति और बदतर होगी. नई सरकार रोज़गार गांरटी योजना (मनरेगा) को केवल 200 ज़िलों में ही सीमित रखने की बात कर रही है.
    पिछले सालों मे इस योजना ने गरीब मजदूरों और किसानों को उम्मीद की नई किरण दी है. अब सरकार उसमें भी कटौती कर रही है.
    मैंने 22 साल केवल ग्रामीण भारत को कवर किया है. दुनिया में ये सबसे अनोखा इलाका है. यहां 83.3 करोड़ लोग रहते हैं और 780 से ज्यादा भाषाएं बोलते हैं.

    रिश्ता कैसे बनेगा?

    भारतीय किसान
    ग्रामीण भारत का इलाका काफ़ी जटिल है. इतनी परेशानियों के बावजूद सबसे ज्यादा मोहक है ये देखना कि कैसे लोगो की हिम्मत नहीं टूटती.
    मुझे लगता है कि ग्रामीण और शहरी भारत का रिश्ता टूटता जा रहा है.
    वजह ये भी है कि मीडिया में ग्रामीण भारत बहुत कम दिखता है और ये मीडिया की बहुत बड़ी ख़ामी है. तो सवाल ये है कि ये बातचीत, ये रिश्ता कैसे बनेगा?
    मैंने इस तरफ पहला कदम बढ़ाते हुए एक ऐसा डिजिटल मंच तैयार करने की कोशिश की है जो ग्रामीण भारत के जीवन के हर पहलू को पेश करेगा.

    ग्रामीण भारत की कहानी

    भारतीय किसान
    ये मंच है पीपल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया. ये पोर्टल ग्रामीण भारत का एक झरोखा है. ये एक ऐसा मंच है जिस पर आकर भारत के गांव की कहानी देखी, सुनी, समझी जा सकती है.
    वो कहानियां जिन्हें पत्रकार, आम लोग, गांववासी, मैं और आप कोई भी कह सकता है. ये सिर्फ़ पत्रकारिता नहीं बल्कि आम लोगों की रोज़मर्रा जिंदगी की बातों का मंच है.
    पिछले 22 साल के दौरान ग्रामीण भारत में पत्रकारिता के ज़रिए मैंने जो काम किया है उसके आधार पर मेरा ये विश्वास है कि पत्रकारिता की ज़रूरतें बढ़ीं हैं और ज़रूरी है कि हम ग्रामीण भारत की कहानी भी कहें.
    (बीबीसी संवाददाता रूपा झा से बातचीत पर आधारित)
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