Friday, October 30, 2015

सूखे की संतानें..

सूखे की संतानें...

  • 2 घंटे पहले
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सब जानते हैं कि सूखा किसान की उपज खा जाता है और उसको और परिवार को एक ऐसे आर्थिक संकट में उलझा देता है जिससे वो कभी नहीं निकल पाता.
'अकाल यात्रा' के दूसरे रिपोर्ताज यहां पढ़ें
बारिश न होने का असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी पड़ता है.
सैम ह्यूस्टन स्टेट यूनिवर्सिटी के संतोष कुमार और यूनिवर्सिटी ऑफ़ पसाऊ की रमोना मोलिटर ने पड़ताल में पाया कि सूखाग्रस्त इलाक़ों के बच्चों का वज़न वज़न कम होता है.
वैसी माओं के बच्चे, जिन्होंने प्राइमरी से आगे पढ़ाई नहीं की है, इससे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.
लड़कियों में ख़ासतौर पर हीमोग्लोबिन के स्तर गिरने का ख़तरा और बढ़ जाता है.
शाह और स्टाइनबर्ग ने 2013 में पाया कि मॉनसून और बारिश में उतार-चढ़ाव बच्चों की ज़िंदगी पर सीधा असर डालते हैं.
बच्चों की पैदाइश और उनकी चार साल की उम्र के दौरान पड़ने वाले सूखे के चलते वो उम्र के मुताबिक़ स्कूली शिक्षा में सामंजस्य नहीं बैठा पाते या कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देखते.
महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाक़े अंबाजोगाई की योगेश्वरी शिक्षण संस्था से जुड़ीं शैलजा भारतराव बरूड़े ने मराठवाड़ा के सूखाग्रस्त इलाक़ों में बच्चों और महिलाओं की स्थिति के बारे में एक सर्वेक्षण किया है. इसमें कई बातें सामने आईं.
सूखे का असर बच्चियों की शिक्षा पर पड़ रहा है.
लड़कियों को परिवार के लड़कों के मुक़ाबले पढ़ाई में कम तरजीह दी जा रही.
बहुत से बच्चे इस साल स्कूल नहीं पहुँच पाए हैं. बारिश न होने से माता-पिता के पास फ़ीस के पैसा नहीं है.
बच्चों की जीवनशैली में भी बदलाव देखा जा रहा है.
उनके खाने-पीने की आदतें बदल रही हैं और अक्सर किसान माता-पिता उन्हें पौष्टिक आहार नहीं दे पाते
उपज न होने और आर्थिक परेशानियों के चलते घरों में हिंसा की वारदात भी बढ़ी हैं. कई बार महिलाओं और बच्चों को हिंसा का सामना भी करना पड़ता है.
यंग लाइव्स लॉन्गीट्यूडिनल सर्वे के तहत 2002 और फिर 2006-07 के बीच आंध्र प्रदेश में सूखे और नक्सली हिंसा के चलते बच्चों की सेहत पर असर के बारे में एक सर्वेक्षण किया गया था.
इस सर्वेक्षण के मुताबिक़ सूखे से सबसे ज़्यादा अगर कोई प्रभावित होता है तो वो छोटे बच्चे होते हैं, जिनके शारीरिक विकास पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है.
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सांप्रदायिकता से किसे फायदा?

सांप्रदायिकता से किसे फायदा?

Friday, October 30, 2015
[CG KHABAR ]
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मोहम्मद अखलाक-मृतक
अंग्रेजों ने हमारे देश के दो टुकड़े क्या किये हम कई टुकड़ों में बंट गये हैं. आज भी अंग्रेजों की लगाई आग हमारे समाज के भीतर जल रही है. इसे जब तक बुझाया नहीं जाता देश विकास नहीं कर सकेगा. हमारे आपस में लड़ने का फायदा किसे हो रहा है यह देखने-समझने की बात है. भारत और पाकिस्तान का बंटवारा जिस पीढ़ी ने नहीं देखा उसे अयोध्या तथा दादरी जैसी घटनाओं से दो -चार होना पड़ रहा है. हमने कभी यह सोचा न था कि हमारे मुल्क का कभी बंटवारा होगा. लेकिन हम बंट गए और हमें क्या हासिल हुआ इसका सटीक लेखा-जोखा हमारे पास संभवत: नहीं है. हिंदुओं और मुसलमानों को भारत-पाकिस्तान के दो हिस्सों में विभाजित कर अंग्रेजों ने जो साजिश रची, उसकी आग देश में आज भी धधक रही है. इसका परिणाम अयोध्या और दादरी के साथ सुलगता कश्मीर है.
गोरे हमारे बीच सांप्रदायिक तनाव की ऐसी दीवार खड़ी कर चले गए, जिसकी लंबाई को हम आज तक नाप नहीं पाए. मुल्क को दो टुकड़ों में विभाजित कर दिया. एक विशाल राष्ट्र जाति और धर्म के नाम पर विभाजित हो गया. हमारे खून के रिश्ते बंट गए. हमारी ईद, दीवाली, होली, दशहरा सब कुछ बंट गया. उस बंटवारे की पीड़ा आज हमारे लिए कितनी नासूर बन गई है, यह हम भली भांति समझ रहे हैं. लेकिन हम विभाजित होने के बाद फिर एक विभाजन की ओर बढ़ रहे हैं.
दुनियाभर की आतंकी और विंध्वसंक ताकतें हमंे विभाजित करने पर तुली हैं. लेकिन यह बात संभवत हमारे समझ में नहीं आ रही है, क्योंकि हमारा राजनीतिक स्वार्थ देश से भी बड़ा हो गया है. हमें एक के बाद एक बंटवारे के मुहाने पर खड़ा कर वैश्विक ताकतें अपना उल्लू सीधा करना चाहती हैं.
एशिया महाद्वीप में भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उसकी दुश्मनी का लाभ सीधे तौर पर अमेरिका और चीन उठा रहे हैं. आज इसी का परिणाम है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हमें वीटो वाले देशों जैसा स्थान नहीं मिल पा रहा है. भारत-पाकिस्तान आपस में विभाजित होने के साथ-साथ विचार और सिद्धांतों से भी बंटे और कटे हुए हैं.
भारत से पाकिस्तान बना और फिर बंगलादेश. कश्मीर को लेकर जंग जारी है. इस मसले को बार-बार संयुक्त राष्ट्र में घसीटने की कोशिश की जाती है, लेकिन यह दीगर बात है कि सफलता हाथ नहीं लगती. विभाजन के कारण हमने महात्मा गांधी को खोया. इसी जाति, धर्म, संप्रदाय और आतंकवाद की भेंट राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और दूसरे राजनेता चढ़े. इस विभाजन के पीछे आखिर वजह क्या है? जब हिंदू और मुसलमान अलग-अलग देशों में बंट गया, बावजूद इसके इस समस्या का हल क्यों नहीं निकला? पाकिस्तान बनने के बाद बंगलादेश क्यों बना?
क्या एक और विभाजन के बाद हिंदू और मुस्लिम का भेद मिट जाएगा? तब सांप्रदायिकता की आग नहीं जलेगी? दादरी और गोधरा जैसी घटनाएं नहीं होंगी? मुंबई बारूदों की आग में नहीं जलेगी? घाटी में तिरंगा आग के हवाले नहीं होगा? अलग कश्मीर की मांग नहीं की जाएगी? मोहर्रम और दुर्गा पूजा के दौरान सांप्रदायिक दंगे नहीं होंगे? निश्चित तौर पर सारी फसाद की जड़ हमारी राजनीति और उसकी सांप्रदायिक नीति है.
हम देश को एकल भारत के रूप में नहीं देख रहे हैं. हम इसे हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाइयों वाला भारत देख रहे हैं. जिस दिन भारत भारतीयता और भारतवासियों की बात करने लगेगा, उस दिन संभत: सांप्रदायिकता की आग ठंडी हो जाएगी. भाषा, जाति, धर्म, प्रांतवाद की बात नहीं आएगी. लेकिन हम ऐसा जब कर पाएंगे?
राजनीति की सोच बदलनी होगी. हमें उस सोच को विस्तार देना होगा. सत्ता की केंद्र बिंदु से हमें बाहर आना होगा. देश और प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिक आग ने हमारी गंगा जमुनी तहजीब को तोड़ कर रख दिया है. देश में सांप्रदायिक घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. कभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की धमकी दी जाती है और कभी कश्मीर में आईएसआई झंडे लहराए जाते हैं.
पाकिस्तान जिंदाबाद और भारत मुदार्बाद के नारे लगाए जाते हैं क्यों, इससे हम कहीं न कहीं से देश को कमजोर करने पर तुले हैं. आतंकवाद, और सांप्रदायिकता का कोई धर्म नहीं होता है. हमें एक दूसरे की बस्तियां जलाकर एक दूसरे को जिंदा जलाकर क्या हासिल कर लेंगे. श्रीराम बड़े या मोहम्मद पैगम्बर. यह विवाद उन्हीं लोगों पर छोड़ दीजिए. हम ईश्वरीय शक्तियों के लिए क्यों कट मर रहे हैं. हमने तो इसके लिए कभी पैगम्बर साहब और श्रीराम को लड़ते हुए नहीं देखा. फिर हम आप अपना क्यों खून बहा रहे हैं? गाय और सूअर के विवाद से हमें क्या मिलने वाला है.
देश और विदेश में बीफ और दूसरे मवेशियों का बड़ा बाजार है. अगर धर्म की इतनी हमें चिंता है तो जिन बूचड़खानों में बेगुनाह पशुओं का बध किया जाता है, गोवंश की खुले आम तस्करी की जाती है, वहां हमारा जमीर क्यों सो जाता है? हम हिंदू-मुसलमान एक साथ मिलकर यह आवाज क्यों नहीं उठाते हैं कि देश में स्थापित सभी बूचड़खाने बंद होने चाहिए. बेगुनाह मवेशियों का कत्ल हमें मान्य नहीं है, वह चाहे किसी भी प्रजापति के मवेशी हों.
हम क्यों सिर्फ गाय और सूअर की बात करते हैं? हम तो इंसान है, हमारी इंसानियत तो बेजुबानों के लिए भी दिखनी चाहिए. फिर हम मौन क्यों हो जाते हैं? धर्म के नाम पर लड़ाई बंद होनी चाहिए.
हमें देश के खिलाफ उठने वाली हर आवाज के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी. हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, उत्तर, पूर्व, पश्चिम, दक्षिण की बात बंद करनी होगी. हमें विंघ्य से हिमाचल, यमुना से गंगा, द्रविड़ से बंग, अटक से कटक तक की बात करनी होगी. हमारी इसी आंतरिक कमजोरी का फायदा हमारे पड़ोसी उठा रहे हैं. वैश्विक मंच के साथ अन्य मसलों पर हमें बारबार चेतावनी देते हैं और कमजोर करने की साजिश रचते हैं. चीन जब चाहता है, हमारी सीमा पहुंच हमें आंखें दिखाता है. कश्मीर में आईएसआई और दूसरे आतंकी संगठन कहर मचाते हैं. हमारे देश में वे पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा बुलंद करते हैं.
हमारे देश की आत्मा संसद पर हमले की साजिश रची जाती है. पाकिस्तान आए दिन हमारे सीमा पर गोले दाग कर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता है. यह सब आखिर क्यों? भारत एक सहिष्णु देश है. यहां हिंसा कोई स्थान नहीं है. हमारी अनेकता में एकता की संस्कृति पूरी दुनिया के लिए मिसाल है. लेकिन देश में हर महीने औसतन 57 सांप्रदायिक दंगे हमारी सोच पर सवाल उठाते हैं. इससे बड़ी हमारे लिए शर्म की बात और क्या हो सकती है? लेकिन अब यह देश सांप्रदायिक दंगों के लिए जाना जाने लगा है.
पिछले पांच सालों का आंकड़ा देखें तो सबसे अधिक सांप्रदायिक दंगे उत्तर प्रदेश में हुए हैं. इस दौरान देश में 3,416 सांप्रदायिक दंगे हुए, जिसमें 529 लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी. दंगों में 10,344 लोग घायल हुए. देश में औसतन हर माह 57 सांप्रदायिक विवाद होते हैं. सांप्रदायिक विवाद में देश में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है. यहां कभी मुजफ्फनर, कभी सहारनपुर और कभी दादरी जैसी घटनाएं होती हैं. उत्तर प्रदेश में पिछले पांच साल में 703 सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं.
दूसरे पायदान पर 484 घटनाओं के साथ महाराष्ट्र और तीसरे पर 416 दंगे के साथ मध्य प्रदेश और इसके बाद 356 दंगों के साथ कर्नाटक और 305 सांप्रदायिक दंगों के साथ गुजरात है. हमारे देश की यह असली तस्वीर है. यह हमारी निजी सर्वे रिपोर्ट नहीं है. यह चर्चा के दौरान देश की संससद लोकसभा में पेश किए गए आंकड़े हैं.
सवाल उठता है कि यह आग कब बुझेगी? यह हमें कमजोर करने की साजिश रची जा रह है, लेकिन वोट बैंक की राजनीति जाने हमें कहां पहुंचा देगी? वह वक्त दूर नहीं जब हम एक और विभाजन के चैराहे के करीब खड़े होंगे. जब फिर कोई नाथू राम गोडसे पैदा होगा और किसी महत्मा गांधी को शहीद होना पड़ेगा. लेकिन हमें वक्त में बदलाव लाना होगा, ताकि देश की सांप्रदायिक एकता के साथ हमारी राष्ट्रीय अखंडता कायम रहे. देश में विकास की बात हो विभाजन की नहीं.

भगत सिंह के पौत्र बोले, देश में बढ़ती सांप्रदायिकता खतरनाक

भगत सिंह के पौत्र बोले, देश में बढ़ती सांप्रदायिकता खतरनाक

By Web Desk | Thursday, October 29, 2015 - 14:27
dadri issue
भगत सिंह के पौत्र बोले, देश में बढ़ती सांप्रदायिकता खतरनाक
बेंगलुरू. देश में बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए शहीद भगत सिंह के पौत्र अभितेज सिंह ने चिंता जताई है. उन्होंने देश में बढ़ती सांप्रदायिक वारदातों के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है.
बेंगलौर के प्रेस क्लब में पत्रकारों से बात करते हुए अभितेज सिंह ने कहा कि युवाओं को मिलकर देश में सांप्रदायिक ताकतों से लड़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि बीजेपी और कांग्रेस समाज में अपनी-अपनी विचारधारा थोपकर समाज में असहिष्णुता फैला रहीं हैं.
अभितेज सिंह ने दादरी, कलबुर्गी, डाभोलकर और गोविंद पंसारे की हत्या जैसी घटनाओं के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि देश में बढ़ती असहिष्णुता के लिए किसी व्यक्ति पर दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए.
अभितेज ने कहा कि लोगों को समझना चाहिए कि कौन सी राजनीतिक पार्टियां विभाजनकारी और सांप्रदायिक राजनीति कर रही हैं. ताकि हम एकजुट होकर इन सभी पार्टियों को पस्त कर सकें.

साहित्यिक जंग का नया माहौल और सत्‍ता की प्रतिक्रिया

साहित्यिक जंग का नया माहौल और सत्‍ता की प्रतिक्रिया

आउटलुक

“साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने का सिलसिला एक नई परिस्थिति का संकेत देता है और एक अभूतपूर्व माहौल की रचना भी करता है। परिस्थिति नई है, वरना अभी तक यह माना जाता रहा है कि कला और साहित्य में राज्य द्वारा सम्मानित किए जाने के लिए होड़ लगी रहती है। पुरस्कार लौटाने की व्यग्रता इस पैमाने पर पहले नहीं देखी गई।”
अवश्य कुछ ऐसा हुआ है जिससे रचनाकार और बौद्धिक आशंकित हैं। उनका कदम न प्रायोजित है, न नियोजित। उसे किसी एक हादसे पर उभरी भावुक प्रक्रिया के रूप में भी नहीं देखा जा सकता। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि एक अर्से से बढ़ती हुई घुटन इधर की कुछेक घटनाओं और उन पर राज्य की दृष्टि स्पष्ट होने के बाद बर्दाश्त के बाहर चली गई। विचार और रचना की गरिमा के प्रति हिकारत का वातावरण सघनता की सहनीय सीमा लांघ चुका है। साहित्य लिखने वाले तंग आ चुके हैं। इसका कारण सिर्फ यह नहीं कि पुस्तकों पर विवाद, प्रतिबंध की मांग और लेखकों पर हमले बढ़ते चले गए हैं। तंग आने का ज्यादा बड़ा कारण यह है कि विचार और कल्पना के प्रति कुढ़न फैलती चली गई है। पूर्वांचल की एक कहावत है, 'तंंग आयद, जंग आयद।’ जब आदमी तंग आ जाता है तो वह जंग पर उतर आता है। पुरस्कार लौटाकर लेखकों और कवियों ने सत्याग्रही जंग का नया माहौल बनाया है। 
सत्ता की ओर से आई प्रतिक्रियाएं दिखाती हैं कि पुरस्कार लौटाने वालों की संख्या और विविधता से सरकार चौंकी है। एक मंत्री ने राय दी है कि लेखकों को देश की छवि की चिंता करनी चाहिए। सत्ता और साहित्य का यह संवाद कुछ अवरुद्ध प्रश्नों को खोलेगा। सर्जना की प्रेरणा क्या होती है, यह प्रश्न सत्ता पर काबिज लोगों के लिए या तो निरर्थक है या फिर महज एक रस्मी प्रश्न है जिसका कोई तुच्छ उत्तर वे तपाक से दे देना चाहेंगे। साहित्य और कला के उद्देश्य सत्ता या ताकत की शब्दावली में व्यक्त नहीं किए जा सकते। फिर भी कलाकार और कवि को यह उम्मीद रहती है कि उनकी जरूरत को समाज ही नहीं, राज्य भी समझेगा। इस आशा के पीछे यह मान्यता छिपी रही है कि राज्य की जरूरत भी समाज को इसीलिए है कि जीवन संभव बना रहे। लेखक की चिंता भी यही है। जब वह पुरस्कृत किया जाता है तो सोचता है कि राज्य ने इस चिंता की कद्र की। 
नयनतारा सहगल को जिस उपन्यास के लिए साहित्य आकदमी पुरस्कार दिया गया था, वह आपातकाल की राजनीतिक घुटन की कहानी है। यदि वित्तमंत्री ने यह कृति पढ़ी होती तो वे यह टिप्पणी करने से सकुचाते कि पुरस्कार लौटाने वालों ने आपातकाल का विरोध क्यों नहीं किया। समस्या शायद यह है कि पुरस्कृत हो जाने के बाद लेखक एक प्रतीक बन जाता है। कृति की जगह उसकी हैसियत महत्वपूर्ण हो जाती है। तब कई लोग उसे सत्ता का अंग मानते हैं। इसलिए जब वह अपना पुरस्कार लौटाता है तो इसे एक प्रकार की धृष्टता समझा जाता है। आज जो लोग पुरस्कार लौटाने वालों की आलोचना कर रहे हैं, वे भूल गए हैं कि कृति का उद्देश्य पुरस्कार पाना नहीं था। पर इसे भूल कहना गलत है। उन्हें नहीं मालूम कि कृति की खातिर कृतिकार इतनी मेहनत क्यों करता है। 
एक के बाद एक लेखक का पुरस्कार लौटा देना ऐसे समवेत स्वर का निर्माण सिद्ध हुआ है जैसा स्वतंत्र भारत ने कभी नहीं सुना। ये अलग-अलग भाषाओं के रचनाकार हैं और उनकी रचनाएं भी अलग-अलग किस्म की हैं। उनके कदम में निहित सामूहिकता की विवेचना यदि साहित्य अकादमी भी ठीक से नहीं कर पा रही है तो यह कोई अचरज की बात नहीं है। घुटन में संस्थाएं जी लेती हैं, रचनाशीलता मर जाती है। भारत एक देश के रूप में इसी किस्म के संकट से गुजर रहा है। उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं जीवित हैं, पर रचनाशक्ति हांफ रही है। भारत सिर्फ एक सरकार नहीं है, एक समाज भी है। उसकी सामाजिकता को कमजोर करने वाले विष हवा में हमेशा रहे हैं, पर किसी गंभीर विष को सत्ता ने इतने निश्चिंत भाव से देखा हो जिस तरह आज देख रही है, इस बात के लंबे उदाहरण नहीं मिलते। इस स्थिति से उत्पन्न आशंकाएं ठीक से व्यक्त नहीं की जा सकतीं। साहित्यकारों का विक्षोभ इसी कठिन परिस्थिति का संकेत है। 

इस संकेत में सत्ता की विचाराधारा के प्रति असंतोष पढ़ना पर्याप्त न होगा। वैचारिक टकराव लोकतंत्र का लक्षण है, पर टकराव तभी तक लोकतंत्र में रचनाशील योगदान देता है जब तक वह शब्दों में व्यक्त होता रहता है। हिंसा का सहारा लेते ही वह विनाशक हो जाता है। जो विचारधारा हिंसा का सहयोग लेती है, स्वयं नष्ट हो जाती है। सत्ता भले रचना को न समझे, उसे रचनाकार की व्यग्रता को जरूर समझना चाहिए। अच्छा रचनाकार कभी अपने लिए व्यग्र नहीं होता। उसे अकेले जीने की आदत होती है। पुरस्कार लौटाकर ये रचनाकार लिखते रहेंगे। उनकी जीवनी के अलावा साहित्य के राष्ट्रीय इतिहास में यह घटना लेखक की निस्पृहता सिद्ध करती रहेगी। सत्ता इसी निस्पृहता से डरती है। इस बार भी डरी है, भले यह बताने से डर रही हो। 

मौजूदा सरकार में विज्ञान की नासमझी: पीएम भार्गव

मौजूदा सरकार में विज्ञान की नासमझी: पीएम भार्गव

P Anil Kumar

“वह उम्र के उस पड़ाव में हैं, जहां कांपते हाथों के साथ लड़खड़ाती जुबान से लोग अपने बीते दिनों की उपलब्धियों को गिनते-गिनवाते हैं लेकिन उनका मामला अलग है। वह खुद ही पूछते हैं, बताओ मेरी उम्र कितनी है, फिर मेरे मौन को मेरी दुविधा समझकर खुद ही जवाब देते हैं, 86 साल। नहीं लगता न, अगर ये पार्किंसंस (हाथों-पैरों के स्वत: हिलने की बीमारी) न परेशान करता तो शायद बिल्कुल भी न लगता। पुष्प मित्र भार्गव (पी.एम.भार्गव) देश के आला वैज्ञानिक, बायोलॉजिस्ट हैं। उन्हें इस बात की फिक्र है कि अगर देश में जीन संवद्धित (जीएम) फसलों को मंजूरी मिल गई तो इससे किस तरह न सिर्फ पर्यावरण, खेती को नुकसान होगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों को नुकसान होगा। ”
वह केंद्र सरकार की जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सदस्य हैं और खराब तबीयत में भी इसकी बैठकों में शामिल होने को मुस्तैद रहते हैं। देश-विदेश के अनेक सम्मानों से सम्मानित हो चुके डॉ. भार्गव देश के अनेक वैज्ञानिक शोध संस्थानों, खासकर हैदराबाद के सेंटर ऑफ सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी), जिसकी स्थापना ही उन्होंने की थी और जिसकी गणना देश के सबसे प्रतिष्ठित शोध केंद्र्रों में होती है, से जुड़े रहे हैं। आउटलुक की ब्यूरो प्रमुख भाषा सिंह से उन्होंने अनेक विषयों पर खुलकर बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश:
इतने विरोध के बावजूद, जीएम फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके समर्थक हैं। इसकी क्या वजह है?
सबसे बड़ा और एकमात्र कारण है, कॉरपोरेट। कॉरपोरेट का बिजनेस इससे जुड़ा है। सीधा-सा फॉर्मूला है, किसी भी देश पर नियंत्रण करने का सबसे अच्छा तरीका है उसके खाद्य उत्पादों को काबू करना। आज भी 64 फीसदी भारतीय आबादी खेती पर निर्भर है। यहां अगर उन्होंने बीज के उत्पादन और एग्रोकेमिकल पर काबू कर लिया तो उन्हीं का बोलबाला है। मोनसेंटो, सीनजेंटा जैसी अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से इस पर आधिपत्य के लिए सक्रिय हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में बीज उत्पादन का करीब 30 फीसदी कारोबार विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से है। अब यह सोचिए कि इतना लुभावना और फायदे वाला कारोबार हासिल करने के लिए वे ञ्चया कुछ नहीं करेंगी।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद जीएम के समर्थक माने जाते हैं। और यह बात, हमसे ज्यादा इन कंपनियों को पता है कि मोदी उनके लिए कोई राह निकालेंगे।
क्या पिछले एक साल में कोई राह निकली।
हां, स्पष्ट संकेत दिए गए कि केंद्र की नई सरकार जीएम फूड और जीएम फसलों के लिए रास्ता खोलेगी। पिछली केंद्र सरकार (यूपीए) को हम जैसे तमाम लोगों के दबाव में जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल पर रोक लगानी पड़ी थी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने बहुत खामोशी के साथ इन फील्ड ट्रायल को मंजूरी देनी शुरू कर दी है। करीब 21 जीएम फसलों का फील्ड ट्रायल चल रहा है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने जिस अंदाज में कहा कि इस ट्रायल से किसी नुकसान का अंदेशा नहीं है, उससे साफ है कि सरकार इसे आगे बढ़ाएगी।
जीएम फसलों के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि उससे उपज बढ़ेगी। अन्न की कमी दूर होगी और यही एकमात्र रास्ता है, सबको भोजन मुहैया कराने का...?
यह सरासर गलत है। अवैज्ञानिक और बेहद बेतुका है। मिसाल के तौर पर भारत को ही लीजिए। भारत में हर साल तकरीबन 27 करोड़ टन अनाज पैदा होता है। अगर इसे भारत की आबादी से विभाजित किया जाए तो जितना प्रतिव्यक्ति के लिए इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने निर्धारित किया है, उससे बहुत अधिक बैठता है। संकट कहीं और है। संकट है अनाज की बरबादी का। हमारे पास अन्न सुरक्षित रखने के लिए अच्छी भंडारण व्यवस्था नहीं है। दूसरा, लोगों के पास अनाज खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। आंकड़ों में तमाम तरह की बाजीगीरी करने के बावजूद हकीकत यही है कि देश में गरीबी और इसकी वजह से कुपोषण बढ़ा है।
यानी उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत नहीं है?
क्यों नहीं। उत्पादकता बढ़ाना तो लक्ष्य होना ही चाहिए, उसके बिना हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं। सवाल है, कैसे। देसी तकनीकों, देसी खाद-उर्वरक आदि के जरिये न सिर्फ उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है बल्कि खेती की लागत भी कम की जा सकती है और जमीन की उर्वरता को बचाए रखा जा सकता है। ये किताबी बातें नहीं हैं। ऐसा हम कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में 20-30 लाख हेक्टेयर जमीन पर ऑर्गेनिक खेती के जरिये उत्पादकता को बढ़ाया है और यहां एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है।
लेकिन अमेरिका सहित कई विकसित देशों में जीएम फूड तो है?
जी हां, वहां है। लेकिन देखिए वहां भी जीएम फूड की लेबलिंग की मांग जबर्दस्त ढंग से बढ़ रही है। इन देशों में एलर्जी और पेट की बीमारियों में कई गुना वृद्धि हुई है। साथ ही, भारत अमेरिका नहीं है। हम खेती पर निर्भर है। बीजों पर हमारा अधिकार होना जरूरी है। हमारी खेती विविध है। हमारे पास हजारों प्रजातियां हैं। ये हमारी धरोहर हैं, इन्हें बचाना और जिंदा रखकर हम पूरी दुनिया को चमत्कृत कर सकते हैं। इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च ने 4,000 से अधिक कृषि पद्धतियों को जुटाया है। लेकिन विडंबना देखिए। इनमें से सिर्फ 90 की जांच हुई और उनमें से सिर्फ 40 की दोबारा जांच हुई। मेरी जानकारी में इसके बाद हमने इस ज्ञान का भी कोई इस्तेमाल नहीं किया। सवाल है, क्यों? यह ज्ञान तो हमारी खेती की तस्वीर ही बदल देगा, पर सही मायनों में खेती की फिक्र किसे है।
आप वैज्ञानिक हैं। आज बहुत कम प्रतिभावान बच्चे वैज्ञानिक बनना चाहते हैं, क्यों?
विज्ञान आज एक आकर्षक कॅरिअर नहीं है। यह बेहद दुखद है। सरकारें विज्ञान में निवेश नहीं करना चाहतीं। अच्छे अध्यापक नहीं हैं। बेसिक साइंस में निवेश करने की जरूरत है। बच्चों और बड़ों को भी यह बताने की जरूरत है कि विज्ञान के बिना जीवन आगे नहीं बढ़ सकता। आज से 50 साल पहले क्या किसी ने कल्पना की थी कि मोबाइल फोन की तकनीक आएगी। नहीं, न। यह विज्ञान से संभव हुआ।
दिक्कत कहां है?
सरकार की उपेक्षा। आगे हालात और खराब होंगे। मौजूदा सरकार में कोई नहीं है जो विज्ञान को समझता हो, या जिसे यह लगता हो कि विज्ञान की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतना बोलते हैं, लेकिन एक साल में एक बार भी विज्ञान शब्द पर नहीं बोले। वित्त मंत्री ने पूरा बजट पेश कर दिया, पर विज्ञान का नाम नहीं लिया। विज्ञान के नाम पर जब प्रधानमंत्री सहित बाकी नेता यह कह रहे हों कि हमने वैदिक काल में हवाईजहाज और बम बना लिया था तो उनकी वैज्ञानिक सोच के बारे में समझा ही जा सकता है। वैज्ञानिक सोच को इस दौर में जबर्दस्त खतरा है।
कैसे ?
अंधविश्वास और भ्रामक बातों को जब राजनीतिक वरदहस्त मिल जाए तो समझिए वैज्ञानिक सोच का बंटाधार है। कौन वैज्ञानिकों की शोध और समझ पर विश्वास करेगा। हमने अतीत में वाकई क्या हासिल किया था, उसे प्रचारित करने के बजाय ये सारी बातें विज्ञान का मार्ग अवरुद्ध करती हैं। वैसे भी वैज्ञानिक शोध पर बहुत खतरा है। कृषि में शोध मोनसेंटो सहित बाकी जीएम फूड वाली कंपनियां कर रही हैं। आईआईटी में भी यही चलन हो गया है। इससे देश के हित में जो असल शोध होने चाहिए, वह नहीं हो रहे।