Tuesday, September 29, 2015

इस अभियान की सफलता से राजनीतिक दल डरे हुए हैं , वे अभी तरह - तरह से षड्यंत्र क रेंगे -कमल शुक्ला


इस अभियान की सफलता से राजनीतिक दल डरे हुए हैं , वे अभी तरह - तरह से षड्यंत्र करेंगे 





कमल शुक्ला 

इस अभियान की सफलता से राजनीतिक दल डरे हुए हैं , वे अभी तरह - तरह से षड्यंत्र करेंगे | अब तक सभी राजनीतिक दल ने अपने संगठनों में केवल मोहरे के रूप ही आदिवासी नेताओं का प्रयोग कर किया हैं | यहाँ तक कि कम्युनिष्ट पार्टियों ने भी | मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि केवल भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ( माओवादी ) ही एक मात्र पार्टी रही है जिसने ना केवल आदिवासियों के हाथ में नेत्रित्व सौंपा बल्कि नेता और कार्यकर्ता की संख्या में महिला और पुरुष की संख्या भी लग-भग आधा-आधा है |
आदिवासी अस्मिता और संस्कृति के प्रति जागरूकता ही बस्तर की सबसे बड़ी समस्या का समाधान है | अब नई पीढ़ी को ऐसा नही होने देना है |बस्तर में प्राथमिक शिक्षा अब तक उनकी भाषा और बोली में नही हुई , यह एक षड्यंत्र का ही परिणाम है | जबकि बंगलादेश से लाकर बसाए गए शरणार्थियों तक के लिए सरकार ने यह व्यवस्था की | एक ओर तो पूरे अबुझमाड़ को अलग-थलग रखने के लिए लम्बे समय तक केवल अजायब घर बनाकर रखा गया , वहीँ दूसरी ओर उसी के एक बड़े इलाके में सीधे आदिवासी संस्कृति से सर्वथा अलग बंगलादेश के शरणार्थियों को लाकर बसा दिया गया | इसका बहुत ही घातक परिणाम आज आदिवासी ही झेल रहे हैं | यहाँ इस षड्यंत्र में सभी राजनीतिक दल शामिल रहे | अब आप फिर मुझपर नक्सलियों की तरफदारी का आरोप लगाएंगे , पर सच यही है कि केवल उनके ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों के साथ संवाद उनकी भाषा में किया , उनकी भाषा में जनगीत गाये और लोकगीतों को भी अपना हथियार बनाया | और यही कारण है कि सुदूर अंचल का आदिवासी अपने आपके करीब उन्ही को पाता है |
सलवा जुडूम के बहाने दो लाख से ज्यादा आदिवासियों को जब भेड़-बकरी की तरह दौड़ा-दौड़ा कर विस्थापित किया गया था , तो उनमे से अधिकाँश ने आज आंध्र और उड़ीसा में जाकर ईसाई धर्म अपना लिया | इधर कांग्रेस नेता महेंद्रकर्मा के नेत्रित्व में भाजपा कम आरएसएस ने सलवाजुडूम कैम्पों में आदिवासियों को जबरदस्ती कीर्तन , रामायण , आदि का पाठ करने और मूर्ति पूजा करने के लिए मजबूर कर हिन्दू घोषित किया | अपनी नदी , जानवर ,आँगा ,देवगुड़ी छोड़कर अपनी ही धरती में शरणागत आदिवासियों को गणेश , दुर्गा, दशहरा ,दिवाली आदि पर्व मनाने के लिए बाध्य किया गया | अब जाग रहे आदिवासी युवाओं से अपेक्षा है कि वे सरकार और विपक्ष ( चुपचाप तमाशा देख रहे बामपंथियों की भी ) की मिलीभगत से चल रहे खनिज और पानी के दोहन के लिए बड़े सेठों को जल जंगल बेचने के षड्यंत्र के खिलाफ उठ खड़े हों | मै आपको साम्प्रदायिक होने और दंगा करने के लिए आह्वान नही कर रहा , बल्कि बस जागने , एक जुट होने , अपने ही बीच के मुखौटा लगाये वीभीषनों ( कांग्रेस और भाजपा के मोहरे बने आदिवासी नेताओं ) को अलग-थलग करने की बात कर रहा हूँ | एक सशक्त आन्दोलन { चाहे वह संवैधानिक अधिकार की लड़ाई का मामला हो या अलग राज्य का मामला हो } की जरुरत है | आपके इस आन्दोलन में वे गैर आदिवासी भी साथ हो चलेंगे , जिन्होंने बस्तर को अपना घर समझा है, दूकान नही | ( बस्तर पर एक पुस्तक लिखने की कोशिश मै भी कर रहा हूँ , उसी का एक अंश --१ क्रमशः)

Gupta's security guard fired into the group of workers. One worker got bullet injury in the arm and started bleeding.


 Gupta's security guard fired into the group of workers. One worker got
 bullet injury in the arm and started bleeding.


























 ACC-Holcim is constructing a huge new state of art Expansion Plant at
 Jamul, District Durg, Chhattisgarh where construction is underway.  charge of this project is Sunil Gupta. This new plant is right next to the
 ACC-Holcim old plant (Jamul Cement Works) where our union Pragatisheel
 Cement Shramik Sangh represents a majority of the 1200 strong force of
 contract workers. The two plants are physically separated from each other.
 At the new plant there is a rapid turnover of workers almost entirely
 brought from outside the state, they are usually housed in a separate
 housing unit of the company - Gharounda. The management takes ample care to
 see that our union has no access to the workers of the new plant.

 Payment related disputes in the new plant are fairly common as contractors , fail to pay regular payments. On 25th Septmber workers working in the Silo
 at the new expansion plant began demanding 2 months overdue pay from their
 contractor. Workers were agitated since even the shops which advance them, provisions were refusing to do so. Also festival season is round the
 corner. The grievance of the workers was not resolved. Unfortunately our
 union could not come to know of this problem on that day.
 On the next day 26th September, early in the morning the workers of the new plant again accosted their supervisor/ contractor raised the issue and this
 time there was a lot of tension in the air. Sunil Gupta heard this and came
 out of his chamber. He went to the workers and abused them angrily and
 asked them to get to work. An agitated worker caught hold of him. Seeing
 this Gupta's security guard fired into the group of workers. One worker got
 bullet injury in the arm and started bleeding. Instantly the rumour spread> that a worker has been shot and killed. Workers who were working at heights
 in the structures came down and there was a situation of fracas. In anger
 the workers smashed computers in the office and cars standing outside the
 new plant.

 When the news reached the old plant, Kaladas  Dehariya, one of our
 activists in the union office was informed. He came on a bike to the gate
 of the new plant to find that the injured worker was being taken in an auto
 to hospital. He began filming this on his mobile phone. Immediately the security people and possibly workers snatched away the phone and smashed it> and began kicking and hitting him. By this time the police had arrived.
 Fortunately one of the policemen of Jamul Police Station recognized
 Kaladasji and rescued him.Then the police basically cleared out the new
 plant and all workers left. Some of them however did go to the Police> Station and filed an FIR against Sunil Gupta and his security guard
 (possibly some Kutty?).

 Meanwhile word had spread in the old plant. In solidarity and protest,
 workers of the old plant stopped work and came out and gathered at the gate
 of the old plant. After some time they took out a procession and had a big
 meeting of several hundreds of workers at Niyogi Chowk (or ACC Chowk) near> the statue of Niyogiji. By this police officials of the ASP and CSP had>reached the spot. Our union gave them representations demanding -
 a) grievance of the workers in the new plant regarding payment of their
 outstanding wages be resolved immediately.
 b) sunil gupta and his security guard be arrested and prosecuted.
 c) a judicial enquiry be made into the incident.

 This is not the first time there has been a fracas and violent incidents in
 the new plant over non-payment of wages. The management is squarely
 responsible for letting such a volatile situation develop.

 Another concern of our union is that on the last occasion also the local
 ACC-Holcim management had tried to somehow blame our union and activists
 for the incident. It is very likely that they will do so again and indeed
 that might be one of the devious motives behind this incident.

 We are in the midst of a serious negotiation with the ACC-Holcim management
 on the issues of redeployment / absorption / rehabilitation of the contract
 workers of the old plant, which requires to be clinched before the new
 plant is commissioned. We fear that the present incident may be utilised by the management to derail these talks.

Sudha Bharadwaj, Lakhan Sahu, Rajkumar Sahu, Kaladas Dehariya, Ramakant
 Banjare, Bansi Lal Sahu
 on behalf of the Pragatisheel Cement Shramik Samgh

कोसमपाली में खाक हो गई जिंदगी , भयावह मौंते , जलती खदान की आंच से जीवन हुआ दूभर :कोयला बना इनके लिये अभिशाप .

कोसमपाली में खाक हो गई जिंदगी , भयावह मौंते , जलती खदान की आंच से जीवन हुआ दूभर :कोयला बना इनके लिये अभिशाप .

















रायगढ़ के तमनार में बसा कोसमपाली की आबादी कुल पांच सौ है, यहाँ कदम कदम पे बेबसी और लाचारी का मंजर है .
यहाँ हर परिवार में कोयला खदान से फैले ज़हर के कारण मौत से कराह रहा है , जीवन दुश्वार है क्योकि पानी मिट्टी हवा सब ज़हर उगल रहा है .
फ़िलहाल क़ानूनी चक्कर में पडी यहाँ की खदान बंद पड़ी है .
इसके पहले इसी खदान ने लगभग हर आदिवासी किसान की पूरी जमीन हड़प ली थी ,इस बंद खदान से निकल रही हानिकारक गैसों के उत्सर्ग ने यहाँ के लोगो की खुशियाँ छिन गई है .
सरपंच शिव लाल भगत कहते है की पूरा गाँव बिधवा महिलाओ की बस्ती बन गया है , पांच साल में 63 महिलाओ ने अपने पति खोये है . बेतरतीव खनन ने जिन्दगी को कितना काला बना दिया है , उसका जीता जागता उदहारण कोसमपाली है .खुशहाली का लालच दिखाकर यहाँ के किसानो की पूरी जमीन अधिग्रहण कर उसका पूरा काला सोना निकाल लिया .
सामाजिक कार्यकर्ता रिन चिन ने कहा की हमने हवा की शुद्दता की जाँच की है , इसमें मानक पैमाने पी एम् 2.5 लेवल से बहुत खतरनाक स्थिति पर 403 स्तर पाया गया है .यहाँ हवा में सिलिकोन , मैग्नीज निकिल और लैड जैसे हानिकारक तत्वों की अधिकता पाई गई हैं .

न कोख् में सुरक्षित न जन्म के बाद

हवा और पानी में घुल रहे ज़हर से शिशु न तो कोख में सुरक्षित है और न जन्म लेने के बाद .
संत राम और उनकी पत्नी सावित्री राठिया ने अपने पांच नवजात शिशुओ कोखोया है , चैतराम और गीता ने अभी पीछे महीने ही अपने कलेजे के टुकड़े को खोया है .
बसंत राठिया कहते है की यहाँ हर माँ को डर है की उसका बच्चा कोख या उसके आँचल में बच पायेगा की नही, महिलाये गर्भवती तो हो रही है लेकिन गर्भापात की शिकायते आम हो रही है .कई परिवार प्रसव के बाद माँ और बच्चे को किसी रिश्तेदार के यहाँ भेजने को मजबूर हो जाते है .

अंधकार हो गई है जिन्दगी 


पति को खो चुकी नीलम को अपना जीवन अंधकार में दिखाई देता है ,पहले खदान में हमारी सब जमीन चली गई और अब पति चला गया ,अब साँस लेने में दम घुटता है, नीलम जैसी कम उम्र में विधवा होने वाली महिलाओ की संख्या बहुत हो गई है .

45 साल की उत्तरा बताती है की विधवाओ के सामने उनका जीवन पहाड़ सी हो गई है ,खदान से पुरे परिवार पर मौत मंडराने लगी है, इसके बाद 35 परिवार पलायन कर गए है , सरपंच बताते है की विधवाओ के पास सिर्फ विधवा पेंशन ही उनका एकमात्र सहारा रह गया है , जो उनके पालन के लिए बिलकुल अपर्याप्त है.

भयावह तस्वीर : पांच साल .बेहिसाब मौतें 
*
सरपंच शिवपाल भगत ने बताया कि खनन से प्रति एकड़ दो लाख रुपये मुआवजा दिया था , इसके बाद लोगो ने काम करना बंद कर दिया ,ज्यादातर लोग नशे के आदी हो गये , खदान में प्रदुषण और नशे ने मौत की बाढ़ आ गई , करीब 40 लोगो की मौत सुखा और टीबी से हुई , 85 साल की देववती का कहना है की इतनी बेहिसाब मौतें उन्होंने कभी नहीं देखी .
कन्हाई राम पटेल बताते है की 10 साल पहले मुआवजा राशी हड़पने के लिए कई कंपनियों ने गाव में जाल बिछा दिया , रकम डूबने के बाद प्रभावित लोग बेहद निराश और हताश हो गये और इसके बाद आत्महत्या की बाढ़ आ गई .
सामाजिक कार्यकर्त्ता डिग्री चौहान कहते है की हमने प्रशाशन को कोसमपाली की स्थिति से बार बार अवगत कराया है लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई .
गाव में घुसते ही दिखने लगता है की कैसे माकन की दीवालें दरक गई है विस्फोट से, नियम कायदों को दर किनारे करके कोयला निकाल लिया गया और पुरे गाव को खोखला कर दिया गया , यहाँ तक की शमशान को भी खदान में मिला लिया गया इनके पूजा स्थल को भी खदान में जोड़ लिया गया , तीन तरफ का रास्ता बंद कर दिया पूरा गाव टापू बना दिया अब वे नदी को पार करके बाहर जाना पड़ता है 
.
(कोसमपाली से लौट के श्वेता शुक्ला )

Saturday, September 26, 2015

Worker shot and injured in ACC-Holcim New Expansion Plant at Jamul

Worker shot and injured in ACC-Holcim New Expansion Plant at Jamul



ACC-Holcim is constructing a huge new state of art Expansion Plant at Jamul, District Durg, Chhattisgarh where construction is underway. In charge of this project is Sunil Gupta. This new plant is right next to the ACC-Holcim old plant (Jamul Cement Works) where our union Pragatisheel Cement Shramik Sangh represents a majority of the 1200 strong force of contract workers. The two plants are physically separated from each other. At the new plant there is a rapid turnover of workers almost entirely brought from outside the state, they are usually housed in a separate housing unit of the company - Gharounda. The management takes ample care to see that our union has no access to the workers of the new plant.

Payment related disputes in the new plant are fairly common as contractors fail to pay regular payments. On 25th Septmber workers working in the Silo at the new expansion plant began demanding 2 months overdue pay from their contractor. Workers were agitated since even the shops which advance them provisions were refusing to do so. Also festival season is round the corner. The grievance of the workers was not resolved. Unfortunately our union could not come to know of this problem on that day.

On the next day 26th September, early in the morning the workers of the new plant again accosted their supervisor/ contractor raised the issue and this time there was a lot of tension in the air. Sunil Gupta heard this and came out of his chamber. He went to the workers and abused them angrily and asked them to get to work. An agitated worker caught hold of him. Seeing this Gupta's security guard fired into the group of workers. One worker got bullet injury in the arm and started bleeding. Instantly the rumour spread that a worker has been shot and killed. Workers who were working at heights in the structures came down and there was a situation of fracas. In anger the workers smashed computers in the office and cars standing outside the new plant. 

When the news reached the old plant, Kaladas  Dehariya, one of our activists in the union office was informed. He came on a bike to the gate of the new plant to find that the injured worker was being taken in an auto to hospital. He began filming this on his mobile phone. Immediately the security people and possibly workers snatched away the phone and smashed it and began kicking and hitting him. By this time the police had arrived. Fortunately one of the policemen of Jamul Police Station recognized Kaladasji and rescued him.Then the police basically cleared out the new plant and all workers left. Some of them however did go to the Police Station and filed an FIR against Sunil Gupta and his security guard (possibly some Kutty?).

Meanwhile word had spread in the old plant. In solidarity and protest, workers of the old plant stopped work and came out and gathered at the gate of the old plant. After some time they took out a procession and had a big meeting of several hundreds of workers at Niyogi Chowk (or ACC Chowk) near the statue of Niyogiji. By this police officials of the ASP and CSP had reached the spot. Our union gave them representations demanding -
a) grievance of the workers in the new plant regarding payment of their outstanding wages be resolved immediately.
b) sunil gupta and his security guard be arrested and prosecuted.
c) a judicial enquiry be made into the incident.

This is not the first time there has been a fracas and violent incidents in the new plant over non-payment of wages. The management is squarely responsible for letting such a volatile situation develop.

Another concern of our union is that on the last occasion also the local ACC-Holcim management had tried to somehow blame our union and activists for the incident. It is very likely that they will do so again and indeed that might be one of the devious motives behind this incident. 

We are in the midst of a serious negotiation with the ACC-Holcim management on the issues of redeployment / absorption / rehabilitation of the contract workers of the old plant, which requires to be clinched before the new plant is commissioned. We fear that the present incident may be utilised by the management to derail these talks.

Sudha Bharadwaj, Lakhan Sahu, Rajkumar Sahu, Kaladas Dehariya, Ramakant Banjare, Bansi Lal Sahu
on behalf of the Pragatisheel Cement Shramik Samgh

बहादुर और निर्भीक महिला कमला काका को नक्सली बनाने पे तुली है छत्तीसगढ़ी पुलिस

बहादुर और निर्भीक महिला कमला काका को नक्सली बनाने पे तुली है छत्तीसगढ़ी पुलिस 

बहादुर और निर्भीक महिला कमला काका को नक्सली बनाने पे तुली है छत्तीसगढ़ी पुलिस 
कोत्तागुडा गाव , बरसगुडा थाना जिला बीजापुर की 26 वर्षीय आदिवासी महिला कमला काका अभी दंतेवाडा में नर्स की पढाई कर रही हैं
कमला काका सारके गुडा फर्जी हत्या कांड की पीड़ित और प्रत्यक्ष दर्शी गवाह है जो बिना किसी डर से पूरी घटना की बात करतीं है .
सारकेगुडा का ऐसा सच जो कभी बाहर नहीं आता यदि ये सच्चाई कमला बाहर नहीं लाती , कमला ने न केवल इस हत्याकांड को दुनिया के सामने स्पस्ट किया बल्कि दुसरे दिन से ही इसका नेतृत्व किया .
                              
सारकेगुडा फर्जी मुठभेड़ 

28 और 29 जून 2012 की रात्रि में तीन गाव कोत्तागुडा ,राजपेंटा और सरकेगुडा के लोग आने वाले त्यौहार बीज पंदुम की तयारी पे चर्चा कर रहे थे , जिसमे गाव के पुजारी ,महिलाय,े पुरुष और बच्चे ,श शामिल थे .
चर्चा चल ही रही थी की करीब 200 सीआरपी के जवानों ने चारो तरफ से घेर के अंधरे में फ़ायर शुरू कर दिया , वे इन सब को माओवादी मान रहे थे , इस फायरिंग में 17 आदिवासी इस रात को मारे गये .जिनमे 7 बच्चे शामिल थे ,10 और 15 साल के बच्चा भी मारा गया .

इस हत्याकांड में कमला काका का भतीजा काका राहुल (नागेश) 10 साल भी शामिल था .

कमला काका की भूमिका

कमला हत्या के अगले दिन ही जिला मुख्यालय बीजापुर में गाव वासियों को लेके पहुची और बताया की किस प्रकार से सीआरपी ने इस घटना को अंजाम दिया हैं , और उन्होने मरने वालो को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया .
घटना के बाद पत्रकार ,राजनेतिक दल और मानव अधिकार समूह और जनसंघटन के लोग गावं में आना शुरू हो गुए , सभी ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया , कमला उस समय बेहद छोटी और स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता मितानिन थी , इस वक्त कमला अदिवासियो की शाश्क्त और साफ साफ बात करने वाली आवाज बन के उभरी . उसने इस सच को दुनिया के सामने लाया और बताया की कैसे फ़ोर्स के लोगो ने चर्चा कर रहे आदिवासियों को मार दिया और कैसे कैसे मारा ,इस क्रूर अन्याय से सबको अवगत कराया .
Times of india interview
Http;//timesofindia.indiatimes.com/city/goa/cant- why-the government -targets-poor-tribals/ articleshow/17072577 , snd the documentaries " Basaguda encounter : kiling of innocent adiwasis in chhattisgarh state "
https://www.youtube.com/watch ?v-Qla-hduwe and "sarkeguda people rejected government's aid" at https:www.youtube.com/watch?v-~kxqlqbir-30 where she feature

कमला काका गाव वासियों के डेलिगेशन के साथ मुख्यमंत्री रमन सिंह और केन्द्रीय गृह मंत्री शुशील शिंदे से भी मिल के न्याय की मांग की .
इतनी मशक्कत के बाद न्यायिक जाँच की घोषणा राज्य सरकार ने कर दी , रिटायर्ड न्यायाधीश व्ही के अग्रवाल को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया .

कमला काका के नेत्रत्व में 14 गाव के लोग 12-13 दिसंबर 2013 की रात को आयोग के सामने हाजिर हुए .
बस इसी दिन से बीजापुर पुलिस ने कमला को धोंस देना शुरू कर दिया की उसे गिरफ्तार कर लिया जायेगा और पुलिस ने सुनोयोजित तरीके से अफवाह फैलाना शुरू कर दिया की कमला नक्सल के साथ है और इसने नक्सल से रुपये लिए है ,इसीलिए पुलिस के खिलाफ अभियान और गवाह दे रही है। .

पुलिस पुरे न्याय आयोग की प्रोसेस को प्रभावित कर रही है , कमला के जीवन को बड़ी थ्रेट मिल रही है पुलिस से की कमला को नक्सल घोषित करके उसपे कोई भी कार्यवाही की जा सके .

आज कमला के जीवन को भारी खतरा पैदा हो गया है,जाँच प्रभावित की जा रही है , उसे कहा जा रहा है की तुझे कभी भी विशेष जन सुरक्षा अधिनियम में गिरफ्तार किया जा सकता है और फर्जी मुठभेड़ करके मारा भी जा सकता है .
हम सब मिलकर इस बहादुर निर्भीक आदिवासी महिला के साथ आये और राष्ट्रपति तथा सुप्रीम कोर्ट से मांग करे की सारके गुडा हत्या की बिना किसी दवाव के जाँच हो और कमला काका को सुरक्षा प्रदान की जाए .

Friday, September 25, 2015

नकारात्मकता (उदासी) की तिजारत करते अंबेडकरवादी -संजीव खुदशाह

नकारात्मकता (उदासी) की तिजारत करते अंबेडकरवादी

💢संजीव खुदशाह
अगर कोई मुझसे कहता की मैं एक कट्टर बौध्द हूँ, या कट्टर आंबेडकरवादी हूँ, तो मैं उसे कट्टर तालीबानी के बराबर ही समझता हूँ। जिनका काम आपसी द्वेश फैलाना है। क्योकि बुध्द और आंबेडकर के विचार कट्टरता खत्म करते है न की बढ़ाते है.
दरअसल, आज तक जितने भी समता आंदोलन हुऐ है। उनमें कट्टरता के बजाय विद्रोह का समावेश रहा है। वे बिना सभी के सहयोग के पूर्णं नही हुये। चाहे शोषक वर्ग ही क्यो न हो। असल में शोषक वर्ग में जन्म लेने का अर्थ यह नही है कि वह केवल और केवल शोषक ही हो। ठीक उसी तरह शोषित वर्ग में जन्म लेने का अर्थ यह नही होता कि वह समता का समर्थक हो। यदि हम वर्ग के भेद को मिटाना चाहते है तो वर्ग भेद को मिटाने का पहला कदम यही होगा कि हम इस आंदोलनकर्ताओं में ही वर्ग भेद को पूरी तरह से मिटा दे। उच्च वर्ग के समतावादी लोगो को अपने साथ लेकर। उसी प्रकार यदि हम जातिभेद को मिटाना चाहते है तो हमें वास्तव में बिना किसी जाति भेद के इस आंदोलन में सभी को साथ ले जो आपके साथ आना चाहते है या मदद कर रहे हैं।
बाबा साहेब डाँ आंबेडकर को मानने वाले ज्यादातर लोग सिर्फ सवर्णो को कोसने, या देवी देवता को नीचा दिखाने को ही आंबेडकरवादी होने का सबसे बडा प्रमाण पत्र मानते है। यदि ऐसा “आंबेडकरवादी” शब्द “समता आंदोलन” का पर्याय माना जाता है और कबीर, फुले, बुध्द को अपना मार्गदर्शक मानता है। तो मेरे ख्याल में यह संसार का सबसे बडा भ्रम है। क्योंकि कबीर फुले और बुध्द की जीवनी को देखे तो ज्ञात होता है की उन्होने विचार को गलत या सही ठहराया, न कि किसी व्यक्ति या जाति को।
खुद डाँ आंबेडकर के करीबी और मददगार ब्राम्हण ही थे। उनके गुरू जिनसे उन्होने अपना सरनेम आंबेडकर प्राप्त किया वे ब्राम्हण ही थे। उनकी दूसरी पत्नी भी ब्राम्हण ही थी। वे सब जिन्होने आंबेडकर को संविधान लिखने के लिए मौका दिया। वे भी ब्राम्हण और सवर्ण ही थे।
मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहर लाल नेहरू सभी बैरिस्टर पास थे उनमें ऐसी कोई कमजोरी नही थी कि वे संविधान नही लिख सकते न ही ऐसी कोई मजबूरी थी कि डाँ अंबेडकर को ही संविधान बनाने की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया जाय।
लेकिन उन्होने ऐसा किया इसका एक कारण था वे डाँ आम्बेडकर की समतावादी नीति के कायल थे। वे इस स्वतंत्र भारत को ये संदेश देना चाहते थे अब भारत विकास की ओर आगे बढे़गा क्योंकि अब यहां समानता है। आंबेडकरी आंदोलन के लोग अपनी गोष्टियों में उन बातो की चर्चा ज्यादा करते जिन्हे उन्हे नकारना है।
उनकी चर्चा कम होती जिन्हे उन्हे स्वीकारना है। इसका असर ये होता है कि आम आदमी इनसे दूर होता जाता है। मैं यह बात उन सभी समतावादी आंदोलन के बारे मे कह रहा हूँ जो दलित, ओबीसी या आदिवासी वर्ग से ताल्लुख रखते है।
आंबेडकरी आंदोलन क्यों अच्छा है ये बताने का काम बहुत कम लोग कर रहे हैं। हिन्दू धर्म में बुराई है ये बार-बार बताने की कोशिश होती है। अक्सर एक आम आदमी हिन्दू धर्म की बुराई सुनकर घबरा जाता है, और विकल्प खोजता है। सही विकल्प नही मिलने के कारण वह अपने शोषण को ही अपनी नियती मानने लगता है। इस कारण ये आंदोलन आज नकारत्मक आंदोलन का पर्याय बन गया है। समतावादी आंदोलन सिर्फ समाज की सच्चाई को आम आदमी तक पहुंचाने का कार्य करेगी तो वह आंदोलन नही एक डाकिये का काम करती है। और डाकिये कभी आंदोलन नही लाते।
बदलाव लाने के लिए उसके पूरे चरण में काम करना होगा। नकारात्मक से ज्यादा सकारात्मक मुद्दो पर बात करनी होगी। अगर कोई चीज गलत है, तो ये बताना होगा सही क्या है और वो सही क्यो है? ये भी बताना होगा।
आज बौध्द धर्म सीमित होता जा रहा है। उसका कारण है। बौध्द धर्म के लिए धर्मांतरित तो काफी लोग हुऐ। उन्हे 22 प्रतिज्ञायें भी दिलाई गई। इसमें से जोर इस बात का ज्यादा दिया गया की क्या नही करना है। क्या करना है उस प्रतिज्ञा को बार बार नही उछाला गया। बौध्द धर्म इसलिए महान है क्योंकि उसकी शिक्षायें सम्यक है। वे संतुलन की शिक्षा देते है। बौध्द धम्म जीवन जीने का एक महान तरीका सिखाता है आश्चर्य की बात है कि यदि बौध्द धर्म के सिर्फ पंच शील का पालन करे तो व्यक्ति का जीवन उन्नति की ओर अग्रसर हो जायेगा।
लेकिन यहां जांच इस बात की होती है की व्यक्ति दिवाली में दिये जलाता है या नही, जांच इस बात की नही होती की वह पंचशील का पालन करता है या नही। इतिहास बताता है कि पहले पूरा भारत बौध्दमय था। और बौध्दों के सारे त्यौहारों को हिन्दू त्योहारों में तबदील कर दिया गया। यही कारण है कि डाँ आम्बेडकर ने धर्म चक्र प्रर्वतन दिवस का दिन दशहरे के दिन को चुना और आज बौध्द इसे अशोक विजय दशमी के नाम से पुकारते है।
उसी प्रकार कुछ इतिहासकार समाज सेवक ये मानते है कि दलित और पिछडा वर्गो के परिवार में घर के अंदर पूजी जाने वाली देवी महामाया कोई और नही बल्कि बुध्द की माता ही है। ऐसे सैकडो सकारात्मक तथ्य हमारे पास है जिन्हे हम लोगो तक पहुचा सकते है।
मैं यहां पर जानकारी देना आवश्यक समझता हूं कि बौद्ध धर्म के पतन के समय हीनयांन-महायान से कुछ पंथ भी तैयार हुए। ये पंथ बौद्ध भिक्षुओं से ही टूटकर बने थे। इन्ही में एक पंथ नाथ सम्प्रदाय था, जिसमें बौध्द धर्म के अवशेष नाम-मात्र के थे। नाथ संप्रदाय आज हिन्दू धर्म के पोषक रूप में जाना जाता है।
भगवान बुध्द की प्रतिमा सभी ने देखी होगी। सारी की सारी प्रतिमाये और चित्र उनकी ध्यान मुद्रा में है। कितने प्रतिशत बौध्द ध्यान लगाने पर जोर देते है? ध्यान से जो उर्जा मिलती है उसका प्रयोग सारे संसार के साधक उपयोग कर रहे है। आज कई नई संस्थाये प्रयोग करती देखी जाती है, और अपने नाम पर मेडिटेशन का प्रचार करती है। जैसे आर्ट आफ लीविंग, पांतंजली योग पीठ आदी। ध्यान या मेडिटेशन के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने का तरिका बुध्द ने ही मानव जाति को सिखलाया था।
इतनी विलक्षण पूंजी को क्या बौध्द आंदोलन के लोग प्रचारित करते देखे जा‍ते है। ये एक ऐसी पूंजी है जिसपर बुध्द का ही कापीराईट है। बावजूद इसके बौध्द प्रचारक इसका प्रचार नही करते। बौध्द प्रचारकों का बौध्द धर्म प्रचार करने का मुख्य आधार होता है हिन्दू धर्म खराब है इसलिए इसे छोडो़। जबकि प्रचार का कारण ये होना चाहिए बौध्द धर्म में ये ये अच्छाइयां है इसलिए इसे अपनाओं।
किसी भी प्रचार के तरिके सकारात्मक होंगे तो परिणाम ज्यादा अच्छे आयेगे। समतावादी आंदोलन की हवा में कुछ संस्थाये उभरी जैसे बामसेफ, आरपीआई, एम्बस, बीएसपी आदि। इन सभी का विचार संस्थागत तौर पर चलता है। यदि उनके प्रमुख ने ये मान लिया की एफडीआई गलत है तो सभी सदस्य बिना किसी दिमाग को खर्च किये ये रटेगे की एफडीआई गलत है। यहां मै किसी बात का समर्थन या विरोध नही कर रहा हूँ। मैं सिर्फ ये बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि इस आंबेडकरी आंदोलन में किसी व्यक्ति के विचार को सुन कर बताया जा सकता है की वह किस संस्था से ताल्लुख रखता है। अभिजात्य वर्ग की शिकायत रही है कि आरपीआई, बामसेफ जैसी कई अम्बेडकरवादी संस्थाये टुकड़ो में बंट गई। जब वे स्वयं साथ नही रह सकती तो अपने समाज को क्या जोड़ सकेगी।
शिकायत बिल्कुल सही है। लेकिन ये प्रश्न मूहबांये खडा है कि ये संस्थाये आपस में एक होकर क्यो नही रह सकी। इसका उत्तर सिर्फ एक है वह ये की इन्होने कभी भी आम्बेडकर की नही माना, न ही इन्होने बुध्द को माना। क्योंकि इन्होने हमेशा नकारात्मकता का ही प्रचार किया। आम्बेडकर कभी भी ऐसे नही थे। न बुध्द ने ऐसे प्रचार को तरजीह दी। इन्होने नकारत्मक को सकारात्मकता से ढांक दिया।
एक आम आदमी को दो वक्त की रोटी सुख और शांती चाहिए। क्या समतावादी आंदोलन आम आदमी की आखरी दो जरूरतो को पूरा कर सकता है। यदि नही तो वह व्यक्ति जिसके पास न रोटी है, न सुख, न शांती उसके लिए आपकी नकारात्मक बाते किसी बकवास से कम नही । उसे सकारात्मक बातें अपनी ओर खींचती है क्योकि उसमें उर्जा है शांति है और उसमें वह अपना भविष्य देखता है।
( संजीव खुद्शाह )
Publish in Forward Press August 2015 issue

Thursday, September 24, 2015

में सामान्य वर्ग से आता हूँ

में सामान्य वर्ग से आता हूँ


मेरे सयुंक्त परिवार में की जवान पीढ़ी में कुल 9 लोग गिने मेने आज,
जो नोकरी करने योग्य थे या कहिये उन्हें नोकरी की जरुरत थी।
उनमे से सौ प्रतिशत लोग निजी कंपनी या कहे कि कारपोरेट की नोकरी करते है .
मेरी पीढ़ी में चार में से तीन भाई सरकारी नोकरी करते थे , और मेरे पिता के परिवार् में भी सब लोग सरकारी नोकरी में थे.
मुझे कभी याद नहीं आता की हमारे घर में कभी आरक्षण को लेके कोई चिंता या नाराजी व्यक्त हुई हो , क्यों की कभी उस वज़ह से कोई परेशानी ही नहीं पड़ी आज तो कार्पोरेट और निजी कंपनी में आरक्षण के कोई मतलब ही नहीं बचा।
मेरे कहने का ये मतलब यह कतई नहीं है की रोजगारी की समस्या ही नहीं है ।
में सिर्फ यह कह रहा हूँ की आरक्षण की बहस दुर्भावना पूर्ण ज्यादा है , वास्तविक कम ।
जैसे मेरे घर के लोग भी गाहे बगाहे आताक्षण के खिलाफ बहस करते मिल जायेंगे जब की उहे इसकी कभी जरुरत ही नही थी.

[ डा लखन सिंह ]