This Blog is dedicated to the struggling masses of India. Under the guidance of PUCL, Chhattisgarh, this is our humble effort from Chhattisgarh to present the voices of the oppressed people throughout India and to portray their daily struggles against the plunder and pillage that goes on against them throughout the country.
छत्तीसगढ़ सरकार ने करीब तीन हज़ार स्कूलों को बंद कर दिया है. ये सभी सरकारी स्कूल थे.
इनमें से ज्यादातर स्कूल आदिवासी बहुल पहाड़ी और जंगली इलाकों में स्थित थे.
आदिवासियों ने सरकार की इस कदम का कड़ा विरोध किया है. उन्होंने इस पर चिंता जताई है कि उनके बच्चे अब पढ़-लिख नहीं पाएंगे.
दलील
आदिवासी बहुल इलाका नारायणपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा में इन स्कूलों को बंद किया गया है. अब इन इलाकों के बच्चों को दूसरे गांवों में जंगल, पहाड़ और दूसरी बाधाएं पार कर जानी पड़ती है.
अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ को एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स में देश के 35 राज्यों में 28वें स्थान पर रखा गया था.
स्कूलों को बंद करने के फ़ैसले पर राज्य सरकार की दलील है कि या तो इन स्कूलों में छात्रों की तदाद बहुत कम थी और नज़दीक के इलाक़े में ही कोई दूसरा सरकारी स्कूल चल रहा है इस वजह से ये फ़ैसला लिया गया है.
इसके अलावा शिक्षकों की कमी और इमारत जैसे भी दूसरे कारण इसके पीछे सरकार की ओर से बताए गए हैं.
सरकार ने इसे एक 'तर्कपूर्ण कार्रवाई' बताया है.
गुस्सा
राज्य के स्कूली शिक्षा मंत्री केदार कश्यप का कहना है, "सरकार का यह कदम शिक्षा के स्तर को सुधारेगा. अब नए सत्र में हमारा मकसद साढ़े छह लाख बच्चों को स्कूल में दाखिला करवाना है"
लेकिन आकड़े बताते हैं कि सुविधाओं में कमी और स्कूलों के दूर-दराज के इलाके में होने की वजह से 2011 से 2012 के बीच एक साल में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या 64,860 से बढ़कर 76204 हो गई है.
पूर्व शिक्षा मंत्री और कांग्रेस के विधायक सत्यनारायण शर्मा का कहना है, "सरकार का यह प्रयोग सभी के लिए शिक्षा के कल्याणकारी उद्देश्य के ख़िलाफ़ है. आदिवासियों में भी इस क़दम को लेकर गुस्सा है."
एमक्यूएम के नेता अल्ताफ़ हुसैन के पोस्टर के साथ एक समर्थक.
पाकिस्तान की पार्टी मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के नेताओं ने ब्रिटिश अधिकारियों को बताया है कि उन्हें भारत सरकार से फंडिंग मिली.
बीबीसी को पाकिस्तान के विश्वसनीय सूत्रों से यह जानकारी मिली है.
ब्रिटिश अधिकारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग और एमक्यूएम की एक प्रॉपर्टी से मिली हथियारों की एक सूची की जाँच कर रहे हैं. एक पाकिस्तानी अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि पिछले 10 सालों में भारत ने सैकड़ों एमक्यूएम चरमपंथियों को ट्रेनिंग दी है.
भारतीय अधिकारियों ने इस दावे को 'पूरी तरह आधारहीन' बताया है. एमक्यूएम ने इन दावों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.
प्रशिक्षण का भी आरोप
एमक्यूएम पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है, नेशनल एसेम्बली में उसके 24 सदस्य हैं.
एमएक्यूएम के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने ब्रिटिश अधिकारियों को एक औपचारिक और रिकॉर्डेड पूछताछ में बताया था कि उन्हें भारत से फंडिंग मिलती है, ऐसी जानकारी बीबीसी को मिली है.
इस बीच एक पाकिस्तानी अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि भारत ने एमक्यूएम के सैकड़ों चरमपंथियों को विस्फोटकों, हथियारों और विध्वंसक गतिविधियों की ट्रेनिंग पूर्वोत्तर और उत्तर भारत के कैम्पों में दी है.
इस पाकिस्तानी अधिकारी ने बताया कि 2005-06 के पहले एमक्यूएम के कुछ मझोले स्तर के कुछ सदस्यों को ट्रेनिंग दी गई थी, हाल में बड़ी संख्या में एमक्यूएम सदस्यों को प्रशिक्षण दिया गया जिनमें से ज्यादातर पार्टी के जूनियर स्तर के सदस्य थे.
ये दावा कराची पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी राव अनवर के बयान के बाद आया है कि एमक्यूएम के दो गिरफ्तार चरमपंथियों ने कहा है कि उन्हें भारत में ट्रेन किया गया. अप्रैल में अनवर ने बताया कि कैसे ये दो शख्स भारत की इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ से प्रशिक्षण लेने के लिए थाईलैंड होते हुए भारत गए. इसके जवाब में एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन ने राव अनवर की कड़ी निंदा की.
‘भारत का खंडन’
एमक्यूएम को भारत की ओर से फंड और ट्रेनिंग दिए जाने के दावे के बारे में पूछे जाने पर लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने कहा, "शासन की कमियों को पड़ोसियों पर आरोप लगाकर सही नहीं ठहराया जा सकता."
ब्रिटिश अधिकारियों ने 2010 में एमक्यूएम की जांच शुरू की, जब एक वरिष्ठ पार्टी नेता इमरान फारुक़ की उनके उत्तरी लंदन स्थित घर के बाहर चाकू मारकर हत्या कर दी गई. उस जांच के दौरान पुलिस को एमक्यूएम के लंदन ऑफिस और एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन के घर से 5 लाख पाउंड मिले. इस वजह से मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर दूसरी जांच शुरू हो गई.
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, जिन्हें बीबीसी विश्वसनीय मानता है, जांच के दौरान ब्रिटेन के अधिकारियों को एक लिस्ट मिली, जिसमें एमक्यूएम की एक प्रॉपर्टी में मोर्टारों, ग्रेनेडों और बम बनाने वाले उपकरणों सहित हथियारों का ब्योरा था, इस लिस्ट में हथियारों की क़ीमत भी दर्ज थी. लिस्ट के बारे में पूछे जाने पर एमक्यूएम ने कोई जवाब नहीं दिया.
जैसे-जैसे ब्रिटिश पुलिस की जांच आगे बढ़ी ब्रिटिश अदालतों का रुख़ एमक्यूएम के प्रति सख़्त होता गया. 2011 में एक ब्रिटिश जज ने शरण दिए जाने के एक मामले की अपील पर सुनवाई करते वक़्त पाया कि, "एमक्यूएम ने कराची में अपने खिलाफ खड़े होने वाले 200 से ज्यादा पुलिस वालों की जान ली है."
'ठोस सुबूत'
पिछले साल एक अन्य ब्रिटिश जज ने ऐसे ही एक अन्य केस की सुनवाई करते हुए कहा, "इस बात के पुरजोर और ठोस सुबूत हैं कि एमक्यूएम दशकों से हिंसा कर रहा है."
पाकिस्तान में भी एमक्यूएम दबाव में है. मार्च में देश के सुरक्षा बलों ने पार्टी के कराची मुख्यालय पर छापा मारा. उन्होंने दावा कि उन्हें वहां बड़ी मात्रा में हथियार मिले हैं. एमक्यूएम ने कहा कि हथियार वहां प्लांट किए गए थे.
नेशनल असंबेली में 24 सदस्यों के साथ एमक्यूएम पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची की राजनीति में लंबे समय से प्रमुख ताकत बनी हुई है. इस पार्टी को मुहाजिरों (बँटवारे के समय भारत से पाकिस्तान गए लोग) के बीच ठोस समर्थन प्राप्त है.
मुहाजिर शिकायत करते हैं कि पाकिस्तान में उनसे लगातार भेदभाव किया जाता है. एमक्यूएम जोर देकर कहता है कि वो एक शांतिपूर्ण, सेकुलर पार्टी है जो पाकिस्तान के मध्यवर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करती है.
अल्ताफ हुसैन बीस साल से ज्यादा वक्त से ब्रिटेन में आत्म-निर्वासन में रह रहे हैं. 2002 में उन्हें ब्रिटिश पासपोर्ट मिला. कई सालों से इस पार्टी पर कराची में हिंसा का सहारा लेने के आरोप लगते रहे हैं.
वित्तीय हेराफेरी का मामला
अल्ताफ हुसैन समेत एमक्यूएम के कई अधिकारी मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में गिरफ्तार हो चुके हैं लेकिन किसी को चार्ज नहीं किया गया है. पार्टी ज़ोर देकर कहती है कि इसका फंड वैध है और उसका ज्यादातर हिस्सा कराची के व्यापारिक समुदाय से चंदे के रूप में मिला है.
भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर भारत में चरमपंथी हमलों को प्रायोजित करने के आरोप लगाता रहा है. मसलन, भारत माँग करता रहा है कि 2008 के मुंबई हमले की साज़िश रचने और उसे संचालित करने वाले संदिग्धों के खिलाफ पाकिस्तान कड़ी कार्रवाई करे.
एमक्यूएम केस के ताजा घटनाक्रम से जाहिर होता है कि अब पाकिस्तान ऐसी शिकायतों के जवाब में भारत से कराची में हिंसक ताकतों को स्पॉन्सर करना बंद करने की मांग करेगा.
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एक बड़े पत्रकार, एक सच्चे मानवतावादी'प्रफुल्ल बिदवई
अमित सेनगुप्ताएसोसिएट प्रोफ़ेसर, आईआईएमसी, दिल्ली
43 मिनट पहले
साझा कीजिए
क़रीब दो हफ़्ते पहले की बात है, प्रफुल्ल बिदवई मछली खाना चाहते थे. उन्हें पता था कि मेरे पड़ोस में बंगाली खाने का कारोबार करने वाले सागर चटर्जी मेरे दोस्त हैं. चटर्जी ने साइकिल पर अपने कारोबार की शुरुआत की थी.
सागर और उनकी पत्नी स्वादिष्ट पूर्वी बंगाली व्यंजन बनाते हैं. मैंने प्रफुल्ल को फ़ोन करके उनके यहाँ खाने का न्योता दिया.
उन्होंने बताया कि वो भारतीय वामपंथ की चुनौतियाँ विषय पर अपनी किताब के आखिरी हिस्से को लिखने में काफ़ी थक गए हैं और एक ब्रेक की उन्हें सख्त जरूरत है.
भारत और दुनिया के वामपंथ के इतिहास की उनके विशद ज्ञान से रूबरू होने का भी ये एक बढ़िया मौक़ा था. प्रफुल्ल ने अपनी जवानी में मुंबई की ट्रेड यूनियन आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी थी.
कुछ लोग जानते हैं कि प्रफुल्ल ने लेबर मूवमेंट पर किताबों का श्रमसाध्य लेखन और संपादन किया है.
तीक्ष्णता और अध्यवसाय
उनमें अकादमिक तीक्ष्णता और उनके आईआईटी बॉम्बे के दिनों के वैज्ञानिक अध्यवसाय का बेजोड़ मिश्रण था.
आईआईटी की पढ़ाई उन्होंने बीच में ही छोड़ दी थी. उसके बाद उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से समाज और राजनीति की खुली आलोचनात्मक पड़ताल शुरू की.
उनकी आखिरी प्रकाशित किताब 'द पॉलिटिक्स ऑफ़ क्लाइमेट चेंज एंड द ग्लोबल क्राइसिसः मार्टगेंजिंग ऑवर फ़्यूचर' एक जटिल और गूढ़ विषय पर लिखी गई मास्टरपीस है. ऐसे विषय पर इतना समर्पित अथक परिश्रम प्रफुल्ल ही कर सकते थे.
मैंने उनके खस्ताहाल डेस्कटॉप कम्प्यूटर पर इस किताब का एक चैप्टर टाइप करने में उनकी मदद की थी.
तब मैं इस बात का गवाह बना कि किसी चैप्टर को काग़ज़ पर लिखने, फिर से लिखने और फिर उसमें सुधार करने में कितनी मेहनत लगी होगी.
गठबंधन की ज़रूरत
प्रफुल्ल कहते थे, "हमें व्यापक परिदृश्य देखना है. भविष्य में आसन्न युद्ध, जलवायु परिवर्तन, सैन्यवाद, प्रभुवर्ग की बढ़ती दौलत और भोगविलास, भयावह व्यापक ग़रीबी और अन्याय, फासीवाद का सामना करने के लिए सभी नागरिक समूहों, पीस एक्टिविस्टों, संयुक्त वामदलों, नारीवादियों, समाजवादियों और पर्यावरण आंदोलनों को एक नॉन-सेक्टेरियन गठजोड़ बनाना होगा. उम्मीदों की एक नई राजनीति."
किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा, "अाखिरकार, जलवायु का एजेंडा तभी बदल सकता है जब शोषित वर्ग को जलवायु मुद्दों से जुड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए. जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ संघर्ष और समतावादी विकास में उनका काफ़ी कुछ दाँव पर लगा है. जलवाय परिवर्तन से मुख्य रूप से वही प्रभावित होते हैं. जलवायु संकट का समेकित समाधान तभी हो सकेगा जब जलवायु और विकास से जुड़े एजेंडे ज़मीनी आंदोलन से नियंत्रित होंगे."
बर्फ़ बिल्कुल नहीं
प्रफुल्ल मुझसे मिलने के लिए दो मेट्रो बदलकर पूर्वी दिल्ली में एक पत्रकार दोस्त के घर पहुँचे.
वो दोस्त शाकाहारी है. उसने अपनी पसंद की चीजें, हींग के तड़के वाली अरहर की दाल और बैगन का भुर्ता इत्यादि बनाया.
लेकिन इसके साथ बोनस था पूर्वी बंगाल के स्टाइल में बनाया हुआ प्रॉन मलाई करी और सरसों के तले में बनी रोहू.
इसके साथ ही ठीकठाक मात्रा में पहले की बची हुई 'डैलमोर' सिंगल माल्ट व्हिस्की भी थी. प्रफुल्ल सचमुच खुश हुए.
प्रफुल्ल हमेशा बारीकी पसंद करते थे. उस दिन भी उन्होंने ख़ालिश व्हिस्की, कुछ बूंद सादा पानी के साथ ली, बर्फ़ बिल्कुल नहीं.
तारीफ़ और आलोचना
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार.
वो हाल ही में अगरतला से लौटे थे. उन्होंने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार का लंबा इंटरव्यू किया था.
त्रिपुरा में सीपीएम को लगातार कई जीत दिलाने वाले अपने इस ईमानदार कम्यूनिस्ट के लिए उनके पास तारीफ ही तारीफ थी.
उन्होंने पूछा कि सीपीएम मानिक सरकार को ईमानदारी और नेतृत्व के शानदार प्रतीक के रूप में क्यों नहीं पेश करती?
साथ ही उन्हें ये भी लगता था कि मानिक सरकार अगर आधिकारिक वामपंथी माइंटसेट से बाहर निकलकर ज़्यादा कल्पनाशीलता दिखाएं तो बेहतर होगा, ख़ासकर इस 'दक्षिणपंथी फासीवादी उभार' के दौर में.
उन्होंने पूछा था, आखिर जब सड़कों पर उतरना चाहिए तब वामपंथी पार्टियाँ अपने दड़बे में क्यों फंस जाती हैं?
प्रफुल्ल को पता था. शीर्ष वामपंथी नेताओं के साथ उनका खुला संवाद था.
वामपंथी नेताओं से संवाद
एक बार उनकी छत पर 'लंच' में रोमिला थापर, कई शीर्ष संपादकों, वाइस-चांसलरों के साथ तीन शीर्ष वामपंथी नेता बार के पास मुझे नज़र आए. असल में उन नेताओं ने एक बूंद भी नहीं पी फिर भी वो वहाँ मौजूद थे.
बीटी रणदिवे और बासवपुन्नैया से लेकर एबी बर्धन और प्रकाश करात तक भारतीय वामपंथ के आलोचनात्मक आख्यान के प्रफुल्ल अभिन्न अंग थे.
वो आईआईटी मद्रास के आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ पूरे देश एवं अन्यत्र हुए प्रतिरोध से बहुत उत्साहित थे.
वो ग़ुस्से में कह रहे थे, "सीता (सीताराम येचुरी) को एकजुटता दिखाने के लिए तुरंत आईआईटी जाना चाहिए था. वो ज़ेनोफ़ोबिया को बढ़ावा देने वालों शक्तियों के ख़िलाफ़ प्रगतिशील बहसों से जुड़ने के ऐसे शानदार मौक़े कैसे छोड़ सकते हैं."
आत्मविश्लेषण
उस रात वो आत्म विश्लेषण के मूड में थे. उन्होंने कहा कि दुनिया को बेहतर बनाने में उन्होंने अपने तरीके से योगदान किया है. वो बोले, "प्रगतिशील ताकतों ने दुनिया को बेहतर बनाया है."
उन्होंने कहा, "ऐसे निराशावादी समय में भी मुझे उम्मीद है कि भारतीय समाज में सच्चा लोकतंत्र, न्याय और बराबरी आएगा. मुझे जनसंघर्ष में पूरा भरोसा है. मुझे अब भी वामपंथ में भरोसा है."
नरेंद्र मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर उनका लिखा लेख इस मुद्दे पर लिखे सबसे अच्छे लेखों में एक था.
वो भी तब जब मोदी की तारीफ़ों की बाढ़ आई हुई थी और कई मीडिया वाले उनके सामने बिछने के तैयार दिख रहे थे.
हर लेख से पहले वो कई इंटरव्यू करते थे, तथ्यों की गहन छानबीन और शोध करते थे. वो पत्रकारों को नियमित फ़ोन करके उनकी राय जानते रहते थे.
लिखना जारी रखो
विभिन्न विषयों पर पूरी दुनिया की मीडिया में छपने वाले उनके लेखों में आपक एक भी हल्का वाक्य नहीं मिलेगा.
उनके लिखे का एक-एक शब्द, तथ्य, विचार और अवधारणा एक विलक्षण मस्तिष्क में तपने के बाद सामने आते थे.
उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हें लिखना नहीं छोड़ना चाहिए. लिखते रहो, हफ़्ते दर हफ़्ते."
वामपंथ पर अपनी नई किताब के शीर्षक में वो जीजिविषा और पुनरुत्थान के क्षण के लिए फ़ीनिक्स के मिथक का उपयोग करना चाहते थे. ग्रीक मिथकों के अनुसार फ़ीनिक्स पक्षी मरने के बाद अपनी राख से जी उठता है.
इस किताब के ज़्यादातर चैप्टर उन्होंने पूरे कर लिए थे.
मिलती रहेगी प्रेरणा
मैंने उनसे कई बार कहा था कि उन्हें हर्बर्ट मार्क्यूज की 'एन एसे ऑन लिबर्टी' जैसी एक किताब लिखनी चाहिए.
ये उनके लिए आकर्षक विचार था. लेकिन अब उनके जाने के बाद वो निबंध कभी नहीं लिखा जा सकेगा.
फिर भी, मानव मुक्ति पर प्रफुल्ल बिदवई का विलक्षण और लंबा आख्यान हमेशा जीवित रहेगा और दूसरों को प्रेरित करता रहेगा.
(अमित सेनगुप्ता आईआईएमसी, नई दिल्ली में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.)
साठ किलोमीटर पैदल चलके आदिवासी पहुंचे संघर्ष को ,सुकमा
आदिवासियों की ज़मीनों को छीन कर बड़े उद्योगपतियों को देने के लिए छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार आदिवासियों को डराने के लिए आदिवासियों की हत्या करवा रही है , आदिवासी महिलाओं से पुलिस भेज कर बलात्कार करवा रही है , निर्दोष युवकों को फर्ज़ी मुकदमे बना कर जेलों में ठूंस रही है .
इन सब सरकारी क्रूरता के विरुद्ध आदिवासियों ने सत्याग्रह शुरू किया है . एक सप्ताह से चल रहे धरने को तोंगपाल से सुकमा जिला मुख्यालय में ले जाने का निर्णय लिया गया . साठ किलोमीटर लंबा सफर पैदल ही करने का निर्णय लिया गया .
कल रात दस हज़ार से ज़्यादा आदिवासी महिलायें बुज़ुर्ग बच्चे तीस किलोमीटर पैदल चल कर कूकानार गाँव के पास रात को जंगल में सोये .
आज सुबह आदिवासियों का मार्च फिर से शुरू हुआ है . इस पूरे अहिंसक संघर्ष में सोनी सोरी आदिवासियों के साथ है .
आदिवासियों के इस अहिंसक संघर्ष से घबराई हुई भाजपा सरकार धमकियों पर उतर आयी है . पुलिस अधिकारियों ने आदिवासियों को धमकी दी है कि अगर तुम आदिवासी लोग यह रैली करोगे तो पुलिस तुम्हारे गांव में आकर आदिवासियों के पूरे गाँव को जला देगी .
रमन सिंह के दमन राज के खात्मे की उल्टी गिनती शुरू .
आरटीआई कार्यकर्ता गुरु प्रसाद शुक्ला की हत्या के लिए भ्रष्टाचारी सपा सरकार जिम्मेदार- रिहाई मंच कार्यकर्ता गुरु प्रसाद शुक्ला की हत्या के लिए भ्रष्टाचारी सपा सरकार जिम्मेदार- रिहाई मंच सूबे में हो रहा इंसाफ का कत्ल, अखिलेश फिल्मों की शूटिंग में मशगूल ट्रान्सफर पोस्टिंग के खेल ने साबित किया प्रदेश पुलिस है आपराधिक गिरोह अखिलेश सरकार पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार और सपा जिलाध्यक्षों की आपराधिक रिकार्ड पर जारी करे श्वेत पत्र
लखनऊ 13 जून 2015। रिहाई मंच ने कहा कि शाहजहांपुर में पत्रकार की हत्या के बाद जिस तरीके से बहराइच में आरटीआई कार्यकर्ता गुरू प्रसाद शुक्ला की दिन दहाड़े हत्या, आरटीओ चुन्नी लाल पर बेसिक शिक्षा एवं बालपुष्टाहार मंत्री कैलाश चैरसिया द्वारा थप्पड़ तानने और उन्हें जान से मारकर गंगा में फेंकने की धमकी ने साबित कर दिया है कि सपा सरकार इंसाफ मांगने की हर आवाज का कत्ल कर देना चाहती है। मंच ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के कई आईपीएस अधिकारियों और पूर्व डीजीपी ए. सी. शर्मा व ए. एल. बनर्जी तथा आगरा के समाजवादी पार्टी नेता शैलेन्द्र अग्रवाल की मिलीभगत से चल रहे ट्रान्सफर-पोस्टिंग के काले खेल की पूरी कलई जिस तरह से हर रोज परत दर-परत खुल रही है उसने सपा सरकार के काले कारनामों को एक बार फिर से बेनकाब कर दिया है। रिहाई मंच ने अखिलेश सरकार से उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार और सपा जिलाध्यक्षों की आपराधिक रिकार्ड पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग करते हुए उनकी अवैध आय की जांच के लिए न्यायिक आयोग की गठन की मांग की है।
रिहाई मंच के नेता राजीव यादव ने आरोप लगाते हुए कहा कि जगेन्द्र सिंह की हत्या के बाद अखिलेश यादव ने सपा के जिला अध्यक्षों की अगुवाई में दुष्प्रचार विरोधी टीम गठित करने के नाम पर सूबे में इंसाफ मांगने वालों की हत्या करने के लिए अपराधियों की एक संगठित टीम बनाई है। बहराइच के गौरा गांव में आरटीआई कार्यकर्ता गुरु प्रसाद शुक्ला की हत्या जिसकी तस्दीक करती है। एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री होने के नाते होना तो यह चाहिए था कि तत्काल पत्रकार जगेन्द्र सिंह की हत्या, बलात्कार आरोपी और खनन माफिया मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा को बर्खास्त करते हुए जेल की सलाखों के पीछे भेजते। पर अखिलेश यादव का यह कहना कि राज्य में विकास का माहौल है, फिल्मों की शूटिंग चल रही है, विदेशी निवेश कर रहे हैं, सौहार्द का माहौल है जो साबित करता है कि उनके मंत्रियों और पुलिस द्वारा हत्या रिश्वतखोरी में वह बराबर की भागीदार हैं। प्रदेश ही नहीं पूरा देश पत्रकार जगेन्द्र सिंह और आरटीआई कार्यकर्ता गुरु प्रसाद शुक्ला की हत्या पर स्तब्ध है और अंधेर नगरी का यह चैपट राजा फिल्मों की शूटिंग में मशगूल है।
रिहाई मंच नेता हरे राम मिश्र ने कहा कि शैलेन्द्र अग्रवाल के पकड़े जाने के बाद जिस तरह से थानेदारों और इंस्पेक्टरों की ट्रान्सफर, पोस्टिंग और प्रमोशन में बीस-बीस लाख रुपए लेने की बात सामने आ रही है वह साबित करता है कि पूरा का पूरा पुलिस विभाग ही बिक चुका है। यह जांच का विषय है कि इन सब पुलिस अधिकारियों ने प्रमोशन के लिए कितने फर्जी एनकांउटर किए, फर्जी मुकदमें और नाजायज वसूली की, इन सब की भी गहराई से जांच की जाए। हरे राम मिश्र ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश पुलिस में ट्रान्सफर-पोस्टिंग का खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है और इसकी कमाई ऊपर बैठे सत्ता के लोगों तक जा रही है और यही वजह है कि चाहे वह कानपुर दंगे की माथुर जांच कमेटी में आरोपी बनाए गए ए. सी शर्मा हों या फिर हत्या का मुकदमा दर्ज होने के बाद खुले घूम रहे डीजीपी विक्रम सिंह और बृजलाल, इन लोगों की यही काली कमाई इनके लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।
रिहाई मंच राज्य कार्यकारिणी सदस्य अनिल यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस में जिस तरह से अंडरवल्र्ड की तरह रिश्वत के लिए बकरा, मुर्गा, शर्ट, मिठाई आदि कोडवर्ड का प्रयोग किया जाता है वह साबित करता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस आपराधिक गिरोह में तब्दील हो चुकी है। ऐसी भाषा तो फिल्मों में ’डी’ कंपनी के माफिया इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह से महिलाओं के अश्लील फोटोग्राफ के कारोबार में क्राइम ब्रांच पुलिस आरोपी बनी है ठीक इसी तरह एटीएस-एसटीएफ के अधिकारियों-कर्मचारियों पर सादे ड्रेस में फर्जी गिरफ्तारियों और धन उगाही के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा के नाम पर नागरिकों से अवैध वसूली और उत्पीड़न कर रही उत्तर पुलिस की इन विशेष आपराधिक दस्तों को प्रदेश सरकार तत्काल भंग करे। द्वारा जारी शाहनवाज आलम प्रवक्ता, रिहाई मंच 09415254919
Govt transfers environment clearance of 19 coal blocks to new allottees
The 19 coal blocks are located in Jharkhand, Chhattisgarh, West Bengal, Madhya Pradesh, Maharashtra and Odisha
Press Trust of India | New Delhi
June 22, 2015 Last Updated at 15:02 IST
The Centre has so far transferred the environment clearance (EC) of 19 coal blocks out of approved 29 mines from the earlier allottees to the new successful bidders including JSW Steel, GMR Chhattisgarh Energy, Jaypee Cementand Ambuja Cementsamong others.
In a bid to expedite operations from the recently allocated coal mines, the Environment Ministry had amended EC norms after a request made by the Coal Ministry to facilitate transfer of ECs to successful coal bidders.
"We have so far transferred the ECs of 19 coal blocks to new allottees. We have already issued the transferred letters," a senior Environment Ministry official told PTI.
The 19 coal blocks are located in Jharkhand, Chhattisgarh, West Bengal, Madhya Pradesh, Maharashtra and Odisha. These blocks have a combined coal production capacity of over 22 million tonnes per annum (mtpa), the official added.
Of 19 coal blocks, the Environment Ministry had issued transferred letters for four coal blocks in April, nine blocks in May and six blocks in the current month, according to the data maintained by the Ministry.
So far this month, the Ministry has transferred the ECs of six blocks from earlier allottees to JSW Steel, GMR Chhattisgarh, Jaypee Cement, Aumbuja Cement, Araanya Mines Pvt and Bharat Aluminium Company.
The Ministry transfered the ECs to these companies with some conditions, the official added.
"Any change in scope of work will attract the provision of Environment Protection Act (EPA) 1986 and Environment Impact Assessment (EIA) Notification 2006 in conjunction with the subsequent amendments/circular," said the letters sent to these companies.
That apart, "all conditions stipulated in the EC letter shall remain unchanged. The successful bidder shall be liable, if any, for any act of violation of the EPA 1986, EIA notification 2006/ subsequent amendments and circulars which it has inherited during the transfer.
"The successful bidder should be liable for compliance of all court directions, if any," the letters said.
As per earlier norms, the EC for any project was allowed to be transferred to another applicant with a written 'no objection' by the transferor, to and by the regulatory authority concerned.
Now, the ministry has made amendments to the September 2006 EIA notification, allowing transfer of EC to new coal blockallottees without taking 'no objection' nod from previous owners.
The EC norms were eased as new coal block allottees feared that old allottees would create problems in transferring EC with no objection nod, thus delaying the commencement of mining operations.
The Centre auctioned 29 blocks in two phases to companies like Monnet, GMR Chhattisgarh, Hindalco, Reliance Cement among others, garnering about Rs 2 lakh crore.
The auction followed the Supreme Court's cancellation of 204 coal blocks last year.