Sunday, May 31, 2015

देवास : जहाँ खो गए हैं सैकड़ों तालाब

देवास : जहाँ खो गए हैं सैकड़ों तालाब

Author: 
 मनीष वैद्य
.मध्यप्रदेश में पानी के नाम पर एक बड़े गड़बड़-घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। आश्चर्य है कि यहाँ तालाब के तालाब ही खो गए हैं। सरकारी दस्तावेजों में जहाँ तालाब दिखाए गए हैं, वहाँ पानी तो दूर कीचड़ तक नजर नहीं आ रहा है यानी पूरा सफेद झूठ। प्रशासनिक अमले को जब इसकी खबर लगी तो वह हक्का–बक्का रह गए। आनन–फानन में जाँच शुरू हुई। पहले ही दिन अधिकारियों के हाथ–पैर फूल गए। खेत–खेत घूमते रहे अधिकारी पर तालाबों का कहीं अता–पता नहीं चला। तीन दिन की जाँच में ही 107 तालाबों का सत्यापन किया तो पता लगा कि इनमें से 100 तालाब गुमशुदा हो गए हैं।

मध्यप्रदेश में एक जिला है देवास। बीते सालों में पानी के लिए यहाँ कई बड़े काम हुए हैं और देशभर में खूब नाम भी हुआ लेकिन इस बार देवास का नाम बदनाम हुआ है बलराम तालाबों में सब्सिडी डकारने के लिए बड़े पैमाने पर हुई धांधली की वजह से। जन सुनवाई कर रहे जिला कलेक्टर को किसी किसान ने शिकायत की कि उन्हें बलराम तालाब का पैसा नहीं मिला, रिकॉर्ड देखने पर पता लगा कि इसमें तो पैसा निकला है। आखिरकार फैसला किया कि मौके पर जाकर ही पता करेंगे तो अधिकारियों की शामत आ गई। ऐसा भी कभी होता है, इतना बड़ा अधिकारी कैसे किसी के खेत तक जायेगा, वह भी जरा सी शिकायत का पता करने। टालने और गुमराह करने की कोशिश हुई लेकिन कलेक्टर भी अड़ गए। फिर तो वही हुआ जिसका अन्देशा था। अधिकारियों ने देखा तो जहाँ बलराम तालाब होना था, वहाँ तो लहसुन के पौधे लहलहा रहे थे। जमीनी अमले से पूछा–कहाँ है तालाब तो सबकी सिट्टी – पिट्टी गुम। कौन क्या बोले। उन्होंने आस-पास के खेत देखे, शाम हो गई पर कहीं नहीं मिले बलराम तालाब।

आनन–फानन में पूरे इलाके के बलराम तालाबों के कागज निकाले गए और अधिकारियों के दल पहुँचे खेत–खेत। लेकिन जमीन पर तालाब हो तो किसी को मिले भी, तालाब तो खुदे ही नहीं थे, तो मिलते कहाँ से। सब कुछ कागजों में ही हो गया। कागजों में खुद भी गए तालाब और सरकार का पैसा भी खर्च हो गया। अधिकारियों के दल ने पहली खेप में 107 तालाब का सर्वे किया तो उन्हें मिले केवल सात तालाब यानी 100 तालाब कागजों पर ही। इन सौ तालाबों का इलाके में किसी को पता नहीं था।

अब तो कलेक्टर खासे नाराज हुए, उन्होंने भरी बैठक में कृषि अधिकारियों को लताड़ लगाते हुए जिले भर में इस योजना के तहत बने करीब दो हजार तालाबों के सत्यापन करने का आदेश दे दिया। साथ ही प्रारम्भिक जाँच में दोषी मिले 13 अफसर व मातहतों को निलम्बित कर दिया है। अब अधिकारी गाँव–गाँव, खेत–खेत जाकर मुआयना कर रहे हैं। पता लगा रहे हैं गुमशुदा तालाबों का।

देवास के जिस जिरवाय गाँव में सबसे ज्यादा घोटाला मिला, वहाँ हम पहुँचे तो दंग रह गए। 5 हजार की जनसंख्या वाले इस गाँव में कृषि विभाग ने खेत का बरसाती पानी खेत में ही सहेजने, संरक्षित करने और उसका सिंचाई तथा जल स्तर बढ़ाने के लिए 107 तालाब बनाने की मन्जूरी दी और थोड़े दिन बाद कृषि अधिकारियों, पंचायत और राजस्वकर्मियों ने तस्दीक भी कर दिया कि यहाँ इतने तालाब मौके पर बन चुके हैं। सरकार के खजाने से पैसा निकला और सब ने बाँट भी लिया। किसी को यकीन ही नहीं था कि कभी इसका खुलासा भी होगा। सरकार की योजना है कि अपने खेत पर तालाब बनाने पर 40 से 50 फीसदी तक इसके लागत खर्च में सब्सिडी दी जाती है। इसी सब्सिडी को डकारने के लिए यह पूरा गड़बड़-घोटाला हुआ। किसान सज्जन सिंह के खेत पर जहाँ हम खड़े थे, वहाँ तालाब का पानी हिलोरे लेते नजर आना था पर वहाँ कीचड़ तक नहीं था, बल्कि लहसुन के पौधे लहलहा रहे थे।

यह अकेले जिरवाय की कहानी नहीं है, जिले में ऐसे दर्जनों गाँव हैं जहाँ बड़ी तादाद में सरकारी खर्च से बलराम तालाब बनाये गये हैं। बीते 4 सालों में ही दो हजार से ज्यादा तालाब जिले में बनाये गए हैं और अब उनकी जाँच की जा रही है। बलराम तालाब योजना देवास में 2007-08 में लागू हुई थी। इसमें कुछ किसान आगे आये और उन्होंने तालाब बनवाये भी लेकिन ज्यादातर ने पैसों के लालच में जमीनी कर्मचारियों से साँठ–गाँठ कर रुपये डकार लिए। कुछ किसानों ने हमारे सामने यह आरोप भी लगाया कि जिन किसानों ने कर्मचारियों को कमीशन देने से मना किया, उन्हें इस योजना से दूर ही रखा गया। आरोप तो यह भी है कि इतने बड़े घपले की जाँच बहुत धीमी गति से चल रही है। इससे दोषियों को बचने का मौका मिलेगा। बीते 4 महीनों में कृषि विभाग जाँच रिपोर्ट ही तैयार नहीं करा पाया है। वहीं अन्य जिलों में भी इस आशय की जाँच नहीं कराई गई है।

इन्होंने बताया कि -


मामले के सामने आते ही हमने पूरे जिले में बनाये गये बलराम तालाबों की जाँच सत्यापन कराने का आदेश दिया है। शुरूआती जाँच में दोषी कर्मचारियों पर भी कार्रवाई की गई है।(आशुतोष अवस्थी, जिला कलेक्टर, देवास)

कलेक्टर के आदेश पर कार्रवाई की जा रही है। कुछ क्षेत्रों में तालाबों के सत्यापन में गड़बड़ी मिली है, सम्बन्धित कर्मचारियों को निलम्बित भी कर दिया है। जाँच रिपोर्ट जल्दी ही जिला कलेक्टर को सौंप देंगे। (जीके वास्केल, उप संचालक कृषि, जिला देवास)

यह सब बहुत पहले से चल रहा है, पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। अब भी यदि कलेक्टर सक्रिय नहीं होते तो इसी तरह गड़बड़ी चलती रहती। (सुनील पटेल, किसान, जिरवाय जिला देवास)

लेखक से सम्पर्क - 11 – ए, मुखर्जी नगर, पायोनियर स्कूल चौराहा, देवास म.प्र 455001, मोबा.नं. 9826013806

क्या पार्रिकर ने शपथ का उल्लंघन किया? आतंकवादी के खिलाफ आर्मी तैयार करेगी आतंकवादी

क्या पार्रिकर ने शपथ का उल्लंघन किया? आतंकवादी के खिलाफ आर्मी तैयार करेगी आतंकवादी 

  • 31 मई 2015
मनोहर पार्रिकर
रक्षा मंत्री को एक बड़ी छड़ी रखनी चाहिए, लेकिन बोलना उन्हें नरमी से चाहिए.
लेकिन मनोहर पार्रिकर के रूप में भारत को इससे उलट रक्षा मंत्री मिला है; यानी छड़ी तो छोटी है लेकिन बातें बड़ी बड़ी हैं.
बीती 21 मई को उन्होंने सरकारी नीति के रूप में ‘आतंकवादियों’ के इस्तेमाल की बात कही थी.
बकौल परार्रिकर, “कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में यहां पर बातचीत नहीं की जा सकती.”
हालांकि इसके बाद उन्होंने इन चीजों पर खुलकर बात की. उन्होंने कहा, “यदी कोई देश, चाहे वो पाकिस्तान ही क्यों न हो, हमारे देश के ख़िलाफ़ कुछ साज़िश रच रहा है तो हम निश्चित रूप से कुछ आक्रामक क़दम उठाएंगे.”

पढ़ें विस्तार से

मनोहर पार्रिकर
उन्होंने एक हिंदी कहावत का इस्तेमाल करते हुए कहा, “कांटे से कांटा निकालना. हम आतंकवादियों से केवल आतंकवादियों के मार्फत ही निपट सकते हैं. हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? हमें ये करना चाहिए.”
भारत, ‘आतंकियों के ख़िलाफ़ आतंकियों के इस्तेमाल’ की रणनीति अपना चुका है और उसमें असफल भी हो चुका है.
यह रणनीति कश्मीर में भी असफल हो चुकी है, जहां 1960 के दशक में कांग्रेस सरकार ने सेना और जमात ए इस्लामी व अन्य इस्लामी गुटों के हथियारबंद विरोधियों को खुली छूट देने का फैसला किया था.
यह प्रयोग जल्द ही ख़त्म हो गया है और इसके नेता कुक्का पारे को बाद में चरमपंथियों ने मार डाला.
ऐसा ही एक प्रयोग मध्य भारत में भी असफल हो गया है, जहां सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ हथियारबंद गुटों को मैदान में उतारा, जो असहाय आबादी के ख़िलाफ़ ही खड़े हो गए.

हंगामा

पी चिदम्बरम
गौर करने की बात है कि इन अनुभवों को ध्यान में रखते हुए एक मंत्री को सोच समझकर वो बात बोलनी चाहिए जो पार्रिकर ने बोला.
ज़ाहिर तौर पर विपक्ष इस पर हैरान है. पूर्व गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने कहा, “रक्षा मंत्री का यह सबसे ख़ौफ़नाक बयान है. मैं उम्मीद करता हूं कि अपने बयान की गंभीरता का उन्हें एहसास है और वो जल्द ही इसे वापस ले लेंगे.”
उन्होंने कहा, “यूपीए के दस सालों के शासन के दौरान पाकिस्तान के किसी भी हिस्से में भारत ने कोई भी आतंकवादी या अपराधिक तत्व नहीं भेजे और मुझे विश्वास है कि एनडीए सरकार ने भी ऐसा नहीं किया और ना ही करेगी... उनका बयान सच्चाई से पूरी तरह अलग है और उन्हें तत्काल इसे वापस लेना चाहिए.”
लेकिन पार्रिकर ने जो कुछ कहा था उस पर एक और दांव चला. उन्होंने 26 मई को कहा कि वो ‘भारत की रक्षा करने के लिए किसी भी स्तर तक’ जाएंगे और ‘जो हमला करेंगे उन्हें उसी अंदाज़ में’ जवाब दिया जाएगा.

शेखी और मुसीबत

सरताज़ अजीज़
पाकिस्तान में इस बयान को उसके दावे की पुष्टि की तरह देखा गया कि भारत पाकिस्तान में बलूचिस्तान और अन्य जगहों पर हस्तक्षेप कर रहा है और देश के ख़िलाफ़ हिंसा को मदद कर रहा है.
ऐसा बयान कुछ सेकेंड के लिए तालियां बटोर सकता है लेकिन लंबे समय के लिए नुकसानदायक होता है.
कुछ महीने पहले एक कोस्ट गार्ड अधिकारी ने एक पाकिस्तानी नौका को डुबाने की शेखी बघार कर ऐसी ही ग़लती की थी और मुसीबत में फंस गया था.
मेरे ख्याल से, पार्रिकर ने एक मंत्री के रूप में शपथग्रहण के दौरान ली गई दो शपथों का उल्लंघन किया है.
शपथ के शब्द थे, “संविधान और क़ानून के अनुसार वो काम करेंगे”, लेकिन ‘आतंकवादियों के इस्तेमाल’ वाला उनका बयान इस शपथ का उल्लंघन है.
दूसरी शपथ थी गोपनीयता बनाए रखने की. सभी सरकारें छूट लेती हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क़ानून अस्पष्ट है, लेकिन कुछ मंत्री इसके बारे में डींग मारने लगते हैं.

शपथ का उल्लंघन?

मनोहर पार्रिकर
पार्रिकर की गोपनीयता शपथ उन्हें इस बात के लिए बाध्य करती है कि ‘वो अपना कर्तव्य निभाने के लिए ज़रूरी चीजों के अलावा, सीधे या अप्रत्यक्ष तरीक़े से किसी व्यक्ति या व्यक्तियों से ऐसे किसी मामले में चर्चा नहीं करें जो उनके संज्ञान में लाई जाएगी.’
लेकिन अगर वो वाकई सरकारी नीति का खुलासा कर रहे थे तो उनकी यह बयानबाजी उनके कर्तव्य निभाने कि लिए ज़रूरी नहीं थी.
पार्रिकर स्वीकार करते हैं कि भारत एक ग़रीब देश है जिसके पास बहुत सीमित संसाधन हैं.
एक रैंक एक पेंशन की मांग कर रहे सेवानिवृत्त कर्मचारियों से पार्रिकर ने कहा, “लोग इसकी वित्तीय जटिलताओं के बारे में नहीं जानते हैं.”
और इस तरह वो इसमें हो रही देरी को सही ठहराते हैं.

कितना काम हुआ?

रफ़ाएल
उनके मंत्री बनने के बाद से भारतीय वायु सेना 36 नए रफ़ाएल लड़ाकू विमान हासिल करेगी. जबकि क़रार 126 विमानों का था. यह कई कारणों से हो सकता है लेकिन निश्चित रूप से बजट इसमें एक अहम कारण रहा होगा.
पार्रिकर ने माउंटेन वॉरफ़ेयर टुकड़ी बनाने की योजना में भी कटौती कर दी और अब 80 हज़ार की जगह 35 हज़ार जवानों की भर्ती होगी.
वो कहते हैं कि इन बड़ी बड़ी स्कीमों के लिए “पैसा कहां है?” वो ये सही ही कह रहे हैं.
उन्हें अपनी ऊर्जा और समय को, अपनी ‘छड़ी’ को बड़ी करने मे लगाना चाहिए न कि शेखी बघारने में.
(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैंं )
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शरण की तलाश ऐसे आठ हज़ार से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान लोग भारत भी आए हैं.- बर्मी वो तो सांप से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं'

शरण की तलाश ऐसे आठ हज़ार से ज़्यादा  रोहिंग्या मुसलमान लोग भारत भी आए हैं.



बर्मी  तो सांप से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं'

  • 2 घंटे पहले
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जौहरा बेगम
जौहरा बेगम बर्मा वापस नहीं जाना चाहतीं.
दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहने वाली जौहरा बेगम के पास न रहने का स्थायी ठिकाना है, न नियमित काम और न ही बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम, फिर भी यहां ज़िंदगी उन्हें सुकून भरी लगती है.
सुकून इसलिए क्योंकि यहां उन्हें बर्मा के उन बौद्ध लोगों का डर नहीं है, जिन्हें वो 'सांप से भी ख़तरनाक' मानती हैं.
जौहरा बेगम का संबंध बर्मा के उस अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान समुदाय से है, जिसे संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन 'दुनिया के सबसे प्रताड़ित' लोगों में गिनते हैं.
बड़ी तादाद में बर्मा छोड़कर भाग रहे ज़्यादातर रोहिंग्या यूं तो मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया का रुख करते हैं, लेकिन शरण की तलाश ऐसे आठ हज़ार से ज़्यादा लोग भारत भी आए हैं.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

रोहिंग्या बस्ती में नहाते बच्चे
दिल्ली स्थित रोहिंग्या बस्ती में नहाते बच्चे
दिल्ली में रोहिंग्या लोगों की बस्ती में जाते ही सबसे पहले मेरी नज़र पानी में छप-छप करते बच्चों पर पड़ी. कूड़ेदान के एक डिब्बे में भरे पानी में ये बच्चे गर्मी से छुटकारा पाने में जुटे थे.
रोहिंग्या लोगों की ज़िंदगी के चारों ओर का घेरा भी शायद उतना ही तंग है, जितना ये कूड़ेदान का डिब्बा इन पांच बच्चों की धमाचौकड़ी करने के लिए तंग है.
रोहिंग्या लोगों का संबंध बर्मा के पश्चिमी प्रांत रखाइन से है जहां इनकी आबादी 10 लाख से ज़्यादा बताई जाती है, लेकिन बर्मा की सरकार ने कभी इन्हें अपना नागरिक नहीं माना.
वहां इन लोगों को ना ज़मीन जायदाद ख़रीदने का हक है, और ना ही पढ़ने लिखने का. उनके आने जाने पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं.
यही नहीं, उन पर बहुसंख्यक ‘बौद्ध लोगों के अत्याचारों’ की ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आती रही हैं.
जौहरा बेगम कहती हैं, “कोई नहीं चाहता कि अपना देश, अपना घर छोड़ कर ऐसे दर दर भटके. लेकिन ऊपर वाले ने हमारी क़िस्मत ऐसी ही लिखी है.”
वो बताती हैं, “वहां बहुत ज़ुल्म होता है. पुलिस किसी को भी पकड़कर ले जाती है, डर से कोई बाहर नहीं निकलता है, मेहनत मजदूरी भी नहीं कर सकते हैं.”
दिल्ली में ही रह रहे रोहिंग्या युवक अब्दुस शकूर बताते हैं, “मुसलमान गांवों में अधिकारी आते हैं और जगह खाली करने के लिए कहते हैं. वहां की सरकार में कोई मुसलमान नहीं है, इसीलिए दिक्कत है.”

टकराव

रोहिंग्या मुस्लिम लड़का, दिल्ली, भारत
रखाइन प्रांत में बहुसंख्यक बौद्धों के लिए रोहिंग्या लोगों की मौजूदगी हमेशा से चिंता और रोष का विषय रही है और वो उन्हें बांग्लादेश से भागकर आए मुसलमान मानते हैं, जिन्हें बर्मा से चले जाना चाहिए.
रखाइन प्रांत में वर्ष 2012 में बड़े दंगे हुए जिनमें लगभग 200 लोग मारे गए. ये दंगे एक बौद्ध महिला के बलात्कार और फिर उसकी हत्या के बाद शुरू हुए और इसका इल्ज़ाम तीन रोहिंग्या लोगों पर लगा.
इसके बाद मार्च 2013, अगस्त 2013, जनवरी 2014 और जून 2014 में भी अल्पसंख्यक रोहिंग्या और बहुसंख्यक बौद्धों के बीच हिंसक टकराव हुआ, लेकिन जान गंवाने वालों में ज़्यादातर रोहिंग्या ही बताए जाते हैं.
अब्दुस शकूर कहते हैं, “छोटे-छोटे बच्चों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा. मैं और मेरा परिवार जान बचाने के लिए पहले बांग्लादेश गए और फिर वहां से भारत आए. यहां हम आराम से रह सकते हैं.”
जौहरा बेगम कहती हैं कि बर्मा में न पुलिस उनकी सुनती है और न हुकूमत, तो फिर इंसाफ़ की उम्मीद किससे करें.
वो तो यहां तक कहती हैं, “किसी के घर में जवान बेटी उन्हें अच्छी लगती है तो पुलिस वाले उसे अपने साथ ले जाते हैं, उसका बलात्कार करते हैं.”
बौद्ध लोगों के बारे में वो कहती हैं, “वो जानवर से भी बदतर हैं. हम सांप से नहीं डरेंगे, लेकिन उनसे डरेंगे. वो हमारे लिए सांप से भी ज्यादा खतरनाक हैं.”

मानवीय त्रासदी

भारत में रहने वाली रोहिंग्या मुस्लम लड़की साजिदा
साजिदा परचून की दुकान चलाती हैं.
इसी बस्ती में छोटी सी परचून की दुकान पर बैठी लगभग 10 साल की साजिदा के लिए भारत ही उसका घर है.
वजह पूछने वो कहती हैं, “वहां बहुत जुल्म होता है, मैंने तो बर्मा देखा नहीं, लेकिन मेरी मां बताती है कि उधर बहुत ज़ुल्म होता है. बड़ा हो या छोटा सबको काट देते हैं.”
ऐसे हालात में, हज़ारों की तादाद में रोहिंग्या लोग बर्मा छोड़ कर भाग रहे हैं. वो नौकाओं पर सवार होकर समंदर में तो निकल जाते हैं, लेकिन कोई भी देश उन्हें लेने को तैयार नहीं है.
ऐसे में हज़ारों लोग समंदर में फंसे रहते हैं. कइयों की नौकाएं डूब जाती हैं, कुछ बीमारियों की भेंट चढ़ जाते हैं जबकि कई लोग मानव तस्करों के हाथों में पड़ जाते हैं.
बहुत से रोहिंग्या ये सोचकर मलेशिया और इंडोनेशिया का रुख़ करते हैं कि मुस्लिम-बहुल देश होने के नाते वहां उन्हें शरण मिलेगी, लेकिन ये इतना आसान नहीं होता. ये दोनों ही देश रोहिंग्या लोगों से हमदर्दी तो रखते हैं लेकिन उन्हें अपने यहां शरण नहीं देना चाहते.
उन्हें डर है कि शरण दी तो और हजारों लोगों को भी आने का प्रोत्साहन मिलेगा, जिसका असर उनकी अर्थव्यवस्था के साथ साथ सामाजिक ताने बाने पर भी पड़ेगा. यहीं चिंता थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया की भी है.

ग़रीबी सबसे बड़ी समस्या

रोहिंग्या मुसलमान बच्चे और महिलाएँ
बर्मा से पलायन कर रहे रोहिंग्या मुसलमान बच्चों और महिलाओं का दल इंडोनेशिया में शरण लिए हुए.
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय प्रवासी संगठन के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन साल में लगभग एक लाख बीस हज़ार रोहिंग्या लोगों ने नौकाओं पर सवार होकर बर्मा छोड़ने की कोशिश की है.
कई हज़ार रोहिंग्या लोगों ने भारत का रुख़ भी किया है. दिल्ली में यूएनएचसीआर की प्रवक्ता शुचिता मेहता कहती हैं, “हमारे पास अप्रैल 2015 के आंकड़े हैं जिनके मुताबिक 8,330 रोहिंग्या शरणार्थी भारत में हैं और इनमें से 2360 लोगों ने भारत में शरण के लिए आवेदन किया है.”
ये लोग दिल्ली के अलावा, जम्मू, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं.
शुचिता मेहता बताती हैं कि भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों की सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी है क्योंकि सीमित शिक्षा के साथ ये लोग खुद को एक विदेशी शहरी वातावरण में पाते हैं.
यूएनएचसीआर की प्रवक्ता के मुताबिक यहां रहने वाले ज़्यादातर रोहिंग्या लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं और कभी-कभी उनका शोषण भी होता है, मसलन पूरा मेहनताना नहीं दिए जाने की भी शिकायतें मिलती हैं.
इसके अलावा बच्चों का स्कूल में दाखिला न होना और रहने की स्थायी जगह न होने जैसी समस्याओं का सामना भी ये लोग कर रहे हैं, फिर भी वो अपनी ज़िंदगी सुकून में बताते हैं.

‘अभी बर्मा गए तो..’

रोहिंग्या मुस्लिम
रोहिंग्या मुस्लिम (फ़ाइल फ़ोटो).
वापस बर्मा जाने की बात पर अब्दुस शकूर कहते हैं, “अभी गए तो हमें भी मार देंगे. बर्मा तब जाएंगे जब वहां भी भारत की तरह प्रधानमंत्री चुना जाएगा, सबकी बात सुनी जाएगी.”
लेकिन अभी इसकी संभावना नहीं दिखती. सुधारों पर जोर देने वाले बर्मा के राष्ट्रपति थेन सेन को इसी साल बौद्धों के व्यापक विरोध के बाद रोहिंग्या लोगों को मतदान का अस्थायी अधिकार देने वाले क़ानून को वापस लेना पड़ा. बर्मा में इसी साल आम चुनाव होने हैं.
फिलहाल अब्दुस शकूर का सपना है कि भारत में ही मोबाइल रिपेरिंग का काम सीख कर वो अपनी दुकान खोलें.
वहीं जौहरा बेगम चाहती है कि जैसे-तैसे उनके बच्चे पढ़ लिख जाएं जबकि नन्हीं साजिदा की तमन्ना है कि पहले ख़ुद पढ़ें और फिर टीचर बन कर दूसरे लोगों को पढ़ाएं.
हालांकि जिस स्कूल में ये सब बच्चे पढ़ने जाते हैं, वो कुछ समय से बंद है क्योंकि टीचर की तन्ख्वाह का इंतजाम नहीं हो पाया.

सीजी नेट स्वर की पहल - शुरू हुई हिंदी और गोंडी के बीच दूरी खत्म करने की शुरुवाद

सीजी नेट स्वर की पहल 

शुरू हुई हिंदी और गोंडी के बीच दूरी खत्म करने की शुरुवाद 

Posted:   Updated: 2015-05-31 10:05:46 ISTRaipur : began initiative to eliminate distance between Hindi and Gondi
सीजीनेट स्वर (वैकल्पिक मीडिया का समूह) में कार्यकर्ता रविकांत पेन्द्रे तथा कमल गौड़ ने भी उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद नौकरी को न कहा है।
रायपुर. माओवादी प्रभावित कुछ इलाके में बच्चों का रोजाना स्कूल पहुंचना ही बड़ी बात मानी जाती है। मगर विपरीत परिस्थितियों में बड़ी डिग्रियां लेने के बावजूद वे नौकरी को न कह दें। कम ही होता है। ऐसे ही कुछ आदिवासी नौजवान बदलाव की इबारत लिखते हुए नया रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में एकत्रित हुए हैं।
पत्रकारिता और वकालत की डिग्रियां लेने वाले और अंग्रेजी जैसी कुछ भाषाओं के अच्छे जानकार लालसू नोगोटी ने हर तरह की नौकरी को न बोला है। छत्तीसगढ़ से सटे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में जुब्बी जैसे मारिया गौड़ जनजाति बहुल गांव के यह होनहार युवा असल में आदिवासी बिरादरी के लिए बदलाव की बारहखड़ी लिखना चाहते हैं।
वे पुलिस और नक्सलियों की लड़ाई को मिटाने के लिए गोड़ी बोली की दोस्ती हिंदी से कराना चाहते हैं। मगर नौकरियों को न कहने और संवाद से समाधान कराने के लिए आगे आने वाले वे अकेले युवा नहीं है। सीजीनेट स्वर (वैकल्पिक मीडिया का समूह) में कार्यकर्ता रविकांत पेन्द्रे तथा कमल गौड़ ने भी उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद नौकरी को न कहा है।
युवा सीख रहे गोंडी
कमाल की बात है कि रविकांत पेन्द्रे और कमल , गौड़ होने के बावजूद अपनी गोंडी बोली नहीं जानते। इसलिए उन जैसे कई आदिवासी सीजीनेट स्वर द्वारा आयोजित नाट्य संगीत कार्यशाला में इन दिनों गौड़ी सीख रहे है। कमल बताते हैं कि कई गौड़ इलाकों में गोंडी विलुप्त हो चुकी है। वजह है कि युवाओं में अपनी ही बोली को लेकर हीनभावना है। इसलिए वे अपनी संस्कृति की अच्छी बातों का प्रसार करने के लिए फिर से अपनी ही बोली सीखेंगे।
गोंडी से ही समाधान
लालसू नोगोटी के मुताबिक हिंसा प्रभावित इलाकों में पुलिस, वकील और अधिकारी जनजातियों की जुबान नहीं जानने के चलते न तो उनकी समस्या से परिचित है, न संवेदनओं से। लिहाजा गोंडी बोली के जानकार शिक्षित युवा जंगल में रहते हुए यदि आदिवासी अधिकारों की लड़ाई लड़ेंगे और प्रचार-प्रसार के लिए आगे आएंगे तभी बदलाव संभव है। सुंभ्राशु चौधरी मानते हैं कि मध्य भारत में माओवाद की समस्या की जड़ में भी गोंडी और हिन्दी बोलने वालों के बीच एक तरीके की दूरी जिम्मेदार है। आदिवासी जमात की बोली और संवाद से बड़ी से बड़ी समस्याएं आसानी से सुलझ सकती हैं। हिन्दी और आदिवासी जमात के बीच 36 का आंकड़ा है। जरूरत है संवाद के जरिए इसे 63 में बदला जाए।
नया रायपुर से निकलेगी यात्रा
पत्रकार गोंडी नहीं बोल पाते, इसलिए उनकी बातें दबी रह जाती हैं। लिहाजा इस कार्यशाला में जनपत्रकारिता यात्रा की तैयारी चल रही है। इसमें छत्तीसगढ़ और अन्य आदिवासी राज्यों में उनके मुद्दों को नाटकों के जरिए दिखाया जाएगा। इसमें गोंडी, हिंदी और शहरी समूहों ने परस्पर मिलकर न केवल एक-दूसरे की जुबान सीखी बल्कि हिन्दी गौड़ी के फ्यूजन से नाटकों की नई सीरीज तैयार की है।
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Saturday, May 30, 2015

क्या कश्मीर से भी हटेगा अफ़्सपा? बीबीसी

क्या कश्मीर से भी हटेगा अफ़्सपा?

  • 1 घंटा पहले
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भारतीय सेना
त्रिपुरा से सेना को विशेषाधिकार देने वाला क़ानून, अफ़्सपा, हटाए जाने के बाद अब भारत प्रशासित कश्मीर में भी इसे हटाने की माँग तेज़ हो गई है.
मुख्यधारा की कुछ राजनीतिक पार्टियाँ कश्मीर से अफ़्सपा हटाने की मांग कर रही हैं.
अलगाववादी संगठनों ने भी त्रिपुरा की तरह कश्मीर से भी अफ़्सपा हटाने की मांग कर राजनीतिक पार्टियों को मुश्किल में डाल दिया है.
भाजपा के साथ राज्य में गठबंधन सरकार चला रही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने कहा है कि राज्य में सुरक्षा हालात बेहतर हुए हैं. अफ़्सपा जैसे क़ानून हटाए जाने चाहिए ताक़ि ज़मीन पर भी यह बदलाव दिखे.

'कश्मीरियों की आवाज़ सुनें'

पीडीपी के प्रवक्ता डॉक्टर महबूब बेग़ ने कहा, "ये तथ्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के लोग ही इस राज्य के हितों के सबसे बड़े रक्षक हैं. लोकतांत्रिक तरीक़े से उठाई गईं उनकी जायज़ मांगों को सुना जाना चाहिए ताक़ि विश्वास की कमी पूरी हो और वे ख़ुद को अलग ना मानें."
भारतीय सेना
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के कुछ इलाक़ों में 1990 में अफ़्सपा लगाया गया था.
उन्होंने कहा कि प्रांत के लोकतांत्रिक संस्थानों के विकास के लिए यह ज़रूरी हैं कि उनमें 'संरक्षणात्मक हिरासत' की भावना ना हो.
बेग ने कहा कि लोगों को सुरक्षा के मुद्दे पर राहत देने के लिए अस्फ़पा हटाया जाना अहम है.
हालांकि भाजपा का कहना है कि वह राष्ट्रीय हित के मामलों में किसी को समझौता नहीं करने देगी.

नेशनल कॉन्फ़्रेंस भी हटाने के पक्ष में

जम्मू-कश्मीर में विपक्षी दल नेशनल कांफ़्रेंस का कहना है कि प्रांत के शांत हिस्सों से अफ़्सपा हटाए जाने का यही सही वक़्त है.
पार्टी नेता नासिर असलम वानी ने कहा, "जम्मू-कश्मीर के अधिकतर इलाक़ों में हालात सामान्य हो गए हैं. कई इलाक़े ऐसे हैं जहाँ सुरक्षा बलों की कोई भूमिका ही नहीं है. ऐसे इलाक़ों से जल्द से जल्द अफ़्सपा हटना चाहिए."
सैयद अली शाह गीलानी
गिलानी कहते हैं कि अफ़्सपा कश्मीर पर भारत के क़ब्ज़े का नतीजा है.
उन्होंने कहा कि अपनी सरकार के दौरान उनकी पार्टी लगातार इसकी माँग करती रही थी और सेना के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो सका.
कांग्रेस का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को राहत दी जानी चाहिए लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की क़ीमत पर नहीं.
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, "ऐसा क़ानून होना चाहिए जो कश्मीर में सैन्य बलों के संचालन में मदद करे, साथ ही कश्मीर के लोगों को भी राहत मिलनी चाहिए."

'पूरी आज़ादी से हल'

भारतीय सेना
सेना का कहना है कि अफ़्सपा पर फ़ैसला राज्य और केंद्र सरकार को लेना है.
हुर्रियत कांफ़्रेंस ने त्रिपुरा के फ़ैसले का स्वागत करते हुए इसे जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए आँख खोलने वाला बताया है.
मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने कहा, "त्रिपुरा का अफ़्सपा हटाना एक साहसी फ़ैसला है. ये जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए आँख खोलने वाला है. हालांकि यहाँ सरकार की क़ानून हटाने की कोई इच्छा नहीं है."
अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने कहा, "यह भारतीय क़ब्ज़े का ही एक नतीजा है. पूरी आज़ादी इस सबको ख़त्म कर देगी."
क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर सरकार भी प्रांत में क़ानून को बेअसर कर सकती है अगर वो इस संबंध में अपना गजट नोटिफ़िकेशन वापस ले ले.
जम्मू-कश्मीर सरकार ने छह जुलाई 1990 को नोटिफ़िेकेशन जारी किया था जिसमें प्रांत के कुछ इलाक़ों को हिंसा प्रभावित घोषित किया गया था जिसके बाद वहाँ अफ़्सपा लागू हो गया था. साल 2000 में जारी एक नोटिफ़िकेशन में जम्मू को भी हिंसा प्रभावित घोषित कर दिया गया था.
हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील जफ़र अहमद शाह कहते हैं कि यदि राज्य सरकार की मंत्री परिषद राज्यपाल के पास इस नोटिफ़िकेशन को हटाने का प्रस्ताव भेजती है तो राज्यपाल को उसे मानना होगा.
अलगाववादी नेता उमर फ़ारूख
अलगाववादी नेता उमर फ़ारूक़ का कहना है कि सरकार नहीं चाहती की अफ़्सपा हटे.

'राज्य सरकार चाहे तो हटा ले'

राज्य के महाधिवक्ता रेयाज़ जान कहते हैं कि नोटिफ़िकेशन वापस लेने का अधिकार उसी के पास होता है जो उसे जारी करता है. अगर सरकार ने नोटिफ़िकेशन जारी किया है तो वो उसे वापस भी ले सकती है.
हालांकि सेना की पंद्रहवी कोर के कमांडिंग ऑफ़िसर लेफ़्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा कहते हैं, "जहाँ तक कश्मीर का सवाल है, राज्य और केंद्र सरकार अफ़्सपा के मुद्दे पर विचार कर रही हैं. इसे वापस लेने का फ़ैसला भी वे ही ले सकती हैं."
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