Wednesday, January 4, 2017

वजूद के लिए जूझती कलाकारों की बस्ती : दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी पर विस्थापन का संकट

बुधवार, 4 जनवरी 2017

वजूद के लिए जूझती कलाकारों की बस्ती : दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी पर विस्थापन का संकट


आजादी के बाद जब देश इंसानी इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन को देख रहा था उसी समय भाटों के सात डेरे आकर  दिल्ली की मौजूदा कठपुतली कॉलोनी  में जम गए. इन डेरों को अब यहीं जम जाना था. पानी की जरूरत के लिए एक तालाब भी बनाया गया. धीरे-धीरे देशभर की कला से जुड़ी जातियां यहां आकर बसने लगी। तीन पीढ़ियों से रह रहे इस कठपुतली कॉलिनी पर अचानक फिर विस्थापन का खतरा मंडराने लगा है कारण रेहजा बिल्डर्स को इस जमीन पर अपने एक प्रोजेक्ट के लिए चाहिए। रहेजा का कहना है कि 190 मीटर ऊंची और 54 मंजिला यह इमारत दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत होगी. इसमें 170 लग्जरी फ्लैट, एक स्काई क्लब और हेलीपेड बनाए जा रहे हैं। हम यहां आपके साथ कठपुतली कॉलोनी के जन्म से लेकर विस्थापन के खिलाफ उनकी लड़ाई तक पर विनय सुल्तान की यह विस्तृत रिपोर्ट साझा कर रहे है;

यह पश्चिमी राजस्थान का कोई भी दूर-दराज का गांव हो सकता है. लोग रात का खाना खाकर मंदिर के खाली मैदान में जमा हैं. लकड़ी के तख्ते और कपड़े की मदद से चार फीट के लगभग का एक मंच बनाया गया है. काले कपड़े पहने एक कठपुतली, जो एक जोगी का किरदार अदा कर रही है, चिलम पीती है और धुआं छोड़ती. सब लोग हैरान हैं कि कठपुतली धुआं कैसे छोड़ सकती है? लेकिन तभी उस मंच के पीछे से किसी के खांसने की आवाज आती है. इस भांडाफोड़ पर सब लोग ठठ्ठे मार कर हंसने लगते हैं. आखिर में महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक लम्बी छलांग लगा कर नाला पार करता है. ढपली पर घोड़े की टाप बजती है. मंच पर चार चक्कर काट कर घोड़ा गायब हो जाता है.

परियोजना के मुताबिक बस्ती के लोग दो साल के लिए आनंद पर्वत (दिल्ली में पश्चिम उत्तर का एक इलाका) में बने ट्रांजिट कैम्प जाएंगे. दो साल के बाद उन्हें इसी जमीन पर अपना एक फ्लैट मिलेगा

जब मैं शादीपुर बस डिपो से सटे हुए कठपुतली कॉलोनी पहुंचा तो मेरे साथ अनेक स्मृतियां थीं. वो भागीरथ भाट जो दीपावली के अगले दिन नियम से घर आता और एक सांस में मेरे 20 पुरखों के नाम बता देता. घोड़े की वो टाप जो ढपली से निकल कर दिमाग में चिपक गई थी. लेकिन कॉलोनी के मुहाने पर मिले इंसानी बस्ती के सबसे सनातनी सबूत. मल और कीचड़ से बजबजाती नाली. भीतर घुसने के तीसरे मिनट में आपको इस बात का अहसास हो जाएगा कि यह जगह इंसानों के रहने लायक तो नहीं है. हालांकि यह सड़क पर खेल-तमाशा दिखाने वाले कलाकारों यानी स्ट्रीट आर्टिस्टों की अपने आप में अनोखी और सबसे बड़ी बस्ती है. राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार, आंध्र प्रदेश से आए लगभग 3500 कलाकार परिवार यहां बसे हुए हैं.

किस इलाके में कहां जाकर डेरे डालना सुरक्षित है, कहां पर पानी आसानी से मिल जाएगा, घुमंतू जातियों में यह जानकारी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती है. आजादी के बाद जब देश इंसानी इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन को देख रहा था उसी समय भाटों के सात डेरे इस जगह आकर जम गए. इन डेरों को अब यहीं जम जाना था. पानी की जरूरत के लिए एक तालाब भी बनाया गया. धीरे-धीरे देशभर की कला से जुड़ी जातियां यहां आकर बसने लगी.


बस्ती के बाहर लगे दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के कैम्प में गहमागहमी का आलम है. लोग यहां आकर एक करारनामे पर दस्तख्त कर रहे हैं. इस करारनामे के मुताबिक बस्ती के लोग दो साल के लिए आनंद पर्वत (दिल्ली में पश्चिम उत्तर का एक इलाका) में बने ट्रांजिट कैम्प जाएंगे. दो साल के बाद उन्हें इसी जमीन पर अपना एक फ्लैट मिलेगा. इसके लिए इन्हें 1.12 लाख रुपये देने होंगे. साथ ही पांच साल रख-रखाव के लिए तीस हजार रुपये भी देने होंगे.

डीडीए कैम्प में एक बड़ा एलसीडी टेलीविजन रखा हुआ है. इस पर कठपुतली कॉलोनी के पुनर्वास पर एक वीडियो दिखाया जा रहा है. इस वीडियो में नए बनने वाले फ्लैट का नक्शा दिखाया जा रहा है. दो कमरों वाले इन फ्लैट को देखने पर आपको लगेगा कि इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता. बढ़िया बने हुए पार्क ओपन एयर थियेटर और भी तमाम सुविधाएं. मेरे पास बैठी पतासी भाट बड़ी हसरत से उस वीडियो को देख रही हैं. बीच में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का एक टुकड़ा भी दिखाया जाता है. इसमे वे कह रहे हैं, ‘क्या दिल्ली में लोगों को झुग्गी-झोपड़ी में गुजारा करना पड़े अच्छी बात है? इसलिए भाइयों-बहनों मेरा एक सपना है. 2022, जब भारत की आजादी के 75 साल होंगे, हमारे यहां दिल्ली में हर झुग्गी-झोपड़ी को अपना पक्का घर मिले. मैं यह सपना सच करना चाहता हूं.’ वीडियो खत्म होता है और पतासी मुझसे मुखातिब होती हैं, ‘हमें भी अपना अच्छा घर चाहिए. किसको दिल्ली में अपना घर नहीं चाहिए. लोग अपनी मर्जी से ट्रांजिट कैम्प जा रहे हैं. ‘

मीटिंग में 100 से ज्यादा महिलाएं जुटी हुई हैं. पुरुष ना के बराबर हैं. घिसे-पिटे राजनीतिक नारों के साथ जमीन ना छोड़ने की कसमें खाई जा रही हैं. इतने में किसी घर से पत्थर चल जाता है

हालांकि अपने घर का यह सपना इस बस्ती के लोगों को पहली बार नहीं दिखाया गया है. 1986 में कठपुतली कॉलोनी को वसंत कुंज लेकर जाने की बात हुई. इसके बाद 1990 में डीडीए के स्लम विंग के आर्किटेक्ट अनिल लाल ने इस बस्ती के पुनर्वास की एक योजना पेश की. 1996 में इस बस्ती को महरौली स्थानांतरित करने के प्रयास किए गए. 2002 में सांसद रघुनाथ झा के सवाल का जवाब देते हुए तत्कालीन शहरी विकास मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि द्वारका के पॉकेट-बी सेक्टर-16 में बने 1446 जनता फ्लैट कठपुतली कॉलोनी के लोगों के लिए सुरक्षित किए गए हैं. 

2007 में डीडीए ने फिर से इस कॉलोनी के पुनर्वास पर काम करना शुरू किया. ‘झुग्गी मुक्त दिल्ली 2021’ के मास्टर प्लान के तहत इस बस्ती के पुनर्वास को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर रेखांकित किया गया. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के इस प्रोजेक्ट के लिए निविदा मंगाई गई. कुल आठ निविदा में से रहेजा बिल्डर्स को सबसे मुफीद पाया गया.

छह अक्टूबर 2009 में रहेजा और डीडीए के बीच हुए करार के मुताबिक प्रोजेक्ट में दो कमरे के 2641 फ्लैट, पार्क, ओपन एयर थियेटर, दो स्कूल जैसी सुविधाओं का वादा किया गया है. इसके बदले में रहेजा बिल्डर्स ने 6.11 करोड़ का भुगतान डीडीए को किया. रहेजा बिल्डर्स के हिसाब से इस पूरे प्रोजेक्ट में 254.27 करोड़ का खर्च आने वाला है. कुल 5.22 हैक्टेयर जमीन में से 3.4 हैक्टेयर जमीन कॉलोनी के पुनर्वास में इस्तेमाल होगी. रहेजा बिल्डर्स को शेष 1.7 हैक्टेयर जमीन पर निर्माण करवाने का हक़ हासिल होगा. माने कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा ही पुनर्वास के काम लिया जाएगा. रहेजा का कहना है कि 190 मीटर ऊंची और 54 मंजिला यह इमारत दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत होगी. इसमें 170 लग्जरी फ्लैट, एक स्काई क्लब और हेलीपेड बनाए जा रहे हैं.

शाम के छह बज रहे हैं. बिहारी बस्ती के बीच छोटे से चौगान में महिलाऐं जुटी हुई हैं. भाट बस्ती से आगे निकल कर जैसे ही आप बाएं मुड़ते हैं तो मोड़ तक राजस्थानी आपको अलविदा कहने आती है. नुक्कड़ पर मराठी आपका स्वागत कर रही है. गली के अंत में खड़ी भोजपुरी बताती है कि प्रदर्शन कहां चल रहा है. पचास के लगभग पुलिसकर्मी यहां तैनात हैं. मीटिंग में 100 से ज्यादा महिलाएं जुटी हुई हैं. पुरुष ना के बराबर हैं. घिसे-पिटे राजनीतिक नारों के साथ जमीन ना छोड़ने की कसमें खाई जा रही हैं. इतने में किसी घर से पत्थर चल जाता है. माहौल में तनाव महसूस किया जा सकता है. बस्ती के नौजवान पहले भी पुलिस की लाठी का स्वाद चख चुके हैं. फिर आपसी समझाइश से चीजें ठीक की जाती हैं. प्रदर्शन सामान्य गति से चलने लगता है.

डीडीए के छह साल पुराने सर्वे के मुताबिक कॉलोनी में 3100 झुग्गियां थीं लेकिन बिल्डर सिर्फ 2641 फ्लैट बना रहा है 

इस बीच पतासी भाट का सवाल अपनी जगह पर बना हुआ है. ‘दिल्ली में किसे अपना घर नहीं चाहिए?’ तो क्या इन लोगों को इस बार अपना घर मिल पाएगा? इस प्रस्तावित पुनर्वास योजना में रहेजा बिल्डर्स ने 2641 फ्लैट बनाने का वादा किया है. 2009 में एक स्वतंत्र फर्म ज्ञान पी माथुर एंड एसोसिएट्स ने बस्ती का सर्वे किया था. इसमें घरों की कुल संख्या 2704 थी. इसके बाद डीडीए ने तीन चरणों में सर्वे किया. नवम्बर 2010 के सर्वे के हिसाब 3100 झुग्गी पायी गईं. बस्ती के लोगों और कुछ गैर सरकारी संगठनों के सर्वे के हिसाब से यह संख्या 3500 के लगभग जाती है.

डीडीए के 2010 के सर्वे को भी सही माना जाए तो बनाए जा रहे फ्लैट और मौजूद झुग्गियों की संख्या में बड़ा अंतर है. क्योंकि यह सर्वे 6 साल पुराना है तो फिलहाल कुल परिवारों की संख्या में अंतर के और बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता. इस लिहाज से देखा जाए तो इस प्रोजेक्ट के जरिए कुछ लोगों का बेघर होना तय है. वहीं दूसरी तरफ अक्टूबर 2011 में स्टेट लेवल एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी ने कहा कि रहेजा बिल्डर्स ने जो सूचनाएं उपलब्ध करवाई हैं वे पर्यावरण गाइडलाइन की शर्तों को पूरा नहीं करतीं. सो कमेटी ने इस प्रोजेक्ट को एन्वायरमेंट क्लियरेंस को होल्ड पर रख दिया.

डीडीए के साथ जिस करार के तहत बस्ती के लोग आनंद पर्वत ट्रांजिट कैम्प शिफ्ट हो रहे हैं, उसमें कई चीजों का स्पष्ट होना जरुरी है. सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुमार कहते हैं, ‘सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अगर तय दो साल में घर बन कर तैयार नहीं होते तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? अगर समय पर घर नहीं मिलते हैं तो हमें क्या मुआवजा मिलेगा यह भी साफ़ नहीं किया गया है. इसके अलावा इस फ्लैट की कीमत 1.12 लाख है. ऊपर से पांच साल के रख-रखाव के लिए तीस हजार रुपये अलग से देने होंगे. ज्यादातर लोग एकमुश्त यह रकम नहीं दे सकते. डीडीए ने इसके लिए लोन लेने की बात कही है. लेकिन इन लोगों को लोन देगा कौन? हमने कई बैंकों से बात की. बिना नियमित आय के कोई भी बैंक लोन नहीं देने जा रहा.’ तो फिलहाल बस्ती के लोगों के लिए अच्छे घर के सपने का सच होना थोड़ा मुश्किल ही लग रहा है.

आप गूगल पर कठपुतली कॉलोनी टूर अगर सर्च करेंगे तो आपको कई सारी ट्रेवल वेबसाइट मिल जाएंगी. ये वेबसाइट 50 यूएस डॉलर में आपको कठपुतली कॉलोनी घुमाने का पैकेज देती है. इसमें होटल से लाने-ले जाने की सुविधा के साथ-साथ 3 घंटे इस कॉलोनी में घूमने का मौका देती हैं. विजय कहते हैं, ‘कई लोगों के हित बस्ती के यथास्थिति बने रहने के साथ जुड़े हुए हैं. यूरोप और अमेरिका से आने वाले पर्यटकों को यहां लाकर कला की जगह गरीबी बेची जा रही है.’

शिक्षा को लेकर इस बस्ती में 11 संगठन काम कर रहे हैं और 2014 के आंकड़ों के मुताबिक यहां 80 फीसदी बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाते

यह भी एक कठोर सच्चाई है कि कलाकारों की यह बस्ती कई गैर सरकारी संगठनों के लिए नूराकुश्ती का मैदान बनी हुई है. कलाकारों के हित, स्वच्छता, शिक्षा, ना जाने कितने मुद्दों पर काम करने के नाम पर कई सारे गैर सरकारी संगठन यहां सक्रिय हैं. अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शिक्षा को लेकर इस बस्ती में 11 संगठन काम कर रहे हैं और 2014 के आंकड़ों के मुताबिक यहां 80 फीसदी बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाते.

इधर प्रदर्शन अब ख़त्म होने के कगार पर है. प्रदर्शन में पुरुषों की भागीदारी नहीं होने का सवाल अब भी बना हुआ था. इसका जवाब मिलता है भाट समाज के प्रधान दिलीप भाट के घर पर. 10 फीट की छोटी सी बैठक में जितने लोग आ सकते हैं वो खड़े हैं. बाहर भी लोगों का जमावड़ा लगा हुआ है. मीटिंग में पत्थर चल जाने की खबर से यहां पर सनसनी है. दिलीप बताते हैं कि इससे पहले पुलिस ने उनके घर का दरवाजा तोड़कर उन्हें पकड़ लिया था और मारते-मारते थाने ले गई थी. वो अभी तीन केस में विचाराधीन हैं. बस्ती में 19 लोग मुक़दमा झेल रहे हैं. दिलीप कहते हैं, ‘हम लोग अपने घर में कैद हो चुके हैं. बाहर निकलते ही पुलिस का निशाना बन सकते हैं.’ पास में खड़े राजू भाट कहते हैं, ‘हम काम पर नहीं जा पा रहे हैं. हमेशा डर लगा रहता है कि काम पर गए तो पीछे से कहीं पुलिस कुछ कर ना दे. आखिर इतनी पुलिस यहां क्या कर रही है. हमें क्यों डराया जा रहा है.’


प्रदर्शन खत्म हो गया है. महिलाऐं हाथ नचा कर पुलिस को कोस रही हैं. पुलिस की टुकड़ी धीरे-धीरे बाहर निकलने लगी है. आखिरी पुलिस वाले के पांच मीटर आगे निकल जाने के बाद 4-5 साल के दो बच्चे नाच-नाच कर गाते हैं, ‘हमें तो लूट लिया मिलकर डीडीए वालों ने, रहेजा वालों ने, मोदी वालों ने.’ पास ही खड़ा एक नौजवान हंसते हुए कहता है, ‘हम तो कलाकार हैं साहब, गले लगाओगे तो भी गाना गाएंगे और मारोगे तो भी गाना गाएंगे.’

साभार : सत्याग्रह

Tuesday, January 3, 2017

The CHHATTISGARH special Court (Naxal) rejected the bail petition of the seven activists, lawyers and research scholars who were arrested from Telangana on 25th December,2016

Press Note

Dantewada, 4 January,2017:
The CHHATTISGARH special Court (Naxal) rejected the bail petition of the seven activists, lawyers and research scholars who were arrested from Telangana on 25th December,2016

The FIR 0/2016 filed against them accused them of helping naxalites covert currency, carrying banned literature under section 8(1)(2)(3)(5) of CHHATTISGARH Special Public Security Act 2005(CSPA)
The senior High Court advocate from Telangana, V Raghunath, arguing for the defendants submitted to the court that the accusation of exchange of currency for naxalites does not hold as the detained persons were being accused of carrying old demonetised currency in 500s and 1000s amounting to one lakh. He said that if the intention was to help naxalites, they would be carrying new notes not the old ones.Till December 30, 2016 then, and now till, 31 March 2017, it is not illegal to possess old currency.
After repeated questioning by the honourable judge, the police read out the list of seizures from the accused in the court, specially the literature allegedly found on them. Raghunath pointed out to the court that the literature allegedly found on them at the time of arrest were all widely sold in the market and read by many as it is not banned. Raghunath also placed before the court, Supreme Court judgements that clearly held that mere membership in banned organization or possession of literature are in themselves not a crime.
He argued that according to CSPSA,2005 section 8(4), the police are required to take written permission from the Superintendent of Police before undertaking any investigation into cases under the draconian CSPSA. In this instance, the FIR states that the persons were arrested at 8:30 am on 25-12-2016, and proceeds to mention the investigation done and seizures made without prior permission of the Superintendent of Police. This makes the case fundamentally flawed and the arrests illegal.
The CHHATTISGARH government is perpetrating heinous human rights violations against the ADIVASIS in several district of the state specially in Bastar region. Instead of alleviating the socio-economic distress of the adivasi community, the state has chosen to hunt down social activists who bring out state sponsored atrocities. Several journalists, academics, lawyers, and rights activists have either been silenced or driven out of CHHATTISGARH state over last few years.
The present case of arrest of Ch Prabhaker, B Ravindranath, both Telangana state high Court advocates, B Durgaprasad, journalist, D Prabhaker, President of KNPS, Andhra Pradesh,R Lakshmaiah, gen sec Adivasi Tudum Debba, Rajendra Prasad and Nazeer, both research scholars, all of whom were on factfinding visit to CHHATTISGARH, is another such attempt to discourage public scrutiny of state repression of adivasis.
We demand unconditional release of the seven activists arrested and detained under the draconian CHHATTISGARH Special Public Security Act 2005, in view of the serious procedural lapses and untenable accusations.

1.N.Narayanarao, Telangana Democratic Forum convener, and CLC gen sec.
2.M.Kumaraswamy, Civil Liberties Committee, joint sec, Telangana state
3 B Savitri, Committe for the Release of Political Prisoners
4 Vattam Upendra, Adivasi Thudum Debba.
5. Kusuma Kumari, KNPS.
6. Soni Sori, Adivasi Social activist.
7.Bela Bhatia, Independent researcher and human rights activist
8.Padmaja Shaw, academician
9.Lingaram Kodopi.Adivasi social worker and journalist
10.Family members of seven detained activists

जस्टिस ठाकुर ने अपने पिता को भी नहीं छोड़ा था .-बीबीसी

जस्टिस ठाकुर ने अपने पिता को भी नहीं छोड़ा था .
  • 3 जनवरी 2017
टीएस ठाकुरImage copyrightPTI
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर प्रधानमंत्री को उनके भाषण के सिलसिले में कटघरे में खड़ा कर चुके हैं.
सवाल करने उनके स्वभाव का हिस्सा रहा है, उन्होंने कभी अपने पिता को भी नहीं बख़्शा था.
न्यायाधीश ठाकुर ने एक बार अपने पिता की सरकार की बर्खास्तगी की भी मांग कर दी थी.
यह ग़ुलाम मोहम्मद शाह की सरकार थी, जिसमें टीएस ठाकुर के पिता देवीदास ठाकुर उपमुख्यमंत्री थे.
ग़ुलाम मुहम्मद शाह 2 जुलाई 1984 से 6 मार्च 1986 तक जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे.
उस दौरान तीरथ सिंह ठाकुर जम्मू हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हुआ करते थे.
बार एसोसिएशन में उनके पुराने साथी बताते हैं कि ग़ुलाम मोहम्मद शाह की सरकार विवादों में थी और चारों तरफ सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे थे.
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्टImage copyrightMAJID JAHANGIR
जस्टिस ठाकुर लंबे समय से जानने वाले और वरिष्ठ वकील बीएस सलाथिया कहते हैं, "तीरथ सिंह ठाकुर हमेशा से सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा रखते थे."
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जब वे अपने पिता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकते हैं तो आप समझ जाइए कि वो ग़लत होते हुए नहीं देख सकते हैं. और वो जिस पद पर आज हैं वहां वो भला कैसे चुप रह सकते हैं जब पूरे देश में जजों की इतनी कमी है. अब जम्मू कश्मीर उच्च न्यायलय को देख लीजिए. यहाँ 17 स्वीकृत पद हैं मगर जजों की मौजूदा संख्या सिर्फ आठ है. तो वो भला कैसे नहीं बोलें?"
हाल ही में न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर ने सबको अचम्भे में तब डाल दिया जब वो एक समारोह में मंच से बोलते-बोलते रो पड़े थे.
सु्प्रीम कोर्टImage copyrightAP
मौक़ा था राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों के सम्मलेन का जिसमें प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद थे.
न्यायमूर्ति ठाकुर यह कहते-कहते आंसुओं में डूब गए कि आम आदमी का न्याय प्रणाली पर विश्वास निम्नतर स्तर पर पहुंच चुका है.
यह घटना इस साल अप्रैल माह की थी. तीन महीनों के बाद यानी स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर उन्होंने फिर एक समारोह में क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की मौजूदगी में प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा "आप ग़रीबी हटाएं, रोज़गार का सृजन करें, योजनाएं लाएं मगर देश के लोगों के लिए न्याय के बारे में भी सोचें."
इससे पहले जजों की नियुक्ति को लेकर मुख्य न्यायाधीश ने सरकार के ख़िलाफ़ तल्ख़ टिप्पणी भी की थी.
उन्होंने कहा था कि अगर जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार कुछ नहीं करती है तो फिर न्यायपालिका को ही हस्तक्षेप करने पर मजबूर होना पड़ेगा.
यह भी बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि तीरथ सिंह ठाकुर एक बार चुनाव भी लड़ चुके हैं.
उन्होंने चुनाव बतौर निर्दलीय उम्मीदवार लड़ा था.
जम्मू-कश्मीर
जम्मू कश्मीर में 1987 के विधानसभा के चुनावों में उन्होंने रामबन विधानसभा क्षेत्र से अपना भाग्य आज़माया और उनका मुक़ाबला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भरत गांधी के साथ था.
तीरथ सिंह ठाकुर ये चुनाव हार गए थे.उन्हें कुल 8597 वोट मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी भरत गांधी को 14339.
रामबन के पुराने लोगों में से एक ग़ुलाम क़ादिर वानी बताते हैं कि ठाकुर चुनाव इसलिए हार गए थे क्योंकि राजनीति और ख़ास तौर पर चुनावों में जो तिकड़म नेता अपनाया करते हैं, उससे वो पूरी तरह अनभिज्ञ थे.
ग़ुलाम क़ादिर वानी कहते हैं, "चुनाव जीतने के लिए सब कुछ करना पड़ता है. सिर्फ उसूलों से चुनाव जीते नहीं जाते. हालांकि उनके पिता उपमुख्यमंत्री रहे हैं, मगर तीरथ सिंह ठाकुर को वो सारे तिकड़म नहीं आते थे. इसलिए वोटरों को रिझाने के लिए वो ऐसा कुछ नहीं कर पाए."
साल 1987 में भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में हुए विधानसभा के चुनाव काफी विवादित हुए जिसमे बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के आरोप लगाए गए. इस चुनाव में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच गठजोड़ हुआ था और इस गठजोड़ ने 66 सीटें जीती थीं.
कश्मीरImage copyrightPTI
कहा जाता है कि इस दौर में जम्मू कश्मीर में 'मिलिटेंसी' शुरू हुई थी.
जस्टिस ठाकुर जम्मू-कश्मीर के रामबन ज़िले की उखेड़ा तहसील के रहने वाले हैं और उनका परिवार हमेशा से ही जाना माना रहा.
उनके पिता देवीदास ठाकुर शेख अब्दुल्ला के सहयोगी भी रह चुके थे और 1975 में वो शेख अब्दुल्लाह के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री भी रह चुके थे.
डोडा ज़िले में उनके परिवार को क़रीब से देखने वाले पुराने लोगों के अनुसार चूँकि राजनीति में आने से पहले देवीदास ठाकुर जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय में जज थे, राजनीति में उनकी जो इज़्ज़त थी वो शायद ही उस दौर में उनके समकक्ष किसी राज नेता की रही हो.
यही सम्मान उनके परिवार के बाक़ी के सदस्यों को भी मिला. खास तौर पर उनके पुत्र तीरथ सिंह ठाकुर को.
सुप्रीम कोर्टImage copyrightAFP
बतौर जज भी तीरथ सिंह ठाकुर अपने फ़ैसलों के लिए जाने जाते रहे हैं क्योंकि हर मामले में उनका अध्ययन साफ़ झलकता रहा.
उनके कुछ प्रमुख फ़ैसले जिनकी चर्चा हुई-
  • महाराष्ट्र में पर्यूषण पर्व के दौरान मांस पर प्रतिबन्ध के मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने टिप्पणी की: मांस प्रतिबन्ध किसी के गले के अंदर ज़बरदस्ती ठूंसे नहीं जा सकते.
  • उन्होंने कबीर का हवाला देते हुए कहा : कबीर ने कहा था कि तुम उन लोगों के घरों में तांक-झाँक क्यों करते हो जो मांस खाते हैं. वो जो कर रहे हैं उन्हें करने दो भाई. तुम्हें इतनी चिंता क्यों है.
  • फरवरी 2015 में न्यायमूर्ति ठाकुर और न्यायमूर्ति एके गोयल की खंडपीठ ने बहु-विवाह पर कहा था कि इस्लाम में यह प्रथा नहीं है और सरकार इसपर क़ानून बना सकती है.
  • इससे पहले 2015 के जनवरी माह में एक आदेश में कहा कि बीसीसीआई का क्रिकेट में कोई व्यावसायिक हित नहीं होना चाहिए. इस फ़ैसले के बाद बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन को अपना पद छोड़ना पड़ा.
  • इसके अलावा कई और भी महत्वपूर्ण मामले मुख्य न्यायाधीश की अदालत में चल रहे हैं जैसे गंगा की सफाई का मामला, शारदा चिट फंड मामला और वन रैंक वन पेंशन.
जाने-माने वकील शांति भूषण कहते हैं कि तीरथ सिंह ठाकुर दिल्ली उच्च न्यायलय में भी बतौर जज रहे हैं और उनकी अदालतों में उन्हें जाने का मौक़ा भी मिला है.
हाईकोर्टImage copyrightREUTERS
शांति भूषण का कहना है कि अदालत के बाहर उन्होंने कभी भी ठाकुर को इस तरह बोलते नहीं सुना.
शांति भूषण कहते हैं, "वो प्रशासनिक प्रमुख भी हैं और जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार का रवैया ऐसा है तो कोई कैसे ना 

किसानों का दर्द कौन समझेगा





किसानों का दर्द कौन समझेगा

* किसानों ने 30 गाड़ियों में लगभग 1 लाख किलो सब्जी लाकर जनता को मुफ्त में वितरण किया गया. किसान अपने साथ शिमला मिर्च, भाठा, टमाटर, पत्तागोभी, लौकी, सेमी तथा करेला लेकर आये थे.
* लोगों ने किसानों के पसीने से सींचकर उगाये गये फसलों को लेने के लिये सुबह से ही लाइन लगा ली थी.
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Tuesday, January 3, 2017

सीजी खबर
एक कहावत है, मुफ्त का चंदन घिस बेटा नंदन. एक और कहावत है माले मुफ्त दिले बेरहम. दोनों कहावतें सोमवार को रायपुर के धरना स्थल बूढ़ापारा में सजीव हो उठी. बूढ़ापारा धरना स्थल पर किसानों द्वारा नोटबंदी से छाई मंदी के विरोध में मुफ्त में सब्जियां बांटी जा रही थी. लोगों ने किसानों के पसीने से सींचकर उगाये गये फसलों को लेने के लिये सुबह से ही लाइन लगा ली थी. किसी ने भी नोटबंदी से छाई मंदी का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा. सभी मौका देखकर चौका लगाने की फिराक में थे. मुफ्त की सब्जी लो तथा बढ़ चलो.

दरअसल, मंदी तथा परिवहन व्यवस्था के ठप्प पड़ जाने की वजह से किसानों को अपने उत्पादों का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा था. इससे कुपित होकर किसानों ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अनोखा विरोध प्रदर्शन किया. न नारे लगया गये न ही रैली निकाली गई. किसानों ने मुफ्त में जनता को सब्जियां बांटी. जिसे लेने के लिये आधा किलोमीटर लंबी लाइन लग गई. अभ किसानों का दर्द कितने दिलों तक पहुंचा यह कहना मुश्किल है पर रसोई में उनके खून-पसीने की मेहनत से उगाई गई सब्जियां कई दिनों तक पकती रहेंगी यह तय है. किसानों के आंसुओं की लोगों को परवाह होती तो वे वहां सब्जी लेने के बजाये विरोध प्रदर्शन करने लगते. इसके उलट, सब्जी बांटने की व्यवस्था को बनाये रखने के लिये पुलिस को लगाना पड़ा था.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग, भिलाई, रायपुर, राजनांदगांव, बेमेतरा तथा बालोद के किसानों ने 30 गाड़ियों में लगभग 1 लाख किलो सब्जी लाकर जनता को मुफ्त में वितरण किया गया. किसान अपने साथ शिमला मिर्च, भाठा, टमाटर, पत्तागोभी, लौकी, सेमी तथा करेला लेकर आये थे. जनता भी ऐसी कि इसका कारण पूछे बिना केवल अपने पसंद की सब्जियां लेकर चलती बनी. बताया जा रहा है कि इन सब्जियों का मूल्य करीब 20 लाख रुपये का है.

मुफ्त में सब्जियां मिलने की खबर पाते ही लोग सुबह के 1 बजे से लाइन लगाकर खड़े हो गये. किसानों ने विरोध स्वरूप करीब 12 बजे से सब्जियां बांटना शिरू किया जो शाम तक चलता रहा. लोगों ने स्वमेय ही दो समानांतर लाईनें बना ली थी. एक वर्ग का दर्द दूसरे वर्ग के लिये वरदान बन गया. किसी का परिवार तबाह हो रहा है तो किसी की रसोई आबाद हो रही है. जनता भी इतनी निष्ठुर हो गई है कि केवल अपनी ही सोचती है. दूसरे के लिये सोचने का समय किसके पास है. जबकि, नोटबंदी से सभी किसी न किसी तरह से प्रभावित हुये हैं.

एक आकलन के अनुसार उद्योग धंधे आधे हो गये हैं. चिल्हर की तंगी के कारण लोग अपनी जरूरत का सामान नहीं खरीद पा रहें हैं. बैंकों में रुपये जमा होने के बावजूद भी लोग दवाई के लिये भटकते नज़र आये थे. नोटबंदी बिना किसी सूचना के लागू कर दी गई. जिससे नगदी की कमी हो गई. भारत जैसे देश में नगदी से रोटी मिलती है, नगदी के रूप में ही रोजी मिलती है, नगदी हो तभी भूख मिटती है. नगद ही नारायण है उसके बिना सब सूना है. जब लोग परेशान होने लगे तब कैशलेस को कारगार बनाने की कोशिश शुरू की गई. तब तक इतना नुकसान हो चुका था कि इसका देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ना निश्चित है.

बात की शुरूआत लोगों के ‘मैं’ में बदल जाने को लेकर हुई थी. लोग अपने में ही इतने मग्न हैं कि उन्हें पड़ोस में रोने की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती. हर कोई चाहता है कि देश आजाद रहे परन्तु भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद पड़ोस में पैदा हो ऐसा भाव है. अपने बच्चे को तो हर कोई डॉक्टर, इंजीनियर तथा एक सफल बिजसनेसमैन बनाने के सपने देखता है. भला कौन दूसरों के पचड़े में पड़े.

ऐसे में दूसरे विश्व युद्ध के समय पोस्टर निकोलस की वह बेबस कविता याद आती है जो कुछ-कुछ इस तरह की है- पहले वे आये बुद्धिजीवियों के लिये, मैं चुप रहा क्योंकि मैं बुद्धिजीवी नहीं था. फिर वे आये यहूदियों के लिये मैं फिर भी चुप रहा. फिर वे आये साम्यवादियों के लिये मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था. अंत में वे आये मेरे लिये, तब कोई नहीं था जो मेरे लिये आवाज़ उठाता.

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Monday, January 2, 2017

सामाजिक कार्यकर्ताओं की जमानत के लिये बस्तर पहुचे वकीलों से पुलिस कि कड़ी पूछताछ . एक दर्जन वकील पहुचे दंतेवाड़ा






*दंतेवाड़ा स्थित मधुवन होटल में पुलिस की तीन बार दविश .
** सामाजिक कार्यकर्ताओं की जमानत के  लिये  बस्तर पहुचे  वकीलों से पुलिस कि कड़ी पूछताछ .
एक दर्जन वकील पहुचे दंतेवाड़ा

* सुकमा में गिरफ्तार वकीलों ,पत्रकार और  मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की पैरवी करने  तेलंगाना से आये  एडवोकेट को भी परेशान किया छत्तीसगढ़ पुलिस ने.
* तथाकथित पकडे गये पुराने नोट भी पेश नही कर पाई पुलिस ,,आज तक का समय लिया .
* सोनी सोड़ी ने किया हस्तक्षेप .
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माओवादीयों से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार तेलंगाना के सामाजिक कार्यकर्ताओं की जमानत के लिये पहुचे एक दर्जन वकीलों से छत्तीसगढ़ पुलिस ने बार बार कडी पूछताछ की .
जिस होटल में वकील ठहरे थे वहा तीन बार पुलिस ने छानबीन की और वकीलों से कहा कि दंतेवाड़ा में  ठहरना खतरे से खाली नही है . सभी वकीलों से उनके परिचय पत्र मांगे गये उसकी प्रति भी साथ ले गये ॥

तेलंगाना डेमोक्रेटिक फ्रंट के संयुक्त सचिव मदन कुमार स्वामी ने पत्रकारों से चर्चा की और पुलिस के असमान्य व्यवहार के बारे में बताया .
आज सुनवाई :
तेलंगाना पुलिस ने सात वकीलो ,पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को नोट बदलने के आरोप में पकड कर सुकमा पुलिस को सोंप दिया था . सारे देश में तीव्र प्रतिक्रिया के बार बस्तर के  आई जी कल्लूरी ने कहा था कि वे सफेद पोश नक्सली है .
सोमवार को नक्सल मामलों के एडीजे मनोज सिंह ठाकुर की अदालत में केस डायरी तो प्रस्तुत की लेकिन  सबूत पेश करने के लिये समय की मांग की ,अब सुनवाई आज मंगलवार को होगी .

** एक दर्जन वकील पहुचे दंतेवाड़ा

मामले की सुनवाई के लिये आन्ध्रप्रदेश हाईकोर्ट के अधिवक्ता  वी रधुनाथ ,जी लिंगये ,एन पुर्षोत्तम ,जगन्नाथन सहित दर्जनभर वकील पहुचे है ,इनके साथ परिजन भी अदालत भी मौजूद थे.

आँध्रप्रदेश और तेलंगाना से दंतेवाड़ा पहुँचे वकीलों और सामजिक कार्यकर्ताओं पुलिस और आईबी के जासूसों की पैनी नजर, पत्रकारों की भेष में आईबी के जासूस कोर्ट में कैमरे से कर रहे वीडियो रिकार्डिंग और फोटोग्राफी । प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों की भेष में भी पहुँचते हैं आईबी के जासूस ।
 बस्तर में पत्रकारों के लिए नक्सली इलाकों में इनकी वजह से काम करना काफी खतरनाक । ।

आँध्रप्रदेश और तेलंगाना से बस्तर आने के दौरान रास्ते भर में हुई वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तलाशी । फर्जी नोटबदली मामले में दुबारा फँसाने की साजिश की आशंका सेसबहुत कम कैश लेकर पहुँचे हैं वकील और सामाजिक कार्यकर्ता । छत्तीसगढ़ सरकार के इशारों पर दंतेवाड़ा में भी सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों को फर्जी मामले बनाकर गिरफ्तार करने की हो सकती है साजिश ।

 सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकील और पत्रकार की कथित एक लाख नोटबदली काण्ड में आज पूरी नहीं हो सकी जमानत पर सुनवाई । विशेष न्यायालय नक्सल एवं एडीजे मनोज सिंह ठाकुर के कोर्ट में चल रही थी सुनवाई । लेकिन पुलिस तथाकथित जप्त पुराने नोट कोर्ट में पैश नही कर पाई ,कोर्ट से कल तक का समय मांग  ,इस मामले में कल होगी जमानत पर अगली सुनवाई ।
होटल मधुबन में  जहां यह सारे वकील ठहरने है ,यहाँ की  पुलिस ने सख्ती से तलाशी ली और  वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के आइकॉर्ड की फोटोकॉपी करवाकर ले गई .
पुलिस के बार बार हस्तक्षेप के बाद सोनी सोरी होटल पहुची और पुलिस के लोगों से बातचीत की और उन्हें वकीलों को परेशान न करने की चेतावनी दी .
आज सुकमा पुलिस कोर्ट में दस्तावेज़ प्रस्तुत करेगी .
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आज बहुत मजा आया ,
छत्तीसगढ़ पुलिस डरकर भीगी बिल्ली बनी घूमती रही,
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जिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों को छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक हफ्ते पहले फर्जी मामला बनाकर जेल में डाला था,

उनका मामला अदालत में लड़ने के लिए आज आंध्र प्रदेश से वकीलों की एक टीम दंतेवाड़ा आई,

छत्तीसगढ़ पुलिस इतने सारे वकीलों को एक साथ देख कर बुरी तरह घबरा गई ,

और अदालत में भेस बदल-बदल कर घूम घूम कर सारे क्रियाकलापों को छुप कर देखती रही,

शाम को आईजीपी कल्लूरी के हुकुम से दंतेवाड़ा थाने से पुलिस वाले जीप में वकीलों के होटल पर पहुंचकर बार-बार उन्हें परेशान करने लगे,

पुलिस वाले सभी वकीलों से उनके आईकार्ड और उनके पास कितना पैसा है इसकी जानकारी बार बार मांग रहे थे ,

पुलिस ने ऐसा दो बार किया ,

इसके बाद सोनी सोरी ने वहां पहुंचकर पुलिस वालों से जब पूछताछ करी तो पुलिसवाले डरकर वापस थाने में भाग गए,

छत्तीसगढ़ पुलिस की यह हरकतें देख कर बहुत मजा आया,

आज अदालत में जज साहब ने पुलिस से पूछा कि आपने कहा है कि इनके पास से एक लाख रुपये के नकद नोट पुराने वाले जो बंद हो गए हैं वह पकड़े गए और नक्सलवादी पर्चे पकड़े गए ?

तो वह दोनों सबूत अदालत में पेश कीजिए ?

लेकिन पुलिस अदालत में दोनों ही सबूत पेश नहीं कर पाई,

इस पर अदालत ने पुलिस को फटकार मारी,

और कल तक दोनों सबूत पेश करने के लिए कहा,

कल इस मामले पर बहस होगी,

छत्तीसगढ़ पुलिस अपनी बेइज्जती खुद करवा रही है,

पुलिस वालों को नियम से काम करना चाहिए,

लेकिन वह बार-बार कह रहे थे हमें तो ऊपर से आर्डर मिला है,

हमारा कहना है अगर ऊपर से आर्डर मिलेगा गोबर खाओ तो क्या पुलिसवाले गोबर खाने लगेंगे ?

अरे भाई अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो और कानून से चलो वरना तुम्हारी इसी तरह खिल्ली उड़ेगी,
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हिमांशु कुमार

मजदूरों ने पचास ट्रक बिना कच्चा लोहा लोड किये ट्रकों को बैरंग लौटाया, जायसवाल निक्को कंपनी पर लगे गम्भीर आरोप





मजदूरों ने पचास ट्रक बिना कच्चा लोहा लोड किये ट्रकों को बैरंग लौटाया, जायसवाल निक्को कंपनी पर लगे गम्भीर आरोप,
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कांकेर-अंतागढ के मेटाबोदेली चारगांव माइंस मे निक्को कंपनी के खिलाफ मजदूरों का फूटा गुस्सा , लामबंद होकर मजदूरों ने पचास ट्रक बिना कच्चा लोहा लोड किये ट्रकों को बैरंग लौटाया, जायसवाल निक्को कंपनी पर लगे गम्भीर आरोप, आदिवासियों के शोषण का लगा आरोप, मजदूरो ने जांच नाके पर दिया धरना, 2015 का लंबित मजदूरी भुगतान और क्षेत्र हित की माँगे शामिल।
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नोटबंदी के खिलाफ बोलने से किसानों को भाजपा नेताओं ने रोका :छत्तीसगढ़ ,रायपुर





नोटबंदी के खिलाफ बोलने से किसानों को भाजपा नेताओं ने रोका :छत्तीसगढ़ ,रायपुर
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छ्ग युवा प्रगतिशील किसान संघ द्वारा आज नोटबंदी की वजह से किसानों को सब्जियों की कीमत ना मिलने की समस्या को लेकर रायपुर (छ्ग) में आंदोलन किया। इसमें 1 लाख किलो ( लगभग 30 गाडियाँ ) टमाटर, गोभी, लौकी, शिमला मिर्च, केला, बैगन आदि सब्जियाँ हजारों लोगों को मुफ्त बांटी गई।

संघ के सदस्य दानू साहू, जालम सिंह पटेल, शेर सिंह ठाकुर, शिवकुमार वर्मा, दुर्ग जिला अध्यक्ष संतोष राणा ने कहा कि इस आंदोलन पर भाजपा नेताओं का दबाव था। किसान नोटबंदी से परेशान हैं । उनके उत्पाद नहीं बिक रहे हैं । इस गुस्से को जाहिर करने ही यह प्रदर्शन किया गया, लेकिन भाजपा के बड़े नेताओं ने किसान संघ के पदाधिकारियों पर दबाव डाला और उन्हें नोटबंदी के खिलाफ बोलने से मना किया ।

धमधा, कनहारपुरी, बसनी, गोरपा, घोटवानी आदि क्षेत्रों से आए टमाटर उत्पादक किसानों ने इस मुद्दे पर संघ के रूख पर क्षोभ जताया। उन्होने कहा कि नोटबंदी के कारण दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम बंगाल से ट्रक टमाटर खरीदने नहीं आ रहे हैं, इस वजह से सब्जियों के दाम गिर गए हैं। किसान सरकार से मांग करते हैं कि धमधा, दुर्ग, बेमेतरा, बेरला, अहिवारा में टमाटर और अन्य सब्जियों के लिए बड़ी मंडी बनाई जाई, जहां से बड़े ट्रकों की लोडिंग हो सके। किसानों को राष्ट्रीयकृत बैंको से 1% ब्याज दर पर कर्ज दिया जाए । बेमेतरा, बेरला में गन्ना कारख़ाना खोला जाए, और किसानों के कर्ज माफ किए जाए। यह सभी मांगे पहले भी की जा चुकी हैं, और सरकार से आशा की जाती है कि इन मांगो पर अमल करे।

लेकिन त्वरित राहत के लिए नोटबंदी से उत्पन्न समस्या का समाधान सरकार को निकालना चाहिए। अगर इस मामले पर सरकार ने तुरंत कोई ठोस कार्यवाही नहीं की तो किसान मोदी सरकार के खिलाफ उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे।
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दानू साहू – 7697639494
जालम सिंह पटेल – 9424109627
शेरसिंह ठाकुर – 7354157281
संतोष राणा – 9755185454