Monday, September 5, 2016

आपका कहना है कि आप गैर राजनैतिक व्यक्ति है ,

Himanshu Kumar


आप का कहना है कि आप कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं

आप के लिए सभी पार्टियां एक जैसी हैं

आप एक अराजनैतिक व्यक्ति हैं

लेकिन आप देशप्रेमी हैं , आप सरकार का समर्थन करते हैं ,

आप अपनी सेना और पुलिस का भी पूरा समर्थन करते हैं

आप दलितों पर होने वाले अन्याय से इसलिए प्रभावित नहीं होते क्योंकि आप जातपात को नहीं मानते

आप आदिवासियों के साथ होने वाली हिंसा पर इसलिए ध्यान नहीं देते क्योंकि आदिवासी नक्सलवादियों को समर्थन देते हैं , इसलिए पुलिस उन्हें मारती है

आपको मुसलमानों के साथ होने वाले अन्याय से कोई परेशानी इसलिए नहीं होती क्योंकि आप साम्प्रदायिक भी नहीं हैं

आपका कहना है कि आप गैर राजनैतिक व्यक्ति है ,

आपको राजनीति में कोई रुची नहीं है

लेकिन आप असल में झूठ बोल रहे हैं

आपका यह कहना कि आपकी कोई राजनीति नहीं है
 यही आपकी सबसे बड़ी राजनीति है

असल में आपको राजनीति में भाग लेनी की ज़रूरत इसलिए नहीं है

क्योंकि राजनीति इस समय देश में जो कुछ कर रही है

आप उसके कारण बड़े आराम मे हैं

ध्यान से देखिये , अपने आप को

आपके पास एक नौकरी है

आप एक मजदूर या किसान से कई गुना कम काम करते हैं
 लेकिन आपको कई गुना ज़्यादा रूपये मिलते हैं

आपकी बिजली के लिए आदिवासी का घर तोडा जाता है

आपके मकान में लगे सीमेंट के लिए कई गाँव के लोग अस्थमा से खांस कर दम तोड़ते हैं

आपके लोहे के लिए कई नदियाँ लाल गाद से भर जाती है ,

उसमें फंस कर कई हज़ार जानवर मर जाते हैं , कई किसान बरबाद हो जाते हैं

आपके घर में लगे दरवाजों और फर्नीचर के लिए कितने ही जंगल काट डाले गए ,

विरोध करने वाले आदिवासी परिवारों को जेलों में ठूंस दिया गया ,

आप जिस कंपनी में काम करते हैं , उसके लिए कच्चे माल के लिए कितने ही लोगों की ज़मीनों को छीनने के लिए पुलिस नें विरोध करने वाली आदिवासी महिलाओं से बलात्कार किया ,

आप कहते हैं कि आप गैर राजनैतिक हैं ,

झूठ सरासर झूठ ,

इस सब अन्याय होते हुए चुपचाप देखते रहना ही आपकी राजनीति है ,

आपकी राजनीती यह है कि जब तक आप खुद मजे उड़ा रहे हैं तब तक आप चाहते हैं कि सब कुछ ऐसे ही चलता रहे ,

लेकिन मजा उड़ने वाला आपका वर्ग बहुत छोटा है ,

देश में ज्यादातर लोग वह है जो तकलीफ में है ,

जो तकलीफ में हैं वो चाहते है कि सब कुछ बदल जाए ,

इसलिए ये लोग हड़ताल करते हैं ,

यह लोग लाइन में लग कर वोट डालते हैं , इस उम्मीद में कि शायद इस दफा कुछ बदल जाएगा

यही लोग हैं जो आदिवासी इलाकों में रैली करते हैं ,
और पुलिस की गोलियों से मारे जाते हैं ,

जिनके मर जाने की खबर छापने के लिए आपके अखबारों को एक कोना भी नहीं मिलता ,

आप फिल्म ऐक्ट्रेस की नयी ड्रेस की पूरे पेज़ की फोटो देखते हैं ,

आप मुंह बिचका कर कहते हैं ,

आई हेट पालिटिक्स ,

नहीं तुम पालिटिक्स से हेट नहीं करते ,

तुम हकीकत से हेट करते हो ,

तुम सही का साथ देने से ड़रते हो ,

तुम सोचते हो सही के हक़ में आवाज़ उठाओगे तो तुम्हारे संगी साथी, चोपड़ा, शर्मा पांडे अग्गरवाल साब, हंसी उडायेंगे ,

और बोलेंगे कि पागल हो गए हो , या कम्युनिस्ट बन रहे हो क्या ?

या कहेंगे कि नक्सलवादी बन रहे हो क्या ?

आप सोचते हैं कि कहीं सरकार या पुलिस नाराज़ ना हो जाए ?

कहीं आपके बेटे बेटी की जाब पर कोई आंच ना आ जाए ?

कहीं पुलिस आपके दरवाजे तक ना आ जाए ,

तो जनाब आपकी राजनीति ,

खुद की हैसियत , सुख सुविधा और रुतबा को बचाए रखने की राजनीति है ,

आप गैर राजनैतिक बिलकुल भी नहीं हैं ,

लेकिन आप जैसों के लिए ही दिनकर नें बहुत पहले लिखा था,

‘ जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ‘

आपका तटस्थ होना ही आपकी चालकी से भरी राजनीति है ,

ठीक इसी मुद्दे पर ,

भगत सिंह ने वाइसराय को खत लिख कर कहा था ,

कि “ हम मानते हैं हम एक युद्ध में शामिल हैं ,

लेकिन यह युद्ध आपने शुरू किया है ,

आपकी पुलिस आपकी सेना रोज़ गरीबों की ज़मीनों और जीवन के साधनों पर हमला करके उन्हें छीन रही है ,

इस युद्ध में आपकी पूरी सरकारी मशीनरी , आपकी सेनाएं , हथियारों के भारी ज़खीरे शामिल हैं ,

आपने जनता के विरुद्ध एक युद्ध छेड़ा हुआ है ,

हम तो सिर्फ जनता के ऊपर छेड़े गए आपके इस युद्ध का जवाब दे रहे हैं ,

इसलिए आप हमें युद्ध बंदी मानिये और हमें फांसी देने की बजाय हमें गोली से उड़ा दीजिए.”

आज भी एक युद्ध चल रहा है ,

भारतीय राज्य के सशस्त्र दस्ते आदिवासी इलाकों में जनता के विरुद्ध एक युद्ध कर रहे हैं ,

आपके फेवरिट उद्योगपतियों के कारखानों के लिए,

लोहा , कोयला , सोना , पानी , ज़मीनें , जंगल पर कब्जा करने के लिए ,

आपके फेवरिट नेता फौजों को देश के किसानों , आदिवासियों को मार कर ज़मीनों पर कब्ज़ा करने का हुक्म दे रहे हैं ၊

आपके फेवरिट सुपर स्टार इस युद्ध से आपका ध्यान हटाने के लिए आपका दिल बहला रहे हैं ,

ठीक इसी समय आपके फर्ज़ी धर्मगुरु आपको मन की शांती के झूठे नुस्खे दे रहे हैं ,

आपके पुरस्कार लोलुप कवि और साहित्यकार फर्ज़ी और मनगढंत विषयों पर खोखला साहित्य का कचरा आपको परोस रहे हैं ၊

और आप कहते हैं आपको इस अब से कोई लेना देना नहीं है ,

आप कहते है कि आप गैर राजनैतिक हैं ,

बिलकुल झूठ ,

आप घोर राजनैतिक स्वार्थी, चालाक और डरपोक व्यक्ति

जाति का उन्मूलनः क्रांति और प्रतिक्रांति -राम पुनियानी

Dr. Ram Puniyani


जाति का उन्मूलनः क्रांति और प्रतिक्रांति
-राम पुनियानी

उना, गुजरात में हुए भयावह घटनाक्रम से यह साफ है कि देश में दलित-विरोधी मानसिकता अब भी जीवित है। इस तरह की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, यद्यपि पिछले दो वर्षों में इनमें तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है। हमें यह समझना होगा कि इस मानसिकता के पीछे वह राजनीतिक विचारधारा है, जो जातिप्रथा को औचित्यपूर्ण बताती है। हमें यह याद रखना होगा कि सन 2002 में गाय की खाल उतारने को लेकर झज्जर, हरियाणा में हुई हिंसा को विहिप के आचार्य गिरीराज किशोर ने उचित ठहराया था।
 यूरोप के कई देशों में भी जन्म-आधारित वर्गीय और लैंगिक पदक्रम थे, जिन्हें औद्योगिक क्रांति ने समाप्त कर दिया और वहां सच्चे प्रजातंत्र का आगाज़ किया। भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्योंकि हमारे देश औपनिवेशिक शासकों ने ऐसा नहीं होने दिया। पश्चिम में हुईं औद्योगिक क्रांतियों ने वहां के सामंती वर्ग का खात्मा कर दिया। यह सामंती वर्ग ही जन्म-आधारित पदक्रम का संरक्षक और पैरोकार था। भारत में औपनिवेशिक शासन ने देश के औद्योगिकरण की शुरूआत की और आधुनिक शिक्षा की भी, परंतु इनसे जन्मे आधुनिक समाज में भी जातिगत पदक्रम बना रहा। इसी आधुनिक समाज से भारतीय राष्ट्रवाद उपजा, जो जाति, धर्म और लिंग से परे सभी नागरिकों की समानता का हामी था।
 औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ जहां देश का औद्योगिकरण करना चाहते थे, वहीं वे सामंती ताकतों को भी जीवित रखना चाहते थे। सामंती ताकतों और पुरोहित वर्ग के गठजोड़ ने धार्मिक राष्ट्रवादों - मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद - को जन्म दिया। यूरोपीय देशों के उपनिवेशों में औद्योगिकरण से आए परिवर्तनों की गति उतनी तेज़ नहीं थी जितनी कि यूरोपीय देशों में थी, जहां श्रमिकों और महिलाओं ने मिलकर सामंती और पुरोहित वर्ग के गठबंधन को समूल उखाड़ फेंका। उपनिवेशों में समाज के धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया धीमी बनी रही और उनके स्वतंत्र हो जाने के बाद भी, इन देशों में समाज के कुछ वर्गों के संरक्षण में सामंती मानसिकता बनी रही। औद्योगिक क्रांति ने उपनिवेशों में सामाजिक बदलाव नहीं लाया। जहां तक भारत का प्रश्न है, यहां जोतिराव फुले के नेतृत्व में दलितों की समानता हासिल करने की धीमी और लंबी यात्रा शुरू हुई। सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं की समानता की लड़ाई शुरू की। इन धाराओं का दकियानूसी धार्मिक तत्वों ने कड़ा विरोध किया। इन्हीं तत्वों ने आगे चलकर हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसी संस्थाओं का रूप ले लिया।
 भारतीय राष्ट्रवाद की यात्रा में अंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने कालाराम मंदिर और चावदार तालाब जैसे आंदोलन चलाकर सामाजिक प्रजातंत्र लाने की कोशिश की। उन्होंने मनुस्मृति के दहन को अपना समर्थन देकर सामाजिक समानता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी। क्रांति हमेशा एक दिन या कुछ महिनों में नहीं होती। कभी-कभी वह कई चरणों में होती है और दशकों तक जारी रहती है। इस अर्थ में जोतिराव, सावित्रीबाई, अंबेडकर और पेरियार क्रांतिकारी थे। इनका भारतीय राष्ट्रवाद ने अनमने ढंग से समर्थन किया और हिन्दू राष्ट्रवाद ने खुलकर विरोध। गांधी, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक थे, ने अछूत प्रथा का भरसक विरोध किया, यद्यपि विधानमंडलों के चुनाव में आरक्षण के मुद्दे पर उनकी सोच पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता है। आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू ने अंबेडकर के नेतृत्व में एक ऐसे संविधान का निर्माण करवाया जो न केवल सभी को औपचारिक समानता देता है बल्कि दलितों की बेहतरी के लिए आरक्षण जैसे सकारात्मक कदमों का
 प्रावधान भी करता है। हिन्दू कोड बिल व अन्य तरीकों से भारतीय समाज में सुधार लाने के नेहरू के प्रयासों को उनकी पार्टी के भीतर के दकियानूसी तत्वों और बाहर के हिन्दू राष्ट्रवादियों ने विफल कर दिया।
 दलित यदि आज भी पराधीन बने हुए हैं तो उसका मुख्य कारण हिन्दू राष्ट्रवाद है, जिसने भारतीय संविधान का भी विरोध किया था। हिन्दू राष्ट्रवादी हमेशा से आरक्षण का विरोध करते आए हैं। उनके विरोध के चलते ही अहमदाबाद में सन 1981 में दलित-विरोधी दंगे हुए थे और फिर 1986 में अन्य पिछड़ा वर्गों के खिलाफ हिंसा हुई थी। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद, हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा ने राममंदिर मुद्दे पर देशभर में जुनून खड़ा कर दिया। यह सही है कि जो लोग दलितों के खिलाफ हिंसा करते आए हैं, उन्हें शायद ही कभी उनके कृत्यों की सज़ा मिली हो। इसका कारण भी वह मानसिकता है, जिसकी जड़ें हिन्दुत्व की विचारधारा में हैं। यह विचारधारा केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जो हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए सीधे काम कर रहे हैं। इनके अतिरिक्त भी बड़ी संख्या में ऐसे तत्व, संगठन और दल हैं, जिनकी यही मानसिकता है।
 इन हालातों को बदलने के लिए एक क्रांति की आवश्यकता है। परंतु यह क्रांति खूनी क्रांति नहीं होगी और ना ही यह रातों-रात होगी। यह क्रांति हमारी रोज़ाना की जिन्दगी में होगी। हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा की गोद में जा बैठे उदित राज, रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे लोग इस क्रांति की राह में एक बड़ी बाधा हैं। जहां तक सामाजिक परिवर्तन का सवाल है, हिन्दू राष्ट्रवादी, प्रतिक्रांतिकारी ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा, आरएसएस की राजनैतिक शाखा है और आरएसएस, हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है। वे तथाकथित दलित नेता, जो भाजपा के साथ हो लिए हैं, भी जातिगत समानता की राह में रोड़ा हैं। इन कथित दलित नेताओं को यह समझना चाहिए कि भाजपा, राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण संस्थानों में ऐसे मूल्यों के बीज बो रही है जो दलित-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देंगे। उदाहरणार्थ, भाजपा ने सुदर्शन राव नामक एक सज्जन को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का मुखिया नियुक्त किया है। राव का कहना है कि जाति व्यवस्था से किसी को कभी कोई समस्या नहीं रही है और किसी ने कभी इस व्यवस्था के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की। भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस का कहना है कि भारत में सभी जातियां समान थीं और समस्या मुसलमानों के हमले से शुरू हुई।
 ये सारी झूठी बातें और बेबुनियाद तर्क, समाज की आंखों में धूल झोंकने के प्रयास हैं ताकि जातिप्रथा बनी रहे और दलितों को नीची निगाहों से देखा जाता रहे। यही कारण है कि रोहित वेम्युला को आत्महत्या करनी पड़ती है और उना जैसी दिल को दहला देने वाली घटनाएं होती हैं। अगर भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन एक क्रांति था, तो हिन्दू राष्ट्रवाद की आज की राजनीति एक प्रतिक्रांति है जिसे अवसरवादी दलित नेताओं का पूरा समर्थन प्राप्त है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि रोहित वेम्युला व उना जैसी घटनाओं के खिलाफ दलित और गैर-दलित युवा उठ खड़े होंगे और अवसरवादी तत्वों को दरकिनार करते हुए जाति के उन्मूलन की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाएंगे।
 (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

आलोचना करने पर देशद्रोह, मानहानि के आरोप नहीं लगाये जा सकते: सुप्रीम कोर्ट


आलोचना करने पर देशद्रोह, मानहानि के आरोप नहीं लगाये जा सकते: सुप्रीम कोर्ट



सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक स्पष्ट संदेश में कहा कि सरकार की आलोचना करने पर किसी पर देशद्रोह या मानहानि के मामले नहीं थोपे जा सकते।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति यू यू ललित की पीठ ने इस मुद्दे पर आगे और कुछ कहने से दूरी बनाते हुए कहा, यदि कोई सरकार की आलोचना करने के लिए बयान दे रहा है तो वह देशद्रोह या मानहानि के कानून के तहत अपराध नहीं करता। हमने स्पष्ट किया है कि आईपीसी की धारा 124 (ए) (देशद्रोह) को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पहले के एक फैसले के अनुरूप कुछ दिशानिर्देशों का पालन करना होगा।

एक गैर सरकारी संगठन की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि देशद्रोह एक गंभीर अपराध है और असहमति को दबाने के लिए इससे संबंधित कानून का अत्यंत दुरपयोग किया जा रहा है।

उन्होंने इस संबंध में कुछ उदाहरण दिये। जिनमें कुडनकुलम परमाणु उर्जा परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी आदि पर देशद्रोह के आरोप लगाये जाने के मामले गिनाये गये।

इस पर पीठ ने कहा, हमें देशद्रोह कानून की व्याख्या नहीं करनी। 1962 के केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले में पहले ही स्पष्ट है।

न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका का निस्तारण करते हुए इस अपील पर यह निर्देश देने से इंकार कर दिया कि इस आदेश की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को भेजी जाए। इस संगठन ने देशद्रोह कानून के दुरपयोग का आरोप लगाया था।

पीठ ने कहा, आपको अलग से याचिका दाखिल करनी होगी, जिसमें यह उल्लेख हो कि देशद्रोह के कानून का कोई दुरपयोग तो नहीं हो रहा। आपराधिक न्यायशास्त्र में आरोप और संज्ञान मामला केंद्रित होने चाहिए, अन्यथा ये बेकार होंगे। कोई सामान्यीकरण नहीं हो सकता।


भूषण ने कहा कि शीर्ष अदालत के केदारनाथ सिंह फैसले के बाद भी कानून में संशोधन नहीं किया गया और एक कांस्टेबल फैसला नहीं समक्षता लेकिन आईपीसी की धारा को समक्षता है। शीर्ष अदालत ने कहा, कांस्टेबलों को समक्षने की जरूरत नहीं है। देशद्रोह के आरोपों को लागू करते समय शीर्ष अदालत द्वारा तय दिशानिर्देशों को मजिस्ट्रेट को समक्षना होता है और उनका पालन करना होता है।

अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें आईपीसी की धारा 124 ए के दुरपयोग पर ध्यान देने के लिए शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गयी थी और दलील दी गयी थी कि डर पैदा करने और असहमति को दबाने के मददेनजर इस तरह के आरोप गढ़े जा रहे हैं। संगठन की याचिका में कहा गया, विद्वानों, कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों के खिलाफ देशद्रोह के मामले बढ़े हैं जिनमें सबसे ताजा मामला एमनेस्टी इंडिया पर कश्मीर पर एक चर्चा आयोजित करने को लेकर लगाये गये देशद्रोह के आरोप का है।

उन्होंने कहा, इस संबंध में केंद्र और अनेक राज्य सरकारों द्वारा धारा 124 (ए) के दुरपयोग पर ध्यान देने के लिए एक याचिका दाखिल की गयी है। इसके दुरपयोग से छात्रों, पत्रकारों और सामाजिक रूप से सक्रिय विद्वानों का नियमित उत्पीड़न होता है। गौरतलब है कि बेंगलूरू पुलिस ने शनिवार को एबीवीपी की शिकायत पर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के खिलाफ देशद्रोह के आरोप दर्ज किये थे। संगठन ने जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और न्याय नहीं मिलने के आरोपों पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया था।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के हवाले से याचिका में कहा गया है कि 2014 में ही देशद्रोह के 47 मामले दर्ज किये गये थे और इनके सिलसिले में 58 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सरकार अब तक केवल एक व्यक्ति को ही दोषी सिद्ध करा सकी है
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Sunday, September 4, 2016

बलात्कार के आरोपी को फिर मिला राष्ट्रपति पुरस्कार

बलात्कार के आरोपी को फिर मिला राष्ट्रपति पुरस्कार

BY AVINASH · JANUARY 26, 2013




जब आप यह रपट पढ़ रहे होंगे तब तक भारतीय पुलिस सेवा के पदाधिकारी एसआरपी कल्लूरी को वीरता के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा जा चुका होगा। एसआरपी कल्लूरी का करियर दागदार रहा है। जुलाई 2012 में, कल्लूरी ने लिंगाराम कोडोपी को माओवादी हमले के एक मास्टरमाइंड के रूप में आरोपित किया था। पड़ताल के बाद लिंगाराम नोएडा में अध्ययनरत पत्रकारिता का छात्र निकला। साथ ही छत्तीसगढ़ में सेवारत आईपीएस कल्लूरी हवालात में हुए एक बलात्कार के मामले में आरोपित भी रहे हैं। यह मामला छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिला लेधा से संबंधित है। मोहल्ला लाइव ऐसे में पुण्य प्रसून वाजपेयी की एक पुरानी रपट प्रकाशित कर रहा है जो प्रथम प्रवक्ता में प्रकाशित हुई थी। इस रपट पर उन्हें प्रिंट का रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला था और उसके केंद्र में लेधा थीं।
सरगुजा की लेधा को गर्भवती हालात में पुलिस उठाकर ले गई थी। उसने जेल में ही बच्चे को जन्म दिया। बाद में पुलिस ने लेधा के पति को सरगुजा के बीच गांव में तब गोली गोली मारी जब पुलिस ने उसे लोधा के माध्यम से नौकरी और पैसे का लालच देकर आत्मसमर्पण के लिए रजामंद किया था। इस घटना के तीन महीने बाद एक बार फिर पुलिस लेधा को उठाकर थाने ले गयी और वहां उसके साथ कल्लौरी की मौजूदगी में सामूहिक बलात्कार किया गया जो कई दिनों तक चलता रहा।
यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की त्रासदी का बखान करती है और वहां राष्ट्रीय संसाधनों की हो रही लूट के बारे में बताती है। यह रिपोर्ट उस बहस को पारदर्शी बनाती है जो नक्सलवाद के मसले को लेकर लगातार छिड़ी हुई है। साथ ही ऐसे में जबकि महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और बराबरी को लेकर चले आंदोलन के बाद देश एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ना चाहता है, सत्ता प्रतिष्ठान का यह पुरस्कार उसके इरादों, वादों और संवेदनशीलता का भी असली चेहरा सामने लाता है: संपादक

हिन्दुस्तान की जमीं का स्याह सच यह भी है

♦ पुण्य प्रसून वाजपेयी

देश के मूल निवासी आदिवासी को अगर भूख के बदले पुलिस की गोली खानी पड़े; आदिवासी महिला को पुलिस-प्रशासन जब चाहे, जिसे चाहे, उठा ले और बलात्कार करे, फिर रहम आए तो जिन्दा छोड़ दे या उसे भी मार दे; और यह सब देखते हुए किसी बच्चे की आंखों में अगर आक्रोश आ जाए तो गोली से छलनी होने के लिए उसे भी तैयार रहना पड़े; फिर भी कोई मामला अदालत की चैखट तक न पहुंचे, थानों में दर्ज न हो – तो क्या यह भरोसा जताया जा सकता है कि हिन्दुस्तान की जमीं पर यह संभव नहीं है? जी! दिल्ली से एक हजार किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके का सच यही है। लेकिन राज्य की नजर में ये इलाके आतंक पैदा करते हैं, संसदीय राजनीति को ठेंगा दिखाते हुए विकास की गति रोकना चाहते हैं। हिंसक कार्रवाइयों से पुलिस प्रशासन को निशाना बनाते हैं। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर व्यवस्था को खारिज कर विकल्प की बात करते हैं। इस नक्सली हिंसा को आदिवासी मदद करते हैं तो उन्हें राज्य कैसे बर्दाश्त कर सकता है? लेकिन राज्य या नक्सली हिंसा की थ्योरी से हटकर इन इलाकों में पुरखों से रहते आए आदिवासियों को लेकर सरकार या पुलिस प्रशासन का नजरिया आंतरिक सुरक्षा के नाम पर आदिवासियों को नक्सली करार देकर जिस तरह की पहल करता है, वह रोंगटे खड़े कर देता है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की पुलिस ने आदिवासी महिला लेधा को सीमा के नाम से गिरफ्तार किया। पुलिस ने आरोप लगाया कि मार्च 2006 में बम विस्फोट के जरिए जिन तीन केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों की मौत हुई उसके पीछे सीमा थी। अप्रैल 2006 में जिस वक्त सीमा को गिरफ्तार किया गया, वह गर्भवती थी। सीमा का पति रमेश नागेशिया माओवादियों से जुड़ा था। कोर्ट ने सीमा को डेढ़ साल की सजा सुनाई। सीमा ने जेल में बच्चे को जन्म दिया, जो काफी कमजोर था। अदालत ने इस दौरान पुलिस के कमजोर सबूत और हालात देखते हुए सीमा को पूरे मामले से बरी कर दिया, यानी मुकदमा ही खत्म कर दिया।

लेधा उर्फ सीमा नक्सली होने के आरोप से मुक्त हो गई। लेकिन पुलिस ने लेधा पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह अपने पति रमेश नागेशिया पर आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव बनाए। पुलिस ने नौकरी और पैसा देने का लोभ भी दिया। लेधा ने भी अपने पति को समझाया और कमजोर बेटे का वास्ता दिया कि आत्मसमर्पण करने से जीवन पटरी पर लौट सकता है। आखिरकार रमेश आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार हो गया।

28 मई, 2006 को सरगुजा के सिविलडाह गाव में आत्मसमर्पण की जगह ग्राम पंचायत के सचिव का घर तय हुआ। सरगुजा के एसपी सीआरपी कलौरी लेधा को लेकर सिविलडाह गांव पहुंचे। कुसुमी इलाके से अतिरिक्त फौज भी उनके साथ गई। इंतजार कर रहे रमेश को पुलिस ने पहुंचते ही भरपूर मारा। इतनी देर तक कि बदन नीला-काला पड़ गया। फिर एकाएक लेधा के सामने ही आर्मड् फोर्स के असिस्टेंट प्लाटून कमांडर ने रमेश की कनपटी पर रिवाल्वर लगा कर गोली चला दी। रमेश की मौके पर ही मौत हो गई। गोद में बच्चे को लेकर जमीन पर बैठी लेधा चिल्ला भी नहीं पाई। वह डर से कांपने लगी। लेधा को पुलिस शंकरगढ़ थाने ले गई, जहां उसे डराया-धमकाया गया कि कुछ भी देखा हुआ, किसी से कहा तो उसका हश्र भी नरेश की तरह होगा। लेधा खामोश रही।

लेकिन तीन महीने बाद ही दशहरे के दिन पुलिस लेधा और उसके बूढ़े बाप को गांव के घर से उठाकर थाने ले गई, जहां एसपी कल्लौरी की मौजूदगी में और बाप के ही सामने लेधा को नंगा कर बलात्कार किया गया। फिर अगले दस दिनों तक लेधा को थाने में ही सामूहिक तौर पर हवस का शिकार बनाया जाता रहा। इस पूरे दौर में लेधा के बाप को तो अलग कमरे में रखा गया, मगर लेधा का कमजोर और न बोल सकने वाला बेटा रंजीत रोते हुए सूनी आंखों से बेबस-सा सब कुछ देखता रहा। लेधा बावजूद इन सबके, मरी नहीं। वह जिंदा है और समूचा मामला लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भी जा पहुंची। जनवरी 2007 में बिलासपुर हाईकोर्ट ने मामला दर्ज भी कर लिया। पहली सुनवाई में सरकार की तरफ से कहा गया कि लेधा झूठ बोल रही है।

दूसरी सुनवाई का इंतजार लेधा, उसके मां-बाप और गांववालों को है कि शायद अदालत कोई फैसला उनके हक में यह कहते हुए दे दे कि अब कोई पुलिसवाला किसी गांववाले को नक्सली के नाम पर गोली नहीं मारेगा, इज्जत नहीं लूटेगा। लेधा या गांववालों को सिर्फ इतनी राहत इसलिए चाहिए, क्योंकि इस पूरे इलाके का यह पहला मामला है जो अदालत की चैखट तक पहुंचा है। लेधा जैसी कई आदिवासी महिलाओं की बीते एक साल में लेधा से भी बुरी गत बनाई गई। लेधा तो जिंदा है, कइयों को मार दिया गया। बीते एक साल के दौरान थाने में बलात्कार के बाद हत्या के छह मामले आए। पेद्दाकोरमा गांव की मोडियम सुक्की और कुरसम लक्के, मूकावेल्ली गांव की वेडिंजे मल्ली और वेडिंजे नग्गी, कोटलू गांव की बोग्गाम सोमवारी और एटेपाड गांव की मडकाम सन्नी को पहले हवस का शिकार बनाया फिर मौत दे दी गई। मडकाम सन्नी और वेडिंजे नग्गी तो गर्भवती थीं। ये सभी मामले थाने में दर्ज भी हुए और मिटा भी दिए गए। मगर यह सच इतना सीमित भी नहीं है। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना किसी एक गांव की नहीं है, बल्कि दर्जन भर ऐसे गांव हैं। कोण्डम गांव की माडवी बुधरी, सोमली और मुन्नी, फूलगट्टी गाँव की कुरसा संतो और कडती मुन्नी, कर्रेबोधली गांव की मोडियम सीमो और बोग्गम संपो, पल्लेवाया गाँव की ओयम बाली, कर्रेमरका गाँव की तल्लम जमली और कडती जयमती, जांगला गांव की कोरसा बुटकी, कमलू जय्यू और कोरसा मुन्नी, कर्रे पोन्दुम गाँव की रुकनी, माडवी कोपे और माडवी पार्वती समेत तेइस महिलाओं के साथ अलग-अलग थाना क्षेत्रों में बलात्कार हुआ। इनमें से दो महिलाएं गर्भवती थीं। दोनों के बच्चे मरे पैदा हुए। नीलम गांव की बोग्गम गूगे तो अब कभी भी मां नहीं बन पाएगी।

सवाल सिर्फ महिलाओं की त्रासदी या आदिवासियों के घर में लड़की-महिला के सुरक्षित होने भर का नहीं है। दरअसल आदिवासी महिला के जरिये तो पुलिस-सुरक्षाकर्मियों को कडक (आतंक होने) का संदेश समूचे इलाके में दिया जाता है। यह काम तेंदूपत्ता जमा कराने वाले ठेकेदार करते हैं। चूंकि तेंदूपत्ता को खुले बाजार में बेचकर ठेकेदार लाखों कमाते हैं, इसलिए वे सुरक्षाकर्मियों के लिए नक्सलियों के बारे में जानकारी देने का सूत्र भी बन जाते हैं। नक्सलियों की पहल की कोई भी सूचना इलाके में तैनात सुरक्षाकर्मियों के लिए भी उपलब्धि मानी जाती है, जिससे वे बड़े अधिकारियों के सामने सक्षम साबित होते हैं और यह पदोन्नति का आधार बनता है। इलाके में तेंदूपत्ता ठेकेदार की खासी अहमियत होती है। एक तरफ आदिवासियों के लिए छह महीने का रोजगार तो दूसरी तरफ पुलिस के लिए खुफियागिरी। ज्यादातर मामलों में जब ठेकेदार को लगता है कि तेंदूपत्ता को जमा करने वाले आदिवासी ज्यादा मजदूरी की मांग कर रहे हैं तो वह किसी भी आदिवासी महिला के संबंध नक्सलियों से होने की बात पुलिस-जवान से खुफिया तौर पर कहता है और अंजाम होता है बलात्कार या हत्या। उसके बाद ठेकेदार की फिर चल निकलती है। तेंदूपत्ता आदिवासियों के शोषण और ठेकेदार-सरकारी कर्मचारियों के लिए मुनाफे का प्रतीक भी है। खासकर जब से अविभाजित मध्यप्रदेश सरकार ने तेंदूपत्ता के राष्ट्रीयकरण और सहकारीकरण का फैसला किया तब से शोषण और बढ़ा। बोनस के नाम पर सरकारी कर्मचारी हर साल, हर जिले में लाखों रुपये डकार लेते हैं। बोनस की रकम कभी आदिवासियों तक नहीं पहुंचती। वहीं मजदूरी का दर्द अलग है। महाराष्ट्र में सत्तर पत्तों वाली तेंदूपत्ता की गड्डी की मजदूरी डेढ़ रुपये मिलती है, वहीं छत्तीसगढ़ में महज 45 पैसे ही प्रति गड्डी दिए जाते हैं। कई गांवों में सिर्फ 25 पैसे प्रति गड्डी ठेकेदार देता है। ऐसे में, कोई आदिवासी अगर विरोध करता है, तो इलाके में तैनात सुरक्षाकर्मियों को उस आदिवासी या उस गांववालों के संपर्क-संबंध नक्सलियों से होने की जानकारी खुफिया तौर पर ठेकेदार पहुंचाता है। उसके बाद हत्या, लूट, बलात्कार का सिलसिला चल पड़ता है।

यह सब आदिवासी बहुल इलाकों में कैसे बदस्तूर जारी है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि पिछले साल जुलाई से अक्टूबर के दौरान पचास से ज्यादा आदिवासियों को सुरक्षाकर्मियों ने निशाना बनाया। दर्जनों महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई। गांव जलाए गए। मवेशियों को खत्म किया गया। एक लिहाज से समूचे इलाके को उजाड़ बनाने की कोशिश भी की जाती रही है। यानी, एक तरफ ठेकेदार रणनीति के तहत आदिवासियों को जवानों के सामने झोंकता है, तो दूसरी तरफ विकास के गोरखधंधे में जमीन की जरूरत सरकार को महसूस होती है, तो वह भी जमीन से आदिवासियों को बेदखल करने की कार्रवाई इसी तरह कई-कई गांवों में करती है। इसमें एक स्तर पर नक्सलियों से भिडने पहुंचे केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवान होते हैं तो दूसरे स्तर पर राज्य की पुलिस। इन इलाकों में जमीन हथियाने के लिए आदिवासियों के हाट बाजार तक को प्रतिबंधित करने से स्थानीय पुलिस-प्रशासन नहीं हिचकते।

जुलाई से अक्टूबर, 2006 के दौरान इसी इलाके में 54 आदिवासी पुलिस की गोली से मारे गए जिनमें सबसे ज्यादा सितंबर में इकतीस मारे गए। इनमें से 16 आदिवासियों का रोजगार गारंटी योजना के तहत नाम पहले भी दर्ज था, अब भी है। इसके अलावा कोतरापाल, मनकेवल, मुंडेर, अलबूर, पोट्टायम, मज्जीमेडरी, पुल्लुम और चिन्नाकोरमा समेत 18 गांव ऐसे हैं जहां के ढाई सौ से ज्यादा आदिवासी लापता हैं। सरकार की अलग-अलग कल्याणकारी योजनाओं में इनमें से 128 आदिवासियों के नाम अब भी दर्ज हैं। पैसा बीते छह महीने से कागज पर इनके घर पहुंच रहा है। हस्ताक्षर भी कागज पर हैं। लेकिन ये आदिवासी हैं कहां? कोई नहीं जानता। पुलिस बंदूक थामे सीधे कहती है कि उनका काम आदिवासियों को तलाशना नहीं, कानून-व्यवस्था बरकरार रखना है।
मगर कानून-व्यवस्था कैसे बरकरार रखी जाती है, इसका नमूना कहीं ज्यादा त्रासद है। 21 जुलाई को पोन्दुम गांव में दो किसानों के घर जलाए गए। पल्लेवाया गांव में लूटपाट और तोडफोड़ की गई। तीन आदिवासी महिलाओं समेत दस लोगों को गिरफ्तार किया गया। 22 जुलाई को पुलिस ने मुंडेर गांव पर कहर बरपाया। मवेशियों को मार दिया गया या सुरक्षाकर्मी पकड़ ले गए। दस घरों में आग लगा दी गई। गांववालों ने गांव छोड़ बगल के गांव फूलगट्टा में शरण ली।

25 जुलाई को फूलगट्टा गांव को निशाना बनाया गया। पचास आदिवासियों को पकड़कर थाने ले जाया गया। 29 जुलाई को कर्रेबोदली गांव निशाना बना। आदिवासियों के साथ मारपीट की गई। पंद्रह आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया। अगस्त के पहले हफ्ते में मजिमेंडरी गांव को निशाना बनाया गया। सुअरबाड़ा और मुर्गाबाड़ा को जला दिया गया। एक दर्जन आदिवासियों को पकड़कर थाने में कई दिनों तक प्रताडि़त किया गया। इसी हफ्ते फरसेगढ़ थाना क्षेत्र के कर्रेमरका गांव के कई आदिवासियों (महिलाओं समेत) को गिरफ्तार कर अभद्र व्यवहार किया गया। 11 अगस्त को कोतरापाल गांव में पुलिस ने फायरिंग की। आत्म बोडी और लेकर बुधराम समेत तीन किसान मारे गए। पुलिस ने तीनों को नक्सली करार दिया और एनकाउंटर में मौत बताई। 12 अगस्त को कत्तूर गांव के दो किसानों को कुटरू बाजार में पुलिस ने पकड़ा। बाद में दोनों के नाम एनकाउंटर में थाने में दर्ज किए गए। 15 अगस्त को जांगला गांव में पांच किसानों के घरों में तेंदूपत्ता ठेकेदार ने आग लगवाई। मामला थाने पहुंचा तो ठेकेदार को थाने ने ही आश्रय दे दिया। यानी मामला दर्ज ही नहीं किया गया। जो दर्ज हुआ उसके मुताबिक नक्सलियों के संबंध जांगला गांव वालों से हैं।

अगस्त के आखिरी हफ्ते में डोलउल, आकवा, जोजेर गाँव को निशाना बनाया गया। ईरिल गांव के सुक्कु किसान की जघन्य हत्या की गई। सिर अगले दिन पेड़ पर टंगा पाया गया। आदिवासी इतने दहशत में आ गए कि कई दिनों तक खेतों में जाना छोड़ दिया। इस घटना की कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई।

25 सितंबर को बीजापुर तहसील के मनकेल गांव में किसान-आदिवासियों के दर्जन भर से ज्यादा घरों में आग लगाई गई। पांच महिला आदिवासी और दो बच्चों को पुलिस थाने ले गई, जिनका अब तक कोई अता-पता नहीं है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में ही इन्द्रावती नदी में चार आदिवासियों के शव देखे गए। उन्हें किसने मारा और नदी में कब फेंका गया, इस पर पुलिस कुछ नहीं कहती। गांववालों के मुताबिक हाट-बाजार से जिन आदिवासियों को सुरक्षाकर्मी अपने साथ ले गए उनमें ये चार भी थे।

पांच अक्टूबर को बीजापुर तहसील के मुक्कावेल्ली गांव की दो महिला वेडिंजे नग्गी और वेडिंजे मल्ली पुलिस गोली से मारी गईं। अक्टूबर के पहले हफ्ते में जेगुरगोण्डा के राजिम गांव में पांच महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। इनके साथ पकड़े गए एक किसान की दो दिन बाद मौत हो गई, मगर पुलिस फाइल में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। इसी दौर में पुलिस की गोली के शिकार बच्चों का मामला भी तीन थानों में दर्ज किया गया। मगर मामला नक्सलियों से लोहा लेने के लिए तैनात पुलिसकर्मियों से जुड़ा था, तो दर्ज मामलों को दो घंटे से दो दिन के भीतर मिटाने में थानेदारों ने देरी नहीं की।

दो सितंबर 2006 को नगा पुलिस की गोली से अडियल गांव का 12 साल का कड़ती कुमाल मारा गया। तीन अक्टूबर 2006 को 14 साल के राजू की मौत लोवा गांव में पुलिस की गोली से हुई। पांच अक्टूबर 2006 को तो मुकावेल्ली गांव में डेढ़ साल के बच्चे को पुलिस की गोली लगी। 10 अक्टूबर 2006 को पराल गांव में 14 साल का लड़का बारसा सोनू पुलिस की गोली से मरा। ऐसी बहुतेरी घटनाएं हैं जो थानों तक नहीं पहुंची हैं। इस सच की पारदर्शिता में पुलिस का सच इसी बीते एक साल के दौर में आधुनिकीकरण के नाम पर सामने आ सकता है। मसलन, सात सौ करोड़ रुपये गाडि़यों और हथियारों के नाम पर आए। बारह सौ करोड़ रुपये इस इलाके में सड़क की बेहतरी के लिए आए। थानों की दीवारें मजबूत हों, इसलिए थानों और पुलिस गेस्टहाउसों की इमारतों के निर्माण के लिए सरकार ने डेढ़ सौ करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जबकि इस पूरे इलाके में हर आदिवासी को दो जून की रोटी मिल जाए, महज इतनी व्यवस्था करने के लिए सरकार का खुद का आंकड़ा है कि सौ करोड़ में हर समस्या का निदान हो सकता है। लेकिन इसमें पुलिस प्रशासन, ग्राम पंचायत और विधायक-सांसदों के बीच पैसों की बंदरबांट न हो, तभी यह संभव है। हां, बीते एक साल में जो एक हजार करोड़ रुपये पुलिस, सड़क, इमारत के नाम पर आए, उनमें से सौ करोड़ रुपये का खर्च भी दिखाने-बताने के लिए इस पूरे इलाके में कुछ नहीं है।

सुरक्षा बंदोबस्त के लिए राज्य पुलिस के अलावा छह राज्यों के सुरक्षा बल यहां तैनात हैं। सरकार की फाइल में यइ इलाका कश्मीर और नगालैंड के बाद सबसे ज्यादा संवेदनशील है। इसलिए इस बंदोबस्त पर ही हर दिन का खर्चा राज्य के आदिवासियों की सालाना कमाई से ज्यादा आता है। नब्बे फीसद आदिवासी गरीबी की रेखा से नीचे हैं। देश के सबसे गरीब आदिवासी होने का तमगा इनके माथे पर लगा है। सबसे महंगी सुरक्षा बंदोबस्त भी इसी इलाके में है। हर दिन का खर्चा सात से नौ करोड़ तक का है।

दरअसल, इतना महंगा सुरक्षा बंदोबस्त और इतने बदहाल आदिवासियों का मतलब सिर्फ इतना भर नहीं है। इसका महत्त्वपूर्ण पहलू छत्तीसगढ़ का सबसे समृद्ध राज्य होना है। देश का नब्बे फीसद टीन अयस्क यहीं पर मौजूद है। देश का 16 फीसद कोयला, 19 फीसद लौह अयस्क और पचास फीसद हीरा यहीं मिलता है। कुल 28 कीमती खनिज यहीं मौजूद हैं। इतना ही नहीं, 46,600 करोड़ क्यूबिक मीटर जल संसाधन का भंडार यहीं है और सबसे सस्ती-सुलभ मानव श्रमशक्ति तो है ही। बीते पांच सालों के दौरान (पहले कांग्रेस और फिर भाजपा) राज्य सरकार की ही पहल पर ऐसी छह रिपोर्टें आईं, जिनमें सीधे तौर पर माना गया कि खनिज संपदा से ही अगर आदिवासियों का जीवन और समूचा बुनियादी ढांचा जोड़ दिया जाए तो तमाम समस्याओं से निपटा जा सकता है। मगर आदिवासियों के लिए न तो खनिज संपदा का कोई मतलब है, न ही जंगल का। जो बुनियादी ढांचा विकास के नाम पर बनाया जा रहा है उसके पीछे रुपया कम, डालर ज्यादा है। सुरक्षा बंदोबस्त का हाल यह है कि यहां तैनात ज्यादातर पुलिसकर्मियों के घर अन्य प्रांतों में हैं, तो वे वहां के अपने परिवारों की सुख-सुविधाओं के लिए भी यहीं से धन उगाही कर लेना चाहते हैं। ऐसे में उनका जुड़ाव यहां से होता ही नहीं।

सामाजिक सरोकार जब एक संस्थान का दूसरे संस्थान या सुरक्षाकर्मियों का आम आदिवासियों से नहीं है और राज्य सरकार अगर अपनी पूंजी से ज्यादा बाहरी पूंजी-उत्पाद पर निर्भर है, तो हर कोई दलाल या सेल्समैन की भूमिका में ही मौजूद है। थाने से लेकर केन्द्रीय बल और कलेक्टर से लेकर विधायक तक सभी अपने-अपने घेरे में धन की उगाही के लिए सेल्समैन बन गए हैं। करोड़ों के वारे-न्यारे कैसे होते हैं, वह भी भुखमरी में डूबे आदिवासियों के इलाके में यह देशी-विदेशी कंपनियों की परियोजनाओं के खाके को देखकर समझा जा सकता है।

अमेरिकी कंपनी टेक्सास पावर जेनरेशन के जरिए राज्य में एक हजार मेगावाट बिजली उत्पाद का संयंत्र खोलने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए। यानी बीस लाख डालर राज्य में आएंगे। अमेरिका की ही वन इंकार्पोरेट कंपनी ने पचास करोड़ रुपये की दवा फैक्टरी लगाने पर समझौता किया। छत्तीसगढ़ बिजली बोर्ड ने इफको (इंडियन फामर्स को-ऑपरेटिव लिमिटेड) के साथ मिलकर पांच हजार करोड़ की लागत से सरगुजा में एक हजार मेगावाट का बिजली संयंत्र लगाने का समझौता किया। इसमें राज्य का हिस्सा 26 फीसद, तो इफको का 74 फीसद है। बिजली के निजीकरण के सवाल के बीच ऐसे संयंत्र का मतलब है कि भविष्य में यह भी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को दस हजार करोड़ में बेच दिया जाएगा। टाटा कंपनी विश्व बैंक की मदद से दस हजार करोड़ की लागत से बस्तर में स्टील प्लांट स्थपित करने जा रही है। एस्सार कंपनी के साथ भी सात हजार करोड़ की लागत से स्टील प्लांट लगाने पर सहमति बनी है। एस्सार कंपनी चार हजार करोड़ की लागत से कास्टिक पावर प्लांट की भी स्थापना करेगी। प्रकाश स्पंज आयरन लिमिटेड की रुचि कोयला खदान खोलने में है। उसे कोरबा में जमीन पसंद आई है। इसके अलावा एक दर्जन बहुराष्ट्रीय कंपनियां खनिज संसाधनों से भरपूर जमीन का दोहन कर पचास हजार करोड़ रुपये इस इलाके में लगाना चाहती है। इसमें पहले कागजात तैयार करने में ही सत्ताधारियों की अंटी में पांच सौ करोड़ रुपये पहुंच चुके हैं।

कौडि़यों के मोल में किस तरह का समझौता होता है इसका नजारा बैलाडिला में मिलता है। बैलाडिला खदानों से जो लोहा निकलता है उसे जापान को 160 रुपये प्रति टन (16 पैसे प्रति किलोग्राम) बेचा जाता है। वही लोहा मुंबई के उद्योगों के लिए दूसरी कंपनियों को 450 रुपये प्रति टन और छत्तीसगढ़ के उद्योगपतियों को सोलह सौ रुपये प्रतिटन के हिसाब से बेचा जाता है। जाहिर है नगरनार स्टील प्लांट, टिस्को, एस्सार पाइपलाइन परियोजना (बैलाडिला से जापान को पानी के जरिए लौह-चूर्ण भेजने वाली परियोजना), इन सभी से बस्तर में मौजूद जल संपदा का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है। अभी ही किसानों के लिए भरपूर पानी नहीं है। खेती चैपट हो रही है। किसान आत्महत्या को मजबूर है या पेट पालने के लिए शहरों में गगनचुबी इमारतों के निर्माण में बतौर ईंट ढोने वाला मजदूर बन रहा है या ईंट भट्टियों में छत्तीसगढ़वासी के तौर पर अपनी श्रमशक्ति सस्ते में बेचकर जीने को मजबूर है।

इन तमाम पहलुओं का आखिरी सच यह है कि अगर तमाम परियोजनाओं को अमली जामा पहनाया जाएगा तो राज्य की 60 फीसद कृषि योग्य जमीन किसानों के हाथ से निकल जाएगी। यानी स्पेशल इकोनामिक जोन (एसईजेड) के बगैर ही 50 हजार एकड़ भूमि पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। करीब दस लाख आदिवासी किसान अपनी जमीन गंवाकर उद्योगों पर निर्भर हो जायेंगे।

सवाल है कि इसी दौर में इन्हीं आदिवासी बहुल इलाके को लेकर केन्द्र सरकार की भी तीन बैठकें हुईं। चूंकि यह इलाका नक्सल प्रभावित है, ऐसे में केन्द्र की बैठक में आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर ऐसी बैठकों को अंजाम दिया गया। नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री, गृह सचिव और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की गृह मंत्रालय से लेकर प्रधानमंत्री तक के साथ बैठक हुई। तीनों स्तर की बैठकों में इन इलाकों में तैनात जवानों को ज्यादा आधुनिक हथियार और यंत्र मुहैया कराने पर विचार हुआ।

चूंकि नौ राज्यों के सभी नक्सल प्रभावित इलाके पिछड़े-गरीब के खांचे में आते हैं तो आधारभूत संरचना बनाने पर जोर दिया गया। हर राज्य के मुख्यमंत्री ने विकास का सवाल खड़ा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आवाजाही में आ रही परेशानियों का हवाला दिया और केन्द्र से मदद मांगी। तीनों स्तर की बैठकों में इस बात पर सहमति बनी कि विकास और उद्योगों को स्थापित करने से कोई राज्य समझौता नहीं करेगा। यानी हर हाल में इन इलाकों में सड़कें बिछाई जायेंगी, रोशनी जगमग कर दी जायेगी जिससे पूंजी लगाने वाले आकर्षित होते रहें।

किसी बैठक में लेधा जैसी सैकड़ों आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार का जिक्र नहीं हुआ। किसी स्तर पर यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि आदिवासी बहुल इलाके में गोली खा कौन रहा है? खून किसका बह रहा है? किसी अधिकारी ने यह कहने की जहमत नहीं उठाई कि इतनी बड़ी तादाद में मारे जा रहे आदिवासी चाहते क्या हैं? इतना ही नहीं, हर बैठक में नक्सलियों की संख्या बताकर हर स्तर के अधिकारियों ने यही जानकारी दी कि उनके राज्य में इस आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर काबू पाने के लिए कौन-कौन से तरीके अपनाए जा रहे हैं। हर बैठक में मारे गए नक्सलियों की संख्या का जिक्र जरूर किया गया। छत्तीसगढ़ की सरकार ने भी हर बैठक में उन आंकड़ों का जिक्र किया जिससे पुलिस की ‘बहादुरी’ को मान्यता दिलाई जा सके। राज्य के सचिव स्तर से लेकर देश के गृहमंत्री तक ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि नक्सलियों को मारने के जो आंकड़े दिए जा रहे हैं उसमें किसी का नाम भी जाना जाए। उम्र भी पूछी जाए। थानों में दर्ज मामले के बारे में भी कोई जानकारी हासिल की जाए। सरकार की किसी बैठक या किसी रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं है कि जो नक्सली बताकर मारे गए और मारे जा रहे हैं, वे आदिवासी हैं।

एक बार भी यह सवाल किसी ने उठाने की जहमत नहीं उठाई कि कहीं नक्सलियों को ठिकाने लगाने के नाम पर फर्जी मुठभेड़ का सिलसिला तो नहीं जारी है? कोई भी नहीं सोच पाया कि जंगल गांव में रहने वाले आदिवासियों से अगर पुलिस को मुठभेड़ करनी पड़ रही है तो अपने जंगलों से वाकिफ आदिवासी ही क्यों मारा जा रहा है? अपने इलाके में वह कहीं ज्यादा सक्षम है। सैकड़ों की तादाद में फर्जी मुठभेड़, आखिर संकेत क्या हैं? जाहिर है, इन सवालों का जवाब देने की न कोई मजबूरी है या ना जरूरत ही है सरकार को। मगर सरकार अगर यह कह कर बचती है कि पुलिसिया आतंक की ऐसी जानकारी उसके पास नहीं आई है और वह बेदाग है, तो संकट महज आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मारने या नक्सलियों का हवाला देकर आंतरिक सुरक्षा पुता बनाने का नहीं है, बल्कि संकट उस लोकतंत्र पर है जिसका हवाला देकर सत्ता बेहिचक खौफ पैदा करने से भी नहीं कतराती।

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Saturday, September 3, 2016

एक बेटी की अपील : जेल में बंद पिता की रिहाई के लिए;

शनिवार, 3 सितंबर 2016
एक बेटी की अपील : जेल में बंद पिता की रिहाई के लिए;





( संघर्ष संवाद )

इस तस्वीर को ध्यान से देखिए, यह तस्वीर ओडिशा के नियमगिरि के डोंगरिया कोंध आदिवासी दसरू कडरका की बेटी का है जो अपने पिता की रिहाई की मांग को लेकर हाथ में पिता का वोटर कार्ड लिए हुए है.  दसरू कडरका नियामगिरी सुरक्षा समिति का कार्यकर्ता था ।
 पांच  माह पहले मुनिगड़ा बाजार से पुलिस ने माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया  तब से बिना कोई सबूत  के जेल में है । देश भर में 2 सितंबर की आम हड़ताल को नियामगिरी के डोंगरिया कोंद आदिवासियों ने पूर्ण समर्थन दिया। इस आम हड़ताल के समर्थन में स्थानीय निवासी अपनी  समस्याओं जिसमें फर्जी गिरफ्तारियां तथा पुलिस उत्पीड़न समेत दसरू कडरका की  बेटी ने अपने पिता की रिहाई की मांग की है ;

नियामगिरी सुरक्षा समिति के पच्चीस वर्षीय कार्यकर्ता दसरू कडरका को 7 अप्रैल 2016 को मुनिगड़ा बाजार से माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया पिछले पांच महीने से पुलिस आरोप को प्रमाणित करता कोई सबूत नहीं जुटा पाई है । पुलिस ने उस पर आगजनी, लूट, हत्या और कॉम्बैट आपरेशन के दौरान पुलिस बल पर हमले जैसे कई झूठे केस लगाए हैं।

यह कोई पहली घटना नहीं है। 27 फरवरी को नियामगिरी सुरक्षा समिति के कार्यकर्ता, 20 वर्षीय छात्र, मुंडा कडरका को अर्ध सैनिक बलों द्वारा एक फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। 28 नवंबर को नियामगिरी सुरक्षा समिति के नेता द्रिका कडरका ने पुलिस यातना के बाद आत्महत्या कर ली।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि यह नियामगिरी के संघर्षशील डोंगरिया कोंद आदिवासियों को डराने धमकाने के लिए सरकार की साजिश है जिससे कि वह वेंदाता कंपनी के खिलाफ लड़ रहे अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा की लड़ाई में घुटने टेक दें। यह डोंगरिया कोंध आदिवासियों, जिन्होंने सर्वोच्च न्यायलय की एक निर्देशिका का पालन करते हुए 2013 में ग्राम सभा की बैठक में खनन परियोजना का सर्वसम्मति से अस्वीकृत कर दिया था, के जनवादी आंदोलन को नष्ट करने की साजिश है।

दस हजार से कम आबादी वाली डोंगरिया कोंध जन जाति खासतौर पर एक कमजोर जनजाति समूह के रूप में चिन्हित है।
 इस तरह से इस समुदाय के युवाओं की हत्या या इस हद तक यातना देना कि वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाएं या फिर उनके संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज करना एक तरह से इस हाशिए पर खड़े समुदाय पर प्रत्यक्ष हमला है। नियामगिरी लगभग सात सालों से अर्ध सैनिक बलों के कब्जे में है जिसने पर्वतीय इलाकों में एक डर का माहौल व्याप्त कर रखा है।
 इन सात सालों में नियमागिरी सुरक्षा समिति के अध्यक्ष लाडो सिकाका के अवैध अपहरण और यातना समेत सुरक्षा बलों द्वारा डोंगरिया कोंध आदिवासियों के अनेकों अवैध अपहरण, गिरफ्तारियों और उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं।
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Friday, September 2, 2016

मोहन भागवत जी किसके साथ महाभारत का युद्ध करना चाहते हो ?

मोहन भागवत जी किसके साथ महाभारत का युद्ध करना चाहते हो ?
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* राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हिन्दुत्व की स्थापना के लिए कार्यकर्ता महाभारत के लिए तैयार रहें.
 ** अपने वक्तव्यों को सिद्ध करने के लिए भागवत ने तमाम हिंसा और युद्धों के उदाहरण भी दिए। उन्होंने कहा कि धर्म स्थापना के लिए ही महाभारत का युद्ध हुआ.
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अभी आगरा में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बडी गंभीर चेतावनी दी पूरे भारतीय समाज को .
उन्होंने कहा कि संघ को महाभारत के लिये तैयार रहना होगा ,आदि आदि .

इतनी गंभीर हिंसक चेतावनी के बाद कही कोई चर्चा या बात तक नहीं हो रही है ?
सहज स्वाभाविक प्रश्न है कि संघ किन से और क्यों महाभारत का हिंसक युद्ध चाहता है.
उन्हें धर्म की स्थापना से कौन रोक रहा है.
महाभारत की तरह उनसे किसने छल किया है और किसने इनके हिस्से की ज़मीन देने से इंकार कर दिया है.
किस द्रोपदी का किसने अपमान किया है .
ये खुद कौरव है या पाण्डव !
एक तथ्य यह भी है कि महाभारत में युद्ध की चेतावनी पाण्डव नही कुटिल कौरव बार बार देते थे.
और हां युद्ध में मोहन तो पाण्डवों के साथ खड़े थे ,यहाँ तो मोहन हज़ार मूंह की सैना कौरव की तरफ से  टंकार भर रहे है .
और वैसे भी मोहन की पूरी सैना  कन्हैया (jnu) के पीछे पड गई थी  ,तो अब कृष्ण कन्हैया तो इनके साथ खड़े होने से रहे .
चलो मान लिया कि हिन्दू धर्म की स्थापना के लिये महाभारत लडने की तैयारी कर रहे है भागवत !
तो सबसे प्रमुख प्रश्न यही कि इस युद्ध में कौरव कौन होगा .
वही न !
जो इन्हें भारत को हिन्दू राष्ट्र  घोषित करने में बाधा डालेगा .
चलो पडतात कर लेते  है कि कौन कौन ऐसी ताकत है.
,जो इन्हें रोक सकता है .
सबसे पहले तो भारत का संविधान ही इनके आडे आता है .
वो कहता है कि भारत धर्मनिर्पेक्ष और समाजवादी होगा .
तो सबसे पहले इसे बदलो !
शायद इन्हें होश न हो ,संवैधानिक मूल अधिकार संविधान संशोधन से नहीं बदले जा सकते ,भले ही ये  शतप्रतिशत बहुमत आ जाये तो भी .
तब इनके पास एक ही रास्ता बच जायेगा ,जैसा दूसरे देशों में हुआ कि हिंसक तख्तापलट में संविधान ही निरस्त कर दिया जायें.
आप हंस रहे है !
दुनिया के कई देशों में धार्मिक और फासिस्ट उन्मादियों  ने ठीक एसा ही किया है .
तो सिद्ध पाया गया कि इनका पहला दुश्मन भारत का संविधान ही हुआ ।
अब  जो दूसरा दुश्मन इनके आडे आयेगा वह है भारत की बहुलता ,  उदारता ,बहुसंस्कृति ,बहुभाषा और भोगोलिक विभिन्नता भी इसकी इजाजत नहीं देता.
भारत का ढांचा ही एसा बना है जो एक धर्म एक संस्कृति एक भाषा और एक रीतिरिवाज की अनुमति नहीं देता .
और फिर
डायवरसिटी भी इनकी दुश्मन की तरह सामने खडी है
जातिगत भेदभाव और भेदभावपूर्ण व्यवहार भी इनके आड़े आयेगा ही .
और फिर जिनके खिलाफ लड लड के संघ खड़ा हुआ ,
उदार हिन्दू ,मुसलमान,इसाई ,बौध्द ,दलित ,आदिवासी किसान ,मजदूर ,महिला निश्चित ही तुम्हारे खिलाफ खड़े है .
काश्मीर ,पूर्वी भारत और बस्तर में तो कबसे युद्ध थोप रखा है .
तो मोहन भागवत !
तुम भी सुई की नौक बराबर कुछ भी दैने को तैयार नहीं हो ,जिनका  हक़ बनता है भारत में बराबरी का .
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Thursday, September 1, 2016

बस्तर में जारी खूनी जंग और कार्पोरेट लूट के खिलाफ जन सम्मेलन : 3 सितम्बर 2016, गांधी पीस फाउंडेशन , नई दिल्ली


बस्तर में जारी खूनी जंग और कार्पोरेट लूट के खिलाफ जन सम्मेलन : 3 सितम्बर 2016, गांधी पीस फाउंडेशन , नई दिल्ली



स्थान : गांधी पीस फाउंडेशन , नई दिल्ली

एक घमासान युद्ध चुपचाप देश के सबसे गरीब जनता पर भारतीय राज्य द्वारा छेड़ा जा रहा है। ऑपरेशन ग्रीन हंट नामक यह युद्ध  छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और केरल के कुछ हिस्सों में रहने वाले आदिवासी और अन्य वन निवासी  समुदायों पर क्रूर दमन है। बस्तर वर्तमान में इस युद्ध की नसों का केंद्र है। राज्य दमन तेज हो गया है, विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में अपनी नवीनतम अवतार में, यानी, मिशन 2016 ।

मानव अधिकारों का उल्लंघन भी कई गुना बढ़ चुका है। आदिवासियों के जल जंगल जमीन को 'विकास' के नाम पर बड़ी कंपनियों और खनन माफिया के हाथों बेचा जा रहा है और उनके प्रतिरोध की आवाज़ों को कुचलने की पूरी कोशिश में सरकार जुटी हुई है। पिछले एक साल में करीब नब्बे लोग फर्जी मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। इस युद्ध की वास्तविकता स्पष्ट करने के लिए सिर्फ तीन उदहारण काफी हैं-

अगस्त 16 वीं को अर्जुन कश्यप नामक एक 19 साल के युवक को एक फर्जी मुठभेड़ में सीआरपीएफ द्वारा बेरहमी से मार दिया गया। उसे एक खतरनाक 'माओवादी नेता' घोषित किया गया। पिछले साल अर्जुन को माओवादी होने के झूठे आरोप में फंसाया गया और गिरफ्तार किया गया था। जब उसके वकीलों ने यह स्थापित किया की में दर्ज किये जाने वाले नाम का युवक वह नहीं है तो उसे बेल मिल गयी थी। उसके केस की कार्यवाही चल रही थी और आखरी कोर्ट की तारीक 30  अगस्त थी। इससे पहले कि उसे रिहाई का मौका मिलता , उसे मार दिया गया।

13 जून को मड़कम हिड़मे नामक एक युवती को सुरक्षा कर्मियों ने दंतेवाड़ा में उसके घर से जंगल तक घसीटा, उसका सामूहिक बलात्कार किया और अंत में मार दिया। बाद में उसे वर्दी पहना कर माओवादी करार दिया गया जब की उनकी कहानी झूठी घटनाओं में उलझी हुई थी।

सीतु हेमला नामक बस्तर के एक आदिवासी ग्रामीण युवक पर सुरक्षा बलों ने घोर अत्याचार कर उसकी गोली मारकर हत्या की। उसका अपराध? उसका नाम एक माओवादी कमांडर के साथ मिलता था। सीतु पालनार के गाँव में खेती करने वाला एक साधारण युवक था। क्या एक तथाकथित लोकतंत्र का कानून ऐसे अत्याचार से लागू किया जा सकता है, जहाँ एक साधारण मनुष्य को कोर्ट से पहले ही माओवादी करार कर उसके मृत शरीर के साथ निशानेबाज़ी का खिलवाड़ किया जाय?

ऑपरेशन ग्रीन हंट का जाल फैला जा रहा है। बस कुछ ही दिन पहले, 8 जुलाई को फिर से, कांधमाल, ओडिशा में, पांच दलित आदिवासी ग्रामीणों पर अंधाधुंध गोली चलाई गयी और उन्हें मारा गया। वे बैंक से अपना वेतन लेकर वापस अपने गांव जा रहे थे। इन लोगों के बीच एक दो साल का बच्चा भी था- उसे भी शायद यह सुरक्षा कर्मी इस देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं। निश्चित रूप से पुलिस ने फिर इस घटना को एक वास्तविक मुठभेड़ के रंग में रंगने की कोशिश की। लेकिन यह असंभव है कि यात्रियों से भरी एक गाड़ी ऐसे एक मुठभेड़ के बीचों-बीच जाकर अटक जाय। गोलियां सिर्फ एक ही तरफ से चलीं और लोग भी एक ही तरफ के मारे गए। इससे पता चलता है की पुलिस झूठों का बाँध तोड़कर अपने हाथ उसी गंदे पानी से धो लेना चाहती है।
इस युद्ध का कोई साक्षी नहीं । सभी लोकतान्त्रिक आवाज़ों को यहाँ दबा दिया जा रहा है।  सोनी सोरी पर लगातार हो रहे हमले इस बात के प्रमाण हैं की प्रतिरोध करने वालों को यहाँ चैन से जीने नहीं दिया जायेगा।

कई स्थानीय पत्रकारों को फ़र्ज़ी मामलों में जेल भेजकर उनकी कस्टडी में पिटाई की जा रही है ताकि सच्ची पत्रकारिता करने का उन्हें दंड मिले। उन्हें लगातार डराया और धमकाया जा रहा है। जगदलपुर कानूनी कार्यवाही समूह नामक वकीलों का एक छोटा सा समूह, माओवादी होने के आरोप में विचाराधीन कैदी होने के दुष्चक्र में फंसे स्थानीय लोगों की कानूनी तौर पे मदद करता था। उन्हें भी राज्य सरकार ने प्रताड़ित कर बस्तर से डरा-धमका कर बाहर निकाल दिया है । अन्य शिक्षकों और मानवाधिकार संगठनों के सदस्यों को भी डराया गया है और इस क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को जारी रखने के खिलाफ चेतावनी दी गई है। सत्ता के खिलाफ सच बोलने की कीमत वास्तव में इन युद्धग्रस्त स्थानों में अधिक है।

यह याद किया जाना चाहिए कि यह हिंसा और दमन राज्य के नव-उदारवादी हवस से प्रेरित है। इन सभी क्षेत्रों में जो खनिज संसाधन हैं उन्हें टाटा, मित्तल, रिलायंस, अदानी, एस्सार, रियो-टिंटो जैसी बड़ी कंपनियां हड़पना चाहती हैं । वहां की राज्य सरकार इन आदिवासियों, जिन्होंने अपने खून पसीने से सींच कर इन जंगलों की सदियों से हिफाज़त की है,के साथ बलात्कार कर, उनकी हत्या कर, इन कंपनीयों की सहायता कर रही है।

यही मौका है हम जैसे विशेषाधिकृत लोगों के पास इस देश को दिखाने के लिए कि अनधिमान और चुप्पी के अलावा भी हम इन आदिवासियों की लड़ाई में अपना सहयोग दे सकते हैं। आगामी सम्मेलन में, पत्रकार, वकील, मानव अधिकार कार्यकर्ता और अन्य लोकतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ता बस्तर में चल रहे इस राज्य दमन के विरुद्ध और छत्तीसगढ़ के लोगों की लड़ाई में सहयोग देते हुए अपनी बात प्रस्तुत करेंगे। हम इस सम्मेलन में शामिल होने और इस युद्ध के खिलाफ अपने विरोध दर्ज करने के लिए हर संपृक्त नागरिक को आमंत्रित करते हैं।
 बुधवार, अगस्त 31, 2016