Saturday, January 2, 2016

चर्च गए तो राशन बंद कर दिया जायेगा ,पंचायत का फरमान


चर्च गए तो राशन बंद कर दिया जायेगा ,पंचायत का फरमान 




छत्‍तीसगढ़ के नारायणपुर के केरलापाल गांव के ग्राम पटेल, सरपंच, सहित चार लोगों ने तुगलकी फरमान जारी किया है. फरमान में मुख्यमंत्री रमन सिंह के आदेश का हवाला देकर चर्च जाने वाले ग्रामीणों को राशन नहीं देने का फरमान पंचायत ने जारी किया है.
साथ ही पंचायत ने स्‍पष्‍ट लहजों में चर्च जाने वाले परिवारों को हैंडपंप से पानी और मनरेगा के तहत काम न करने की चेतावनी दी है. ऐसे में राशन न मिलने से दो परिवार के सदस्यों ने मुख्यालय आकर कलेक्टर से राशन के लिए गुहार लगाई है.
कलेक्टर ने इस मामले की जांच के आदेश खाद्य निरीक्षक को दिए हैं. हालांकि, अधिकारी इस पूरे मामले में कैमरे के सामने कुछ भी कहने से बचते नजर आ रहे हैं.

आज पत्रकारों पे नक्सली समर्थक कहा गया ,कल तक यही आरोप जन संघटनो

आज पत्रकारों पे नक्सली समर्थक कहा गया ,कल तक यही आरोप जन संघटनो ,



उपरोक्त पोस्टर में सुकमा बोल रहा हूँ नमक वाट्सअप ग्रुप में पुलिस के किन्ही ग्रुप ने पहली बार पोस्ट किया गए थे 


आज पत्रकारों पे नक्सली समर्थक कहा गया ,कल तक यही आरोप जन संघटनो ,एन जी ओ ,स्वास्थ संघटन और आप पार्टी और सीपीआई पार्टी से लेके तमाम मानवाधिकार संघटन को बार बार नक्सली समर्थक होने के लगाये गये .
बस्तर क्षेत्र के निरीह गरीब और वंचित आदिवासी रोज रोज इन आरोपों के कारण प्रताड़ना भुगत रहे है .
इन सबके बारे में भी ठीक यही तर्क पेश किये गये जो संतोष या समारू के खिलाफ कहा गया ,ऐसे ही खूब कार्टून छापे गए और भी बहुत बहुत भुगता है इन लोगो ने .
ये सब बार बार और पूरी इमानदारी से कहते रहे की हमारा माओ वादियों से कोई लेना देना नही है ,और था भी नहीं .
हमने उनके दर्द को सुना समझा और भुगता है .
आप भी इनके बारे में निर्णय करते वक्त एक बार नही कई बार सोचिये की ये भी निर्दोष हो सकते है .

यह वही रक्त है, जो बहता है और एक माँ पैदा होती है

यह वही रक्त है, जो बहता है और एक माँ पैदा होती है 




सदमें मे हूँ, लखनऊ ऐसा तो न था, ये कौन लोग थे ? एक बेटा ऐसी हरकत तो नहीं कर सकता, तो क्या ये नराधम किसी माँ की औलाद नहीं है, तो किस कोख के जाये है ये ?
लखनऊ के मोहनलालगंज जहाँ यह नृशंश वारदात हुई, बेशक वह जगह जरा सुनसान हैं, पर लखनऊ वालों के मन इतनें भी सूनें तो नहीं थे कि दर्द से कराहती, चीखँती एक औरत की गुहार उस सूनेपन की भेंट चढ़ जाए ।
कभी एक औरत के बिखरे खूँन को देखा था, रक्तरंजित शरीर और सद्ध-प्रसूत बगल में पड़ा बच्चा। अस्पताल लाते रास्ते में ही हो गया था, सबकुछ ! पता नहीं क्यों, जबकि उसके घर वाले राहत की साँसे भर रहे थे, मै रो पड़ा था ।
यह फैला हुआ रक्त मुझे उस सद्ध-प्रसूता की याद दिला गया। इस रक्त से गुजरकर ही पैदा हुए होंगे वे नराधम भी। यह रक्त उनकी माँ का रक्त है, काश उनकी पैैदाइस वाला रक्त और पैदा हुआ भ्रूण किसी नाली में बह गया होता ।
इन तस्वीरों से मुँह न चुराइये, हमारे मुँह चुरानें की हकीकत हैं यह तस्वीरें । अब तो जो है, उसे जस का तस, बिना ब्लर किए स्वीकारिये, शेयर कीजिए

बीजापुर में फोर्स द्वारा आदिवासी महिलाओ से दुराचार और मारपीट और हत्या पे मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ डीजीपी को फटकार लगाते हुए चार सप्ताह में मांगी रिपोर्ट .


बीजापुर में फोर्स द्वारा आदिवासी महिलाओ से दुराचार और मारपीट और हत्या पे मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ डीजीपी को फटकार लगाते हुए चार सप्ताह में मांगी रिपोर्ट .
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राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग ने पुलिस महानिरीक्षक छत्तीसगढ़ से बीजापुर जिले के ग्राम चिन्नागेलुर ,पेदमा पल्ली ,बुडी गेचोर ,और गुडेन में आदिवासी महिलाओ के साथ फ़ोर्स द्वारा किये गये बलात्कार ,मारपीट और हत्या के मामले में कडी फटकार लगाते हुए विस्त्रत रिपोर्ट र्मांगी है .और चार सप्ताह में मामले का पूरा ब्यौरा देने को आदेश दिया है .
लगभग डेढ़ महीने पहले इन ग्रामो में सीआरपी और पुलिस द्वारा 40 महिलाओ के साथ मारपीट बलात्कार और अन्य तरीको से प्रताड़ित किया गया था , जिसमे गर्भवती महिला के साथ मारपीट और रेप किया गया जिसमे एक महिला की बाद में मौत हो गई थी .
आयोग ने शिकायत के बाद भी कोई कार्यवाही न करने और ज्ञात सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज न करने पे नाराजगी जताई है .
महिला संघटनो ने घटना के बाद तुरंत स्थल पे जाके जाँच की थी और रिपोर्ट को प्रेस तथा विभिन्न स्थानो में शिकायत के रूप में भेजी थी , जाँच में पाया गया था की 45 दिन पहले बीजापुर के ग्राम चिन्ना गेलुर ,पेद्दा गेलुर,पेदमापल्ली,बुडगी चेरू और गुधेन में 13 साल की नाबालिग और गर्भवती महिला समेत 40 महिलाओ के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया .चोथे दिन उसमे से एक महिला का मौत हो गयी थी .
परिवार के लोग और जन संघटन के लोगो की शिकायत पे खानापूर्ति के लिए प्राथमिकी दर्ज कर ली गई और बाद में पुरे मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया था .आज तक फ़ोर्स के किसी भी जवान के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई .





निर्दोष ग्रामीणों को फ़ोर्स द्वारा जबरन नक्सली बताते हुये लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटा गया,


निर्दोष ग्रामीणों को फ़ोर्स द्वारा लात,घुसे डंडे,बेल्ट से पीटा गया ...

और जाँच भी उसी थाने  के आरोपी कर रहे हैं 

फ़ोर्स द्वारा मरकानार के ग्रामीणों को मारपीट कर  नक्सली सिद्द करने में तूली 


कांकेर :- निर्दोष ग्रामीणों को फ़ोर्स द्वारा जबरन नक्सली बताते हुये लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटा गया, इतना में जवानो का मन नहीं भरा तो अगले दिन पुरे गाँव के ग्रामीणों को उठा कर बारी -बारी से कमरे में बंद कर जानवरों की तरह मार-पीट  किया गया यह घटना उत्तर बस्तर के कांकेर जिले में कोयली बेडा के ग्राम मरकानार की है जहा पुलिस द्वारा जबरन ग्रामीणों को नक्सली समर्थक बताते हुये बेहरमी से मार-पीट  किया गया, एक ओर जहा पुलिसिया तंत्र नक्सलियों सैकड़ो की संख्या में आत्मसमर्पण निति के तहत आत्मसमर्पण कराने में मशगुल है वही दूसरी और उत्तर बस्तर में जवानो का आमानवीय चेहरा सामने आ रहा है इस तरह की घटना नक्सलवाद का पनपने में कारगर सिध्द होती है आम आदिवासी ग्रामीण जो अपने जीवउपार्जन सामान्य  ढंग से करते आ रहे है उन्हें बन्दुक बट की नोक पर पुलिस नक्सली बताते हुये जबरन जानवरों की तरह पीटा जा रहा है आप पार्टी के जिला संयोजक देवलाल नरेटी जो मारकानार ग्राम से हो आये है उनके अनुसार गाव वालो को फ़ोर्स द्वारा जानवरों की तरह मारा पिटा गया है कई ग्राम वासी अभी दर्द से कहर रहे है उनके अनुसार ग्रामीणों को दो-दो दिन तक बारी बारी से कोयलीबेडा थाने ले जाकर फ़ोर्स द्वारा बेहरमी से मर पीट किया गया है 
             ज्ञात हो की घटना उत्तर बस्तर के कांकेर जिले में कोयली बेडा के ग्राम मरकानार  में दो दिसंबर बुधवार को कोयली बेडा मेढकी नदी और मरकानार  के बीच हुए  मेढकी नदी को लेके थाना कोयलीबेड़ा से फ़ोर्स लगभग दोपहर तीन बजे ग्राम मरकानार में  खेत में काम करने वाले लोगो आयतु ध्रुव ,रामलाल ध्रुव ,राम चन्द्र दर्रो बजनु राम ध्रुव ,हिरदु निषाद ,धंनु राम उसेंडी ,बैजनाथ ध्रुव ,अर्जुन कड़ियांम  और एक मेहमान श्याम सिंह दुग्गा को घर से बुलाकर बीच जंगल में नौ लोगो का सामूहिक फोटो खिंच के घटना स्थल से होते हुए थाने  ले गए और वहाँ जाके  पुलिस अधिकारियो के सामने सभी नौ लोगो के नाम रजिस्टर  में अंकित किया।
   इसके बाद फ़ोर्स के लोगो ने घटना के बारे में पूछ ताछ किया ,और सभी लोगो को एक कमरे में बंद करके  लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटाई की गई , इस मारपीट में रामचन्द्र दर्रो बेहोश हो गया। इसके बाद दबा बनाते हुए दुबारा 4 दिसंबर  दिन शुक्रवार को सुबह 9  बजे  पुरे गाव को उपस्थित होने का आदेश देने का बाद रात को 10  बजे छोड़ा गया।
अगले दिन 4  दिसंबर को पूरे गाव के लोग सुबग 9 बजे थाने में उपस्थित हुए ,पुरे  दिन पुरे गाव के लोगो को बेवजह  बिठाया गया और 17 व्यक्तियों से    बरी बारी पूछताछ की गई और उन्हें अलग अलग कमरो में तीन तीन पुलिस वालो ने लात घुसो बेल्ट डंडे से बुरी तरह से मारपीटा  गया , जिससे राजेन्द्र ध्रुव और शेषन लावतरे बेहोश हो गया।
जिन ग्रामीणो के साथ मारपीट की गई उनके नाम है , रामलाल धुर्व ,शेषन लाउत्तरे ,राम लाल दर्रो ,हीरालाल आँचले ,सुबीर कौशल ,आयतु राम ध्रुव ,धनी  राम मांडवी ,महेर सिंह ध्रुव ,राजेन्द्र ध्रुव ,शंकर अचला ,बजणु राम ध्रुव ,अर्जुन कड़ियां ,सग्राम सलाम ,हिरदु राम निषाद ,बेहा राम अचला और अजित ध्रुव है।
     पुरे गाव को बुरी तरह प्रताड़ित करने के बाद अगले दिन शनिवार दिनाक 5  दिसंबर 15  को फिर उपस्थित होने को कह के रात में 10  बजे छोड़ा गया।  बजे तीसरी बार 5  दिसंबर को फिर  पुरे गाव के लोग थाने  में हाजिर हुए ,फिर वही कहानी दोहराई गई इन सब से अलग अलग पूछ ताछ के बार मार पीट  की गई और शाम को 7 बजे यह कह के छोड़ दिया की तुम लोगो में से तीन चार लोगो को समय आने पे नक्सली केस में फसा के जेल भेज दिया जायेगा।
ग्रामीणो ने कलेक्टर और एसपी  से लिखित में शिकायत करते हुए लिखा है की महोदय हम ग्राम वासी खेती मजदूरी ,वनोपज सग्रह करके बड़ी मुश्किल में अपना  जीवन का भरण पोषण करते है ,घने जंगलो में नक्सलियों और पुलिस के बीच किसी तरह अपना जीवन वसर कर रहे हैं। हम कोई घटना के बारे में कुछ नहीं जानते बस हमें पुलिस बार बार प्रताड़ित करती रहती हैं। ऐसी किसी नक्सली घटना से हमारा कोई वास्ता नहीं है और न ही कुछ हमलोगो को कुछ मालूम ही हैं।
ग्रामीणो ने पत्र में लिखा है की ऐसी प्रताड़ना की घटनाये रोज की बात हो गई है। ये पुलिस और नक्सलियों के बीच की लड़ाई है और हम ग्रामवासी इसमें बेगुनाह प्रताड़ित  होते रहते है। आज कल रोज पुलिस हमारे साथ मारपीट करती रहती है शिकायत के पश्चात अभी तक  पुलिस वालो के खिलाफ कोई कार्यवाही हुई और न ग्राम वासियो की प्रताड़ना ही कम हुई है।
बॉक्स
आप पार्टी के जिला संयोजक देवलाल नरेटी का कहना है कि जिस तरह से मरकानार के आम आदिवासी ग्रामीणों साथ घटना घटी है इससे ये साबित होता है की पुलिस और बी एस फ की टीम बस्तर में निवास करने वाले भोले भाले  गांव के लोंगो को मार - पीट करके  नक्सली

साबित करने में तूली  है और  सारी हदें पार कर रही है और भोले भाले लोंगो को वारंटी बता कर अंदर कर रही है जिसे पुलिस प्रशासन और सरकार अपना उपलब्धि बता रही जो गलत है शायद पुलिस प्रशासन की लड़ाई नक्सलियों से नहीं गांवो में निवास करने वाले भोले भाले लोंगो से है जिसे हम कभी होने नहीं देंगे

वही इस मामले में कांकेर कलेक्टर शम्मी आब्दी से जब ग्राम वासियों ने फ़ोर्स की प्रताड़ना की शिकायत की तब
कार्यवाही का  भरोसा दिया था वही आज पर्यत्न तक किसी भी प्रकार की कार्यवाही नही हुई है और ग्रामीणों पर आत्याचार निरंतर जारी है 
  पुलिस द्वारा निर्दोष ग्रामीणों के साथ मारपीट की घटना को लेकर कलेक्टर ने कहा की पहले घटनाओ का तो नही पता लेकिन अभी की घटना की जल्द जाँच कर दोषियों पर कार्यवाही की जायेगी । 
तथा इससे पहले जितने जाँच लंबित है उन सब की फाइल खोल कर 
कार्यवाही की जायेगी ।

'नगर को गांव' बनाने के लिए आदिवासियों का आंदोलन आलोक प्रकाश पुतुल

'नगर को गांव' बनाने के लिए आदिवासियों का आंदोलन

  • 29 दिसंबर 2015
Image copyrightAlok Putul
छत्तीसगढ़ के प्रेमनगर में नगर पंचायत के चुनाव सोमवार को ख़त्म हुए, लेकिन एक नगर पंचायत का किस्सा कुछ अजीब सा है.
सूरजपुर ज़िले का प्रेमनगर इस बात का उदाहरण है कि हुकूमत कैसे एक ग्राम पंचायत को रातों रात नगर पंचायत में तब्दील कर देती है.
प्रेमनगर के लोगों का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि उन्हें आदिवासी अधिकारों से वंचित रखा जाए और वो सरकार की योजना में बाधा न पहुँचाएं.
एक सरकारी कंपनी प्रेमनगर में पावर प्लांट लगाना चाहती थी और ग्राम पंचायत इसका विरोध कर रही थी.
आदिवासी विशेष अधिकार क़ानून के तहत ये संभव भी है. लेकिन सरकार ने ग्राम पंचायत का चरित्र ही बदल दिया और उसे नगर पंचायत बना दिया.
नगर पंचायत में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानि 'पेसा' क़ानून लागू नहीं होता है. दिसंबर में पेसा क़ानून को लागू हुए 20 साल पूरे हो गए हैं.
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चुनाव में अध्यक्ष पद की एक उम्मीदवार भद्रसानी सिंह ने कहा, "मैं अगर नगर पंचायत का चुनाव जीती तो सबसे पहले नगर पंचायत को ख़त्म करने का वादा करती हूं."
इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड यानी इफ़को और छत्तीसगढ़ सरकार ने 4 जून, 2005 को 1,320 मेगावॉट का एक पावर प्लांट लगाने की घोषणा की थी.
विशेष रूप से संरक्षित पंडो आदिवासी इलाके प्रेमनगर को पावर प्लांट स्थापित करने के लिए चुना गया. लेकिन गांव के लोग इसके लिए तैयार नहीं हुए. गांव वालों के पास अपने तर्क थे.
इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता मेहदीलाल कहते हैं, "इस प्लांट के लिए लाखों पेड़ काटे जाने की बात सुनकर कौन विरोध नहीं करता? आखिर आदिवासियों का जीवन तो जंगल से ही होता है."
वह कहते हैं, "ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि यहां पावर प्लांट नहीं लगाया जाए."
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इफ़को प्रबंधन और ज़िला प्रशासन ने कई बार ग्राम सभा में अपने पक्ष में प्रस्ताव पारित करने की कोशिश की. लेकिन ग्राम सभा ने हर बार प्रस्ताव नकार दिया.
मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह कहते हैं, "एक दर्जन बार ग्राम सभा के इनकार के बाद 2009 में नगर पंचायत की तैयारी शुरू हुई."
वो कहते हैं, "उस समय लोगों को पता चला कि सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए प्रेमनगर को ग्राम पंचायत की जगह नगर पंचायत बना दिया है."
इस अधिसूचना का साफ मतलब यह था कि अब इफ़को के पावर प्लांट के लिए ग्राम सभा जैसी कोई रुकावट नहीं थी क्योंकि प्रेमनगर अब ग्राम पंचायत नहीं, नगर पंचायत बन चुका था.
नगर पंचायत पर पेसा क़ानून लागू ही नहीं होता.
हाईकोर्ट अधिवक्ता सुधा भारद्वाज का दावा है कि संविधान के अनुच्छेद 243 जेडसी के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में नगरीय निकाय तब तक स्थापित नहीं किया जा सकता, जब तक संसद से इसके लिए आदिवासी समुदायों के हितों के संरक्षण की शर्तों को जोड़ते हुए कोई कानून नहीं बनाया जाता.
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Image captionहाई कोर्ट अधिवक्ता सुधा भारद्वाज
वो प्रेमनगर को नगर पंचायत बनाए जाने को पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी मानती हैं.
इधर प्रेमनगर के गांव से नगर में बदलते ही इलाके के लोगों की मुश्किलें शुरू हो गईं.
इलाके में रोज़गार गारंटी योजना के सारे काम बंद कर दिए गए क्योंकि रोज़गार गारंटी योजना केवल गांवों के लिए होती है.
प्रेमनगर में वन अधिकार पत्र पर रोक लगा दी गई. वन अधिकार क़ानून में गांव के लोगों को मिलने वाले सारे व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार रद्द कर दिए गए.
प्रेमनगर के मनोहर पंडो कहते हैं, "नगर पंचायत बने सात साल हो गए, लेकिन आज भी मेरे वॉर्ड में बिजली नहीं है. हम पंडो आदिवासी आज भी नाले का पानी पी रहे हैं."
पंडो ने बताया, "रोज़ी-रोटी, जल-जंगल-ज़मीन सब छिन गया. पंचायत थी तो सुनवाई हो जाती थी. लेकिन अब कोई नहीं सुनता."
प्रेमनगर के लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी लेकिन इस साल मार्च में कोर्ट ने पुराने दस्तावेज़ का हवाला दे कर तकनीकी आधार पर याचिका ख़ारिज कर दी.
Image copyrightAlok Putul
इसके बाद से ही प्रेमनगर को ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनाने के ख़िलाफ़ इलाके के लोग अनिश्चितकालीन धरने पर हैं.
इस धरने में शामिल अशोक कुमार कहते हैं, "प्रेमनगर और उसके अधिकार केवल पेसा कानून में ही सुरक्षित थे. हम सरकार को यह कहने का मौका नहीं देना चाहते कि मामला अदालत में है और हम कुछ नहीं कर सकते."
उन्होंने बताया, "हम पेसा कानून, पंचायती राज और प्रेमनगर की पहचान बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं."

सरकार तू हैं कहाँ बता ? ; सन्दर्भ बस्तर - प्रभात सिंह

सरकार तू हैं कहाँ बता ? ;  सन्दर्भ बस्तर 
प्रभात सिंह 



सुरक्षा का अधिकार नहीं है ? जबकि माओवादी उसे कई बार उठाकर ले गए और जान से मारने की धमकी के बाद छोड़ दिए और अंत में वही हुआ जो हमेशा बस्तर में होता आ रहा है निर्दोषों का हमेशा गला घोंटा जाता रहा है |
अब इस दुःखद मामले पर बस्तर के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी जुलुस निकालकर अपनी नाकामयाबी छुपाने का प्रयास देश की जनता के सामने करेंगे | भाई आप ही बताओ; आसुजीत पोड़ियाम बस्तर में इकलौता शख्स नहीं है जिसे माओवादियों ने मुखबिरी के नाम पर मौत के घाट उतार दिया हो, पर इसकी कहानी औरों से जुदा है | पेशे से डाकिया कहलाने वाले सुजीत पर माओवादी गोपनीय सैनिक के रूप में मुखबिरी का आरोप लगा रहे हैं सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक फुलपाड़ इलाके से कुछ माह पहले 4 लोगों की गिरफ्तारी और सन्ना सोढ़ी की गिरफ्तारी में इसकी भूमिका का आरोप माओवादियों द्वारा लगाया गया है | सुजीत 2013 से ही माओवादियों को खटक रहा है | इस मामले में भी पत्रकारों ने भरपूर कोशिश की पत्रकार जंगलों की ख़ास छानकर कल शाम ही लौटे थे | किन्तु कोई सुखद समाचार नहीं मिला पर आज खबर आई तो फिर बस्तर की धरती लाल हो गई |
अब सवाल यहीं से उठता है कि यदि सुजीत पोड़ियाम माओवादीयों की मुखबिरी कर रहा था तो पुलिस को हर घटना की जानकारी रही होगी | फिर सुजीत और उसके घर वालों को मरने क्यों छोड़ दिया गया | जबकि एक कथित हमले या माओवादी धमकी बावत चिट्ठी के बाद जनप्रतिनिधि टाइप के ठेकेदारों को भी सुरक्षा बल मुहैया हो जाती है और तो ऐसे कथित जनप्रतिनिधियों को सालों साल सुरक्षा बाकायदा रौब के साथ मिलती रहती है | तब ऐसे गोपनीय सैनिकों को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई जो सरकारी तंत्र को मजबूत करने की सबसे बड़ी कड़ी है | जबकि गोपनीय सैनिकों के बिना माओवाद खत्म हो ही नहीं सकता है |
अब इसका दूसरा पहलु यह कि वह गोपनीय सैनिक नहीं रहा हो और पुलिस के लिए मुखबिरी भी नहीं करता रहा हो किन्तु जब माओवादी सुजीत को लगातार डरा रहे थे और सुजीत को माओवादियों द्वारा कथित गोपनीय सैनिक करार देकर जान से मारने की धमकी और चेतावनी मिल रही थी | तब बेचारे डाकिया सुजीत के साथ न्याय क्यों नहीं किया गया | क्या सत्ता लोभियों को ही छत्तीसगढ़ सरकार में केवल सुरक्षा का अधिकार है ? क्या सुजीत जैसे कर्मवीर डाकिये को प लोगों के हाथ में बन्दुक दी है क्या सरकार ने ? नहीं ना ! जिस आम जनता की सुरक्षा का जिम्मा हथियार बंद बस्तर पुलिस को दी गई है | वे चंद माओवादियों को नहीं पकड़ पा रहे हैं जो बस्तर में खून की होली सालों से खेल रहे हैं | इन्हें जुलुस निकालने के बजाय उस वीरगति को प्राप्त सुजीत कुड़ियाम की अर्थी उठने के पहले माओवादियों को सबक सिखाया जाना था | किन्तु ऐसा होगा नहीं क्योंकि सब सुनियोजित साजिस का हिस्सा है |
ये सलवा जुडूम ले कर आये हजारों मारे गए लाखों बेघर हो गए, इनकि मौजूदा स्थिति देखना हो तो चले जाइए बस्तर से सटे पड़ोसी राज्यों में करीब एक लाख लोग तो भद्राचलम की विस्थापित बस्तीयों में ही मिल जायेंगे | बस्तर में सरकारी राजनैतिक सलवाजुडूम के बाद माओवाद तो कम नहीं हुआ, किन्तु माओवाद उससे अधिक विकराल शक्ल अख्तियार कर बस्तर में लौट आया | अब सलवा जुडूम का विकल्प ढूंढने की फिराक लगाईं जा रही है | उसके वैकल्पिक नाम बदल-बदल कर सामने लाये जा रहे हैं |
माओवाद का शिकार आम बस्तरिया होता था, होता है और होता रहेगा | तब तक, जब तक कार्पोरेट्स को बस्तर में हर उस इलाके की जमीन नहीं मिल जाती जहाँ गर्भ में छुपा है बेशकीमती खनिज सम्पदा | जिसके दोहन के लिए जल और साथ में उन्हें मुफ्त में खरबों की वन सम्पदा सौगात में मिल नहीं जाते |
इतना सब सुनने के बाद भी आपको लगता है कि, सरकार है छत्तीसगढ़ में ! यदि है तो वह सरकार है कार्पोरेट्स के लिए काम करने वाली सरकार; जिसके लिए बस्तर में फोर्स की संख्या तो सालों से बढ़ती जा रही है | किन्तु नक्सलवाद का नासूर कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है |
एक तरफ बस्तर के पुलिस अफसर कहते नहीं थकते की अब तो नक्सलियों का खात्मा हम कर ही दिए हैं | बस्तर में माओवाद खत्म होने के कगार पर है | तो फिर बस्तर में फोर्स की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है | अपराध कम होने से थानों, चौकियों और पुलिस कैम्पों की संख्या कम होनी चाहिए । यदि इन सबकी संख्या बढ़ रही है तो समझ लीजिये अपराध बढ़ रहा है ।
एक बात तो साफ है बस्तर में फोर्स तब तक रहेगी जब तक कार्पोरेट्स को एक-एक इंच जमीन नहीं मिल जाता; ये कार्पोरेट्स पाइप लाईन बिछाने के लिए माओवादियों को पैसे देने तैनात खड़े रहते हैं | तो फिर इनके सामने दूसरा पक्ष उस सरकार का है जिसके उपर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों |
Prabhat Singh की खबर साभार