Saturday, January 2, 2016

निर्दोष ग्रामीणों को फ़ोर्स द्वारा जबरन नक्सली बताते हुये लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटा गया,


निर्दोष ग्रामीणों को फ़ोर्स द्वारा लात,घुसे डंडे,बेल्ट से पीटा गया ...

और जाँच भी उसी थाने  के आरोपी कर रहे हैं 

फ़ोर्स द्वारा मरकानार के ग्रामीणों को मारपीट कर  नक्सली सिद्द करने में तूली 


कांकेर :- निर्दोष ग्रामीणों को फ़ोर्स द्वारा जबरन नक्सली बताते हुये लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटा गया, इतना में जवानो का मन नहीं भरा तो अगले दिन पुरे गाँव के ग्रामीणों को उठा कर बारी -बारी से कमरे में बंद कर जानवरों की तरह मार-पीट  किया गया यह घटना उत्तर बस्तर के कांकेर जिले में कोयली बेडा के ग्राम मरकानार की है जहा पुलिस द्वारा जबरन ग्रामीणों को नक्सली समर्थक बताते हुये बेहरमी से मार-पीट  किया गया, एक ओर जहा पुलिसिया तंत्र नक्सलियों सैकड़ो की संख्या में आत्मसमर्पण निति के तहत आत्मसमर्पण कराने में मशगुल है वही दूसरी और उत्तर बस्तर में जवानो का आमानवीय चेहरा सामने आ रहा है इस तरह की घटना नक्सलवाद का पनपने में कारगर सिध्द होती है आम आदिवासी ग्रामीण जो अपने जीवउपार्जन सामान्य  ढंग से करते आ रहे है उन्हें बन्दुक बट की नोक पर पुलिस नक्सली बताते हुये जबरन जानवरों की तरह पीटा जा रहा है आप पार्टी के जिला संयोजक देवलाल नरेटी जो मारकानार ग्राम से हो आये है उनके अनुसार गाव वालो को फ़ोर्स द्वारा जानवरों की तरह मारा पिटा गया है कई ग्राम वासी अभी दर्द से कहर रहे है उनके अनुसार ग्रामीणों को दो-दो दिन तक बारी बारी से कोयलीबेडा थाने ले जाकर फ़ोर्स द्वारा बेहरमी से मर पीट किया गया है 
             ज्ञात हो की घटना उत्तर बस्तर के कांकेर जिले में कोयली बेडा के ग्राम मरकानार  में दो दिसंबर बुधवार को कोयली बेडा मेढकी नदी और मरकानार  के बीच हुए  मेढकी नदी को लेके थाना कोयलीबेड़ा से फ़ोर्स लगभग दोपहर तीन बजे ग्राम मरकानार में  खेत में काम करने वाले लोगो आयतु ध्रुव ,रामलाल ध्रुव ,राम चन्द्र दर्रो बजनु राम ध्रुव ,हिरदु निषाद ,धंनु राम उसेंडी ,बैजनाथ ध्रुव ,अर्जुन कड़ियांम  और एक मेहमान श्याम सिंह दुग्गा को घर से बुलाकर बीच जंगल में नौ लोगो का सामूहिक फोटो खिंच के घटना स्थल से होते हुए थाने  ले गए और वहाँ जाके  पुलिस अधिकारियो के सामने सभी नौ लोगो के नाम रजिस्टर  में अंकित किया।
   इसके बाद फ़ोर्स के लोगो ने घटना के बारे में पूछ ताछ किया ,और सभी लोगो को एक कमरे में बंद करके  लात घुसे डंडा और बेल्ट से बेरहमी से पिटाई की गई , इस मारपीट में रामचन्द्र दर्रो बेहोश हो गया। इसके बाद दबा बनाते हुए दुबारा 4 दिसंबर  दिन शुक्रवार को सुबह 9  बजे  पुरे गाव को उपस्थित होने का आदेश देने का बाद रात को 10  बजे छोड़ा गया।
अगले दिन 4  दिसंबर को पूरे गाव के लोग सुबग 9 बजे थाने में उपस्थित हुए ,पुरे  दिन पुरे गाव के लोगो को बेवजह  बिठाया गया और 17 व्यक्तियों से    बरी बारी पूछताछ की गई और उन्हें अलग अलग कमरो में तीन तीन पुलिस वालो ने लात घुसो बेल्ट डंडे से बुरी तरह से मारपीटा  गया , जिससे राजेन्द्र ध्रुव और शेषन लावतरे बेहोश हो गया।
जिन ग्रामीणो के साथ मारपीट की गई उनके नाम है , रामलाल धुर्व ,शेषन लाउत्तरे ,राम लाल दर्रो ,हीरालाल आँचले ,सुबीर कौशल ,आयतु राम ध्रुव ,धनी  राम मांडवी ,महेर सिंह ध्रुव ,राजेन्द्र ध्रुव ,शंकर अचला ,बजणु राम ध्रुव ,अर्जुन कड़ियां ,सग्राम सलाम ,हिरदु राम निषाद ,बेहा राम अचला और अजित ध्रुव है।
     पुरे गाव को बुरी तरह प्रताड़ित करने के बाद अगले दिन शनिवार दिनाक 5  दिसंबर 15  को फिर उपस्थित होने को कह के रात में 10  बजे छोड़ा गया।  बजे तीसरी बार 5  दिसंबर को फिर  पुरे गाव के लोग थाने  में हाजिर हुए ,फिर वही कहानी दोहराई गई इन सब से अलग अलग पूछ ताछ के बार मार पीट  की गई और शाम को 7 बजे यह कह के छोड़ दिया की तुम लोगो में से तीन चार लोगो को समय आने पे नक्सली केस में फसा के जेल भेज दिया जायेगा।
ग्रामीणो ने कलेक्टर और एसपी  से लिखित में शिकायत करते हुए लिखा है की महोदय हम ग्राम वासी खेती मजदूरी ,वनोपज सग्रह करके बड़ी मुश्किल में अपना  जीवन का भरण पोषण करते है ,घने जंगलो में नक्सलियों और पुलिस के बीच किसी तरह अपना जीवन वसर कर रहे हैं। हम कोई घटना के बारे में कुछ नहीं जानते बस हमें पुलिस बार बार प्रताड़ित करती रहती हैं। ऐसी किसी नक्सली घटना से हमारा कोई वास्ता नहीं है और न ही कुछ हमलोगो को कुछ मालूम ही हैं।
ग्रामीणो ने पत्र में लिखा है की ऐसी प्रताड़ना की घटनाये रोज की बात हो गई है। ये पुलिस और नक्सलियों के बीच की लड़ाई है और हम ग्रामवासी इसमें बेगुनाह प्रताड़ित  होते रहते है। आज कल रोज पुलिस हमारे साथ मारपीट करती रहती है शिकायत के पश्चात अभी तक  पुलिस वालो के खिलाफ कोई कार्यवाही हुई और न ग्राम वासियो की प्रताड़ना ही कम हुई है।
बॉक्स
आप पार्टी के जिला संयोजक देवलाल नरेटी का कहना है कि जिस तरह से मरकानार के आम आदिवासी ग्रामीणों साथ घटना घटी है इससे ये साबित होता है की पुलिस और बी एस फ की टीम बस्तर में निवास करने वाले भोले भाले  गांव के लोंगो को मार - पीट करके  नक्सली

साबित करने में तूली  है और  सारी हदें पार कर रही है और भोले भाले लोंगो को वारंटी बता कर अंदर कर रही है जिसे पुलिस प्रशासन और सरकार अपना उपलब्धि बता रही जो गलत है शायद पुलिस प्रशासन की लड़ाई नक्सलियों से नहीं गांवो में निवास करने वाले भोले भाले लोंगो से है जिसे हम कभी होने नहीं देंगे

वही इस मामले में कांकेर कलेक्टर शम्मी आब्दी से जब ग्राम वासियों ने फ़ोर्स की प्रताड़ना की शिकायत की तब
कार्यवाही का  भरोसा दिया था वही आज पर्यत्न तक किसी भी प्रकार की कार्यवाही नही हुई है और ग्रामीणों पर आत्याचार निरंतर जारी है 
  पुलिस द्वारा निर्दोष ग्रामीणों के साथ मारपीट की घटना को लेकर कलेक्टर ने कहा की पहले घटनाओ का तो नही पता लेकिन अभी की घटना की जल्द जाँच कर दोषियों पर कार्यवाही की जायेगी । 
तथा इससे पहले जितने जाँच लंबित है उन सब की फाइल खोल कर 
कार्यवाही की जायेगी ।

'नगर को गांव' बनाने के लिए आदिवासियों का आंदोलन आलोक प्रकाश पुतुल

'नगर को गांव' बनाने के लिए आदिवासियों का आंदोलन

  • 29 दिसंबर 2015
Image copyrightAlok Putul
छत्तीसगढ़ के प्रेमनगर में नगर पंचायत के चुनाव सोमवार को ख़त्म हुए, लेकिन एक नगर पंचायत का किस्सा कुछ अजीब सा है.
सूरजपुर ज़िले का प्रेमनगर इस बात का उदाहरण है कि हुकूमत कैसे एक ग्राम पंचायत को रातों रात नगर पंचायत में तब्दील कर देती है.
प्रेमनगर के लोगों का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि उन्हें आदिवासी अधिकारों से वंचित रखा जाए और वो सरकार की योजना में बाधा न पहुँचाएं.
एक सरकारी कंपनी प्रेमनगर में पावर प्लांट लगाना चाहती थी और ग्राम पंचायत इसका विरोध कर रही थी.
आदिवासी विशेष अधिकार क़ानून के तहत ये संभव भी है. लेकिन सरकार ने ग्राम पंचायत का चरित्र ही बदल दिया और उसे नगर पंचायत बना दिया.
नगर पंचायत में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानि 'पेसा' क़ानून लागू नहीं होता है. दिसंबर में पेसा क़ानून को लागू हुए 20 साल पूरे हो गए हैं.
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चुनाव में अध्यक्ष पद की एक उम्मीदवार भद्रसानी सिंह ने कहा, "मैं अगर नगर पंचायत का चुनाव जीती तो सबसे पहले नगर पंचायत को ख़त्म करने का वादा करती हूं."
इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड यानी इफ़को और छत्तीसगढ़ सरकार ने 4 जून, 2005 को 1,320 मेगावॉट का एक पावर प्लांट लगाने की घोषणा की थी.
विशेष रूप से संरक्षित पंडो आदिवासी इलाके प्रेमनगर को पावर प्लांट स्थापित करने के लिए चुना गया. लेकिन गांव के लोग इसके लिए तैयार नहीं हुए. गांव वालों के पास अपने तर्क थे.
इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता मेहदीलाल कहते हैं, "इस प्लांट के लिए लाखों पेड़ काटे जाने की बात सुनकर कौन विरोध नहीं करता? आखिर आदिवासियों का जीवन तो जंगल से ही होता है."
वह कहते हैं, "ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि यहां पावर प्लांट नहीं लगाया जाए."
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इफ़को प्रबंधन और ज़िला प्रशासन ने कई बार ग्राम सभा में अपने पक्ष में प्रस्ताव पारित करने की कोशिश की. लेकिन ग्राम सभा ने हर बार प्रस्ताव नकार दिया.
मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह कहते हैं, "एक दर्जन बार ग्राम सभा के इनकार के बाद 2009 में नगर पंचायत की तैयारी शुरू हुई."
वो कहते हैं, "उस समय लोगों को पता चला कि सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए प्रेमनगर को ग्राम पंचायत की जगह नगर पंचायत बना दिया है."
इस अधिसूचना का साफ मतलब यह था कि अब इफ़को के पावर प्लांट के लिए ग्राम सभा जैसी कोई रुकावट नहीं थी क्योंकि प्रेमनगर अब ग्राम पंचायत नहीं, नगर पंचायत बन चुका था.
नगर पंचायत पर पेसा क़ानून लागू ही नहीं होता.
हाईकोर्ट अधिवक्ता सुधा भारद्वाज का दावा है कि संविधान के अनुच्छेद 243 जेडसी के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में नगरीय निकाय तब तक स्थापित नहीं किया जा सकता, जब तक संसद से इसके लिए आदिवासी समुदायों के हितों के संरक्षण की शर्तों को जोड़ते हुए कोई कानून नहीं बनाया जाता.
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Image captionहाई कोर्ट अधिवक्ता सुधा भारद्वाज
वो प्रेमनगर को नगर पंचायत बनाए जाने को पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी मानती हैं.
इधर प्रेमनगर के गांव से नगर में बदलते ही इलाके के लोगों की मुश्किलें शुरू हो गईं.
इलाके में रोज़गार गारंटी योजना के सारे काम बंद कर दिए गए क्योंकि रोज़गार गारंटी योजना केवल गांवों के लिए होती है.
प्रेमनगर में वन अधिकार पत्र पर रोक लगा दी गई. वन अधिकार क़ानून में गांव के लोगों को मिलने वाले सारे व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार रद्द कर दिए गए.
प्रेमनगर के मनोहर पंडो कहते हैं, "नगर पंचायत बने सात साल हो गए, लेकिन आज भी मेरे वॉर्ड में बिजली नहीं है. हम पंडो आदिवासी आज भी नाले का पानी पी रहे हैं."
पंडो ने बताया, "रोज़ी-रोटी, जल-जंगल-ज़मीन सब छिन गया. पंचायत थी तो सुनवाई हो जाती थी. लेकिन अब कोई नहीं सुनता."
प्रेमनगर के लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी लेकिन इस साल मार्च में कोर्ट ने पुराने दस्तावेज़ का हवाला दे कर तकनीकी आधार पर याचिका ख़ारिज कर दी.
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इसके बाद से ही प्रेमनगर को ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनाने के ख़िलाफ़ इलाके के लोग अनिश्चितकालीन धरने पर हैं.
इस धरने में शामिल अशोक कुमार कहते हैं, "प्रेमनगर और उसके अधिकार केवल पेसा कानून में ही सुरक्षित थे. हम सरकार को यह कहने का मौका नहीं देना चाहते कि मामला अदालत में है और हम कुछ नहीं कर सकते."
उन्होंने बताया, "हम पेसा कानून, पंचायती राज और प्रेमनगर की पहचान बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं."

सरकार तू हैं कहाँ बता ? ; सन्दर्भ बस्तर - प्रभात सिंह

सरकार तू हैं कहाँ बता ? ;  सन्दर्भ बस्तर 
प्रभात सिंह 



सुरक्षा का अधिकार नहीं है ? जबकि माओवादी उसे कई बार उठाकर ले गए और जान से मारने की धमकी के बाद छोड़ दिए और अंत में वही हुआ जो हमेशा बस्तर में होता आ रहा है निर्दोषों का हमेशा गला घोंटा जाता रहा है |
अब इस दुःखद मामले पर बस्तर के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी जुलुस निकालकर अपनी नाकामयाबी छुपाने का प्रयास देश की जनता के सामने करेंगे | भाई आप ही बताओ; आसुजीत पोड़ियाम बस्तर में इकलौता शख्स नहीं है जिसे माओवादियों ने मुखबिरी के नाम पर मौत के घाट उतार दिया हो, पर इसकी कहानी औरों से जुदा है | पेशे से डाकिया कहलाने वाले सुजीत पर माओवादी गोपनीय सैनिक के रूप में मुखबिरी का आरोप लगा रहे हैं सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक फुलपाड़ इलाके से कुछ माह पहले 4 लोगों की गिरफ्तारी और सन्ना सोढ़ी की गिरफ्तारी में इसकी भूमिका का आरोप माओवादियों द्वारा लगाया गया है | सुजीत 2013 से ही माओवादियों को खटक रहा है | इस मामले में भी पत्रकारों ने भरपूर कोशिश की पत्रकार जंगलों की ख़ास छानकर कल शाम ही लौटे थे | किन्तु कोई सुखद समाचार नहीं मिला पर आज खबर आई तो फिर बस्तर की धरती लाल हो गई |
अब सवाल यहीं से उठता है कि यदि सुजीत पोड़ियाम माओवादीयों की मुखबिरी कर रहा था तो पुलिस को हर घटना की जानकारी रही होगी | फिर सुजीत और उसके घर वालों को मरने क्यों छोड़ दिया गया | जबकि एक कथित हमले या माओवादी धमकी बावत चिट्ठी के बाद जनप्रतिनिधि टाइप के ठेकेदारों को भी सुरक्षा बल मुहैया हो जाती है और तो ऐसे कथित जनप्रतिनिधियों को सालों साल सुरक्षा बाकायदा रौब के साथ मिलती रहती है | तब ऐसे गोपनीय सैनिकों को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई जो सरकारी तंत्र को मजबूत करने की सबसे बड़ी कड़ी है | जबकि गोपनीय सैनिकों के बिना माओवाद खत्म हो ही नहीं सकता है |
अब इसका दूसरा पहलु यह कि वह गोपनीय सैनिक नहीं रहा हो और पुलिस के लिए मुखबिरी भी नहीं करता रहा हो किन्तु जब माओवादी सुजीत को लगातार डरा रहे थे और सुजीत को माओवादियों द्वारा कथित गोपनीय सैनिक करार देकर जान से मारने की धमकी और चेतावनी मिल रही थी | तब बेचारे डाकिया सुजीत के साथ न्याय क्यों नहीं किया गया | क्या सत्ता लोभियों को ही छत्तीसगढ़ सरकार में केवल सुरक्षा का अधिकार है ? क्या सुजीत जैसे कर्मवीर डाकिये को प लोगों के हाथ में बन्दुक दी है क्या सरकार ने ? नहीं ना ! जिस आम जनता की सुरक्षा का जिम्मा हथियार बंद बस्तर पुलिस को दी गई है | वे चंद माओवादियों को नहीं पकड़ पा रहे हैं जो बस्तर में खून की होली सालों से खेल रहे हैं | इन्हें जुलुस निकालने के बजाय उस वीरगति को प्राप्त सुजीत कुड़ियाम की अर्थी उठने के पहले माओवादियों को सबक सिखाया जाना था | किन्तु ऐसा होगा नहीं क्योंकि सब सुनियोजित साजिस का हिस्सा है |
ये सलवा जुडूम ले कर आये हजारों मारे गए लाखों बेघर हो गए, इनकि मौजूदा स्थिति देखना हो तो चले जाइए बस्तर से सटे पड़ोसी राज्यों में करीब एक लाख लोग तो भद्राचलम की विस्थापित बस्तीयों में ही मिल जायेंगे | बस्तर में सरकारी राजनैतिक सलवाजुडूम के बाद माओवाद तो कम नहीं हुआ, किन्तु माओवाद उससे अधिक विकराल शक्ल अख्तियार कर बस्तर में लौट आया | अब सलवा जुडूम का विकल्प ढूंढने की फिराक लगाईं जा रही है | उसके वैकल्पिक नाम बदल-बदल कर सामने लाये जा रहे हैं |
माओवाद का शिकार आम बस्तरिया होता था, होता है और होता रहेगा | तब तक, जब तक कार्पोरेट्स को बस्तर में हर उस इलाके की जमीन नहीं मिल जाती जहाँ गर्भ में छुपा है बेशकीमती खनिज सम्पदा | जिसके दोहन के लिए जल और साथ में उन्हें मुफ्त में खरबों की वन सम्पदा सौगात में मिल नहीं जाते |
इतना सब सुनने के बाद भी आपको लगता है कि, सरकार है छत्तीसगढ़ में ! यदि है तो वह सरकार है कार्पोरेट्स के लिए काम करने वाली सरकार; जिसके लिए बस्तर में फोर्स की संख्या तो सालों से बढ़ती जा रही है | किन्तु नक्सलवाद का नासूर कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है |
एक तरफ बस्तर के पुलिस अफसर कहते नहीं थकते की अब तो नक्सलियों का खात्मा हम कर ही दिए हैं | बस्तर में माओवाद खत्म होने के कगार पर है | तो फिर बस्तर में फोर्स की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है | अपराध कम होने से थानों, चौकियों और पुलिस कैम्पों की संख्या कम होनी चाहिए । यदि इन सबकी संख्या बढ़ रही है तो समझ लीजिये अपराध बढ़ रहा है ।
एक बात तो साफ है बस्तर में फोर्स तब तक रहेगी जब तक कार्पोरेट्स को एक-एक इंच जमीन नहीं मिल जाता; ये कार्पोरेट्स पाइप लाईन बिछाने के लिए माओवादियों को पैसे देने तैनात खड़े रहते हैं | तो फिर इनके सामने दूसरा पक्ष उस सरकार का है जिसके उपर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों |
Prabhat Singh की खबर साभार

नटोरियन कलेक्टर के साथी और भ्रष्टाचार का केंद्र बस्तर -

नटोरियन कलेक्टर के साथी और भ्रष्टाचार का केंद्र बस्तर -

प्रभात सिंह
बस्तर में करप्शन का पायदान कितना नीचे गिर गया होगा ! इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक कलेक्टर जैसे रौबदार पद पर बैठा व्यक्ति एक विद्यालय में छोटे बच्चों से लिए गए अधिक फीस के मामले को दबाने के लिए खुद न्यायपालिका में हस्तक्षेप करने से भी परहेज नहीं करता है | और वह खबर छापने वाले पत्रकारों को नटोरीयन की संज्ञा देने से भी नहीं हिचकता हैं |
अब मान लिया जाय की वहाँ उनके इर्द गिर्द एक आध नटोरियन होंगे भी जिन्हें पत्रकार तो कहा भी नहीं जा सकता है | क्योंकि उनके लिए पत्रकारिता ब्लेकमेलिंग का व्यवसाय है | इसके बूते सुकमा जैसे पिछड़े इलाके में उनका करोड़ों का कारोबार हो जाता है | लेकिन उस कलेक्टर को इतना भी भान नहीं की उसी जगह पर ऐसे पत्रकार भी रहते है | जो उनकी सच्चाई कोर्रा जैसे छोटे हेराफेरी के मामले से लेकर जिले के बड़े घपलों का पर्दाफ़ाश करते रहे हैं |
तो कलेक्टर साहब को किस बात की खीझ है कि आप सुकमा के साथ बीजापुर और दंतेवाड़ा के सारे पत्रकारों को भी उसी तराजू में तौल रहे हैं | जबकि छत्तीसगढ़ में यदि अव्वल दर्जे की पत्रकारिता कहीं होती है तो वह बस्तर के इन्ही इलाकों में होती है | वो अलग बात है कि इन पत्रकारों के कारण बस्तर में कई अधिकारियों की अपने चढ़ावे की कमाई में कमी दिखने लगती है | बस्तर आकर वापस गए अधिकारीयों के घरों में संगेमरमर के फर्श संडास तक देखने को मिलेंगे |
आप अंदाजा लगा सकते हैं की ऐसे अधिकारियों के रहते इस सुकमा जिले में कई मामले ऐसे ही लगातार दबाये जाते रहे होंगे | जहां एक कलेक्टर ऐसे छोटे भ्रष्टाचार मामलों में खुद न्यायपालिका को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा हो | वहाँ इनके मातहत अधिकारी तो लाखों करोड़ों के गबन के मामले तो सेटलमेंट स्तर पर ही निपटा लेते होंगे |
ऐसे में तो अब यही समझा जाए कि सुकमा में जब तक ऐसे अफसर रहेंगे तब तक कोई भ्रष्टाचार की खबर लिखने का मतलब ही नहीं है | क्योंकि ऐसे अफसर तो तुरंत सेटलमेंट की जुगत में लग जाते होंगे | जिले का सबसे बड़ा अफसर ऐसा होगा तो उसके नीचे काम करने वाला अधिकारी कैसा होगा आप अंदाजा लगा सकते हैं | और इसमें हिस्सा ढूंढने वाले चंद नटोरियन भी हैं जिनका पत्रकारिता से कोई लेना देना ही नहीं है | ये बस्तर में एक पुलिस के एक बड़े अधिकारी से लेकर ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के लिए प्रेस विज्ञप्ति खुद बनाते हैं | क्योंकि उन्हें हर उस खबर पर दाम मिलता है | जिसके लिए बस्तर के गरीब आदिवासियों के तन के कपड़े तक योजनाओं के नाम पर नीलाम हो जाते हैं |
अब आप ऐसे हैं तो आपके जैसे छत्तीसगढ़ में काम करने वाले सारे आईएएस अफसरों को हम आपके जैसा समझने लगे तो ठीक है क्या? आप ही बताइये ! वैसे आपके किये की सजा आपको मिलेगी ही नहीं ! क्योंकि इस छत्तीसगढ़ सरकार में ४५ आईएएस अफसरों के खिलाफ जाँच होनी थी | जिनमें आपके सरीखे १६ जिले के कलेक्टर हैं; कई मामले तो १५ साल भी पार कर गए हैं |
तो क्या अब जनता मान ले की भ्रष्ट लोगों के खिलाफ छत्तीसगढ़ राज्य में अलग से न्याय व्यवस्था खुद जनता को बनानी पड़ेगी | क्या इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय कभी आम आदमी के साथ नहीं होगा ? तो क्या इसके लिए कोई अलग तरीके के सरकार की जरुरत है ? सवाल कई है जवाब सिर्फ एक है | सलाम छत्तीसगढ़ |

कितना आसान है किसी गरीब मजदूर लडकी की हत्या और उसके साथ बलात्कार करना ,कही कोई सुगबुहाट नही कोई हल्ला नही कोई बड़ी खबर तक नही और न कोई विरोध सिवाय मजदूर पिता और उनका परिवार . ***

रायगढ़ के टेंडा नयापारा के जंगल में महिला मजदूर की पेड़ पे वस्त्रहीन लाश के हत्यारों का कोई पता नही कर पाई पुलिस .कितना आसान है किसी गरीब मजदूर लडकी की हत्या और उसके साथ बलात्कार करना ,कही कोई सुगबुहाट नही कोई हल्ला नही कोई बड़ी खबर तक नही और न कोई विरोध सिवाय मजदूर पिता और उनका परिवार .
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टी एन आर कम्पनी के ठेकेदार मजदूर 18 साल की लड़की को कुछ लोगो ने हत्या करके उसकी लाश वस्त्रहीन करके टेड़ा नयापारा के जंगल में एक पेड़ से टांग दी , हत्या के पूर्व उसके साथ बलात्कार की आशंका भी व्यक्त की गई है , इस घटना को चार दिन तफ्तीश के बाबजूद अभी तक कोई गिरफ्तारी या प्रारम्भिक जाँच तक नही कर पाई.
नवापारा में रहने वाली साधमति की माँ एक स्कुल में मध्यान भोजन बनाती है , पिता रथु भी मजदूरी का काम करते है ,सधामती शुक्रवार की शाम मड़ई मेला देखने गई थी ,रात को वापस न आने पे उनके घर वालो ने खोजबीन की लेकिन उसका कोई पता नही चला बाद में अगली सुबह नयापारा के जंगल में एक लड़की की लाश दुपट्टे से फाँसी में लटकी होने के खबर पे सरे लोग इकठा हो गये ,तब उस लडकी की पहचान हो पाई,
पुलिस हमेशा की तरह उसे आत्महत्या का मामला बता रही है , पुलिस से कोई ये पूछने को तैयार नही है की कोई लडकी अपने सारे वस्त्र उतार के इतने ऊँचे पेड़ पे चढ़ के आत्म हत्या क्यों करेगी.
ये सब देख के और पुलिस का रवैया जिस तरह का है उससे लगता है की कितना आसान है किसी गरीब मजदूर लड़की का बलात्कार और हत्या करके उसे गुमनामी में डाल देने में सफल हो जाना.




टेंडा नवापारा के जंगल में किया था पांच लडको ने सामूहिक बलात्कार ,वस्त्रहीन करके भगाया ,,
उसके बाद उसने कर की आत्महत्या .
पांचो आरोपी किये गिरफ्ता
र 

[ 31 disambae 16]

(अनिल रतेरिया की रिपोर्ट )

रायगढ़ टॉप न्यूज 31 दिसंबर। 25 दिसंबर को ग्राम टेंडा नावापारा की रहने वाली 18 वर्षीय बालिका गांव के मेले मे गयी थी । जिसका शव 26 दिसबंर को टेण्डा नावापारा के समीप भेंगारी रोड के पास जंगल में महुआ झाड में लटके अवस्था में पाया गया था जिसकी सूचना मिलने पर मृतिका की मां तथा ग्रामीणो के साथ-साथ थाना प्रभारी घरघोडा भी घटना स्थल पहुंचे थे । बालिका के शरीर पर अधोवस्त्र नही रहने के कारण पुलिस प्रकरण को अत्यंत संवेदनशील मानकर चल रही थी ।
पुलिस अधीक्षक डॉ संजीव शुक्ला, एफएसएल यूनिट के प्रभारी अधिकारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक आर के पैकरा द्वारा भी घटना स्थल पहुंचकर विवेचक को घटनास्थल पर उपलब्ध भौतिक साक्ष्य संकलित करने के संबंध मे समुचित दिशा निर्देश दिये गये । 
प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतिका स्थानीय TRN एनर्जी प्रा0लि0 के ठेकेदार के अधीन ठेका श्रमिक के रूप में कार्य कर रही थी ।
मर्ग जांच क्रम में की गयी पूछताछ में पता चला कि मृतिका गांव की उषा और सावित्री के साथ टीआरएन कंपनी में काम करने जाती थी गावं का लक्ष्मी मेला रहने के कारण दो दिन से काम मे नही गयी थी । वह यह बोल कर कि उषा और सावित्री के साथ मेला देखने जा रही हूं घर से 350 रू/ पर्स तथा मोबाईल लेकर निकली थी बदन पर सलवार शूट तथा स्वेटर पहनी थी। 26 दिसबंर को सवेरे 7-8 बजे हल्ला सुनने पर की एक लडकी गावं के जंगल में डेढोला अमरैया में लाश महुआ पेड में फांसी होकर लटकी है बेटी के घर न आने के कारण मां श्रीमति सनिरो यादव ने गांव की कोटवारिन श्रीमति तीजमति तथा सरपंच पति सनत राम राठिया वगैरह को बतायी और मौके पर जाकर देखी तो बदहवास रह गयी। मृतिका की मां ने बताया कि उषा और सावित्री के अलावा ग्राम भेंगारी के गुरूचरण राठिया के साथ मेला घुमने, फोटो खिचवाने की बात कहकर मेला से घूमकर फोटो खिचवाने के बाद रात्री लगभग 12:30 बजे मेले से मृतिका अपने परिचित गुरूचरण के साथ पैदल भेंगारी तरफ जाने के लिये निकली थी । गुरूचरण राठिया ने बताया कि मेला से लगभग एक फलांग दूर भगत गुरूजी के घर के सामने मेन रोड पर मृतिका के साथ पहुचा थी कि पांच लडके 16 से 20 साल उम्र के खडे़ थे जिनमें से एक लड़का ठिकना हटटा कटटा था सामने आकर ये कहते हुये कि लडकी को कहा ले जा रहे हो मृतिका के साथ छेडखानी करने लगे गुरूचरण के द्वारा मोबाईल से फोन किया जाने लगा जिस पर लडको के द्वारा धक्का मुक्की मारपीट कर गुरूचरण को भगा दिये और मोबाईल छीनकर मृतिका को लेकर जंगल की तरफ ले गये दूसरे दिन मृतिका का शव टेन्डा नावापारा के डेढोहा महुवारी में महुआ पेड में लटके हुए दूसरे दिन देखा गया था।
गुरूचरण राठिया से पूछताछ के बाद थाना प्रभारी घरघोडा द्वारा 29 दिसंबर को अपराध क्रंमाक 325/15 धारा 365, 354, 395, 34 ता0हि0 कायम कर विवेचना मे लिया गया तथा थाना घरघोडा एवं क्राइम ब्रांच के संयुक्त प्रयास से 30 दिसबंर की रात्री प्रकरण का पटाक्षेप हुआ ग्राम छाल के पांच आरोपियों जिनमें रायपारा छाल निवासी दो अवस्यक तथा जमीदारपारा छाल के एक बाल अपचारी सहित जमीदारपारा के अविनाश ऊर्फ डमरू पिता जगसाय यादव उम्र 18 साल 6 माह तथा राजकमल ऊर्फ लल्लू पिता हंशराम सिदार उम्र 19 वर्ष को हिरासत में लेकर पूछताछ की गयी
आरोपियों से पूछताछ में जो तथ्य उजागर हुए उससे इन दरिन्दो के दुष्कृत्यो से मानवता शर्मशार हो गई आरोपीगण दो मोटर सायकलो में छाल से मेला देखने आये थे जंहा मृतिका को गुरूचरण के साथ अकेले जाता देखकर पीछाकर बलपूर्वक निर्जन स्थान पर ले जाकर बारी-बारी से दुष्कर्म किया कर अर्धनग्न अवस्था- में ही घर जाने को मजबूर किया गया जबकि मृतिका अपने अधोवस्त्र वापस देने के लिये गिडगिडाती रही लेकिन दुर्दान्त आरोपियों पर कोई असर नही हुआ और इसी ग्लानिवश मृतिका द्वारा महुआ पेड की डगाल मे दुपट्टे से फांसी लगाकर अपनी ईहलीला समाप्‍त कर ली ।
आरोपियों की निशादेही पर मृतिका का सलवार, पेन्टी, बैग, टूटा हुआ मोबाईल तथा मृतिका के परिचित एवं प्रारंभिक घटना के चश्मदीद साक्षी गुरूचरण राठिया का टूटा हुआ मोबाईल जप्त किया गया इसी प्रकार आरोपियों के मोबाईल तथा वह मोटर सायकल जिसमें आरोपीगण छाल से मेला देखने आये थे जप्त किया गया है आरोपियों को हिरासत में लेकर बापर्दा रख शिनाख्त कार्यवाही कराई गयी जिसमें पांचो आरापियों को गुरूचरण राठिया द्वारा पहचान किये जाने पर आज गिरफतार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया है ।
अबतक की विवेचना पर पाया गया कि आरोपियो द्वारा एक राय होकर मृतिका की आबरू लूटने के उददेश्य से छेडखानी करते हुये निर्जन स्थान ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म कर मृतिका के अधोवस्त्र साशय कब्जे में लेकर अर्धनग्न अवस्था में ही घर जाने के लिये विवश किये जाने के फलस्वरूप मृतिका के साथ घटित दुष्कर्म और लोक लज्जा के कारण पास के महुआ पेड़ की डगाल में अपने दुपपटे से फांसी लगाकर मौत हो गयी।

Friday, January 1, 2016

स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में गैर ब्राम्हण महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

इतिहास में महिला विद्रोह के अवसर
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स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में गैर ब्राम्हण महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह




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केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें। 
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता. आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे.
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई. सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं.
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया.
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है .
अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया .

रायगढ़ के पुसौर में 100 एकड़ जमीन गिरबी रखने वाला सूदखोर गिरफतार किया गया,,


रायगढ़ के पुसौर में 100 एकड़ जमीन गिरबी रखने वाला सूदखोर गिरफतार किया गया,,






रायगढ़ के पुसौर में 100 एकड़ जमीन गिरबी रखने वाला सूदखोर गिरफतार किया गया,, सामाजिक कार्यकर्ता डिग्री चौहान की पहल पे एस पी ने की कार्यवाही .
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पुसौर थाना क्षेत्र में जितेंद्र साहू पिता सहदेव साहू जो ओड़ेकरा में रह के सूदखोरी का गैर क़ानूनी काम करता है उसने कम ब्याज का लालच देके 30 -40 किसानो 100 एकड़ से ज्यादा जमीन कब्जा ली ,इसको लेके किसानो में बड़ा रोष है ,8 -10 किसान पी यू सी एल के कार्यकर्ता डिग्री प्रसाद चौहान के साथ एस पी संजीव चतुर्वेदी से मिल के शिकायत की ,उसकेआधार पे तुरंत कर्यवाही करते हुये जितेन्द्र साहू को तुरंत गिरफतार कर लिया गया .
ये सूदखोर किसानो की जमीन अपने नाम रजिस्ट्री करवा लेता था जब वही किसान पैसा वापस करने जाता तो ज्यादा ब्याज बता के जमीन वापस करने से इंकार कर देता था ,गवाह के रूप में उसने एक दो लठेत भी रखे है जो गुंडा गर्दी के काम भी आते है .
पुसौर और आसपास के क्षेत्र में ऐसे की गिरोह काम कर रहे है जो किसानो की खराब खेती और बेंक के बढ़ते कर्ज पटाने के लिए कर्ज देते है और उनकी जमीन हडप रहे है ,एक किसान ने अपना पूरा कर्ज़ भी पता दिया लेकिन उसकी जमीन वापस नही करने से सदमे में उसकी मौत भी हो गई थी .
थाने का घेराव ,अलग अलग ऍफ़ आई आर दर्ज करने की मांग
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पुसौर के बडी संख्या में किसानो ने थाने का घेराव कर लिया है ,उनकी मांग है की सभी किसानो का अलग अलग प्रकरण दर्ज किया जाये और केस सूदखोरी कानून में दर्ज हो जब की पुलिस एक साथ केस दर्ज करना की जिद कर रही है ।
सूचना मिलने तक थाने का घेराव जारी है .