Tuesday, August 4, 2015

चीन तक हो रही है छत्तीसगढ़ के मजदूरो की गुलामी के लिए तस्करी



चीन तक हो रही है छत्तीसगढ़ के मजदूरो  की गुलामी के लिए तस्करी 


रायपुर. छत्तीसगढ़ में मानव तस्करी के अंतरराष्ट्रीय गिरोह की सक्रियता उजागर होने के बाद अब एक और चौंका देने वाला खुलासा हुआ है। यह गिरोह जांजगीर-चांपा के 12 मजदूरों को 15 अगस्त को सिंगापुर में कंस्ट्रक्शन वर्क कर रही चीनी कंपनी सीनो हाइड्रो का गुलाम बनाने वाला था। इनके पासपोर्ट, वीजा, टिकट बन गए थे, लेकिन "पत्रिका" की खबर के बाद सक्रिय हुई पुलिस से गिरोह के मनसूबों पर पानी फिर गया। कबूतरबाजी का मुख्य सरगना अहमदाबाद निवासी संदीप फरार हो गया। पुलिस के हत्थे चढ़े विजय वर्मन व विकास सोनवानी छत्तीसगढ़ में संदीप के लिए ही काम करते थे। जांजगीर एसपी प्रशांत अग्रवाल ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि इन मजदूरों को सिंगापुर जाने से रोक लिया गया है।
चार खेप में भेजा
पुलिस के मुताबिक दलाल विजय हाई स्कूल पास है। उसके पास से बीए और एमए की फर्जी डिग्री बरामद की गई है। चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि वह 2013 से मई-2015 के बीच चार खेप में मजदूरों को मलेशिया भेज चुका है। इनमें से कई मजदूरों को महीनेभर कोलकाता और चेन्नई में रखा गया।
और दलालों की होगी गिरफ्तारी
पुलिस का दावा है कि मलेशिया में बंधक बनाए गए 22 मजदूरों को भेजने के मामले में जल्द ही गिरोह के कई और दलालों की गिरफ्तारी की जाएगी।
सीनो हाइड्रो भेजे जाने थे मजदूर
पत्रिका की पड़ताल के मुताबिक कुछ समय पहले मलेशिया रहकर आए विजय को अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करों ने ज्यादा कमीशन देने का लालच दिया था। इसके बाद उसने साथी विकास और अन्य दलालों के साथ मिलकर जांजगीर के 12 मजदूरों को सीनो हाइड्रो की सिंगापुर ब्रांच में भेजने की पूरी तैयारी कर ली थी। उन्हें कोलकाता से फ्लाइट से भेजा जाना तय किया गया था।

क, ख, ग भी नहीं पढ़ पाए प्रदेश के पांच लाख नौनिहाल chhattisgarh

क, ख, ग भी नहीं पढ़ पाए प्रदेश के पांच लाख नौनिहाल







Posted:IST   Updated:ISTRaipur : five lakh children are Unable to read of A, b, c
प्रदेश के पांच लाख से अधिक बच्चे पढ़-लिख नहीं पाए। इनकी ��"पचारिक शिक्षा की सरकार कोई व्यवस्था नहीं कर पाई है
रायपुर. प्रदेश के पांच लाख से अधिक बच्चे पढ़-लिख नहीं पाए। इनकी औपचारिक शिक्षा की सरकार कोई व्यवस्था नहीं कर पाई है। यह चिंताजनक हकीकत जनगणना निदेशालय के हालिया जारी आंकड़ों से सामने आई है। सात वर्ष से अधिक उम्र की जनसंख्या का शैक्षणिक स्तर नाम से जारी आंकड़ों में साफ कर दिया है कि प्रदेश में 7 से 14 वर्ष तक के 45 लाख 21 हजार847 बच्चों में से 4 लाख 85601 बिल्कुल निरक्षर हैं। इनमें अधिक संख्या लड़कियों की है। इस उम्र की 2 लाख 56079 लड़कियां पढ़ाई-लिखाई शुरू नहीं कर पाई हैं। यह आंकड़े इसलिए भी चिंताजनक हैं कि सरकार 99 प्रतिशत नामांकन का दावा कर रही है, जबकि इन बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा है।
केवल 29 हजार साक्षर
रिपोर्ट के मुताबिक, इस आयुवर्ग के 29455 बच्चे केवल साक्षर हैं। मतलब वे केवल अक्षर पहचान पाते हैं अथवा अपना नाम लिख सकते हैं। उनकी औपचारिक पढ़ाई शुरू नहीं हुई है। केवल साक्षरों की सबसे अधिक 4 हजार 275 की संख्या सात वर्ष उम्र वालों की है। उसके बाद 14 साल की उम्र वाले बच्चों की संख्या (3599) ज्यादा है।
23 लाख प्राइमरी से नीचे
कुल 22 लाख 98032 बच्चों का शैक्षणिक स्तर पांचवी से नीचे का है। इनमें से सबसे अधिक (489678) आठ साल की उम्र वालों का है। इसके बाद 10 साल की उम्र वाले बच्चे हैं जिनकी संख्या 4 लाख 81 हजार 178 है। चिंताजनक यह भी कि 14 वर्ष के 35 हजार 589 बच्चे पांचवी पास नहीं कर पाए हैं। 13 वर्ष तक के एेसे बच्चों की संख्या 52 हजार 977 है।
शिक्षा को बनाना होगा मुद्दा
भेदभाव की खाई को पाटे बिना सभी तक शिक्षा नहीं मुहैया कराना असंभव है। सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले इसके लिए उसे भोजन के अधिकार की तरह मुद्दा बनाना होगा। यह एक चुनौती है, जिसे सरकार, समाज और शिक्षकों को स्वीकार करना ही होगा।
गौतम बंद्योपाध्याय, संयोजक, शिक्षा का अधिकार फोर 

कारपोरेट हित नहीं आर्थिक न्याय चाहिए

वित्त और विकास के आपसी तालमेल की परिणिति यदि मानव कल्याण में न होकर केवल कारपोरेट लाभ के लिए होती है तो वह अर्थहीन है। लैंगिक भेदभाव से मुक्त समाज की स्थापना में आर्थिक न्याय की उपलब्धता सर्र्वोेपरि है। वैश्विक नेता इसी पखवाड़े विकास हेतु वित्तीय प्रबंधन के तरीकों पर विचारविमर्श के लिए इथोपिया के आदिसअबाबा शहर में इकट्ठा हो रहे हैं। इस सम्मेलन के निर्णय मानवता के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। पेश है एन्नी शोन्स्टीन  का सप्रेस से साभार यह आलेख;

आगामी 13 से 16 जुलाई 2015 तक विभिन्न राष्ट्रों एवं सरकारों के प्रमुख एवं वित्त एवं विदेशी मामलों के मंत्री आदिस अबाबा में तीसरे ‘अंतर्राष्ट्रीय विकास के लिए वित्त सम्मेलन' (एफ एफ डी 3) में इकट्ठा हो रहे हैं जिसमें वे एक अर्न्तसरकार समझौते को अपनाएंगे और इसके निहिताथों पर सहमति बनाएंगे। इसकी सफलता या असफलता ही संभाव्य सुस्थिर विकास लक्ष्यों तक पहुंच का मार्ग संभव कर पाएगी और विश्व के लिए ऐसा आधार तैयार कर पाएगी जिसमें लैंगिक न्याय एवं पर्यावरणीय सुस्थिरता कायम हो सके और जिसके अन्तर्गत सम्मान, संरक्षण एवं मानवाधिकारों की पूर्ति सभी नागरिकों के लिए एक वास्तविकता बन पाए। यह सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी प्राथमिकताएं किस आधार पर तय करते हैं। आर्थिक न्याय प्राप्त करने के उद्धेश्य से मई 2015 को जारी मसौदे में कारपोरेट एवं सार्वजनिक शक्तियों के बीच मौजूदा असंतुलन में बदलाव की आवश्यकता के साथ ही साथ ‘‘उत्तर - दक्षिण‘‘ के संबंधो में व्याप्त असमानताओं के परिणामस्वरुप उत्पन्न परिस्थितियों से निपटने को कहा गया है।

एफ एफ डी 3 के माध्यम से वैश्विक नीतियों के प्रति असंबद्धता और शक्ति असंतुलन को संबोधित करना होगा। इसमें व्यापार, वैश्विक वित्तीय प्रशासन, अवैध वित्तीय प्रवाह एवं करों की चोरी जैसे अन्य तमाम मामले भी शामिल हैं और इनके लैंगिक निहितार्थ भी हैं। इसके अलावा राजनीतिक वैधता हेतु रियो (ब्राजील) में स्वीकार्य सामान्य परंतु विविधतापूर्ण जवाबदारियों की अनिवार्यता के साथ ही साथ संतुलन, सामंजस्य और एफ एफ डी एजंेडा के प्रभाव एवं सन् 2015 के बाद के व्यापक विकास एजंेडे की आवश्यकता भी है। एफ एफ डी नागरिक समाज संगठनांे के समूहों के साथ ही साथ महिलावादी एवं महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्षरत समूहों ने भी इस बात पर जोर दिया है।

आर्थिक न्याय की प्राप्ति हेतु वास्तविक ढांचागत रुपांतरण के लिए आवश्यक है कि वर्तमान प्रभुत्वशाली आर्थिक प्रतिमान के समानांतर बाजार आधारित विकास की वैधानिकता पर पुनर्विचार हो। यह एक ऐसा प्रतिमान है जो कि सिर्फ विकास को ही आर्थिक वृद्धि समझता है और राज्य की भूमिका एवं जवाबदारी का क्षय करते हुए निजीकरण एवं उदारीकरण के माध्यम से मोर्चाबंदी करता है। सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण से शिक्षा, स्वास्थ्य सुश्रुषा, पानी एवं ऊर्जा तक आम आदमी की पहुंच में नाटकीय कमी आई है और इसका बहुत असंतुलित ढंग से दुनिया भर की महिलाओं एवं लड़कियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। स्थानीय एवं वैश्विक  दोनों स्तर की सार्वजनिक नीतियों जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ भी शामिल हैं, पर कारपोरेट क्षेत्र एवं अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का बढ़ता प्रभुत्व एसोसिएशन फॉर वुमन राइट्स इन डेवलपमेंट और इसके अनेक सहयोगी संगठनों जिसमें महिलावादी एवं महिला अधिकार संस्थाएं शामिल हैं, की चिंता का मुख्य विषय है।

एफ एफ डी की प्रक्रिया द्वारा कारपोरेट क्षेत्र को और अधिकमजबूत बनाने की शक्तियां नहीं प्रदान करना चाहिए जिससे कि वह राष्ट्र के क्षेत्रों एवं जवाबदेही को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल न कर पाएं। मानवाधिकार से संबंधित मसलों पर भीमकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर लगाम कसना आवश्यक है। साथ ही ऐसी व्यवस्था निर्मित होना चाहिए जिससे कि कारपोरेट को उनके कृत्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जा सकें। और महिलाओं को परिपूर्ण मानवाधिकार प्राप्त होने चाहिए। महिलाओं को व्यापार में कम प्रतिनिधित्व देना भी अस्वीकार्य है। साथ ही सभी को पूर्ण मानवाधिकारों की प्राप्ति ही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए।

पी पी पी (सार्वजनिक निजी भागीदारी) को सुस्थिर विकास प्राप्त करने हेतु एक चमत्कारिक शब्द मान लिया गया है। अनेक अधोसंरचनात्मक परियोजनाओं में इसकी जटिलताएं (विश्वभर में) सामने आई हैं। विश्व बैंक के (आई ई जी) ने भी इसमें ढेर सारी समस्याएं बताई हैं।  इनमें शामिल हैं:-

यह वित्तीय प्रबंधन करने की अत्यन्त महंगी पद्धति है और इससे सार्वजनिक व्यय की लागत अत्यधिक बढ़ जाती है।

यह लागत सामान्यतः अपारदर्शी होती है और कारपोरेशन अपने शेयरधारकों के अलावा किसी भी अन्य भागीदार के प्रति जवाबदेह नहीं होते। आई ई जी की रिपोर्ट के अनुसार इसमें छुपे हुए अनेक खर्च शामिल होते हैं और परियोजना स्तर शायद ही कभी इन्हें सार्वजनिक किया जाता है। साथ ही ये परियोजनाएं अक्सर ऋण की सीमाओं का अतिक्रमण कर देती हैं।

इनका वित्तप्रबंधन अत्यन्त जोखिम भरा होता है। विकासशील देशों से प्राप्त अनेक तथ्य बताते हैं कि इस प्रकार की 25 से 35 प्रतिशत योजनाएं योजनानुसार गतिविधि कर पाने में असफल हो जाती हैं। इनमें कार्य की गुणवत्ता अत्यन्त खराब होती हैै और पुर्नभुगतान न हो पाने की दशा में दिवालिया होने की संभावना बनी रहती है।

सम्मेलन से यह अपेक्षा की जा रही है कि इस तथ्य को ध्यान में रखे बिना कि निजी निवेश सिर्फ अधिकतम लाभ हेतु होता है अधोसंरचनात्मक कार्य आवंटित न किए जाएं। साथ ही ढांचागत भेदभाव जिसकी शिकार मुख्यतः महिलाएं, लड़कियां और देशज समुदाय होते हैं, से निपटने पर पूरा ध्यान रखा जाए। (सप्रेस/थर्ड


शिक्षा के अधिकार का बन रहा मजाक ?

Monday, August 3, 2015

क्योंकि मैं ज़िंदा हूँ अभी मरा नहीं... क्योंकि मैं हूँ जिंदा लाश नहीं



क्योंकि मैं ज़िंदा  हूँ अभी मरा नहीं... क्योंकि मैं हूँ जिंदा लाश नहीं















मैं जानता हूँ कि कोई आदिवासी इस पोस्ट को ओपन करके पुरा नही पढेगा
और अगर पढ भी लिया तो कोई रिप्लाई रिएक्शन नहीं देगा फिर भी लिख रहा हूं
क्योंकि मैं जिंदा हूँ अभी मरा नहीं............
क्योंकि मैं हूँ जिंदा लाश नहीं.

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On the night of 28th July 2015, a contingent of joint security forces comprising of more than 500 officers, along with a few surrendered Naxals (one of whom, Badru, is now a constable, the others being Kiran and Hurra), went on a combing operation towards Nahadi. The forces halted in Gonderas, where, as is common in this area, they beat up women and men, looted their possessions, burnt their belongings, killed and ate dozens of chicken, before finally reaching Village Nahadi on the morning of the 29th at around 10 am. Upon reaching Nahadi, the forces rounded up the entire village and started going from house to house beating everyone they found there, including pregnant women.
A little while later, around 11am, hearing this commotion, Hemla Podiya emerged from his house to see what was happening. He was only a 100 feet from his hut when a single shot rang out and he was killed. Eye-witnesses among the villagers identified the shooter as Badru, a surrendered Naxalite who used to be active in the area.
When the family of Podiya and other villagers heard a gunshot they all came rushing to the spot. But the security forces didn’t allow anyone to come near the body and hurriedly took it away instead. Podiya’s mother and wife were beaten up, and the sister was threatened that she would be put in the hut and burnt. All traces of the killing were removed, as the blood-soaked mud from the spot where Podiya Hemla had fallen was dug up by the police and disposed of by throwing it away into a nearby stream.
Podiya Hemla was a young man; he lived with his parents, young sister, wife and two young kids. His brother, the villagers claim, was also killed earlier by the police in a similar encounter.
On the same day, a group of 20-29 youth and children from nearby villages who are part of a cultural group were also severely beaten up and detained by the police for a day. They were released only after stern warnings not to protest the killing of Hemla Podiya in any manner, else they would be re-arrested. Reports of beatings by the police in the nearby villages of Kakadi and Karkapara have also emerged.
The story narrated by the villagers is in stark contrast with the narrative of the police. The villagers are insistent, there was no encounter, no heavy firing – only a single shot was fired by Badru, which killed an unarmed villager in an act of unprovoked assault. It was cold blooded murder. Podiya was shot from the back and at a short distance. This did not take place in a dense forested patch, but in the open ground of the village. Eighteen dangerous Naxalites were not arrested – only some young people belonging to a cultural group were detained, and they too were let off within a day. On one count, all sides agree – most of the violence that day was done by the three surrendered Naxalites, whom the villagers recognized. While the police showered them with praises, the anguished villagers are asking, “If Naxalites are criminals, then why are the police recruiting these criminals, arming them again with guns, and letting them loose to kill us?”
Villagers from surrounding villages met again yesterday (Aug 1st) at the ground where Podiya Hemla was killed. They are demanding a judicial inquiry into the matter. Villagers fear further police repression, but want to fight for justice. We will keep you informed with more updates.


कोसा मरकाम और महोन्द्र मण्ड़ावी को फ़ोर्स पकड़ कर ले गई , दंतेवाड़ा के पोटाली गॉव में




कोसा मरकाम और  महोन्द्र मण्ड़ावी  को  फ़ोर्स पकड़ कर ले गई , दंतेवाड़ा के पोटाली  गॉव  में 

लिंगारम कोडपि की रिपोर्ट 



आज दंन्तेवाड़ा जिले कि सयुक्त फोर्स नहाड़ी, पोटाली गाँवो में गयी हुई थी. वहा कोई नक्सल गतीविधीया नहीं हो रही थी. पर पुलिस प्रशासन को यह दिखाना हैं कि नक्सल गतिवीधिया चल रही हैं.कोई वजह न मिलने पर सयुक्त फोर्स ने दो आदिवासी युवको को धुरवा पारा पोटाली से (१)कोसा मरकाम/ बोटी (२) महोन्द्र मण्ड़ावी / देवा को पकड़ कर ले आयी पता नही इनके साथ पुलिस प्रशासन कैसा व्यवहार करेगा. पुलिस प्रशासन लोगों से वाह- वाही लुटने के लिए उन दो युवाओ को हार्डकोर नक्सली दिखा सकती हैं या रास्ते में भाग रहे थे बोलकर गोली मार सकते हैं. हमेशा से कल्लूरी आई. जी. बस्तर संभाग के पुलिस गुड्डो से ऐसा करवाते आया हैं. उदाहरण के तौर पर 2010 कि घटना जिसमें 300 घर जलाये गये. मर्डर हुआँ साथ - साथ एक महीला का बलात्कार भी हुआ. आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई सर्वोच्च न्यायालय चुप हैं. कोई सुनवाई नहीं हुई . उस समय आज जो बस्तर में आई. जी. हैं यही अधिकारी जिले में उच्च पद पर पदस्त थे. क्या ये अधिकारी आदिवासीयों के घरो को जलवाने वाला अपराधी नहीं हैं? अगर अपराधी हैं तो राज्य और केन्द्र सरकार ने दुबारा पद्दोउन्नती कर बस्तर संभाग में आई. जी. बनाकर क्यो भेजा? सरकार को बस्तर से कुछ न कुछ चाहिए तबी तो सरकार ने इतने बड़े अपराधी को बड़ा पद देकर भेजा है.

क्या मुस्लिम सिर्फ ‘आतंकवादी’ और ‘राष्ट्रद्रोही’ ही रहेगा?

क्या मुस्लिम सिर्फ ‘आतंकवादी’ और ‘राष्ट्रद्रोही’ ही रहेगा?

नैयर इमाम,
कुछ दिनों पहले फूलन देवी की पुण्यतिथि बीती है. मल्लाह जाति से आने वाली फूलन देवी का सामूहिक बलात्कार उच्च जाति के दबंगों ने किया और उन्होंने प्रतिशोध में हथियार उठा लिया. उनके इस कदम को बुद्धिजीवियों ने ‘क्रांतिकारी’ कदम कहा है क्योंकि यह जातीय संघर्ष के लिए था. उनके इस क्रांतिकारी क़दम ने उन्हें 'बैंडिट क्वीन' बना दिया. अपने यौवन से लेकर उम्र ढ़लने के पड़ाव तक फूलन देवी और उनकी गैंग ने हज़ारों जाने निगल लीं मगर कोई सज़ा नहीं. ढलती उम्र में आत्मसमर्पण कर उन्होंने अपने सारे पाप धो लिए और संसद तक पहुंच गयीं.
भारत का इतिहास दंगों के स्याह रंग से भी पुता हुआ है. बंटवारे और उसके बाद के सैकड़ों दंगों में मुसलमानों को मारा गया. मुस्लिम महिलाओं के साथ हिन्दू चरमपंथियों ने बलात्कार किया. उनके गर्भ चीरकर तलवार की नोक पर अजन्मे बच्चे को लहराया गया. मुस्लिम शिक्षण संस्थानों पर हमले किए गए और मज़ारों मस्जिदों को नेस्तनाबूत कर दिया गया. यहां पर प्रश्न उठना लाज़िम है कि इतना सब होने के बाद यदि कोई मुस्लिम प्रतिशोध में हथियार उठा ले तो वो आतंकवादी क्यों, क्रांतिकारी क्यों नहीं?

Yaqub
यह मानने में कोई गुरेज़ नहीं कि फूलन की तरह याक़ूब की वजह से भी कई जिंदगियां मिट गयीं मगर सज़ा सिर्फ याक़ूब को, क्यों? आत्मसमर्पण तो दोनों ने किए मगर फांसी सिर्फ़ याक़ूब को, क्यों? (सनद रहे कि आडवाणी और प्रवीण तोगड़िया के नाम यहां नहीं लिए जा रहे हैं)
गुजरात में जब मुस्लिमों को चरमपंथियों ने मारा था तो कौन-सा प्रतिशोध हो पाया था? गुजरात में ही घरों में घुसकर जब पुलिस सुरक्षा में हिंदूवादी ताकतों ने मुस्लिम औरतों के साथ बलात्कार किया तब क्या कोई जवाब मुस्लिम समुदाय से उठ पाया था? प्रतिशोध और जवाब सम्बन्धी कोई भी कार्रवाई तब भी नहीं हो पायी थी जब मुस्लिम भीड़ को सामूहिक रूप से जलाया गया था. हाशिमपुरा में तो पीएसी ने घरों से मुस्लिम नौजवानों को खींचकर नहर पर गोली मारी थी. अलीगढ़ से लेकर यवतमाल तक सैकड़ों दंगों में मुस्लिम बर्बाद हुए.
यहां सिर्फ मुस्लिम-मुस्लिम का रोना नहीं है. 1984 के सिख दंगों के बाद भी दमनकारी हिन्दू ताकतों का सिखों ने क्या बिगाड़ लिया? अलबत्ता 21वीं शताब्दी में वे उनके साथ राजनीति करते दिख रहे हैं. ईसाई ननों से बलात्कार, उनकी हत्या और चर्चों पर हमलों के बाद भी ईसाई समाज ने क्या कर लिया? लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला में
दलितों के नरसंहार पर दलितों ने क्या कर लिया? छिटपुट नक्सली हमलों से अलग, जिसमें वे खुद शामिल नहीं होते हैं, बस्तर के आदिवासियों ने ही कौन-सा पहाड़ तोड़ लिया?
प्रतिशोध में जब सिख हथियार उठाए तो चरमपंथी, आदिवासी उठा ले तो नक्सली, हिन्दू उठा ले तो राष्ट्रवादी, विद्रोही उठा ले तो अलगाववादी लेकिन एक मुस्लिम के प्रतिशोधी स्वरुप को आतंकवादी का नाम दिया जाता है. एक ही काम के इतने अलग नाम क्यों?
यहां यह दलील नहीं दी जा रही है कि मुस्लिम को आतंकवादी मत कहो. बल्कि यह समझाने को कोशिश हो रही है कि एक नियम सब पर लागू हो. आतंकवादी उसे ही कहा जाए जो आतंकवादी हो. देशद्रोही उसे ही कहा जाए जो देशद्रोही हो. विरोधी उसे ही कहा जाए जो विरोधी हो. वहां निर्णय एक मानवीय आधार पर लिया जाए, न कि धर्म के आधार पर.
जिस देश की अदालत में फैसले का आधार मनुस्मृति को बनाया जाता हो, उस देश में कोई भी दमित वर्ग क्या कर सकता है? वे लिखने और भाषायी विरोध के अलावा कुछ नहीं कर सकते हैं, लेकिन हिंदूवादी ताकतों का आलम यह है कि वे इस लिखने और विरोध की आवाज़ से ही बिलबिला उठती हैं. क्या कहें इस बिलबिलाहट को, लोकतंत्र या नरसंहार?
(नैयर इमाम पेशे से अध्यापक हैं. उनसे naiyarimam88@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. यह उनके अपने विचार हैं.)