Tuesday, September 2, 2014

सरगुजा जिले में अडानी कंपनी द्वारा किया जा रहे अवैध तथा गैरकानूनी खनन को तुरंत बंद किया जाये

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पांचवी बार ईसाइयो पे चंगई सभा के नाम से संघ और उनसे जुड़े संघटनो ने घरपो पे हमला किया और लोगो को मारा पीटा , प्राथना स्थल का अपमान किया ,तोफ फोड़ किया



साथियो ,

आज फिर और पिछले दिनों से लगातार पांचवी बार ईसाइयो पे चंगई सभा के नाम से संघ और उनसे जुड़े संघटनो ने घरपो पे हमला किया और लोगो को मारा पीटा  , प्राथना स्थल का अपमान किया ,तोफ फोड़ किया ,पुलिस ने आके दंगाईयो की जगह इस निरपराध लोगो जी गिरफ्तार कर लिया। और स्थनीय अखबारों ने पूरी तरह धर्म परिवर्तन की कहानी बना के पेश की और दंगाईयो की हो फोटो प्रमुखता से  छापी  मनो उनलोगो ने कोई बडा नेक काम किया है।  

पूरा समाचार ये है। 

चाम्पा जांजगीर जिले के कैरा ग्राम पंचायत के मोहल्ले चारभाटा  में दुकलु राम देवांगन के घर में कुछ प्राथना सभा चल रही थी ,इस पे गॉव और बहार के 100 -150   लोगो ने रात  को हल्ला मचाना शुरू कर दिया ,बुरे और अपमान जनक नारे लगाये गए , और इनके घरो में घुस गए ,

सरपंच लोकेश शर्मा के साथ सैकड़ो लोगो के लेके गॉव में ही इनके खिलाफ गलियो में जुलुस निकला गया ,और घर में घुसने के कारण  बहुत मारपीटी की गई , जो लोग पिटे वो पुरे मसीही समाज के ही लोग है ,क्योकि धर्म सेना के लोग हथियारों  के साथ आये थे , 
थोड़ी देर में पूर्व योजना के तहत पुलिस आए गई ,और उसने भी दंगाईयो का ही साथ दिया ,और सभी घर के लोगो को गिरफ्तार कर लिया ,, और ठाने  ले गए।  
दूसरे दिन सभी अखबारों ने जो समाचार छपा वो ठीक इसके उल्टा था ,समाचारो में कहा गया की उस घर में धर्मांतरण चल रहा था ,और जब गॉव वालो और पुलिस ने इसे बंद करने को कहा तो उन्होंने इससे मना  कर दिया ,इसके बाद गॉव और पुलिस  के लोगो ने उनके खिलाफ कार्यवाही की। 

इसके पहले हुई पांचो घटनाओ की जानकारी इसी ब्लॉग में छपी है  ,इसे ओपन कर ले और अपनी याद ताजा कर लें। 

इस खबर को भेजने का सिर्फ इतना निमित्त  है की हम सबको राज्य स्तर  पे मिल बैठ के तुरंत कुछ कार्यवाही करना चाहिए , मेरी  ऐपी जोसी  जी से बात हुई है और प्रसाद राओ , डिग्री प्रसाद , से बात हुई हैं , मुझे लगता है की सिर्फ इसी पे चर्चा करने के लिए राज्य स्तर  पे एक बैठक बुलानी चहिये और डिटेल में कार्यक्रम बनाने की जरूरत हैं , 

लाखन सिंह 

बस्तर में नक्सली उन्मूलन की आड़ में लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं पर हमला चिंताजनक है।


प्रेस  विज्ञप्ति 

बस्तर में नक्सली उन्मूलन की आड़ में लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं पर हमला चिंताजनक है। 

छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन के महासचिव एड सुधा भारद्वाज ने प्रेस विज्ञप्ति ज़ारी कर अन्तागढ़ विधान  सभा उपचुनाव  के दरम्यान घट रही घटनाओं पर  गहरी चिंता व्यक्त की। बारह में से दस प्रत्याशियों का नामांकन वापस लेना तथा कांग्रेस उम्मीदवार मंतूराम पवार का रहस्यमयी तरीके से गायब होकर फिर प्रकट होने की घटनाएँ  बिलकुल भी स्वाभाविक नहीं कही जा सकती हैं विशेषकर जब हाल के विधान सभा चुनावों में बस्तर संभाग में कांग्रेस पार्टी को कई सीटें प्राप्त हुई थी। समाचार पत्रो के अनुसार जो एकमात्र प्रत्याशी अब चुनाव मैदान में बचे हैं - अम्बेडकराइट पार्टी ऑफ़ इंडिया के रूपधर पुडो - ने भी प्रेस वार्ता लेकर बताया कि उनपर अपना नाम वापस लेने के लिए बहुत दबाव बनाया जा रहा था, यहाँ तक कि उन्हें नामांकन वापस लेने की अवधि  तक "भूमिगत" हो जाना पड़ा ।  निष्पक्ष और मुक्त वातावरण में चुनावों का किया जाना हमारे लोकतान्त्रिक ढांचे की बुनियादी शर्त  हैं।  परन्तु ऐसा लग रहा है  कि बस्तर में सैन्यीकरण की परिस्थितियों को राजनैतिक विपक्षियों से निपटने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 

26  अगस्त को रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस लेकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष श्री  भूपेश बघेल ने कहा कि जिन चैतराम साहू और उनकी पत्नी मंजुला को "हार्डकोर नक्सली" बताकर सरेंडर दिखाया गया है वे साधारण ग्रामीण हैं, मंजुला खाना पकाने का काम करती है। इसी प्रकार 27 अगस्त को जगदलपुर में प्रेस कांफ्रेंस  लेकर आदिवासी महासभा के अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री के नाम सौंपे गए एक ज्ञापन में कहा  है कि जिन  सुखदेव नाग और माँगीराम कश्यप  को झीरम घाटी के आरोपी बताकर गिरफ्तार किया गया  है,  वे दोनों ग्रामीण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारी हैं। सुखदेव नाग दरभा जनपद का चुना हुआ सदस्य है  और माँगीराम टाहकवाड़ा में पार्टी ब्रांच का सचिव है। इन्हें 25 अगस्त को तोंगपाल थाना में बुलाया गया था। थानेदार के नहीं मिलने पर शाम को ये फिर थाना गए थे। अगले दिन इन्हें झीरम हमले में शामिल होने और महेंद्र कर्मा को गाेली मारने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। जबकि दो बार पहले भी एनआईए ने सुखदेव नाग से पूछताछ की थी जिसमें एनआईए को कोई प्रमाण नहीं मिला था। 

27 अगस्त को ही आम आदमी पार्टी की  प्रत्याशी रही सोनी सोढ़ी ने  जगदलपुर में  वार्ता लेकर बताया कि उनकी पार्टी के एक जांच दल ने पाया है कि चिंतागुफा क्षेत्र के जिस रामाराम ग्राम में नक्सली मुठभेड़ में 11 नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया गया है, वास्तव  में वहां एक ग्रामीण महिला  अड़मे वेट्टी फ़ोर्स के अंधाधुन्द गोलीबारी से मारी गयी जिसे गांववालों ने वहीँ दफनाया था। उसी  प्रकार ग्राम बड़े गुड़रा  के जिस गाली  को  नक्सली के नाम पर आत्मसमर्पण करवाया गया है, न  केवल वह एक साधारण ग्रामीण है बल्कि उसे समर्पण का कोई लाभ देने की बजाय जेल में डाल दिया गया है। 

कांकेर ज़िले में पिछले 6 महीनों में  करीब 13 जन  प्रतिनिधियों (सरपंच/ जनपद  सदस्य/ सचिव) को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें अंतागढ़ ब्लॉक के कांग्रेस नेता बद्री गावडे भी हैं जो  "रावघाट संघर्ष समिति" की भी अगुआई कर रहे थे । इन गिरफ्तारियों को स्थानीय जनता भविष्य में प्रस्तावित विभिन्न परियोजनाओं - दो बड़े अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांटों और रावघाट खदानों के संभावित विरोध से जोड़कर देख रही है।    

छत्तीसगढ़ शासन ने यू. पी.  ए. सरकार के समय में सुप्रीम कोर्ट में पोलावरम परियोजना के विरुद्ध एक प्रकरण दायर किया था जिसमे कहा गया था कि कोंटा क्षेत्र के 16  ग्रामों और करीब  7000 हेक्टेयर वन्य प्राणियों और सम्पदाओं से भरपूर वन भूमि के डूब में आने की सम्भावना थी। प्रभाव का पूरा अध्ययन नहीं किया गया है और न ही ग्राम सभाओं से पेसा कानून के अंतर्गत कोई मशविरा ही किया गया है।  अब केंद्र सरकार के बदल जाने और इस परियोजना को अपने मातहत करने के पश्चात, छत्तीसगढ़ शासन इस  सम्बन्ध में अपने नागरिकों और अपने हितों के बचाव के लिए आगे आता नहीं दिखाई दे रहा है। हाल में प्रस्तावित पोलावरम बांध के विरोध में आदिवासी महासभा ने एक लम्बी पदयात्रा कोंटा ब्लॉक में निकाली थी। 

अंत में छत्तीसगढ़ लोक  स्वातंत्र्य संगठन की ओर से  यह  जानकारी दी गई कि दिनांक 25 अगस्त को छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम की संवैधानिकता के विरुद्ध लगे PUCL  की स्पेशल लीव पेटिशन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा छत्तीसगढ़ शासन को नोटिस ज़ारी किया गया है।  जस्टिस राजिन्दर सच्चर ने PUCL की ओर से पैरवी की थी ।   

सुधा भारद्वाज, अधिवक्ता 
महासचिव , छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन 
मोबाइल नंबर  - 09926603877  

Monday, September 1, 2014

मोदी की 'सरकार' और 'हिंदू राष्ट्र' का सपना

मोदी की 'सरकार' और 'हिंदू राष्ट्र' का सपना

 मंगलवार, 22 अप्रैल, 2014 को 11:36 IST तक के समाचार
भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का नाता पार्टी के अस्तित्व से भी पुराना है. क्योंकि भारतीय जनता पार्टी जिस जनसंघ से बनी है, उसका सीधा जुड़ाव आरएसएस से रहा है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक सदस्यों में शामिल माधव सदाशिव गोलवालकर ने अपने ज़माने में जनसंघ को आरएसएस का पूर्वपक्ष कहा था.
जनसंघ को उन्होंने आरएसएस के लिए नियुक्ति केंद्र बताया था जिसके मुताबिक़ अगर कोई जनसंघ में काम करता, तो अंत में वह संघ के लिए और संघ के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए काम कर रहा होता.
उस ज़माने में संघ के उद्देश्य राजनीतिक नहीं होते थे. तब वे सामाजिक और सांस्कृतिक थे. जिसके अंदर हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना भी थी.
गोलवालकर ने राजनीति को अस्पृश्य माना था. उन्होंने तब कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राजनीति सबसे निम्न माध्यम है.

सोच में बदलाव का इतिहास

एमएस गोलवालकर का मॉडल राजनीति को तिरस्कृत करने का मॉडल था. लेकिन अब उसमें बदलाव आ गया है. हालांकि ये भी सच है कि संघ की सोच में बदलाव का इतिहास भी बेहद पुराना है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जो इतिहास है, उसके मुताबिक संघ और हिंदू महासभा में दरार इसलिए आई थी क्योंकि वीर सावरकर की सोच अलग थी. वे 1929 तक ज़्यादा प्रभावी हो गए थे.
इसके बाद 1938-1939 तक वे उसके अध्यक्ष भी बने. उनका मानना था कि बिना राजनीति को महत्व दिए हिंदू राष्ट्र संभव नहीं है. राजनीति को निम्न मानना ग़लत है. इसी बात पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के बीच दरार पड़ी.
संघ के मौजूदा सर संघचालक मोहन भागवत का मॉडल, हिंदू महासभा और वीर सावरकर के हिंदुत्व के मॉडल पर आधारित है, उसको अपनाता है. जबकि गोलवालकर का मॉडल उसको खारिज़ करता है.
गोलवालकर का मॉडल संन्यास का मार्ग था, उससे उलट मोहन भागवत का मानना है कि हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना तब तक साकार नहीं हो सकती जबतक राजनीति और राजनीतिक नेता उसकी अगुआई नहीं करते. इससे साफ़ है कि संघ और भारतीय जनता पार्टी में जो फर्क़ था वो अब मिट चुका है.

संघ और पार्टी का भेद?

मीडिया में ये चर्चा ज़रूर चलती रहती है कि आरएसएस का बीजेपी पर कितना प्रभाव है? अगर बीजेपी की सरकार बनती है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उसमें क्या भूमिका रहेगी? लेकिन इसका हक़ीकत से कोई लेना देना नहीं है. इसे समझने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल को देखना होगा.
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार छह साल तक चली थी. तब वाजपेयी और आडवाणी ने सोच समझकर एक रणनीति के अनुसार संघ को सरकार से दूर रखा. इसे अलग अलग जामा पहनाने की कोशिश भी ख़ूब हुई जिसमें गठबंधन की मजबूरी का सबसे ज़्यादा हवाला दिया गया.
लेकिन वाजपेयी और आडवाणी का मानना था कि संघ को अपना काम करना चाहिए और सरकार और पार्टी को अपना काम करना चाहिए. इस दौरान बहुत सारी चीज़ें ऐसी हुईं जिनका कोई प्रमाण देना संभव नहीं है लेकिन इसकी तस्दीक अलग तरीके से हो सकती है.
मसलन, संघ मुख्यालय, नागपुर में आरएसएस के बहुत सारे सूत्र बताएंगे कि वाजपेयी-आडवाणी ने रज्जू भैया को सर संघचालक की गद्दी से नहीं उतरने के लिए मनाया क्योंकि रज्जू भैया के बाद संघ कि जिम्मेदारी केएस सुदर्शन को मिलनी थी, जो कट्टरवादी थे.

मोदी की रणनीति

वाजपेयी और आडवाणी ने संघ को राजनीति से दूर रखने के लिए काफ़ी मजबूत रणनीति अपनाई थी. अब वो रणनीति नहीं है, अब संघ और पार्टी एक हैं.
ऐसे में यह कहना कि बीजेपी की सरकार पर संघ का क्या प्रभाव होगा, एक तरह से बेमानी ही है. अब संघ और पार्टी दोनों एक ही हो चुके हैं, अलग अलग रुपों में ही सही.
इससे राजनीति निश्चित तौर पर प्रभावित होगी. आरएसएस का गोलवालकर वाला मॉडल हो या सावरकर वाला मॉडल, दोनों ही गैर लोकतांत्रिक हैं.
जनतंत्र में दोनों की आस्था नहीं है. उनकी आस्था इसलिए नहीं है क्योंकि वे लोकतंत्र के दोनों मॉडल, चाहे वो रिपब्लिकन मॉडल हो या फिर डेमोक्रेटिक मॉडल दोनों को विदेशी मानते हैं और उसे अपनी संस्कृति का हिस्सा नहीं मानते.
एक सवाल यह जरूर उठता है कि क्या मोदी भी वाजपेयी और आडवाणी की तरह सरकार से संघ को दूर रखने का कोई उपाय तलाशेंगे. यह भविष्य तय करेगा. मेरे ख्याल से राजनीतिक विश्लेषक को ज्योतिषी का काम नहीं करना चाहिए.
दुर्भाग्य यह है कि हमारे राजनीति विश्लेषक कभी-कभी ज्योतिषी हो जाते हैं.

हिंदू राष्ट्र का सपना

हमें यह ध्यान रखना होगा कि 2025 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे हो रहे हैं. लोगों को अचरज भले हो लेकिन एक बड़ा सच यह है कि संघ वाले नरेंद्र मोदी के सरकार बनने की संभावना और हिंदू राष्ट्र साकार होने का सपना साथ-साथ देख रहे हैं.
संघ वालों की राय में अगर दस साल मोदी रह जाएं तो 2025 में जब संघ के 100 साल पूरे होंगे तबतक भारत का हिंदू राष्ट्र बनना संभव हो जाना चाहिए.
(आलेख बीबीसी संवाददाता रूपा झा से बातचीत पर आधारित. राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर ज्योतिर्मय शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व पर कई पुस्तक लिख चुके हैं, बुधवार को बीबीसी हिंदी की वेबसाइट पर पढ़िए हिंदुत्व की राजनीति पर उनकी अगली कड़ी)

गुजरात: 'संघ' की शिक्षा सरकारी स्कूलों में


 सोमवार, 28 जुलाई, 2014 को 10:09 IST तक के समाचार
गुजरात सरकार उन किताबों को राज्य के सभी प्राइमरी और हाई स्कूलों में पढ़ाने जा रही है जिन्हें पिछले दो दशकों से संघ की शाखाओं में बाँटा जाता रहा है.
अब तक ये किताबें 'विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान' के स्कूलों में भी पढ़ाई जा रही थीं लेकिन अब ये सरकारी स्कूलों में भी बांटी जाएंगी.

बत्रा की ये किताबें मूल रूप से हिन्दी में लिखी गई हैं जिनका गुजराती में अनुवाद किया गया है और इन सब पर एक मोटी रकम ख़र्च की गई है.इन पुस्तकों के लेखक आरएसएस के कार्यकर्ता दीनानाथ बत्रा हैं. ये वही दीनानाथ बत्रा हैं जिन्होंने अमरीकी लेखक वेंडी डोनिगर की किताब का ज़ोरदार विरोध किया था और इसके बाद प्रकाशक ने सारी प्रतियां बाज़ार से वापस मँगवा ली थीं.
राज्य सरकार के इस फ़ैसले का कुछ लोग विरोध भी कर रहे हैं लेकिन ख़ुद दीनानाथ बत्रा कहते हैं सरकार का ये फ़ैसला सही है और इन किताबों को हर राज्य सरकार के स्कूलों में बाँटा जाना चाहिए.

अंकुर जैन की इस रिपोर्ट को विस्तार से पढ़ें

अमरीकी लेखक वेंडी डोनिगर की किताब को बाजार से हटवाने के लिए प्रकाशक को मजबूर करने वाले आरएसएस कार्यकर्ता और लेखक दीनानाथ बत्रा की किताबें अब गुजरात सरकार स्कूलों में बँटवाने जा रही है.
शिक्षा बचाओ आंदोलन संस्था के अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा ख़ुद को किताबों का सोशल ऑडिटर कहते हैं.
बत्रा ने ये किताबें 'विद्याभारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान' के लिए नब्बे के दशक में लिखी थीं. विद्या भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित स्कूलों और उच्च शिक्षा के संस्थानों का नेटवर्क है.
ये किताबें पिछले दो दशकों से इन स्कूलों में पढाई जा रही हैं और शाखाओं में बाँटी जाती रही हैं. गुजरात सरकार ने हाल ही में एक मोटी राशि ख़र्च करके बत्रा की कुल नौ किताबों के 42 हज़ार सेट गुजरात के प्राइमरी और हाई स्कूलों में बँटवाने का फ़ैसला किया है.
सवाल उठता है कि आख़िर इन किताबों में ऐसा क्या है कि गुजरात सरकार ने करीब एक साल तक इनका हिन्दी से गुजराती में अनुवाद करवाया और अब उन्हें स्कूलों में वितरित किया जा रहा है.

'अगर यहूदी इसराइल ले सकते हैं तो...'

दीनानाथ बत्रा अपनी एक किताब में बच्चों से सवाल करते हैं कि आप भारत का नक्शा कैसे बनाएंगे और फिर कहते हैं कि क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, तिब्बत, बांग्लादेश, श्रीलंका और बर्मा अविभाजित भारत का हिस्सा हैं.
किताब में लिखा है, "मित्रों, तैयार हो जाओ अखंड भारत की महिमा और अस्मिता को पुनः स्थापित करने के लिए... अगर 1700 वर्ष बिना भूमि के रहे यहूदी अपने संकल्प से इसराइल ले सकते हैं, अगर खंडित वियतनाम और कोरिया फिर एक हो सकते हैं तो भारत भी फिर से अखंड हो सकता है."

'पश्चिमी संगीत पशुभाव पैदा करता है'

‘शिक्षा में त्रिवेणी’ नाम की किताब में बत्रा लिखते हैं, “आज के युग में लोगों के पहनावे ने शरीर को बाजार में लाकर सुंदरता की नीलामी में लाकर खड़ा कर दिया है. पहनावे से चंचलता और विचारों में उत्तेजना आना स्वाभाविक है."
गुजरात सरकार ने बत्रा की इस किताब के अलावा ‘शिक्षा का भारतीयकरण’, ‘विद्यालय-कार्यकलाप का घर’ और ‘प्रेरणादीप’ किताबें गुजराती में छपवाई हैं.
शिक्षा त्रिवेणी किताब में ही बत्रा बच्चों को पश्चिमीकरण से सावधान रहने को कहते हैं. वे लिखते हैं, "वेस्टर्न म्यूजिक, डिस्को जैसे उत्तेजक गीत पशुभाव जागृत करते हैं. बच्चों को भजन और देशभक्ति के गीत सुनने चाहिए."
अपनी किताब ‘शिक्षा का भारतीयकरण’ में बत्रा बच्चों को जन्मदिन पर मोमबत्ती बुझाकर नहीं, बल्कि गायत्री मंत्र पढ़ कर मनाने की हिदायत देते हैं.

'हर राज्य सरकार को ऐसी किताबें बाँटनी चाहिए'

दीनानाथ बत्रा मानते हैं कि सालों तक देश की शिक्षा प्रणाली ने विद्यार्थियों को भारत के गौरवान्वित इतिहास से वंचित रखा और अब समय आ गया है इसे बदलने का.
वे कहते हैं, “स्कूलों में आज तक सिर्फ अकबर और औरंगज़ेब पर कई पेज होते थे लेकिन शिवाजी और महाराणा प्रताप पर सिर्फ़ कुछ पंक्तियां ही. मेरी किताबों में भारत के इतिहास की झलक है जो स्कूल की किताबों में नहीं होती. बच्चों को गलत इतिहास परोसा गया है और इसे बदलना होगा. मैं चाहता हूं कि ऐसी किताबें अन्य राज्य भी बाँटें."

आरएसएस की प्रशंसा

गुजरात के स्कूलों में बँटी बत्रा की सभी किताबों में आरएसएस और संघ प्रचारक रह चुके लोगों की जमकर प्रशंसा की गई है.
एक जगह दीनानाथ बत्रा लिखते हैं, "जो विद्यार्थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में रोज़ जाते हैं उनके जीवन में चमत्कारी बदलाव आ जाते हैं. इनमें से कई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई अच्छे नम्बरों से पास कर, अब अपनी युवा क्षमता और इच्छाओं का देश हित में उपयोग कर रहे हैं."
सभी किताबों में मौजूदा शिक्षा के ढांचे की तीखी आलोचना करते हुए बत्रा बच्चों से कहते हैं कि उन्हें जान बूझकर इतने सालों तक गलत इतिहास पढ़ाया गया.
वो लिखते हैं, "इंग्लिश शिक्षा ने हिन्दू शब्द को विकृत किया है. मेकॉले और मार्क्स के पुत्रों ने हमारे इतिहास के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ किया है."

'आरएसएस वालों को ही नियुक्त किया जाता है'

समाज शास्त्री अच्युत याग्निक कहते हैं कि पिछले कई सालों से यूनिवर्सिटी के कुलपतियों की नियुक्ति के लिए उम्मीदवार का आरएसएस से ताल्लुक होना ज़रूरी है.
उनके मुताबिक, "गुजरात सरकार में कुलपति की नौकरी सिर्फ आरएसएस से जुड़े लोगों को ही दी जाती है. पर अब सरकार कॉलेज की बजाय स्कूली शिक्षा में भी आरएसएस को एंट्री दे रही है. बत्रा की किताबें इसका पहला संकेत हैं. समाज का ध्रुवीकरण और हिंदुत्ववाद फैलाने के लिए अब स्कूल का उपयोग होगा."
बत्रा की किताबों का अनुवाद कराने वाले डॉ जयेश ठक्कर, गुजरात पाठ्यपुस्तक मंडल की अनुसंधान समिति के अध्यक्ष हैं. वो कहते हैं, "बच्चों को अगर संस्कार और भारत के इतिहास के बारे में बताया जाए तो इसे लोग भगवाकरण कहते हैं. अरे यह काम तो कांग्रेस की सरकार के वक़्त भी होता था."

शिक्षा क्षेत्र की बदहाली

लेकिन जो गुजरात सरकार बच्चों को संस्कार और भारत के इतिहास की 'सच्ची तस्वीर' बताने में इतनी तत्पर है, उस राज्य में शिक्षा की तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है. गुजरात के स्कूली पाठ्य पुस्तकों में गलतियों ने इतिहास के साथ ख़ूब खिलवाड़ किया है.
गांधी जी की पुण्य तिथि से लेकर विश्व युद्ध तक इतिहास के कई हादसे गलत तरह से प्रस्तुत किए गए हैं.
साल 2012 के आँकड़ों के मुताबिक गुजरात के स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट 58 प्रतिशत है जबकि कई अन्य राज्यों में यह 49 प्रतिशत है.
यही नहीं, अध्यापक और विद्यार्थी का अनुपात भी गुजरात में राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है. उच्चतर कक्षाओं में हर 52 विद्यार्थियों के लिए एक अध्यापक है जबकि राष्ट्रीय औसत 34 है.

सांप्रदायिकता से लड़ने वाला सिपाही चला गया'

सांप्रदायिकता से लड़ने वाला सिपाही चला गया'

 शनिवार, 30 अगस्त, 2014 को 12:36 IST तक के समाचारFacebook
बिपिन चंद्र
जाने माने इतिहासकार बिपन चंद्रा के निधन को भारत के कई इतिहासकारों ने एक अपूर्णीय क्षति बताया है.
इतिहासकार मृदुला मुखर्ज़ी का मानना है कि सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी और शायद ही किसी ने इतनी बड़ी भूमिका निभा
प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीबवहीं अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब का कहना है कि इतिहास के ज़रिए उन्होंने प्रगतिशील विचारों को फैलाया.
बिपन चंद्रा इस बात को ज़रूरी समझते थे कि इतिहास के ज़रिए प्रगतिशील विचारधारा को फैलाया जाए.
उनकी पुस्तकों 'इंडिया आफ़्टर इंडिपेंडेंस' और 'इंडियाज़ स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेंस' आदि में यह झलक देखने को मिलती है.
उनपर कांग्रेस समर्थक इतिहासकार होने के आरोप भी लगे, लेकिन जो भी इतिहासकार 1947 के पहले का इतिहास लिखेगा वो या तो ब्रितानी समर्थक होगा या कांग्रेस समर्थक. आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस का ही नेतृत्व था.''
यह कहना कि जो आज़ादी की लड़ाई को बेहतर समझता है, वो कांग्रेसी रुझान वाला होगा, ग़लत है.
लेकिन मैं मानता हूं कि 1980 से वो ये सोचने लगे थे कि देश में सांप्रदायिक शक्तियां इतनी तेज़ी से बढ़ रही हैं कि कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो इसका मुक़ाबला कर सकती है.
जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो उनको लगने लगा कि समाजवाद का अब वैसा भविष्य नहीं रहा. फिर भी वो अपनी पुरानी विचारधारा से हटे नहीं.
बाद में उन्हें कई बड़े ओहदे भी मिले. नेशनल बुक ट्रस्ट की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने संभाली, लेकिन बाद के दिनों में उनकी सेहत ख़राब हो चली थी.

मृदुला मुखर्जी

इस मौक़े पर उनका जाना, हमारे लिए बहुत बड़ी क्षति है. मुझे नहीं लगता कि पिछले पचास सालों में सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ जो लड़ाई लड़ी जा रही थी, उसमें उनसे ज़्यादा किसी ने भूमिका अदा की हो.
बिपिन चंद्र
उन्होंने बहुत विस्तृत फ़लक पर काम किया था. उन्होंने आर्थिक इतिहास, स्वतंत्रता संघर्ष के कई पहलुओं पर काम किया. उन्होंने कार्ल मार्क्स से लेकर भगत सिंह तक पर काम किया.
सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई, उनके लिए एक वैचारिक और भावनात्मक महत्व रखती थी. वो ये सोचते थे कि भारत में धर्म निरपेक्षता का मतलब ही है कि हमें सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ खड़े होना है.
मुझे लगता है कि एक ऐसे समय में जब सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई और तेज़ होनी चाहिए, हमारा एक सिपाही और जनरल चला गया. यह एक अपूर्णीय क्षति.
पिछले कुछ महीनों से बिपिन चंद्रा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी और इतिहास को लेकर नई सरकार के रवैये पर कुछ बोलने या कर सकने में वो असमर्थ थे, लेकिन एनडीए की पिछली सरकार जब सत्ता में आई थी तो उन्होंने एक दिल्ली हिस्टोरियन ग्रुप बनाया था जिसमें हम सभी लोग थे.
उस समय एनसीआरटी की क़िताबों में जो छेड़-छाड़ हो रही थी, उस पर हम लोगों ने अलग-अलग पहलुओं पर किताबें, पर्चे-पम्फ़लेट निकाले और ढेरों सेमिनार किए.
हिंदुस्तानियों को हिंदू बताने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और संघ प्रमुख मोहन भागवत का हाल के दिनों में कई बयान आए हैं.
भगत सिंह
बिपन चंद्रा का नज़रिया था कि जिस देश के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ाई लड़ी उसमें हिंदू राष्ट्र की कोई जगह नहीं थी. विभाजन के बाद पाकिस्तान धर्म के आधार पर इस्लामी देश बना, जबकि इसके ठीक विपरीत भारत धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद, लोकतंत्र की बुनियाद पर बना और ये हमारे संविधान में निहित है

First Cry…, a film by ajay t.g. trailer

Trailer


             https://www.youtube.com/watch?v=IjoeV8qhQ9E&feature=em-share_video_user






Film Description:
First Cry tells the remarkable story of Shahid Hospital in the mining township of Dalli Rajhara, in Chattisgarh. The hospital was paid for and built by the voluntary labour of daily-wage contract miners and successfully provides modern health-care to workers, adivasis and the poor.
Produced by Public Service Broadcasting Trust, New Delhi
(as described by Sikha Sen)