This Blog is dedicated to the struggling masses of India. Under the guidance of PUCL, Chhattisgarh, this is our humble effort from Chhattisgarh to present the voices of the oppressed people throughout India and to portray their daily struggles against the plunder and pillage that goes on against them throughout the country.
*16 जून को दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक छत्तीसगढ के सभी जिलों में राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करेंगे किसान*
*राज्य के 21 संगठनों ने मिलकर बनाया छत्तीसगढ किसान मजदूर महासंघ*
*कर्ज मुक्ति और फसल के दाम के अलावा 21 सौ रुपए समर्थन मूल्य, 3 सौ रुपए बोनस, 5 एच पी तक सिंचाई पंप को निशुल्क बिजली, धान का एक एक दाना खरीदने का चुनावी वायदे पूरे करने के लिए निर्णायक संघर्ष करेंगे किसान*
*मंदसौर में 7 किसानों की हत्या करने वाले शिवराज सरकार को बर्खास्त करने और हत्या का प्रकरण दर्ज करने की उठी मांग*
छत्तीसगढ के विभिन्न किसान संगठनों के आह्वान पर दो दर्जन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने आज रायपुर के बूढ़ा तालाब में धरना-प्रदर्शन किया, किसानों में मंदसौर में 7 किसानों की हत्या को लेकर मध्यप्रदेश के शिवराज सरकार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश था, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसान आंदोलन के लिए किसानों ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराया किसानों का आरोप है कि प्रधानमंत्री होने के नाते नरेंद्र मोदी को पूरे देश के किसानों के कर्ज माफ करने की बात कहनी चाहिए लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में उन्होने सिर्फ यूपी के किसानों के कर्ज माफ करने की बात कही और प्रधानमंत्री की इच्छानुसार यूपी के मुख्यमंत्री ने किसानों के कर्ज माफ करने का ऐलान भी किया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्षपातपूर्ण व्यवहार से मध्यप्रदेश सहित अन्य भाजपा शासित राज्यों के किसानों में जबरदस्त आक्रोश है जो मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में हड़ताल के रूप में उभरकर आया है,
छत्तीसगढ के किसान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के इस बात से हतप्रभ हैं कि छत्तीसगढ में धान की सरकारी खरीद को प्रति एकड़ 15 क्विंटल करने के लिए केंद्र सरकार ने नहीं कहा है, अमित शाह की इस सफाई पर छत्तीसगढ के किसानों ने मुख्यमंत्री रमन सिंह से पूछा है कि वह किसानों को बताए कि धान का एक एक दाना खरीदने का वायदा तोड़कर केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के किसके आदेश पर सरकार ने प्रति एकड़ 20 क्विंटल की धान खरीद को कम करके 15 क्विंटल किया है,
धान के बोनस पर विचार करने संबंधी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को किसानों को झांसा देने का प्रयास निरूपित करते हुए किसानों ने कहा कि सिर्फ एक साल का बोनस से किसानों का आक्रोश कम नहीं होगा, भाजपा सरकार को पूरे 4 साल का बोनस और समर्थन मूल्य के अंतर की राशि देनी होगी,
राष्ट्रीय किसान महासंघ के आह्वान पर छत्तीसगढ किसान मजदूर महासंघ द्वारा राज्य के सभी जिलों में 16 जून को तीन घंटे के लिए नेशनल हाईवे, स्टेट हाइवे, रेलमार्ग जाम करने का निर्णय लिया गया है ।
धरना-प्रदर्शन में छत्तीसगढ प्रगतिशील किसान संगठन के दुर्ग, बालोद, बेमेतरा और बलौदाबाजार के कार्यकर्ता, क्रांतिकारी किसान संगठन, छत्तीसगढ किसान मोर्चा, जिला किसान संघ राजनांदगांव, कृषक बिरादरी, छत्तीसगढ किसान सभा, नई राजधानी किसान कल्याण समिति, छत्तीसगढ एग्रीकान, छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना, राष्ट्रीय राजमार्ग नागरिक संघर्ष समिति, किसान बंधु, नदी घाटी मोर्चा, छत्तीसगढ महिला अधिकार मंच, व्ही फोरम, किसान महासंघ, आप किसान मोर्चा, किसान समन्वय समिति, छत्तीसगढ मुक्ति मोर्चा, छत्तीसगढ श्रमिक मंच, किसान समाज, तत्पर, छत्तीसगढ बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता शामिल थे ।
राजकुमार गुप्त, संयोजक, छत्तीसगढ प्रगतिशील किसान संगठन
** बुरकापाल से चालीस पुरुषों को पुलिस और सुरक्षा बल वाले छह जून को पकड के ले गए.
* आदिवासी महिलाओं और छोटी बच्चियों को भी सिपाही पीट रहे हैं, इन सिपाहियों का कहना है कि हम तुम्हारा गांव उजाड़ेंगे, सिपाही गांव की महिलाओं से कह रहे हैं कि तुम लोग गाँव खाली करके भाग
जाओ.
*****
बुराकपाल से करीब बीस महिलाएं और बच्चे दंतेवाड़ा आये हुए हैं,उनका कहना है की हमारे परिवारों के चालीस पुरुषों को पुलिस और सुरक्षा बल वाले छह जून को पकड के ले गए, इन आदिवासियों से फ़ोर्स वालों ने दिन भर फ्री में सीआरपीएफ कैम्प में काम करवाया और फिर अगले दिन सुकमा शहर लेकर चले गए.
इन आदिवासियों से फ़ोर्स वालों ने दिन भर फ्री में सीआरपीएफ कैम्प में काम करवाया और फिर अगले दिन सुकमा शहर लेकर चले गए,
अब पुलिस वाले और सीआरपीएफ वाले गांव की महिलाओं को जंगल में से तेंदू पत्ता और महुआ का बीज, टोरा भी नहीं बीनने दे रहे हैं,
आदिवासी महिलाओं और छोटी बच्चियों को भी सिपाही पीट रहे हैं, इन सिपाहियों का कहना है कि हम तुम्हारा गांव उजाड़ेंगे, सिपाही गांव की महिलाओं से कह रहे हैं कि तुम लोग गाँव खाली करके भाग
जाओ.
चित्र में बुरकपाल से आयी हुई महिलाओं का चित्र है उनके साथ सोनी सोरी भी मौजूद हैं,
दूसरे चित्र में उन आदिवासियों के नाम है जिन्हें फ़ोर्स वाले छह जून को पकड़ कर ले गए हैं,
इनमें सात स्कूली बच्चे भी शामिल हैं,
प्रेसविज्ञप्ति
मोदी सरकार किसानों को राहत देने की बजाए कार्पोरेट घरानों के मुनाफे हेतु प्रतिबद्ध .
आन्दोलनरत किसानों पर गोली चलाने से भाजपा सरकार का असली चेहरा उजागर हुआ .
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन
**
पिछले एक महीने से चार प्रमुख मांगो पर आन्दोलनरत किसानों पर मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा करवाई गई फायरिंग और दमनात्मक कार्यवाही का छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन कड़े शब्दों में निंदा करता हैं, और शहीद किसानों को श्रदांजलि अर्पित करता हैं l आन्दोलनरत किसानों की मांगो पर विचार करने के बजाये पुलिसिया दमनात्मक कार्यवाही से शिवराज और मोदी दोनों सरकारों का असली चेहरा उजागर हुआ हैं l
आज देश में किसानों के हालत बद से बदतर होते जा रहे हैं l कृषि में बढ़ते उत्पादन लागत, गिरते बाज़ार मूल्यों और चक्रवृद्धि ब्याज वाले बढ़ाते कर्जों के बोझ तले दबे किसानों को भाजपा के कर्ज माफी और आमदनी दुगुनी करने के वादों ने बहुत उम्मीद जगायी थी, परन्तु तीन साल बीतने के बाद किसान अब छला महसूस कर रहा है l कर्जे के बोझ तले दबे किसानों पर विमुद्रीकरण से उनकी आर्थिक स्थिति पर और अधिक गंभीर दुष्प्रभाव पड़े हैं l हालत यह रही की किसानों को उनकी उपज के खरीददार तक नही मिले l इसके उधाहरण छत्तीसगढ़ में भी दिखाई दिए जहाँ किसानों ने खरीददार नहीं मिलने पर टमाटर को व्यापक रूप से सडको पर फेंका हैं l
यह कहने में कोई आश्चर्य नहीं हैं कि सरकारें जानबूझ कर कृषि को संकट से उबारना नहीं चाहती l इसके पीछे मूल मकसद हैं किसानों कि जमीन को आसानी से बाजार में उपलब्ध कराते हुए उधोगीकरण और व्यावसायिक कृषि हेतु सोपना l ऊँची लागत नीचे दाम के संकट में किसान लगातार कर्जे में जा रहे है, जिसका नतीजा किसान आत्महत्या के आकड़े प्रतिदिन बढ रहे है l केन्द्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 12608 किसान आत्महत्या कर रहे है l हालाकि 2014 लोकसभा चुनावों से पूर्व ही देश के किसान आत्महत्या कर रहे थे, जो वर्तमान सरकार के समय भी अनवरत हैं l मोदी सरकार ने नारा तो किसानो की आय को दुगना करने का दिया हैं, परन्तु नीतियां किसानों से ज्यादा कार्पोरेट जगत को मुनाफा पहुचाने की अपनाई जा रहीं हैं l इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता हैं की कार्पोरेट जगत का 6 लाख 70 हजार करोड़ रूपये कर्ज को एन पी ए घोषित करके माफ़ कर दिया गया हैं l इसमें से 4 लाख 70 हजार करोड़ रूपये सिर्फ 50 बड़े कार्पोरेट घरानों का हैं l इसके अलावा मोदी सरकार के द्वारा पिछले 3 वर्षो में लगभग 1 लाख 70 हजार करोड़ की रियायत करों में प्रदान की गई हैं l
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन मोदी सरकार की इन कार्पोरेट परस्त नीतियों की कड़े शब्दों में निंदा करता हैं और मंदसोर सहित पूरे देश के किसानों के आन्दोलन में अपनी एकजुटता प्रदर्शित करता हैl साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों से किसानों की मांगो को शीघ्र ही पूरा करने का आह्वान करता हैं l
भवदीय
आनंद मिश्रा
नंदकुमार कश्यप
रमाकांत बंजारे
आलोक शुक्ला
**
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन
डर के दस्तावेज़ नहीं होते हैं, डर का माहौल होता है.
मेरा यही छोटा सा जवाब होता है जब कोई कहता है कि देश में इमरजेंसी नहीं है, इमरजेंसी का भ्रम फैलाया जा रहा है. सत्ता के आतंक और अंकुश का अंतिम पैमाना आपातकाल नहीं है. डराने के और भी सौ तरीके आ गए हैं, जो आपातकाल के वक्त नहीं थे.
सरकारें सबको नहीं डराती हैं, सिर्फ उन्हें डराती है, जिनसे उसे डर लगता है. ऐसे ही लोगों के आस-पास डर का माहौल रचा जाता है. यही वो माहौल है जहां से सत्ता आपको डराती है.
यूनिवर्सिटी में इंटरनेट कनेक्शन काट दिया जाता है. पटेल आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद कर दिया जाता है. दलित आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद हो जाता है. मध्य प्रदेश के मंदसौर में इंटरनेट बंद करने का क्या तुक रहा होगा? क्या मंदसौर में मॉस्को जितनी इंटरनेट कनेक्टिविटी होगी?
गोली खाने वाले किसानों की 'डिजिटल और डेटा हिस्ट्री' चेक की जाएगी?
सरकार को जब जनता से डर लगता है, तब उसका विश्वास इंटरनेट से उठ जाता है लेकिन जब बर्मा और बांग्लादेश की फर्ज़ी तस्वीरों को लेकर सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जाता है, तब इंटरनेट बंद नहीं किया जाता है.
यही वो उन्माद है जो हमारे समय में डर का दस्तावेज़ है. जो फाइलों में नहीं मिलेगा, माहौल में मिलेगा.
फ़ोन पर गालियां देने वाला ख़ुद को कोलकाता का बता रहा था, कह रहा था कि तुम सुधर जाओ जबकि मैं छह जून को किसानों की आमदनी पर चर्चा करके स्टूडियो से निकला था.
क्या किसानों को यह बताना ग़लत है कि आपकी मासिक आमदनी 1600 रुपये है. सरकार ने लागत में पचास फीसदी जोड़कर दाम देने का अपना वादा पूरा नहीं किया है.
क्या किसानों की बात करने पर गालियां दी जाएंगी? बहरहाल, जिस तरह की गाली दी गई, उसे मैं भारतीय संस्कृति का दुर्लभ दस्तावेज़ मानता हूं, इन सबको संकलित कर संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए.
इमेज कॉपीरइटNDTV
जब से एनडीटीवी के प्रमोटर के यहां सीबीआई ने छापे मारे हैं, तब से ऐसे फोन की तादाद बढ़ गई है. एनडीटीवी को लेकर पहले से झूठ की सामग्री तैयार रहती है, उसी का वितरण समय-समय पर चालू हो जाता है. फोन पर कोई मुझे माओवादी कहता है, कोई अलगाववादी.
कोई देख लेने की धमकियां दे रहा है, व्हाट्सऐप के ज़रिए लगातार अफ़वाह फैलाई जा रही है कि मैं माओवाद का समर्थन करता हूं. अहमदाबाद एयरपोर्ट पर ख़ुद को बीजेपी का समर्थक बताने वाले एक सज्जन को नहीं समझा सका कि मैं माओवाद का समर्थन नहीं करता हूं.
व्हाट्सऐप के ज़रिए फैलाए जाने वाला झूठ एक दिन लोगों के मन में रेफरेंस प्वाइंट बन जाता है. वो उसी चश्मे से देखने लगते हैं. जिस दिन बहुत से लोग इस झूठ पर यक़ीन कर लेंगे, मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे.
उनकी हत्या का आदेश गृह मंत्रालय की फाइल में नहीं मिलेगा. माहौल में मिलेगा जिसे राजनैतिक तौर पर रचा जा रहा है.
अफ़वाह भारत का नया राजनीतिक उद्योग है. राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अब इस अफवाह को फैलाने वाला वेंडर बन गया है. सिर्फ दो सवाल कीजिए, आपको सारे जवाब मिल जाएंगे. ये लोग कौन हैं और कौन लोग इनके समर्थन में हैं.
इसके लिए आपको बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के ट्विटर हैंडल पर जाकर चेक करने की ज़रूरत नहीं है, बहुत से गायक, लेखक, समाजसेवी बनकर घूम रहे लोगों की टाइमलाइन से भी आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं.
ये वही लोग हैं जो किसानों और ग़रीबों की बात करने पर किसी को नक्सल घोषित कर रहे हैं. तभी तो मुख्यमंत्री कह पाते हैं कि किसान पुलिस की गोली से नहीं मरे, असामाजिक तत्वों की गोली से मरे हैं. एक और मुख्यमंत्री हैं जो कहते हैं कि जो लोग किसानों को आंदोलन के लिए भड़का रहे हैं वो पाप कर रहे हैं.
देश भर में अनेक जगहों पर किसान आंदोलन कर रहे होते हैं, एक दिन सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ भी अभियान चलेगा कि ये किसान नहीं, पापी हैं.
आजकल कई पत्रकारों को विपक्ष के किसी नेता के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर देखिए उनके चेहरे पर कैसी आध्यात्मिक खुशी छा जाती है. आप इन्हीं पत्रकारों को केंद्र के ख़िलाफ़ या सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर उनकी चुप्पी देखिए.
पत्रकार का काम होता है सरकार के दावों पर पहले संदेह करे, जांच करे. इन दिनों सरकार की बात पर यकीन करने वाले पत्रकारों का समूह बढ़ गया है. इन पत्रकारों के पास सबसे बड़ा तर्क यह है कि पहले भी तो होता था.
इमेज कॉपीरइटAFP
'वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे'
भारतीय पत्रकारिता में सरकार परस्ती बढ़ गई है. सरकार से प्यार करने वाले पत्रकारों की आपूर्ति मांग से ज़्यादा है इसलिए अब पत्रकार हुकूमत की नज़र में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.
यही कारण है कि ऐसे पत्रकारों में होड़ मची है कैसे हुकूमत की नज़र में आ सकें. चीख कर, चिल्ला कर, धमका कर या उकसा कर. वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे.
जिन दोस्तों से बात करता हूं वो हर दूसरी बात के बाद यही कहते हैं कि फोन तो रिकॉर्ड नहीं हो रहा है. मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है मगर माहौल में यह बात है कि फोन रिकॉर्ड हो रहा है.
चुप रहने की सलाह बढ़ती जा रही है. जानता हूं भीड़ कुछ भी कर सकती है. यह भीड़ गौमांस के नाम पर किसी मुसलमान को मार सकती है, यह भीड़ बच्चा चोरी की अफवाह पर किसी हिन्दू को मार सकती है, यही भीड़ लंगर के लिए अनाज मांग रहे किसी सिख सेवादार की पगड़ी उछाल सकती है.
इमेज कॉपीरइटAFP
'यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है'
यूपी में जब पुलिस अधिकारी नहीं बचे तो मैं सुरक्षा किससे मांगू. कहीं ऐसा न हो जाए कि यूपी का एसएसपी बजरंग दल के नेताओं की सुरक्षा में ड्यूटी पर जा रहा हो.
यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है जिसका हर दिन प्रक्षेपण किया जाता है. सतर्क रहने की चेतावनी जब बढ़ जाए तो इसका मतलब है कि डर का सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक वितरण व्यापक हो चुका है.
डर का माहौल हर जगह नहीं होता है. उन्हीं के आसपास होता है जो सामाजिक आर्थिक मसलों पर बोलते हैं. यह व्यक्ति भी हो सकता है और समूह भी. दो रोज़ पहले पुरानी दिल्ली के किनारी बाज़ार से एक फोन आया था. कहने लगे कि हम व्यापारी हैं, अब हम खुलकर तो नहीं बोल सकते वरना ये सेल्स टैक्स और सीबीआई लगा देंगे, सोशल मीडिया से गाली दिलवा देंगे.
अच्छा है कि भाई साहब आप खुलकर बोलते हो. कोई तो बोल रहा है.
इमेज कॉपीरइटAFP
'फोन से डर की आवाज़ आ रही थी'
मैं हर विषय पर नहीं बोलता हूं. बोलने की पात्रता भी नहीं रखता. मेरी इस सफाई से किनारी बाज़ार के व्यापारी को कोई फर्क नहीं पड़ा. उनकी आवाज़ में डर था. मेरा हौसला बढ़ाने के लिए किया गए फोन से डर की आवाज़ आ रही थी.
ठीक इसी समय में बहुत से पत्रकार बोल रहे हैं. लिख रहे हैं मगर उनकी खबरों की पहुंच लगातार सीमित होती जा रही है. वो सब अपने-अपने संस्थान और मोहल्ले में अकेले हैं. जो हुकूमत के सुर से सुर मिलाकर गीत गा रहे हैं, उनकी आवाज़ ज़्यादा है. आप इस कोरस को ग़ौर से सुनियेगा. इस कोरस से जो संगीत निकल रहा है, वो भय का संगीत है.
लोकतंत्र की हत्या से पहले का बैकग्राउंड म्यूज़िक है.
भारत का मीडिया डर की राजधानी में रहता है. हम सब उस राजधानी से रोज़ गुज़रते हैं. डर सीबीआई का नहीं है, उस भीड़ का है जो थाने के बाहर भी है, अदालत के परिसर में भी. इस भीड़ को लेकर जो लोग नरम हैं, वही तो डर के दस्तावेज़ हैं.
वैसे लोग फाइलों में नहीं मिलते, आपके पड़ोस में हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
सोनकच्छ। मध्यप्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन ने उग्र और हिंसात्मक रूप ले लिया है। किसान अपने आंदोलन में इतने भटक गए हैं कि वे मासूम बच्चों और महिलाओं को निशाना बना रहे हैं। ऐसा ही एक वीडियो glibs.in के पास है, जिसमें एक बस को रोककर उस पर पत्थर बरसाए जा रहे हैं। जबकि बस में सवार बच्चे, महिलाएं और निर्दोष लोग रो-रोकर अपना बचाव कर रहे हैं। लेकिन प्रतिशोध में अंधे प्रदर्शनकारियों पर मासूमों के रोने का भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। प्रदर्शनकारी इतने पर ही नहीं माने, उन्होंने बस में आग लगा दी।
यह सच है कि किसानों के साथ सरकार छलावा कर रही है। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि प्रदर्शनकारी अपना विरोध मासूम नागरिकों पर हमला कर जताएं। हो सकता है कि किसानों के प्रदर्शन की आड़ में कुछ गैर सामाजिक तत्व इस तरह की हरकत कर रहे हों। इसलिए किसान भाईयों से glibs.in यह अपील करता है कि अपने प्रदर्शन को इतना हिंसक ना होने दें कि किसी मासूम की जान चली जाए।
देश का पेट पालने वाले अन्नदाता इतना बड़ा कलंक अपने माथे ना लगने दें। अपने प्रदर्शन से गैर सामाजिक तत्वों को पहचानिए और उन्हें दूर कीजिए। किसान नीतिगत तरीके से अपने हक की लडाई लडें और अंत में इतना ही कि इस वीडियों को देखें, और अपनी अंतरात्मा से पूछें कि क्या लड़ाई का यह तरीका सही है?
नवभारत 5 जून 2017
--
वैश्विक तापमान वृद्धि और मौसम परिवर्तन समझौते से अमेरिकी राष्ट्रपति ने अलग होने की घोषणा कर शायद किसी को भी हैरत में नही डाला ,असल में इन मामलो में अमेरिका का रुख हमेशा से विवादास्पद रहा है, असल में अमेरिकी प्रेसीडेंट किसी न किसी कारपोरेट लाबी के होते हैं और उनके अनुरूप अपने रुख रखते हैं, सामाजिक.वैज्ञानिक शोधों के नतीजे उन्हें ज्यादा प्रभावित नही करतीं.
परन्तु मौसम परिवर्तन की मूल बहस में जिस बात को अमेरिकी प्रेसिडेंट (ट्रंप की तरह विरोध करने वाले ) कहते रहे हैं कि मनुष्य की गतिविधियों से पृथ्वी को बहुत असर नही होता, तो आईये देखें कि हमारी पृथ्वी पर हम कितना प्रभाव डालते हैं,क्या इससे पृथ्वी गर्म हो सकती है, क्या पृथ्वी के मौसम परिवर्तन के लिए मानवीय गतिविधियों के अलावा कोई अन्य कारण भी हैं ,वो स्थाई हैं या अस्थाई,इसके लिए हमें जानना होगा की हमारी पृथ्वी क्या है और हम क्या हैं .
हमारी पृथ्वी लगभग 4.5 अरब वर्षों से अपनी धुरी पर घूम रही है, और आगे कम से कम 10 अरब वर्षों तक वह ऐसे ही घूमती रहेगी, यानी वह एक (perpetual) सतत गतिशील मशीन की तरह है, इसी घूर्णन से हमारी रात और दिन होते हैं, इसके साथ ही वह इतने ही समय से हमारे सूर्य के चारों और चक्कर लगा रही है जिसे हम अपना एक वर्ष कहते हैं, यही चक्कर हमारे मौसम निर्धारित करते हैं,इस पृथ्वी के समुद्र पहाड़ पानी बादल बरसात वनस्पति निर्माण, उसके म्यूटेशन (जिसके कारण जीव जंतुओं पेड़ पौधों की और हमारी भी उत्पत्ति हुई ) की क्षमता पर मनुष्य का कोई हस्तक्षेप नही है, खुद मनुष्य (HOMOSEPIEN) की अपनी उम्र 10 लाख साल के आस पास है, तमाम नैसर्गिक गतिविधियों के बीच मानव की गतिविधियों का अनुपात क्या हो सकता है, 1%,1.5%,2% या 2.5% ,और यही अनुपात तय करेगा कि पृथ्वी को गर्म करने और उसके मौसम को प्रभावित करने का काम हम कर रहे या नही.
पिछली सदी के सातवें दशक तक पर्यावरण अध्ययन करने वालों का बहुमत मानता था कि मनुष्य की तमाम गतिविधियाँ 1 से 1.5% तक है जो मौसम पर बहुत प्रभाव नही डालता, परन्तु 8 वें दशक से आद्योगीकरण का विस्तार एशिया और अफ्रीकी महाद्वीपों में बढ़ने, जैविक ईंधन (कोयला, तेल आदि fossil fuels) के बढ़ाते खपत ने आज तमाम शोधकर्ताओं को यह मानने में मज़बूर कर दिया है हमारी गतिविधियाँ 2% को पार कर 2.5% को छू रही हैं और यह मानव सभ्यता के लिए विनाशकारी हो सकता है .
.
औद्योगीकरण से पूर्व की तुलना आज पृथ्वी का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस अधिक है, वह लगभग 13.9/ 14 डिग्री सेल्सियस के करीब है,क्या यह औद्योगीकरण के कारण हुआ है, वहीं1880 जब पृथ्वी का तापमान मापना और रिकार्ड रखना शुरू हुआ, तब से आज का तापमान o.o4 डिग्री अधिक है, यह वृद्धि दिखने में बहुत कम लगती है, परन्तु स्थानीय स्तर पर यह 4से 5डिग्री की वृद्धि तक हो सकती है, हमारे पृथ्वी मेंCO2 का घनत्व मार्च 2015 में401.51ppmथा, यदि इसे हम टन के रूप में अभिव्यक्त करेंगे तो वह 855.21ख़रब टन (1ppm=2.13 gigaton) यह अप्रेल 2017में 409.01ppm हुआ और मई 17 में 409.25ppm हो गया, क्या यह उद्योगों, वाहनों,घरों से निकले गैस से हुआ, तो कुछ वैज्ञानिकों का कहना है, उत्सर्जन से वातावरण में CO2 के घतांव का सीधे सम्बन्ध जोड़ना आसान नही, हमारे औद्योगिक गतिविधियों से अन्य ग्रीन हॉउस गैसे भी निकलती हैं. उनसे भी ख़ास कर एसी, फ्रिज, बोतलों में बंद विभिन्न स्प्रेयर आदि से निकलने वाली गैसे पृथ्वी के ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती हैं, परन्तु यदि पिछले 137 वर्षों के औसत तापमान को देखें तो एक बारगी यह कहना मुश्किल है कि पृथ्वी बहुत गर्म हो गई है, फिर क्यों वैश्विक स्तर पर चिता व्यक्त किया जा रहा है.
पेरिस समझौते के अनुसार अभी भी पृथ्वी को औद्योगीकरण पूर्व के तापमान से 2 डिग्री अधिक में बने रहने हम (Conservative science (based on research by the Intergovernmental Panel on Climate Change) estimates that humanity can emit up to 762 billion tonnes of Carbon dioxide emissions from 2017 and still have a 66 percent chance of staying within a 2°C warming from pre-industrial times. Given our current emissions rate, that gives us just under 20 years before we blow through this budget.)
762 ख़राब टन CO2 का उत्सर्जन कर सकते हैं
वास्तव में औसत आंकड़े कभी भी स्थिति की भयावहता को नही दर्शाते, आज के तमाम विकसित देशों ने अपने यहाँ उपभोग और ऊर्जा खपत को उसके चरम में ले गए हैं ,
अमेरिका सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाला देश है उसका हिस्सा 25%, योरुपिन यूनियन 23%चीन 11%और भारत महज 2% ज़िम्मेदार है इसलिए पेरिस समझौते में अमेरिका को 1000 ख़राब डालर के ग्रीन फंड में उस अनुपात में हिस्सा देना था, इन पैसों से भारत जैसे देशों में साफ़ वैकल्पिक ऊर्जा विकसित करने सहायता मिलती ,परन्तु ट्रंप भाग लिए.
खैर हम वैश्विक उत्सर्जन में भले ही 2% भागीदारी रखते हैं ,परन्तु विकास की एकांगी सोच के कारण देश के अलग अलग हिस्से गरमी, बाढ़ और मरुस्थलीकरण की समस्या से ग्रस्त हो रहे हैं, बात छत्तीसगढ़ की ,और बिलासपुर में आखिर ऐसा क्या हुआ की तापमान अविश्वसनीय रूप से बढ़ा. तो फिर थोड़ा वैश्विक हालत देखें, हमारी धरती के भूमध्य रेखा और कर्क तथा मकर रेखाओं के बीच का क्षेत्र, जो पृथ्वी के कुल ज़मीन का 7% है उसमे पृथ्वी के आधे वन क्षेत्र सहित आधे से अधिक जैव विविधता मिलती है, भले ही भूमध्य रेखा पृथ्वी के बीचोंबीच है, सूरज उसके ऊपर सीधा नही चमकता ,क्योकि पृथ्वी 23 अंश झुकी हुई है, इसलिए सूर्य किरणे कर्क रेखा और मकर रेखा पर लम्बवत पडतीं है, दुनिया के घने वर्षा वन इन्ही में हैं और इसी ईलाके में औसत तापमान सबसे अधिक होता है.
पूरी धरती के तापमान को अवशोषित कर उसे नियंत्रित करने का काम ये वर्षा वन करते हैं .
छत्तीसगढ़ के सोनहत से कर्क रेखा गुजरती है ,पुराना बिलासपुर( मुंगेली कोरबा चाम्पा ) 21 अंश 47मिनट उत्तरी अक्षांश से 23 अंश 8 मिनट उत्तरी अक्षांश में स्थित है ,जो कर्क रेखा के एकदम समीप है सूर्य के उत्तरायण में ,1 जून, या कभी 2 जून को सूर्य किरणे यहाँ लम्बवत पड़तीं हैं और दक्षिणायन में 11 जुलाई को को सूर्य किरणे लंबवत पडतीं हैं ,प्रक्रति ने इसीलिए इसे घने वर्षावनों का सौगात दिया है ताकि वह सूर्य की सीधी किरणों के को ताप अवशोषित कर इस क्षेत्र को ठंडा रखे ,परन्तु हम देखते हैं की बाक्साईट और कोयला खनन के लिए क्षेत्र में वनों की निर्मम कटाई हुई, उस पर बड़ी संख्या में तापविद्युत गृहों का निर्माण,आज कोरबा जिले में स्थित हसदो वन क्षेत्र की हज़ारों एकड़ घने वन कोयला खनन के लिए दिया जा रहा है जो न सिर्फ गरमी को और बढ़ाएगा वरण अमानवीय विस्थापन भी करेगा , उसपर तुर्रा यह कि शहर के भीतर के 100 साल पुराने पेड़ों को काट दिया गया. इन सबका मिला जुला असर 49.3 डिग्री तापमान है, ग्लोबल वार्मिंग के स्थानीय असर को पहिचानकर और उनके कारणों को दूरकर ही हम सबको अच्छा पर्यावरण दे सकते हैं ,अमानवीय विस्थापन को रोक सकते हैं , पेड़ लगाना तो अच्छा है,अपने वनों और वृक्षों को बचाना सर्वोत्तम है.